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उत्तरखण्ड · अध्याय 17

श्रवणों की उत्पत्ति और महिमा

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (garuda.2.17.1)

गरुड उवाच । एको मे संशयो देव हृदये सम्प्रबाधते । श्रमणाः कस्य पुत्राश्च कथं यमपुरे स्थिताः

garuḍa uvāca | eko me saṁśayo deva hṛdaye samprabādhate | śramaṇāḥ kasya putrāśca kathaṁ yamapure sthitāḥ

गरुड़ ने कहा — हे देव! एक संशय मेरे हृदय को बहुत पीड़ित कर रहा है — ये श्रवण किसके पुत्र हैं, और वे यमपुरी में कैसे स्थित हैं?

श्लोक 2 (garuda.2.17.2)

मानुषैश्च कृतं कर्म कस्माज्जानन्ति ते प्रभो । कथं शृण्वन्ति ते सर्वे कस्माज्ज्ञानं समागतम्

mānuṣaiśca kṛtaṁ karma kasmājjānanti te prabho | kathaṁ śṛṇvanti te sarve kasmājjñānaṁ samāgatam

हे प्रभो! वे मनुष्यों द्वारा किए गए कर्म को कैसे जानते हैं? वे सब कैसे सुनते हैं, कहाँ से उन्हें ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ है?

श्लोक 3 (garuda.2.17.3)

कुत्र भुञ्जन्ति देवेश क्रथयस्व प्रसादतः । पक्षिराजवचः श्रुत्वा भगवान्वाक्यमब्रवीत्

kutra bhuñjanti deveśa krathayasva prasādataḥ | pakṣirājavacaḥ śrutvā bhagavānvākyamabravīt

हे देवेश! वे कहाँ भोजन करते हैं? कृपापूर्वक यह स्पष्ट कीजिए।' पक्षिराज के वचन सुनकर भगवान ने यह वाणी कही।

श्लोक 4 (garuda.2.17.4)

श्रीकृष्ण उवाच । शृणुष्व वचनं सत्यं सर्वेषां सौख्यदायकम् । तदहं कथयिष्यामि श्रवणानां विचेष्टितम्

śrīkṛṣṇa uvāca | śṛṇuṣva vacanaṁ satyaṁ sarveṣāṁ saukhyadāyakam | tadahaṁ kathayiṣyāmi śravaṇānāṁ viceṣṭitam

श्रीकृष्ण ने कहा — सुनो यह सत्य वचन, जो सबको सुख देने वाला है। मैं तुम्हें श्रवणों के आचरण की कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 5 (garuda.2.17.5)

एकीभूतं यदा सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । क्षीरोदसागरे पूर्वं मयि सुप्ते जगत्पतौ

ekībhūtaṁ yadā sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam | kṣīrodasāgare pūrvaṁ mayi supte jagatpatau

जब समस्त जगत, चराचर सहित, एकाकार हो गया था, और मैं, जगत का स्वामी, पहले क्षीर-सागर में शयन कर रहा था,

श्लोक 6 (garuda.2.17.6)

नाभिस्थोजस्तपस्तेपे वर्षाणि सुबहून्यपि । एकीभूतं जगत्सृष्टं भूतग्रामचतुर्विधम्

nābhisthojastapastepe varṣāṇi subahūnyapi | ekībhūtaṁ jagatsṛṣṭaṁ bhūtagrāmacaturvidham

तब [ब्रह्मा ने] नाभि में स्थित होकर, बहुत वर्षों तक तप किया। एक साथ हुआ सृष्ट जगत चार प्रकार के प्राणी-समूहों से भरा हुआ था,

श्लोक 7 (garuda.2.17.7)

ब्रह्मणा निर्मितं पूर्वं विष्णुना पालितं तदा । रुद्रः संहारमूर्तिश्च निर्मितो ब्रह्मणा ततः

brahmaṇā nirmitaṁ pūrvaṁ viṣṇunā pālitaṁ tadā | rudraḥ saṁhāramūrtiśca nirmito brahmaṇā tataḥ

जो पहले ब्रह्मा द्वारा रचा गया था, तब विष्णु द्वारा पालित हुआ। रुद्र, जो संहार-मूर्ति हैं, फिर ब्रह्मा द्वारा रचे गए,

श्लोक 8 (garuda.2.17.8)

वायुः सर्वगतः सृष्टः सूर्यस्तेजोभिवृद्धिमान् । धर्मराजस्ततः सृष्टश्चित्रगुप्तेन संयुत)

vāyuḥ sarvagataḥ sṛṣṭaḥ sūryastejobhivṛddhimān | dharmarājastataḥ sṛṣṭaścitraguptena saṁyuta)

सर्वव्यापी वायु रचा गया, और तेज में वृद्धि करने वाला सूर्य भी। फिर धर्मराज को रचा गया, चित्रगुप्त सहित।

श्लोक 9 (garuda.2.17.9)

सृष्ट्वैतदादिकं सर्वं तपस्तेपे तु पद्मजः । गतानि बहुवर्षाणि ब्रह्मणो नाभिपङ्कजे

sṛṣṭvaitadādikaṁ sarvaṁ tapastepe tu padmajaḥ | gatāni bahuvarṣāṇi brahmaṇo nābhipaṁkaje

यह सब आदि रचकर, कमल से उत्पन्न [ब्रह्मा] ने तप किया। ब्रह्मा की नाभि-कमल में बहुत वर्ष बीत गए —

श्लोक 10 (garuda.2.17.10)

योयो हि निर्मितः पूर्वं तत्तत्कर्म समाचरेत् । कस्मिंश्चित्समये तत्र ब्रह्मा लोकसमन्वितः

yoyo hi nirmitaḥ pūrvaṁ tattatkarma samācaret | kasmiṁścitsamaye tatra brahmā lokasamanvitaḥ

जो-जो पहले रचा गया था, वह-वह अपना ही कर्म करने लगा। किसी समय, वहाँ लोकों सहित ब्रह्मा,

श्लोक 11 (garuda.2.17.11)

रुद्रो विष्णुस्तथा धर्मः शासयन्ति वसुन्धराम् । न जानीमो वयं किञ्चिल्लोककृत्यमिहोच्यताम्

rudro viṣṇustathā dharmaḥ śāsayanti vasundharām | na jānīmo vayaṁ kiñcillokakṛtyamihocyatām

रुद्र, विष्णु और वैसे ही धर्म भी, पृथ्वी का शासन करते थे। [तब उन्होंने सोचा] — 'हम यहाँ लोक-कृत्य के विषय में कुछ भी नहीं जानते; यह हमें बताया जाना चाहिए।'

श्लोक 12 (garuda.2.17.12)

इति चिन्तापराः सर्वे देवा विममृशुस्तदा । संचिन्त्य ब्रह्मणो मन्त्रं विबुधैः प्रेरितस्तदा

iti cintāparāḥ sarve devā vimamṛśustadā | saṁcintya brahmaṇo mantraṁ vibudhaiḥ preritastadā

इस प्रकार चिंता में डूबे हुए सभी देवताओं ने तब विचार किया। तब देवताओं द्वारा प्रेरित होकर, ब्रह्मा के मंत्र का चिंतन करके,

श्लोक 13 (garuda.2.17.13)

गृहीत्वा पुष्पपत्राणि सोसृजद्द्वादशात्मजान् । तेजोराशीन्विशालाक्षान्ब्रह्मणो वचनात्तु ते

gṛhītvā puṣpapatrāṇi sosṛjaddvādaśātmajān | tejorāśīnviśālākṣānbrahmaṇo vacanāttu te

पुष्प और पत्ते लेकर उसने बारह पुत्रों को उत्पन्न किया — तेज की राशि, विशाल नेत्रों वाले, ब्रह्मा के वचन से ही [उत्पन्न]।

श्लोक 14 (garuda.2.17.14)

योयं वदति लोकेस्मिञ्छुभं वा यदि वाशुभम् । प्रापयन्ति ततः शीघ्रं ब्रह्मणः कर्णगोचरम्

yoyaṁ vadati lokesmiñchubhaṁ vā yadi vāśubham | prāpayanti tataḥ śīghraṁ brahmaṇaḥ karṇagocaram

इस लोक में जो कोई भी शुभ या अशुभ कुछ भी कहता है, वे उसे तुरंत ब्रह्मा के कानों तक पहुँचा देते हैं।

श्लोक 15 (garuda.2.17.15)

दूराच्छ्रवणविज्ञानं दूराद्दर्शनगोचरम् । सर्वे शृण्वन्ति यत्पक्षिंस्तेनैव श्रवणा मताः

dūrācchravaṇavijñānaṁ dūrāddarśanagocaram | sarve śṛṇvanti yatpakṣiṁstenaiva śravaṇā matāḥ

दूर से सुनने का ज्ञान, और दूर से देखने की क्षमता — हे पक्षिन्! क्योंकि वे सब कुछ सुनते हैं, इसीलिए वे 'श्रवण' माने गए हैं।

श्लोक 16 (garuda.2.17.16)

स्थित्वा चैव तथाकाशे जन्तूनां चेष्टितं च यत् । तज्ज्ञात्वा धर्मराजाग्रे मृत्युकाले वदन्ति च

sthitvā caiva tathākāśe jantūnāṁ ceṣṭitaṁ ca yat | tajjñātvā dharmarājāgre mṛtyukāle vadanti ca

आकाश में ही स्थित रहकर, प्राणियों के जो भी आचरण होते हैं, उन्हें जानकर, धर्मराज के समक्ष मृत्यु के समय वे बताते हैं।

श्लोक 17 (garuda.2.17.17)

धर्मं चार्थं च कामं च मोक्षं च कथयन्ति ते । एको हि धर्ममार्गश्च द्वितीयश्चार्थमार्गकः

dharmaṁ cārthaṁ ca kāmaṁ ca mokṣaṁ ca kathayanti te | eko hi dharmamārgaśca dvitīyaścārthamārgakaḥ

वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन सबका ब्योरा बताते हैं। धर्म-मार्ग एक है, अर्थ-मार्ग दूसरा है,

श्लोक 18 (garuda.2.17.18)

अपरः काममार्गश्च मोक्षमार्गश्चतुर्थकः । उत्तमा धममार्गेण वैनतेय प्रयान्ति हि

aparaḥ kāmamārgaśca mokṣamārgaścaturthakaḥ | uttamā dhamamārgeṇa vainateya prayānti hi

काम-मार्ग तीसरा है, और मोक्ष-मार्ग चौथा है। हे वैनतेय! उत्तम [प्राणी] धर्म-मार्ग से ही [आगे] जाते हैं।

श्लोक 19 (garuda.2.17.19)

अर्थदाता विमानैस्तु अश्वैः कामप्रदायकः । हंसयुक्तविमानैश्च मोक्षाकाङ्क्षी विसर्पति

arthadātā vimānaistu aśvaiḥ kāmapradāyakaḥ | haṁsayuktavimānaiśca mokṣākāṁkṣī visarpati

अर्थ चाहने वाला विमानों से जाता है, काम चाहने वाला घोड़ों से; हंस-युक्त विमानों से मोक्ष चाहने वाला विचरण करता है।

श्लोक 20 (garuda.2.17.20)

इतरः पादचारेण त्वसिपत्रवनानि च । पाषाणैः कण्टकैः क्लिष्टः पाशबद्धोऽथ याति वै

itaraḥ pādacāreṇa tvasipatravanāni ca | pāṣāṇaiḥ kaṇṭakaiḥ kliṣṭaḥ pāśabaddho'tha yāti vai

अन्य [अर्थात् जिनका कोई शुभ मार्ग न हो] पैदल चलते हैं, तलवार-पत्तों के वनों से होकर, पत्थरों और काँटों से क्लेश पाते हुए, पाशों में बँधे हुए ही जाते हैं।

श्लोक 21 (garuda.2.17.21)

यः कश्चिन्मानुषे लोके श्रवणान्पूजयेदिह । वर्धन्या जलपात्रेम पक्वान्नपरिपूर्णया

yaḥ kaścinmānuṣe loke śravaṇānpūjayediha | vardhanyā jalapātrema pakvānnaparipūrṇayā

जो कोई भी मनुष्य-लोक में यहाँ श्रवणों की पूजा करता है, पके हुए अन्न से भरे जल-पात्र की भेंट से,

श्लोक 22 (garuda.2.17.22)

श्रवणान्पूजयेत्तत्र मया सह खगेश्वर । तस्याहं तत्प्रदास्यामि यत्सुरैरपि दुर्लभम्

śravaṇānpūjayettatra mayā saha khageśvara | tasyāhaṁ tatpradāsyāmi yatsurairapi durlabham

हे खगेश्वर! श्रवणों की पूजा वहाँ मेरे साथ ही करता है। उसे मैं वह प्रदान करूँगा, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 23 (garuda.2.17.23)

संभोज्य ब्राह्मणान् भक्त्या त्वेकादश शुभाञ्छुचीन् । द्वादशं सकलत्रं च मम प्रीत्यै प्रपूजयेत्

saṁbhojya brāhmaṇān bhaktyā tvekādaśa śubhāñchucīn | dvādaśaṁ sakalatraṁ ca mama prītyai prapūjayet

भक्तिपूर्वक ग्यारह शुभ और पवित्र ब्राह्मणों को भोजन कराकर, बारहवें को पत्नी सहित मेरी प्रसन्नता के लिए पूजना चाहिए।

श्लोक 24 (garuda.2.17.24)

देवैः सर्वैश्च संपूज्य स्वर्गं यान्ति सुखेप्सया । तैः पूजितैरह तुष्टश्चित्रगुप्तेन धर्मराट्

devaiḥ sarvaiśca saṁpūjya svargaṁ yānti sukhepsayā | taiḥ pūjitairaha tuṣṭaścitraguptena dharmarāṭ

इस प्रकार समस्त देवताओं के साथ पूजित होकर, वे सुख की कामना से स्वर्ग को जाते हैं। उनके पूजित होने से चित्रगुप्त सहित धर्मराज प्रसन्न होते हैं,

श्लोक 25 (garuda.2.17.25)

तैस्तुष्टैर्मत्पुरं यान्ति लोका धर्मपारायणाः । श्रवणानां च माहात्म्यमुत्पत्तिं चेष्टितं शुभम्

taistuṣṭairmatpuraṁ yānti lokā dharmapārāyaṇāḥ | śravaṇānāṁ ca māhātmyamutpattiṁ ceṣṭitaṁ śubham

और उनके प्रसन्न होने से, धर्म-परायण लोक मेरे नगर को जाते हैं। जो श्रवणों की महिमा, उत्पत्ति और उनके शुभ आचरण को,

श्लोक 26 (garuda.2.17.26)

शृणोति पक्षिशार्दूल स च पापैर्न लिप्यते । इह लोके सुखं भुक्त्वा स्वर्गलोके महीयते

śṛṇoti pakṣiśārdūla sa ca pāpairna lipyate | iha loke sukhaṁ bhuktvā svargaloke mahīyate

हे पक्षिशार्दूल! सुनता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता। इस लोक में सुख भोगकर वह स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है।

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