पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 125
एकादशी-माहात्म्य
श्लोक 1 (garuda.1.125.1)
पितामह उवाच । मान्धाता चक्रवर्त्यासीदुपोष्यैकादशीं नृपः । एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयारपि
pitāmaha uvāca māndhātā cakravartyāsīdupoṣyaikādaśīṁ nṛpaḥ ekādaśyāṁ na bhuñjīta pakṣayorubhayārapi
पितामह ने कहा — राजा मान्धाता चक्रवर्ती सम्राट् थे, जिन्होंने एकादशी का उपवास किया। दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए।
श्लोक 2 (garuda.1.125.2)
दशम्येकादशीमिश्रा गान्धार्या समुपोषिता । तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्
daśamyekādaśīmiśrā gāndhāryā samupoṣitā tasyāḥ putraśataṁ naṣṭaṁ tasmāttāṁ parivarjayet
गान्धारी ने दशमी से मिली एकादशी का उपवास किया, जिससे उनके सौ पुत्र नष्ट हो गए; अतः ऐसी मिश्रित तिथि का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 3 (garuda.1.125.3)
द्वादश्येकादशी यत्र तत्र सन्निहितो हरिः । दशम्येकादशी यत्र तत्र सन्निहितोऽसुरः । बहुवाक्यविरोधेन सन्देहो जायते यदा
dvādaśyekādaśī yatra tatra sannihito hariḥ daśamyekādaśī yatra tatra sannihito'suraḥ bahuvākyavirodhena sandeho jāyate yadā
जहाँ एकादशी द्वादशी से युक्त हो, वहाँ हरि साक्षात् विद्यमान रहते हैं; जहाँ एकादशी दशमी से युक्त हो, वहाँ असुर विद्यमान रहता है। जब अनेक मतों के विरोध से सन्देह उत्पन्न हो —
श्लोक 4 (garuda.1.125.4)
द्वादशी तु तदा ग्राह्या त्रयोदश्यान्तु पारणम् । एकादशी कलापिस्यादुपोष्या द्वादशी तथा
dvādaśī tu tadā grāhyā trayodaśyāntu pāraṇam ekādaśī kalāpisyādupoṣyā dvādaśī tathā
तब द्वादशी ही ग्राह्य माननी चाहिए, और त्रयोदशी को पारण करना चाहिए; यदि एकादशी की कला भी शेष हो, तो द्वादशी को भी उपवास करना चाहिए।
श्लोक 5 (garuda.1.125.5)
एकादशी द्वादशी च विशेषेण त्रयोदशी । त्रिमिश्रा सा तिथिर्ग्राह्या सर्वपापहरा शुभा
ekādaśī dvādaśī ca viśeṣeṇa trayodaśī trimiśrā sā tithirgrāhyā sarvapāpaharā śubhā
एकादशी, द्वादशी और विशेषतः त्रयोदशी — जिस तिथि में ये तीनों मिली हों, वह ग्राह्य है; वह शुभ और सभी पापों को हरने वाली है।
श्लोक 6 (garuda.1.125.6)
एकादशीमुपोष्यैवद्वादशीम थवा द्विज ! । त्रिमिश्रां चैव कुर्वीत न दशम्या युतां क्रचित्
ekādaśīmupoṣyaivadvādaśīma thavā dvija ! trimiśrāṁ caiva kurvīta na daśamyā yutāṁ kracit
हे द्विज! एकादशी का उपवास करना चाहिए, अथवा द्वादशी का, अथवा जहाँ तीनों मिली हों उसका; परन्तु दशमी से युक्त तिथि का कभी नहीं।
श्लोक 7 (garuda.1.125.7)
रात्रौ जागरणं कुर्वन्पुराणश्रवणं नृपः । गदाधरं पूजयंश्च उपोष्यैका दशीद्वयम् । रुक्माङ्गदो ययौ मोक्षमन्ये चैकादशीव्रतम्
rātrau jāgaraṇaṁ kurvanpurāṇaśravaṇaṁ nṛpaḥ gadādharaṁ pūjayaṁśca upoṣyaikā daśīdvayam rukmāṅgado yayau mokṣamanye caikādaśīvratam
राजा रुक्माङ्गद ने रात्रि में जागरण करते हुए, पुराण-श्रवण करते हुए तथा गदाधर का पूजन करते हुए दोनों एकादशियों का उपवास किया और मोक्ष को प्राप्त हुए; अन्य भी एकादशी-व्रत से यही फल पाते हैं।