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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 85

गया माहात्म्य (चतुर्थ) — समस्त प्रेतगणों के लिए आवाहन-मन्त्र

अध्याय 84अध्याय-सूचीअध्याय 86

श्लोक 1 (garuda.1.85.1)

ब्रह्मोवाच । स्नात्वा प्रेतशिलादौ तु वरुणास्थामृतेन च । पिण्डं दद्यादिमैर्मन्त्रैरावाह्य च पितॄन्परान्

brahmovāca snātvā pretaśilādau tu varuṇāsthāmṛtena ca piṇḍaṁ dadyādimairmantrairāvāhya ca pitṝnparān

ब्रह्मा जी ने कहा — प्रेतशिला आदि में स्नान करके और वरुण के अमृत-जल से पवित्र होकर, इन मन्त्रों से परम पितरों का आवाहन करके पिण्डदान करना चाहिए —

श्लोक 2 (garuda.1.85.2)

अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते । आवाहयिष्येतान्सर्वान् दर्भपृष्ठे तिलोदकैः

asmatkule mṛtā ye ca gatiryeṣāṁ na vidyate āvāhayiṣyetānsarvān darbhapṛṣṭhe tilodakaiḥ

'हमारे कुल में जो मरे हैं और जिनकी गति ज्ञात नहीं है, उन सबका मैं दर्भ के ऊपर तिल और जल से आवाहन करता हूँ।'

श्लोक 3 (garuda.1.85.3)

पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे च ये मृताः । तेषामुद्धरणार्थाये इमं पिण्डं ददाम्यहम्

pitṛvaṁśe mṛtā ye ca mātṛvaṁśe ca ye mṛtāḥ teṣāmuddharaṇārthāye imaṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'पितृवंश में जो मरे हैं और मातृवंश में जो मरे हैं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 4 (garuda.1.85.4)

मातामहकुले ये च गतिर्येषां न विद्यते । तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्

mātāmahakule ye ca gatiryeṣāṁ na vidyate teṣāmuddharaṇārthāya imaṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'नाना के कुल में जो हैं और जिनकी गति ज्ञात नहीं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 5 (garuda.1.85.5)

अजातदन्ता ये केचिद्ये च गर्भे प्रपीडिताः । तेषामुद्धरणार्थाय इम पिण्डं ददाम्यहम्

ajātadantā ye kecidye ca garbhe prapīḍitāḥ teṣāmuddharaṇārthāya ima piṇḍaṁ dadāmyaham

'जिनके दाँत नहीं निकले थे, और जो गर्भ में ही पीड़ित होकर मर गए — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 6 (garuda.1.85.6)

बन्धुवर्गाश्च ये केचिन्नामगोत्रविवर्जिताः । स्वगोत्रे परगोत्रे वा गतिर्येषां न विद्यते । तेषामुद्धरणार्थाय इम पिण्डं ददाम्यहम्

bandhuvargāśca ye kecinnāmagotravivarjitāḥ svagotre paragotre vā gatiryeṣāṁ na vidyate teṣāmuddharaṇārthāya ima piṇḍaṁ dadāmyaham

'नाम-गोत्रविहीन जो कोई भी बन्धुजन हैं, चाहे स्वगोत्र में हों या परगोत्र में, जिनकी गति ज्ञात नहीं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 7 (garuda.1.85.7)

उद्बन्धनमृता ये च विषशस्रहताश्च ये । आत्मोपघातिनो ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्

udbandhanamṛtā ye ca viṣaśasrahatāśca ye ātmopaghātino ye ca tebhyaḥ piṇḍaṁ dadāmyaham

'फाँसी लगाकर मरे हैं जो, विष या शस्त्र से मारे गए हैं जो, और जिन्होंने आत्मघात किया है — उनको मैं पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 8 (garuda.1.85.8)

अग्निदाहे मृता ये च सिंहव्याघ्रहताश्चये । दंष्ट्रिभिः श्रृङ्गिभिर्वापि तेषां पिण्डं ददाम्यहम्

agnidāhe mṛtā ye ca siṁhavyāghrahatāścaye daṁṣṭribhiḥ śrṛṅgibhirvāpi teṣāṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'अग्नि में जलकर मरे हैं जो, सिंह-व्याघ्र से मारे गए हैं जो, दाढ़ों या सींगों वाले पशुओं से मारे गए हैं जो — उनको मैं पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 9 (garuda.1.85.9)

अग्निदग्धाश्च ये केचिन्नाग्निदग्धास्तथापरे । विद्युच्चौरहता ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्

agnidagdhāśca ye kecinnāgnidagdhāstathāpare vidyuccaurahatā ye ca tebhyaḥ piṇḍaṁ dadāmyaham

'जो अग्नि से दग्ध हुए और जो अग्नि से दग्ध नहीं हुए, और जो बिजली गिरने या चोरों द्वारा मारे गए — उनको मैं पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 10 (garuda.1.85.10)

रौरवे चान्धतामिस्त्रे कालसूत्रे च ये गताः । तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्

raurave cāndhatāmistre kālasūtre ca ye gatāḥ teṣāmuddharaṇārthāya imaṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'जो रौरव, अन्धतामिस्र और कालसूत्र नरकों में गए हैं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 11 (garuda.1.85.11)

असिपत्रवने घोरे कुम्भीपाके च ये गताः । तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्

asipatravane ghore kumbhīpāke ca ye gatāḥ teṣāmuddharaṇārthāya imaṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'जो भयंकर असिपत्रवन और कुम्भीपाक में गए हैं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 12 (garuda.1.85.12)

अन्येषां यातना स्थानां प्रेतलोकनिवासिनाम् । तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्

anyeṣāṁ yātanā sthānāṁ pretalokanivāsinām teṣāmuddharaṇārthāya imaṁ piṇḍaṁ dadāmyaham

'प्रेतलोक में निवास करने वाले अन्य यातना-स्थानों में जो हैं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 13 (garuda.1.85.13)

पुशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः । अथवा वृक्षयोनि स्थास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्

puśuyoniṁ gatā ye ca pakṣikīṭasarīsṛpāḥ athavā vṛkṣayoni sthāstebhyaḥ piṇḍaṁ dadāmyaham

'जो पशु-योनि को, पक्षी-कीट-सरीसृप योनि को, अथवा वृक्ष-योनि को प्राप्त हुए हैं — उनको मैं पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 14 (garuda.1.85.14)

असंख्ययातनासंस्था ये नीता यमशासनैः । तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिंडं ददाम्यहम्

asaṁkhyayātanāsaṁsthā ye nītā yamaśāsanaiḥ teṣāmuddharaṇārthāya imaṁ piṁḍaṁ dadāmyaham

'जो असंख्य यातनाओं में यम के आदेश से ले जाए गए हैं — उनके उद्धार के लिए मैं यह पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 15 (garuda.1.85.15)

जात्यन्तरसहस्त्रेषु भ्रमन्ति स्वेन कर्मणा । मानुष्यं दुर्लभं येषां तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्

jātyantarasahastreṣu bhramanti svena karmaṇā mānuṣyaṁ durlabhaṁ yeṣāṁ tebhyaḥ piṇḍaṁ dadāmyaham

'जो अपने कर्मों से हजारों अन्य जन्मों में भटकते हैं और जिन्हें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है — उनको मैं पिण्ड देता हूँ।'

श्लोक 16 (garuda.1.85.16)

ये बान्धवाऽबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते सर्वेतृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा

ye bāndhavā'bāndhavā vā ye'nyajanmani bāndhavāḥ te sarvetṛptimāyāntu piṇḍadānena sarvadā

'जो बन्धु हैं या बन्धु नहीं हैं, अथवा जो किसी अन्य जन्म में बन्धु थे — वे सब पिण्डदान से सदा तृप्ति प्राप्त करें।'

श्लोक 17 (garuda.1.85.17)

ये केचित्प्रेतरूपेण वर्त्तन्ते पितरो मम । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा

ye kecitpretarūpeṇa varttante pitaro mama te sarve tṛptimāyāntu piṇḍadānena sarvadā

'मेरे जो भी पितर प्रेत-रूप में विद्यमान हैं — वे सब पिण्डदान से सदा तृप्ति प्राप्त करें।'

श्लोक 18 (garuda.1.85.18)

ये मे पितृकुले जाताः कुले मातुस्तथैव च । गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः

ye me pitṛkule jātāḥ kule mātustathaiva ca guruśvaśurabandhūnāṁ ye cānye bāndhavā mṛtāḥ

'जो मेरे पितृकुल में उत्पन्न हुए, और जो मातृकुल में भी; गुरु, श्वसुर और बन्धुओं के जो अन्य बन्धुजन मरे हैं —'

श्लोक 19 (garuda.1.85.19)

ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्त्रदारविवर्जिताः । क्रियालो पहता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा

ye me kule luptapiṇḍāḥ puttradāravivarjitāḥ kriyālo pahatā ye ca jātyandhāḥ paṅgavastathā

'मेरे कुल में जिनका पिण्ड लुप्त हो गया है, जो पुत्र-पत्नी से रहित हैं, जिनके संस्कार-कर्म में त्रुटि रही, जो जन्मान्ध हैं और पंगु हैं —'

श्लोक 20 (garuda.1.85.20)

विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम । तेषां पिण्डं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठताम्

virūpā āmagarbhāśca jñātājñātāḥ kule mama teṣāṁ piṇḍaṁ mayā dattamakṣayyamupatiṣṭhatām

'जो विरूप हैं, जो अपरिपक्व गर्भ से जन्मे, चाहे मेरे कुल में ज्ञात हों या अज्ञात — उन सबका यह पिण्ड मेरे द्वारा दिया गया अक्षय रूप से उपस्थित रहे।'

श्लोक 21 (garuda.1.85.21)

साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा । मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता

sākṣiṇaḥ santu me devā brahmeśānādayastathā mayā gayāṁ samāsādya pitṝṇāṁ niṣkṛtiḥ kṛtā

'ब्रह्मा, ईशान आदि देवगण मेरे साक्षी हों कि मैंने गया में पहुँचकर पितरों का ऋण-मोचन कर दिया है।'

श्लोक 22 (garuda.1.85.22)

आगतोऽहं गयां देव ! पितृकार्य्ये गदाधर । तन्मे साक्षी भवत्वद्य अनृणोऽहमृणत्रयात्

āgato'haṁ gayāṁ deva ! pitṛkāryye gadādhara tanme sākṣī bhavatvadya anṛṇo'hamṛṇatrayāt

'हे देव गदाधर! मैं पितृ-कार्य के लिए गया आया हूँ। आज आप मेरे साक्षी बनें कि मैं तीनों ऋणों से मुक्त हूँ।'

श्लोक 23 (garuda.1.85.23)

महानदी ब्रह्मसरोऽक्षयो वटः प्रभासमुद्यन्तमहो ? गयाशिरः । सरस्वतीधर्मकधेनुपृष्ठा एते कुरुक्षेत्रगता गयायाम्

mahānadī brahmasaro'kṣayo vaṭaḥ prabhāsamudyantamaho ? gayāśiraḥ sarasvatīdharmakadhenupṛṣṭhā ete kurukṣetragatā gayāyām

महानदी, ब्रह्मसर, अक्षयवट, प्रभास, उदित होता हुआ [तेज] (पाठ अनिश्चित), गयाशिर, सरस्वती, धर्मक, और धेनुपृष्ठ — ये सभी, जो कुरुक्षेत्र में हैं, वही गया में भी विद्यमान हैं।

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