पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 79
स्फटिक-परीक्षण
श्लोक 1 (garuda.1.79.1)
॥ सूत उवाच ॥ कावेरविन्ध्ययवनचीननेपालभूमिषु ॥ लाङ्गली व्यकिरन्मेदो दानवस्य प्रयत्नतः
. sūta uvāca . kāveravindhyayavanacīnanepālabhūmiṣu . lāṅgalī vyakiranmedo dānavasya prayatnataḥ
सूत ने कहा — कावेरी, विन्ध्य, यवन, चीन और नेपाल की भूमियों में, हलधारी ने दैत्य की चर्बी को प्रयत्नपूर्वक बिखेर दिया।
श्लोक 2 (garuda.1.79.2)
आकाशशुद्धं तैलाख्यमुत्पन्नं स्फटिकं ततः ॥ मृणालशङ्खधवलं किञ्चिद्वर्णान्तरन्वितम्
ākāśaśuddhaṁ tailākhyamutpannaṁ sphaṭikaṁ tataḥ . mṛṇālaśaṅkhadhavalaṁ kiñcidvarṇāntaranvitam
उससे आकाश के समान शुद्ध, 'तैल' नामक स्फटिक उत्पन्न हुआ — कमल-नाल अथवा शंख के समान श्वेत, कुछ भिन्न वर्णों से युक्त भी।
श्लोक 3 (garuda.1.79.3)
न त्तुल्यं हि रत्नानामथवा पापनाशनम् ॥ संस्कृतं शिल्पिना सद्यो मूल्यं किञ्चिल्लभेत्ततः (दा)
na ttulyaṁ hi ratnānāmathavā pāpanāśanam . saṁskṛtaṁ śilpinā sadyo mūlyaṁ kiñcillabhettataḥ (dā)
यह अन्य रत्नों के समान (मूल्यवान) तो नहीं है, फिर भी यह पाप का नाशक है। शिल्पी द्वारा संस्कारित किए जाने पर यह तुरन्त कुछ मूल्य प्राप्त कर लेता है।