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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 238

अष्टांग-योग: यम-नियम का वर्णन

अध्याय 237अध्याय-सूचीअध्याय 239

श्लोक 1 (garuda.1.238.1)

श्रीभगवानुवाच । यमश्च नियम.पार्थ आसनं प्राणसंयमः । प्रत्याहारस्तथा ध्यानं धारणार्जुन सप्तमी

śrībhagavānuvāca yamaśca niyama.pārtha āsanaṁ prāṇasaṁyamaḥ pratyāhārastathā dhyānaṁ dhāraṇārjuna saptamī

श्री भगवान ने कहा — हे पार्थ! यम, नियम, आसन, प्राणसंयम (प्राणायाम), प्रत्याहार, तथा ध्यान और सातवीं धारणा, हे अर्जुन —

श्लोक 2 (garuda.1.238.2)

समाधिरिति चाष्टाङ्गो योग उक्तो विमुक्तये । कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा

samādhiriti cāṣṭāṅgo yoga ukto vimuktaye karmaṇā manasā vācā sarvabhūteṣu sarvadā

— और समाधि — इस प्रकार मुक्ति के लिए अष्टांग योग कहा गया है। कर्म, मन और वाणी से, सब प्राणियों के प्रति, सदा —

श्लोक 3 (garuda.1.238.3)

हिंसाविरामको धर्मो ह्याहिंसा परमं सुखम् । विधिना या भवेद्धिंसा सा त्वहिंसा प्रकीर्तिता

hiṁsāvirāmako dharmo hyāhiṁsā paramaṁ sukham vidhinā yā bhaveddhiṁsā sā tvahiṁsā prakīrtitā

— हिंसा से विरत रहना ही धर्म है; अहिंसा ही परम सुख है। विधिपूर्वक जो हिंसा होती है, वह भी अहिंसा ही कही गई है।

श्लोक 4 (garuda.1.238.4)

सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः

satyaṁ brūyātpriyaṁ brūyānna brūyātsatyamapriyam priyaṁ ca nānṛtaṁ brūyādeṣa dharmaḥ sanātanaḥ

सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए; अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। और प्रिय होते हुए भी असत्य नहीं बोलना चाहिए — यही सनातन धर्म है।

श्लोक 5 (garuda.1.238.5)

यच्चद्रव्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा । स्तेयं तस्यानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम्

yaccadravyāpaharaṇaṁ cauryādvātha balena vā steyaṁ tasyānācaraṇamasteyaṁ dharmasādhanam

चोरी से या बल से दूसरे के धन का हरण करना स्तेय (चोरी) है; उसका न करना ही अस्तेय है, जो धर्म का साधन है।

श्लोक 6 (garuda.1.238.6)

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा । सर्वत्र मैथुनत्यागं ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते

karmaṇā manasā vācā sarvāvasthāsu sarvadā sarvatra maithunatyāgaṁ brahmacaryaṁ pracakṣate

कर्म, मन और वाणी से, सभी अवस्थाओं में, सदा, सर्वत्र मैथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य कहलाता है।

श्लोक 7 (garuda.1.238.7)

द्रव्याणामप्यनादानमापत्स्वपि तथेच्छया । अपरिग्रहमित्याहुस्तं प्रयत्नेन वर्जयेत्

dravyāṇāmapyanādānamāpatsvapi tathecchayā aparigrahamityāhustaṁ prayatnena varjayet

आपत्ति में भी और इच्छावश भी वस्तुओं को ग्रहण न करना अपरिग्रह कहा गया है; इसे प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिए।

श्लोक 8 (garuda.1.238.8)

द्विधा शौचं मृज्जलाभ्यां बाह्य भावादथान्तरात् । यदृच्छालाभतस्तुष्टिः सन्तोषः सुखलक्षणम्

dvidhā śaucaṁ mṛjjalābhyāṁ bāhya bhāvādathāntarāt yadṛcchālābhatastuṣṭiḥ santoṣaḥ sukhalakṣaṇam

शौच दो प्रकार का है — मिट्टी-जल से बाह्य, और भाव से आंतरिक। जो अनायास प्राप्त हो उसी में संतुष्टि ही संतोष है, जो सुख का लक्षण है।

श्लोक 9 (garuda.1.238.9)

मनसश्चैन्द्रियाणां च ऐकाग्र्यं परमं तपः । शरीरशोषणं वापि कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः

manasaścaindriyāṇāṁ ca aikāgryaṁ paramaṁ tapaḥ śarīraśoṣaṇaṁ vāpi kṛcchracāndrāyaṇādibhiḥ

मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है, तथा कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतों से शरीर को सुखाना भी तप है।

श्लोक 10 (garuda.1.238.10)

वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजप बुधाः । सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते

vedāntaśatarudrīyapraṇavādijapa budhāḥ sattvaśuddhikaraṁ puṁsāṁ svādhyāyaṁ paricakṣate

विद्वानों ने वेदांत, शतरुद्रीय और प्रणव आदि के जप को स्वाध्याय कहा है, जो मनुष्यों के सत्त्व को शुद्ध करने वाला है।

श्लोक 11 (garuda.1.238.11)

स्तुतिस्मरणपूजादिवाङ्मनः कायकर्मभिः । अनिश्चला हरौ भक्तिरेतदीश्वरचिन्तनम् । आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा

stutismaraṇapūjādivāṅmanaḥ kāyakarmabhiḥ aniścalā harau bhaktiretadīśvaracintanam āsanaṁ svastikaṁ proktaṁ padmamardhāsanaṁ tathā

स्तुति, स्मरण, पूजा आदि से, वाणी-मन-शरीर के कर्मों से हरि में अटल भक्ति ही ईश्वर-चिंतन है। आसन स्वस्तिकासन, पद्मासन और अर्धासन कहे गए हैं।

श्लोक 12 (garuda.1.238.12)

प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् । इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु त्वसत्स्विव

prāṇaḥ svadehajo vāyurāyāmastannirodhanam indriyāṇāṁ vicaratāṁ viṣayeṣu tvasatsviva

अपने ही देह में उत्पन्न वायु प्राण है, उसका निरोध ही आयाम (प्राणायाम) है; विषयों में विचरण करती इन्द्रियों को मानो असत् की ओर से हटाना ही प्रत्याहार है।

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