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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 97

याज्ञवल्क्य-उक्त द्रव्यशुद्धि-निरूपण

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

श्लोक 1 (garuda.1.97.1)

याज्ञवल्क्य उवाच । द्रव्यशुद्धिंप्रवक्ष्यामि तन्निबोधत सत्तमाः । सौवर्णराजताब्जानां शङ्खरज्ज्वादिचर्मणाम्

yājñavalkya uvāca dravyaśuddhiṁpravakṣyāmi tannibodhata sattamāḥ sauvarṇarājatābjānāṁ śaṅkharajjvādicarmaṇām

याज्ञवल्क्य ने कहा — अब मैं द्रव्यशुद्धि का वर्णन करूँगा; हे सत्तमो, इसे समझो। सोना, चाँदी, रत्न, शंख, रस्सी और चमड़े से बनी वस्तुओं की —

श्लोक 2 (garuda.1.97.2)

पात्राणां चासनानां च वारिणा शुद्धिरिष्यते । उष्णवाभः स्रुक्स्रुवयोर्धान्यादेः प्रोक्षणेन च

pātrāṇāṁ cāsanānāṁ ca vāriṇā śuddhiriṣyate uṣṇavābhaḥ sruksruvayordhānyādeḥ prokṣaṇena ca

तथा पात्रों और आसनों की शुद्धि जल से होती है। स्रुक् और स्रुवा की शुद्धि गरम जल से, तथा धान्य आदि की प्रोक्षण से होती है।

श्लोक 3 (garuda.1.97.3)

तक्षणाद्दारुश्रृङ्गादेर्यज्ञपात्रस्य मार्जनात् । सोष्णैरुदकगोमूत्रैः शुध्यत्याविककौशिकम्

takṣaṇāddāruśrṛṅgāderyajñapātrasya mārjanāt soṣṇairudakagomūtraiḥ śudhyatyāvikakauśikam

काष्ठ और सींग की वस्तुओं की शुद्धि छीलने से, यज्ञपात्र की सफाई से होती है। ऊनी और रेशमी वस्त्र गरम जल और गोमूत्र से शुद्ध होते हैं।

श्लोक 4 (garuda.1.97.4)

भैक्ष्यं योषिन्मुखं पश्यन्पुनः पाकान्महीमयम् । गोघ्नातेऽन्ने तथा केशमक्षिकाकीटदूषिते

bhaikṣyaṁ yoṣinmukhaṁ paśyanpunaḥ pākānmahīmayam goghnāte'nne tathā keśamakṣikākīṭadūṣite

भिक्षा का अन्न पुनः पकाने से शुद्ध होता है, मिट्टी के बर्तन पुनः आग में तपाने से। गाय द्वारा सूँघा गया, या केश-मक्खी-कीट से दूषित अन्न [अशुद्ध होता है]।

श्लोक 5 (garuda.1.97.5)

भस्मक्षेपाद्विशुद्धिः स्याद्भूशुद्धिर्माजनादिना । त्रपुसीसकताम्राणां क्षाराम्लोदकवारिभिः

bhasmakṣepādviśuddhiḥ syādbhūśuddhirmājanādinā trapusīsakatāmrāṇāṁ kṣārāmlodakavāribhiḥ

राख छिड़कने से विशुद्धि होती है; भूमि की शुद्धि झाड़ने आदि से होती है। रांगा, सीसा और तांबे की शुद्धि क्षार, अम्ल और साधारण जल से होती है।

श्लोक 6 (garuda.1.97.6)

भस्माद्भिर्लोहकांस्यानामज्ञातं च सदा शुचि । अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धलेपापकर्षणात्

bhasmādbhirlohakāṁsyānāmajñātaṁ ca sadā śuci amedhyāktasya mṛttoyairgandhalepāpakarṣaṇāt

लोहा और कांसे की शुद्धि राख और जल से होती है; तथा अज्ञात [उत्पत्ति की वस्तु] सदा शुद्ध मानी जाती है। अशुद्ध वस्तु से सने हुए की शुद्धि गंध-दाग हटने तक मिट्टी और जल से होती है।

श्लोक 7 (garuda.1.97.7)

शुचि गोतृप्तिदं तोयं प्रकृतिस्थं महीगतम् । तथा मांसं श्वचाण्डालक्रव्यादादिनिपातितम्

śuci gotṛptidaṁ toyaṁ prakṛtisthaṁ mahīgatam tathā māṁsaṁ śvacāṇḍālakravyādādinipātitam

गाय की प्यास बुझाने वाला जल शुद्ध है, तथा भूमि पर स्वाभाविक अवस्था में स्थित जल भी। इसी प्रकार मांस भी शुद्ध है, यदि उसे कुत्ते, चाण्डाल, मांसाहारी पशु आदि ने न छुआ हो।

श्लोक 8 (garuda.1.97.8)

रश्मिरग्नी रजश्छाया गौरश्वो वसुधानिलाः । अश्वाजविप्रुषो मेध्या स्तथाचमनबिन्दवः

raśmiragnī rajaśchāyā gauraśvo vasudhānilāḥ aśvājavipruṣo medhyā stathācamanabindavaḥ

सूर्यकिरण, अग्नि, धूल, छाया, गाय, घोड़ा, पृथ्वी और वायु सदा शुद्ध हैं; घोड़े या बकरे के छींटे भी शुद्ध हैं, तथा आचमन की बूँदें भी।

श्लोक 9 (garuda.1.97.9)

स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वा रथ्याप्रसर्पणे । आचान्तः पुनराचामेद्वासोऽन्यत्परिधाय च

snātvā pītvā kṣute supte bhuktvā rathyāprasarpaṇe ācāntaḥ punarācāmedvāso'nyatparidhāya ca

स्नान करके, पानी पीकर, छींककर, सोकर, भोजन करके, या सड़क पर चलकर — आचमन कर चुका व्यक्ति पुनः आचमन करे; तथा दूसरे वस्त्र पहनकर भी।

श्लोक 10 (garuda.1.97.10)

क्षुते निष्ठीविते स्वापे परिधानेऽश्रुपातने । पञ्चस्वेतेषु नाचामेद्दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् । तिष्ठन्त्यग्न्यादयो देवा विप्रकर्णे तु दक्षिणे

kṣute niṣṭhīvite svāpe paridhāne'śrupātane pañcasveteṣu nācāmeddakṣiṇaṁ śravaṇaṁ spṛśet tiṣṭhantyagnyādayo devā viprakarṇe tu dakṣiṇe

छींकने, थूकने, सोने, वस्त्र पहनने और आँसू बहाने के समय — इन पाँचों अवसरों पर यदि आचमन न कर सके तो दाहिने कान का स्पर्श करे; क्योंकि अग्नि आदि देवता ब्राह्मण के दाहिने कान में निवास करते हैं।

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