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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 88

कर्म और ज्ञान — रुचि तथा पितरों का संवाद

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

श्लोक 1 (garuda.1.88.1)

सूत उवाच । हरिर्मन्वन्तराण्याह ब्रह्मादिभ्यो हराय च । मार्कण्डेयः पितृस्तो त्रं क्रौञ्चुकिं प्राह तच्छृणु

sūta uvāca harirmanvantarāṇyāha brahmādibhyo harāya ca mārkaṇḍeyaḥ pitṛsto traṁ krauñcukiṁ prāha tacchṛṇu

सूत जी ने कहा — हरि ने ब्रह्मा आदि को तथा हर (शिव) को मन्वन्तरों का वर्णन किया। अब मार्कण्डेय ने क्रौंचुकि को जो पितृस्तोत्र कहा, उसे सुनो।

श्लोक 2 (garuda.1.88.2)

मार्कण्डेय उवाच । रुचिः प्रजापतिः पूर्वं निर्ममो निरहंकृतिः । अत्रस्तोऽमितमायी च चचार पृथिवीमिमाम्

mārkaṇḍeya uvāca ruciḥ prajāpatiḥ pūrvaṁ nirmamo nirahaṁkṛtiḥ atrasto'mitamāyī ca cacāra pṛthivīmimām

मार्कण्डेय ने कहा — पूर्वकाल में रुचि नामक प्रजापति, ममता और अहंकार से रहित, निर्भय और असीम तपोबल से युक्त, इस पृथ्वी पर विचरण करते थे।

श्लोक 3 (garuda.1.88.3)

अनग्निमनिकेतं तमेकाहारमनाश्रमम् । विमुक्तसङ्गं तं दृष्ट्वा प्रोचुः स्वपितरो मुनिम्

anagnimaniketaṁ tamekāhāramanāśramam vimuktasaṅgaṁ taṁ dṛṣṭvā procuḥ svapitaro munim

अग्निरहित, गृहरहित, एक बार भोजन करने वाले, आश्रमविहीन, और सर्वसंगरहित उस मुनि को देखकर उनके पितरों ने कहा —

श्लोक 4 (garuda.1.88.4)

पितर ऊचुः । वत्स कस्मात्त्वया पुण्यो न कृतो दार संग्रहः । स्वर्गापवर्गहे (से)तुत्वाद्वन्धस्तेनानिशं (निमिषं) विना

pitara ūcuḥ vatsa kasmāttvayā puṇyo na kṛto dāra saṁgrahaḥ svargāpavargahe (se)tutvādvandhastenāniśaṁ (nimiṣaṁ) vinā

पितरों ने कहा — 'हे वत्स! तुमने पुण्यकर्म विवाह क्यों नहीं किया? यह स्वर्ग और मोक्ष दोनों का सेतु है; इसके बिना निरंतर बन्धन ही रहता है।'

श्लोक 5 (garuda.1.88.5)

गृही समस्तदेवानां पितॄणां च तथार्हणम् । ऋषीणामर्थिनां चैव कुर्वल्लो कानवाप्नुयात्

gṛhī samastadevānāṁ pitṝṇāṁ ca tathārhaṇam ṛṣīṇāmarthināṁ caiva kurvallo kānavāpnuyāt

'गृहस्थ, समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और याचकों का यथोचित पूजन करते हुए, सभी लोकों को प्राप्त कर लेता है।'

श्लोक 6 (garuda.1.88.6)

स्वाहोच्चारणतो देवान्स्वधोच्चारणतः पितृन् । विभजत्यन्नदानेन भृत्याद्यानतिथीनपि

svāhoccāraṇato devānsvadhoccāraṇataḥ pitṛn vibhajatyannadānena bhṛtyādyānatithīnapi

'स्वाहा के उच्चारण से देवताओं को, स्वधा के उच्चारण से पितरों को, तथा अन्नदान से सेवकों और अतिथियों को भी वह अपना भाग देता है।'

श्लोक 7 (garuda.1.88.7)

सत्त्वं दैवादृणाद्वन्धमिममस्मदृणादपि । अवाप्तोऽसि मनुष्यर्षे भूतेभ्यश्च दिनेदिने

sattvaṁ daivādṛṇādvandhamimamasmadṛṇādapi avāpto'si manuṣyarṣe bhūtebhyaśca dinedine

'हे मनुष्यों में श्रेष्ठ! तुमने देवताओं के ऋण से, हमारे ऋण से, तथा प्रतिदिन समस्त प्राणियों के ऋण से यह बन्धन प्राप्त किया है।'

श्लोक 8 (garuda.1.88.8)

अनुत्पाद्य सुतान्देवानसन्तर्प्य पितॄस्तथा । अकृत्वा च कथं मौण्ड्यं स्वर्गतिं प्राप्तुमिच्छसि

anutpādya sutāndevānasantarpya pitṝstathā akṛtvā ca kathaṁ mauṇḍyaṁ svargatiṁ prāptumicchasi

'पुत्र उत्पन्न किए बिना, देवताओं और पितरों को तृप्त किए बिना, और यह कर्तव्य पूरा किए बिना, तुम स्वर्गगति कैसे पाना चाहते हो?'

श्लोक 9 (garuda.1.88.9)

क्लेशबोधैककं पुत्रं अन्यायेन भवेत्तव । मृतस्य नरकं त्यक्त्वा क्लेशं एवान्यजन्मनि

kleśabodhaikakaṁ putraṁ anyāyena bhavettava mṛtasya narakaṁ tyaktvā kleśaṁ evānyajanmani

'तुम्हारे लिए अन्यायपूर्वक केवल क्लेश ही शेष रहेगा; मरने पर नरक को छोड़कर भी अगले जन्म में क्लेश ही मिलेगा।'

श्लोक 10 (garuda.1.88.10)

रुचिरुवाच । परिग्रहोऽतिदुः खाय पापाया धोगतेस्तथा । भवत्यतो मया पूर्वं न कृतो दारसंग्रहः

ruciruvāca parigraho'tiduḥ khāya pāpāyā dhogatestathā bhavatyato mayā pūrvaṁ na kṛto dārasaṁgrahaḥ

रुचि ने कहा — 'परिग्रह (विवाह-बन्धन) अत्यंत दुःख, पाप और अधोगति का कारण बनता है; इसीलिए मैंने अभी तक विवाह नहीं किया है।'

श्लोक 11 (garuda.1.88.11)

आत्मनः संशयोपायः क्रियते क्षणमन्त्रणात् । स्वमुक्तिहेतुर्न भवत्यसावपि परिग्रहात्

ātmanaḥ saṁśayopāyaḥ kriyate kṣaṇamantraṇāt svamuktiheturna bhavatyasāvapi parigrahāt

'क्षणिक विचार से स्वयं के लिए संशय का साधन बन जाता है; परिग्रह से अपनी मुक्ति का कारण कभी नहीं बनता।'

श्लोक 12 (garuda.1.88.12)

प्रक्षाल्यतेऽनुदिवसं य आत्मा निष्परिग्रहः । मम त्वपङ्कदिग्धोऽपि विद्याम्भोभिर्वरं हि तत्

prakṣālyate'nudivasaṁ ya ātmā niṣparigrahaḥ mama tvapaṅkadigdho'pi vidyāmbhobhirvaraṁ hi tat

'जो आत्मा निष्परिग्रह है, वह प्रतिदिन शुद्ध होता रहता है; मेरे लिए तो, भले ही कीचड़ से लिप्त न हूँ, विद्या के जल से शुद्ध होना ही श्रेष्ठ है।'

श्लोक 13 (garuda.1.88.13)

अनेकभवसंभूतकर्मपङ्काङ्कितो बुधैः । आत्मा तत्त्वज्ञानतोयैः प्रक्षाल्यो नियतेन्द्रियैः

anekabhavasaṁbhūtakarmapaṅkāṅkito budhaiḥ ātmā tattvajñānatoyaiḥ prakṣālyo niyatendriyaiḥ

'अनेक जन्मों के कर्मरूपी कीचड़ से लिप्त आत्मा को विद्वानों को संयमित इन्द्रियों सहित तत्त्वज्ञान के जल से शुद्ध करना चाहिए।'

श्लोक 14 (garuda.1.88.14)

पितर ऊचुः । युक्तं प्रक्षालनं कर्त्तुमात्मनोऽपि यतेन्द्रियैः । किं तु नोपायमार्गोऽयं यतस्त्वं पुत्र वर्त्तसे

pitara ūcuḥ yuktaṁ prakṣālanaṁ karttumātmano'pi yatendriyaiḥ kiṁ tu nopāyamārgo'yaṁ yatastvaṁ putra varttase

पितरों ने कहा — 'संयमित इन्द्रियों से आत्मा को शुद्ध करना उचित है; किन्तु यह मार्ग, जिस पर तुम चल रहे हो, उपयुक्त उपाय नहीं है।'

श्लोक 15 (garuda.1.88.15)

पञ्चयज्ञैस्तपोदानैरशुभं नुदतस्तव । फलाभिसन्धिरहितैः पूर्वकम शुभाशुभैः

pañcayajñaistapodānairaśubhaṁ nudatastava phalābhisandhirahitaiḥ pūrvakama śubhāśubhaiḥ

'पाँच यज्ञों से, फल की आसक्ति से रहित तप और दान से, तुम्हारा अशुभ कर्म तथा पूर्वजन्मों का शुभ-अशुभ दोनों दूर होता है —'

श्लोक 16 (garuda.1.88.16)

एवं न बन्धो भवति कुर्वतः कारणात्मकम् । न च बन्धाय तत्कर्म भवत्यनतिसन्निभम्

evaṁ na bandho bhavati kurvataḥ kāraṇātmakam na ca bandhāya tatkarma bhavatyanatisannibham

'इस प्रकार [कारण को समझते हुए] कर्म करने वाले को बन्धन नहीं होता; और वह कर्म अत्यधिक आसक्ति रहित होने से बन्धनकारी भी नहीं होता।'

श्लोक 17 (garuda.1.88.17)

पूर्वकर्म कृतं भोगैः क्षीयते ह्यनिशन्तथा । सुखदुः खात्मकैर्वत्स पुण्या पुण्यात्मकं नृणाम्

pūrvakarma kṛtaṁ bhogaiḥ kṣīyate hyaniśantathā sukhaduḥ khātmakairvatsa puṇyā puṇyātmakaṁ nṛṇām

'हे वत्स! मनुष्यों के पूर्वकृत पुण्य और पाप कर्म सुख-दुःखरूपी भोगों के द्वारा निरंतर क्षीण होते रहते हैं।'

श्लोक 18 (garuda.1.88.18)

एवं प्रक्षाल्यते प्राज्ञैरात्मा बन्धाच्च रक्ष्यते । रक्ष्यश्च स्वविवेकैर्न पापपङ्केन दह्यते

evaṁ prakṣālyate prājñairātmā bandhācca rakṣyate rakṣyaśca svavivekairna pāpapaṅkena dahyate

'इस प्रकार विद्वानों द्वारा आत्मा शुद्ध होती है और बन्धन से रक्षित होती है; अपने विवेक से रक्षित होकर वह पापरूपी कीचड़ से दग्ध नहीं होती।'

श्लोक 19 (garuda.1.88.19)

रुचिरुवाच । अविद्या पच्यते वेदे कर्ममार्गात्पितामहाः । तत्कथं कर्मणो मार्गे भवन्तो योजयन्ति माम्

ruciruvāca avidyā pacyate vede karmamārgātpitāmahāḥ tatkathaṁ karmaṇo mārge bhavanto yojayanti mām

रुचि ने कहा — 'हे पितामहो! वेद में अविद्या को कर्ममार्ग से पचाया (दूर किया) जाता है — तो फिर आप मुझे कर्म के मार्ग में क्यों लगाते हैं?'

श्लोक 20 (garuda.1.88.20)

पितर उचुः । अविद्या सर्वमेवैतत्कर्मणैतन्मृषा वचः । किं तु विद्यापरिप्राप्तौ हेतुः कर्म न संशयः

pitara ucuḥ avidyā sarvamevaitatkarmaṇaitanmṛṣā vacaḥ kiṁ tu vidyāpariprāptau hetuḥ karma na saṁśayaḥ

पितरों ने कहा — 'यह सब कर्म ही अविद्या है — यह कथन मिथ्या है। बल्कि विद्या की प्राप्ति में कर्म ही कारण है, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 21 (garuda.1.88.21)

विहिताकरणानर्थो न सद्भिः क्रियते तु यः । संयमो मुक्तये योऽन्यः प्रत्युताधोगतिप्रदः

vihitākaraṇānartho na sadbhiḥ kriyate tu yaḥ saṁyamo muktaye yo'nyaḥ pratyutādhogatipradaḥ

'विहित कर्म न करने का अनर्थ सज्जन नहीं करते; इसके विपरीत जो अन्य प्रकार का संयम मुक्ति के लिए किया जाता है, वह उल्टे अधोगति ही देता है।'

श्लोक 22 (garuda.1.88.22)

प्रक्षालयामीति भवान्यदेतन्मन्यते वरम् । विहिताकरणोद्भूतैः पापैस्त्वमपि दह्यसे

prakṣālayāmīti bhavānyadetanmanyate varam vihitākaraṇodbhūtaiḥ pāpaistvamapi dahyase

'तुम जो यह मानते हो कि 'मैं स्वयं को शुद्ध कर रहा हूँ' — यह तुम्हारा जो श्रेष्ठ विचार है, उससे भी तुम विहित कर्म न करने से उत्पन्न पापों से दग्ध हो रहे हो।'

श्लोक 23 (garuda.1.88.23)

अविद्याप्युपकाराय विषवज्जायते नृणाम् । अनुष्ठानाभ्युपायेन बन्धयोग्यापि नो हि सा

avidyāpyupakārāya viṣavajjāyate nṛṇām anuṣṭhānābhyupāyena bandhayogyāpi no hi sā

'अविद्या भी मनुष्यों के लिए विष के समान उपकारी हो जाती है, यदि उसका अनुष्ठान उचित उपाय से किया जाए; तब वह बन्धनकारी भी नहीं होती।'

श्लोक 24 (garuda.1.88.24)

तस्माद्वत्स कुरुष्व त्वं विधिवद्दारसंग्रहम् । आजन्म विफलन्तेऽस्तु असम्प्राप्यान्यलौकिकम्

tasmādvatsa kuruṣva tvaṁ vidhivaddārasaṁgraham ājanma viphalante'stu asamprāpyānyalaukikam

'इसलिए, हे वत्स, तुम विधिपूर्वक विवाह करो; तुम्हारा जन्म आजीवन निष्फल न रहे और अन्य लोक की प्राप्ति से वंचित न रहे।'

श्लोक 25 (garuda.1.88.25)

रुचिरुवाच । वृद्धोऽहं साम्प्रतं को मे पितरः सम्प्रिदास्यति । भार्यान्तथा दरिद्रस्य दुष्करो दारसंग्रहः

ruciruvāca vṛddho'haṁ sāmprataṁ ko me pitaraḥ sampridāsyati bhāryāntathā daridrasya duṣkaro dārasaṁgrahaḥ

रुचि ने कहा — 'मैं अब वृद्ध हो चुका हूँ; कौन मुझे कन्या देगा? और निर्धन मनुष्य के लिए विवाह करना अत्यंत कठिन है।'

श्लोक 26 (garuda.1.88.26)

पितर ऊचुः । अस्माकं पतनं वत्स भवतश्चाप्यधोगतिः । नूनं भावि भवित्री च नाभिनन्दसि नो वचः

pitara ūcuḥ asmākaṁ patanaṁ vatsa bhavataścāpyadhogatiḥ nūnaṁ bhāvi bhavitrī ca nābhinandasi no vacaḥ

पितरों ने कहा — 'हे वत्स! हमारा पतन और तुम्हारी भी अधोगति निश्चय ही होकर रहेगी, क्योंकि तुम हमारे वचन का स्वागत नहीं कर रहे हो।'

श्लोक 27 (garuda.1.88.27)

इत्युक्त्वा पितरस्तस्य पश्यतो मुनिसत्तम । बभूवुः सहसाऽदृश्या दीपा वातहता इव

ityuktvā pitarastasya paśyato munisattama babhūvuḥ sahasā'dṛśyā dīpā vātahatā iva

हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर पितर, उसके देखते-देखते, हवा से बुझे हुए दीपकों की भाँति सहसा अदृश्य हो गए।

श्लोक 28 (garuda.1.88.28)

मुनिः क्रौंचुकये प्राह मार्कण्डेयो महातपाः । रुचिवृत्तान्तमखिलं पितृसंवादलक्षणम्

muniḥ krauṁcukaye prāha mārkaṇḍeyo mahātapāḥ rucivṛttāntamakhilaṁ pitṛsaṁvādalakṣaṇam

महातपस्वी मुनि मार्कण्डेय ने क्रौंचुकि से रुचि का यह सम्पूर्ण वृत्तान्त, जो पितरों के साथ हुए संवाद के रूप में था, इस प्रकार कहा।

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