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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 143

रामायण-वर्णन

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

श्लोक 1 (garuda.1.143.1)

ब्रह्मोवाच । रामायणमतो वक्ष्ये श्रुतं पापविनाशनम् । विष्णुनाभ्यब्जतो ब्रह्मा मरीचिस्तत्सुतोऽभवत्

brahmovāca rāmāyaṇamato vakṣye śrutaṁ pāpavināśanam viṣṇunābhyabjato brahmā marīcistatsuto'bhavat

ब्रह्मा जी ने कहा — अब मैं रामायण का वर्णन करूँगा, जिसका श्रवण पापों का नाश करने वाला है। विष्णु की नाभि-कमल से ब्रह्मा, और उनके पुत्र मरीचि हुए।

श्लोक 2 (garuda.1.143.2)

मरीचेः कश्यपस्तस्माद्रविस्तस्मान्मनुः स्मृतः । मनोरिक्ष्वाकुरस्याभूद्वंशे राजा रघुः स्मृतः

marīceḥ kaśyapastasmādravistasmānmanuḥ smṛtaḥ manorikṣvākurasyābhūdvaṁśe rājā raghuḥ smṛtaḥ

मरीचि से कश्यप, उनसे सूर्य, उनसे मनु कहलाए। मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए, जिनके वंश में राजा रघु कहलाए।

श्लोक 3 (garuda.1.143.3)

रघोरजस्ततो जातो राजा दशरथो बली । तस्य पुत्रास्तु चत्वारो महाबलपराक्रमाः

raghorajastato jāto rājā daśaratho balī tasya putrāstu catvāro mahābalaparākramāḥ

रघु से अज उत्पन्न हुए, फिर बलवान् राजा दशरथ हुए। उनके चार पुत्र थे, महान् बल-पराक्रम से युक्त।

श्लोक 4 (garuda.1.143.4)

कौसल्यायाम भूद्रामो भरतः कैकयीसुतः । सुतौ लक्ष्मणशक्षुघ्नौ सुमित्रायां बभूवतुः

kausalyāyāma bhūdrāmo bharataḥ kaikayīsutaḥ sutau lakṣmaṇaśakṣughnau sumitrāyāṁ babhūvatuḥ

कौसल्या से राम, कैकेयी से भरत हुए। सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न — ये दो पुत्र हुए।

श्लोक 5 (garuda.1.143.5)

रामो भक्तः पितुर्मातुर्विश्वामित्रादवाप्तवान् । अस्त्रग्रामं ततो यक्षीं ताटकां प्रजघान ह

rāmo bhaktaḥ piturmāturviśvāmitrādavāptavān astragrāmaṁ tato yakṣīṁ tāṭakāṁ prajaghāna ha

माता-पिता के भक्त राम ने विश्वामित्र से समस्त अस्त्र-विद्या प्राप्त की। फिर उन्होंने यक्षिणी ताटका का वध किया।

श्लोक 6 (garuda.1.143.6)

विशावमित्रस्य यज्ञे वै सुबाहुं न्यवधीद्बली । जनकस्य क्रतुं गत्वा उपयेमेऽथ जानकीम्

viśāvamitrasya yajñe vai subāhuṁ nyavadhīdbalī janakasya kratuṁ gatvā upayeme'tha jānakīm

विश्वामित्र के यज्ञ में उस बलवान् ने सुबाहु का वध किया। फिर जनक के यज्ञ में जाकर उन्होंने जानकी (सीता) से विवाह किया।

श्लोक 7 (garuda.1.143.7)

ऊर्मिलां लक्ष्मणो वीरो भरतो माण्डवीं सुताम् । शत्रुघ्नो वै कीर्तिमतीं कुशध्वजसुते उभे

ūrmilāṁ lakṣmaṇo vīro bharato māṇḍavīṁ sutām śatrughno vai kīrtimatīṁ kuśadhvajasute ubhe

वीर लक्ष्मण ने ऊर्मिला से, भरत ने पुत्री माण्डवी से, शत्रुघ्न ने कीर्तिमती से विवाह किया — ये दोनों कुशध्वज की पुत्रियाँ थीं।

श्लोक 8 (garuda.1.143.8)

पित्रादिभिरयोध्यायां गत्वा रामादयः स्थिताः । युधाजितं मातुलञ्च शत्रुघ्नभरतौ गतौ

pitrādibhirayodhyāyāṁ gatvā rāmādayaḥ sthitāḥ yudhājitaṁ mātulañca śatrughnabharatau gatau

पिता आदि सहित राम आदि अयोध्या जाकर वहाँ रहने लगे। शत्रुघ्न और भरत अपने मामा युधाजित् के यहाँ गए।

श्लोक 9 (garuda.1.143.9)

गतयोर्नृपवर्योऽसौ राज्यं दातुं समुद्यतः । स रामाय तत्पुत्राय कैकेय्या प्रार्थितस्तदा

gatayornṛpavaryo'sau rājyaṁ dātuṁ samudyataḥ sa rāmāya tatputrāya kaikeyyā prārthitastadā

उनके जाने पर उस श्रेष्ठ राजा ने राज्य देने का संकल्प किया। उसी समय कैकेयी ने उनसे उनके पुत्र राम के लिए (वनवास) माँगा —

श्लोक 10 (garuda.1.143.10)

चतुर्दशसमावासो वनेरामस्य वाञ्छितः । रामः पितृहितार्थञ्च लक्ष्मणेन च सीतया

caturdaśasamāvāso vanerāmasya vāñchitaḥ rāmaḥ pitṛhitārthañca lakṣmaṇena ca sītayā

चौदह वर्षों तक राम का वन में वास चाहा गया। राम, पिता के हित के लिए, लक्ष्मण और सीता सहित —

श्लोक 11 (garuda.1.143.11)

राज्यञ्च तृणवत्त्यक्त्वा शृङ्गवेरपुरं गतः । रथं त्यक्त्वा प्रयागञ्च चित्रकूटगिरिं गतः

rājyañca tṛṇavattyaktvā śṛṅgaverapuraṁ gataḥ rathaṁ tyaktvā prayāgañca citrakūṭagiriṁ gataḥ

राज्य को तृण के समान त्यागकर शृंगवेरपुर गए। रथ छोड़कर प्रयाग होते हुए चित्रकूट पर्वत पर पहुँचे।

श्लोक 12 (garuda.1.143.12)

रामस्य तु वियोगेन राजा स्वर्गं समाश्रितः । संस्कृत्य भरतश्चागाद्राममाह बलान्वितः

rāmasya tu viyogena rājā svargaṁ samāśritaḥ saṁskṛtya bharataścāgādrāmamāha balānvitaḥ

राम के वियोग से राजा दशरथ स्वर्ग को प्राप्त हुए। संस्कार कर भरत सेना सहित राम के पास गए और उनसे कहा —

श्लोक 13 (garuda.1.143.13)

अयोध्यान्तु समागत्य राज्यं कुरु महामते । स नैच्छत्पादुके दत्त्वा राज्याय भरताय तु

ayodhyāntu samāgatya rājyaṁ kuru mahāmate sa naicchatpāduke dattvā rājyāya bharatāya tu

'हे महामते! अयोध्या लौटकर राज्य करें।' राम ने इसे स्वीकार नहीं किया, और अपनी पादुकाएँ देकर राज्य भरत को सौंप दिया।

श्लोक 14 (garuda.1.143.14)

विसर्जितोऽथ भरतो रामराज्यमपालयत् । नन्दिग्रामे स्थितो भक्तो ह्ययोध्यां नाविशद्व्रती

visarjito'tha bharato rāmarājyamapālayat nandigrāme sthito bhakto hyayodhyāṁ nāviśadvratī

विदा होकर भरत ने राम के राज्य की रक्षा की। नन्दिग्राम में रहकर व्रतधारी भक्त भरत अयोध्या में प्रवेश नहीं करते थे।

श्लोक 15 (garuda.1.143.15)

रामोऽपि चित्रकूटाच्च ह्यत्रेराश्रममाययौ । नत्वा सुतीक्ष्णं चागस्त्यं दण्डकारण्यमागतः

rāmo'pi citrakūṭācca hyatrerāśramamāyayau natvā sutīkṣṇaṁ cāgastyaṁ daṇḍakāraṇyamāgataḥ

राम भी चित्रकूट से अत्रि के आश्रम में पहुँचे। सुतीक्ष्ण और अगस्त्य को प्रणाम कर वे दण्डकारण्य में पहुँचे।

श्लोक 16 (garuda.1.143.16)

तत्र शूर्पणखा नाम राक्षसी चात्तुमागता । निकृत्य कर्णो नासे च रामेणाथापवारिता

tatra śūrpaṇakhā nāma rākṣasī cāttumāgatā nikṛtya karṇo nāse ca rāmeṇāthāpavāritā

वहाँ शूर्पणखा नामक राक्षसी उन्हें खाने आई। राम ने उसके कान और नाक काटकर उसे भगा दिया।

श्लोक 17 (garuda.1.143.17)

तत्प्रेरितः खरश्चागाद्दूषणस्त्रिशिरास्तथा । चतुर्दशसहस्रेण रक्षसान्तु बलेन च

tatpreritaḥ kharaścāgāddūṣaṇastriśirāstathā caturdaśasahasreṇa rakṣasāntu balena ca

उससे प्रेरित होकर खर, दूषण और त्रिशिरा चौदह हजार राक्षसों की सेना सहित वहाँ आए।

श्लोक 18 (garuda.1.143.18)

रामोऽपि प्रेषयामास बाणैर्यमपुरञ्च तान् । राक्षस्या प्रेरितोऽभ्यागाद्रावणो हरणाय हि

rāmo'pi preṣayāmāsa bāṇairyamapurañca tān rākṣasyā prerito'bhyāgādrāvaṇo haraṇāya hi

राम ने बाणों से उन सबको यमपुरी भेज दिया। राक्षसी से प्रेरित होकर रावण हरण करने के लिए आया।

श्लोक 19 (garuda.1.143.19)

मृगरूपं स मारीचं कृत्वाग्रेऽथ त्रिदण्डधृक् । सीतया प्रेरितो रामो मारीचं निजघान ह

mṛgarūpaṁ sa mārīcaṁ kṛtvāgre'tha tridaṇḍadhṛk sītayā prerito rāmo mārīcaṁ nijaghāna ha

उसने मारीच को मृग-रूप में आगे भेजा, और स्वयं त्रिदण्डधारी संन्यासी का रूप धारण किया। सीता द्वारा प्रेरित होकर राम ने मारीच का वध किया।

श्लोक 20 (garuda.1.143.20)

म्रियमाणः स च प्राह हा सीते ! लक्ष्मणोति च । सीतोक्तो लक्ष्मणोऽथागाद्रामश्चानुददर्श तम्

mriyamāṇaḥ sa ca prāha hā sīte ! lakṣmaṇoti ca sītokto lakṣmaṇo'thāgādrāmaścānudadarśa tam

मरते समय उसने 'हा सीते! लक्ष्मण!' पुकारा। सीता के कहने पर लक्ष्मण वहाँ गए, और राम ने उन्हें देखा।

श्लोक 21 (garuda.1.143.21)

उवाच राक्षसी माया नूनं सीता हृतेति सः । रावणोऽन्तरमासाद्य ह्यङ्केनादाय जानकीम्

uvāca rākṣasī māyā nūnaṁ sītā hṛteti saḥ rāvaṇo'ntaramāsādya hyaṅkenādāya jānakīm

राम ने कहा — 'यह निश्चय ही राक्षस-माया थी; सीता का हरण हो गया।' रावण ने अवसर पाकर जानकी को गोद में उठा लिया।

श्लोक 22 (garuda.1.143.22)

जटायुषं विनिर्भिद्य ययौ लङ्कां ततो बली । अशोकवृक्षच्छायायां रक्षितां तामधारयत्

jaṭāyuṣaṁ vinirbhidya yayau laṅkāṁ tato balī aśokavṛkṣacchāyāyāṁ rakṣitāṁ tāmadhārayat

जटायु का वध कर वह बलवान् लंका को गया। उसने सीता को अशोक-वृक्ष की छाया में रक्षित रखा।

श्लोक 23 (garuda.1.143.23)

आगत्य रामः सून्याञ्च पर्णशालां ददर्श ह । शोकं कृत्वाथ जानक्या मार्गणं कृतवान्प्रभुः

āgatya rāmaḥ sūnyāñca parṇaśālāṁ dadarśa ha śokaṁ kṛtvātha jānakyā mārgaṇaṁ kṛtavānprabhuḥ

लौटकर राम ने पर्णशाला को सूनी देखा। शोक करते हुए प्रभु ने जानकी की खोज आरम्भ की।

श्लोक 24 (garuda.1.143.24)

जटायुषञ्च संस्कृत्य तदुक्तो दक्षिणां दिशम् । गत्वा सख्यं ततश्चक्रे सुग्रीवेण च राघवः

jaṭāyuṣañca saṁskṛtya tadukto dakṣiṇāṁ diśam gatvā sakhyaṁ tataścakre sugrīveṇa ca rāghavaḥ

जटायु का संस्कार कर, उनके बताए अनुसार दक्षिण दिशा में जाकर राघव ने सुग्रीव से मित्रता की।

श्लोक 25 (garuda.1.143.25)

सप्त तालान्विनिर्भिद्य शरेणानतपर्वणा । वालिनञ्च विनिर्भिद्य किष्किन्धायां हरीश्वरम्

sapta tālānvinirbhidya śareṇānataparvaṇā vālinañca vinirbhidya kiṣkindhāyāṁ harīśvaram

एक ही बाण से सात ताल वृक्षों को भेदकर, तथा किष्किन्धा के वानरराज वालि का वध कर —

श्लोक 26 (garuda.1.143.26)

सुग्रीवं कृतवान्राम ऋश्यमूके स्वयं स्थितः । सुग्रीवः प्रेषयामास वानरान्पर्वतोपमान्

sugrīvaṁ kṛtavānrāma ṛśyamūke svayaṁ sthitaḥ sugrīvaḥ preṣayāmāsa vānarānparvatopamān

राम ने सुग्रीव को राजा बनाया और स्वयं ऋष्यमूक पर्वत पर रहे। सुग्रीव ने पर्वत के समान विशाल वानरों को भेजा —

श्लोक 27 (garuda.1.143.27)

सीताया मार्गणं कर्तुं पूर्वाद्याशासु सोत्सवान् । प्रतीचीमुत्तरां प्राचीं दिशं गत्वा समागताः

sītāyā mārgaṇaṁ kartuṁ pūrvādyāśāsu sotsavān pratīcīmuttarāṁ prācīṁ diśaṁ gatvā samāgatāḥ

सीता की खोज हेतु सभी दिशाओं में उत्साहपूर्वक। पश्चिम, उत्तर और पूर्व दिशा में जाने वाले लौट आए —

श्लोक 28 (garuda.1.143.28)

दक्षिणान्तु दिशं ये च मार्गयन्तोऽथ जानकीम् । वनानि पर्वतान्द्वीपान्नदीनां पुलिनानि च

dakṣiṇāntu diśaṁ ye ca mārgayanto'tha jānakīm vanāni parvatāndvīpānnadīnāṁ pulināni ca

परन्तु दक्षिण दिशा में गए वानर जानकी को खोजते हुए वन, पर्वत, द्वीप और नदियों के तटों में भी —

श्लोक 29 (garuda.1.143.29)

जानकीन्ते ह्यपश्यन्तो मरणे कृतनिश्चयाः । सम्पातिवचनाज्ज्ञात्वा हनूमान्कपिकुञ्जरः

jānakīnte hyapaśyanto maraṇe kṛtaniścayāḥ sampātivacanājjñātvā hanūmānkapikuñjaraḥ

जानकी को न पाकर मृत्यु का निश्चय कर बैठे थे — तभी सम्पाति के वचन से जानकर वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने —

श्लोक 30 (garuda.1.143.30)

शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे मकरालयम् । अपश्यज्जानकीं तत्र ह्यशोकवनिकास्थिताम्

śatayojanavistīrṇaṁ pupluve makarālayam apaśyajjānakīṁ tatra hyaśokavanikāsthitām

सौ योजन विस्तृत समुद्र को लांघा। वहाँ उन्होंने अशोक-वाटिका में स्थित जानकी को देखा,

श्लोक 31 (garuda.1.143.31)

भर्त्सितां राक्षसीभिश्च रावणेन च रक्षसा । भव भार्येति वदता चिन्तयन्तीञ्च राघवम्

bhartsitāṁ rākṣasībhiśca rāvaṇena ca rakṣasā bhava bhāryeti vadatā cintayantīñca rāghavam

जिसे राक्षसियाँ और राक्षस रावण डरा रहे थे, जो 'मेरी पत्नी बन जाओ' कह रहा था — परन्तु वह सदा राघव का ही चिन्तन करती थी।

श्लोक 32 (garuda.1.143.32)

अङ्गुलीयं कपिर्दत्त्वा सीतां कौशल्यमब्रवीत् । रामस्य तस्य दूतोऽहं शोकं मा कुरु मैथिलि

aṅgulīyaṁ kapirdattvā sītāṁ kauśalyamabravīt rāmasya tasya dūto'haṁ śokaṁ mā kuru maithili

वानर ने अंगूठी देकर सीता से मृदुतापूर्वक कहा — 'मैं उन्हीं राम का दूत हूँ, हे मैथिली! शोक मत करो।'

श्लोक 33 (garuda.1.143.33)

स्वाभिज्ञानञ्च मे देहि येन रामः स्मरिष्यति । तच्छ्रुत्वा प्रददौ सीता वेणीरत्नं हनूमते

svābhijñānañca me dehi yena rāmaḥ smariṣyati tacchrutvā pradadau sītā veṇīratnaṁ hanūmate

'मुझे अपनी कोई पहचान दें, जिससे राम स्मरण कर सकें।' यह सुनकर सीता ने हनुमान् को अपनी चूड़ामणि दी।

श्लोक 34 (garuda.1.143.34)

यथा रामो नयेच्छीघ्रं तथा वाच्यं त्वया कपे । तथेत्युक्त्वा तु हनुमान्वनं दिव्यं बभञ्ज ह

yathā rāmo nayecchīghraṁ tathā vācyaṁ tvayā kape tathetyuktvā tu hanumānvanaṁ divyaṁ babhañja ha

'ऐसा कहना जिससे राम शीघ्र यहाँ आएँ, हे वानर!' 'ऐसा ही होगा' कहकर हनुमान् ने दिव्य वाटिका को नष्ट कर दिया,

श्लोक 35 (garuda.1.143.35)

हत्वाक्षं राक्षसांश्चान्यान्बन्धनं स्वयमागतः । सर्वैरिन्द्रजितो बाणैर्दृष्ट्वा रावणमब्रवीत्

hatvākṣaṁ rākṣasāṁścānyānbandhanaṁ svayamāgataḥ sarvairindrajito bāṇairdṛṣṭvā rāvaṇamabravīt

अक्षकुमार तथा अन्य राक्षसों का वध कर स्वयं बन्धन में आ गए। इन्द्रजित् के सभी बाणों से बद्ध होकर रावण को देखकर बोले —

श्लोक 36 (garuda.1.143.36)

रामदूतोऽस्मि हनुमान्देहि रामाय मैथिलीम् । एतच्छ्रुत्वा प्रकुपितो दीपयामास पुच्छकम्

rāmadūto'smi hanumāndehi rāmāya maithilīm etacchrutvā prakupito dīpayāmāsa pucchakam

'मैं हनुमान्, राम का दूत हूँ; मैथिली को राम को लौटा दो।' यह सुनकर क्रुद्ध रावण ने उसकी पूँछ में आग लगा दी।

श्लोक 37 (garuda.1.143.37)

कपिर्ज्वलितलाङ्गूलो लङ्कां देहेऽ महाबलः । दग्ध्वा लङ्कां समायातो रामपार्श्वं स वानरः

kapirjvalitalāṅgūlo laṅkāṁ dehe' mahābalaḥ dagdhvā laṅkāṁ samāyāto rāmapārśvaṁ sa vānaraḥ

जलती हुई पूँछ वाले महाबली वानर ने लंका को (जला दिया)। लंका को जलाकर वह वानर राम के पास लौट आया।

श्लोक 38 (garuda.1.143.38)

जग्ध्वा फलं मधुवने दृष्टा सीतत्यवेदयत् । वेणीरत्नञ्च रामाय रामो लङ्कापुर्री ययौ

jagdhvā phalaṁ madhuvane dṛṣṭā sītatyavedayat veṇīratnañca rāmāya rāmo laṅkāpurrī yayau

मधुवन में फल खाकर उसने सीता को देखने की सूचना दी। चूड़ामणि राम को देते ही राम लंका की ओर चल पड़े।

श्लोक 39 (garuda.1.143.39)

ससुग्रीवः स हनुमान्सांगदश्च सलक्ष्मणः । विभीषणोऽपि सम्प्राप्तः शरणं राघवं प्रति

sasugrīvaḥ sa hanumānsāṁgadaśca salakṣmaṇaḥ vibhīṣaṇo'pi samprāptaḥ śaraṇaṁ rāghavaṁ prati

सुग्रीव, हनुमान्, अंगद और लक्ष्मण सहित (वे चले)। विभीषण भी राघव की शरण में आ पहुँचे।

श्लोक 40 (garuda.1.143.40)

लङ्कैश्वर्येष्वभ्यषिञ्चद्रामस्तं रावणानुजम् । रामो नलेन सेतुञ्च कृत्वाब्धौ चोत्ततार तम्

laṅkaiśvaryeṣvabhyaṣiñcadrāmastaṁ rāvaṇānujam rāmo nalena setuñca kṛtvābdhau cottatāra tam

राम ने रावण के छोटे भाई विभीषण को लंका के ऐश्वर्य में अभिषिक्त किया। नल से समुद्र पर सेतु बनवाकर राम उसे पार कर गए।

श्लोक 41 (garuda.1.143.41)

सुवेलावस्थितश्चैव पुरीं लङ्कां ददर्शह । अथ ते वानरा वीरा नीलाङ्गदनलादयः

suvelāvasthitaścaiva purīṁ laṅkāṁ dadarśaha atha te vānarā vīrā nīlāṅgadanalādayaḥ

सुवेल पर्वत पर खड़े होकर उन्होंने लंका नगरी को देखा। तब वे वीर वानर — नील, अंगद, नल आदि —

श्लोक 42 (garuda.1.143.42)

धूम्रधूम्राक्षवीरेन्द्रा जाम्बवत्प्रमुखास्तदा । मैन्दद्विविदमुख्यास्ते पुरीं लङ्कां बभञ्जिरे

dhūmradhūmrākṣavīrendrā jāmbavatpramukhāstadā maindadvividamukhyāste purīṁ laṅkāṁ babhañjire

धूम्र, वीरेन्द्र, जाम्बवान् प्रमुख, तथा मैन्द-द्विविद मुख्य वानरों ने लंका नगरी पर आक्रमण किया।

श्लोक 43 (garuda.1.143.43)

राक्षसांश्च महाकायान्कालाञ्जनचयोपमान् । रामः सलक्ष्मणो हत्वा सकपिः सर्वराक्षसान्

rākṣasāṁśca mahākāyānkālāñjanacayopamān rāmaḥ salakṣmaṇo hatvā sakapiḥ sarvarākṣasān

काले काजल के समान विशालकाय राक्षसों को, लक्ष्मण और वानरों सहित राम ने मार डाला — समस्त राक्षसों को —

श्लोक 44 (garuda.1.143.44)

विद्युज्जिह्वञ्च धूम्राक्षं देवान्तकनरान्त कौ । महोदरमहापार्श्वावतिकायं महाबलम्

vidyujjihvañca dhūmrākṣaṁ devāntakanarānta kau mahodaramahāpārśvāvatikāyaṁ mahābalam

विद्युज्जिह्व, धूम्राक्ष, देवान्तक, नरान्तक, महोदर, महापार्श्व और महाबली अतिकाय को,

श्लोक 45 (garuda.1.143.45)

कुम्भं निकुम्भं मत्तञ्च मकराक्षं ह्यकम्पनम् । प्रहस्तं वीरमुन्मत्तं कुम्भकर्णं महाबलम्

kumbhaṁ nikumbhaṁ mattañca makarākṣaṁ hyakampanam prahastaṁ vīramunmattaṁ kumbhakarṇaṁ mahābalam

कुम्भ, निकुम्भ, मत्त, मकराक्ष, अकम्पन, वीर उन्मत्त प्रहस्त और महाबली कुम्भकर्ण को (मार डाला)।

श्लोक 46 (garuda.1.143.46)

रावणिं लक्ष्मणोऽच्छिन्त ह्यस्त्राद्यै राघवो बली । निकृत्य बाहुचक्राणि रावणन्तु न्यपातयन्

rāvaṇiṁ lakṣmaṇo'cchinta hyastrādyai rāghavo balī nikṛtya bāhucakrāṇi rāvaṇantu nyapātayan

लक्ष्मण ने रावण-पुत्र इन्द्रजित् का वध अस्त्रों से किया, और बलवान् राघव ने रावण की भुजाओं को काटकर अन्ततः उसे मार गिराया।

श्लोक 47 (garuda.1.143.47)

सीतां शुद्धां गृहीत्वाथ विमाने पुष्पके स्थितः । सवानरः समायातो ह्ययोध्यां प्रवरां पुरीम्

sītāṁ śuddhāṁ gṛhītvātha vimāne puṣpake sthitaḥ savānaraḥ samāyāto hyayodhyāṁ pravarāṁ purīm

शुद्ध सीता को लेकर, पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर, वानरों सहित राम अयोध्या की श्रेष्ठ नगरी में पहुँचे।

श्लोक 48 (garuda.1.143.48)

तत्र राज्यं चकाराथ पुत्त्रवत्पालयन्प्रजाः । दशाश्वमेधानाहृत्य गयाशिरसि पातनम्

tatra rājyaṁ cakārātha puttravatpālayanprajāḥ daśāśvamedhānāhṛtya gayāśirasi pātanam

वहाँ पुत्रवत् प्रजा का पालन करते हुए उन्होंने राज्य किया। दस अश्वमेध यज्ञ किए और गयाशिर पर पिण्डदान किया,

श्लोक 49 (garuda.1.143.49)

पिण्डानां विधिवत्कृत्वा दत्त्वा दानानि राघवः । पुत्रौ कुशलवौ दृष्ट्वा तौ च राज्येऽभ्यषेचयत्

piṇḍānāṁ vidhivatkṛtvā dattvā dānāni rāghavaḥ putrau kuśalavau dṛṣṭvā tau ca rājye'bhyaṣecayat

विधिपूर्वक पिण्डदान कर दान दिए। अपने दोनों पुत्रों कुश और लव को देखकर राघव ने उन्हें राज्य में अभिषिक्त किया।

श्लोक 50 (garuda.1.143.50)

एकादशसहस्राणि रामो राज्यमकारयत् । शत्रुघ्नो लवणं जघ्ने शैलूषं भतस्ततः

ekādaśasahasrāṇi rāmo rājyamakārayat śatrughno lavaṇaṁ jaghne śailūṣaṁ bhatastataḥ

राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य किया। शत्रुघ्न ने लवण का, तथा फिर शैलूष का सेना सहित वध किया।

श्लोक 51 (garuda.1.143.51)

अगस्त्यादीन्मुनीन्नत्वा श्रुत्वोत्पत्तिञ्च रक्षसाम् । स्वर्गं गतो जनैः सार्धमयोध्यास्थैः कृतार्थकः

agastyādīnmunīnnatvā śrutvotpattiñca rakṣasām svargaṁ gato janaiḥ sārdhamayodhyāsthaiḥ kṛtārthakaḥ

अगस्त्य आदि मुनियों को प्रणाम कर, राक्षसों की उत्पत्ति की कथा सुनकर, कृतार्थ राम अयोध्यावासी जनों सहित स्वर्ग को गए।

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