पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 148
रक्तपित्त-निदान
श्लोक 1 (garuda.1.148.1)
धन्वन्तरिरुवाच । अथातो रक्तपित्तस्य निदानं प्रवदाम्यहम् । भृशोष्णतिक्तकट्वम्ललवणादिविदाहिभिः
dhanvantariruvāca athāto raktapittasya nidānaṁ pravadāmyaham bhṛśoṣṇatiktakaṭvamlalavaṇādividāhibhiḥ
धन्वन्तरि ने कहा — अब मैं रक्तपित्त के निदान का वर्णन करूँगा। अत्यन्त उष्ण, तिक्त, कटु, अम्ल, लवण आदि दाहकारी पदार्थों से —
श्लोक 2 (garuda.1.148.2)
कोद्रवोद्दालकैश्चान्यैस्तदुक्तैरति सेवितैः । कुपितं पैत्तिकैः पित्तं द्रवं रक्तञ्च मूर्छति
kodravoddālakaiścānyaistaduktairati sevitaiḥ kupitaṁ paittikaiḥ pittaṁ dravaṁ raktañca mūrchati
तथा कोदो, उद्दालक आदि उक्त अन्य पदार्थों के अत्यधिक सेवन से, पित्तकारी कारणों से कुपित हुआ पित्त, द्रव रक्त के साथ मिलकर विकृत हो जाता है।
श्लोक 3 (garuda.1.148.3)
तैर्मिथस्तुल्यरूपत्वमागम्य व्याप्नुवंस्तनुम् । पित्तरक्तस्य विकृतेः संसर्गाद्दषणादपि
tairmithastulyarūpatvamāgamya vyāpnuvaṁstanum pittaraktasya vikṛteḥ saṁsargāddaṣaṇādapi
इन कारणों से दोनों (पित्त और रक्त) परस्पर समान स्वरूप को प्राप्त होकर शरीर में व्याप्त हो जाते हैं — पित्त और रक्त की विकृति के संसर्ग और परस्पर दूषण से —
श्लोक 4 (garuda.1.148.4)
गन्धवर्णानुवृत्तेषु रक्तेन व्यपदिश्यते । प्रभवत्यसृजः स्थानात्प्लीहतो यकृतश्च सः
gandhavarṇānuvṛtteṣu raktena vyapadiśyate prabhavatyasṛjaḥ sthānātplīhato yakṛtaśca saḥ
जब स्राव की गन्ध और वर्ण रक्त के अनुरूप हों, तब इसे 'रक्तपित्त' नाम से कहा जाता है। यह रक्त के स्थान से, प्लीहा से और यकृत से उत्पन्न होता है।
श्लोक 5 (garuda.1.148.5)
शिरोगुरुत्वमरुचिः शीतेच्छा धूमकोऽम्लकः । छर्धितश्छर्दिबै भत्स्यं कासः श्वासो भ्रमः क्लमः
śirogurutvamaruciḥ śītecchā dhūmako'mlakaḥ chardhitaśchardibai bhatsyaṁ kāsaḥ śvāso bhramaḥ klamaḥ
सिर में भारीपन, अरुचि, शीतलता की इच्छा, धूँआ-सा अनुभव, खट्टापन, वमन — जिसका वमित पदार्थ घृणित हो, कास, श्वास, चक्कर और थकान —
श्लोक 6 (garuda.1.148.6)
लोहितो न हितो मत्स्यगन्धास्यात्वञ्च विज्वरे । रक्तहारिद्रहरितवर्णता नयनादिषु
lohito na hito matsyagandhāsyātvañca vijvare raktahāridraharitavarṇatā nayanādiṣu
अशुभ लालिमा, बिना ज्वर के भी मुँह में मछली जैसी गन्ध, तथा नेत्रों आदि में रक्त-वर्ण, पीत-वर्ण अथवा हरित-वर्ण की विकृति —
श्लोक 7 (garuda.1.148.7)
नीललोहित पीतानां वर्णानामविवेचनम् । स्वप्ने इन्मादधर्मित्वं भवत्यस्मिन्भविष्यति
nīlalohita pītānāṁ varṇānāmavivecanam svapne inmādadharmitvaṁ bhavatyasminbhaviṣyati
नील, लाल और पीत वर्णों में अन्तर न कर पाना, तथा स्वप्न में अशुभ वस्तुएँ देखना — यह इस रोग के आने से पहले प्रकट होते हैं।
श्लोक 8 (garuda.1.148.8)
उर्ध्वं नासाक्षिकर्णास्यैर्मेढ्रयोनिगुदैरधः । कुपितं रोमकूपैश्च समस्तैस्तत्प्रवर्तते
urdhvaṁ nāsākṣikarṇāsyairmeḍhrayonigudairadhaḥ kupitaṁ romakūpaiśca samastaistatpravartate
यह कुपित होने पर ऊपर की ओर नासिका, नेत्र, कान और मुख से, तथा नीचे की ओर लिंग, योनि और गुदा से, तथा सभी रोमकूपों से भी प्रकट होता है।
श्लोक 9 (garuda.1.148.9)
ऊर्ध्वं साध्यं कफाद्यस्मात्तद्विरेचनसाधितम् । बह्वौषधानि पित्तस्य विरेको हि वरौषधम्
ūrdhvaṁ sādhyaṁ kaphādyasmāttadvirecanasādhitam bahvauṣadhāni pittasya vireko hi varauṣadham
ऊपर की ओर होने वाला यह कफ-सम्बद्ध होने से साध्य है, और विरेचन से उपचारित होता है। पित्त के लिए अनेक औषधियाँ हैं, परन्तु विरेचन ही श्रेष्ठ औषध है।
श्लोक 10 (garuda.1.148.10)
अनुबन्धी कफो यत्र तत्र तस्यापि शुद्धिकृत् । कषायाः स्वादवो यस्य विशुद्धौ श्लेष्मला हिताः
anubandhī kapho yatra tatra tasyāpi śuddhikṛt kaṣāyāḥ svādavo yasya viśuddhau śleṣmalā hitāḥ
जहाँ कफ भी सहवर्ती हो, वहाँ उसकी भी शुद्धि करनी चाहिए। कषाय और मधुर द्रव्य उसकी शुद्धि में हितकर होते हैं, जो कफनाशक हैं —
श्लोक 11 (garuda.1.148.11)
कटुतिक्तकषाया वा ये निसर्गात्कफावहाः । अधो याप्यञ्च नायुष्मांस्तत्प्रच्छर्दनसाधकम्
kaṭutiktakaṣāyā vā ye nisargātkaphāvahāḥ adho yāpyañca nāyuṣmāṁstatpracchardanasādhakam
अथवा कटु, तिक्त, कषाय द्रव्य, जो स्वभाव से कफनाशक हों। नीचे की ओर होने वाला रक्तपित्त केवल याप्य (शमन योग्य) है, असाध्य है, और निर्बल व्यक्ति के लिए वमन ही इसका उपचार है।
श्लोक 12 (garuda.1.148.12)
अल्पौषधञ्च पित्तस्य वमनं नावमौषधम् । अनुबन्धि बलं यस्य शान्तपित्तनरस्य च
alpauṣadhañca pittasya vamanaṁ nāvamauṣadham anubandhi balaṁ yasya śāntapittanarasya ca
पित्त के लिए औषध अल्प मात्रा में दें, तथा वमन के लिए निर्बल औषध न दें। जिस व्यक्ति का पित्त शान्त हो गया हो और शक्ति सहवर्ती रह गई हो —
श्लोक 13 (garuda.1.148.13)
कषायश्च हितस्तस्य मधुरा एव केवलम् । कफमारुतसंस्पृष्टमसाध्यमुपनामनम्
kaṣāyaśca hitastasya madhurā eva kevalam kaphamārutasaṁspṛṣṭamasādhyamupanāmanam
उसके लिए कषाय हितकर है, तथा केवल मधुर द्रव्य ही उपयुक्त हैं। कफ और वायु दोनों से युक्त रोग असाध्य होकर बार-बार लौटने वाला होता है।
श्लोक 14 (garuda.1.148.14)
असह्यं प्रतिलोमत्वादसाध्यादौषधस्य च । न हि संशोधनं किञ्चिदस्य च प्रतिलोमिनः
asahyaṁ pratilomatvādasādhyādauṣadhasya ca na hi saṁśodhanaṁ kiñcidasya ca pratilominaḥ
यह अपने विपरीत क्रम के कारण असह्य तथा औषध से भी असाध्य है; इस विपरीत प्रकार के लिए कोई शोधन-चिकित्सा कारगर नहीं होती।
श्लोक 15 (garuda.1.148.15)
शोधनं प्रतिलोमञ्च रक्तपित्तेऽभिसर्जितम् । एवमेवोपशमनं संशोधनमिहेष्यते
śodhanaṁ pratilomañca raktapitte'bhisarjitam evamevopaśamanaṁ saṁśodhanamiheṣyate
इस विपरीत रक्तपित्त में शोधन-चिकित्सा वर्जित है; अतः यहाँ केवल शमन-चिकित्सा ही अपेक्षित है, शोधन नहीं।
श्लोक 16 (garuda.1.148.16)
संसृष्टेषु हि दोषेषु सर्वथा छर्दनं हितम् । तत्र दोषोऽत्र गमनं शिवास्त्र इव लक्ष्यते
saṁsṛṣṭeṣu hi doṣeṣu sarvathā chardanaṁ hitam tatra doṣo'tra gamanaṁ śivāstra iva lakṣyate
जब दोष मिश्रित हों, तब सर्वथा वमन ही हितकर है। वहाँ दोष की गति उपचार में तीव्र और निर्णायक देखी जाती है।
श्लोक 17 (garuda.1.148.17)
उपद्रवाश्च विकृतिं फलतस्तेषु साधितम्
upadravāśca vikṛtiṁ phalatasteṣu sādhitam
तथा उपद्रवों की विकृति को भी उन-उन प्रकारों के अनुसार, उनके परिणामस्वरूप, उपचारित करना चाहिए।