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पूर्वखण्ड — आचारकाण्ड · अध्याय 98

याज्ञवल्क्य-उक्त दानधर्म-निरूपण

अध्याय 97अध्याय-सूचीअध्याय 99

श्लोक 1 (garuda.1.98.1)

याज्ञवल्क्य उवाच । अथ दानिविधिं वक्ष्ये तन्मे श्रृणुत सुव्रताः । अन्येभ्यो ब्राह्मणाः श्रेष्ठास्तेभ्यश्चैव क्रियापराः

yājñavalkya uvāca atha dānividhiṁ vakṣye tanme śrṛṇuta suvratāḥ anyebhyo brāhmaṇāḥ śreṣṭhāstebhyaścaiva kriyāparāḥ

याज्ञवल्क्य ने कहा — अब मैं दान-विधि का वर्णन करूँगा; हे सुव्रतो, मुझसे सुनो। ब्राह्मण अन्य सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनमें भी अनुष्ठान-परायण श्रेष्ठ हैं —

श्लोक 2 (garuda.1.98.2)

ब्रह्मवेत्ता च तेभ्योऽपि पात्रं विद्यात्तपोऽन्विताः (तम्) । गोभूधान्यहिरण्यादि पात्रे दातव्यमर्चितम्

brahmavettā ca tebhyo'pi pātraṁ vidyāttapo'nvitāḥ (tam) gobhūdhānyahiraṇyādi pātre dātavyamarcitam

उनसे भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ है — तपस्वियों सहित उसे ही उत्तम पात्र जानना चाहिए। गाय, भूमि, धान्य, स्वर्ण आदि सम्मानपूर्वक योग्य पात्र को देना चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.1.98.3)

विद्यातपोभ्यां हीनेन न तु ग्राह्यः प्रतिग्रहः । गृह्णन्प्रदातारमधो नयत्यात्मानमेव च

vidyātapobhyāṁ hīnena na tu grāhyaḥ pratigrahaḥ gṛhṇanpradātāramadho nayatyātmānameva ca

विद्या और तप से रहित व्यक्ति से दान ग्रहण नहीं करना चाहिए। ग्रहण करने वाला दाता को और स्वयं को भी अधोगति में ले जाता है।

श्लोक 4 (garuda.1.98.4)

दातव्यं प्रत्यहं पात्रे निमित्तेषु विशेषतः । याचितेनापि दातव्यं श्रद्धापूतं तु शक्तितः

dātavyaṁ pratyahaṁ pātre nimitteṣu viśeṣataḥ yācitenāpi dātavyaṁ śraddhāpūtaṁ tu śaktitaḥ

योग्य पात्र को प्रतिदिन दान देना चाहिए, विशेषतः विशेष अवसरों पर। माँगने वाले को भी यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक शुद्ध दान देना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.1.98.5)

हेमश्रृङ्गी शफैः रौप्यैः सुशीला वस्त्रसंयुता । सकांस्यापात्रा दातव्या क्षीरिणी गौः सदक्षिणा

hemaśrṛṅgī śaphaiḥ raupyaiḥ suśīlā vastrasaṁyutā sakāṁsyāpātrā dātavyā kṣīriṇī gauḥ sadakṣiṇā

स्वर्ण-मढ़े सींग, चाँदी के खुर, सुशील स्वभाव, वस्त्र से युक्त, कांस्य-पात्र सहित, दूधवाली गाय दक्षिणा सहित देनी चाहिए।

श्लोक 6 (garuda.1.98.6)

दशसौवर्णिकं श्रृङ्गं शफं सप्तपलैः कृतम् । पञ्चाशत्पलिकं पात्रं कांस्यं वत्सस्य कीर्त्त्यते

daśasauvarṇikaṁ śrṛṅgaṁ śaphaṁ saptapalaiḥ kṛtam pañcāśatpalikaṁ pātraṁ kāṁsyaṁ vatsasya kīrttyate

सींग के लिए दस स्वर्ण-मुद्राएँ, खुर के लिए सात पल; कांस्य पात्र पचास पल का बछड़े के लिए कहा गया है।

श्लोक 7 (garuda.1.98.7)

स्वर्णपिप्पलपात्रेण वत्सो वा वत्सिकापि वा । अस्या अपि च दातव्यमपत्यं रोगवर्जितम्

svarṇapippalapātreṇa vatso vā vatsikāpi vā asyā api ca dātavyamapatyaṁ rogavarjitam

स्वर्ण के पीपल-पत्ते के आकार के पात्र सहित बछड़ा या बछिया भी देनी चाहिए; तथा इसकी संतान भी रोगरहित होकर दी जानी चाहिए।

श्लोक 8 (garuda.1.98.8)

दाता स्वर्गमवाप्नोति वत्सरान्रोमसंमितान् । कपिला चेत्तारयते भूयश्चासप्तमं कुलम्

dātā svargamavāpnoti vatsarānromasaṁmitān kapilā cettārayate bhūyaścāsaptamaṁ kulam

दाता गौ के रोमों जितने वर्षों तक स्वर्ग प्राप्त करता है; यदि वह कपिला गौ हो, तो वह सातवीं पीढ़ी तक कुल का उद्धार करती है।

श्लोक 9 (garuda.1.98.9)

यावद्वत्सस्य द्वौ पादौ मुखं योन्यां प्रदृश्यते । तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया यावद्गर्भं न मुञ्चति

yāvadvatsasya dvau pādau mukhaṁ yonyāṁ pradṛśyate tāvadgauḥ pṛthivī jñeyā yāvadgarbhaṁ na muñcati

जब तक बछड़े के दोनों पैर और मुख गर्भ के द्वार पर दिखाई दे रहे हों, तब तक गाय को पृथ्वी के समान मानना चाहिए — जब तक वह गर्भ को पूर्ण रूप से न छोड़ दे।

श्लोक 10 (garuda.1.98.10)

यथा कथञ्चिद्दत्त्वा गां धेनुं वाऽधेनुमेव वा । अरोगामपरिक्लिष्टां दाता स्वर्गे महीयते

yathā kathañciddattvā gāṁ dhenuṁ vā'dhenumeva vā arogāmaparikliṣṭāṁ dātā svarge mahīyate

जिस किसी प्रकार भी गाय — चाहे दूधवाली हो या न हो — रोगरहित और अपीड़ित देकर, दाता स्वर्ग में महिमामंडित होता है।

श्लोक 11 (garuda.1.98.11)

श्रान्तसंवाहनं रोगिपरिचर्य्या सुरार्चनम् । पादशौचं द्विजोच्छिष्टमार्जनं गोप्रदानवत्

śrāntasaṁvāhanaṁ rogiparicaryyā surārcanam pādaśaucaṁ dvijocchiṣṭamārjanaṁ gopradānavat

थके हुए की सेवा, रोगी की परिचर्या, देवपूजा, चरण-प्रक्षालन, तथा ब्राह्मण के जूठे पात्र की सफाई — इनका फल गोदान के समान है —

श्लोक 12 (garuda.1.98.12)

द्विजाय यदभीष्टं तु दत्त्वा स्वर्गमवाप्नुयात् । भूदीपांश्चान्नवस्त्राणि सर्पिर्दत्त्वा व्रजेच्छ्रियम्

dvijāya yadabhīṣṭaṁ tu dattvā svargamavāpnuyāt bhūdīpāṁścānnavastrāṇi sarpirdattvā vrajecchriyam

द्विज को अभीष्ट वस्तु देकर मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है। भूमि, दीप, अन्न, वस्त्र और घी देकर वह श्री को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (garuda.1.98.13)

गृहधान्यच्छत्रमाल्यवृक्षयानघृतं जलम् । शय्यानुलेपनं दत्त्वा स्वर्गलोके महीयते

gṛhadhānyacchatramālyavṛkṣayānaghṛtaṁ jalam śayyānulepanaṁ dattvā svargaloke mahīyate

घर, धान्य, छत्र, माला, वृक्ष, वाहन, घी, जल, शय्या और उबटन देकर मनुष्य स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 14 (garuda.1.98.14)

ब्रह्मदाता ब्रह्मलोकं प्राप्नोति सुरदुर्लभम् । वेदार्थयज्ञशास्त्राणि धर्मशास्त्राणि चैव हि

brahmadātā brahmalokaṁ prāpnoti suradurlabham vedārthayajñaśāstrāṇi dharmaśāstrāṇi caiva hi

ब्रह्मदाता देवताओं को भी दुर्लभ ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। वेदार्थ, यज्ञशास्त्र और धर्मशास्त्रों को —

श्लोक 15 (garuda.1.98.15)

मूल्येनापि लिखित्वापि ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । एतन्मूलं जगद्यस्मादसृजत्पूर्वमीश्वरः

mūlyenāpi likhitvāpi brahmalokamavāpnuyāt etanmūlaṁ jagadyasmādasṛjatpūrvamīśvaraḥ

मूल्य देकर भी, अथवा स्वयं लिखकर भी दान करने वाला ब्रह्मलोक प्राप्त करता है — क्योंकि ईश्वर ने पहले इसी मूल से जगत् की रचना की थी।

श्लोक 16 (garuda.1.98.16)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्य्यो वेदार्थसंग्रहः । इतिहासपुराणं वा लिखित्वा यः प्रयच्छति

tasmātsarvaprayatnena kāryyo vedārthasaṁgrahaḥ itihāsapurāṇaṁ vā likhitvā yaḥ prayacchati

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से वेदार्थ का संग्रह करना चाहिए। जो इतिहास या पुराण लिखकर दान करता है,

श्लोक 17 (garuda.1.98.17)

ब्रह्मदानसमं पुण्यं प्राप्नोति द्विगुणोन्नतिम् । लोकायतं कुतर्कश्च प्राकृतम्लेच्छभाषितम्

brahmadānasamaṁ puṇyaṁ prāpnoti dviguṇonnatim lokāyataṁ kutarkaśca prākṛtamlecchabhāṣitam

वह ब्रह्मदान के समान पुण्य प्राप्त करता है, बल्कि दुगुनी उन्नति पाता है। लोकायत दर्शन, कुतर्क, तथा प्राकृत और म्लेच्छ भाषा —

श्लोक 18 (garuda.1.98.18)

न श्रोतव्यं द्विजेनैतदधो नयति तं द्विजम् । समर्थो यो न गृह्णीयाद्दातृलोकानवाप्नुयात्

na śrotavyaṁ dvijenaitadadho nayati taṁ dvijam samartho yo na gṛhṇīyāddātṛlokānavāpnuyāt

द्विज को इन्हें नहीं सुनना चाहिए — ये उस द्विज को अधोगति में ले जाते हैं। जो समर्थ होकर भी दान ग्रहण नहीं करता, वह दाता के समान लोक प्राप्त करता है।

श्लोक 19 (garuda.1.98.19)

कुशाः शाकं पयो गन्धाः प्रत्याख्येया न वारि च । अयाचिताहृतं ग्राह्यमपि दुष्कृतकर्मणः

kuśāḥ śākaṁ payo gandhāḥ pratyākhyeyā na vāri ca ayācitāhṛtaṁ grāhyamapi duṣkṛtakarmaṇaḥ

कुश, साग, दूध, गंध और जल को कभी अस्वीकार नहीं करना चाहिए। बिना माँगे लाई गई वस्तु दुष्कर्मी व्यक्ति से भी ग्रहण की जा सकती है —

श्लोक 20 (garuda.1.98.20)

अन्यत्र कुलटाषण्डपतितेभ्यो द्विषस्तथा । देवातिथ्यर्चनकृते पितृतृप्त्यर्थमेव च । सर्वतः प्रतिगृह्णीयादात्मतृप्त्यर्थमेव च

anyatra kulaṭāṣaṇḍapatitebhyo dviṣastathā devātithyarcanakṛte pitṛtṛptyarthameva ca sarvataḥ pratigṛhṇīyādātmatṛptyarthameva ca

व्यभिचारिणी, नपुंसक, पतित और शत्रु के अतिरिक्त। देवता और अतिथि के पूजन हेतु, तथा पितरों की तृप्ति के लिए, और अपनी तृप्ति के लिए भी सभी से ग्रहण किया जा सकता है।

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