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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 221

धर्म-सार

अध्याय 220अध्याय-सूचीअध्याय 222

श्लोक 1 (garuda.1.221.1)

ब्रहामोवाच । धर्मसारमहं वक्ष्ये संक्षेपाच्छुणु शङ्कर । भुक्तिमुक्तिप्रदं सूक्ष्मं सर्वपापविनाशनम्

brahāmovāca dharmasāramahaṁ vakṣye saṁkṣepācchuṇu śaṅkara bhuktimuktipradaṁ sūkṣmaṁ sarvapāpavināśanam

ब्रह्मा ने कहा — हे शंकर! अब मैं धर्म का सार कहूँगा, इसे संक्षेप में सुनो — यह सूक्ष्म है, भोग और मोक्ष देने वाला है, और सब पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (garuda.1.221.2)

श्रुतं धर्मं बलं धैर्यं सुखमुत्साहमेव च । शोको हरति वै नॄणां तस्माच्छोकं परित्यजेत्

śrutaṁ dharmaṁ balaṁ dhairyaṁ sukhamutsāhameva ca śoko harati vai nṝṇāṁ tasmācchokaṁ parityajet

श्रुत ज्ञान, धर्म, बल, धैर्य, सुख और उत्साह — इन सबको शोक मनुष्यों से छीन लेता है; इसलिए शोक का त्याग कर देना चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.1.221.3)

कर्मदाराः कर्मलोकाः कर्मसम्बन्धिबान्धवाः । कर्माणि प्रेरयन्तीह पुरुषं सुखदुः खयोः

karmadārāḥ karmalokāḥ karmasambandhibāndhavāḥ karmāṇi prerayantīha puruṣaṁ sukhaduḥ khayoḥ

पत्नी, लोक, बन्धु-बान्धव — सब कर्म से ही प्राप्त होते हैं; कर्म ही इस संसार में मनुष्य को सुख-दुःख की ओर प्रेरित करते हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.221.4)

दानमे परो धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते । दानाःत्स्वर्गश्च राज्यञ्च दद्याद्दनं ततो नरः

dāname paro dharmo dānātsarvamavāpyate dānāḥtsvargaśca rājyañca dadyāddanaṁ tato naraḥ

दान ही परम धर्म है, दान से सब कुछ प्राप्त होता है; दान से स्वर्ग और राज्य मिलते हैं, इसलिए मनुष्य को दान देना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.221.5)

एकतो दानमेवाहुः समग्रवरदक्षिणम् । एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम्

ekato dānamevāhuḥ samagravaradakṣiṇam ekato bhayabhītasya prāṇinaḥ prāṇarakṣaṇam

एक ओर पूर्ण और उत्तम दक्षिणा सहित दान कहा जाता है, दूसरी ओर भय से त्रस्त प्राणी के प्राणों की रक्षा भी दान ही है।

श्लोक 6 (garuda.1.221.6)

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैः स्नानेन वा पुनः । धर्मस्य नाशका ये च ते वै निरयगामिनः

tapasā brahmacaryeṇa yajñaiḥ snānena vā punaḥ dharmasya nāśakā ye ca te vai nirayagāminaḥ

तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ या स्नान से भी जो धर्म का नाश करते हैं, वे निश्चय ही नरक में जाने वाले हैं।

श्लोक 7 (garuda.1.221.7)

ये च होमजपस्नानदेवतार्चनतत्पराः । सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः

ye ca homajapasnānadevatārcanatatparāḥ satyakṣamādayāyuktāste narāḥ svargagāminaḥ

जो होम, जप, स्नान और देव-पूजा में तत्पर रहते हैं, तथा सत्य-क्षमा आदि गुणों से युक्त हैं, वे मनुष्य स्वर्ग को जाने वाले हैं।

श्लोक 8 (garuda.1.221.8)

न दाता सुखदुः खानां न च हर्तास्ति कश्चन । भुञ्जते स्वकृतान्येव दुः खानि च सुखानि च

na dātā sukhaduḥ khānāṁ na ca hartāsti kaścana bhuñjate svakṛtānyeva duḥ khāni ca sukhāni ca

सुख-दुःख का कोई देने वाला नहीं है, न कोई हरने वाला है; मनुष्य अपने ही किए हुए सुख-दुःख को भोगता है।

श्लोक 9 (garuda.1.221.9)

धर्मार्थं जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते । सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्

dharmārthaṁ jīvitaṁ yeṣāṁ durgāṇyatitaranti te santuṣṭaḥ ko na śaknoti phalamūlaiśca vartitum

जिनका जीवन धर्म के लिए होता है, वे विपत्तियों को पार कर जाते हैं; संतुष्ट पुरुष के लिए फल-मूल पर जीवन बिताना कठिन नहीं।

श्लोक 10 (garuda.1.221.10)

सर्व एव हि सौख्येन सङ्कटान्यवगाहते । इदमेव हि लोभस्य कार्यं स्या दतिदुष्करम्

sarva eva hi saukhyena saṅkaṭānyavagāhate idameva hi lobhasya kāryaṁ syā datiduṣkaram

सभी लोग सुख की खोज में संकटों में उतर जाते हैं; यही लोभ का अत्यंत दुष्कर कार्य है।

श्लोक 11 (garuda.1.221.11)

लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभाद्द्रोहः प्रवर्तते । लोभान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च

lobhātkrodhaḥ prabhavati lobhāddrohaḥ pravartate lobhānmohaśca māyā ca māno matsara eva ca

लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से द्रोह उत्पन्न होता है; लोभ से मोह, माया, अभिमान और ईर्ष्या भी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 12 (garuda.1.221.12)

रागद्वेषानृतक्रोधलोममोहमदोज्झितः । यः स शान्तः परं लोकं याति पापविवर्जितः

rāgadveṣānṛtakrodhalomamohamadojjhitaḥ yaḥ sa śāntaḥ paraṁ lokaṁ yāti pāpavivarjitaḥ

राग, द्वेष, असत्य, क्रोध, लोभ, मोह और मद से रहित जो पुरुष शान्त है, वह पाप-रहित होकर परम लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (garuda.1.221.13)

देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर । धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्

devatā munayo nāgā gandharvā guhyakā hara dhārmikaṁ pūjayantīha na dhanāḍhyaṁ na kāminam

हे हर! देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व और गुह्यक इस लोक में धर्मात्मा की ही पूजा करते हैं, न धनवान की, न कामी की।

श्लोक 14 (garuda.1.221.14)

अनन्तबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण वा । अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिवेदना

anantabalavīryeṇa prajñayā pauruṣeṇa vā alabhyaṁ labhate martyastatra kā parivedanā

अनन्त बल-पराक्रम से, बुद्धि से अथवा पुरुषार्थ से मनुष्य दुर्लभ वस्तु भी प्राप्त कर लेता है — फिर वहाँ खेद किस बात का?

श्लोक 15 (garuda.1.221.15)

सर्वसत्त्वदयालुत्वं सर्वेन्द्रियविनिग्रहः । सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं श्रेयः परमिदं स्मृतम्

sarvasattvadayālutvaṁ sarvendriyavinigrahaḥ sarvatrānityabuddhitvaṁ śreyaḥ paramidaṁ smṛtam

सब प्राणियों पर दया, सभी इन्द्रियों का निग्रह, और सर्वत्र अनित्यता का बोध — यही परम कल्याण कहा गया है।

श्लोक 16 (garuda.1.221.16)

पश्यन्निवाग्रतो मृत्युं यो धर्मं नाचरेन्नरः । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्

paśyannivāgrato mṛtyuṁ yo dharmaṁ nācarennaraḥ ajāgalastanasyeva tasya janma nirarthakam

जो मनुष्य मृत्यु को सामने देखते हुए भी धर्म का आचरण नहीं करता, उसका जन्म बकरी के गले के थन के समान निरर्थक है।

श्लोक 17 (garuda.1.221.17)

भ्रूणहा ब्रह्महा गोघ्नः पितृहा गुरुतल्पगः । भूमिं सर्वगुणोपेतां दत्त्वा पापैः प्रमुच्यते

bhrūṇahā brahmahā goghnaḥ pitṛhā gurutalpagaḥ bhūmiṁ sarvaguṇopetāṁ dattvā pāpaiḥ pramucyate

गर्भ-हत्यारा, ब्रह्म-हत्यारा, गौ-हत्यारा, पितृ-हत्यारा और गुरु-पत्नी-गामी भी — सर्वगुण-सम्पन्न भूमि दान करके पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.221.18)

न गोदानात्परं दानं किञ्चिदस्तीति मे मतिः । या गौर्न्यायार्जिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम्

na godānātparaṁ dānaṁ kiñcidastīti me matiḥ yā gaurnyāyārjitā dattā kṛtsnaṁ tārayate kulam

गौ-दान से बढ़कर कोई दान नहीं है, ऐसा मेरा मत है; न्यायपूर्वक अर्जित गौ का दान सम्पूर्ण कुल को तार देता है।

श्लोक 19 (garuda.1.221.19)

नान्नदानात्परं दानं किञ्चिदस्ति वृषध्वज ! । अन्नेन धार्यते सर्वं चराचरमिदं जगत्

nānnadānātparaṁ dānaṁ kiñcidasti vṛṣadhvaja ! annena dhāryate sarvaṁ carācaramidaṁ jagat

हे वृषभ-ध्वज! अन्न-दान से बढ़कर कोई दान नहीं है; अन्न से ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् धारण किया जाता है।

श्लोक 20 (garuda.1.221.20)

कन्यादानं वृषोत्सर्गस्तीर्थसेवा श्रुतं तथा । हस्त्यश्वरथदानानि मणिरत्नवसुन्धराः

kanyādānaṁ vṛṣotsargastīrthasevā śrutaṁ tathā hastyaśvarathadānāni maṇiratnavasundharāḥ

कन्या-दान, वृषोत्सर्ग, तीर्थ-सेवा, वेद-श्रवण, तथा हाथी-घोड़े-रथ का दान, मणि-रत्न और भूमि का दान —

श्लोक 21 (garuda.1.221.21)

अन्नदानस्य सर्वाणि कलां नार्हन्ति षोडशीम् । अन्नात्प्राणा बलं तेजश्चान्नाद्वीर्यं धृतिः स्मृतिः

annadānasya sarvāṇi kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm annātprāṇā balaṁ tejaścānnādvīryaṁ dhṛtiḥ smṛtiḥ

— ये सभी अन्न-दान की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। अन्न से ही प्राण, बल और तेज मिलते हैं, तथा अन्न से ही वीर्य, धृति और स्मृति मिलती है।

श्लोक 22 (garuda.1.221.22)

कूपवापीतडागादीनारामांश्चैव कारयेत् । त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते

kūpavāpītaḍāgādīnārāmāṁścaiva kārayet trisaptakulamuddhṛtya viṣṇuloke mahīyate

कुआँ, बावली, तालाब आदि तथा उद्यान बनवाने चाहिए; ऐसा करने वाला इक्कीस पीढ़ियों को उद्धार कर विष्णु-लोक में गौरवान्वित होता है।

श्लोक 23 (garuda.1.221.23)

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते । कालेन तीर्थं फलति सद्यः साधुसमागमः

sādhūnāṁ darśanaṁ puṇyaṁ tīrthādapi viśiṣyate kālena tīrthaṁ phalati sadyaḥ sādhusamāgamaḥ

साधुओं का दर्शन तीर्थ से भी बढ़कर पुण्यकारी है; तीर्थ काल बीतने पर फल देता है, पर साधु का सत्संग तुरन्त फल देता है।

श्लोक 24 (garuda.1.221.24)

सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषश्च क्षमार्जवम् । ज्ञानं शमो दया दानमेष धर्मः सनातनः

satyaṁ damastapaḥ śaucaṁ santoṣaśca kṣamārjavam jñānaṁ śamo dayā dānameṣa dharmaḥ sanātanaḥ

सत्य, दम, तप, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान — यही सनातन धर्म है।

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