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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 228

विष्णु-नाम की महिमा

अध्याय 227अध्याय-सूचीअध्याय 229

श्लोक 1 (garuda.1.228.1)

सूत उवाच । मुक्तिहेतुमनाद्यन्तमजमव्ययमक्षयम् । यो नमेत्सर्वलोकस्य नमस्यो जायते नरः

sūta uvāca muktihetumanādyantamajamavyayamakṣayam yo nametsarvalokasya namasyo jāyate naraḥ

सूत ने कहा — जो मोक्ष के कारण, आदि-अंत-रहित, अजन्मा, अव्यय और अक्षय परमेश्वर को नमन करता है, वह सम्पूर्ण लोक के लिए नमस्करणीय बन जाता है।

श्लोक 2 (garuda.1.228.2)

विष्णुमानन्दमद्वैतं विज्ञानं सर्वगं प्रभुम् । प्रणमामि सदा भक्त्या चेतसा हृदयालयम्

viṣṇumānandamadvaitaṁ vijñānaṁ sarvagaṁ prabhum praṇamāmi sadā bhaktyā cetasā hṛdayālayam

आनंद-स्वरूप, अद्वैत, विज्ञान-स्वरूप, सर्वव्यापी, हृदय में निवास करने वाले प्रभु विष्णु को मैं सदा भक्तिपूर्वक मन से प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 3 (garuda.1.228.3)

योऽन्तस्तिष्ठन्नशेषस्य पश्यतीशः शुभाशुभम् । तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं नमस्ये परमेश्वरम्

yo'ntastiṣṭhannaśeṣasya paśyatīśaḥ śubhāśubham taṁ sarvasākṣiṇaṁ viṣṇuṁ namasye parameśvaram

जो सबके भीतर स्थित होकर शुभ-अशुभ को देखते हैं, उन सर्व-साक्षी विष्णु परमेश्वर को मैं नमन करता हूँ।

श्लोक 4 (garuda.1.228.4)

शक्तेनापि नमस्कारः प्रयुक्तश्चक्रपाणये । संसारतृणवर्गाणामुद्वेजनकरो हि सः

śaktenāpi namaskāraḥ prayuktaścakrapāṇaye saṁsāratṛṇavargāṇāmudvejanakaro hi saḥ

अल्प शक्ति से भी चक्रधारी को किया गया नमस्कार संसार-रूपी तिनकों के समूह को उखाड़ फेंकने वाला होता है।

श्लोक 5 (garuda.1.228.5)

कृष्णे स्फुरज्जलधरोदरचारुकृष्णे लोकाधिकारपुरुषे परमप्रमेये । एको हि भावगुणमात्रदृढप्रणामः सद्यः श्वपाकमपि साधयितुं सशक्तः

kṛṣṇe sphurajjaladharodaracārukṛṣṇe lokādhikārapuruṣe paramaprameye eko hi bhāvaguṇamātradṛḍhapraṇāmaḥ sadyaḥ śvapākamapi sādhayituṁ saśaktaḥ

जल-भरे मेघ के उदर के समान सुंदर श्याम कृष्ण, जो लोकों के अधिकारी पुरुष और परम अप्रमेय हैं — उनके प्रति भाव-मात्र से किया गया एक दृढ़ प्रणाम भी श्वपच (चांडाल) तक को तुरंत सिद्ध बना सकता है।

श्लोक 6 (garuda.1.228.6)

प्रणम्य दण्डबद्भूमौ नमस्कारेण योर्ऽचयेत् । स यां गतिमवाप्नोति न तां क्रतुशतैरपि

praṇamya daṇḍabadbhūmau namaskāreṇa yor'cayet sa yāṁ gatimavāpnoti na tāṁ kratuśatairapi

भूमि पर दण्ड की भाँति गिरकर जो प्रणाम-पूर्वक पूजा करता है, वह जिस गति को प्राप्त करता है, वह सैकड़ों यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 7 (garuda.1.228.7)

दुर्गसंसारकान्ताराकूपारेऽपि प्रधावताम् । एकः कृष्णे नमस्कारो मुक्त्या तांस्तारयिष्यति

durgasaṁsārakāntārākūpāre'pi pradhāvatām ekaḥ kṛṣṇe namaskāro muktyā tāṁstārayiṣyati

दुर्गम संसार-वन के समुद्र में भटकते हुओं के लिए कृष्ण को किया गया एक ही नमस्कार उन्हें मुक्ति तक पार कर देगा।

श्लोक 8 (garuda.1.228.8)

आसीनो वा शयानो वातिष्ठन् वा यत्र तत्र वा । नमो नारायणायेति मन्त्रैकशरणो भवेत्

āsīno vā śayāno vātiṣṭhan vā yatra tatra vā namo nārāyaṇāyeti mantraikaśaraṇo bhavet

बैठे, सोए, खड़े या जहाँ भी हो, 'नमो नारायणाय' इस मंत्र की ही एकमात्र शरण लेनी चाहिए।

श्लोक 9 (garuda.1.228.9)

नारायणेति शब्दोऽस्ति वागस्ति वशवर्तिनी । तथापि नरके मूढाः पतन्तीति किमद्भुतम्

nārāyaṇeti śabdo'sti vāgasti vaśavartinī tathāpi narake mūḍhāḥ patantīti kimadbhutam

'नारायण' शब्द विद्यमान है, और वाणी भी वश में है — फिर भी मूढ़ लोग नरक में गिरते हैं, यह कितना आश्चर्य है!

श्लोक 10 (garuda.1.228.10)

चतुर्मुखो वा यदि कोटिवक्त्रो भवेन्नरः कोपि विशुद्धचेताः । स वै गुणानामयुतैकदेशं वदेन्न वा देववरस्य विष्णोः

caturmukho vā yadi koṭivaktro bhavennaraḥ kopi viśuddhacetāḥ sa vai guṇānāmayutaikadeśaṁ vadenna vā devavarasya viṣṇoḥ

यदि कोई शुद्ध-चित्त मनुष्य चार मुख वाला या करोड़ मुख वाला भी हो जाए, तो भी वह विष्णु — देवताओं में श्रेष्ठ — के गुणों का दस-हज़ारवाँ अंश भी नहीं कह पाएगा।

श्लोक 11 (garuda.1.228.11)

व्यासाद्या मुनयः सर्वे स्तुवन्तो मधुसूदनम् । मतिक्षयान्निवर्तन्ते न गोविन्दगुणक्षयात्

vyāsādyā munayaḥ sarve stuvanto madhusūdanam matikṣayānnivartante na govindaguṇakṣayāt

व्यास आदि सभी मुनि मधुसूदन की स्तुति करते-करते अपनी बुद्धि की सीमा से रुक जाते हैं, न कि गोविंद के गुणों की समाप्ति से।

श्लोक 12 (garuda.1.228.12)

अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः । पुमान् विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तो मृगा यथा । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति

avaśenāpi yannāmni kīrtite sarvapātakaiḥ pumān vimucyate sadyaḥ siṁhatrasto mṛgā yathā baddhaḥ parikarastena mokṣāya gamanaṁ prati

जिसका नाम अनिच्छापूर्वक भी कीर्तित होने पर सभी पापों से मनुष्य तुरंत मुक्त हो जाता है, जैसे सिंह से भयभीत हिरण भागते हैं — इस प्रकार उसकी कमर मोक्ष की ओर जाने के लिए कस जाती है।

श्लोक 13 (garuda.1.228.13)

स्वप्नेऽपि नाम स्पृशतोऽपि पुंसः क्षयं करोत्यक्षयपापराशिम् । प्रत्यक्षतः किं पुनरत्र पुंसा प्रकीर्तिते नाम्नि जनार्दनस्य

svapne'pi nāma spṛśato'pi puṁsaḥ kṣayaṁ karotyakṣayapāparāśim pratyakṣataḥ kiṁ punaratra puṁsā prakīrtite nāmni janārdanasya

स्वप्न में भी नाम का स्पर्श करने वाले मनुष्य के अक्षय पाप-राशि का भी नाश हो जाता है — फिर प्रत्यक्ष रूप से जनार्दन का नाम कीर्तित होने पर तो और भी क्या कहना!

श्लोक 14 (garuda.1.228.14)

नमः कृष्णाच्युतानन्तवासुदेवेत्युदीरितम् । यैर्भावभावितैर्विप्रन ते यमपुरं ययुः

namaḥ kṛṣṇācyutānantavāsudevetyudīritam yairbhāvabhāvitairviprana te yamapuraṁ yayuḥ

'कृष्ण, अच्युत, अनन्त, वासुदेव' को नमस्कार' — जिन्होंने इसे सच्चे भाव से कहा, हे विप्रो! वे यमपुरी को नहीं जाते।

श्लोक 15 (garuda.1.228.15)

क्षयो भवेद्यथा वह्नेस्तमसो भास्करोदये । तथैव कलुषौघस्य नामसंकीर्तनाद्धरेः

kṣayo bhavedyathā vahnestamaso bhāskarodaye tathaiva kaluṣaughasya nāmasaṁkīrtanāddhareḥ

जैसे अग्नि से या सूर्योदय से अंधकार का नाश होता है, वैसे ही हरि-नाम-संकीर्तन से पाप-समूह का नाश होता है।

श्लोक 16 (garuda.1.228.16)

क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरायाति न क्षयम् । गच्छतां दूरमध्वानं कृष्णमूर्छितचेतसाम्

kva nākapṛṣṭhagamanaṁ punarāyāti na kṣayam gacchatāṁ dūramadhvānaṁ kṛṣṇamūrchitacetasām

स्वर्ग की ऊँचाई तक पहुँचकर भी वहाँ से फिर पतन होता है; परन्तु कृष्ण में लीन चित्त वाले, दूर मार्ग तय करने वाले साधकों के लिए वह अविनाशी है।

श्लोक 17 (garuda.1.228.17)

पाथेयं पुण्डरीकाक्षनामसंकीर्तनं हरेः । संसारसर्पसंदष्टविषचेष्टैकभेषजम् । कृष्णेति वैष्णवं क्षान्तं जप्त्वा मुक्तो भवेन्नरः

pātheyaṁ puṇḍarīkākṣanāmasaṁkīrtanaṁ hareḥ saṁsārasarpasaṁdaṣṭaviṣaceṣṭaikabheṣajam kṛṣṇeti vaiṣṇavaṁ kṣāntaṁ japtvā mukto bhavennaraḥ

हरि के पुण्डरीकाक्ष-नाम का संकीर्तन ही यात्रा का पाथेय (सम्बल) है; यह संसार-सर्प के काटने से उत्पन्न विष-वेदना का एकमात्र औषध है। 'कृष्ण' इस क्षमाशील वैष्णव मंत्र को जपकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18 (garuda.1.228.18)

ध्यायन् कृते जपेन्मन्त्रैस्त्रेतायां द्वापरेर्ऽचयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संस्मृत्यकेशवम्

dhyāyan kṛte japenmantraistretāyāṁ dvāparer'cayan yadāpnoti tadāpnoti tadāpnoti kalau saṁsmṛtyakeśavam

कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में मन्त्र-जप से, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता था, वही, वही, वही फल कलियुग में केशव के स्मरण मात्र से मिल जाता है।

श्लोक 19 (garuda.1.228.19)

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । संसारसागरं तीर्त्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्

jihvāgre vartate yasya harirityakṣaradvayam saṁsārasāgaraṁ tīrtvā sa gacchedvaiṣṇavaṁ padam

जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर 'हरि' यह दो अक्षर सदा रहते हैं, वह संसार-सागर को पार कर वैष्णव पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (garuda.1.228.20)

विज्ञातदुष्कृतिसहस्रसमावृतोऽपिश्रेयः परन्तु परिशुद्धिम भीप्समानः । स्पप्नान्तरे न हि पुनश्च भवं स पश्येन्नारायणस्तुतिकथापरमो मनुष्यः

vijñātaduṣkṛtisahasrasamāvṛto'piśreyaḥ parantu pariśuddhima bhīpsamānaḥ spapnāntare na hi punaśca bhavaṁ sa paśyennārāyaṇastutikathāparamo manuṣyaḥ

हज़ारों ज्ञात दुष्कर्मों से घिरा हुआ भी, यदि वह परम शुद्धि की कामना करता हो, और नारायण की स्तुति-कथा में ही परायण मनुष्य हो, तो वह स्वप्न में भी पुनः जन्म को नहीं देखता।

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