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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 144

हरिवंश-वर्णन

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (garuda.1.144.1)

ब्रह्मोवाच । हरिवंशं प्रवक्ष्यामि कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम् । वसुदेवात्तु देवक्यां वासुदेवो बलोऽभवत्

brahmovāca harivaṁśaṁ pravakṣyāmi kṛṣṇamāhātmyamuttamam vasudevāttu devakyāṁ vāsudevo balo'bhavat

ब्रह्मा जी ने कहा — मैं हरिवंश का वर्णन करूँगा, जो कृष्ण की परम महिमा है। वसुदेव से देवकी के गर्भ में वासुदेव (कृष्ण) और बल (बलराम) उत्पन्न हुए।

श्लोक 2 (garuda.1.144.2)

धर्मादिरक्षणार्थाय ह्यधर्मादिविनष्टये । कृष्णः पीत्वा स्तनौ गाढं पूतनामनयत्क्षयम्

dharmādirakṣaṇārthāya hyadharmādivinaṣṭaye kṛṣṇaḥ pītvā stanau gāḍhaṁ pūtanāmanayatkṣayam

धर्म आदि की रक्षा और अधर्म आदि के नाश के लिए, कृष्ण ने स्तन-पान करते हुए पूतना का वध कर दिया।

श्लोक 3 (garuda.1.144.3)

शकटः परिवृत्तोऽथ भग्नौ च यमलार्जुनौ । दमितः कालियो नागो धेनुको विनिपातितः

śakaṭaḥ parivṛtto'tha bhagnau ca yamalārjunau damitaḥ kāliyo nāgo dhenuko vinipātitaḥ

उन्होंने शकटासुर को उलट दिया, यमलार्जुन वृक्षों को तोड़ दिया, नाग कालिय को वश में किया, और धेनुकासुर को मार गिराया।

श्लोक 4 (garuda.1.144.4)

धृतो गोवर्धनः शैल इन्द्रेण परिपूजितः । भारावतरणं चक्रे प्रतिज्ञां कृतवान्हरिः

dhṛto govardhanaḥ śaila indreṇa paripūjitaḥ bhārāvataraṇaṁ cakre pratijñāṁ kṛtavānhariḥ

गोवर्धन पर्वत को धारण किया, जिससे इन्द्र ने उनकी पूजा की। हरि ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए पृथ्वी के भार को उतारा।

श्लोक 5 (garuda.1.144.5)

रक्षणायार्जुनादेश्च ह्यरिष्टादिर्निपातितः । केशी विनिहतो दैत्यो गोपाद्याः परितोषिताः

rakṣaṇāyārjunādeśca hyariṣṭādirnipātitaḥ keśī vinihato daityo gopādyāḥ paritoṣitāḥ

अर्जुन आदि की रक्षा के लिए अरिष्टासुर आदि को मार गिराया; दैत्य केशी का वध किया; गोप आदि को संतुष्ट किया।

श्लोक 6 (garuda.1.144.6)

चाणूरो मुष्टिको मल्लः कंसो मञ्चान्निपातितः । रुक्मिणीसत्यभामाद्याः ह्यष्टौ पत्न्यो हरेः पराः

cāṇūro muṣṭiko mallaḥ kaṁso mañcānnipātitaḥ rukmiṇīsatyabhāmādyāḥ hyaṣṭau patnyo hareḥ parāḥ

चाणूर, मुष्टिक मल्लों का, तथा मंच से कंस का वध किया। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि हरि की आठ प्रमुख पत्नियाँ थीं —

श्लोक 7 (garuda.1.144.7)

षोढश स्त्रीसहस्राणि ह्यन्यान्यास महात्मनः । तासां पुत्राश्च पौत्राद्याः शतशोऽथ सहस्रशः

ṣoḍhaśa strīsahasrāṇi hyanyānyāsa mahātmanaḥ tāsāṁ putrāśca pautrādyāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

तथा उस महात्मा की सोलह हजार अन्य पत्नियाँ भी थीं। उनके पुत्र, पौत्र आदि सैकड़ों-हजारों की संख्या में थे।

श्लोक 8 (garuda.1.144.8)

रुक्मिण्याञ्चैव प्रद्युम्नो न्यवधीच्छंबरञ्च यः । तस्य पुत्रोऽनिरुद्धोऽभूदुषाबाणसुतापतिः

rukmiṇyāñcaiva pradyumno nyavadhīcchaṁbarañca yaḥ tasya putro'niruddho'bhūduṣābāṇasutāpatiḥ

रुक्मिणी से प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने शम्बरासुर का वध किया। उनके पुत्र अनिरुद्ध थे, जो बाणासुर की पुत्री उषा के पति थे।

श्लोक 9 (garuda.1.144.9)

हरिशकरयोर्यत्र महायुद्धं बभूव ह । बाणबाहुसहस्रञ्च च्छिन्नं बाहुद्वयं ह्यभूत्

hariśakarayoryatra mahāyuddhaṁ babhūva ha bāṇabāhusahasrañca cchinnaṁ bāhudvayaṁ hyabhūt

वहाँ हरि और शंकर के बीच महायुद्ध हुआ; बाणासुर की सहस्र भुजाओं में से केवल दो भुजाएँ शेष रहीं, शेष कट गईं।

श्लोक 10 (garuda.1.144.10)

नरको निहतो येन पारिजातं जहार यः । बलश्च शिसुपालश्च हतश्च द्विविदः कपिः

narako nihato yena pārijātaṁ jahāra yaḥ balaśca śisupālaśca hataśca dvividaḥ kapiḥ

जिन्होंने नरकासुर का वध किया और पारिजात वृक्ष हर लाया; तथा बल, शिशुपाल और वानर द्विविद भी उनके द्वारा मारे गए।

श्लोक 11 (garuda.1.144.11)

अनिरुद्धादभूद्वज्रः स च राजा गते हरौ । सन्दीपनिं गुरुञ्चक्रे सपुत्रञ्च चकार सः । मथुरायां चोग्रसेनं पालनं च दिवौकसाम्

aniruddhādabhūdvajraḥ sa ca rājā gate harau sandīpaniṁ guruñcakre saputrañca cakāra saḥ mathurāyāṁ cograsenaṁ pālanaṁ ca divaukasām

अनिरुद्ध से वज्र उत्पन्न हुए, जो हरि के लोकगमन के पश्चात् राजा बने। कृष्ण ने सान्दीपनि को गुरु बनाया और उनके पुत्र को लौटाया; मथुरा में उग्रसेन का राज्य तथा देवताओं की रक्षा भी स्थापित की।

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