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उत्तरखण्ड · अध्याय 23

स्वप्न में प्रेत के चिह्न

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (garuda.2.23.1)

गरुड उवाच । किङ्किं कुर्वन्ति वै प्रेताः पिशाचत्वेव्यवस्थिताः । वदन्ति वा कदाचित्किं तद्वदस्व सुरेश्वर

garuḍa uvāca | kiṁkiṁ kurvanti vai pretāḥ piśācatvevyavasthitāḥ | vadanti vā kadācitkiṁ tadvadasva sureśvara

गरुड़ ने कहा — पिशाच-भाव में स्थित प्रेत क्या-क्या करते हैं? क्या वे कभी कुछ बोलते भी हैं? हे सुरेश्वर! यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (garuda.2.23.2)

श्रीभगवानुवाच । तेषां स्वरूपं वक्ष्यामि चिह्नं स्वप्नं यथातथम् । क्षुत्पिपासार्दितास्ते वै प्रविशेयुः स्ववेश्मनि

śrībhagavānuvāca | teṣāṁ svarūpaṁ vakṣyāmi cihnaṁ svapnaṁ yathātatham | kṣutpipāsārditāste vai praviśeyuḥ svaveśmani

श्रीभगवान ने कहा — मैं उनके स्वरूप, चिह्न और स्वप्न को यथार्थ रूप से बताता हूँ। भूख-प्यास से पीड़ित होकर वे अपने ही घर में प्रवेश करते हैं,

श्लोक 3 (garuda.2.23.3)

प्रतिष्ठा वायुदेहेषु शयानांस्तु स्ववंशजान् । तत्र यच्छन्ति लिङ्गानि दर्शयन्ति खगेश्वर

pratiṣṭhā vāyudeheṣu śayānāṁstu svavaṁśajān | tatra yacchanti liṁgāni darśayanti khageśvara

और वायु-देह में स्थित होकर, अपने ही वंशजों के सोते समय, वहाँ चिह्न देते हैं, संकेत दिखाते हैं, हे खगेश्वर!

श्लोक 4 (garuda.2.23.4)

स्वपुत्रस्वकलत्राणि स्वबन्धुन्तत्र गच्छति । हयो गजो वृषो मर्त्योदृश्यते विकृताननः

svaputrasvakalatrāṇi svabandhuntatra gacchati | hayo gajo vṛṣo martyodṛśyate vikṛtānanaḥ

अपने पुत्र और अपनी पत्नी के पास, अपने बंधुजनों के पास वे जाते हैं। घोड़ा, हाथी, बैल, अथवा विकृत मुख वाला मनुष्य [स्वप्न में] दिखाई पड़ता है।

श्लोक 5 (garuda.2.23.5)

शयानं विपरीतं तु आत्मानं च विपर्ययम् । उत्थितः पश्यति यस्तु तद्विन्द्यात्प्रेतनिर्मितम्

śayānaṁ viparītaṁ tu ātmānaṁ ca viparyayam | utthitaḥ paśyati yastu tadvindyātpretanirmitam

जो सोते हुए [व्यक्ति] को उलटा हुआ देखता है, अथवा स्वयं को ही विपरीत [रूप में] देखता है, जागने पर, यह जानना चाहिए कि यह प्रेत द्वारा निर्मित है।

श्लोक 6 (garuda.2.23.6)

स्वप्ने नरौ हि निगडैर्बध्यते बहुधा यदि । अन्नं च याचते स्वप्ने कुवेषः पूर्वजो मृतः

svapne narau hi nigaḍairbadhyate bahudhā yadi | annaṁ ca yācate svapne kuveṣaḥ pūrvajo mṛtaḥ

यदि स्वप्न में कोई पुरुष अनेक प्रकार से बेड़ियों से बंधा हुआ दिखे, और स्वप्न में अन्न माँगे, विकृत वेश में मृत पूर्वज [दिखे],

श्लोक 7 (garuda.2.23.7)

स्वप्ने यो भुज्यमानस्य गृहीत्वान्नं पलायते । आत्मनस्तु परो वापि तृषार्तस्तु जलं पिबेत्

svapne yo bhujyamānasya gṛhītvānnaṁ palāyate | ātmanastu paro vāpi tṛṣārtastu jalaṁ pibet

जो स्वप्न में, भोजन करते हुए व्यक्ति से, अन्न छीनकर भाग जाता है — चाहे वह स्वयं का हो या किसी अन्य का — और प्यास से पीड़ित होकर जल पीता है,

श्लोक 8 (garuda.2.23.8)

वृषभारोहणं स्वप्ने वृषभैः सह गच्छति । उत्पत्य गगनं याति तीर्थे याति क्षुधातुरः

vṛṣabhārohaṇaṁ svapne vṛṣabhaiḥ saha gacchati | utpatya gaganaṁ yāti tīrthe yāti kṣudhāturaḥ

स्वप्न में बैल पर सवारी करना, बैलों के साथ जाना, ऊपर उठकर आकाश में जाना, तीर्थ में जाना, भूख से व्याकुल होना,

श्लोक 9 (garuda.2.23.9)

स्ववाचा वदते यस्तु गोवृषद्विजावाजिषु । लिङ्गे गजे तथा देवे भूते प्रेते निशाचरे

svavācā vadate yastu govṛṣadvijāvājiṣu | liṁge gaje tathā deve bhūte prete niśācare

अपनी ही वाणी से गौ, बैल, द्विज और घोड़े का, लिंग, हाथी, देवता, भूत, प्रेत और निशाचर का उच्चारण करना —

श्लोक 10 (garuda.2.23.10)

स्वप्नमध्ये तु पक्षीन्द्र प्रेतलिङ्गान्यनेकधा । स्वकलत्रं स्वबन्धुं वा स्वसुतं स्वपतिं विभुम् । विद्यमानं मृतं पश्येत्प्रेतदोषेण निश्चितम्

svapnamadhye tu pakṣīndra pretaliṁgānyanekadhā | svakalatraṁ svabandhuṁ vā svasutaṁ svapatiṁ vibhum | vidyamānaṁ mṛtaṁ paśyetpretadoṣeṇa niścitam

हे पक्षीन्द्र! स्वप्न में इस प्रकार के अनेक प्रेत-चिह्न होते हैं। अपनी पत्नी, अपने बंधु, अपने पुत्र अथवा अपने पति-स्वामी को, जीवित रहते हुए भी, मृत देखे — यह निश्चय ही प्रेत के दोष से होता है।

श्लोक 11 (garuda.2.23.11)

याचते यः परं स्वप्ने क्षुत्तृड्भ्यां च परिप्लुतः । तीर्थे गत्वा दहेत्पिण्डान्प्रेतदौषैर्न संशयः

yācate yaḥ paraṁ svapne kṣuttṛḍbhyāṁ ca pariplutaḥ | tīrthe gatvā dahetpiṇḍānpretadauṣairna saṁśayaḥ

जो स्वप्न में किसी दूसरे से माँगता है, भूख-प्यास से डूबा हुआ; तीर्थ जाकर जो पिण्डों को जला देता है, उसमें प्रेत के दोष होने में संशय नहीं।

श्लोक 12 (garuda.2.23.12)

निर्गच्छेद्वा गृहाद्वापि स्वप्ने पुत्रस्तथा पशुः । पिता भ्राता कलत्रं च प्रेतदोषैस्तु पश्यति

nirgacchedvā gṛhādvāpi svapne putrastathā paśuḥ | pitā bhrātā kalatraṁ ca pretadoṣaistu paśyati

अथवा घर से पुत्र, पशु, पिता, भाई अथवा पत्नी निकल जाते हुए [दिखें] — यह भी प्रेत के दोष से देखा जाता है।

श्लोक 13 (garuda.2.23.13)

चिह्नान्येतानि पक्षीन्द्र प्रायश्चित्तं निवेदयेत् । कृत्वा स्नानं गृहे तीर्थे श्रीवृक्षे तर्पणं जलैः

cihnānyetāni pakṣīndra prāyaścittaṁ nivedayet | kṛtvā snānaṁ gṛhe tīrthe śrīvṛkṣe tarpaṇaṁ jalaiḥ

हे पक्षीन्द्र! ये सब चिह्न [दिखने पर] प्रायश्चित्त करना चाहिए — घर में, तीर्थ में अथवा श्रेष्ठ वृक्ष के नीचे स्नान करके, जल से तर्पण करके,

श्लोक 14 (garuda.2.23.14)

कृष्णधान्यानि पूजां च प्रदद्याद्वेदपारगे । होमं कुर्याद्यथाशक्ति सम्पूर्णं वाचयेत्सुधीः

kṛṣṇadhānyāni pūjāṁ ca pradadyādvedapārage | homaṁ kuryādyathāśakti sampūrṇaṁ vācayetsudhīḥ

काले धान्य और पूजा वेद-पारंगत [ब्राह्मण] को अर्पित करने चाहिए। यथाशक्ति होम करना चाहिए; बुद्धिमान व्यक्ति को [इस अध्याय का] पूर्ण पाठ करना चाहिए।

श्लोक 15 (garuda.2.23.15)

एतद्धि श्रद्धया यस्तु प्रेतलिङ्गनिदर्शनम् । पठते शृणुते वापि प्रेतचिह्नं विनश्यति

etaddhi śraddhayā yastu pretaliṁganidarśanam | paṭhate śṛṇute vāpi pretacihnaṁ vinaśyati

जो श्रद्धापूर्वक इस प्रेत-लक्षण-दर्शक [अध्याय] को पढ़ता है, अथवा सुनता है, उसका प्रेत-चिह्न नष्ट हो जाता है।

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