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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 150

श्वास-निदान

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

श्लोक 1 (garuda.1.150.1)

धन्वन्तरिरुवाच । अथातः श्वासरोगस्य निदानं प्रवदाम्यहम् । कासवृद्ध्या भवेच्छ्वासः पूर्वैर्वा दोषकोपनैः

dhanvantariruvāca athātaḥ śvāsarogasya nidānaṁ pravadāmyaham kāsavṛddhyā bhavecchvāsaḥ pūrvairvā doṣakopanaiḥ

धन्वन्तरि ने कहा — अब मैं श्वास रोग के निदान का वर्णन करूँगा। श्वास कास की वृद्धि से, अथवा पूर्व में बताए गए दोष-प्रकोपक कारणों से उत्पन्न होता है —

श्लोक 2 (garuda.1.150.2)

आमातिसारवमथुविषपाण्डुज्वरैरपि । रजोधूमानिलैर्मर्मघातादपि हिमाम्बुना

āmātisāravamathuviṣapāṇḍujvarairapi rajodhūmānilairmarmaghātādapi himāmbunā

आम, अतिसार, वमन, विष, पाण्डु और ज्वर से भी; धूल, धुएँ, वायु से; मर्मस्थल पर आघात से, तथा अत्यधिक ठंडे जल से भी।

श्लोक 3 (garuda.1.150.3)

क्षुद्रकस्तमकश्छिन्नो महानूर्ध्वश्च पञ्चमः । कफोपरुद्धगमनपवनो विष्वगास्थितः

kṣudrakastamakaśchinno mahānūrdhvaśca pañcamaḥ kaphoparuddhagamanapavano viṣvagāsthitaḥ

क्षुद्रक, तमक, छिन्न, महान् और पाँचवाँ ऊर्ध्व — ये पाँच प्रकार के श्वास हैं। जब वायु की गति कफ से अवरुद्ध होकर सर्वत्र फैल जाती है —

श्लोक 4 (garuda.1.150.4)

प्राणोदकान्नवाहीनि दुष्टस्रोतांसि दूषयन् । उरः स्थः कुरुते श्वासमामाशयसमुद्भवम्

prāṇodakānnavāhīni duṣṭasrotāṁsi dūṣayan uraḥ sthaḥ kurute śvāsamāmāśayasamudbhavam

तब वह प्राण, जल और अन्न ले जाने वाले पहले से ही दूषित स्रोतों को और दूषित करती हुई, छाती में स्थित होकर आमाशय-जनित श्वास उत्पन्न करती है।

श्लोक 5 (garuda.1.150.5)

प्राग्रूपं तस्य हृत्पार्श्वशूलं प्राणविलोमता । आनाहः शङ्खभेदश्च तत्रायासोऽतिभोजनैः

prāgrūpaṁ tasya hṛtpārśvaśūlaṁ prāṇavilomatā ānāhaḥ śaṅkhabhedaśca tatrāyāso'tibhojanaiḥ

इसके पूर्वरूप हैं — हृदय और पार्श्व में शूल, प्राण-वायु की विपरीत गति, आनाह (पेट फूलना) और कनपटी में टूटन-सी पीड़ा; वहाँ परिश्रम तथा अत्यधिक भोजन से —

श्लोक 6 (garuda.1.150.6)

प्रेरितः प्रेरयन्क्षुद्रं स्वयं स समलं मरुत् । प्रतिलोमं शिरा गच्छेदुदीर्य पवनः कफम्

preritaḥ prerayankṣudraṁ svayaṁ sa samalaṁ marut pratilomaṁ śirā gacchedudīrya pavanaḥ kapham

प्रेरित होकर तथा स्वयं क्षुद्र वायु को प्रेरित करता हुआ, मलयुक्त वह वायु शिराओं में विपरीत दिशा में जाता है और कफ को उभार देता है —

श्लोक 7 (garuda.1.150.7)

परिगृह्यशिरोग्रीवमुरः पार्श्वे च पीडयन् । कासं घुर्घुरकं मोहमरुचिम्पीनसं भृशम्

parigṛhyaśirogrīvamuraḥ pārśve ca pīḍayan kāsaṁ ghurghurakaṁ mohamarucimpīnasaṁ bhṛśam

सिर, गर्दन, छाती और पार्श्व को जकड़कर पीड़ा देता हुआ, वह घुरघुराहट भरी कास, मोह, अरुचि और तीव्र जुकाम उत्पन्न करता है —

श्लोक 8 (garuda.1.150.8)

करोति तीव्रवेगञ्च श्वासं प्राणोपतापिनम् । प्रताम्येत्तस्य वेगेनष्ठीवनान्ते क्षणं सुखी

karoti tīvravegañca śvāsaṁ prāṇopatāpinam pratāmyettasya vegenaṣṭhīvanānte kṣaṇaṁ sukhī

तथा प्राणों को संतप्त करने वाला अत्यन्त वेगयुक्त श्वास उत्पन्न करता है। इसके वेग से रोगी व्याकुल होता है, केवल कफ थूकने के बाद क्षणभर सुख पाता है —

श्लोक 9 (garuda.1.150.9)

कृच्छ्राच्छयानः श्वसिति निषण्णः स्वास्थ्यमर्हति । उच्छ्रिताक्षो ललाटेन स्विद्यता भृशमार्तिमान्

kṛcchrācchayānaḥ śvasiti niṣaṇṇaḥ svāsthyamarhati ucchritākṣo lalāṭena svidyatā bhṛśamārtimān

लेटकर वह कठिनाई से साँस लेता है, बैठकर ही उसे कुछ आराम मिलता है; उसकी आँखें ऊपर उठी हुई, ललाट पसीने से तर, अत्यन्त पीड़ित —

श्लोक 10 (garuda.1.150.10)

विशुष्कास्यो मुहुः श्वासः काङ्क्षत्युष्णं सवेपथुः । मेघाम्बुशीतप्राग्वातैः श्लेष्मलैश्च विवर्धते

viśuṣkāsyo muhuḥ śvāsaḥ kāṅkṣatyuṣṇaṁ savepathuḥ meghāmbuśītaprāgvātaiḥ śleṣmalaiśca vivardhate

मुँह शुष्क, बार-बार श्वास, गर्मी की इच्छा और कँपकँपी होती है; यह मेघ, वर्षा, शीत, पूर्वी हवा तथा कफकारी पदार्थों से बढ़ता है — यह तमक श्वास है।

श्लोक 11 (garuda.1.150.11)

स याप्यस्तमकः साध्यो नरस्य बलिनो भवेत् । ज्वरमूर्छावतः सीतैर्न शाम्येत्प्रथमस्तु सः

sa yāpyastamakaḥ sādhyo narasya balino bhavet jvaramūrchāvataḥ sītairna śāmyetprathamastu saḥ

बलवान् मनुष्य में यह तमक याप्य (शमन-योग्य) परन्तु साध्य हो सकता है; परन्तु ज्वर और मूर्च्छा सहित पहला आक्रमण शीतल उपायों से शान्त नहीं होता — यह गम्भीर है।

श्लोक 12 (garuda.1.150.12)

कासश्वसितवच्छीर्णमर्मच्छेदरुजार्दितः । सस्वेदमूर्छः सानाहो बस्तिदाहविबोधवान्

kāsaśvasitavacchīrṇamarmacchedarujārditaḥ sasvedamūrchaḥ sānāho bastidāhavibodhavān

छिन्न प्रकार में मानो मर्मस्थलों में कटन-सी पीड़ा से, क्षीण कास-श्वास से पीड़ित, स्वेद और मूर्च्छा सहित, पेट फूलने तथा मूत्राशय में जलन-बेचैनी से युक्त —

श्लोक 13 (garuda.1.150.13)

अधोदृष्टिः शुताक्षस्तु स्निह्यद्रक्तैकलोचनः । शुष्कास्यः प्रलपन्दीनो नष्टच्छायो विचेतनः

adhodṛṣṭiḥ śutākṣastu snihyadraktaikalocanaḥ śuṣkāsyaḥ pralapandīno naṣṭacchāyo vicetanaḥ

दृष्टि नीचे झुकी, आँखें सूजी हुई, एक आँख गीली और लाल, मुँह शुष्क, प्रलाप करता हुआ, दीन, कान्तिहीन और अचेत होकर —

श्लोक 14 (garuda.1.150.14)

महातामहता दीनो नादेन श्वसिति क्रथन् । उद्धूयमानः संरब्धो मत्तर्षभ इवानिशम्

mahātāmahatā dīno nādena śvasiti krathan uddhūyamānaḥ saṁrabdho mattarṣabha ivāniśam

अत्यन्त कष्ट से दीन, ऊँची घरघराहट के साथ साँस लेता, बार-बार हाँफता, विक्षुब्ध, मानो उन्मत्त बैल के समान निरन्तर —

श्लोक 15 (garuda.1.150.15)

प्रनष्टज्ञानविज्ञानो विभ्रान्तनयनाननः । नेत्रे समाक्षिपन्बद्धमूत्रवर्चा विशीर्णवाक्

pranaṣṭajñānavijñāno vibhrāntanayanānanaḥ netre samākṣipanbaddhamūtravarcā viśīrṇavāk

ज्ञान-विज्ञान से रहित, आँखें और मुख भ्रमित, नेत्र इधर-उधर घूमते, मूत्र-मल का अवरोध, वाणी अस्पष्ट —

श्लोक 16 (garuda.1.150.16)

शुष्ककण्ठो मुहुश्चैव कर्णशङ्खाशिरोऽतिरुक् । यो दीर्घमुच्छ्वसित्यूर्ध्वं न च प्रत्याहरत्यधः

śuṣkakaṇṭho muhuścaiva karṇaśaṅkhāśiro'tiruk yo dīrghamucchvasityūrdhvaṁ na ca pratyāharatyadhaḥ

कण्ठ बार-बार शुष्क, कान-कनपटी-सिर में तीव्र पीड़ा — जो लम्बे समय तक ऊपर की ओर श्वास छोड़ता है परन्तु नीचे की ओर नहीं खींच पाता —

श्लोक 17 (garuda.1.150.17)

श्लेष्मावृतमुखश्रोत्रः क्रुद्धगन्धवहार्दितः । ऊर्ध्वं समीक्षते भ्रान्तमक्षिणी परितः क्षिपन्

śleṣmāvṛtamukhaśrotraḥ kruddhagandhavahārditaḥ ūrdhvaṁ samīkṣate bhrāntamakṣiṇī paritaḥ kṣipan

जिसका मुख और कान कफ से अवरुद्ध हों, कुपित प्राण-वायु से पीड़ित, ऊपर की ओर स्थिर दृष्टि से देखता, आँखें चारों ओर घुमाता —

श्लोक 18 (garuda.1.150.18)

मर्मसु च्छिद्यमानेषु परिदेवी निरुद्धवाक् । एते सिध्येयुरव्यक्ताः व्यक्ताः प्राणहरा ध्रुवम्

marmasu cchidyamāneṣu paridevī niruddhavāk ete sidhyeyuravyaktāḥ vyaktāḥ prāṇaharā dhruvam

मर्मस्थलों के मानो कटने से विलाप करता, वाणी अवरुद्ध — ये गम्भीर अवस्थाएँ केवल तब तक साध्य हो सकती हैं जब तक इनके घातक लक्षण अव्यक्त हों; व्यक्त होने पर वे निश्चित रूप से प्राण हर लेती हैं।

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