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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 93

याज्ञवल्क्य-उक्त वर्णधर्म-निरूपण

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

श्लोक 1 (garuda.1.93.1)

महेश्वर उवाच । याज्ञवल्क्येन यत्पूर्वं धर्मं प्रोक्तं कथं हरे ! । तन्मे काथय केशिघ्न ! यथा तत्त्वेन माधव !

maheśvara uvāca yājñavalkyena yatpūrvaṁ dharmaṁ proktaṁ kathaṁ hare ! tanme kāthaya keśighna ! yathā tattvena mādhava !

महेश्वर ने कहा — हे हरि, हे केशिघ्न, हे माधव! पूर्वकाल में याज्ञवल्क्य ने जो धर्म कहा था, वह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 2 (garuda.1.93.2)

हरिरुवाच । याज्ञवल्क्यं नमस्कृत्य मिथिलायां समास्थितम् । अपृच्छन्नॄषयो गत्वा वर्णधर्माद्यशेषतः । तेभ्यः स कथयामास विष्णुं ध्यात्वा जितेन्द्रियः

hariruvāca yājñavalkyaṁ namaskṛtya mithilāyāṁ samāsthitam apṛcchannṝṣayo gatvā varṇadharmādyaśeṣataḥ tebhyaḥ sa kathayāmāsa viṣṇuṁ dhyātvā jitendriyaḥ

हरि ने कहा — मिथिला में स्थित याज्ञवल्क्य को प्रणाम करके ऋषिगण उनके पास गए और वर्णधर्म आदि समस्त विषयों के बारे में पूछा। तब जितेन्द्रिय याज्ञवल्क्य ने विष्णु का ध्यान करके उन्हें बताया —

श्लोक 3 (garuda.1.93.3)

याज्ञवल्क्य उवाच । यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत । पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः

yājñavalkya uvāca yasmindeśe mṛgaḥ kṛṣṇastasmindharmānnibodhata purāṇanyāyamīmāṁsādharmaśāstrāṅgamiśritāḥ

याज्ञवल्क्य ने कहा — जिस देश में काला मृग विचरण करता है, वहाँ धर्मों को जानो, जो पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और वेदांगों से युक्त —

श्लोक 4 (garuda.1.93.4)

वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश । वक्तारो धर्मशास्त्राणां मनुर्विष्णुर्यमोऽङ्गिराः

vedāḥ sthānāni vidyānāṁ dharmasya ca caturdaśa vaktāro dharmaśāstrāṇāṁ manurviṣṇuryamo'ṅgirāḥ

वेदों के साथ, विद्या और धर्म के चौदह स्थान हैं। धर्मशास्त्रों के वक्ता मनु, विष्णु, यम, अंगिरा,

श्लोक 5 (garuda.1.93.5)

वसिष्ठदक्षसंवर्त्तशातातपपराशराः । आपस्तम्बोशनोव्यासाः कात्यायनबृहस्पती

vasiṣṭhadakṣasaṁvarttaśātātapaparāśarāḥ āpastambośanovyāsāḥ kātyāyanabṛhaspatī

वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति,

श्लोक 6 (garuda.1.93.6)

गौतमः शङ्खलिखितो हारीतोऽत्रिरहं तथा । एते विष्णुं समाराध्य जाता धर्मोपदेशकाः

gautamaḥ śaṅkhalikhito hārīto'trirahaṁ tathā ete viṣṇuṁ samārādhya jātā dharmopadeśakāḥ

गौतम, शंख, लिखित, हारीत, अत्रि और मैं स्वयं — इन सबने विष्णु की आराधना करके धर्मोपदेशक का पद प्राप्त किया।

श्लोक 7 (garuda.1.93.7)

देशकाल उपायेन द्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् । पात्रे प्रदीयते यत्तत्सकलं धर्मलक्षणम्

deśakāla upāyena dravyaṁ śraddhāsamanvitam pātre pradīyate yattatsakalaṁ dharmalakṣaṇam

जो धन, श्रद्धा से युक्त होकर, उचित देश-काल और उपाय से, योग्य पात्र को दिया जाता है — यही धर्म का समस्त लक्षण है।

श्लोक 8 (garuda.1.93.8)

इज्याचारो दमोऽहिंसा दानं स्वाध्यायकर्म च । अयं च परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्

ijyācāro damo'hiṁsā dānaṁ svādhyāyakarma ca ayaṁ ca paramo dharmo yadyogenātmadarśanam

यज्ञ, सदाचार, संयम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय-कर्म — और यह परम धर्म है, जो योग के द्वारा आत्मदर्शन है।

श्लोक 9 (garuda.1.93.9)

चत्वारो वेदधर्मज्ञाः परास्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यत्स्वधर्मः स्यादेको वाध्यात्मवित्तमः

catvāro vedadharmajñāḥ parāsraividyameva vā sā brūte yatsvadharmaḥ syādeko vādhyātmavittamaḥ

चारों वेदों को जानने वाले, अथवा तीनों वेदों को जानने वाले धर्मज्ञ होते हैं; वही सभा बताती है कि स्वधर्म क्या होना चाहिए, अथवा अध्यात्म में सर्वश्रेष्ठ एक ही व्यक्ति भी बता सकता है।

श्लोक 10 (garuda.1.93.10)

ब्रह्मक्षात्त्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः

brahmakṣāttriyaviṭśūdrā varṇāstvādyāstrayo dvijāḥ niṣekādyāḥ śmaśānāntāsteṣāṁ vai mantrataḥ kriyāḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं; इनमें प्रथम तीन द्विज हैं। गर्भाधान से लेकर श्मशान तक उनके संस्कार मन्त्रपूर्वक होते हैं —

श्लोक 11 (garuda.1.93.11)

गर्भाधानमृतौ पुंसः सवनं स्पन्दनात्पुरा । षष्ठेऽष्टमे वा सीमन्तः प्रसवे जातकर्म च

garbhādhānamṛtau puṁsaḥ savanaṁ spandanātpurā ṣaṣṭhe'ṣṭame vā sīmantaḥ prasave jātakarma ca

पुरुष के ऋतुकाल में गर्भाधान, गर्भ-स्पंदन से पूर्व सवन (पुंसवन), छठे या आठवें महीने में सीमन्तोन्नयन, जन्म पर जातकर्म,

श्लोक 12 (garuda.1.93.12)

अहन्येकादशे नाम चतुर्थे मासि निष्क्रमः । षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि चूडां कुर्य्याद्यथाकुलम्

ahanyekādaśe nāma caturthe māsi niṣkramaḥ ṣaṣṭhe'nnaprāśanaṁ māsi cūḍāṁ kuryyādyathākulam

ग्यारहवें दिन नामकरण, चौथे महीने में निष्क्रमण, छठे महीने में अन्नप्राशन — तथा कुलाचार के अनुसार चूडाकर्म करना चाहिए।

श्लोक 13 (garuda.1.93.13)

एवमेनः शमं याति बीजगर्भसमुद्भवम् । तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहश्च समन्त्रकः

evamenaḥ śamaṁ yāti bījagarbhasamudbhavam tūṣṇīmetāḥ kriyāḥ strīṇāṁ vivāhaśca samantrakaḥ

इस प्रकार बीज और गर्भ से उत्पन्न दोष शान्त हो जाता है। स्त्रियों के लिए ये संस्कार बिना मन्त्र के होते हैं, केवल विवाह मन्त्रपूर्वक होता है।

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