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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 46

वास्तु-मान-लक्षण

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (garuda.1.46.1)

।।हरिरुवाच ।। वास्तुं संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादौ विघ्ननाशनम् ।। ईशानकोणादारभ्य ह्येकाशीतिपदे यजेत्

..hariruvāca .. vāstuṁ saṁkṣepato vakṣye gṛhādau vighnanāśanam .. īśānakoṇādārabhya hyekāśītipade yajet

हरि ने कहा — अब मैं संक्षेप में वास्तु का वर्णन करूँगा, जो घर आदि में उत्पन्न विघ्नों का नाश करने वाला है। ईशान कोण से आरम्भ करके इक्यासी पदों में पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.1.46.2)

ईशाने च शिरः पादौ नैर्ऋतेऽग्न्यनिले करौ ।। आवासवासवेश्मादौ पुरे ग्रामे वणिक्पथे

īśāne ca śiraḥ pādau nairṛte'gnyanile karau .. āvāsavāsaveśmādau pure grāme vaṇikpathe

ईशान में सिर और पैर, नैर्ऋत्य में तथा आग्नेय और वायव्य कोणों में भुजाएँ — यह विधान आवासों, निवास-गृहों, नगर, ग्राम और वणिक्-मार्गों में,

श्लोक 3 (garuda.1.46.3)

प्रासादारामदुर्गेषु देवालयमठेषु च ।। द्वाविंशति सुरान्बाह्ये तदन्तश्च त्रयोदश

prāsādārāmadurgeṣu devālayamaṭheṣu ca .. dvāviṁśati surānbāhye tadantaśca trayodaśa

प्रासादों, उद्यानों, दुर्गों, देवालयों और मठों में भी लागू होता है। बाहर बाईस (अथवा बत्तीस) देवता होते हैं, और उसके भीतर तेरह।

श्लोक 4 (garuda.1.46.4)

ईशश्चैवाथ पर्जन्यो जयन्तः कुलिशायुधः ।। सूर्य्यः सत्यो भृगुश्चैव आकाशो वायुरेव च

īśaścaivātha parjanyo jayantaḥ kuliśāyudhaḥ .. sūryyaḥ satyo bhṛguścaiva ākāśo vāyureva ca

ईश, फिर पर्जन्य, जयन्त, वज्रधारी (इन्द्र), सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश और वायु —

श्लोक 5 (garuda.1.46.5)

पूषा च वितथश्चैव ग्रहक्षेत्रयमावुभौ ।। गन्धर्वी भृगुराजस्तु मृगः पितृगणस्तथा

pūṣā ca vitathaścaiva grahakṣetrayamāvubhau .. gandharvī bhṛgurājastu mṛgaḥ pitṛgaṇastathā

पूषा, वितथ, ग्रहक्षत और यम दोनों, गन्धर्वी, भृगुराज, मृग और पितृगण भी —

श्लोक 6 (garuda.1.46.6)

दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो गणाधिपः ।। असुरः शेषपापौ (दौ) च रोगो।डहिमुख (ख्य) एव च

dauvāriko'tha sugrīvaḥ puṣpadanto gaṇādhipaḥ .. asuraḥ śeṣapāpau (dau) ca rogo.ḍahimukha (khya) eva ca

द्वारपाल (दौवारिक), फिर सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शेष और पाप, रोग, तथा अहिमुख —

श्लोक 7 (garuda.1.46.7)

भल्लाटः सोमसर्पौ च अदितिश्चदितिस्तथा ।। बहिर्द्वात्रिंशदेते तु तदन्तश्चतुरः श्रृणु

bhallāṭaḥ somasarpau ca aditiścaditistathā .. bahirdvātriṁśadete tu tadantaścaturaḥ śrṛṇu

भल्लाट, सोम और सर्प, तथा अदिति और दिति — ये सब बाहर के बत्तीस देवता हैं; अब भीतर के चार को सुनो।

श्लोक 8 (garuda.1.46.8)

ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान्पूजयेद्धुधः ।। आपश्चैवाथ सावित्री जयो रुद्रस्तथैव च

īśānādicatuṣkoṇasaṁsthitānpūjayeddhudhaḥ .. āpaścaivātha sāvitrī jayo rudrastathaiva ca

बुद्धिमान को ईशान आदि चारों कोणों में स्थित इन्हें पूजना चाहिए — आपः, फिर सावित्री, जय, और उसी प्रकार रुद्र।

श्लोक 9 (garuda.1.46.9)

मध्ये नवपदे ब्रह्मा तस्याष्टौ च समीपगान् ।। देवानेकोत्तरानेतान्पूर्वादौ नामतः श्रृणु

madhye navapade brahmā tasyāṣṭau ca samīpagān .. devānekottarānetānpūrvādau nāmataḥ śrṛṇu

मध्य के नौ-पद में ब्रह्मा हैं, और उनके निकट आठ देवता हैं। इन्हें, एक-एक अधिक करते हुए, पूर्व दिशा से आरम्भ करके नाम से सुनो —

श्लोक 10 (garuda.1.46.10)

अर्य्यमा सविता चैव विवस्वान्विबुधाधिपः ।। मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधरः क्रमात्

aryyamā savitā caiva vivasvānvibudhādhipaḥ .. mitro'tha rājayakṣmā ca tathā pṛthvīdharaḥ kramāt

अर्यमा, फिर सविता, विवस्वान्, देवताओं के अधिपति (इन्द्र), मित्र, फिर राजयक्ष्मा, तथा पृथ्वीधर — क्रमशः,

श्लोक 11 (garuda.1.46.11)

अष्टमश्चापवत्सश्च परितो ब्रह्मणः स्मृताः ।। ईशानकोणादारभ्य दुर्गे च (र्ज्ञेयो) वंश उच्यते

aṣṭamaścāpavatsaśca parito brahmaṇaḥ smṛtāḥ .. īśānakoṇādārabhya durge ca (rjñeyo) vaṁśa ucyate

और आठवाँ अपवत्स — ये ब्रह्मा के चारों ओर स्मरण किए जाते हैं। ईशान कोण से आरम्भ करके दुर्ग में वंश (मुख्य-रेखा) जानी जाती है।

श्लोक 12 (garuda.1.46.12)

आग्नेयकोणादारभ्य वंशो भवति दुर्द्धरः ।। अदितिं हिमवन्तं च जयन्तं च इदं त्रयम्

āgneyakoṇādārabhya vaṁśo bhavati durddharaḥ .. aditiṁ himavantaṁ ca jayantaṁ ca idaṁ trayam

आग्नेय कोण से आरम्भ करने पर वंश दुर्धर (अशुभ) हो जाता है। अदिति, हिमवान् और जयन्त — ये तीन,

श्लोक 13 (garuda.1.46.13)

नायिका कालिका नाम शक्राद्गन्धर्वगाः पुनः ।। वास्तुदेवान्पूजयित्वा गृहप्रासादकृद्भवेत्

nāyikā kālikā nāma śakrādgandharvagāḥ punaḥ .. vāstudevānpūjayitvā gṛhaprāsādakṛdbhavet

तथा कालिका नाम्नी स्वामिनी, और फिर शक्र (इन्द्र) से आरम्भ होने वाली गन्धर्व-पंक्ति — वास्तु-देवताओं की इस प्रकार पूजा करके ही गृह अथवा प्रासाद का निर्माता बनना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.1.46.14)

सुरेज्यः पुरतः कार्यो यस्याग्नेय्यां महानसम् ।। कपिनिर्गमने (णी) ? येन पूर्वतः सत्रमण्डपम्

surejyaḥ purataḥ kāryo yasyāgneyyāṁ mahānasam .. kapinirgamane (ṇī) ? yena pūrvataḥ satramaṇḍapam

देवगुरु (बृहस्पति के स्थान) को सामने रखना चाहिए, जिसके आग्नेय कोण में रसोईघर हो; जिससे होकर, पूर्व दिशा में, सत्र-मण्डप (यज्ञशाला) हो।

श्लोक 15 (garuda.1.46.15)

गन्धपुष्पगृहं कार्य्यमैशान्यां पट्टसंयुतम् ।। भाण्डागारं च कौबेर्य्यां गोष्ठागारं च वायवे

gandhapuṣpagṛhaṁ kāryyamaiśānyāṁ paṭṭasaṁyutam .. bhāṇḍāgāraṁ ca kauberyyāṁ goṣṭhāgāraṁ ca vāyave

ईशान कोण में सुगन्ध और पुष्पों का कक्ष, चबूतरे सहित बनाना चाहिए। कुबेर की दिशा (उत्तर) में भण्डार-गृह, और वायु की दिशा (वायव्य) में गोशाला।

श्लोक 16 (garuda.1.46.16)

उदगाश्रयं च वारुण्यां वातायनसमन्वितम् ।। समित्कुशेन्धनस्थानमायुधानां च नैर्ऋते

udagāśrayaṁ ca vāruṇyāṁ vātāyanasamanvitam .. samitkuśendhanasthānamāyudhānāṁ ca nairṛte

वरुण की दिशा (पश्चिम) में खिड़की सहित उत्तर की ओर का आश्रय-स्थान; और नैर्ऋत्य दिशा में समिधा, कुश, ईंधन तथा शस्त्रों का स्थान।

श्लोक 17 (garuda.1.46.17)

अभ्यागतालयं रम्यसशय्यासनपादुकम् ।। तोयाग्निदीपसद्भृत्यैर्युक्तं दक्षिणतो भवेत्

abhyāgatālayaṁ ramyasaśayyāsanapādukam .. toyāgnidīpasadbhṛtyairyuktaṁ dakṣiṇato bhavet

शय्या, आसन और पादुका सहित सुन्दर अतिथि-गृह, जल, अग्नि, दीप और भले सेवकों से युक्त, दक्षिण दिशा में होना चाहिए।

श्लोक 18 (garuda.1.46.18)

गृहान्तराणि सर्वाणि सजलैः कदलीगृहैः ।। पञ्चवर्णैश्च कुसुमैः शोभितानि प्रकल्पयेत्

gṛhāntarāṇi sarvāṇi sajalaiḥ kadalīgṛhaiḥ .. pañcavarṇaiśca kusumaiḥ śobhitāni prakalpayet

घर के सभी भीतरी कक्षों को जल-स्रोतों और केले के कुंजों सहित, तथा पाँच रंगों के फूलों से सुशोभित करना चाहिए।

श्लोक 19 (garuda.1.46.19)

प्राकारं तद्बहिर्दद्यात्पञ्चहस्तप्रमाणतः ।। एवं विष्ण्वाश्रमं कुर्य्याद्वनैश्चोपवनैर्युतम्

prākāraṁ tadbahirdadyātpañcahastapramāṇataḥ .. evaṁ viṣṇvāśramaṁ kuryyādvanaiścopavanairyutam

इसके बाहर पाँच हाथ की माप वाली चारदीवारी बनानी चाहिए। इस प्रकार वनों और उपवनों से युक्त विष्णु का आश्रम बनाना चाहिए।

श्लोक 20 (garuda.1.46.20)

चतुः षष्टिपदो वास्तुः प्रासादादौ प्रपूजितः ।। मध्ये चतुष्पदो ब्रह्मा द्विपदास्त्वर्य्यमादयः

catuḥ ṣaṣṭipado vāstuḥ prāsādādau prapūjitaḥ .. madhye catuṣpado brahmā dvipadāstvaryyamādayaḥ

प्रासाद आदि के लिए चौंसठ-पद वाला वास्तु पूजित होता है। मध्य में चार-पद वाले ब्रह्मा हैं, और अर्यमा आदि दो-दो पद में हैं,

श्लोक 21 (garuda.1.46.21)

कर्णे चैवाथ शिख्याद्यास्तथा देवाः प्रकीर्त्तिताः ।। तेभ्यो ह्युभयतः सार्द्धादन्येऽपि द्विपदाः सुराः

karṇe caivātha śikhyādyāstathā devāḥ prakīrttitāḥ .. tebhyo hyubhayataḥ sārddhādanye'pi dvipadāḥ surāḥ

और कोनों में शिखी आदि देवता भी कहे गए हैं। उनसे दोनों ओर डेढ़-डेढ़ पद में अन्य देवता भी दो-दो पद के होते हैं।

श्लोक 22 (garuda.1.46.22)

चतुः षष्टिपदा देवा इत्येवं परिकीर्त्तिताः ।। चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी

catuḥ ṣaṣṭipadā devā ityevaṁ parikīrttitāḥ .. carakī ca vidārī ca pūtanā pāparākṣasī

इस प्रकार चौंसठ देवता कहे गए हैं। चरकी, विदारी, पूतना, पाप-राक्षसी,

श्लोक 23 (garuda.1.46.23)

ईशानाद्यास्ततो बाह्ये देवाद्या हेतुकादयः ।। हैतुकस्त्रिपुरान्तश्च अग्निवेतालकौ यमः

īśānādyāstato bāhye devādyā hetukādayaḥ .. haitukastripurāntaśca agnivetālakau yamaḥ

ईशान आदि से आरम्भ होकर बाहर, हेतुक आदि देवता — हैतुक, त्रिपुरान्तक, अग्नि-वेताल और यम,

श्लोक 24 (garuda.1.46.24)

अग्निजिह्वः कालकश्च करालो ह्योकपादकः ।। ऐशान्यां भीमरूपस्तु पाताले प्रेतनायकः

agnijihvaḥ kālakaśca karālo hyokapādakaḥ .. aiśānyāṁ bhīmarūpastu pātāle pretanāyakaḥ

अग्निजिह्व, कालक, कराल और एकपादक — ईशान में भीषण-रूप, पाताल में प्रेतों का स्वामी,

श्लोक 25 (garuda.1.46.25)

आकाशे गन्धमाली स्यात्क्षेत्रपालांस्ततो यजेत् ।। विस्ताराभिहतं दैर्घ्यं राशिं वास्तोस्तु कारयेत्

ākāśe gandhamālī syātkṣetrapālāṁstato yajet .. vistārābhihataṁ dairghyaṁ rāśiṁ vāstostu kārayet

आकाश में गन्धमाली — इसके बाद क्षेत्रपालों की पूजा करनी चाहिए। भूमि की लम्बाई और चौड़ाई के गुणनफल को वास्तु की राशि बनाना चाहिए।

श्लोक 26 (garuda.1.46.26)

कृत्वा च वसुभिर्भागं शेषं बद्धा यमादिशेत् ।। पुनर्गुणितमष्टाभिर्ऋक्षभागं तु भाजयेत्

kṛtvā ca vasubhirbhāgaṁ śeṣaṁ baddhā yamādiśet .. punarguṇitamaṣṭābhirṛkṣabhāgaṁ tu bhājayet

उसे आठ (वसुओं की संख्या) से भाग देकर शेष को यम आदि के अनुसार निर्धारित करना चाहिए। फिर उसे आठ से गुणा करके नक्षत्र-भाग से भाग देना चाहिए।

श्लोक 27 (garuda.1.46.27)

यच्छेषं तद्भवेदृक्षं भागैर्हृत्वाव्ययं भवेत् ।। ऋक्षं चतुर्गुणं कृत्वा नवभिर्भागहारितम्

yaccheṣaṁ tadbhavedṛkṣaṁ bhāgairhṛtvāvyayaṁ bhavet .. ṛkṣaṁ caturguṇaṁ kṛtvā navabhirbhāgahāritam

जो शेष बचे, वही नक्षत्र होता है; भागों से भाग देने पर अविनाशी (तत्त्व) प्राप्त होता है। नक्षत्र को चौगुना करके नौ से भाग देने पर,

श्लोक 28 (garuda.1.46.28)

शेषमंशं विजानीयाद्देवलस्य मतं यथा ।। अष्टाभिर्गुणितं पिण्डं षष्टिभिर्भागहारितम्

śeṣamaṁśaṁ vijānīyāddevalasya mataṁ yathā .. aṣṭābhirguṇitaṁ piṇḍaṁ ṣaṣṭibhirbhāgahāritam

देवल के मत के अनुसार शेष अंश को जानना चाहिए। कुल संख्या को आठ से गुणा करके साठ से भाग देने पर,

श्लोक 29 (garuda.1.46.29)

यच्छेषं तद्भवेज्जीवं मरणं भूतहारितम् ।। वास्तुक्रोडे गृहं कुर्य्यान्न पृष्ठे मानवः सदा

yaccheṣaṁ tadbhavejjīvaṁ maraṇaṁ bhūtahāritam .. vāstukroḍe gṛhaṁ kuryyānna pṛṣṭhe mānavaḥ sadā

जो शेष बचे, वही आयु होती है; मृत्यु पंचभूतों से भाग देने पर ज्ञात होती है। मनुष्य को सदा वास्तु के मध्य भाग में गृह बनाना चाहिए, कभी पिछले भाग में नहीं।

श्लोक 30 (garuda.1.46.30)

वामपार्श्वेन स्वपिति नात्र कार्य्या विचारणा ।। सिंहकन्यातुलायां च द्वारं शुध्येदथोत्तरम्

vāmapārśvena svapiti nātra kāryyā vicāraṇā .. siṁhakanyātulāyāṁ ca dvāraṁ śudhyedathottaram

मनुष्य बाईं करवट सोता है — इसमें कोई विचार-विमर्श नहीं करना चाहिए। सिंह, कन्या और तुला (राशियों/नक्षत्रों) में उत्तर द्वार शुभ होता है।

श्लोक 31 (garuda.1.46.31)

एवं च वृश्चिकादौ स्यात्पूर्वदक्षिणपश्चिमम् ।। द्वारं दीर्घार्द्धविस्तारं द्वाराण्यष्टौ स्मृतानि च

evaṁ ca vṛścikādau syātpūrvadakṣiṇapaścimam .. dvāraṁ dīrghārddhavistāraṁ dvārāṇyaṣṭau smṛtāni ca

इसी प्रकार वृश्चिक आदि में पूर्व, दक्षिण और पश्चिम (द्वार शुभ होते हैं)। द्वार की चौड़ाई उसकी ऊँचाई की आधी होनी चाहिए; द्वार आठ प्रकार के स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 32 (garuda.1.46.32)

सन्तानप्रेष्यनीचत्वं स्वयानं स्वर्णभूषणम् ।। सुतहीनं तु रौद्रेण वीर्य्यघ्नं दक्षिणे तथा

santānapreṣyanīcatvaṁ svayānaṁ svarṇabhūṣaṇam .. sutahīnaṁ tu raudreṇa vīryyaghnaṁ dakṣiṇe tathā

(अनुचित द्वार से) सन्तान और सेवकों की हीनता, अपने वाहन और स्वर्ण-आभूषणों की हानि होती है; रौद्र योग में सन्तानहीनता, और दक्षिण में वीर्य-नाश होता है।

श्लोक 33 (garuda.1.46.33)

वह्नौ वध(बन्ध)श्चायुर्वृद्धिंपुत्त्रलाभसुतृप्तिदः ।। धनदे नृपपीडादमर्थघ्नं रोगदं जले

vahnau vadha(bandha)ścāyurvṛddhiṁputtralābhasutṛptidaḥ .. dhanade nṛpapīḍādamarthaghnaṁ rogadaṁ jale

अग्नि-दिशा में बन्धन (होता है), पर आयु-वृद्धि, पुत्र-लाभ और पूर्ण तृप्ति भी देता है; कुबेर-दिशा में राजा से पीड़ा और धन-नाश, जल-दिशा में रोग देता है।

श्लोक 34 (garuda.1.46.34)

नृपभीतिर्मृतापत्यं ह्यनपत्यं न वैरदम् ।। अर्थदं चार्थहान्यै च दोषदं पुत्रमृत्युदम्

nṛpabhītirmṛtāpatyaṁ hyanapatyaṁ na vairadam .. arthadaṁ cārthahānyai ca doṣadaṁ putramṛtyudam

राजा से भय, सन्तान की मृत्यु, अथवा सन्तानहीनता — यह शत्रुता से मुक्ति नहीं देता; यह धन तो देता है पर धन की हानि भी करता है, दोष देता है और पुत्र की मृत्यु कराता है।

श्लोक 35 (garuda.1.46.35)

द्वाराण्युत्तरसंज्ञानि पूर्वद्वाराणि वच्म्यहम् ।। अग्निभीतिर्बहु कन्याधनसम्मानकोपदम्

dvārāṇyuttarasaṁjñāni pūrvadvārāṇi vacmyaham .. agnibhītirbahu kanyādhanasammānakopadam

ये उत्तर दिशा के द्वार कहे गए हैं; अब मैं पूर्व दिशा के द्वारों का वर्णन करूँगा। (अनुचित द्वार) अग्नि-भय, अनेक पुत्रियाँ, तथा धन और सम्मान को लेकर विवाद देता है।

श्लोक 36 (garuda.1.46.36)

राजघ्नं कोपदं पूर्वे फलतो द्वारमीरितम् ।। ईशानादौ भवेत्पूर्वमाग्नेय्यादौ तु दक्षिणम्

rājaghnaṁ kopadaṁ pūrve phalato dvāramīritam .. īśānādau bhavetpūrvamāgneyyādau tu dakṣiṇam

यह राजा का नाश और क्रोध उत्पन्न करता है — इस प्रकार पूर्व दिशा में द्वार का फल कहा गया है। ईशान से आरम्भ होकर (उत्तम द्वार) पूर्व में, आग्नेय से आरम्भ होकर दक्षिण में होता है;

श्लोक 37 (garuda.1.46.37)

नैर्ऋत्यादौ पश्चिमं स्याद्वायव्यादौ तु चोत्तरम् ।। अष्टभागे कृते भागे द्वाराणां च फलाफलम्

nairṛtyādau paścimaṁ syādvāyavyādau tu cottaram .. aṣṭabhāge kṛte bhāge dvārāṇāṁ ca phalāphalam

नैर्ऋत्य से आरम्भ होकर पश्चिम में, और वायव्य से आरम्भ होकर उत्तर में होता है। प्रत्येक दिशा को आठ भागों में बाँटकर द्वारों का शुभाशुभ फल जानना चाहिए।

श्लोक 38 (garuda.1.46.38)

अश्वत्थप्लक्षन्यग्रोधाः पूर्वादौ स्यादुदुम्बरः ।। गृहस्य शोभनः प्रोक्त ईशाने चैव शाल्मलिः ।। पूजितो विघ्नहारी स्यात्प्रासादस्य गृहस्य च

aśvatthaplakṣanyagrodhāḥ pūrvādau syādudumbaraḥ .. gṛhasya śobhanaḥ prokta īśāne caiva śālmaliḥ .. pūjito vighnahārī syātprāsādasya gṛhasya ca

अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष और न्यग्रोध (बरगद) पूर्व आदि दिशाओं में, और उदुम्बर (गूलर) घर के लिए शुभ कहा गया है; तथा ईशान में शाल्मलि — पूजित होने पर यह प्रासाद और गृह दोनों के लिए विघ्न-हारी होता है।

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