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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 169

अनुपान-विधि: आहार-पान के गुण

अध्याय 168अध्याय-सूचीअध्याय 170

श्लोक 1 (garuda.1.169.1)

श्रीगरुडमहापुराणम् १६९ धन्वन्तरिरुवाच । हिताहितविकेकाय अनुपानविधिं ब्रुवे । रक्तशालि त्रिदोषघ्नं तृष्णामेदोनिवारकम्

śrīgaruḍamahāpurāṇam 169 dhanvantariruvāca hitāhitavikekāya anupānavidhiṁ bruve raktaśāli tridoṣaghnaṁ tṛṣṇāmedonivārakam

धन्वन्तरि ने कहा — हितकर और अहितकर के विवेक के लिए अनुपान-विधि बताता हूँ। रक्तशालि (लाल चावल) त्रिदोषनाशक तथा प्यास और मेद (मोटापे) का निवारक है।

श्लोक 2 (garuda.1.169.2)

महाशालि परं वृष्यं कलमः श्लेष्मपित्तहा । शीत्तो गुरुस्त्रिदोषघ्नः प्रायशो गौरषष्टिकः

mahāśāli paraṁ vṛṣyaṁ kalamaḥ śleṣmapittahā śītto gurustridoṣaghnaḥ prāyaśo gauraṣaṣṭikaḥ

महाशालि (उत्तम चावल) परम शक्तिवर्धक है, कलम चावल कफ-पित्त नाशक है। शष्टिक चावल, प्रायः श्वेत, शीतल, भारी और त्रिदोषनाशक होता है।

श्लोक 3 (garuda.1.169.3)

श्यामाकः शोषणो रूक्षो वातलः श्लेष्मपित्तहा । तद्वत्प्रियङ्गुनीवारकोरदूषाः प्रकीर्तिताः

śyāmākaḥ śoṣaṇo rūkṣo vātalaḥ śleṣmapittahā tadvatpriyaṅgunīvārakoradūṣāḥ prakīrtitāḥ

श्यामाक (साँवा) शोषक, रूखा, वातवर्धक तथा कफ-पित्त नाशक है; इसी प्रकार प्रियंगु, नीवार और कोरदूष भी कहे गए हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.169.4)

बहुवारः सकृच्छीतः श्लेष्मपित्तहरो यवः । वृष्यः शीतो गुरुः स्वादुर्गोधूमो वातनाशनः

bahuvāraḥ sakṛcchītaḥ śleṣmapittaharo yavaḥ vṛṣyaḥ śīto guruḥ svādurgodhūmo vātanāśanaḥ

एक बार पकाया गया शीतल चावल कफ-पित्तनाशक होता है। जौ अत्यन्त शक्तिवर्धक, शीतल, भारी, मीठा और वातनाशक है, गेहूँ भी इसी प्रकार है।

श्लोक 5 (garuda.1.169.5)

कफपित्तास्त्रजिन्मुद्गः कषायो मधुरोलघुः । माषो बहुबलो वृष्यः पित्तश्लेष्महरो गुरुः

kaphapittāstrajinmudgaḥ kaṣāyo madhurolaghuḥ māṣo bahubalo vṛṣyaḥ pittaśleṣmaharo guruḥ

मूँग कफ-पित्त और रक्त-विकार का नाशक है, कसैला, मीठा और हल्का है। उड़द अत्यन्त बलवर्धक, शक्तिवर्धक, भारी तथा पित्त-कफ नाशक है।

श्लोक 6 (garuda.1.169.6)

अवृष्यः श्लेष्मपित्तघ्नो राजमाषोऽनिलार्तिनुत् । कुलत्थः श्वासहिक्काहृत्कफगुल्मानिलापहः

avṛṣyaḥ śleṣmapittaghno rājamāṣo'nilārtinut kulatthaḥ śvāsahikkāhṛtkaphagulmānilāpahaḥ

राजमाष (राजमा) शक्तिवर्धक नहीं है, कफ-पित्त नाशक है तथा वात-पीड़ा हरता है। कुलत्थ श्वास, हिचकी, हृदय-रोग, कफ, गुल्म और वात का नाश करता है।

श्लोक 7 (garuda.1.169.7)

रक्तपित्तज्वरोन्माथो शीतो ग्राही मकुष्ठकः । पुंस्त्वासृक्कफपित्तघ्नश्चणको वातलः स्मृतः

raktapittajvaronmātho śīto grāhī makuṣṭhakaḥ puṁstvāsṛkkaphapittaghnaścaṇako vātalaḥ smṛtaḥ

मकुष्ठ रक्त-विकार और ज्वर का नाशक, शीतल और संग्राही है। चना पुंस्त्व, रक्त, कफ और पित्त का नाशक है तथा वातवर्धक कहा गया है।

श्लोक 8 (garuda.1.169.8)

मसूरो मधुरः शीव संग्रही कफपित्तहा । तद्वत्सर्वगुणाढ्यश्च कलायश्चातिवातलः

masūro madhuraḥ śīva saṁgrahī kaphapittahā tadvatsarvaguṇāḍhyaśca kalāyaścātivātalaḥ

मसूर मीठी, शीतल, संग्राही तथा कफ-पित्त नाशक है; इसी प्रकार मटर सभी गुणों से युक्त होते हुए भी अत्यन्त वातवर्धक है।

श्लोक 9 (garuda.1.169.9)

आग्की कफपित्तघ्नो शुक्रला च तथा स्मृता । अतसी पित्तला ज्ञेया सिद्धार्थः कफवातजित्

āgkī kaphapittaghno śukralā ca tathā smṛtā atasī pittalā jñeyā siddhārthaḥ kaphavātajit

अरहर कफ-पित्त नाशक और वीर्यवर्धक कही गई है। अलसी पित्तवर्धक जानी जाती है, सफेद सरसों कफ-वात नाशक है।

श्लोक 10 (garuda.1.169.10)

सक्षारमधुरस्निग्धो बलोष्णपित्तकृत्तिलः । बलघ्ना रूक्षलाः शीता विविधाः सस्यजातयः

sakṣāramadhurasnigdho baloṣṇapittakṛttilaḥ balaghnā rūkṣalāḥ śītā vividhāḥ sasyajātayaḥ

क्षार, मिठास और चिकनाई से युक्त तिल बलवर्धक, उष्ण और पित्तकारक है; अन्य विविध अनाज-जातियाँ बल का ह्रास करने वाली, रूखी और शीतल होती हैं।

श्लोक 11 (garuda.1.169.11)

चित्रकेङ्गुदिनालीकाः पिप्पलीमधुशिग्रवः । चव्याचरणनिर्गुण्डीतर्कारीकाशमर्दकाः

citrakeṅgudinālīkāḥ pippalīmadhuśigravaḥ cavyācaraṇanirguṇḍītarkārīkāśamardakāḥ

चित्रक, इंगुदी, नालिका, पीपल, मधु, सहजन, चव्य, आचरण, निर्गुण्डी, तर्कारी और कासमर्द —

श्लोक 12 (garuda.1.169.12)

सबिल्वाः कफपित्तघ्नाः क्रिमिघ्ना लघुदीपकाः । वर्षाभूमार्करौ वातकफघ्नौ दोषनाशनौ

sabilvāḥ kaphapittaghnāḥ krimighnā laghudīpakāḥ varṣābhūmārkarau vātakaphaghnau doṣanāśanau

बेल सहित ये सभी कफ-पित्त नाशक, कृमिनाशक और अग्नि प्रदीप्त करने वाले हैं। पुनर्नवा और आक दोनों वात-कफ नाशक तथा दोष-निवारक हैं।

श्लोक 13 (garuda.1.169.13)

तिक्तरसः स्यादेरण्डः काकमाची त्रिदोषहृत् । चाङ्गेरी कफवातघ्नी सर्षपः सर्वदोषदम्

tiktarasaḥ syāderaṇḍaḥ kākamācī tridoṣahṛt cāṅgerī kaphavātaghnī sarṣapaḥ sarvadoṣadam

एरण्ड (अरंडी) कड़वे रस का है, काकमाची त्रिदोषनाशक है। चांगेरी (खट्टी-बूटी) कफ-वात नाशक है, सरसों सभी दोषों का नाशक है।

श्लोक 14 (garuda.1.169.14)

तद्वदेव च कौस्मसुम्भं राजिका वातपित्तला । नाडीचः कफपित्तघ्नः चुचुर्मधुरशीतलः

tadvadeva ca kausmasumbhaṁ rājikā vātapittalā nāḍīcaḥ kaphapittaghnaḥ cucurmadhuraśītalaḥ

इसी प्रकार कुसुम्भ (कुसुम) और राजिका (सरसों) वात-पित्तवर्धक हैं। नाडीच कफ-पित्तनाशक है, चूचु मीठा और शीतल है।

श्लोक 15 (garuda.1.169.15)

दोषघ्नं पद्मपत्रञ्च त्रिपुटं वातकृत्परम् । सक्षारः सर्वदोषघ्नो वास्तुको रोचनः परः

doṣaghnaṁ padmapatrañca tripuṭaṁ vātakṛtparam sakṣāraḥ sarvadoṣaghno vāstuko rocanaḥ paraḥ

कमल-पत्र दोषनाशक है, त्रिपुट अत्यन्त वातवर्धक है। क्षार से युक्त बथुआ सभी दोषों का नाशक तथा भूख बढ़ाने वाला है।

श्लोक 16 (garuda.1.169.16)

तण्डुकीयोविपहरः पालङ्क्याश्च तथापरे । मूलकं दोषकृच्छामं स्विन्नं वातकफापदम्

taṇḍukīyovipaharaḥ pālaṅkyāśca tathāpare mūlakaṁ doṣakṛcchāmaṁ svinnaṁ vātakaphāpadam

तण्डुलीय विषनाशक है, पालक की जाति भी उसी प्रकार है। मूली कच्ची दोष उत्पन्न करने वाली, किन्तु उबालकर लेने पर वात-कफ नाशक होती है।

श्लोक 17 (garuda.1.169.17)

सर्वदोषहरं ह्यद्यं कण्ठ्यं तत्पक्वमिष्यते । कर्कोटकं सवार्ताकं पदोलं कारवेल्लकम्

sarvadoṣaharaṁ hyadyaṁ kaṇṭhyaṁ tatpakvamiṣyate karkoṭakaṁ savārtākaṁ padolaṁ kāravellakam

कच्ची मूली भी सर्वदोषनाशक और गले के लिए हितकर मानी गई है, पकी हुई भी वैसी ही है। परवल, बैंगन, पटोल और करेला —

श्लोक 18 (garuda.1.169.18)

कुष्ठमेहज्वरश्वासकासपित्तकफापहम् । सर्वदोषहरं हृद्यं कूष्माण्डं बस्तिशोधनम्

kuṣṭhamehajvaraśvāsakāsapittakaphāpaham sarvadoṣaharaṁ hṛdyaṁ kūṣmāṇḍaṁ bastiśodhanam

— कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर, श्वास, खाँसी, पित्त और कफ का नाश करते हैं। कूष्माण्ड (कुम्हड़ा) सभी दोषों का नाशक, हृदय के लिए हितकर और मूत्राशय को शुद्ध करने वाला है।

श्लोक 19 (garuda.1.169.19)

कलिङ्गालाबुनी पित्तनाशिनी वातकारिणी । त्रपुषोर्वारुके वातश्लेष्मले पित्तवारणे

kaliṅgālābunī pittanāśinī vātakāriṇī trapuṣorvāruke vātaśleṣmale pittavāraṇe

करेला और लौकी पित्तनाशक हैं किन्तु वातवर्धक हैं। ककड़ी और उर्वारुक (एक प्रकार का खरबूजा) वात-कफ वर्धक तथा पित्तनिवारक हैं।

श्लोक 20 (garuda.1.169.20)

वृक्षाम्लं कफवातघ्नं जम्बीरं कफवातनुत् । वातघ्नं दाडिमं ग्राहि नागरङ्गफलं गुरु

vṛkṣāmlaṁ kaphavātaghnaṁ jambīraṁ kaphavātanut vātaghnaṁ dāḍimaṁ grāhi nāgaraṅgaphalaṁ guru

वृक्षाम्ल (कोकम) कफ-वात नाशक है, जम्बीर (नींबू) कफ-वात हरता है। अनार वातनाशक और संग्राही है, नारंगी फल भारी होता है।

श्लोक 21 (garuda.1.169.21)

केशरं मातुलुङ्गं च दीपनं कफवातनुत् । वातपित्तहरो माषस्त्वक्स्निग्धोष्णानिलापहः

keśaraṁ mātuluṅgaṁ ca dīpanaṁ kaphavātanut vātapittaharo māṣastvaksnigdhoṣṇānilāpahaḥ

केशर (एक प्रकार की नारंगी) और बिजौरा नींबू भूख बढ़ाने वाले तथा कफ-वात नाशक हैं। वात-पित्तनाशक और चिकनी, उष्ण त्वचा वाला फल वायु को हरता है।

श्लोक 22 (garuda.1.169.22)

सरमामलकं वृष्यं मधुरं हृद्यमम्लकृत् । भुक्तप्ररोचका पुण्या हरीतक्यमृतोपमा

saramāmalakaṁ vṛṣyaṁ madhuraṁ hṛdyamamlakṛt bhuktaprarocakā puṇyā harītakyamṛtopamā

छिलके सहित आँवला शक्तिवर्धक, मीठा, हृदय-हितकर तथा खट्टापन उत्पन्न करने वाला है। भोजन के बाद रुचि बढ़ाने वाली, पवित्र हरड़ अमृत के समान है।

श्लोक 23 (garuda.1.169.23)

स्त्रंसनी कफवातघ्नी ह्यक्षस्तद्वत्त्रिदोषजित् । वातश्लेष्महरं त्वम्लं स्त्रंसनं तिन्तिडीफलम्

straṁsanī kaphavātaghnī hyakṣastadvattridoṣajit vātaśleṣmaharaṁ tvamlaṁ straṁsanaṁ tintiḍīphalam

यह हल्की रेचक तथा कफ-वात नाशक है, बहेड़ा भी उसी प्रकार त्रिदोषनाशक है। खट्टी इमली वात-कफ नाशक और रेचक होती है।

श्लोक 24 (garuda.1.169.24)

दोषलं लकुचं स्वादु बकुलं कफवातजित् । गुल्मवातकफश्वासकासघ्नं बीजपूरकम्

doṣalaṁ lakucaṁ svādu bakulaṁ kaphavātajit gulmavātakaphaśvāsakāsaghnaṁ bījapūrakam

लकुच (बड़हल) दोषकारी और मीठा है, मौलसिरी कफ-वात नाशक है। बिजौरा नींबू गुल्म, वात, कफ, श्वास और खाँसी का नाशक है।

श्लोक 25 (garuda.1.169.25)

कपित्थं ग्राहि दोषघ्नं पक्वं गुरु विषापहम् । कफपित्तकरं बालमापूर्णं पित्तवर्धनम्

kapitthaṁ grāhi doṣaghnaṁ pakvaṁ guru viṣāpaham kaphapittakaraṁ bālamāpūrṇaṁ pittavardhanam

कैथ (कपित्थ) संग्राही और दोषनाशक है; पका हुआ भारी तथा विषनाशक है। कच्चा होने पर यह कफ-पित्तकारक है, अधिक पका होने पर पित्तवर्धक है।

श्लोक 26 (garuda.1.169.26)

पक्वाम्रं वातकृन्मांसशुक्रवर्णबलप्रदम् । वातघ्नं कफपित्तघ्नं ग्राहि विष्टम्भि जाम्बवम्

pakvāmraṁ vātakṛnmāṁsaśukravarṇabalapradam vātaghnaṁ kaphapittaghnaṁ grāhi viṣṭambhi jāmbavam

पका आम वातवर्धक है और मांस, वीर्य, वर्ण तथा बल प्रदान करता है। जामुन वातनाशक, कफ-पित्तनाशक, संग्राही तथा कब्ज़कारी है।

श्लोक 27 (garuda.1.169.27)

तिन्दुकं कफवातघ्नं बदरं वातपित्तहृत् । विष्टम्भि वातलं बिल्वं प्रियालं पवनापहम्

tindukaṁ kaphavātaghnaṁ badaraṁ vātapittahṛt viṣṭambhi vātalaṁ bilvaṁ priyālaṁ pavanāpaham

तेंदू कफ-वात नाशक है, बेर वात-पित्तनाशक है। बेल कब्ज़कारी और वातवर्धक है, पियाल (चिरौंजी) वायुनाशक है।

श्लोक 28 (garuda.1.169.28)

राजादनफलं मोचं पनसं नारिकेलजम् । शुक्रमांसकराण्याहुः स्वादुस्निग्धगुरूणि च

rājādanaphalaṁ mocaṁ panasaṁ nārikelajam śukramāṁsakarāṇyāhuḥ svādusnigdhagurūṇi ca

राजादन फल, केला और नारियल वीर्य और मांस बढ़ाने वाले, मीठे, चिकने और भारी कहे गए हैं।

श्लोक 29 (garuda.1.169.29)

द्राक्षामधूकखर्जूरं कुङ्कुमं वातरक्तजित् । मागधी मधुरा पक्वा श्वासपित्तहरा परा

drākṣāmadhūkakharjūraṁ kuṅkumaṁ vātaraktajit māgadhī madhurā pakvā śvāsapittaharā parā

अंगूर, महुआ, खजूर और केसर वातरक्त-नाशक हैं। पीपल का फल पका होने पर मीठा तथा श्वास-पित्त का उत्तम नाशक होता है।

श्लोक 30 (garuda.1.169.30)

आर्द्रकं रोचकं वृष्यं दीपनं कफवातहृत् । शुण्ठीमरिचपिप्पल्यः कफवातजितो मताः

ārdrakaṁ rocakaṁ vṛṣyaṁ dīpanaṁ kaphavātahṛt śuṇṭhīmaricapippalyaḥ kaphavātajito matāḥ

अदरक रुचिकारक, वीर्यवर्धक, अग्निदीपक तथा कफ-वात नाशक है। सोंठ, काली मिर्च और पीपल कफ-वात नाशक मानी गई हैं।

श्लोक 31 (garuda.1.169.31)

अवृष्यं मरिचं विद्यादिति वैद्यकसंमतम् । गुल्मशूलविबन्धघ्नं हिङ्गुवातकफापहम्

avṛṣyaṁ maricaṁ vidyāditi vaidyakasaṁmatam gulmaśūlavibandhaghnaṁ hiṅguvātakaphāpaham

काली मिर्च को अकेले वीर्यवर्धक नहीं जानना चाहिए — यह वैद्यक-शास्त्र का मत है। हींग गुल्म, शूल और कब्ज़ का नाशक तथा वात-कफ हरने वाली है।

श्लोक 32 (garuda.1.169.32)

यवानीधन्यकाजाज्यः वातश्लेष्मनुदः परम् । चक्षुष्यं सैन्धवं वृष्यं त्रिदोषशमनं स्मृतम्

yavānīdhanyakājājyaḥ vātaśleṣmanudaḥ param cakṣuṣyaṁ saindhavaṁ vṛṣyaṁ tridoṣaśamanaṁ smṛtam

अजवायन, धनिया और जीरा वात-कफ को उत्तम रूप से हरते हैं। सेंधा नमक नेत्रों के लिए हितकर, वीर्यवर्धक और त्रिदोष-शामक माना गया है।

श्लोक 33 (garuda.1.169.33)

सौवर्चलं विबन्धघ्नमुष्णं हृच्छूलनाशनम् । उष्णं शूलहरं तीक्ष्णं विडङ्गं वातनाशनम्

sauvarcalaṁ vibandhaghnamuṣṇaṁ hṛcchūlanāśanam uṣṇaṁ śūlaharaṁ tīkṣṇaṁ viḍaṅgaṁ vātanāśanam

सौवर्चल नमक कब्ज़नाशक, उष्ण तथा हृदय-शूल का नाशक है। विडंग उष्ण, तीक्ष्ण, शूलनाशक और वातनाशक है।

श्लोक 34 (garuda.1.169.34)

रोमकं वातलं स्वादु रोचनं क्लेदनं गुरु । हृत्पाण्डुगलरोगघ्नं यवक्षारोऽग्निदीपनः

romakaṁ vātalaṁ svādu rocanaṁ kledanaṁ guru hṛtpāṇḍugalarogaghnaṁ yavakṣāro'gnidīpanaḥ

रोमक नमक वातवर्धक, मीठा, रुचिकारक, गीला करने वाला और भारी है। यव-क्षार हृदय-रोग, पाण्डु और गले के रोगों का नाशक तथा अग्निदीपक है।

श्लोक 35 (garuda.1.169.35)

दहनो दीपनस्तीक्ष्णः सर्जिक्षारो विदारणः । दोषघ्नं नाभसं वारिलघु हृद्यं विषापहम्

dahano dīpanastīkṣṇaḥ sarjikṣāro vidāraṇaḥ doṣaghnaṁ nābhasaṁ vārilaghu hṛdyaṁ viṣāpaham

दहन-क्षार अग्निदीपक और तीक्ष्ण है, सर्जीक्षार भेदक है। आकाश का जल दोषनाशक, हल्का, हृदय-हितकर और विषनाशक है।

श्लोक 36 (garuda.1.169.36)

नादेयं वातलं रूक्षं सारसं मदुर लघु । वातश्लेष्महरं वार्प्यं ताडागं वातलं स्मृतम्

nādeyaṁ vātalaṁ rūkṣaṁ sārasaṁ madura laghu vātaśleṣmaharaṁ vārpyaṁ tāḍāgaṁ vātalaṁ smṛtam

नदी का जल वातवर्धक और रूखा है, सरोवर का जल मीठा और हल्का है। कुएँ का जल वात-कफ नाशक है, तालाब का जल वातवर्धक कहा गया है।

श्लोक 37 (garuda.1.169.37)

रौच्यमग्निकरं रूक्षं कफघ्नंलघु नैर्झरम् । दीपनं पित्तलं कौपमौद्भिदं पित्तनाशनम्

raucyamagnikaraṁ rūkṣaṁ kaphaghnaṁlaghu nairjharam dīpanaṁ pittalaṁ kaupamaudbhidaṁ pittanāśanam

झरने का जल रुचिकारक, अग्निदीपक, रूखा, हल्का और कफनाशक है। कुएँ के स्रोत का जल अग्निदीपक और पित्तवर्धक है, भूमि से निकले स्रोत का जल पित्तनाशक है।

श्लोक 38 (garuda.1.169.38)

दिवार्ककिरणैर्जुष्टं रात्रौ चैवेन्दुरश्मिभिः । सर्वदोषविनिर्मुक्तं तत्तुल्यं गगनाम्बुना

divārkakiraṇairjuṣṭaṁ rātrau caivenduraśmibhiḥ sarvadoṣavinirmuktaṁ tattulyaṁ gaganāmbunā

जो जल दिन में सूर्य की किरणों और रात्रि में चन्द्रमा की किरणों का सेवन कर चुका हो, वह सभी दोषों से मुक्त होकर आकाश के जल के समान हो जाता है।

श्लोक 39 (garuda.1.169.39)

उष्णं वारि ज्वरश्वासमेदोऽनिलकफापहम् । शृतं शीतत्रिदोषघ्नमुषितं तच्च दोषलम्

uṣṇaṁ vāri jvaraśvāsamedo'nilakaphāpaham śṛtaṁ śītatridoṣaghnamuṣitaṁ tacca doṣalam

उष्ण जल ज्वर, श्वास, मेद, वायु और कफ का नाशक है। उबालकर शीतल किया गया जल त्रिदोषनाशक होता है, किन्तु रात भर रखा हुआ जल दोषकारी हो जाता है।

श्लोक 40 (garuda.1.169.40)

गोक्षीरं वातपित्तग्नं स्निग्धं गुरुरसायनम् । गव्याद्गुरुतरं स्निग्धं माहिष्वह्निनाशनम्

gokṣīraṁ vātapittagnaṁ snigdhaṁ gururasāyanam gavyādgurutaraṁ snigdhaṁ māhiṣvahnināśanam

गाय का दूध वात-पित्त नाशक, चिकना, भारी तथा रसायन (कायाकल्पकारी) है। भैंस का दूध गाय के दूध से भी अधिक भारी और चिकना है, तथा अग्नि को क्षीण करने वाला है।

श्लोक 41 (garuda.1.169.41)

छागं रक्तातिसारघ्नं कासश्वासकफापहम् । चक्षुष्यं जीवनं स्त्रीणां रक्तपित्ते चनावनम्

chāgaṁ raktātisāraghnaṁ kāsaśvāsakaphāpaham cakṣuṣyaṁ jīvanaṁ strīṇāṁ raktapitte canāvanam

बकरी का दूध रक्तातिसार, खाँसी, श्वास और कफ का नाशक है, नेत्रों के लिए हितकर और जीवनदायी है, तथा स्त्रियों के लिए तथा रक्तपित्त में विशेष लाभकारी है।

श्लोक 42 (garuda.1.169.42)

परं वातहरं वृष्यं पित्तश्लेष्मकरं दधि । दोषघ्नं मन्थजातन्तु मस्तु स्रोतोविशोधनम्

paraṁ vātaharaṁ vṛṣyaṁ pittaśleṣmakaraṁ dadhi doṣaghnaṁ manthajātantu mastu srotoviśodhanam

दही वातनाशक और वीर्यवर्धक है, पर पित्त-कफ उत्पन्न करता है। मंथन से बना पदार्थ (छाछ का प्रकार) दोषनाशक है, मट्ठा (मस्तु) स्रोतों को शुद्ध करने वाला है।

श्लोक 43 (garuda.1.169.43)

ग्रहण्यर्शोऽर्दितार्तिघ्नं नवनीतं नवोद्धृतम् । विकाराश्च किलाटाद्या गुरवः कुष्ठहेतवः

grahaṇyarśo'rditārtighnaṁ navanītaṁ navoddhṛtam vikārāśca kilāṭādyā guravaḥ kuṣṭhahetavaḥ

ताज़ा निकाला मक्खन ग्रहणी, बवासीर और अर्दित (मुख-लकवा) की पीड़ा का नाशक है, किन्तु किलाट (जमा हुआ दूध-पदार्थ) आदि विकार भारी होते हैं और कुष्ठ के कारण बनते हैं।

श्लोक 44 (garuda.1.169.44)

परं ग्रहणीशोथार्शः पाण्ड्वतीसारगुल्मनुत् । त्रिदोषशमनं तक्रं कथितं पूर्वसूरिभिः

paraṁ grahaṇīśothārśaḥ pāṇḍvatīsāragulmanut tridoṣaśamanaṁ takraṁ kathitaṁ pūrvasūribhiḥ

प्राचीन आचार्यों ने छाछ (तक्र) को ग्रहणी, सूजन, बवासीर, पाण्डु, अतिसार और गुल्म का उत्तम नाशक तथा त्रिदोष-शामक बताया है।

श्लोक 45 (garuda.1.169.45)

वृष्यञ्च मधुरं सर्पिर्वातपित्तकफापहम् । गव्यं मेध्यञ्च चाक्षुष्यं संस्काराच्च त्रिदोषजित्

vṛṣyañca madhuraṁ sarpirvātapittakaphāpaham gavyaṁ medhyañca cākṣuṣyaṁ saṁskārācca tridoṣajit

घी वीर्यवर्धक और मीठा होता है, तथा वात, पित्त और कफ का नाशक है। गाय के दूध का घी बुद्धिवर्धक और नेत्रों के लिए हितकर है, और विशेष संस्कार से त्रिदोषनाशक बन जाता है।

श्लोक 46 (garuda.1.169.46)

अपस्मारगदोन्मादमूर्छाघ्नं संस्कृतङ्घृतम् । अजादीनाञ्च सर्पोषि विद्याद्गोक्षीरसद्गुणैः । कफवातहरं मूत्रं सर्वक्रिमिविषापहम्

apasmāragadonmādamūrchāghnaṁ saṁskṛtaṅghṛtam ajādīnāñca sarpoṣi vidyādgokṣīrasadguṇaiḥ kaphavātaharaṁ mūtraṁ sarvakrimiviṣāpaham

संस्कारित घृत अपस्मार, उन्माद और मूर्च्छा का नाशक है। बकरी आदि पशुओं का घी भी गाय के दूध के समान गुणों वाला जानना चाहिए। मूत्र कफ-वात नाशक तथा सभी कृमि और विष का नाशक है।

श्लोक 47 (garuda.1.169.47)

पाण्डुत्वोदरकुष्ठार्शः शोथगुल्मप्रमेहनुत् । वातश्लेष्महरं बल्यं तैलं कश्यं तिलोद्भवम्

pāṇḍutvodarakuṣṭhārśaḥ śothagulmapramehanut vātaśleṣmaharaṁ balyaṁ tailaṁ kaśyaṁ tilodbhavam

तिल का तेल पाण्डु, उदर रोग, कुष्ठ, बवासीर, सूजन, गुल्म और प्रमेह का नाशक है; यह वात-कफ का नाशक तथा शक्तिवर्धक है।

श्लोक 48 (garuda.1.169.48)

सार्षपं कृमिपाण्डुघ्नं कफमेदोऽनिलापहम् । क्षौमं तैलमचक्षुष्यं पित्तहृद्वातनाशनम्

sārṣapaṁ kṛmipāṇḍughnaṁ kaphamedo'nilāpaham kṣaumaṁ tailamacakṣuṣyaṁ pittahṛdvātanāśanam

सरसों का तेल कृमि और पाण्डु का नाशक है, कफ, मेद और वायु को दूर करता है। अलसी का तेल नेत्रों के लिए अहितकर है, पर पित्तनाशक और वातहर है।

श्लोक 49 (garuda.1.169.49)

अक्षजं कफपित्तघ्नं केश्यं त्वक्श्रोत्रतर्पणम् । त्रिदोषघ्नं मधु प्रोक्तं वातलञ्च प्रकीर्तितम्

akṣajaṁ kaphapittaghnaṁ keśyaṁ tvakśrotratarpaṇam tridoṣaghnaṁ madhu proktaṁ vātalañca prakīrtitam

अक्षज तेल कफ-पित्त नाशक, बालों के लिए हितकर, तथा त्वचा और कानों को तृप्त करने वाला है। मधु त्रिदोषनाशक कहा गया है, फिर भी वातवर्धक भी बताया गया है।

श्लोक 50 (garuda.1.169.50)

हिक्काश्वासकृमिच्छर्दिमेहतृष्णाविषामहम् । इक्षवोरक्तपित्तघ्नो बल्या वृष्याः कफप्रदाः

hikkāśvāsakṛmicchardimehatṛṣṇāviṣāmaham ikṣavoraktapittaghno balyā vṛṣyāḥ kaphapradāḥ

गन्ने का रस हिचकी, श्वास, कृमि, वमन, प्रमेह, प्यास और विष का नाशक है; यह रक्तपित्त-नाशक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक तथा कफकारक है।

श्लोक 51 (garuda.1.169.51)

फाणितं पित्तलं तव्रिं सुरा मत्स्यण्डिका लघुः । खण्डं वृष्यं तथा स्निग्धं स्वाद्वसृक्पित्तवातजित्

phāṇitaṁ pittalaṁ tavriṁ surā matsyaṇḍikā laghuḥ khaṇḍaṁ vṛṣyaṁ tathā snigdhaṁ svādvasṛkpittavātajit

फाणित (गाढ़ा गुड़-रस) पित्तकारक और भारी है, सुरा (मदिरा) तथा मिश्री हल्की होती है। खाण्ड (चीनी) वीर्यवर्धक, चिकनी, मीठी तथा रक्त-पित्त-वात नाशक है।

श्लोक 52 (garuda.1.169.52)

वातपित्तहरो रूक्षो वातघ्नः कफकृद्गुडः । स पित्तघ्नः परः पथ्यः पुराणोऽसृक्प्रसादनः

vātapittaharo rūkṣo vātaghnaḥ kaphakṛdguḍaḥ sa pittaghnaḥ paraḥ pathyaḥ purāṇo'sṛkprasādanaḥ

गुड़ वात-पित्त नाशक है परन्तु रूखा और कफकारक है। पुराना गुड़ विशेष रूप से पित्तनाशक, हितकर तथा रक्त को शुद्ध करने वाला होता है।

श्लोक 53 (garuda.1.169.53)

रक्तिपित्तहरा वृष्या सस्नेहा गडशर्करा । सर्वपित्तकरं मद्यमम्लत्वात्कफवातजित्

raktipittaharā vṛṣyā sasnehā gaḍaśarkarā sarvapittakaraṁ madyamamlatvātkaphavātajit

मिश्री, घी आदि स्नेह से युक्त होने पर रक्त-पित्त नाशक और वीर्यवर्धक होती है। मदिरा प्रायः पित्तकारक है, परन्तु खटास के कारण कफ-वात नाशक भी है।

श्लोक 54 (garuda.1.169.54)

रक्तपित्तकरास्तीक्ष्णास्तथा सौवीरजातयः । पाचनो दीपनः पथ्यो मण्डः स्याद्भृष्टतण्डुलः

raktapittakarāstīkṣṇāstathā sauvīrajātayaḥ pācano dīpanaḥ pathyo maṇḍaḥ syādbhṛṣṭataṇḍulaḥ

तीक्ष्ण खट्टे पेय (सौवीर आदि) रक्त-पित्त उत्पन्न करने वाले होते हैं। भुने चावल से बना मांड (पेय) पाचक, अग्निदीपक और हितकर होता है।

श्लोक 55 (garuda.1.169.55)

वातानुलोमनी लघ्वी पेया वस्तिविशोधनी । सतक्रदाडिमव्योषा सगुडा मधुपिप्पली

vātānulomanī laghvī peyā vastiviśodhanī satakradāḍimavyoṣā saguḍā madhupippalī

वात को नीचे की ओर ले जाने वाली, हल्की पेया (पतली लपसी) मूत्राशय को शुद्ध करती है। छाछ, अनार, त्रिकटु, गुड़ और मधु-पीपल के साथ बनाई गई —

श्लोक 56 (garuda.1.169.56)

इन्तीयं सुकृता पेया कासश्वा सप्रवाहिकाः । पायसः कफकृद्बल्यः कृशरा वातनाशिनी

intīyaṁ sukṛtā peyā kāsaśvā sapravāhikāḥ pāyasaḥ kaphakṛdbalyaḥ kṛśarā vātanāśinī

— ऐसी अच्छी तरह बनाई गई पेया खाँसी, श्वास और अतिसार में उत्तम है। खीर कफकारक और बलवर्धक होती है, खिचड़ी (कृशरा) वातनाशक होती है।

श्लोक 57 (garuda.1.169.57)

सुधौतः प्रस्त्रुतः स्निग्धः सुखोष्णो लघुरोचनः । कन्दमूलफलेहैः साधितो बृंहणोगुरुः

sudhautaḥ prastrutaḥ snigdhaḥ sukhoṣṇo laghurocanaḥ kandamūlaphalehaiḥ sādhito bṛṁhaṇoguruḥ

भलीभाँति धोया, निथारा हुआ, चिकना, सुखद उष्ण, हल्का और रुचिकर चावल, कन्द-मूल-फलों के साथ पकाया जाने पर भारी होते हुए भी पुष्टिकारक होता है।

श्लोक 58 (garuda.1.169.58)

ईषदुष्णसेवनाच्च लघुः सूपः सुसाधितः । स्विन्न निष्पीडितं शाकं हितं स्नेहादिसंस्कृतम्

īṣaduṣṇasevanācca laghuḥ sūpaḥ susādhitaḥ svinna niṣpīḍitaṁ śākaṁ hitaṁ snehādisaṁskṛtam

हल्के गर्म रूप में लिया गया, भलीभाँति पकाया गया सूप हल्का होता है। भाप में पकाई और निचोड़ी गई सब्ज़ी, घी आदि से संस्कारित होने पर हितकर होती है।

श्लोक 59 (garuda.1.169.59)

दाडिमामलकैर्यूषो वह्निकृद्वातपित्तहा । श्वासकासप्रतिश्यायकफघ्नो मलकैः कृतः

dāḍimāmalakairyūṣo vahnikṛdvātapittahā śvāsakāsapratiśyāyakaphaghno malakaiḥ kṛtaḥ

अनार और आँवले से बना यूष अग्निदीपक तथा वात-पित्त नाशक है। मलक (एक फल) से बना यूष श्वास, खाँसी, प्रतिश्याय और कफ का नाशक है।

श्लोक 60 (garuda.1.169.60)

यवकोलकुलत्थानां यूषः कण्ठ्योऽनिलापहः । मुद्गामलकजो ग्राही श्लेष्मपित्तविनाशनः

yavakolakulatthānāṁ yūṣaḥ kaṇṭhyo'nilāpahaḥ mudgāmalakajo grāhī śleṣmapittavināśanaḥ

जौ, बेर और कुलत्थ का यूष गले के लिए हितकर और वातनाशक है। मूँग-आँवले से बना यूष संग्राही और कफ-पित्तनाशक है।

श्लोक 61 (garuda.1.169.61)

सगुडं दधि वातघ्नं सक्तवो रूक्षवातुलाः । घृतपूर्णोऽग्निकारी स्याद्वृष्या गुर्वो च शष्कुली

saguḍaṁ dadhi vātaghnaṁ saktavo rūkṣavātulāḥ ghṛtapūrṇo'gnikārī syādvṛṣyā gurvo ca śaṣkulī

गुड़ के साथ दही वातनाशक है, सत्तू रूखा और वातवर्धक है। घी से भरा हुआ सत्तू अग्निवर्धक होता है, शष्कुली (मीठी पूरी) वीर्यवर्धक और भारी होती है।

श्लोक 62 (garuda.1.169.62)

बृंहणाः सामिषा भक्ष्यपिष्ट का गुखः स्मृताः । तैलसिद्धाश्च दृष्टिघ्नास्तोयस्विन्नाश्च दुर्जराः

bṛṁhaṇāḥ sāmiṣā bhakṣyapiṣṭa kā gukhaḥ smṛtāḥ tailasiddhāśca dṛṣṭighnāstoyasvinnāśca durjarāḥ

मांस-मिश्रित व्यंजन पुष्टिकारक कहे गए हैं, आटे से बने मिष्ठान्न भारी होते हैं। तेल में तली वस्तुएँ नेत्रों के लिए हानिकारक हैं, और जल में भाप देकर पकाई गई वस्तुएँ पचने में कठिन होती हैं।

श्लोक 63 (garuda.1.169.63)

अत्युष्णा मण्डकाः पथ्याः शीतला गुखो मताः । अनुपानञ्च पानीयं श्रमतृष्णादिनाशनम्

atyuṣṇā maṇḍakāḥ pathyāḥ śītalā gukho matāḥ anupānañca pānīyaṁ śramatṛṣṇādināśanam

अत्यन्त गर्म मण्डक (चावल की रोटी) हितकर होते हैं, शीतल होने पर वे भारी माने जाते हैं। अनुपान (साथ लिया जाने वाला जल) थकान और प्यास आदि का नाशक होता है।

श्लोक 64 (garuda.1.169.64)

अन्नपानादिना रक्षा कृत्स्याद्रोगवर्जितः । अनुष्णः शिखिकण्ठाभो विषञ्चैव विवर्णकृत्

annapānādinā rakṣā kṛtsyādrogavarjitaḥ anuṣṇaḥ śikhikaṇṭhābho viṣañcaiva vivarṇakṛt

उचित अन्न-पान आदि से मनुष्य की रक्षा होनी चाहिए, जिससे वह रोगरहित रहे। जो पदार्थ उष्ण न हो, मोर की गर्दन के समान चमकीला वर्ण रखता हो और वर्ण-विकृति उत्पन्न करता हो —

श्लोक 65 (garuda.1.169.65)

गन्धस्पर्शरसास्तीव्राभोक्तुश्च स्यान्मनोव्यथा । आघ्राणे चाक्षिरोगः स्यादसाध्यश्च भिषग्वरैः । वेपथुर्जृम्भणाद्यं स्याद्विषस्यैतत्तु लक्षणम्

gandhasparśarasāstīvrābhoktuśca syānmanovyathā āghrāṇe cākṣirogaḥ syādasādhyaśca bhiṣagvaraiḥ vepathurjṛmbhaṇādyaṁ syādviṣasyaitattu lakṣaṇam

— जिसकी गन्ध, स्पर्श और स्वाद तीव्र हों, और खाने वाले को मानसिक कष्ट हो; सूँघने मात्र से आँखों में रोग हो जाए, जिसे श्रेष्ठ वैद्य भी असाध्य मानें, तथा कँपकँपी और जँभाई आना — यही विष के लक्षण हैं।

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