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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 44

ब्रह्म-ध्यान-निरूपण

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (garuda.1.44.1)

।।हरिरुवाच ।। पूजयित्वा पवित्राद्यैर्ब्रह्म ध्यात्वा हरिर्भवेत् ।। ब्रह्मध्यानं प्रवक्ष्यामि मायायन्त्रप्रमर्दकम्

..hariruvāca .. pūjayitvā pavitrādyairbrahma dhyātvā harirbhavet .. brahmadhyānaṁ pravakṣyāmi māyāyantrapramardakam

हरि ने कहा — पवित्र आदि से पूजा करके और ब्रह्म का ध्यान करके मनुष्य हरि-स्वरूप हो जाता है। अब मैं ब्रह्म-ध्यान का वर्णन करूँगा, जो माया के यन्त्र को चूर-चूर कर देने वाला है।

श्लोक 2 (garuda.1.44.2)

यच्छेद्वाङ्मनसं प्राज्ञस्तं यजेज्ज्ञानमात्मनि ।। ज्ञानं महति संयच्छेद्य इच्छेज्ज्ञानमात्मानि

yacchedvāṅmanasaṁ prājñastaṁ yajejjñānamātmani .. jñānaṁ mahati saṁyacchedya icchejjñānamātmāni

बुद्धिमान पुरुष वाणी और मन को संयत करे, और उसे आत्मा में स्थित ज्ञान के रूप में उपासे। जो आत्मा में ज्ञान चाहता है, उसे उस ज्ञान को महत् (बुद्धि-तत्त्व) में संयत करना चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.1.44.3)

देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्राणाहङ्करावर्जितम् ।। वर्जितं भूततन्मात्रैर्गुणजन्माशनादिभिः

dehendriyamanobuddhiprāṇāhaṅkarāvarjitam .. varjitaṁ bhūtatanmātrairguṇajanmāśanādibhiḥ

(वह ब्रह्म) शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकार से रहित है; तत्त्वों, तन्मात्राओं, गुणों, जन्म, भोजन आदि से भी रहित है।

श्लोक 4 (garuda.1.44.4)

स्वप्रकाशं निराकारं सदानं दमनादि यत् ।। नित्यं शुद्धं बुद्धमृद्धं सत्यमानन्दमद्वयम्

svaprakāśaṁ nirākāraṁ sadānaṁ damanādi yat .. nityaṁ śuddhaṁ buddhamṛddhaṁ satyamānandamadvayam

स्वयं-प्रकाश, निराकार, सदा विद्यमान, संयम आदि द्वन्द्वों से भी परे —

श्लोक 5 (garuda.1.44.5)

तुरीयमक्षरं ब्रह्म अहमस्मि परं पदम् ।। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिरपि (रिति) गीयते

turīyamakṣaraṁ brahma ahamasmi paraṁ padam .. ahaṁ brahmetyavasthānaṁ samādhirapi (riti) gīyate

नित्य, शुद्ध, बुद्ध (जाग्रत), समृद्ध, सत्य, आनन्दमय, अद्वैत — यही तुरीय, अक्षर ब्रह्म है: 'मैं ही वह परम पद हूँ।' 'मैं ब्रह्म हूँ' — इस अवस्था में स्थित रहना ही समाधि कहलाता है।

श्लोक 6 (garuda.1.44.6)

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।। बुद्धिं च सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचराः

ātmānaṁ rathinaṁ viddhi śarīraṁ rathameva tu .. buddhiṁ ca sārathiṁ viddhi manaḥ pragrahameva ca .. indriyāṇi hayānāhurviṣayāsteṣu gocarāḥ

आत्मा को रथी जानो, और शरीर को ही रथ। बुद्धि को सारथि जानो, और मन को ही लगाम। इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है, और विषयों को उनके मार्ग।

श्लोक 7 (garuda.1.44.7)

आत्मेंद्रियमनोयुक्तो भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।। यस्तु विज्ञानबाह्मेन युक्तेन मनसा सदा

ātmeṁdriyamanoyukto bhoktetyāhurmanīṣiṇaḥ .. yastu vijñānabāhmena yuktena manasā sadā

जो आत्मा, इन्द्रियों और मन से युक्त है, उसे विद्वान लोग भोक्ता कहते हैं। किन्तु जो सदा विवेकयुक्त मन से संयुक्त रहता है,

श्लोक 8 (garuda.1.44.8)

स तु तत्पदमाप्नोति स हि भूयो न जायते ।। विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः

sa tu tatpadamāpnoti sa hi bhūyo na jāyate .. vijñānasārathiryastu manaḥ pragrahavānnaraḥ

वह उस परम पद को प्राप्त करता है, वह फिर जन्म नहीं लेता। जो पुरुष विवेक को सारथि बनाकर मन की लगाम थामे रहता है,

श्लोक 9 (garuda.1.44.9)

स्वर्धुन्याः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ।। अहिंसादिर्यमः प्रोक्तः शौचादिर्नियमः स्मृतः

svardhunyāḥ pāramāpnoti tadviṣṇoḥ paramaṁ padam .. ahiṁsādiryamaḥ proktaḥ śaucādirniyamaḥ smṛtaḥ

वह स्वर्ग की नदी (आकाश-गंगा) के उस पार पहुँचता है — वही विष्णु का परम पद है। अहिंसा आदि को यम कहा गया है, शौच आदि को नियम स्मरण किया गया है।

श्लोक 10 (garuda.1.44.10)

आसनं पद्मकाद्युक्तं प्राणायामो मरुज्जयः ।। प्रत्याहारो जयः प्रोक्तो ध्यानमीश्वरचिन्तनम्

āsanaṁ padmakādyuktaṁ prāṇāyāmo marujjayaḥ .. pratyāhāro jayaḥ prokto dhyānamīśvaracintanam

पद्मासन आदि आसन कहलाते हैं; प्राणायाम श्वास पर विजय है। प्रत्याहार को इन्द्रिय-विजय कहा गया है; ध्यान ईश्वर का चिन्तन है।

श्लोक 11 (garuda.1.44.11)

मनोधृतिर्धारणा स्यात्समाधिर्ब्रह्मणि स्थितिः ।। पूर्वं चेतः स्थिरं न स्यात्ततोमूर्त्तिं विचिन्तयेत्

manodhṛtirdhāraṇā syātsamādhirbrahmaṇi sthitiḥ .. pūrvaṁ cetaḥ sthiraṁ na syāttatomūrttiṁ vicintayet

मन की स्थिरता ही धारणा है; ब्रह्म में स्थिति ही समाधि है। यदि आरम्भ में मन स्थिर न हो, तो (भगवान के) रूप का ध्यान करना चाहिए —

श्लोक 12 (garuda.1.44.12)

हृत्पद्मकर्णिकामध्ये शङ्खचक्रगदाब्जवान् ।। श्रीवत्सकौस्तुभयुतो वनमालाश्रिया युतः

hṛtpadmakarṇikāmadhye śaṅkhacakragadābjavān .. śrīvatsakaustubhayuto vanamālāśriyā yutaḥ

हृदय-कमल की कर्णिका के मध्य में, शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हुए, श्रीवत्स और कौस्तुभ से युक्त, वनमाला की शोभा से सुशोभित,

श्लोक 13 (garuda.1.44.13)

नित्यः शुद्धो भूतियुक्तः सत्यानन्दाह्वयः परः ।। आत्माहं परमं ब्रह्म परमं ज्योतिरेव तु

nityaḥ śuddho bhūtiyuktaḥ satyānandāhvayaḥ paraḥ .. ātmāhaṁ paramaṁ brahma paramaṁ jyotireva tu

नित्य, शुद्ध, ऐश्वर्य से युक्त, सत्-आनन्द नाम से पुकारे जाने वाले परमेश्वर का। 'मैं ही वह परम ब्रह्म हूँ, मैं ही वह परम ज्योति हूँ।'

श्लोक 14 (garuda.1.44.14)

चतुर्विंशतिमूर्त्तिः स शालग्रामशिलास्थितः ।। द्वारकादिशिलासंस्थो ध्येयः पूज्योऽप्यहं च सः

caturviṁśatimūrttiḥ sa śālagrāmaśilāsthitaḥ .. dvārakādiśilāsaṁstho dhyeyaḥ pūjyo'pyahaṁ ca saḥ

वह चौबीस मूर्तियों वाला शालग्राम शिला में स्थित है; द्वारका आदि की शिलाओं में भी स्थित वह ध्येय और पूज्य है — और मैं भी वही हूँ।

श्लोक 15 (garuda.1.44.15)

मनसोऽभीप्सितं प्राप्य देवो वैमानिको भवेत् ।। निष्कामो मुक्तिमाप्नोति मूर्त्तिं ध्याययंस्तुवञ्जपन्

manaso'bhīpsitaṁ prāpya devo vaimāniko bhavet .. niṣkāmo muktimāpnoti mūrttiṁ dhyāyayaṁstuvañjapan

मन की इच्छा को प्राप्त करके (साधक) विमान पर चलने वाला देव बनता है। किन्तु निष्काम रहकर उस रूप का ध्यान, स्तवन और जप करने वाला मुक्ति प्राप्त करता है।

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