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उत्तरखण्ड · अध्याय 29

पुत्र, तिल, कुश, तुलसी और लवण की आवश्यकता

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (garuda.2.29.1)

श्रीकृष्ण उवाच । साधु पृष्टं त्वया भद्र मानुषाणां हिताय वै । शृणुष्वावहितो भूत्वा सर्वमेवौर्ध्वदैहिकम्

śrīkṛṣṇa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā bhadra mānuṣāṇāṁ hitāya vai śṛṇuṣvāvahito bhūtvā sarvamevaurdhvadaihikam

श्रीकृष्ण ने कहा — हे भद्र! तुमने मनुष्यों के हित के लिए भली भाँति पूछा है। सावधान होकर सम्पूर्ण औध्वदैहिक विधि सुनो।

श्लोक 2 (garuda.2.29.2)

कम्यग्विभेदरहितं श्रुतिस्मृतिसमुद्धृतम् । यन्न दृष्टं सुरैः सेन्द्रैर्योगिभिर्योगचिन्तकैः

kamyagvibhedarahitaṁ śrutismṛtisamuddhṛtam yanna dṛṣṭaṁ suraiḥ sendrairyogibhiryogacintakaiḥ

यह श्रुति-स्मृति से निकाला हुआ, भेद-रहित (निःसंदेह) ज्ञान है, जिसे इन्द्र सहित देवताओं, योगियों तथा योग-चिन्तकों ने भी नहीं देखा।

श्लोक 3 (garuda.2.29.3)

गुह्याद्गुह्यतरं वत्स नाख्यातं कस्यचित्क्वचित् । भक्तस्त्वं हि महाभाग सर्वं ते कथयाम्यहम्

guhyādguhyataraṁ vatsa nākhyātaṁ kasyacitkvacit bhaktastvaṁ hi mahābhāga sarvaṁ te kathayāmyaham

हे वत्स! यह गोपनीय से भी अधिक गोपनीय है, जो कभी किसी को नहीं बताया गया; परन्तु तुम मेरे भक्त हो, हे महाभाग, इसलिए मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ।

श्लोक 4 (garuda.2.29.4)

अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च । येन केनाप्युपायेन कार्यं जन्म सुतस्य च

aputrasya gatirnāsti svargo naiva ca naiva ca yena kenāpyupāyena kāryaṁ janma sutasya ca

पुत्रहीन की कोई गति नहीं होती, न स्वर्ग होता है, कदापि नहीं; इसलिए किसी भी उपाय से पुत्र का जन्म कराना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.2.29.5)

तारयेन्नरकात्पुत्रो यदि मोक्षो न विद्यते । दाहः पुत्रेण कर्तव्यो देयः पौत्रेण पावकः

tārayennarakātputro yadi mokṣo na vidyate dāhaḥ putreṇa kartavyo deyaḥ pautreṇa pāvakaḥ

यदि मोक्ष प्राप्त न हो, तो भी पुत्र नरक से तार देता है; दाह पुत्र द्वारा किया जाए, तथा अग्नि पौत्र द्वारा दी जाए।

श्लोक 6 (garuda.2.29.6)

तिलैर्दर्भैश्च भूम्यां वै कुटी धातुमती भवेत् । पञ्चरत्नानि वक्त्रे तु येन जीवः प्ररोहति

tilairdarbhaiśca bhūmyāṁ vai kuṭī dhātumatī bhavet pañcaratnāni vaktre tu yena jīvaḥ prarohati

तिल और कुश से भूमि पर धातुमयी कुटी बनानी चाहिए; मुख में पंचरत्न रखने चाहिए, जिससे जीव का उद्भव (मार्ग) खुलता है।

श्लोक 7 (garuda.2.29.7)

लिप्यात्तु गोमयैर्भूमिं तिलान्दर्भांश्च निः क्षिपेत् । तस्यामेवातुरो मुक्तः सर्वं दहति पातकम्

lipyāttu gomayairbhūmiṁ tilāndarbhāṁśca niḥ kṣipet tasyāmevāturo muktaḥ sarvaṁ dahati pātakam

भूमि को गोबर से लीपकर तिल और कुश बिछाने चाहिए; उसी स्थान पर लेटा हुआ मरणासन्न व्यक्ति मुक्त होकर सारा पाप जला देता है।

श्लोक 8 (garuda.2.29.8)

दर्भमूलीनयेत्स्वर्गं संस्थितं नात्र संशयः । दर्भांस्तत्र हि ये भूम्यां तिलयुक्तान संशयः

darbhamūlīnayetsvargaṁ saṁsthitaṁ nātra saṁśayaḥ darbhāṁstatra hi ye bhūmyāṁ tilayuktāna saṁśayaḥ

कुश की जड़ें, जिन पर वह लेटता है, उसे स्वर्ग ले जाती हैं, इसमें कोई संशय नहीं; भूमि पर बिछाए गए तिल-सहित कुश भी — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 9 (garuda.2.29.9)

सर्वत्र वसुधा पूता यत्र लेपो न विद्यते । यत्र लेपः स्थितस्तत्र पुनर्लेपेन शुध्यति

sarvatra vasudhā pūtā yatra lepo na vidyate yatra lepaḥ sthitastatra punarlepena śudhyati

पृथ्वी सर्वत्र पवित्र है जहाँ लेप न हो; जहाँ अशुद्ध लेप हो, वहाँ पुनः लेप से ही शुद्धि होती है।

श्लोक 10 (garuda.2.29.10)

यातुधानाः पिशाचाश्च राक्षसाः क्रूरकर्मिणः । अलिप्ते आतुरं मुक्तं विशन्त्येते न संशयः

yātudhānāḥ piśācāśca rākṣasāḥ krūrakarmiṇaḥ alipte āturaṁ muktaṁ viśantyete na saṁśayaḥ

बिना लीपी हुई भूमि पर यातुधान, पिशाच तथा क्रूरकर्मी राक्षस मुक्त हुए मरणासन्न व्यक्ति में प्रवेश कर जाते हैं — इसमें संशय नहीं।

श्लोक 11 (garuda.2.29.11)

नित्यहोमं तथा श्राद्धं विप्राणां पादशोधनम् । मण्डलेन विना भूम्यां कुर्वन्त्येतच्च निष्फलम्

nityahomaṁ tathā śrāddhaṁ viprāṇāṁ pādaśodhanam maṇḍalena vinā bhūmyāṁ kurvantyetacca niṣphalam

बिना मण्डल के भूमि पर किया गया नित्य होम, श्राद्ध तथा ब्राह्मणों के पादशोधन निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक 12 (garuda.2.29.12)

आतुरो मुच्यते नैव मण्डलेन विना भुवि । ब्रह्मा रुद्रश्च विष्णुश्च श्रीर्हुताशन एव च । मण्डले चोपतिष्ठन्तस्तस्मात्कुर्वीत मण्डलम्

āturo mucyate naiva maṇḍalena vinā bhuvi brahmā rudraśca viṣṇuśca śrīrhutāśana eva ca maṇḍale copatiṣṭhantastasmātkurvīta maṇḍalam

बिना मण्डल के भूमि पर मरणासन्न व्यक्ति मुक्त नहीं होता। ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, श्री तथा अग्नि स्वयं उस मण्डल में विराजमान रहते हैं; इसलिए मण्डल अवश्य बनाना चाहिए।

श्लोक 13 (garuda.2.29.13)

अन्यथा म्रियते यस्तु बालो वृद्धो युवापि वा । योन्यन्तरं स वै गच्छेत्क्रीडते वायुना सह

anyathā mriyate yastu bālo vṛddho yuvāpi vā yonyantaraṁ sa vai gacchetkrīḍate vāyunā saha

यदि इसके विपरीत बालक, वृद्ध या युवा मरता है, तो वह अन्य योनि को प्राप्त होता है और वायु के साथ भटकता रहता है।

श्लोक 14 (garuda.2.29.14)

मिश्रितं लोहताम्रं तु तथैव जन्म जायते । तस्मैवं वायुभूतस्य न श्राद्धं नोदक क्रिया

miśritaṁ lohatāmraṁ tu tathaiva janma jāyate tasmaivaṁ vāyubhūtasya na śrāddhaṁ nodaka kriyā

जैसे लोहे और ताँबे का मिश्रण होता है, वैसा ही उसका जन्म होता है; इस प्रकार वायुभूत बने हुए उसके लिए न श्राद्ध होता है, न उदक-क्रिया।

श्लोक 15 (garuda.2.29.15)

मम स्वेदसमुद्भूतास्तिलास्तार्क्ष्य पवित्रकाः । असुरा दानवा दैत्यास्तृप्यन्ति तिलदानतः

mama svedasamudbhūtāstilāstārkṣya pavitrakāḥ asurā dānavā daityāstṛpyanti tiladānataḥ

हे तार्क्ष्य! तिल मेरे स्वेद (पसीने) से उत्पन्न पवित्र हैं; असुर, दानव तथा दैत्य तिल-दान से तृप्त होते हैं।

श्लोक 16 (garuda.2.29.16)

तिलाः श्वेतास्तिलाः कृष्णास्तिला गोमूत्रसन्निभाः । ते मे दहन्तु पापानि शरीरेण कृतानि च

tilāḥ śvetāstilāḥ kṛṣṇāstilā gomūtrasannibhāḥ te me dahantu pāpāni śarīreṇa kṛtāni ca

श्वेत तिल, कृष्ण तिल, तथा गोमूत्र के रंग के तिल — ये मेरे शरीर द्वारा किए गए पापों को जला दें।

श्लोक 17 (garuda.2.29.17)

एक एव तिलद्रोणो हेमद्रोणतिलैः समः । तर्पणे दानहोमे च दत्तो भवति चाक्षयः

eka eva tiladroṇo hemadroṇatilaiḥ samaḥ tarpaṇe dānahome ca datto bhavati cākṣayaḥ

एक ही द्रोण-भर तिल स्वर्ण-मिश्रित द्रोण-भर तिल के समान है; तर्पण, दान अथवा होम में दिया गया वह अक्षय होता है।

श्लोक 18 (garuda.2.29.18)

दर्भा मल्लोमसम्भूतास्तिलाः स्वेदसमुद्भवाः । तृप्ताः स्युर्देवता दानैः श्राद्धेन पितरस्तथा । प्रयोगविधिना ब्रह्मा विश्वञ्चाप्युपजीवनात्

darbhā mallomasambhūtāstilāḥ svedasamudbhavāḥ tṛptāḥ syurdevatā dānaiḥ śrāddhena pitarastathā prayogavidhinā brahmā viśvañcāpyupajīvanāt

कुश (विष्णु के) रोमों से उत्पन्न हुए हैं, तिल पसीने से; दान से देवता और श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं; प्रयोग-विधि से ब्रह्मा तथा सारा विश्व भी उससे जीवित रहता है।

श्लोक 19 (garuda.2.29.19)

सव्ययज्ञोपवीतेन ब्रह्माद्यास्तृप्तिमान्पुयुः । अपसव्येन तृप्यन्ति पितरो दिविदेवताः

savyayajñopavītena brahmādyāstṛptimānpuyuḥ apasavyena tṛpyanti pitaro dividevatāḥ

यज्ञोपवीत को सव्य (बाएँ कंधे पर) रखने से ब्रह्मा आदि देवता तृप्ति पाते हैं; अपसव्य (दाएँ कंधे पर) रखने से पितर तथा स्वर्ग के देवता तृप्त होते हैं।

श्लोक 20 (garuda.2.29.20)

अपसव्यादितो ब्रह्मा दर्भमध्ये तु केशवः । दर्भाग्रे शङ्करं विद्यात्त्रयो देवाः कुशे स्थिताः

apasavyādito brahmā darbhamadhye tu keśavaḥ darbhāgre śaṅkaraṁ vidyāttrayo devāḥ kuśe sthitāḥ

अपसव्य विधि में कुश की जड़ में ब्रह्मा, मध्य में केशव, तथा अग्रभाग में शंकर को जानना चाहिए — ये तीनों देवता कुश में स्थित रहते हैं।

श्लोक 21 (garuda.2.29.21)

विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर । नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः

viprā mantrāḥ kuśā vahnistulasī ca khageśvara naite nirmālyatāṁ yānti kriyamāṇāḥ punaḥ punaḥ

हे खगेश्वर! ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि तथा तुलसी — बार-बार प्रयोग में लाए जाने पर भी ये निर्माल्य (जूठे/अपवित्र) नहीं होते।

श्लोक 22 (garuda.2.29.22)

कुशाः पिण्डेषु निर्माल्याः ब्राह्मणाः प्रेतभोजने । मन्त्राः शूद्रेषु पतिताश्चितायाश्च हुताशनः

kuśāḥ piṇḍeṣu nirmālyāḥ brāhmaṇāḥ pretabhojane mantrāḥ śūdreṣu patitāścitāyāśca hutāśanaḥ

पिण्डों में प्रयुक्त कुश निर्माल्य हो जाते हैं; प्रेत-भोजन में सम्मिलित ब्राह्मण भी; शूद्रों-पतितों के लिए पढ़े गए मंत्र भी; तथा चिता की अग्नि भी।

श्लोक 23 (garuda.2.29.23)

तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग । पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां सताम्

tulasī brāhmaṇā gāvo viṣṇurekādaśī khaga pañca pravahaṇānyeva bhavābdhau majjatāṁ satām

हे खग! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशी — संसार-सागर में डूबते हुए सज्जनों के लिए ये पाँच ही तरणी (नौका) हैं।

श्लोक 24 (garuda.2.29.24)

विष्णुरेकादशी गीता तुलसीविप्रधेनवः । अपारे दुर्गसंकारे षट्पदी मुक्तिदायिनी

viṣṇurekādaśī gītā tulasīvipradhenavaḥ apāre durgasaṁkāre ṣaṭpadī muktidāyinī

विष्णु, एकादशी, गीता, तुलसी, ब्राह्मण तथा गौ — ये छह पद (षट्पदी) अपार, दुर्गम संसार में मुक्ति देने वाले हैं।

श्लोक 25 (garuda.2.29.25)

तिलाः पवित्रास्त्रिविधा दर्भाश्च तुलसीदालम् । निवारयन्ति चैतानि दुर्गतिं यान्तमातुरम्

tilāḥ pavitrāstrividhā darbhāśca tulasīdālam nivārayanti caitāni durgatiṁ yāntamāturam

तीन प्रकार के पवित्र तिल, कुश तथा तुलसी-दल — ये मरणासन्न को दुर्गति में जाने से रोकते हैं।

श्लोक 26 (garuda.2.29.26)

हस्ताभ्यामुद्धृतैर्दर्भैस्तोयेन प्रोक्षयेद्भुवम् । मृत्युकाले क्षिपेद्दर्भानातुरस्य करद्वये

hastābhyāmuddhṛtairdarbhaistoyena prokṣayedbhuvam mṛtyukāle kṣipeddarbhānāturasya karadvaye

दोनों हाथों में उठाए गए कुश से जल छिड़ककर भूमि पवित्र करनी चाहिए; मृत्यु के समय मरणासन्न व्यक्ति के दोनों हाथों में कुश रखने चाहिए।

श्लोक 27 (garuda.2.29.27)

दर्भेषु क्षिप्यते योऽसौ दभस्तु परिवेष्टितः । विष्णुलोकं स वै याति मन्त्रहीनोऽपि मानवः

darbheṣu kṣipyate yo'sau dabhastu pariveṣṭitaḥ viṣṇulokaṁ sa vai yāti mantrahīno'pi mānavaḥ

जो कुश पर लिटाया जाए, जिसका शरीर कुश से घिरा हो, वह मनुष्य मंत्रहीन होते हुए भी विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 28 (garuda.2.29.28)

दर्भमूलीगतो भूमौ दर्भपाणिस्तु यो मृतः । प्रायश्चित्तविशुद्धोऽसौ संसारेपारसागरे

darbhamūlīgato bhūmau darbhapāṇistu yo mṛtaḥ prāyaścittaviśuddho'sau saṁsārepārasāgare

जो भूमि पर कुश की जड़ पर लेटकर, हाथ में कुश लिए हुए मरता है, वह इस अपार संसार-सागर में प्रायश्चित्त से विशुद्ध हो जाता है।

श्लोक 29 (garuda.2.29.29)

गोमयेनोपलिप्ते तु दर्भस्यास्तरणे स्थितः । तत्र दत्तेन दानेन सर्वं पापं व्यपोहति

gomayenopalipte tu darbhasyāstaraṇe sthitaḥ tatra dattena dānena sarvaṁ pāpaṁ vyapohati

गोबर से लीपी हुई भूमि पर कुश के बिछौने पर लेटा हुआ व्यक्ति — वहाँ दिए गए दान से सारा पाप दूर कर देता है।

श्लोक 30 (garuda.2.29.30)

लवणं तद्रसं दिव्यं सर्वकामप्रदं नृणाम् । यस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कटा लवणं विना

lavaṇaṁ tadrasaṁ divyaṁ sarvakāmapradaṁ nṛṇām yasmādannarasāḥ sarve notkaṭā lavaṇaṁ vinā

नमक वह दिव्य रस है जो मनुष्यों की सभी कामनाएँ पूर्ण करता है; क्योंकि नमक के बिना अन्न के सभी रस फीके रहते हैं।

श्लोक 31 (garuda.2.29.31)

पितॄणां च प्रियं भव्यं तस्मात्स्वर्गप्रदं भवेत् । विष्णुदेहसमुद्भूतो यतोऽयं लवणो रसः

pitṝṇāṁ ca priyaṁ bhavyaṁ tasmātsvargapradaṁ bhavet viṣṇudehasamudbhūto yato'yaṁ lavaṇo rasaḥ

यह पितरों को प्रिय और मंगलकारी है, इसलिए स्वर्गदायक है; क्योंकि यह लवण-रस विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 32 (garuda.2.29.32)

विशेषाल्लवणं दानं तेन शंसन्ति योगिनः । ब्राह्मण क्षत्त्रियविशां स्त्रीणां शूद्रजनस्य च

viśeṣāllavaṇaṁ dānaṁ tena śaṁsanti yoginaḥ brāhmaṇa kṣattriyaviśāṁ strīṇāṁ śūdrajanasya ca

इसीलिए योगीजन विशेष रूप से लवण-दान की प्रशंसा करते हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्रियों तथा शूद्रों के लिए भी।

श्लोक 33 (garuda.2.29.33)

आतुराणां यदा प्राणाः प्रयान्ति वसुधातले । लवणं तु तदा देयं द्बारस्योद्धाटनं दिवः

āturāṇāṁ yadā prāṇāḥ prayānti vasudhātale lavaṇaṁ tu tadā deyaṁ dbārasyoddhāṭanaṁ divaḥ

जब मरणासन्न व्यक्ति के प्राण पृथ्वी पर निकलने लगें, तब लवण अवश्य देना चाहिए — यही स्वर्ग के द्वार का उद्घाटन है।

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