पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 205
व्याकरण: कारक-विभक्ति और धातु-रूप का वर्णन
श्लोक 1 (garuda.1.205.1)
कुमार उवाच । अथ व्याकरणं वक्ष्ये कात्यायन समासतः । सिद्धशब्दविवेकाय बालव्युत्पत्तिहेतवे
kumāra uvāca atha vyākaraṇaṁ vakṣye kātyāyana samāsataḥ siddhaśabdavivekāya bālavyutpattihetave
कुमार ने कहा — अब मैं कात्यायन के अनुसार व्याकरण का संक्षेप में वर्णन करूँगा, जिससे शुद्ध शब्दों का विवेक हो और बालकों को व्युत्पत्ति (शब्द-रचना) का ज्ञान प्राप्त हो।
श्लोक 2 (garuda.1.205.2)
सुप्तिङन्तं पदं ख्यातं सुपः सप्त विभक्तयः । स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मके
suptiṅantaṁ padaṁ khyātaṁ supaḥ sapta vibhaktayaḥ svaujasaḥ prathamā proktā sā prātipadikātmake
सुप् और तिङ् प्रत्यय से युक्त शब्द 'पद' कहलाता है। सुप् की सात विभक्तियाँ होती हैं। सु, औ, जस् — ये प्रथमा विभक्ति कहलाती हैं, जो प्रातिपदिक (शब्द के मूल रूप) में लगती है।
श्लोक 3 (garuda.1.205.3)
सम्बोधने च लिङ्गादावुक्ते कर्मणि कर्तरि । अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप्रत्ययवर्जितम्
sambodhane ca liṅgādāvukte karmaṇi kartari arthavatprātipadikaṁ dhātupratyayavarjitam
सम्बोधन में तथा लिंग आदि पहले से ज्ञात होने पर कर्म या कर्ता में भी प्रथमा होती है। जो अर्थ रखता हो और धातु व प्रत्यय से रहित हो, वह प्रातिपदिक कहलाता है।
श्लोक 4 (garuda.1.205.4)
अमौशसो द्वितीया स्यात्तत्कर्म क्रियते च यत् । द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते
amauśaso dvitīyā syāttatkarma kriyate ca yat dvitīyā karmaṇi proktāntarāntareṇa saṁyute
अम्, औट्, शस् — द्वितीया विभक्ति होती है। जो किया जाता है, वह कर्म है; कर्म में द्वितीया कही गई है, तथा 'अन्तरा' आदि शब्दों के योग में भी।
श्लोक 5 (garuda.1.205.5)
टाभ्यांभिसस्तृतीया स्यात्करणे कर्तरीरिता । येन क्रियते करणं तत्कर्ता यः करोति सः
ṭābhyāṁbhisastṛtīyā syātkaraṇe kartarīritā yena kriyate karaṇaṁ tatkartā yaḥ karoti saḥ
टा, भ्याम्, भिस् से तृतीया विभक्ति होती है, जो करण और कर्ता में लगती है। जिसके द्वारा क्रिया की जाती है, वह करण है; जो क्रिया करता है, वह कर्ता है।
श्लोक 6 (garuda.1.205.6)
ङेभ्यांभ्यसश्चतुर्थो स्यात्सम्प्रदाने च कारके । यस्मै दित्सा धारयते रोचते सम्प्रदानकम्
ṅebhyāṁbhyasaścaturtho syātsampradāne ca kārake yasmai ditsā dhārayate rocate sampradānakam
ङे, भ्याम्, भ्यस् से चतुर्थी होती है, जो सम्प्रदान कारक में लगती है। जिसके लिए देने की इच्छा हो, जिसके लिए धारण किया जाए या जो रुचिकर हो, वह सम्प्रदान है।
श्लोक 7 (garuda.1.205.7)
पञ्चमी स्यान्ङसिभ्यांभ्योह्यपादाने च कारके । यतोऽपैति समादत्ते उपादत्ते भयं यतः
pañcamī syānṅasibhyāṁbhyohyapādāne ca kārake yato'paiti samādatte upādatte bhayaṁ yataḥ
ङसि, भ्याम्, भ्यस् से पंचमी होती है, जो अपादान कारक में लगती है। जिससे कोई वस्तु दूर हो, जिससे ग्रहण किया जाए या जिससे भय उत्पन्न हो, वह अपादान है।
श्लोक 8 (garuda.1.205.8)
ङसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसम्बन्धमुख्यके । ङयोः सुपो वै सप्तमी स्यात्सा चाधिकरणे भवेत्
ṅasosāmaśca ṣaṣṭhī syātsvāmisambandhamukhyake ṅayoḥ supo vai saptamī syātsā cādhikaraṇe bhavet
ङस्, ओस्, आम् से षष्ठी होती है, जो मुख्यतः स्वामी-सम्बन्ध में लगती है। ङि और ओस् से सप्तमी होती है, जो अधिकरण में होती है।
श्लोक 9 (garuda.1.205.9)
आधारश्चाधिकरणं रक्षार्थानां प्रयोगतः । ईप्सितं चानीप्सितं यत्तदपादानकं स्मृतम्
ādhāraścādhikaraṇaṁ rakṣārthānāṁ prayogataḥ īpsitaṁ cānīpsitaṁ yattadapādānakaṁ smṛtam
आधार को अधिकरण कहते हैं, तथा रक्षा-अर्थक धातुओं के प्रयोग में भी यही होता है। जो वस्तु चाहिए और जो नहीं चाहिए (उससे दूर होना चाहिए) — उसे अपादान कहा गया है।
श्लोक 10 (garuda.1.205.10)
पञ्चमी पर्युपाङ्योगे इतरर्तेऽन्यदिङ्मुखे । एनयोगे द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकैः
pañcamī paryupāṅyoge itararte'nyadiṅmukhe enayoge dvitīyā syātkarmapravacanīyakaiḥ
परि, उप, आ के योग में तथा 'अन्य' और 'दूसरी दिशा' के अर्थ में पंचमी होती है। इनके कर्मप्रवचनीय रूप में प्रयुक्त होने पर द्वितीया होती है।
श्लोक 11 (garuda.1.205.11)
वीप्सेत्थम्भावचिह्नेऽभिर्भागेनैव परिप्रती । अनुरेषु सहार्थे च हीनेऽनूपश्च कथ्यते
vīpsetthambhāvacihne'bhirbhāgenaiva paripratī anureṣu sahārthe ca hīne'nūpaśca kathyate
व्याप्ति और रीति के अर्थ में, तथा अभि, भाग, परि, प्रति के योग में द्वितीया होती है। अनु के साथ 'सहित' के अर्थ में, और हीनता के अर्थ में अनु-उप का प्रयोग होता है।
श्लोक 12 (garuda.1.205.12)
द्वितीया च चतुर्थो स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि । अप्राणे हि विभक्ती द्बे मन्यकर्मण्यनादरे
dvitīyā ca caturtho syācceṣṭāyāṁ gatikarmaṇi aprāṇe hi vibhaktī dbe manyakarmaṇyanādare
प्रयत्न में गति-कर्म के लिए द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं; अचेतन वस्तु के प्रति अनादरपूर्वक 'मानना' क्रिया में दो विभक्तियाँ होती हैं।
श्लोक 13 (garuda.1.205.13)
नमः स्वस्तिस्वधास्वाहालंवषड्योग ईरिता । चतुर्थो चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः
namaḥ svastisvadhāsvāhālaṁvaṣaḍyoga īritā caturtho caiva tādarthye tumarthādbhāvavācinaḥ
नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम् और वषट् के योग में चतुर्थी होती है; तथा प्रयोजन के अर्थ में और भाव-वाचक तुमुन्नन्त शब्द के साथ भी।
श्लोक 14 (garuda.1.205.14)
तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेङ्गे विशेषणे । काले भावे सप्तमी स्यादेतैर्योगेऽपिषष्ठ्यति
tṛtīyā sahayoge syātkutsiteṅge viśeṣaṇe kāle bhāve saptamī syādetairyoge'piṣaṣṭhyati
'सह' के योग में तृतीया होती है, तथा निन्दित अंग के विशेषण में भी; काल और सामान्य भाव में सप्तमी होती है, और इनके साथ षष्ठी भी वैकल्पिक होती है।
श्लोक 15 (garuda.1.205.15)
स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादप्रसूतैः । निर्धारणे द्वे विभक्तो षष्ठी हेतुप्रयोगके
svāmīśvarādhipatibhiḥ sākṣidāyādaprasūtaiḥ nirdhāraṇe dve vibhakto ṣaṣṭhī hetuprayogake
स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी, दायाद, प्रसूत आदि शब्दों के साथ निर्धारण में दो विभक्तियाँ होती हैं; कारण के प्रयोग में षष्ठी होती है।
श्लोक 16 (garuda.1.205.16)
स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियत्नके । हिंसार्थानां प्रयोगे च कृति कर्मणि कर्तरि
smṛtyarthakarmaṇi tathā karoteḥ pratiyatnake hiṁsārthānāṁ prayoge ca kṛti karmaṇi kartari
स्मरण-अर्थक धातु के कर्म में, तथा 'कृ' धातु के प्रतियत्न (प्रति-उद्यम) के अर्थ में, हिंसा-अर्थक धातुओं के प्रयोग में और कृदन्त द्वारा कर्ता व्यक्त होने पर कर्म में षष्ठी होती है।
श्लोक 17 (garuda.1.205.17)
न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठयोः प्रातिपदिके । द्विविधं प्रातिपदिकं नाम धातुस्तथैव च
na kartṛkarmaṇoḥ ṣaṣṭhī niṣṭhayoḥ prātipadike dvividhaṁ prātipadikaṁ nāma dhātustathaiva ca
निष्ठा प्रत्यय (भूतकालिक कृदन्त) से बने प्रातिपदिक में कर्ता और कर्म की षष्ठी नहीं होती। प्रातिपदिक दो प्रकार का होता है — नाम और धातु।
श्लोक 18 (garuda.1.205.18)
भूवान्दिभ्यस्तिङो लः स्याल्लकारा दश वै स्मृताः । तिप्तसूझि प्रथमो मध्यः सिप्थस्थोत्तमपूरुषः
bhūvāndibhyastiṅo laḥ syāllakārā daśa vai smṛtāḥ tiptasūjhi prathamo madhyaḥ sipthasthottamapūruṣaḥ
भू आदि धातुओं से तिङ् प्रत्यय के स्थान पर 'ल' कारक आते हैं; लकार दस माने गए हैं। तिप्, तस्, झि प्रथम पुरुष हैं; सिप्, थस्, थ मध्यम पुरुष हैं।
श्लोक 19 (garuda.1.205.19)
मिब्वस्मस्तु परस्मै हि पदानां चात्मनेपदम् । ताताञ्झ प्रथमो मध्य स्थासाथान्ध्वमथोत्तमः
mibvasmastu parasmai hi padānāṁ cātmanepadam tātāñjha prathamo madhya sthāsāthāndhvamathottamaḥ
मिप्, वस्, मस् परस्मैपद के उत्तम पुरुष हैं; आत्मनेपद में त, आताम्, झ प्रथम पुरुष हैं, से, आथाम्, ध्वम् मध्यम, और शेष उत्तम पुरुष हैं।
श्लोक 20 (garuda.1.205.20)
आदेशा इड्बहिमहि धातुतोथ णिजादिवत् । नाम्नि प्रयुज्यमानेऽपि प्रथमः पुरुषो भवेत्
ādeśā iḍbahimahi dhātutotha ṇijādivat nāmni prayujyamāne'pi prathamaḥ puruṣo bhavet
इट् आदि आदेश धातु से लगते हैं, तथा णिजन्त आदि रूपों में भी वैसे ही। नाम के प्रति प्रयुक्त होने पर भी प्रथम पुरुष होता है।
श्लोक 21 (garuda.1.205.21)
मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि । भूवाद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः
madhyamo yuṣmadi prokta uttamaḥ puruṣo'smadi bhūvādyā dhātavaḥ proktāḥ sanādyantāstathā tataḥ
युष्मद् के लिए मध्यम पुरुष कहा गया है, अस्मद् के लिए उत्तम पुरुष। भू आदि धातुएँ कही गई हैं, तथा उनके बाद सन् आदि प्रत्यय से बनने वाली धातुएँ भी।
श्लोक 22 (garuda.1.205.22)
लडीरितो वर्तमाने स्मेनातीते च धातुतः । भूतेऽनद्यतने लङ्वा लोडाद्याशिषि धातुतः
laḍīrito vartamāne smenātīte ca dhātutaḥ bhūte'nadyatane laṅvā loḍādyāśiṣi dhātutaḥ
लट् वर्तमान काल में और स्मे (लुट्) अतीत में धातु से प्रयुक्त होते हैं; भूतकाल के लिए (अनद्यतन में) लङ्, तथा आशीर्वाद के लिए लोट् आदि धातु से प्रयुक्त होते हैं।
श्लोक 23 (garuda.1.205.23)
विध्यादावेवानुमतो लोड्वाच्यो मन्त्रणे भवेत् । निमन्त्रणाधीष्टसंप्रश्रे प्रार्थनेषु तथाशिषि
vidhyādāvevānumato loḍvācyo mantraṇe bhavet nimantraṇādhīṣṭasaṁpraśre prārthaneṣu tathāśiṣi
विधि आदि में तथा अनुमति के अर्थ में लोट् प्रयुक्त होता है, और परामर्श के अर्थ में भी; निमन्त्रण, अधीष्ट-सम्प्रश्न, प्रार्थना और आशीर्वाद में भी।
श्लोक 24 (garuda.1.205.24)
लिङतीते परोक्षे स्याल्लिड्भूते ळड्भविष्यति । स्यादनद्यतने तद्वद्भविष्यति तु धातुतः
liṅatīte parokṣe syālliḍbhūte ḻaḍbhaviṣyati syādanadyatane tadvadbhaviṣyati tu dhātutaḥ
लिट् अतीत (परोक्ष भूत) में होता है; लिड् भूतकाल में; लड् भविष्य में; इसी प्रकार अनद्यतन भविष्य के लिए भी धातु से प्रयोग होता है।
श्लोक 25 (garuda.1.205.25)
दातोरॢङ्क्रियातिपत्तौ लिङर्थे लेट्प्रकीर्तितः । कृतस्त्रिष्वपि वर्तन्ते भावे कर्मणि कर्तरि
dātorḷṅkriyātipattau liṅarthe leṭprakīrtitaḥ kṛtastriṣvapi vartante bhāve karmaṇi kartari
क्रिया की अपूर्णता (न होने की स्थिति) में लृङ् प्रयुक्त होता है; लेट् को लिङ् के अर्थ में कहा गया है। कृदन्त प्रत्यय भाव, कर्म और कर्ता — तीनों में प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक 26 (garuda.1.205.26)
सदृशास्तव्यता ण्यद्यदनीयाश्च तृजादयः
sadṛśāstavyatā ṇyadyadanīyāśca tṛjādayaḥ
इनके समान तव्य, तव्यत्, ण्यत्, यत्, अनीय तथा तृच् आदि प्रत्यय भी होते हैं।