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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 49

वर्णाश्रम-धर्म-निरूपण

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (garuda.1.49.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। सर्गादिकृद्धरिश्चैव पूज्यः स्वायम्भुवादिभिः ।। विप्राद्यैः स्वेन धर्मेण तद्धर्मं व्यास ! वै श्रृणु

.. brahmovāca .. sargādikṛddhariścaiva pūjyaḥ svāyambhuvādibhiḥ .. viprādyaiḥ svena dharmeṇa taddharmaṁ vyāsa ! vai śrṛṇu

ब्रह्मा ने कहा — सृष्टि आदि के कर्ता हरि स्वायम्भुव मनु आदि द्वारा, ब्राह्मण आदि द्वारा, अपने-अपने धर्म से पूजनीय हैं। हे व्यास! उसी धर्म को सुनो।

श्लोक 2 (garuda.1.49.2)

यजनं याजनं दानं ब्राह्मणस्य प्रतिग्रहः ।। अध्यापनञ्चाध्ययनं षट् कर्माणिद्विजोत्तमे

yajanaṁ yājanaṁ dānaṁ brāhmaṇasya pratigrahaḥ .. adhyāpanañcādhyayanaṁ ṣaṭ karmāṇidvijottame

यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान, प्रतिग्रह (दान लेना), अध्यापन और अध्ययन — हे द्विजोत्तम, ये छह कर्म (ब्राह्मण के हैं)।

श्लोक 3 (garuda.1.49.3)

दानमध्ययनं यज्ञो धर्मः क्षत्त्रियवैश्ययोः ।। दण्डस्तस्य कृषिर्वैश्यस्य शस्यते

dānamadhyayanaṁ yajño dharmaḥ kṣattriyavaiśyayoḥ .. daṇḍastasya kṛṣirvaiśyasya śasyate

दान, अध्ययन और यज्ञ क्षत्रिय और वैश्य दोनों का धर्म है। क्षत्रिय के लिए दण्ड (शासन) और वैश्य के लिए कृषि आदि प्रशंसित है।

श्लोक 4 (garuda.1.49.4)

शुश्रूषैव द्विजातीनां शूद्राणां धर्मसाधनम् ।। कारुकर्म तथाऽऽजीवोपाकयज्ञोऽपि धर्मतः

śuśrūṣaiva dvijātīnāṁ śūdrāṇāṁ dharmasādhanam .. kārukarma tathā''jīvopākayajño'pi dharmataḥ

द्विजातियों की सेवा ही शूद्रों का धर्म-साधन है। शिल्प-कर्म और उससे जीविका, तथा उपकर्म भी धर्मतः (उनके लिए विहित) है।

श्लोक 5 (garuda.1.49.5)

भिक्षाचर्य्याथ शुश्रूषा गुरोः स्वाध्याय एव च ।। सन्ध्याकर्माग्निकार्य्यञ्च धर्मोऽयं ब्रह्मचारिणः

bhikṣācaryyātha śuśrūṣā guroḥ svādhyāya eva ca .. sandhyākarmāgnikāryyañca dharmo'yaṁ brahmacāriṇaḥ

भिक्षाचर्या, गुरु की सेवा, स्वाध्याय, सन्ध्या-कर्म और अग्नि-कार्य — यह ब्रह्मचारी का धर्म है।

श्लोक 6 (garuda.1.49.6)

सर्वेषामाश्रमाणां च द्वैविध्यं तु चतुर्विधम् ।। ब्रह्मचार्य्युपकुर्वाणो नैष्ठिको ब्रह्मतत्परः

sarveṣāmāśramāṇāṁ ca dvaividhyaṁ tu caturvidham .. brahmacāryyupakurvāṇo naiṣṭhiko brahmatatparaḥ

सभी आश्रमों के दो-दो प्रकार होते हैं, इस प्रकार वे चार प्रकार के हो जाते हैं। ब्रह्मचारी उपकुर्वाण और नैष्ठिक (दो प्रकार का है) — ब्रह्म-तत्पर।

श्लोक 7 (garuda.1.49.7)

योऽधीत्य विधिवद्वेदान् गृहस्थाश्रममाव्रजेत् ।। उपकुर्वाणको ज्ञेयो नैष्ठिको मरणान्तिकः

yo'dhītya vidhivadvedān gṛhasthāśramamāvrajet .. upakurvāṇako jñeyo naiṣṭhiko maraṇāntikaḥ

जो विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे, वह उपकुर्वाणक जानना चाहिए; नैष्ठिक मृत्युपर्यन्त (ब्रह्मचर्य में रहता है)।

श्लोक 8 (garuda.1.49.8)

अग्नयोऽतिथिशुश्रूषा यज्ञो दानं सुरार्चनम् ।। गृहस्थस्य समासेन धर्मोऽयं द्विजसत्तम !

agnayo'tithiśuśrūṣā yajño dānaṁ surārcanam .. gṛhasthasya samāsena dharmo'yaṁ dvijasattama !

अग्नियों की सेवा, अतिथि-सेवा, यज्ञ, दान और देव-पूजन — हे श्रेष्ठ द्विज, संक्षेप में यही गृहस्थ का धर्म है।

श्लोक 9 (garuda.1.49.9)

उदासीनः साधकश्च गृहस्थो द्विविधो भवेत् ।। कुटुम्बभरणे युक्तः साधकोऽसौ गृही भवेत्

udāsīnaḥ sādhakaśca gṛhastho dvividho bhavet .. kuṭumbabharaṇe yuktaḥ sādhako'sau gṛhī bhavet

गृहस्थ उदासीन और साधक — दो प्रकार का होता है। परिवार के भरण-पोषण में लगा हुआ गृहस्थ साधक कहलाता है।

श्लोक 10 (garuda.1.49.10)

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य त्यक्त्वा भार्य्याधनादिकम् ।। एकाकी यस्तु विचरेदुदासीनः स मौक्षिकः

ṛṇāni trīṇyapākṛtya tyaktvā bhāryyādhanādikam .. ekākī yastu vicaredudāsīnaḥ sa maukṣikaḥ

तीनों ऋणों को चुकाकर, पत्नी और धन आदि को त्यागकर, जो अकेला विचरण करता है, वह मोक्षार्थी उदासीन है।

श्लोक 11 (garuda.1.49.11)

भूमौ मूलफलाशित्वं स्वाध्यायस्तप एव च ।। संविभागो यथान्यायं धर्मोऽयं वनवासिनः

bhūmau mūlaphalāśitvaṁ svādhyāyastapa eva ca .. saṁvibhāgo yathānyāyaṁ dharmo'yaṁ vanavāsinaḥ

भूमि पर सोना, कन्द-मूल-फल खाना, स्वाध्याय और तप, तथा (अतिथियों को) न्यायपूर्वक बाँटकर देना — यह वनवासी का धर्म है।

श्लोक 12 (garuda.1.49.12)

तपस्तप्यति योऽरण्ये यजेद्देवाञ्जुहोति च ।। स्वाध्याये चैव निरतो वनस्थस्तापसोत्तमः

tapastapyati yo'raṇye yajeddevāñjuhoti ca .. svādhyāye caiva nirato vanasthastāpasottamaḥ

जो वन में तप करता है, देवताओं की पूजा और हवन करता है, और स्वाध्याय में सदा रत रहता है — वह वनस्थ श्रेष्ठ तपस्वी है।

श्लोक 13 (garuda.1.49.13)

तपसा कर्शितोऽत्यर्थं यस्तु ध्यानपरो भवेत् ।। सन्यासी स हि विज्ञेयो वानप्रस्थाश्रमे स्थितः

tapasā karśito'tyarthaṁ yastu dhyānaparo bhavet .. sanyāsī sa hi vijñeyo vānaprasthāśrame sthitaḥ

तप से अत्यन्त क्षीण होकर जो ध्यान में लीन हो जाता है, वह वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए भी संन्यासी ही जानना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.1.49.14)

योगाभ्यासरतो नित्यमारुरुक्षुर्जितेन्द्रियः ।। ज्ञानाय वर्त्तते भिक्षुः प्रोच्यते पारमेष्ठिकः

yogābhyāsarato nityamārurukṣurjitendriyaḥ .. jñānāya varttate bhikṣuḥ procyate pārameṣṭhikaḥ

जो सदा योगाभ्यास में रत, ऊर्ध्वगमन का इच्छुक, जितेन्द्रिय, ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहता है, वह भिक्षु पारमेष्ठिक कहलाता है।

श्लोक 15 (garuda.1.49.15)

यस्त्वात्मरतिरेव स्यान्नित्यतृप्तो महामुनिः ।। सम्यक् चन्दनम् सम्पन्नः स योगी भिक्षुरुच्यते

yastvātmaratireva syānnityatṛpto mahāmuniḥ .. samyak candanam sampannaḥ sa yogī bhikṣurucyate

जो केवल आत्मा में ही रमण करता है, सदा तृप्त, महामुनि, पूर्णतः शान्ति से सम्पन्न — वह योगी भिक्षु कहलाता है।

श्लोक 16 (garuda.1.49.16)

भैक्ष्यं श्रुतं च मौनित्वं तपो ध्यानं विशेषतः ।। सम्यक् च ज्ञानवैराग्यं धर्मोऽयं भिक्षुके मतः

bhaikṣyaṁ śrutaṁ ca maunitvaṁ tapo dhyānaṁ viśeṣataḥ .. samyak ca jñānavairāgyaṁ dharmo'yaṁ bhikṣuke mataḥ

भिक्षा, वेद-श्रवण, मौन, तप, विशेषतः ध्यान, तथा सम्यक् ज्ञान और वैराग्य — यही भिक्षु का धर्म माना गया है।

श्लोक 17 (garuda.1.49.17)

ज्ञानसन्यासिनः केचिद्वेदसन्यासिनोऽपरे ।। कर्मसन्यासिनः केचित्त्रिविधः पारमेष्ठिकः

jñānasanyāsinaḥ kecidvedasanyāsino'pare .. karmasanyāsinaḥ kecittrividhaḥ pārameṣṭhikaḥ

कोई ज्ञान-संन्यासी हैं, कोई वेद-संन्यासी, और कोई कर्म-संन्यासी — इस प्रकार पारमेष्ठिक तीन प्रकार का है।

श्लोक 18 (garuda.1.49.18)

योगी च त्रिविधो ज्ञेयो भौतिकः क्षत्त्र एवं च ।। तृतीयोऽन्त्याश्रमी प्रोक्तो योगमूर्त्तिंसमास्थितः

yogī ca trividho jñeyo bhautikaḥ kṣattra evaṁ ca .. tṛtīyo'ntyāśramī prokto yogamūrttiṁsamāsthitaḥ

योगी भी तीन प्रकार का जानना चाहिए — भौतिक और क्षत्र; तीसरा अन्तिम आश्रमी कहा गया है, जो योग-स्वरूप में स्थित है।

श्लोक 19 (garuda.1.49.19)

प्रथमा भावना पूर्वे मोक्षे त्वक्ष(दुष्क) रभावना ।। तृतीये चान्तिमा प्रोक्ता भावना पारमेश्वरी

prathamā bhāvanā pūrve mokṣe tvakṣa(duṣka) rabhāvanā .. tṛtīye cāntimā proktā bhāvanā pārameśvarī

पहली भावना पूर्व (आश्रम) की है, मोक्ष में कठिन भावना होती है, और तीसरी में अन्तिम, परमेश्वर-केन्द्रित भावना कही गई है।

श्लोक 20 (garuda.1.49.20)

धर्मात्संजायते मोक्षो ह्यर्थात्कामोऽभिजायते ।। प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्विविधं कर्म वैदिकम्

dharmātsaṁjāyate mokṣo hyarthātkāmo'bhijāyate .. pravṛttiśca nivṛttiśca dvividhaṁ karma vaidikam

धर्म से मोक्ष उत्पन्न होता है, और अर्थ से काम उत्पन्न होता है। प्रवृत्ति और निवृत्ति — वैदिक कर्म दो प्रकार का है।

श्लोक 21 (garuda.1.49.21)

ज्ञानं पूर्वं निवृत्तं स्यात्प्रवृत्तं चाग्निदेवकृत् ।। क्षमा दमो दया दानमलोभा (भो) भ्यास एव च

jñānaṁ pūrvaṁ nivṛttaṁ syātpravṛttaṁ cāgnidevakṛt .. kṣamā damo dayā dānamalobhā (bho) bhyāsa eva ca

पूर्व का ज्ञान निवृत्ति-सम्बन्धी होता है, और प्रवृत्ति अग्नि-देवता-सम्बन्धी कर्मों से युक्त होती है। क्षमा, दम, दया, दान, लोभ-रहितता का अभ्यास,

श्लोक 22 (garuda.1.49.22)

आर्जवं चान्सूया च तीर्थानुसरणं तथा ।। सत्यं संतोष आस्तिक्यं तथा चेन्द्रियनिग्रहः

ārjavaṁ cānsūyā ca tīrthānusaraṇaṁ tathā .. satyaṁ saṁtoṣa āstikyaṁ tathā cendriyanigrahaḥ

सरलता, ईर्ष्या-रहितता, तथा तीर्थों का अनुसरण; सत्य, संतोष, आस्तिकता, तथा इन्द्रिय-निग्रह,

श्लोक 23 (garuda.1.49.23)

देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः ।। अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमरूक्षता

devatābhyarcanaṁ pūjā brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ .. ahiṁsā priyavāditvamapaiśunyamarūkṣatā

देवताओं की अर्चना, विशेषतः ब्राह्मणों की पूजा; अहिंसा, प्रिय-भाषण, चुगली से मुक्ति, और कठोरता का अभाव —

श्लोक 24 (garuda.1.49.24)

एते आश्रमिका धर्माश्चतुर्वर्ण्यं ब्रवीम्यतः ।। प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्

ete āśramikā dharmāścaturvarṇyaṁ bravīmyataḥ .. prājāpatyaṁ brāhmaṇānāṁ smṛtaṁ sthānaṁ kriyāvatām

ये आश्रमों के धर्म हैं; अब मैं चारों वर्णों (के धर्म) का वर्णन करता हूँ। कर्मशील ब्राह्मणों का स्थान प्राजापत्य (प्रजापति-लोक) स्मरण किया गया है।

श्लोक 25 (garuda.1.49.25)

स्थानमैन्द्रं क्षत्त्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम् ।। वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधरममनुवर्त्तताम्

sthānamaindraṁ kṣattriyāṇāṁ saṁgrāmeṣvapalāyinām .. vaiśyānāṁ mārutaṁ sthānaṁ svadharamamanuvarttatām

युद्ध में पीठ न दिखाने वाले क्षत्रियों का स्थान ऐन्द्र है; अपने धर्म का पालन करने वाले वैश्यों का स्थान मारुत (वायु-लोक) है।

श्लोक 26 (garuda.1.49.26)

गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचारे च वर्त्तताम् ।। अष्टाशीतिसहस्त्राणामृषीणामूर्द्ध्वरेतसाम्

gāndharvaṁ śūdrajātīnāṁ paricāre ca varttatām .. aṣṭāśītisahastrāṇāmṛṣīṇāmūrddhvaretasām

सेवा में लगे शूद्र-जाति वालों का स्थान गान्धर्व है। अठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषियों का,

श्लोक 27 (garuda.1.49.27)

स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव वन (गुरु) वासिनाम् ।। सप्तर्षोणां तु यत्स्थानं स्थानं तद्वै वनौकसाम्

smṛtaṁ teṣāṁ tu yatsthānaṁ tadeva vana (guru) vāsinām .. saptarṣoṇāṁ tu yatsthānaṁ sthānaṁ tadvai vanaukasām

जो स्थान स्मरण किया गया है, वही वन-निवासियों (गुरु-कुल-वासियों) का भी है; और सप्तर्षियों का जो स्थान है, वही वनवासियों का भी स्थान है।

श्लोक 28 (garuda.1.49.28)

यतीनां यतचित्तानां न्यासिनामूर्द्ध्वरेतसाम् ।। आनन्दं ब्रह्म तत्स्थानं यस्मान्नावर्त्तते मुनिः

yatīnāṁ yatacittānāṁ nyāsināmūrddhvaretasām .. ānandaṁ brahma tatsthānaṁ yasmānnāvarttate muniḥ

संयत-चित्त यतियों का, ऊर्ध्वरेता संन्यासियों का — आनन्दमय ब्रह्म ही उनका स्थान है, जहाँ से मुनि लौटकर नहीं आता।

श्लोक 29 (garuda.1.49.29)

योगिनाममृतस्थानं व्योमाख्यं परमाक्षरम् ।। आनन्दमैश्वरं यस्मान्मुक्तो नावर्त्तते नरः

yogināmamṛtasthānaṁ vyomākhyaṁ paramākṣaram .. ānandamaiśvaraṁ yasmānmukto nāvarttate naraḥ

योगियों का अमृत-स्थान आकाश नामक परम अक्षर तत्त्व है — ऐश्वर्यमय आनन्द, जहाँ से मुक्त पुरुष लौटकर नहीं आता।

श्लोक 30 (garuda.1.49.30)

मुक्तिरष्टाङ्गविज्ञानात्संक्षेपात्तद्वदे श्रृणु ।। यमाः पञ्च त्वहिंसाद्या अहिंसा प्राण्यहिंसनम्

muktiraṣṭāṅgavijñānātsaṁkṣepāttadvade śrṛṇu .. yamāḥ pañca tvahiṁsādyā ahiṁsā prāṇyahiṁsanam

मुक्ति अष्टांग योग के ज्ञान से प्राप्त होती है; उसे संक्षेप में कहता हूँ, सुनो। अहिंसा आदि पाँच यम हैं — अहिंसा प्राणियों को न सताना है।

श्लोक 31 (garuda.1.49.31)

सत्यं भूतहितं वाक्यमस्तेयं स्वाग्रहं परम् ।। अमैथुनं ब्रह्मचर्य्यं सर्वत्यागोऽपरिग्रहः

satyaṁ bhūtahitaṁ vākyamasteyaṁ svāgrahaṁ param .. amaithunaṁ brahmacaryyaṁ sarvatyāgo'parigrahaḥ

सत्य प्राणियों के हित की वाणी है; अस्तेय अपनी ही (इच्छाओं के प्रति) अत्यधिक आग्रह का अभाव है; ब्रह्मचर्य मैथुन का त्याग है; अपरिग्रह सर्वस्व-त्याग है।

श्लोक 32 (garuda.1.49.32)

नियमाः पञ्च सत्याद्या बाह्यमाभ्यन्तरं द्विधा ।। शौचं तुष्टिश्च सन्तोषस्तपश्चोंद्रियनिग्रहः

niyamāḥ pañca satyādyā bāhyamābhyantaraṁ dvidhā .. śaucaṁ tuṣṭiśca santoṣastapaścoṁdriyanigrahaḥ

सत्य आदि पाँच नियम हैं, बाह्य और आभ्यन्तर — दो प्रकार के। शौच, तुष्टि और संतोष, तप, तथा इन्द्रिय-निग्रह,

श्लोक 33 (garuda.1.49.33)

स्वाध्यायः स्यान्मन्त्रजापः प्रणिधानं हरेर्यजिः ।। आसनं पद्मकाद्युक्तं प्राणायामो मरुज्जयः

svādhyāyaḥ syānmantrajāpaḥ praṇidhānaṁ hareryajiḥ .. āsanaṁ padmakādyuktaṁ prāṇāyāmo marujjayaḥ

स्वाध्याय — जो मन्त्र-जप है, और प्रणिधान — जो हरि की उपासना है। पद्मासन आदि आसन हैं; प्राणायाम श्वास पर विजय है।

श्लोक 34 (garuda.1.49.34)

मन्त्रध्यान तो गर्भो विपरीतो ह्यगर्भकः ।। एवं द्विधा त्रिधाप्युक्तं पुरणात्पूरकः स च

mantradhyāna to garbho viparīto hyagarbhakaḥ .. evaṁ dvidhā tridhāpyuktaṁ puraṇātpūrakaḥ sa ca

मन्त्र-ध्यान सहित (श्वास) सगर्भ है, इसके विपरीत अगर्भ है। इस प्रकार यह दो प्रकार का, और तीन प्रकार का भी कहा गया है — भरने से पूरक,

श्लोक 35 (garuda.1.49.35)

कुम्भको निश्चलत्वाच्च रेचनाद्रेचकस्त्रिधा ।। लघुर्द्वादशमात्रः स्याच्चतुर्विंशतिकः परः

kumbhako niścalatvācca recanādrecakastridhā .. laghurdvādaśamātraḥ syāccaturviṁśatikaḥ paraḥ

स्थिरता से कुम्भक, और निकालने से रेचक — यह तीन प्रकार का है। लघु (श्वास) बारह मात्राओं का होता है, उससे बड़ा चौबीस मात्राओं का,

श्लोक 36 (garuda.1.49.36)

षट्त्रिंशन्मात्रिकः श्रेष्ठः प्रत्याहारश्च रोधनम् ।। ब्रह्मात्मचिन्ता ध्यानं स्याद्धारणा मनसो धृतिः

ṣaṭtriṁśanmātrikaḥ śreṣṭhaḥ pratyāhāraśca rodhanam .. brahmātmacintā dhyānaṁ syāddhāraṇā manaso dhṛtiḥ

और सर्वश्रेष्ठ छत्तीस मात्राओं का होता है। प्रत्याहार इन्द्रियों का निरोध है। ब्रह्म को आत्मा मानकर उसका चिन्तन ध्यान है; मन की स्थिरता धारणा है।

श्लोक 37 (garuda.1.49.37)

अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिर्ब्रह्मणः स्थितिः ।। अहमात्मा परं ब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तकम्

ahaṁ brahmetyavasthānaṁ samādhirbrahmaṇaḥ sthitiḥ .. ahamātmā paraṁ brahma satyaṁ jñānamanantakam

'मैं ब्रह्म हूँ' — इस अवस्था में स्थिर रहना ही समाधि है, ब्रह्म में स्थिति है। 'मैं ही आत्मा, परम ब्रह्म, सत्य, ज्ञान, अनन्त हूँ;

श्लोक 38 (garuda.1.49.38)

ब्रह्म विज्ञानमानन्दः स तत्त्वमसि केवलम् ।। अहं ब्रह्मास्म्यहं ब्रह्म अशरीरमानिन्द्रियम्

brahma vijñānamānandaḥ sa tattvamasi kevalam .. ahaṁ brahmāsmyahaṁ brahma aśarīramānindriyam

ब्रह्म विज्ञान और आनन्द है, वही तत्त्वमसि केवल है। मैं ब्रह्म हूँ, मैं ही ब्रह्म हूँ — शरीर-रहित, इन्द्रिय-रहित,

श्लोक 39 (garuda.1.49.39)

अहम्मनोबुद्धिमहदहङ्कारादिवर्जितम् ।। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादियुक्तज्योतिस्तदीयकम्

ahammanobuddhimahadahaṅkārādivarjitam .. jāgratsvapnasuṣuptyādiyuktajyotistadīyakam

मन, बुद्धि, महत् और अहंकार आदि से रहित; जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं से युक्त उसकी ज्योति —

श्लोक 40 (garuda.1.49.40)

नित्यं शुद्धं बुद्धमुक्तं सत्यमानन्दमद्वयम् ।। योऽसावादित्यपुरुषः सोऽसावहमखण्डितम् ।। इति ध्यायन्विमुच्येत् ब्राह्मणो भवबन्धनात्

nityaṁ śuddhaṁ buddhamuktaṁ satyamānandamadvayam .. yo'sāvādityapuruṣaḥ so'sāvahamakhaṇḍitam .. iti dhyāyanvimucyet brāhmaṇo bhavabandhanāt

नित्य, शुद्ध, जाग्रत, मुक्त, सत्य, आनन्दमय, अद्वैत। जो वह आदित्य-पुरुष है, वही मैं हूँ, अखण्ड।' — ऐसा ध्यान करते हुए ब्राह्मण संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50