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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 112

बृहस्पति-उक्त नीतिसार — राजकीय अधिकारियों के गुण

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (garuda.1.112.1)

सूत उवाच । भृत्या बहुविधा ज्ञेया उत्तमाधममध्यमाः । नियोक्तव्या यथार्हेषु त्रिविधेष्वेव कर्मसु

sūta uvāca bhṛtyā bahuvidhā jñeyā uttamādhamamadhyamāḥ niyoktavyā yathārheṣu trividheṣveva karmasu

सूत जी ने कहा — सेवक अनेक प्रकार के जानने चाहिए — उत्तम, अधम और मध्यम; इन तीन प्रकार के कार्यों में उन्हें यथायोग्य नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.112.2)

भृत्ये परिक्षणं वक्ष्ये यस्ययस्य हि यो गुणः । तमिमं संप्रवक्ष्यामि ये यथाकथितं किल

bhṛtye parikṣaṇaṁ vakṣye yasyayasya hi yo guṇaḥ tamimaṁ saṁpravakṣyāmi ye yathākathitaṁ kila

मैं सेवक की परीक्षा का वर्णन करूँगा — जिस-जिस में जो-जो गुण हो, उसे मैं कहूँगा, जैसा कि परंपरा से कहा गया है।

श्लोक 3 (garuda.1.112.3)

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः । तथा चतुर्भिर्भृतकं परीक्षयेद्वतेन शीलेन कलेन कर्मणा

yathā caturbhiḥ kanakaṁ parīkṣyate nigharṣaṇacchedanatāpatāḍanaiḥ tathā caturbhirbhṛtakaṁ parīkṣayedvatena śīlena kalena karmaṇā

जैसे स्वर्ण की परीक्षा चार प्रकार से होती है — रगड़कर, काटकर, तपाकर और पीटकर — वैसे ही सेवक की परीक्षा चार प्रकार से करनी चाहिए — व्रत, शील, कौशल और कर्म से।

श्लोक 4 (garuda.1.112.4)

कुलशीलगुणोपेतः सत्यधर्मपरायणः । रूपवान्सुप्रसन्नश्च कोशाध्यक्षो विधीयते

kulaśīlaguṇopetaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ rūpavānsuprasannaśca kośādhyakṣo vidhīyate

कुल, शील और गुणों से युक्त, सत्य-धर्म में परायण, सुंदर और प्रसन्नचित्त व्यक्ति को कोषाध्यक्ष नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.112.5)

मूल्यरूपपरीक्षाकृद्भवे द्रत्नपरीक्षकः । बलाबलपरिज्ञाता सेनाध्यक्षो विधीयते

mūlyarūpaparīkṣākṛdbhave dratnaparīkṣakaḥ balābalaparijñātā senādhyakṣo vidhīyate

मूल्य और स्वरूप की परीक्षा करने वाला रत्न-परीक्षक होता है; बल-दुर्बलता को पहचानने वाला सेनाध्यक्ष नियुक्त होता है।

श्लोक 6 (garuda.1.112.6)

इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो बलवान् प्रियदर्शनः । अप्रमादी प्रमाथी च प्रतीहारः स उच्यते

iṅgitākāratattvajño balavān priyadarśanaḥ apramādī pramāthī ca pratīhāraḥ sa ucyate

संकेतों और मुद्राओं का ज्ञाता, बलवान्, देखने में सुंदर, सावधान और सशक्त व्यक्ति — वह द्वारपाल (प्रतीहार) कहलाता है।

श्लोक 7 (garuda.1.112.7)

मेधावी वाक्पटुः प्राज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः । सर्वशास्त्रसमालोकी ह्येष साधुः स लेखकः

medhāvī vākpaṭuḥ prājñaḥ satyavādī jitendriyaḥ sarvaśāstrasamālokī hyeṣa sādhuḥ sa lekhakaḥ

बुद्धिमान्, वाक्पटु, विद्वान्, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, तथा समस्त शास्त्रों का ज्ञाता — ऐसा सज्जन व्यक्ति ही लेखक होता है।

श्लोक 8 (garuda.1.112.8)

बुद्धिमान्मतिमांश्चैव परचित्तोपलक्षकः । क्रूरो यथोक्तवादी च एष दूतो विधीयते

buddhimānmatimāṁścaiva paracittopalakṣakaḥ krūro yathoktavādī ca eṣa dūto vidhīyate

बुद्धिमान् और चतुर, दूसरे के मन को पहचानने वाला, दृढ़ और जैसा कहा जाए वैसा ही कहने वाला — ऐसा व्यक्ति दूत नियुक्त होता है।

श्लोक 9 (garuda.1.112.9)

समस्तस्मृतिशास्त्रज्ञः पण्डितोऽथ जितेन्द्रियः । शौर्यवीर्यगुणोपेतो धर्माध्यक्षो विधीयते

samastasmṛtiśāstrajñaḥ paṇḍito'tha jitendriyaḥ śauryavīryaguṇopeto dharmādhyakṣo vidhīyate

समस्त स्मृति-शास्त्रों का ज्ञाता, विद्वान्, जितेन्द्रिय, शौर्य-वीर्य के गुणों से युक्त व्यक्ति — वह धर्माध्यक्ष (मुख्य न्यायाधीश) नियुक्त होता है।

श्लोक 10 (garuda.1.112.10)

पितृपैतामहो दक्षः शास्त्रज्ञः सत्यवाचकः । शुचिश्च कठिनश्चैव सूपकारः स उच्यते

pitṛpaitāmaho dakṣaḥ śāstrajñaḥ satyavācakaḥ śuciśca kaṭhinaścaiva sūpakāraḥ sa ucyate

पिता-पितामह से परंपरागत, कुशल, शास्त्रज्ञ, सत्यवादी, पवित्र और दृढ़ व्यक्ति — वह सूपकार (रसोइया) कहलाता है।

श्लोक 11 (garuda.1.112.11)

आयुर्वेदकृताभ्यासः सर्वेषां प्रियदर्शनः । आयुः शीलगुणोपेतो वैद्य एव विधीयते

āyurvedakṛtābhyāsaḥ sarveṣāṁ priyadarśanaḥ āyuḥ śīlaguṇopeto vaidya eva vidhīyate

आयुर्वेद का अभ्यासी, सबको प्रिय दिखने वाला, दीर्घायु और शीलगुणों से युक्त व्यक्ति — वही वैद्य नियुक्त होता है।

श्लोक 12 (garuda.1.112.12)

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो जपहमपरायणः । आशीर्वादपरो नित्यमेष राजपुरोहित

vedavedāṅgatattvajño japahamaparāyaṇaḥ āśīrvādaparo nityameṣa rājapurohita

वेद-वेदांगों का तत्त्वज्ञाता, जप-होम में परायण, सदा आशीर्वाद देने वाला — यही राजपुरोहित है।

श्लोक 13 (garuda.1.112.13)

लेखकः पाठकश्चैव गणकः प्रतिरोधकः । आलस्ययुक्तश्चैद्राजा कर्म संवर्जयेत्सदा

lekhakaḥ pāṭhakaścaiva gaṇakaḥ pratirodhakaḥ ālasyayuktaścaidrājā karma saṁvarjayetsadā

लेखक, पाठक, गणक और द्वाररक्षक — यदि ये आलसी हो जाएँ, तो राजा को सदा उन्हें पद से हटा देना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.1.112.14)

द्विजिह्वमुद्वेगकरं क्रूरमेकान्तदारुणम् । खलस्याहेश्च वदनमपकाराय केवलम्

dvijihvamudvegakaraṁ krūramekāntadāruṇam khalasyāheśca vadanamapakārāya kevalam

दो जिह्वा वाला, उद्वेग उत्पन्न करने वाला, क्रूर, सर्वथा कठोर — दुष्ट का और सर्प का मुख दोनों केवल हानि पहुँचाने के लिए ही होते हैं।

श्लोक 15 (garuda.1.112.15)

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपिसन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः

durjanaḥ parihartavyo vidyayālaṅkṛto'pisan maṇinā bhūṣitaḥ sarpaḥ kimasau na bhayaṅkaraḥ

दुर्जन का त्याग करना चाहिए, चाहे वह विद्या से सुशोभित ही क्यों न हो; मणि से अलंकृत सर्प भी क्या भयंकर नहीं होता?

श्लोक 16 (garuda.1.112.16)

अकारणविष्कृतकोपधारिणः खलाद्भयं कस्य न नाम जायते । विषं महाहेर्विषमस्य दुर्वचः सदुः सहं सन्निपतेत्सदा मुखे

akāraṇaviṣkṛtakopadhāriṇaḥ khalādbhayaṁ kasya na nāma jāyate viṣaṁ mahāherviṣamasya durvacaḥ saduḥ sahaṁ sannipatetsadā mukhe

बिना कारण क्रोध प्रकट करने वाले दुष्ट से किसे भय नहीं होता? महासर्प का विष तो भयंकर होता ही है, किंतु ऐसे कठोर व्यक्ति के असह्य दुर्वचन भी सदा मुख से गिरते ही रहते हैं।

श्लोक 17 (garuda.1.112.17)

तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् । अर्धराज्यहरं भृत्यं यो हन्यात्स न हन्यते

tulyārthaṁ tulyasāmarthyaṁ marmajñaṁ vyavasāyinam ardharājyaharaṁ bhṛtyaṁ yo hanyātsa na hanyate

समान महत्त्वाकांक्षा वाला, समान सामर्थ्य वाला, रहस्य जानने वाला, उद्यमी सेवक — जो आधा राज्य हड़प सकता हो, उसका वध करने वाला दोषी नहीं होता।

श्लोक 18 (garuda.1.112.18)

शूरत्वयुक्ता मृदुमन्दवाक्या जितेन्द्रियाः सत्यपराक्रमाश्च । प्रागेव पश्चाद्विपरी तरुपा ये ते तु भृत्या न हिता भवन्ति

śūratvayuktā mṛdumandavākyā jitendriyāḥ satyaparākramāśca prāgeva paścādviparī tarupā ye te tu bhṛtyā na hitā bhavanti

जो शूरवीरता से युक्त, मृदु और संयत वाणी वाले, जितेन्द्रिय और सच्चे पराक्रमी दिखते हैं, किंतु बाद में इसके विपरीत निकलते हैं — ऐसे सेवक हितकर नहीं होते।

श्लोक 19 (garuda.1.112.19)

निरालस्याः सुसन्तुष्टाः प्रतिबोधकाः । सुखदुः खसमा धीरा भृत्या लोकेषु दुर्लभाः

nirālasyāḥ susantuṣṭāḥ pratibodhakāḥ sukhaduḥ khasamā dhīrā bhṛtyā lokeṣu durlabhāḥ

आलस्यरहित, पूर्ण संतुष्ट, सचेत; सुख-दुःख में समान और धैर्यवान् सेवक इस संसार में दुर्लभ हैं।

श्लोक 20 (garuda.1.112.20)

क्षान्तिस्तयविहीनश्च क्रूरबुद्धिश्च निन्दकः । दाम्भिकः कपटी चैव शठश्च स्पृहयान्वितः । अशक्तो भयभीतश्च राज्ञा त्यक्तव्य एव सः

kṣāntistayavihīnaśca krūrabuddhiśca nindakaḥ dāmbhikaḥ kapaṭī caiva śaṭhaśca spṛhayānvitaḥ aśakto bhayabhītaśca rājñā tyaktavya eva saḥ

जो क्षमा और स्थिरता से रहित हो, क्रूरबुद्धि, निंदक, दंभी, कपटी, छली, लोभी, अक्षम और भयभीत हो — ऐसे व्यक्ति को राजा को अवश्य त्याग देना चाहिए।

श्लोक 21 (garuda.1.112.21)

सुसन्धानानि चास्त्राणि शस्त्राणि विविधानि च । दुर्गे प्रवेशितव्यानि ततः शत्रुं निपातयेत्

susandhānāni cāstrāṇi śastrāṇi vividhāni ca durge praveśitavyāni tataḥ śatruṁ nipātayet

सुसज्जित अस्त्र और विविध शस्त्र दुर्ग में प्रविष्ट कराने चाहिए, तत्पश्चात् शत्रु का संहार करना चाहिए।

श्लोक 22 (garuda.1.112.22)

षण्मासमथ वर्षं वा सन्धिं कुर्यान्नराधिपः । पश्यन्सञ्चितमात्मानं पुनः शत्रुं निपातयेत्

ṣaṇmāsamatha varṣaṁ vā sandhiṁ kuryānnarādhipaḥ paśyansañcitamātmānaṁ punaḥ śatruṁ nipātayet

राजा को छह महीने या एक वर्ष के लिए संधि कर लेनी चाहिए; अपनी शक्ति संचित हुई देखकर पुनः शत्रु का संहार करना चाहिए।

श्लोक 23 (garuda.1.112.23)

मूर्खान्नियोजयेद्यस्तु त्रयोऽप्येते महीपतेः । अयशश्चार्थनाशश्च नरके चैव पातनम्

mūrkhānniyojayedyastu trayo'pyete mahīpateḥ ayaśaścārthanāśaśca narake caiva pātanam

जो राजा मूर्खों को नियुक्त करता है, उसे तीनों फल मिलते हैं — अपयश, धननाश, और नरक में पतन।

श्लोक 24 (garuda.1.112.24)

यत्किञ्चित्कुरुते कर्म शुभं वा यादि वाशुभम् । तेन स्म वर्धते राजा सूक्ष्मतो भृत्यकार्यतः

yatkiñcitkurute karma śubhaṁ vā yādi vāśubham tena sma vardhate rājā sūkṣmato bhṛtyakāryataḥ

जो भी शुभ या अशुभ कर्म किया जाता है, उससे — सेवकों के कार्यों के सूक्ष्म प्रभाव से — राजा की उन्नति या पतन होता है।

श्लोक 25 (garuda.1.112.25)

तस्माद्भूमीश्वरः प्राज्ञं धर्मकामार्थसाधने । नियोज येद्धिसततं गोब्राह्मणहिताय वै

tasmādbhūmīśvaraḥ prājñaṁ dharmakāmārthasādhane niyoja yeddhisatataṁ gobrāhmaṇahitāya vai

इसलिए राजा को गौ-ब्राह्मण के हित के लिए धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि में सदा बुद्धिमान् व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए।

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