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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 94

याज्ञवल्क्य-उक्त वर्णधर्म-निरूपण (द्वितीय) — उपनयन एवं ब्रह्मचारी-कर्तव्य

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

श्लोक 1 (garuda.1.94.1)

याज्ञवल्क्य उवाच । गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे ब्राह्मणस्योपनायनम् । रज्ञामेकादशे सैके विशामेके यथाकुलम्

yājñavalkya uvāca garbhāṣṭame'ṣṭame vābde brāhmaṇasyopanāyanam rajñāmekādaśe saike viśāmeke yathākulam

याज्ञवल्क्य ने कहा — गर्भ के आठवें वर्ष अथवा जन्म के आठवें वर्ष में ब्राह्मण का उपनयन होता है; क्षत्रियों का ग्यारहवें वर्ष में, तथा वैश्यों का कुलाचार के अनुसार।

श्लोक 2 (garuda.1.94.2)

उपनीय कुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम् । वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत्

upanīya kuruḥ śiṣyaṁ mahāvyāhṛtipūrvakam vedamadhyāpayedenaṁ śaucācārāṁśca śikṣayet

उपनयन करके गुरु शिष्य को महाव्याहृतियों सहित वेद पढ़ाए, तथा उसे शौच और आचार की शिक्षा दे।

श्लोक 3 (garuda.1.94.3)

दिवा सन्ध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदड्मुखः । कुर्य्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः

divā sandhyāsu karṇasthabrahmasūtra udaḍmukhaḥ kuryyānmūtrapurīṣe tu rātrau ceddakṣiṇāmukhaḥ

दिन में और संध्याकाल में, कान पर यज्ञोपवीत रखकर, उत्तर दिशा की ओर मुख करके मल-मूत्र त्याग करे; रात्रि में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके।

श्लोक 4 (garuda.1.94.4)

गृहीतशिश्रश्चोत्थाय मृद्भिरभ्युद्धृतैर्जलैः । गन्धलेपक्षयकरं शौचं कुर्य्यान्महाव्रतः

gṛhītaśiśraścotthāya mṛdbhirabhyuddhṛtairjalaiḥ gandhalepakṣayakaraṁ śaucaṁ kuryyānmahāvrataḥ

उठकर, इन्द्रिय को पकड़कर, मिट्टी और लाए गए जल से, महाव्रती को गंध और लेप का नाश करने वाला शौच करना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.94.5)

अन्तर्जानुः शुचौ देश उपविष्ट उदङ्मुखः । प्राग्वा ब्राह्मेण तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्

antarjānuḥ śucau deśa upaviṣṭa udaṅmukhaḥ prāgvā brāhmeṇa tīrthena dvijo nityamupaspṛśet

घुटने मोड़कर, पवित्र स्थान में बैठकर, उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके, द्विज को नित्य ब्रह्मतीर्थ से आचमन करना चाहिए।

श्लोक 6 (garuda.1.94.6)

कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्य च । प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात्

kaniṣṭhādeśinyaṅguṣṭhamūlānyagraṁ karasya ca prajāpatipitṛbrahmadevatīrthānyanukramāt

कनिष्ठिका और तर्जनी के मूल से लेकर हाथ के अग्रभाग तक, तथा अंगूठे का मूल — ये क्रमशः प्रजापति, पितर, ब्रह्मा और देवताओं के तीर्थ हैं।

श्लोक 7 (garuda.1.94.7)

त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य खान्याद्भिः समुपस्पृशेत् । अद्भिस्तु प्रकृतिस्थाभिर्होनाभिः फेनबुद्दैः

triḥ prāśyāpo dvirunmṛjya khānyādbhiḥ samupaspṛśet adbhistu prakṛtisthābhirhonābhiḥ phenabuddaiḥ

तीन बार जल पीकर, दो बार होठ पोंछकर, जल से इन्द्रियों के छिद्रों का स्पर्श करे — स्वाभाविक अवस्था के, कम न हुए, झाग-बुलबुले रहित जल से।

श्लोक 8 (garuda.1.94.8)

हृत्कण्ठतालुनाभिस्तु यथासंख्यं द्विजातयः । शुध्येरंस्री च शूद्रश्च सकृत्स्पृष्टाभिरन्ततः

hṛtkaṇṭhatālunābhistu yathāsaṁkhyaṁ dvijātayaḥ śudhyeraṁsrī ca śūdraśca sakṛtspṛṣṭābhirantataḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः हृदय, कंठ और तालु तक पहुँचने वाले जल से शुद्ध होते हैं; स्त्री और शूद्र अंततः केवल एक बार स्पर्श किए गए जल से शुद्ध होते हैं।

श्लोक 9 (garuda.1.94.9)

स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः । सूर्य्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्त्रयाः प्रत्ययं जपः

snānamabdaivatairmantrairmārjanaṁ prāṇasaṁyamaḥ sūryyasya cāpyupasthānaṁ gāyattrayāḥ pratyayaṁ japaḥ

जलदेवताओं के मन्त्रों से स्नान, मार्जन, प्राणायाम, तथा सूर्य की उपासना और गायत्री के अनुसार जप —

श्लोक 10 (garuda.1.94.10)

गायत्त्रीं शिरसा सार्द्धं जपेद्व्याहृतिपूर्विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः

gāyattrīṁ śirasā sārddhaṁ japedvyāhṛtipūrvikām pratipraṇavasaṁyuktāṁ trirayaṁ prāṇasaṁyamaḥ

गायत्री को शिरोमन्त्र सहित, व्याहृतिपूर्वक, प्रत्येक भाग में प्रणव से युक्त होकर जपे — यह तीन बार किया गया प्राणसंयम है।

श्लोक 11 (garuda.1.94.11)

प्राणानायम्य सम्प्रोक्ष्य त्र्यृचेनाब्दैवतेन तु । जपन्नासीत सावित्त्रीं प्रत्यगातारकोदयात्

prāṇānāyamya samprokṣya tryṛcenābdaivatena tu japannāsīta sāvittrīṁ pratyagātārakodayāt

प्राणायाम करके, जलदेवताओं की त्रिऋचा से प्रोक्षण करके, तारे अस्त होने तक पश्चिम की ओर मुख करके सावित्री का जप करते हुए बैठे।

श्लोक 12 (garuda.1.94.12)

सन्ध्यां प्राक् प्रातरेवं हि तिष्ठेदासूर्य्यदर्शनात् । अग्निकार्य्यं ततः कुर्य्यात्सन्ध्ययोरुभयोरपि

sandhyāṁ prāk prātarevaṁ hi tiṣṭhedāsūryyadarśanāt agnikāryyaṁ tataḥ kuryyātsandhyayorubhayorapi

इसी प्रकार प्रातःकाल सूर्योदय तक संध्या करते रहे; फिर दोनों संध्याओं में अग्निकार्य करे।

श्लोक 13 (garuda.1.94.13)

ततोऽभिवादयेद्वृद्वानसावहमिति ब्रुवन् । गुरुं चैवाप्युपासीत स्वाध्यायार्थं समाहितः

tato'bhivādayedvṛdvānasāvahamiti bruvan guruṁ caivāpyupāsīta svādhyāyārthaṁ samāhitaḥ

तत्पश्चात् 'मैं अमुक हूँ' — यह कहते हुए वृद्धजनों को प्रणाम करे, तथा स्वाध्याय के लिए एकाग्रचित्त होकर गुरु की सेवा करे।

श्लोक 14 (garuda.1.94.14)

साहूतश्चाप्यधीयीत सर्वं चास्मै निवेदयेत् । हितं तस्याचरेन्नित्यं मनोवाक्रायकर्मभिः

sāhūtaścāpyadhīyīta sarvaṁ cāsmai nivedayet hitaṁ tasyācarennityaṁ manovākrāyakarmabhiḥ

बुलाए जाने पर अध्ययन करे, और सब कुछ गुरु को निवेदित करे; मन, वचन और कर्म से नित्य उनका हित करे।

श्लोक 15 (garuda.1.94.15)

दण्डाजिनोपवीतानि मेखलां चैव धारयेत् । ब्राह्मणेषु चरेद्भैक्षमनिन्द्येष्वात्मवृत्तये

daṇḍājinopavītāni mekhalāṁ caiva dhārayet brāhmaṇeṣu caredbhaikṣamanindyeṣvātmavṛttaye

दण्ड, मृगचर्म, यज्ञोपवीत और मेखला धारण करे; अपनी जीविका के लिए निंदारहित ब्राह्मणों के घर भिक्षाटन करे।

श्लोक 16 (garuda.1.94.16)

आदिमध्यावसानेषु भवेच्छन्दोपलक्षिता । ब्राह्मणक्षत्त्रियविशां भैक्षचर्य्या यथाक्रमम्

ādimadhyāvasāneṣu bhavecchandopalakṣitā brāhmaṇakṣattriyaviśāṁ bhaikṣacaryyā yathākramam

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की भिक्षाचर्या क्रमशः आदि, मध्य और अंत में 'भवत्' शब्द से चिह्नित होती है।

श्लोक 17 (garuda.1.94.17)

कृताग्निकार्य्यो भुञ्जीत विनीतो गुर्वनुज्ञया । आपोशानक्रियापूर्वं सत्कृत्यान्नमकुत्सयन्

kṛtāgnikāryyo bhuñjīta vinīto gurvanujñayā āpośānakriyāpūrvaṁ satkṛtyānnamakutsayan

अग्निकार्य करके, विनम्र होकर, गुरु की अनुमति से, आपोशान क्रिया पूर्वक, अन्न की निंदा न करते हुए आदरपूर्वक भोजन करे।

श्लोक 18 (garuda.1.94.18)

ब्रह्मचार्य्यास्थितो नैकमन्नमद्यादनापदि । ब्राह्मणः काममश्रीयाच्छ्राद्धे व्रतमपडियन्

brahmacāryyāsthito naikamannamadyādanāpadi brāhmaṇaḥ kāmamaśrīyācchrāddhe vratamapaḍiyan

ब्रह्मचर्य में स्थित व्यक्ति आपत्ति के अतिरिक्त एक ही अन्न बार-बार न खाए; किंतु ब्राह्मण श्राद्ध में अपने व्रत का उल्लंघन किए बिना इच्छानुसार खा सकता है।

श्लोक 19 (garuda.1.94.19)

मधु मांसं तथा स्विन्नमित्यादि परिवर्जयेत् । स गुरुर्यः क्रियाः कृत्वा वेदमस्मै प्रयच्छति

madhu māṁsaṁ tathā svinnamityādi parivarjayet sa gururyaḥ kriyāḥ kṛtvā vedamasmai prayacchati

मधु, मांस तथा घी में तला हुआ भोजन आदि का त्याग करे। जो संस्कार करके इसे वेद प्रदान करता है, वह गुरु है।

श्लोक 20 (garuda.1.94.20)

उपनीय ददात्येनामाचार्य्यः स प्रकीर्त्तितः । एकदेशमुपाध्याय ऋत्विग्यज्ञकृदुच्यते

upanīya dadātyenāmācāryyaḥ sa prakīrttitaḥ ekadeśamupādhyāya ṛtvigyajñakṛducyate

जो उपनयन करके वेद देता है, वह आचार्य कहलाता है; जो एक अंश पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है; और यज्ञकर्ता ऋत्विक् कहलाता है।

श्लोक 21 (garuda.1.94.21)

एते मान्या यथापूर्वमेभ्यो माता गरीयसी । प्रतिवेदं ब्रह्मचर्य्यं द्वादशाब्दानि पञ्च वा

ete mānyā yathāpūrvamebhyo mātā garīyasī prativedaṁ brahmacaryyaṁ dvādaśābdāni pañca vā

ये क्रमशः आदरणीय हैं; किंतु इन सबसे माता अधिक श्रेष्ठ है। प्रत्येक वेद के लिए ब्रह्मचर्य बारह वर्ष का है, अथवा पाँच वर्ष का —

श्लोक 22 (garuda.1.94.22)

ग्रहणान्तिकमित्येके केशान्तश्चैव षोडशे । आषोडशाऽऽद्वाविंशाच्चाचतुर्विंशाच्च वत्सरात्

grahaṇāntikamityeke keśāntaścaiva ṣoḍaśe āṣoḍaśā''dvāviṁśāccācaturviṁśācca vatsarāt

कुछ के अनुसार वेद-अध्ययन पूर्ण होने तक, अथवा सोलहवें वर्ष के केशान्त संस्कार तक। यह अवधि सोलहवें, बाईसवें और चौबीसवें वर्ष तक है —

श्लोक 23 (garuda.1.94.23)

ब्रह्मक्षत्त्रविशां काल औपनायनिकः परः । अत ऊर्द्ध्वं पतन्त्येते सर्वधर्मविवर्जिताः

brahmakṣattraviśāṁ kāla aupanāyanikaḥ paraḥ ata ūrddhvaṁ patantyete sarvadharmavivarjitāḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के उपनयन की अंतिम अवधि क्रमशः यही है। इसके पश्चात् वे समस्त धर्मों से वंचित होकर पतित हो जाते हैं।

श्लोक 24 (garuda.1.94.24)

सावित्रीपतिता व्रात्या व्रात्यस्तोमादृते क्रतोः । मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीयं मौञ्जिबन्धनम्

sāvitrīpatitā vrātyā vrātyastomādṛte kratoḥ māturyadagre jāyante dvitīyaṁ mauñjibandhanam

सावित्री-रहित रह गए वे व्रात्य कहलाते हैं, जब तक व्रात्यस्तोम यज्ञ से शुद्ध न हों। चूँकि वे पहले माता से जन्म लेते हैं, मौंजी-बंधन (उपनयन) उनका दूसरा जन्म है।

श्लोक 25 (garuda.1.94.25)

ब्राह्मणक्षत्त्रिय विशस्तस्मादेते द्विजातयः । यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम्

brāhmaṇakṣattriya viśastasmādete dvijātayaḥ yajñānāṁ tapasāṁ caiva śubhānāṁ caiva karmaṇām

इसीलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विज कहलाते हैं, यज्ञों, तपस्याओं और शुभ कर्मों के अधिकारी।

श्लोक 26 (garuda.1.94.26)

वेद एव द्विजातीनां निः श्रेयसकरः परः । मधुना पयसा चैव स देवांस्तर्पयेद्द्विजः

veda eva dvijātīnāṁ niḥ śreyasakaraḥ paraḥ madhunā payasā caiva sa devāṁstarpayeddvijaḥ

द्विजों के लिए वेद ही परम कल्याणकारी है। मधु और दूध से द्विज को देवताओं को तृप्त करना चाहिए —

श्लोक 27 (garuda.1.94.27)

पितॄन्मधुघृताभ्यां च ऋचोऽधीते हि सोऽन्वहम् । यजुः साम पठेत्तद्वदथर्वाङ्गिरसं द्विजः

pitṝnmadhughṛtābhyāṁ ca ṛco'dhīte hi so'nvaham yajuḥ sāma paṭhettadvadatharvāṅgirasaṁ dvijaḥ

और मधु-घृत से पितरों को। जो प्रतिदिन ऋचाओं का अध्ययन करता है, तथा जो द्विज यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद पढ़ता है —

श्लोक 28 (garuda.1.94.28)

सन्तर्पयेत्पितॄन्देवान्सोऽन्वहं हि घृतामृतैः । वाकोवाक्यं पुराणं च नाराशंसीश्च गाथिकाः

santarpayetpitṝndevānso'nvahaṁ hi ghṛtāmṛtaiḥ vākovākyaṁ purāṇaṁ ca nārāśaṁsīśca gāthikāḥ

वह प्रतिदिन घृत और अमृत के समान अर्पणों से पितरों और देवताओं को तृप्त करता है। वाकोवाक्य, पुराण, नाराशंसी गाथाएँ,

श्लोक 29 (garuda.1.94.29)

इतिहासांस्तथा विद्या योऽधीते शक्तितोऽन्वहम् । सन्तर्पयेत्पितॄन्देवान्मांसक्षीरोदनादिभिः

itihāsāṁstathā vidyā yo'dhīte śaktito'nvaham santarpayetpitṝndevānmāṁsakṣīrodanādibhiḥ

तथा इतिहास और विद्याओं का जो प्रतिदिन यथाशक्ति अध्ययन करता है, वह मांस, दूध, अन्न आदि से पितरों और देवताओं को तृप्त करता है।

श्लोक 30 (garuda.1.94.30)

ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः । यं यं क्रतुमधीतेसौ तस्यस्याप्नुयात्फलम्

te tṛptāstarpayantyenaṁ sarvakāmaphalaiḥ śubhaiḥ yaṁ yaṁ kratumadhītesau tasyasyāpnuyātphalam

वे तृप्त होकर उसे समस्त शुभ कामनाओं के फल से तृप्त करते हैं। वह जिस-जिस यज्ञ के बारे में पढ़ता है, उसका फल प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (garuda.1.94.31)

भूमिदानस्य तपसः स्वाध्यायफलभाग्द्विजः । नेष्ठिको ब्रह्मचारी तु वसेदाचार्य्यसन्निधौ

bhūmidānasya tapasaḥ svādhyāyaphalabhāgdvijaḥ neṣṭhiko brahmacārī tu vasedācāryyasannidhau

द्विज केवल स्वाध्याय से ही भूमिदान और तप के फल का भागी बन जाता है। नैष्ठिक ब्रह्मचारी को आचार्य के समीप ही रहना चाहिए —

श्लोक 32 (garuda.1.94.32)

तदभावेऽस्य तनये पत्न्यां वैश्वानरेऽपि वा । अनेन विधिना देहे साधयेद्विजितेन्द्रियः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति न चेह जायते पुनः

tadabhāve'sya tanaye patnyāṁ vaiśvānare'pi vā anena vidhinā dehe sādhayedvijitendriyaḥ brahmalokamavāpnoti na ceha jāyate punaḥ

और उनके अभाव में उनके पुत्र, पत्नी अथवा अग्नि के समीप। इस विधि से जितेन्द्रिय होकर शरीर को साधने वाला ब्रह्मलोक प्राप्त करता है, और यहाँ पुनः जन्म नहीं लेता।

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