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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 29

त्रैलोक्यमोहिनी (श्रीधर) पूजन-विधि

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (garuda.1.29.1)

।।हरिरुवाच । त्रैलोक्यमोहिनीं वक्ष्ये पुरुषोत्तममुख्यकाम् । पूजामन्त्राञ्छ्रीधराद्यान्धर्म्मकामादिदायकान्

hariruvāca trailokyamohinīṁ vakṣye puruṣottamamukhyakām pūjāmantrāñchrīdharādyāndharmmakāmādidāyakān

हरि ने कहा — मैं त्रैलोक्यमोहिनी विद्या बताऊँगा, जो पुरुषोत्तम-प्रधान है, तथा श्रीधर आदि की पूजा-मंत्र, जो धर्म-काम आदि देने वाले हैं।

श्लोक 2 (garuda.1.29.2)

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ह्रूं ॐ नमः । पुरुषोत्तम अप्रतिरूप लक्ष्मीनिवास जगत्क्षोभण सर्वस्त्रीहृदयदारुणं त्रिभुवनमदोन्मादनकर सुरासुरमनुज सुन्दरीं जनमनांसि तापयतापय शोषयशोषय मारयमारय स्तम्भयस्तम्भय द्रावयद्रावय आकर्षय आकर्षय, परमसुभगसर्वसौभाग्यकरं सर्वकामप्रदं अमुकं हनहन चक्रेण गदया खड्गेन सर्वबाणैर्भिधिभिन्धि पाशेन कुट्टकुट्ट अङ्कुशेन ताडयताडय तुरुतुरु किं तिष्ठसि तारयतारय यावत्समीहितं मे सिद्धं भवति ह्रीं (ह्रूं) फट् नमः

oṁ hrīṁ śrīṁ klīṁ hrūṁ oṁ namaḥ puruṣottama apratirūpa lakṣmīnivāsa jagatkṣobhaṇa sarvastrīhṛdayadāruṇaṁ tribhuvanamadonmādanakara surāsuramanuja sundarīṁ janamanāṁsi tāpayatāpaya śoṣayaśoṣaya mārayamāraya stambhayastambhaya drāvayadrāvaya ākarṣaya ākarṣaya, paramasubhagasarvasaubhāgyakaraṁ sarvakāmapradaṁ amukaṁ hanahana cakreṇa gadayā khaḍgena sarvabāṇairbhidhibhindhi pāśena kuṭṭakuṭṭa aṅkuśena tāḍayatāḍaya turuturu kiṁ tiṣṭhasi tārayatāraya yāvatsamīhitaṁ me siddhaṁ bhavati hrīṁ (hrūṁ) phaṭ namaḥ

'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ह्रूं ॐ नमः।' 'हे पुरुषोत्तम! हे अनुपम रूप वाले! हे लक्ष्मी के निवास! हे जगत को क्षुब्ध करने वाले! हे सब स्त्रियों के हृदय को विदीर्ण करने वाले! हे त्रिभुवन में मद और उन्माद उत्पन्न करने वाले, देवों-असुरों-मनुष्यों की सुंदरियों को मोहित करने वाले! उस स्त्री के मन को संतप्त करो, संतप्त करो, सुखाओ, सुखाओ, मार डालो, मार डालो, स्तंभित करो, स्तंभित करो, द्रवित करो, द्रवित करो, खींचो, खींचो — हे परम सौभाग्यशाली, समस्त सौभाग्य और कामनाएँ देने वाले! अमुक को मारो, मारो — चक्र से, गदा से, खड्ग से, समस्त बाणों से भेदो, भेदो, पाश से बांधो, बांधो, अंकुश से ताड़ित करो, ताड़ित करो, शीघ्र, शीघ्र, क्यों ठहरे हो? पार उतारो, पार उतारो — जब तक मेरी इच्छा सिद्ध न हो जाए। ह्रीं फट् नमः।'

श्लोक 3 (garuda.1.29.3)

ॐ श्रीं (श्रीः) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः । क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः

oṁ śrīṁ (śrīḥ) śrīdharāya trailokyamohanāya namaḥ klīṁ puruṣottamāya trailokyamohanāya namaḥ

'ॐ श्रीं, त्रैलोक्य को मोहित करने वाले श्रीधर को नमस्कार।' 'क्लीं, त्रैलोक्य को मोहित करने वाले पुरुषोत्तम को नमस्कार।'

श्लोक 4 (garuda.1.29.4)

ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः । ॐ श्रीं क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विप्णवे नमः

oṁ viṣṇave trailokyamohanāya namaḥ oṁ śrīṁ klīṁ trailokyamohanāya vipṇave namaḥ

'ॐ, त्रैलोक्य को मोहित करने वाले विष्णु को नमस्कार।' 'ॐ श्रीं क्लीं, त्रैलोक्य को मोहित करने वाले विष्णु को नमस्कार।'

श्लोक 5 (garuda.1.29.5)

त्रैलोक्यमोहना मंत्राः सर्वे सर्वार्थसाधकाः । सर्वे चिंत्या पृथग् वापि व्यासात्संक्षेपतोऽथ वा

trailokyamohanā maṁtrāḥ sarve sarvārthasādhakāḥ sarve ciṁtyā pṛthag vāpi vyāsātsaṁkṣepato'tha vā

त्रैलोक्यमोहिनी के ये सभी मंत्र समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाले हैं। इन सबका चिंतन अलग-अलग विस्तार से, अथवा संक्षेप में भी किया जा सकता है।

श्लोक 6 (garuda.1.29.6)

आसनं मूर्त्तिमंत्रं च होमाद्यंगषडंगकम् । चक्रं गदां च खड्गं च मुसलं शङ्खशर्ङ्गकम्

āsanaṁ mūrttimaṁtraṁ ca homādyaṁgaṣaḍaṁgakam cakraṁ gadāṁ ca khaḍgaṁ ca musalaṁ śaṅkhaśarṅgakam

आसन, मूर्ति-मंत्र, होम आदि, षडंग, चक्र, गदा, खड्ग, मूसल, शंख और शार्ङ्ग धनुष —

श्लोक 7 (garuda.1.29.7)

शरं पाशं चांकुशं च लक्ष्मीगरुडसंयुतम् । विष्वक्सेनं विस्तराद्वानरः सर्वमवाप्नुयात्

śaraṁ pāśaṁ cāṁkuśaṁ ca lakṣmīgaruḍasaṁyutam viṣvaksenaṁ vistarādvānaraḥ sarvamavāpnuyāt

बाण, पाश, अंकुश, लक्ष्मी और गरुड से युक्त, तथा विष्वक्सेन का — इन सबका विस्तार से पूजन कर मनुष्य समस्त फल प्राप्त करता है।

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