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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 82

गया माहात्म्य (प्रथम) — गयासुर-वध

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

श्लोक 1 (garuda.1.82.1)

श्रीगणेशाय नमः । ब्रह्मोवाच । सारात्सारतरं व्यास गयामाहात्म्यमुत्तमम् । प्रवक्ष्यामि समासेन भुक्तिमुक्तिप्रदं श्रृणु

śrīgaṇeśāya namaḥ brahmovāca sārātsārataraṁ vyāsa gayāmāhātmyamuttamam pravakṣyāmi samāsena bhuktimuktipradaṁ śrṛṇu

श्री गणेश जी को नमस्कार। ब्रह्मा जी ने कहा — हे व्यास! मैं सारों के सार, गया के उत्तम माहात्म्य को, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है, संक्षेप में कहूँगा; सुनो।

श्लोक 2 (garuda.1.82.2)

गयासुरोऽभवत्पूर्वं वीर्य्यवान्परमः स च । तपस्तप्यन्महाघोरं सर्वभूतोपतापनम्

gayāsuro'bhavatpūrvaṁ vīryyavānparamaḥ sa ca tapastapyanmahāghoraṁ sarvabhūtopatāpanam

पूर्वकाल में गयासुर नामक एक परम बलवान असुर था। उसने ऐसी महाघोर तपस्या की, जो समस्त प्राणियों को संतप्त करने वाली थी।

श्लोक 3 (garuda.1.82.3)

तत्तपस्तापिता देवास्तद्वधार्थं हरिं गताः । शरणं हरिरूचे तान् भवितव्यं शिवात्मभइः

tattapastāpitā devāstadvadhārthaṁ hariṁ gatāḥ śaraṇaṁ harirūce tān bhavitavyaṁ śivātmabhaiḥ

उस तपस्या से संतप्त होकर देवगण उसके वध हेतु हरि की शरण में गए। शरणागत उन देवताओं से हरि ने कहा — 'यह अवश्य होगा, शुभ रीति से।'

श्लोक 4 (garuda.1.82.4)

पात्यतेऽस्य महादेहो तथेत्यूचुः सुरा हरिम् । कदाचिच्छिवपूजार्थं क्षीराब्धेः कमलानि च

pātyate'sya mahādeho tathetyūcuḥ surā harim kadācicchivapūjārthaṁ kṣīrābdheḥ kamalāni ca

'इसका महाशरीर गिराया जाएगा' — ऐसा कहकर देवताओं ने हरि से 'वैसा ही हो' कहा। एक बार शिव-पूजा के निमित्त क्षीरसागर से कमल लाकर —

श्लोक 5 (garuda.1.82.5)

आनीय कीकटे देशे शयनं चाकरोद्वली । विष्णुमायाविमूढोऽसौ गदया विष्णुना हतः

ānīya kīkaṭe deśe śayanaṁ cākarodvalī viṣṇumāyāvimūḍho'sau gadayā viṣṇunā hataḥ

उन कमलों को कीकट देश में ले जाकर उस बलवान असुर ने अपनी शय्या बनाई। विष्णु की माया से मोहित होकर वह विष्णु द्वारा गदा से मारा गया।

श्लोक 6 (garuda.1.82.6)

अतो गदाधरो विष्णुर्गयायां मुक्तिदः स्थितः । तस्य देहो लिङ्गरूपी स्थितः शुद्धे पितामहः

ato gadādharo viṣṇurgayāyāṁ muktidaḥ sthitaḥ tasya deho liṅgarūpī sthitaḥ śuddhe pitāmahaḥ

इसीलिए गदाधर विष्णु गया में मुक्तिदाता के रूप में स्थित हैं। उस असुर का शरीर वहाँ लिंगरूप में स्थित है, और पितामह ब्रह्मा शुद्ध क्षेत्र में स्थित हैं।

श्लोक 7 (garuda.1.82.7)

जनार्द्दनश्च कालेशस्तथान्यः प्रपितामहः । विष्णुराहाथ मर्य्यादां पुण्यक्षेत्रं भविष्यति

janārddanaśca kāleśastathānyaḥ prapitāmahaḥ viṣṇurāhātha maryyādāṁ puṇyakṣetraṁ bhaviṣyati

जनार्दन, कालेश और साथ ही प्रपितामह भी वहाँ हैं। तब विष्णु ने यह मर्यादा घोषित की — 'यह पुण्यक्षेत्र होगा।'

श्लोक 8 (garuda.1.82.8)

यज्ञं श्राद्धं पिण्डदानं स्नानादि कुरुते नरः । स स्वर्गं ब्रह्मलोकं च गच्छेन्न नरकं नरः

yajñaṁ śrāddhaṁ piṇḍadānaṁ snānādi kurute naraḥ sa svargaṁ brahmalokaṁ ca gacchenna narakaṁ naraḥ

जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान और स्नान आदि करता है, वह स्वर्ग और ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, नरक को नहीं।

श्लोक 9 (garuda.1.82.9)

गयातीर्थं परं ज्ञात्वा यागं चक्रे पितामहः । ब्राह्मणान्पूजयामास ऋत्विगर्थमुपागतान्

gayātīrthaṁ paraṁ jñātvā yāgaṁ cakre pitāmahaḥ brāhmaṇānpūjayāmāsa ṛtvigarthamupāgatān

गयातीर्थ को परम जानकर पितामह ब्रह्मा ने वहाँ यज्ञ किया, और ऋत्विक् बनकर आए हुए ब्राह्मणों का पूजन किया।

श्लोक 10 (garuda.1.82.10)

महानदीं रसवहां सृष्ट्वा वाप्यादिकं तथा । भक्ष्यभोज्यफलादींश्च कामधेनुं तथासृजत्

mahānadīṁ rasavahāṁ sṛṣṭvā vāpyādikaṁ tathā bhakṣyabhojyaphalādīṁśca kāmadhenuṁ tathāsṛjat

उन्होंने रसवाहिनी महानदी की रचना की, तथा वापी आदि जलाशयों की भी; भक्ष्य, भोज्य, फल आदि की तथा कामधेनु की भी रचना की।

श्लोक 11 (garuda.1.82.11)

पञ्चक्रोशं गया क्षेत्रं ब्राह्मणेभ्यो ददौ प्रभुः । धर्मयागेषु लोभात्तु प्रतिगृह्य धनादिकम्

pañcakrośaṁ gayā kṣetraṁ brāhmaṇebhyo dadau prabhuḥ dharmayāgeṣu lobhāttu pratigṛhya dhanādikam

प्रभु ब्रह्मा ने पंचक्रोश गया क्षेत्र ब्राह्मणों को दान दिया। किन्तु धर्म-यज्ञों में लोभवश धन आदि ग्रहण करके —

श्लोक 12 (garuda.1.82.12)

स्थिता विप्रास्तदा शप्ता गयायां ब्राह्मणास्ततः । मा भूत्त्रैपुरुषी विद्या मा भूत्त्रैपुरुषं धनम्

sthitā viprāstadā śaptā gayāyāṁ brāhmaṇāstataḥ mā bhūttraipuruṣī vidyā mā bhūttraipuruṣaṁ dhanam

वहाँ बसे हुए ब्राह्मणों को गया में तब शाप दिया गया — 'तुम्हारी विद्या तीन पीढ़ी न चले, तुम्हारा धन तीन पीढ़ी न चले;

श्लोक 13 (garuda.1.82.13)

युष्माकं स्याद्वारिवहा नदी पाषाणपर्वतः । शप्तैस्तु प्रार्थितो ब्रह्मानुग्रहं कृतवान्प्रभुः

yuṣmākaṁ syādvārivahā nadī pāṣāṇaparvataḥ śaptaistu prārthito brahmānugrahaṁ kṛtavānprabhuḥ

तुम्हारी नदी केवल पाषाण-पर्वतों पर जल बहाने वाली हो।' शापित उन ब्राह्मणों की प्रार्थना पर प्रभु ब्रह्मा ने अनुग्रह किया।

श्लोक 14 (garuda.1.82.14)

लोकाः पुण्या गयायां हि श्राद्धिनो ब्रह्मलोकगाः । युष्मान्ये पूजयिष्यन्ति तैरहं पूजितः सदा

lokāḥ puṇyā gayāyāṁ hi śrāddhino brahmalokagāḥ yuṣmānye pūjayiṣyanti tairahaṁ pūjitaḥ sadā

'गया के लोक पुण्यमय ही हैं; श्राद्ध करने वाले ब्रह्मलोक को जाते हैं। जो तुम्हारा पूजन करेंगे, उनसे मैं सदा पूजित मानूँगा।'

श्लोक 15 (garuda.1.82.15)

ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोगृहे मरणं तथा । वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा

brahmajñānaṁ gayāśrāddhaṁ gogṛhe maraṇaṁ tathā vāsaḥ puṁsāṁ kurukṣetre muktireṣā caturvidhā

ब्रह्मज्ञान, गया में श्राद्ध, गोशाला में मृत्यु, तथा कुरुक्षेत्र में निवास — यह मनुष्यों के लिए चार प्रकार की मुक्ति है।

श्लोक 16 (garuda.1.82.16)

समुद्राः सरितः सर्वा वापीकूपह्रदास्तथा । स्नातुकामा गयातीर्थं व्यास यान्ति न संशयः

samudrāḥ saritaḥ sarvā vāpīkūpahradāstathā snātukāmā gayātīrthaṁ vyāsa yānti na saṁśayaḥ

हे व्यास! समस्त समुद्र, नदियाँ, वापी, कूप और सरोवर, स्नान की कामना से निःसंदेह गयातीर्थ को जाते हैं।

श्लोक 17 (garuda.1.82.17)

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः । पापं तत्सङ्गजं सर्वं गयाश्राद्धाद्विनश्यति

brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ pāpaṁ tatsaṅgajaṁ sarvaṁ gayāśrāddhādvinaśyati

ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी, गुरुपत्नीगमन, और इनके संसर्ग से उत्पन्न समस्त पाप — गया में श्राद्ध करने से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 18 (garuda.1.82.18)

असंस्कृता मृता य च पशुचोरहताश्च ये । सर्पदष्टा गयाश्राद्धान्मुक्ताः स्वर्गं व्रजन्ति ते

asaṁskṛtā mṛtā ya ca paśucorahatāśca ye sarpadaṣṭā gayāśrāddhānmuktāḥ svargaṁ vrajanti te

जो संस्कारविहीन मरे हैं, जो पशुओं या चोरों द्वारा मारे गए हैं, और जो सर्पदंश से मरे हैं — वे गया-श्राद्ध से मुक्त होकर स्वर्ग जाते हैं।

श्लोक 19 (garuda.1.82.19)

गयायां पिण्डदानेन यत्फलं लभते नरः । न तच्छक्यं मया वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि

gayāyāṁ piṇḍadānena yatphalaṁ labhate naraḥ na tacchakyaṁ mayā vaktuṁ varṣakoṭiśatairapi

गया में पिण्डदान से मनुष्य जो फल पाता है, उसे मैं सौ करोड़ वर्षों में भी कहने में समर्थ नहीं हूँ।

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