पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 105
याज्ञवल्क्य-उक्त प्रायश्चित्त-विवेक
श्लोक 1 (garuda.1.105.1)
विहितस्याननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात् । अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति
vihitasyānanuṣṭhānānninditasya ca sevanāt anigrahāccendriyāṇāṁ naraḥ patanamṛcchati
विहित कर्म न करने से, निंदित कर्म का सेवन करने से, और इन्द्रियों को वश में न रखने से मनुष्य पतन को प्राप्त होता है।
श्लोक 2 (garuda.1.105.2)
तस्माद्यत्नेन कर्त्तव्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये । एवमस्यान्तरात्मा च लोकश्चैव प्रसीदति
tasmādyatnena karttavyaṁ prāyaścittaṁ viśuddhaye evamasyāntarātmā ca lokaścaiva prasīdati
इसलिए शुद्धि के लिए यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करना चाहिए। इस प्रकार उसकी अंतरात्मा और लोक दोनों प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 3 (garuda.1.105.3)
लोकः प्रसीदेदात्मैवं प्रायश्चित्तैरघक्षयः । प्रायश्चित्तमकुर्वाणाः पश्चात्तापविवर्जिताः
lokaḥ prasīdedātmaivaṁ prāyaścittairaghakṣayaḥ prāyaścittamakurvāṇāḥ paścāttāpavivarjitāḥ
प्रायश्चित्तों से पाप का क्षय होने पर लोक और आत्मा दोनों प्रसन्न होते हैं। जो प्रायश्चित्त नहीं करते और पश्चाताप से रहित रहते हैं,
श्लोक 4 (garuda.1.105.4)
नरकान्यान्ति पापा वै महारौरवरौरवान् । तामिस्रं लोहशङ्कुं च पूतिगन्धसमाकुलम्
narakānyānti pāpā vai mahārauravarauravān tāmisraṁ lohaśaṅkuṁ ca pūtigandhasamākulam
वे पापी महारौरव और रौरव जैसे नरकों को जाते हैं — तामिस्र, लोहशंकु, तथा दुर्गंध से भरा हुआ नरक,
श्लोक 5 (garuda.1.105.5)
हंसाभं लोहितोदं च सञ्जीवननदीपथम् । महानिलयकाकोलमन्धतामिस्रवापनम्
haṁsābhaṁ lohitodaṁ ca sañjīvananadīpatham mahānilayakākolamandhatāmisravāpanam
हंसाभ, लोहितोद, संजीवन नदी का मार्ग, महानिलय, काकोल, अन्धतामिस्र और वापन —
श्लोक 6 (garuda.1.105.6)
अविचीं कुम्भीपाकं च यान्ति पापा ह्यपुण्यतः । ब्रह्महा मद्यपः स्तेयी संयोगी गुरुतल्पगः
avicīṁ kumbhīpākaṁ ca yānti pāpā hyapuṇyataḥ brahmahā madyapaḥ steyī saṁyogī gurutalpagaḥ
अवीचि और कुम्भीपाक — पापी अपने पुण्यहीनता के कारण इन नरकों में जाते हैं। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर, [अनुचित] संगकर्ता, और गुरुपत्नीगामी —
श्लोक 7 (garuda.1.105.7)
गुरुनिन्दा वेदनिन्दा ब्रह्महत्यासमे ह्युभे । निषिद्धभक्षणं जिह्मक्रियाचरणमेव च
gurunindā vedanindā brahmahatyāsame hyubhe niṣiddhabhakṣaṇaṁ jihmakriyācaraṇameva ca
गुरु-निंदा और वेद-निंदा दोनों ब्रह्महत्या के समान हैं। निषिद्ध भोजन करना तथा छल-पूर्ण आचरण भी —
श्लोक 8 (garuda.1.105.8)
रजस्वलामुखास्वादः सुरापानसमानि तु । अश्वरत्नादिहरणं सुवर्णस्तेयसम्मितम्
rajasvalāmukhāsvādaḥ surāpānasamāni tu aśvaratnādiharaṇaṁ suvarṇasteyasammitam
रजस्वला स्त्री का मुख चूमना मद्यपान के समान है। अश्व-रत्न आदि का हरण सोना चुराने के समान माना गया है।
श्लोक 9 (garuda.1.105.9)
सखिभार्याकुमारीषु स्वयोनिष्वन्त्यजासु च । सगोत्रासु तथा स्त्रीषु गुरुतल्पसमं स्मृतम्
sakhibhāryākumārīṣu svayoniṣvantyajāsu ca sagotrāsu tathā strīṣu gurutalpasamaṁ smṛtam
मित्र की पत्नी, कुमारी, अपनी ही जाति की स्त्री, अंत्यज स्त्री, तथा सगोत्र स्त्री के साथ [सम्बन्ध] गुरुपत्नीगमन के समान माना गया है —
श्लोक 10 (garuda.1.105.10)
पितुः स्वसारं मातुश्च मातुलानीं स्नुषामपि । मातुः सपत्नीं भगिनीमाचार्य्यतनयां तथा
pituḥ svasāraṁ mātuśca mātulānīṁ snuṣāmapi mātuḥ sapatnīṁ bhaginīmācāryyatanayāṁ tathā
पिता की बहन, माता की बहन, मामी, पुत्रवधू, माता की सौत, अपनी बहन, आचार्य की पुत्री,
श्लोक 11 (garuda.1.105.11)
आचार्य्यपत्नीं स्वसुतां गच्छंस्तु गुरुतल्पगः । छित्त्वा लिङ्गं वधस्तस्य सकामायाः स्त्रियास्तथा
ācāryyapatnīṁ svasutāṁ gacchaṁstu gurutalpagaḥ chittvā liṅgaṁ vadhastasya sakāmāyāḥ striyāstathā
आचार्य की पत्नी, या अपनी पुत्री के साथ सम्बन्ध रखने वाला गुरुतल्पगामी होता है। उसका लिंग काटकर उसका वध किया जाना चाहिए, तथा सहमत स्त्री का भी।
श्लोक 12 (garuda.1.105.12)
गोवधो व्रात्यतास्तेयमृणानां च परिक्रिया । अनाहिताग्निताऽपण्यविक्रयः परिवेदनम्
govadho vrātyatāsteyamṛṇānāṁ ca parikriyā anāhitāgnitā'paṇyavikrayaḥ parivedanam
गौ-हत्या, व्रात्य होना (उपनयन न कराना), चोरी, ऋण न चुकाना; अग्नि न रखना, अविक्रेय वस्तु बेचना, छोटे भाई का बड़े से पहले विवाह करना,
श्लोक 13 (garuda.1.105.13)
भृत्याचाध्ययनादानं भृतकाध्यापनमन्तथा । पारदार्य्यं पारिवित्त्यं वार्द्धुष्यं लवणक्रिया
bhṛtyācādhyayanādānaṁ bhṛtakādhyāpanamantathā pāradāryyaṁ pārivittyaṁ vārddhuṣyaṁ lavaṇakriyā
वेतनभोगी गुरु से शिक्षा लेना और वेतन लेकर पढ़ाना; परस्त्रीगमन, बड़े भाई से पहले विवाहित होना, ब्याज पर धन देना, नमक बेचना,
श्लोक 14 (garuda.1.105.14)
सच्छूद्रविट्क्षत्त्रबन्धोर्निन्दितार्थोपजीविता । नास्तिक्यं व्रतलोपश्च शूल्यं गोश्वेव विक्रयः
sacchūdraviṭkṣattrabandhorninditārthopajīvitā nāstikyaṁ vratalopaśca śūlyaṁ gośveva vikrayaḥ
शूद्र, वैश्य या क्षत्रिय के बीच निंदित जीविका अपनाना; नास्तिकता, व्रत-भंग, तथा पशु को वध हेतु गौ के समान बेचना,
श्लोक 15 (garuda.1.105.15)
पितृमातृसुहृत्त्यागस्तडागारामविक्रयः । कन्यायादूषण चैव परिविन्दकयाजनम्
pitṛmātṛsuhṛttyāgastaḍāgārāmavikrayaḥ kanyāyādūṣaṇa caiva parivindakayājanam
पिता-माता-मित्रों का त्याग, तालाब या उद्यान की उचित देखभाल न करना; कन्या को दूषित करना, तथा बड़े भाई से पहले विवाहित व्यक्ति के लिए यज्ञ कराना,
श्लोक 16 (garuda.1.105.16)
कन्याप्रदानं तस्यैव कौटिल्यं व्रतलोपनम् । आत्मनोऽर्थे क्रियारम्भो मद्यपस्त्रीनिषेवणम्
kanyāpradānaṁ tasyaiva kauṭilyaṁ vratalopanam ātmano'rthe kriyārambho madyapastrīniṣevaṇam
उसे कन्या देना, कुटिलता, व्रत-भंग, केवल स्वार्थ के लिए यज्ञ आरंभ करना, तथा मद्यपी की पत्नी का सेवन करना,
श्लोक 17 (garuda.1.105.17)
स्वाध्यायाग्निसुतत्यागो बान्धवत्याग एव च । असच्छास्त्राभिगमनं भार्य्यात्मपरिवि क्रयः
svādhyāyāgnisutatyāgo bāndhavatyāga eva ca asacchāstrābhigamanaṁ bhāryyātmaparivi krayaḥ
स्वाध्याय, अग्नि और संतान का त्याग, तथा बन्धुओं का त्याग; असत् शास्त्रों का अनुसरण, तथा पत्नी या स्वयं को बेचना —
श्लोक 18 (garuda.1.105.18)
उपपापानि चोक्तानि प्रायश्चित्तं निबोधत । शिरः कपालध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन्
upapāpāni coktāni prāyaścittaṁ nibodhata śiraḥ kapāladhvajavān bhikṣāśī karma vedayan
ये उपपाप कहे गए हैं। अब प्रायश्चित्त को समझो। सिर पर कपाल की ध्वजा धारण करके, भिक्षा से जीवन-यापन करके, अपना कर्म प्रकट करते हुए —
श्लोक 19 (garuda.1.105.19)
ब्रह्महा द्वादश समा मितभुक् शुद्धिमाप्नुयात् । लोमभ्यः स्वाहेति च वा लोमप्रभृति वै तनुम्
brahmahā dvādaśa samā mitabhuk śuddhimāpnuyāt lomabhyaḥ svāheti ca vā lomaprabhṛti vai tanum
ब्रह्महत्यारा बारह वर्षों तक अल्प भोजन करके शुद्धि प्राप्त करता है। अथवा 'लोमेभ्यः स्वाहा' मंत्र से रोम से लेकर —
श्लोक 20 (garuda.1.105.20)
मज्जान्तां जुहुयाद्वापि स्वस्वमन्त्रैर्यथाक्रमम् । शुद्धिः स्याद्ब्राह्मणत्राणात्कृत्वैवं शुद्धिरेव च
majjāntāṁ juhuyādvāpi svasvamantrairyathākramam śuddhiḥ syādbrāhmaṇatrāṇātkṛtvaivaṁ śuddhireva ca
अस्थि-मज्जा तक अपने-अपने मंत्रों से क्रमशः हवन करे। ब्राह्मण की रक्षा करने से भी शुद्धि होती है — ऐसा करने से भी शुद्धि होती है,
श्लोक 21 (garuda.1.105.21)
निरातङ्कं द्विजं गां च ब्राह्मणार्थे हतोऽपि वा । अरण्ये नियतो जुप्त्वा त्रिः कृत्वो वेदसंहिताम्
nirātaṅkaṁ dvijaṁ gāṁ ca brāhmaṇārthe hato'pi vā araṇye niyato juptvā triḥ kṛtvo vedasaṁhitām
अथवा निरोग द्विज या गौ की रक्षा करने से, या ब्राह्मण के लिए स्वयं मारा जाने से भी। अथवा वन में संयमित होकर वेद-संहिता का तीन बार पाठ करके —
श्लोक 22 (garuda.1.105.22)
सरस्वतीं वा संसेव्यं धनं पात्रे समर्पयेत् । यागस्थक्षत्त्रविड्घाते चरेद्ब्रह्महणो व्रतम्
sarasvatīṁ vā saṁsevyaṁ dhanaṁ pātre samarpayet yāgasthakṣattraviḍghāte caredbrahmahaṇo vratam
अथवा सरस्वती नदी के तट पर सेवा करके, धन को योग्य पात्र को अर्पित करना चाहिए। यज्ञरत क्षत्रिय या वैश्य के वध में ब्रह्महत्या का व्रत करना चाहिए।
श्लोक 23 (garuda.1.105.23)
गर्भहा वा यथावर्णं तथात्रेयीनिषू (सू) दनम् । चरेद्वरतमहत्वापि घातनार्थमुपागतः
garbhahā vā yathāvarṇaṁ tathātreyīniṣū (sū) danam caredvaratamahatvāpi ghātanārthamupāgataḥ
गर्भहत्यारे को भी [मृतक के] वर्ण के अनुसार वैसा ही व्रत करना चाहिए, तथा स्त्री-हत्या में भी। मारने के इरादे से आया हो, किंतु वध न हुआ हो, तब भी व्रत करना चाहिए —
श्लोक 24 (garuda.1.105.24)
द्विगुणं सवनस्थे तु ब्राह्मणे व्रतमाचरेत् । सुराम्बुघृतगोमूत्रं पीत्वा शुद्धिः सुरापिणः
dviguṇaṁ savanasthe tu brāhmaṇe vratamācaret surāmbughṛtagomūtraṁ pītvā śuddhiḥ surāpiṇaḥ
सोमयज्ञरत ब्राह्मण [के वध] में दुगुना व्रत करना चाहिए। खौलता जल, घी अथवा गोमूत्र पीकर मद्यपायी की शुद्धि होती है —
श्लोक 25 (garuda.1.105.25)
अग्निवर्णं घृतं वापि चीरवास जटी भवेत् । व्रतं ब्रह्महणः कुर्य्यात्पुनः संस्कारमर्हति
agnivarṇaṁ ghṛtaṁ vāpi cīravāsa jaṭī bhavet vrataṁ brahmahaṇaḥ kuryyātpunaḥ saṁskāramarhati
अथवा अग्नि-तप्त घी पीकर। छाल के वस्त्र पहनकर, जटा धारण करके ब्रह्महत्यारे का व्रत करे, तत्पश्चात् वह पुनः संस्कार का अधिकारी होता है।
श्लोक 26 (garuda.1.105.26)
रेतेविण्मूत्रपानाच्च सुरापा ब्राह्मणी तथा । पतिलोकपरिभ्रष्टा गृध्री स्यात्सूकरी शुनी
reteviṇmūtrapānācca surāpā brāhmaṇī tathā patilokaparibhraṣṭā gṛdhrī syātsūkarī śunī
वीर्य, मल और मूत्र पीने से — मद्यपायिनी ब्राह्मणी, पति के लोक से भ्रष्ट होकर, गिद्ध, सूअरी या कुतिया बनती है।
श्लोक 27 (garuda.1.105.27)
स्वर्णहारी द्विजो राज्ञे दत्त्वा तु मुसलं तथा । कर्मणः ख्यापनं कृत्वा हतस्तेन भवेच्छुचिः
svarṇahārī dvijo rājñe dattvā tu musalaṁ tathā karmaṇaḥ khyāpanaṁ kṛtvā hatastena bhavecchuciḥ
सोना चुराने वाला द्विज राजा के पास जाकर, मूसल लेकर, अपना कर्म प्रकट करके, उसके द्वारा मारा जाने पर शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 28 (garuda.1.105.28)
आत्मतुल्यं सुवर्णं वा दत्त्वा शुद्धिमियाद्द्विजः । शयने सार्द्धमायस्यां योषिता निभृतं स्वपेत्
ātmatulyaṁ suvarṇaṁ vā dattvā śuddhimiyāddvijaḥ śayane sārddhamāyasyāṁ yoṣitā nibhṛtaṁ svapet
अथवा अपने बराबर वजन का सोना [ब्राह्मणों को] देकर द्विज शुद्धि प्राप्त करता है। [व्यभिचार का दंड:] तप्त लौह-शय्या पर लौह-स्त्री-प्रतिमा के साथ सोना चाहिए —
श्लोक 29 (garuda.1.105.29)
उच्छेद्य लिङ्गं वृषणं नैर्ऋत्यामुत्सृजोद्दिशि । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं समा वा गुरुतल्पगः
ucchedya liṅgaṁ vṛṣaṇaṁ nairṛtyāmutsṛjoddiśi prājāpatyaṁ caretkṛcchraṁ samā vā gurutalpagaḥ
फिर अपने लिंग-वृषण काटकर नैऋत्य दिशा में फेंक देना चाहिए। अथवा गुरुपत्नीगामी को प्राजापत्य या कृच्छ्र व्रत एक वर्ष तक करना चाहिए —
श्लोक 30 (garuda.1.105.30)
चान्द्रायणं वा त्रीन्मासनभ्यसेद्वेदसंहिताम् । पञ्चगव्यं पिबेद्गोघ्नो मासमासीत संयतः
cāndrāyaṇaṁ vā trīnmāsanabhyasedvedasaṁhitām pañcagavyaṁ pibedgoghno māsamāsīta saṁyataḥ
अथवा चान्द्रायण व्रत करे, या तीन महीने वेद-संहिता का अभ्यास करे। गौ-हत्यारा पंचगव्य पीए और संयमित रहते हुए एक महीना बिताए,
श्लोक 31 (garuda.1.105.31)
गोष्ठेशयो गोऽनुगामी गोप्रदानेन शुध्यति । उपपातकशुद्धिः स्याच्चान्द्रायणव्रतेन च
goṣṭheśayo go'nugāmī gopradānena śudhyati upapātakaśuddhiḥ syāccāndrāyaṇavratena ca
गोशाला में सोकर, गौओं के पीछे-पीछे चलकर, गौदान से शुद्ध होता है। उपपातकों की शुद्धि चान्द्रायण व्रत से होती है,
श्लोक 32 (garuda.1.105.32)
पयसा वापि मासेन पराकेणापि वा पुनः । ऋषभैकं सहस्त्रं गा दद्यात्क्षत्त्रवधे पुमान्
payasā vāpi māsena parākeṇāpi vā punaḥ ṛṣabhaikaṁ sahastraṁ gā dadyātkṣattravadhe pumān
अथवा एक महीने केवल दूध पीकर, या पराक व्रत से भी। क्षत्रिय-वध में पुरुष को एक बैल और सहस्र गौएँ देनी चाहिए —
श्लोक 33 (garuda.1.105.33)
ब्रह्महत्याव्रतं वापि वत्सरत्रितयं चरेत् । वैश्यहाऽब्दं च (ब्दांश्च) रेदेतद्दद्याद्वैकशतं गवाम्
brahmahatyāvrataṁ vāpi vatsaratritayaṁ caret vaiśyahā'bdaṁ ca (bdāṁśca) redetaddadyādvaikaśataṁ gavām
अथवा ब्रह्महत्या का व्रत तीन वर्ष तक करे। वैश्य-वध में एक वर्ष व्रत करे, या एक सौ गौएँ दे,
श्लोक 34 (garuda.1.105.34)
षण्मासाच्छूद्रहा चैतद्दद्याद्वा धेनवो दश । अप्रदुष्टां स्त्रियं हत्वा शूद्रहत्याव्रतं चरेत्
ṣaṇmāsācchūdrahā caitaddadyādvā dhenavo daśa apraduṣṭāṁ striyaṁ hatvā śūdrahatyāvrataṁ caret
शूद्र-वध में छह महीने का व्रत करे, या दस गौएँ दे। निर्दोष स्त्री की हत्या करने पर शूद्र-हत्या का व्रत करे।
श्लोक 35 (garuda.1.105.35)
मार्जारगोधानकुलपशुमण्डूकघातनात् । पिबेत्क्षीरं त्र्यहं पापी कृच्छ्रं वाप्यधिकं चरेत्
mārjāragodhānakulapaśumaṇḍūkaghātanāt pibetkṣīraṁ tryahaṁ pāpī kṛcchraṁ vāpyadhikaṁ caret
बिल्ली, गोह, नेवला, पशु या मेंढक का वध करने पर पापी तीन दिन दूध पीकर रहे, या इससे अधिक कृच्छ्र व्रत करे।
श्लोक 36 (garuda.1.105.36)
गजे नीलान्वृषान्पञ्च शुके वत्सं द्विहायनम् । खराजमेषेषु वृषो देयः क्रौञ्चे त्रिहायणः
gaje nīlānvṛṣānpañca śuke vatsaṁ dvihāyanam kharājameṣeṣu vṛṣo deyaḥ krauñce trihāyaṇaḥ
हाथी [के वध] में पाँच काले बैल, तोते में दो वर्ष का बछड़ा; गधे, बकरी और भेड़ में एक बैल; क्रौंच पक्षी में तीन वर्ष का पशु देना चाहिए।
श्लोक 37 (garuda.1.105.37)
वृक्षगुल्मलतावीरुच्छेदने जप्यमृक्शतम् । अवकीर्णो भवेद्गत्त्वा ब्रह्मचारी च योषितम्
vṛkṣagulmalatāvīrucchedane japyamṛkśatam avakīrṇo bhavedgattvā brahmacārī ca yoṣitam
वृक्ष, झाड़ी, लता या वीरुध् काटने पर सौ ऋचाओं का जप करे। ब्रह्मचारी स्त्री-प्रसंग करके 'अवकीर्णी' (व्रतभ्रष्ट) बन जाता है —
श्लोक 38 (garuda.1.105.38)
गर्दभं पशुमालभ्य नैर्ऋतं च विशुध्यति । मधुमांसाशने कार्य्यं कृच्छ्रं शेषव्रतानि च
gardabhaṁ paśumālabhya nairṛtaṁ ca viśudhyati madhumāṁsāśane kāryyaṁ kṛcchraṁ śeṣavratāni ca
गधे को नैऋति देवता के लिए बलि देकर शुद्ध होता है। मधु या मांस अनुचित रूप से खाने पर कृच्छ्र व्रत तथा शेष व्रत करने चाहिए।
श्लोक 39 (garuda.1.105.39)
कृच्छ्रत्रयं गुरुः कुर्य्यान्म्रियेत् प्रहितो यदि । प्रतिकूलं गुरोः कृत्वा प्रसाद्यैव विशुध्यति
kṛcchratrayaṁ guruḥ kuryyānmriyet prahito yadi pratikūlaṁ guroḥ kṛtvā prasādyaiva viśudhyati
यदि गुरु द्वारा भेजा गया शिष्य मर जाए, तो गुरु को तीन कृच्छ्र व्रत करने चाहिए। गुरु के विरुद्ध कार्य करके, उन्हें फिर प्रसन्न करके ही शुद्धि होती है।
श्लोक 40 (garuda.1.105.40)
रिपून्धान्यप्रदानाद्यैः स्नेहाद्यैर्वाप्युपक्रमेत् । क्रियमाणोपकारे च मृते विप्रे न पातकम्
ripūndhānyapradānādyaiḥ snehādyairvāpyupakramet kriyamāṇopakāre ca mṛte vipre na pātakam
शत्रुओं के प्रति भी अन्न-दान आदि से, या स्नेह आदि से व्यवहार करना चाहिए। सहायता करते समय यदि ब्राह्मण मर जाए, तो पाप नहीं लगता।
श्लोक 41 (garuda.1.105.41)
महापापोपपापाभ्यां योभिशस्तो मृषा परम् । अब्भक्षो मासमासीत स जापी नियतन्द्रियः
mahāpāpopapāpābhyāṁ yobhiśasto mṛṣā param abbhakṣo māsamāsīta sa jāpī niyatandriyaḥ
जिस पर महापाप या उपपाप का झूठा आरोप लगाया गया हो, उसे एक महीने केवल जल पीकर, संयमित इन्द्रिय से जप करते रहना चाहिए।
श्लोक 42 (garuda.1.105.42)
अनियुक्तो भ्रातृभार्य्यां गच्छंश्चान्द्रायणं चरेत् । त्रिरात्रान्ते घृतं प्राश्य गत्वोदक्यां शुचिर्भवेत्
aniyukto bhrātṛbhāryyāṁ gacchaṁścāndrāyaṇaṁ caret trirātrānte ghṛtaṁ prāśya gatvodakyāṁ śucirbhavet
बिना उचित नियुक्ति के भाई की पत्नी के पास जाने वाले को चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। रजस्वला स्त्री के पास जाकर तीन रात्रि के अंत में घी खाकर शुद्ध होता है।
श्लोक 43 (garuda.1.105.43)
गोष्ठे वसन्ब्रह्मचारी मासमेकं पयोव्रती । गायत्त्रीजप्यनिरतो मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात्
goṣṭhe vasanbrahmacārī māsamekaṁ payovratī gāyattrījapyanirato mucyate'satpratigrahāt
गोशाला में रहकर एक महीने केवल दूध पीकर, गायत्री-जप में तत्पर रहकर, वह अनुचित दान ग्रहण करने के पाप से मुक्त होता है।
श्लोक 44 (garuda.1.105.44)
त्रिः कृच्छ्रमाचरेद्व्रात्ययाजकोऽपि चरन्नपि । वेदप्लावी यवाश्यब्दं त्यक्त्वा च शरणागतान्
triḥ kṛcchramācaredvrātyayājako'pi carannapi vedaplāvī yavāśyabdaṁ tyaktvā ca śaraṇāgatān
व्रात्य के लिए यज्ञ कराने वाला तीन बार कृच्छ्र व्रत करे। वेद की उपेक्षा करने वाला एक वर्ष केवल जौ खाए, तथा शरणागतों को त्यागने वाला भी —
श्लोक 45 (garuda.1.105.45)
प्राणायामत्रयं कुर्य्यात्खरयानोष्ट्रयानगः । नग्नः स्नात्वा च सुप्त्वा च गत्वा चैव दिवा स्त्रियम्
prāṇāyāmatrayaṁ kuryyātkharayānoṣṭrayānagaḥ nagnaḥ snātvā ca suptvā ca gatvā caiva divā striyam
तीन प्राणायाम करे, जैसे गधे या ऊँट पर सवार होने वाला भी करे। नग्न होकर स्नान करने वाला, नग्न सोने वाला, और दिन में पत्नी के पास जाने वाला भी —
श्लोक 46 (garuda.1.105.46)
गुरुंत्वं कृत्य हुंकृत्य विप्रं निर्जित्य वाद तः । प्रसाद्य तं च मुनयस्ततो ह्युपवसेद्दिनम्
guruṁtvaṁ kṛtya huṁkṛtya vipraṁ nirjitya vāda taḥ prasādya taṁ ca munayastato hyupavaseddinam
गुरु का अनादर करने वाला, उन्हें कठोरता से 'हुं' कहने वाला, या वाद-विवाद में ब्राह्मण को पराजित करने वाला — उसे प्रसन्न करके, ऋषियों के अनुसार, एक दिन उपवास करना चाहिए।
श्लोक 47 (garuda.1.105.47)
विप्रे दण्डोद्यमे कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने । देशं कालं वयः शक्तिं पापं चावेक्ष्य यत्नतः
vipre daṇḍodyame kṛcchramatikṛcchraṁ nipātane deśaṁ kālaṁ vayaḥ śaktiṁ pāpaṁ cāvekṣya yatnataḥ
ब्राह्मण पर शस्त्र उठाने में कृच्छ्र व्रत, तथा उसे मारने में अतिकृच्छ्र व्रत करना चाहिए। स्थान, काल, आयु, सामर्थ्य और पाप की गंभीरता को यत्नपूर्वक देखकर —
श्लोक 48 (garuda.1.105.48)
प्रायश्चितं प्रकल्प्यं स्याद्यत्र योक्ता तु निष्कृतिः । गर्भत्यागो भर्त्तृनिन्दा स्त्रीणां पतनकारणम्
prāyaścitaṁ prakalpyaṁ syādyatra yoktā tu niṣkṛtiḥ garbhatyāgo bharttṛnindā strīṇāṁ patanakāraṇam
उचित प्रायश्चित्त निर्धारित करना चाहिए, जहाँ भी क्षतिपूर्ति संभव हो। गर्भपात और पति-निंदा स्त्रियों के पतन के कारण हैं —
श्लोक 49 (garuda.1.105.49)
एष ग्रहान्तिके दोषः तस्मात्तां दूतरस्त्यजेत् । विख्यातदोषः कुर्वीत गुरोरनुमतं व्रतम्
eṣa grahāntike doṣaḥ tasmāttāṁ dūtarastyajet vikhyātadoṣaḥ kurvīta guroranumataṁ vratam
यह दोष रजस्वला-काल के समीप का है, अतः इसे शीघ्र त्याग देना चाहिए। जिसका दोष सर्वविदित हो, वह गुरु की अनुमति से खुले रूप में व्रत करे।
श्लोक 50 (garuda.1.105.50)
असंविख्यातदोषस्तु रहस्यं व्रतमाचरेत् । त्रिरात्रोपोषणो जप्त्वा ब्रह्महा त्वघमर्षणम्
asaṁvikhyātadoṣastu rahasyaṁ vratamācaret trirātropoṣaṇo japtvā brahmahā tvaghamarṣaṇam
जिसका दोष अज्ञात हो, वह गुप्त रूप से व्रत करे। ब्रह्महत्यारा तीन रात्रि उपवास करके अघमर्षण मंत्र का जप करते हुए,
श्लोक 51 (garuda.1.105.51)
अन्तर्जले विशुद्धे च दत्त्वा गां च पयस्विनीम् । लोमभ्यः स्वाहेति ऋचा दिवसं मारुताशनः
antarjale viśuddhe ca dattvā gāṁ ca payasvinīm lomabhyaḥ svāheti ṛcā divasaṁ mārutāśanaḥ
पवित्र जल में खड़े होकर, दूधवाली गौ का दान देकर, 'लोमेभ्यः स्वाहा' ऋचा से, दिनभर केवल वायु पर निर्वाह करते हुए —
श्लोक 52 (garuda.1.105.52)
जले जप्त्वा तु जुहुयाच्चात्वारिंशद्घृताहुतीः । त्रिरात्रोपोषणो हुत्वा कूष्माण्डीभिर्घृतं शुचिः
jale japtvā tu juhuyāccātvāriṁśadghṛtāhutīḥ trirātropoṣaṇo hutvā kūṣmāṇḍībhirghṛtaṁ śuciḥ
जल में जप करके चालीस घृत-आहुतियाँ देनी चाहिए। तीन रात्रि उपवास करके कूष्माण्डी मन्त्रों से घी की आहुति देकर शुद्ध होता है।
श्लोक 53 (garuda.1.105.53)
सुरापः स्वर्णहारी च रुद्रजापी जले स्थितः । सहस्त्रशीर्षाजप्येन मुच्यते गुरुतल्पगः
surāpaḥ svarṇahārī ca rudrajāpī jale sthitaḥ sahastraśīrṣājapyena mucyate gurutalpagaḥ
मद्यपायी और सोना चुराने वाला जल में खड़े होकर रुद्र-जप से [शुद्ध होते हैं]। गुरुपत्नीगामी सहस्रशीर्ष मन्त्र के जप से मुक्त होता है।
श्लोक 54 (garuda.1.105.54)
प्राणायामशतं कुर्य्यात्सर्वपापापनुक्त्ये । ॐकाराभियुतं सोमसलिलप्रशनाच्छुचिः
prāṇāyāmaśataṁ kuryyātsarvapāpāpanuktye oṁkārābhiyutaṁ somasalilapraśanācchuciḥ
सम्पूर्ण पाप के निवारण हेतु सौ प्राणायाम, ओंकार सहित, करने चाहिए। सोम-जल पीने से भी शुद्धि होती है।
श्लोक 55 (garuda.1.105.55)
कृत्वोपवासं रेतोविण्मूत्राणां प्राशनेद्विजः । अज्ञानकृतपापस्य नाशः सन्ध्यात्रये कृते
kṛtvopavāsaṁ retoviṇmūtrāṇāṁ prāśanedvijaḥ ajñānakṛtapāpasya nāśaḥ sandhyātraye kṛte
उपवास करके द्विज को [पंचगव्य आदि] ग्रहण करना चाहिए। अज्ञानवश किए गए पाप का नाश तीन बार संध्या करने से होता है,
श्लोक 56 (garuda.1.105.56)
रुद्रैकादशजप्याद्धि पापनाशो भवेद्द्विजैः । वेदाभ्यासरतं शान्तं पञ्चयज्ञक्रियापरम्
rudraikādaśajapyāddhi pāpanāśo bhaveddvijaiḥ vedābhyāsarataṁ śāntaṁ pañcayajñakriyāparam
तथा द्विजों के लिए ग्यारह रुद्रों के जप से पाप का नाश होता है। वेदाभ्यास में रत, शान्त, पंचयज्ञ में तत्पर व्यक्ति को —
श्लोक 57 (garuda.1.105.57)
न स्पृशन्ति हा पापानि चाशु स्मृत्वा ह्यपोहितः । जप्त्वा सहस्त्रगायत्त्रीं शुचिर्ब्रह्महणादृते
na spṛśanti hā pāpāni cāśu smṛtvā hyapohitaḥ japtvā sahastragāyattrīṁ śucirbrahmahaṇādṛte
पाप स्पर्श नहीं करते, स्मरण मात्र से वे शीघ्र दूर हो जाते हैं। सहस्र गायत्री-जप करके मनुष्य शुद्ध होता है, ब्रह्महत्या को छोड़कर।
श्लोक 58 (garuda.1.105.58)
ब्रह्मचर्य्यं दया क्षान्तिर्ध्यानं सत्यमकल्कता । अहिंसा स्तेयमाधुर्य्ये दमश्चैते यमाः स्मृताः
brahmacaryyaṁ dayā kṣāntirdhyānaṁ satyamakalkatā ahiṁsā steyamādhuryye damaścaite yamāḥ smṛtāḥ
ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अचौर्य, मधुरता और दम — ये यम कहे गए हैं।
श्लोक 59 (garuda.1.105.59)
स्नानमौनोपवासोज्यास्वाध्यायोपस्थनिग्रहः । तपोऽक्रोधो गुरोर्भक्तिः शौचं च नियमाः स्मृताः
snānamaunopavāsojyāsvādhyāyopasthanigrahaḥ tapo'krodho gurorbhaktiḥ śaucaṁ ca niyamāḥ smṛtāḥ
स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रिय-निग्रह, तप, अक्रोध, गुरु-भक्ति और शौच — ये नियम कहे गए हैं।
श्लोक 60 (garuda.1.105.60)
पञ्चगव्यं तु गोक्षीरं दधिमूत्रशकृद्घृतम् । जग्ध्वा परेह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत्
pañcagavyaṁ tu gokṣīraṁ dadhimūtraśakṛdghṛtam jagdhvā parehnyupavasetkṛcchraṁ sāntapanaṁ caret
गोदुग्ध, दही, गोमूत्र, गोबर और घृत — यही पंचगव्य है। इसे खाकर अगले दिन उपवास करना 'सांतपन' कृच्छ्र कहलाता है।
श्लोक 61 (garuda.1.105.61)
पृथक् सान्तपनैर्द्रव्यैः षडहः सोपवासकः । सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं महासान्तपनः स्मृतः
pṛthak sāntapanairdravyaiḥ ṣaḍahaḥ sopavāsakaḥ saptāhena tu kṛcchro'yaṁ mahāsāntapanaḥ smṛtaḥ
सांतपन की सामग्री को अलग-अलग छह दिन लेकर, उपवास सहित सात दिनों में यह कृच्छ्र 'महासांतपन' कहलाता है।
श्लोक 62 (garuda.1.105.62)
पर्णोदुम्बरराजीवबील्वपत्रकुशोदकैः । प्रत्येकं प्रत्यहाभ्यस्तैः पर्ण कृच्छ्र उदाहृतः
parṇodumbararājīvabīlvapatrakuśodakaiḥ pratyekaṁ pratyahābhyastaiḥ parṇa kṛcchra udāhṛtaḥ
पर्ण, औदुम्बर, राजीव, बिल्वपत्र और कुश के जल से, प्रतिदिन क्रम से अभ्यास करने पर 'पर्ण कृच्छ्र' कहलाता है।
श्लोक 63 (garuda.1.105.63)
तप्तक्षीरघृताम्बूनामेकैकं प्रत्यहं पिबेत् । एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्रश्च पावनः
taptakṣīraghṛtāmbūnāmekaikaṁ pratyahaṁ pibet ekarātropavāsaśca taptakṛcchraśca pāvanaḥ
तप्त दूध, घी और जल में से एक-एक प्रतिदिन पीना चाहिए, और एक रात्रि उपवास — यह पवित्र 'तप्त कृच्छ्र' है।
श्लोक 64 (garuda.1.105.64)
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । उपवासेन चैकेन पादकृच्छ्र उदाहृतः
ekabhaktena naktena tathaivāyācitena ca upavāsena caikena pādakṛcchra udāhṛtaḥ
एक बार भोजन, केवल रात्रि में भोजन, तथा बिना माँगे प्राप्त भोजन, और एक दिन का उपवास — यह 'पाद कृच्छ्र' कहलाता है।
श्लोक 65 (garuda.1.105.65)
यथा कथञ्चित्त्रिगुणः प्रजापत्योऽयमुच्यते । अयमेवातिकृच्छ्रः स्यात्पाणिपूर्णाम्बुभोजनात्
yathā kathañcittriguṇaḥ prajāpatyo'yamucyate ayamevātikṛcchraḥ syātpāṇipūrṇāmbubhojanāt
इसे किसी भी प्रकार तीन गुना करने पर 'प्राजापत्य' कहलाता है। यही, केवल हथेलीभर जल पीकर किया जाए, तो 'अतिकृच्छ्र' कहलाता है।
श्लोक 66 (garuda.1.105.66)
कृच्छ्रातिकृच्छ्रं पयसा दिवसानेकविंशतिम् । द्वादशाहोपवासैश्च पराकः समुदाहृतः
kṛcchrātikṛcchraṁ payasā divasānekaviṁśatim dvādaśāhopavāsaiśca parākaḥ samudāhṛtaḥ
'कृच्छ्रातिकृच्छ्र' इक्कीस दिन तक केवल दूध पीकर किया जाता है। बारह दिन के उपवास से 'पराक' कहलाता है।
श्लोक 67 (garuda.1.105.67)
पिण्याकाचामतक्राम्बुसक्तूनां प्रतिवासरम् । एकैकमुपवासश्च कृच्छ्रः सौम्योऽयमुच्यते
piṇyākācāmatakrāmbusaktūnāṁ prativāsaram ekaikamupavāsaśca kṛcchraḥ saumyo'yamucyate
खली, चावल का माँड़, छाछ, जल और सत्तू — इनमें से एक-एक प्रतिदिन, उपवास सहित — यह कृच्छ्र 'सौम्य' कहलाता है।
श्लोक 68 (garuda.1.105.68)
एषां त्रिरात्रमभ्यासादेकैकं स्याद्यथाक्रमात् । तुलापुरुष इत्येष ज्ञेयः पंचदशाहिकः
eṣāṁ trirātramabhyāsādekaikaṁ syādyathākramāt tulāpuruṣa ityeṣa jñeyaḥ paṁcadaśāhikaḥ
इनमें से प्रत्येक को तीन-तीन रात्रि क्रम से अभ्यास करने पर पंद्रह दिनों का यह व्रत 'तुलापुरुष' कहलाता है।
श्लोक 69 (garuda.1.105.69)
तिथिपिण्डांश्चरेद्वृद्ध्या शुक्ले शिख्यण्डसम्मितान् । एकैकं ह्रासयेत्कृष्णे पिण्डं चान्द्रायणं चरेत्
tithipiṇḍāṁścaredvṛddhyā śukle śikhyaṇḍasammitān ekaikaṁ hrāsayetkṛṣṇe piṇḍaṁ cāndrāyaṇaṁ caret
शुक्ल पक्ष में तिथि के अनुसार बढ़ते हुए मोर के अंडे के बराबर पिण्ड खाए; कृष्ण पक्ष में एक-एक कम करता जाए — यह चान्द्रायण व्रत है।
श्लोक 70 (garuda.1.105.70)
यथाकथञ्चित्पिण्डानां चत्वारिंशच्छतद्वयम् । मासेनैवोपभुञ्जीत चान्द्रायणमथापरम्
yathākathañcitpiṇḍānāṁ catvāriṁśacchatadvayam māsenaivopabhuñjīta cāndrāyaṇamathāparam
किसी भी प्रकार, दो सौ चालीस पिण्डों को एक महीने में ही खा ले — यह चान्द्रायण का दूसरा रूप है।
श्लोक 71 (garuda.1.105.71)
कृत्वा त्रिषवणं स्नानं पिण्डं चान्द्रायणं चरेत् । पवित्राणि जपेत्पिण्डान् गायत्त्र्या चाभिमन्त्रयेत्
kṛtvā triṣavaṇaṁ snānaṁ piṇḍaṁ cāndrāyaṇaṁ caret pavitrāṇi japetpiṇḍān gāyattryā cābhimantrayet
दिन में तीन बार स्नान करके पिण्ड-आधारित चान्द्रायण व्रत करे; पवित्र मन्त्रों का जप करे और पिण्डों को गायत्री से अभिमन्त्रित करे।
श्लोक 72 (garuda.1.105.72)
अनादिष्टेषु पापेषु शुद्धिश्चान्द्रायणेन तु । धर्मार्थो यश्चरेदेतच्चन्द्रस्यैति सलोकताम्
anādiṣṭeṣu pāpeṣu śuddhiścāndrāyaṇena tu dharmārtho yaścaredetaccandrasyaiti salokatām
जिन पापों का उल्लेख नहीं किया गया, उनकी शुद्धि चान्द्रायण से होती है। जो धर्म की इच्छा से इसे करता है, वह चन्द्रमा के लोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 73 (garuda.1.105.73)
कृच्छ्रकृद्धर्मकामस्तु महतीं श्रियमश्नुते
kṛcchrakṛddharmakāmastu mahatīṁ śriyamaśnute
धर्म की कामना से कृच्छ्र व्रत करने वाला महान् समृद्धि प्राप्त करता है।