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उत्तरखण्ड · अध्याय 32

गर्भोत्पत्ति, देह-रचना तथा ब्रह्माण्ड-देह-निरूपण

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (garuda.2.32.1)

तार्क्ष्य उवाच । कथमुत्पद्यते जन्तुर्भूतग्रामे चतुर्विधे । त्वचा रक्तं तथा मांसं मेदो मज्जास्थि जीवितम्

tārkṣya uvāca kathamutpadyate janturbhūtagrāme caturvidhe tvacā raktaṁ tathā māṁsaṁ medo majjāsthi jīvitam

तार्क्ष्य ने कहा — चतुर्विध भूत-समूह में प्राणी कैसे उत्पन्न होता है? त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि तथा जीवन कैसे बनते हैं?

श्लोक 2 (garuda.2.32.2)

पादौ पाणी तथा गुह्यं जिह्वाकेशनखाः शिरः । सन्धिमार्गाश्च बहुशो रेखा नैकविधास्तथा

pādau pāṇī tathā guhyaṁ jihvākeśanakhāḥ śiraḥ sandhimārgāśca bahuśo rekhā naikavidhāstathā

पैर, हाथ, गुह्यांग, जिह्वा, केश, नख, सिर, संधियों के अनेक मार्ग, तथा नाना प्रकार की रेखाएँ —

श्लोक 3 (garuda.2.32.3)

कामः क्रोधो भयं लज्जा मनो हर्षः सुखासुखम् । चित्रितं छिद्रितञ्चापि नानाजालेन वेष्टितम्

kāmaḥ krodho bhayaṁ lajjā mano harṣaḥ sukhāsukham citritaṁ chidritañcāpi nānājālena veṣṭitam

काम, क्रोध, भय, लज्जा, मन, हर्ष, सुख-दुःख — यह शरीर चित्रित और छिद्रित है, अनेक जालों से आवृत है।

श्लोक 4 (garuda.2.32.4)

इन्द्रजालमिदं मन्ये संसारेऽसारसागरे । कर्ता कोऽत्र हृषीकेश संसारे दुः खसंकुले

indrajālamidaṁ manye saṁsāre'sārasāgare kartā ko'tra hṛṣīkeśa saṁsāre duḥ khasaṁkule

मैं इसे इस असार संसार-सागर में एक इन्द्रजाल मानता हूँ; हे हृषीकेश! इस दुःखपूर्ण संसार में इसका रचयिता कौन है?

श्लोक 5 (garuda.2.32.5)

श्रीविष्णुरुवाच । कथयामि परं गोप्यं कोशस्यास्य विनिर्णयम् । यस्य विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रज्यते

śrīviṣṇuruvāca kathayāmi paraṁ gopyaṁ kośasyāsya vinirṇayam yasya vijñānamātreṇa sarvajñatvaṁ prajyate

श्रीविष्णु ने कहा — मैं इस देह-कोश का परम गोपनीय निर्णय बताता हूँ, जिसे जानने मात्र से सर्वज्ञता प्रकट होती है।

श्लोक 6 (garuda.2.32.6)

साधु पृष्टं त्वया लोके सदयं जीवकारणम् । वैनतेय शृणुष्व त्वमेकाग्रकृतमानसः

sādhu pṛṣṭaṁ tvayā loke sadayaṁ jīvakāraṇam vainateya śṛṇuṣva tvamekāgrakṛtamānasaḥ

हे विनतासुत! तुमने संसार में जीवन के दयायुक्त कारण के विषय में भली भाँति पूछा है; एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 7 (garuda.2.32.7)

ऋतुकाले च नारीणां वर्ज्यं दिनचतुष्टयम् । यतस्तस्मिन् ब्रह्महत्यां पुरा वृत्रसमुत्थिताम्

ṛtukāle ca nārīṇāṁ varjyaṁ dinacatuṣṭayam yatastasmin brahmahatyāṁ purā vṛtrasamutthitām

स्त्रियों के ऋतुकाल के चार दिन वर्ज्य हैं, क्योंकि पूर्वकाल में वृत्रासुर-वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या को

श्लोक 8 (garuda.2.32.8)

ब्रह्मा शक्रात्समुत्तार्य चतुर्थांशेन दत्तवान् । तावन्नालोक्यते वक्त्रं पापं यावद्वपुः स्थितम्

brahmā śakrātsamuttārya caturthāṁśena dattavān tāvannālokyate vaktraṁ pāpaṁ yāvadvapuḥ sthitam

ब्रह्मा ने इन्द्र से उतारकर उसका चतुर्थांश (स्त्रियों को) दिया था; जब तक वह पाप शरीर में स्थित रहता है, तब तक उसका मुख नहीं देखना चाहिए।

श्लोक 9 (garuda.2.32.9)

प्रथमेऽहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रजकी ज्ञेया चतुर्थेऽहनि शुध्यति

prathame'hani cāṇḍālī dvitīye brahmaghātinī tṛtīye rajakī jñeyā caturthe'hani śudhyati

पहले दिन वह चाण्डाली के समान, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान, तीसरे दिन रजकी के समान जानी जाए; चौथे दिन वह शुद्ध हो जाती है।

श्लोक 10 (garuda.2.32.10)

सप्ताहात्पितृदेवानां भवेद्योग्या कृतार्चने । सप्ताहमध्ये यो गर्भस्तत्संम्भूतिर्मलिम्लुचा

saptāhātpitṛdevānāṁ bhavedyogyā kṛtārcane saptāhamadhye yo garbhastatsaṁmbhūtirmalimlucā

सप्ताह बीतने पर वह देव-पितृ पूजन के योग्य होती है; सप्ताह के भीतर जो गर्भ ठहरे, वह मलिन उत्पत्ति वाला होता है।

श्लोक 11 (garuda.2.32.11)

निषेकसमये पित्रोर्यादृक्चित्तविकल्पना । तादृग्गर्भसमुत्पत्तिर्जायते नात्र संशयः

niṣekasamaye pitroryādṛkcittavikalpanā tādṛggarbhasamutpattirjāyate nātra saṁśayaḥ

संभोग के समय माता-पिता के मन में जैसी भावना हो, वैसा ही गर्भ उत्पन्न होता है — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 12 (garuda.2.32.12)

युग्मासु पुत्त्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । पूर्वसप्तममुत्सृज्य तस्माद्युग्मासु संविशेत्

yugmāsu puttrā jāyante striyo'yugmāsu rātriṣu pūrvasaptamamutsṛjya tasmādyugmāsu saṁviśet

सम (युग्म) रात्रियों में पुत्र उत्पन्न होते हैं, विषम रात्रियों में पुत्रियाँ; इसलिए प्रथम सात रात्रियों को छोड़कर युग्म रात्रियों में ही समागम करना चाहिए।

श्लोक 13 (garuda.2.32.13)

षोडशर्तुर्निशाः स्त्रीणां सामान्यात्समुदाहृतः । या चतुर्दशमी रात्रिर्गर्भस्तिष्ठति तत्र चेत्

ṣoḍaśarturniśāḥ strīṇāṁ sāmānyātsamudāhṛtaḥ yā caturdaśamī rātrirgarbhastiṣṭhati tatra cet

सामान्यतः स्त्रियों की सोलह रात्रियाँ ऋतुकाल मानी जाती हैं; यदि उनमें से चौदहवीं रात्रि को गर्भ ठहरे,

श्लोक 14 (garuda.2.32.14)

गुणभाग्यनिधिः पुत्रस्तत्र जायेत धार्मिकः । सा निशा तत्र सामान्यैर्न लभ्येत खगाधिप

guṇabhāgyanidhiḥ putrastatra jāyeta dhārmikaḥ sā niśā tatra sāmānyairna labhyeta khagādhipa

तो वहाँ गुण-भाग्यसम्पन्न, धार्मिक पुत्र उत्पन्न होता है; हे खगाधिप! वह रात्रि साधारण जनों को सहज प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 15 (garuda.2.32.15)

प्रायशः सम्भवत्यत्र गर्भस्त्वष्टाहमध्यतः । पञ्चमेऽहनि नारीणां कार्यं माधुर्यभोजनम्

prāyaśaḥ sambhavatyatra garbhastvaṣṭāhamadhyataḥ pañcame'hani nārīṇāṁ kāryaṁ mādhuryabhojanam

प्रायः गर्भ आठ दिनों के भीतर ठहर जाता है। पाँचवें दिन स्त्री को मधुर भोजन देना चाहिए।

श्लोक 16 (garuda.2.32.16)

कटुक्षारञ्च तीक्ष्णञ्च त्याज्यमुष्णञ्च दूरतः । तत्क्षेत्रमोषधीपात्रं बीजञ्चाप्यमृतायितम्

kaṭukṣārañca tīkṣṇañca tyājyamuṣṇañca dūrataḥ tatkṣetramoṣadhīpātraṁ bījañcāpyamṛtāyitam

कटु, क्षारीय, तीक्ष्ण तथा उष्ण पदार्थों को दूर से त्यागना चाहिए; वह क्षेत्र (गर्भाशय) औषधि का पात्र है, और बीज अमृत के समान है।

श्लोक 17 (garuda.2.32.17)

तस्मिन्नुप्त्वा नरः स्वामी सम्यक्फलमवाप्नुयात् । तस्याश्चैवातपो वर्ज्य शीतलं केवलं चरेत्

tasminnuptvā naraḥ svāmī samyakphalamavāpnuyāt tasyāścaivātapo varjya śītalaṁ kevalaṁ caret

उसमें बीज बोकर पुरुष स्वामी सम्यक् फल प्राप्त करता है; उसके लिए धूप त्याज्य है, केवल शीतलता का ही आचरण करना चाहिए।

श्लोक 18 (garuda.2.32.18)

ताम्बूलपुष्पश्रीखण्डैः संयुक्तः शुचिवस्त्रभृत् । धर्ममादाय मनसि सुतल्पं संविशेत्पुमान्

tāmbūlapuṣpaśrīkhaṇḍaiḥ saṁyuktaḥ śucivastrabhṛt dharmamādāya manasi sutalpaṁ saṁviśetpumān

ताम्बूल, पुष्प तथा चन्दन से युक्त, शुद्ध वस्त्र धारण किए, मन में धर्म रखकर पुरुष को शुभ शय्या पर जाना चाहिए।

श्लोक 19 (garuda.2.32.19)

निषेकसमये यादृङ्नरचित्तविकल्पना । तादृक्स्वभावसम्भूतिर्जन्तुर्विशति कुक्षिगः

niṣekasamaye yādṛṅnaracittavikalpanā tādṛksvabhāvasambhūtirjanturviśati kukṣigaḥ

संभोग के समय पुरुष के मन में जैसी भावना हो, वैसा ही स्वभाव लेकर वह प्राणी गर्भ में प्रवेश करता है।

श्लोक 20 (garuda.2.32.20)

शुक्रशोणितसंयोगे पिण्डोत्पत्तिः प्रजायते । वर्धते जठरे जन्तुस्तारापतिरिवाम्बरे

śukraśoṇitasaṁyoge piṇḍotpattiḥ prajāyate vardhate jaṭhare jantustārāpatirivāmbare

शुक्र और शोणित (रज) के संयोग से पिण्ड की उत्पत्ति होती है; प्राणी गर्भ में वैसे ही बढ़ता है जैसे आकाश में चन्द्रमा।

श्लोक 21 (garuda.2.32.21)

चैतन्यं बीजरूपं हि शुक्रे नित्यं व्यवस्थितम् । कामश्चित्तञ्च शुक्रञ्च यदा ह्येकत्वमाप्नुयुः

caitanyaṁ bījarūpaṁ hi śukre nityaṁ vyavasthitam kāmaścittañca śukrañca yadā hyekatvamāpnuyuḥ

चैतन्य बीज-रूप में सदा शुक्र में स्थित रहता है; जब काम, चित्त और शुक्र एकत्व को प्राप्त होते हैं,

श्लोक 22 (garuda.2.32.22)

तदा द्रावमवाप्नोति योषागर्भाशये नरः । रक्ताधिक्ये भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत्पुमान्

tadā drāvamavāpnoti yoṣāgarbhāśaye naraḥ raktādhikye bhavennārī śukrādhikye bhavetpumān

तब पुरुष स्त्री के गर्भाशय में द्रव (वीर्यपात) को प्राप्त करता है। रक्त की अधिकता से पुत्री होती है, शुक्र की अधिकता से पुत्र।

श्लोक 23 (garuda.2.32.23)

शुक्रशोणितयो साम्ये गर्भाः षण्डत्वमाप्नुयुः । अहोरात्रेण कलिलं बुद्वदं पञ्चभिर्दिनैः

śukraśoṇitayo sāmye garbhāḥ ṣaṇḍatvamāpnuyuḥ ahorātreṇa kalilaṁ budvadaṁ pañcabhirdinaiḥ

शुक्र और शोणित की समानता होने पर गर्भ नपुंसक हो जाता है। एक दिन-रात में वह कलिल (द्रव पिण्ड) बनता है, पाँच दिनों में बुद्बुद (बुलबुला) रूप;

श्लोक 24 (garuda.2.32.24)

चतुर्दशे भवेन्मांसं मिश्रधातुसमन्वितम् । घनं मांसञ्च विंशाहे गर्भस्थो वर्धते क्रमात्

caturdaśe bhavenmāṁsaṁ miśradhātusamanvitam ghanaṁ māṁsañca viṁśāhe garbhastho vardhate kramāt

चौदहवें दिन वह मिश्रित धातुओं से युक्त मांस बनता है; बीसवें दिन ठोस मांस होता है, गर्भस्थ प्राणी क्रमशः बढ़ता है।

श्लोक 25 (garuda.2.32.25)

पञ्चविंशतिमे चाह्नि बलं पुष्टिश्च जायते । तथा मासे तु सम्पूर्णे पञ्चतत्त्वं निधारयेत्

pañcaviṁśatime cāhni balaṁ puṣṭiśca jāyate tathā māse tu sampūrṇe pañcatattvaṁ nidhārayet

पच्चीसवें दिन बल और पुष्टि उत्पन्न होती है; एक मास पूर्ण होने पर पंचतत्व स्थिर हो जाते हैं।

श्लोक 26 (garuda.2.32.26)

मासद्वये तु सञ्जाते त्वचा मेदश्च जायते । मज्जास्थीनि त्रिभिर्मासैः केशाङ्गुल्यश्चतुर्थके

māsadvaye tu sañjāte tvacā medaśca jāyate majjāsthīni tribhirmāsaiḥ keśāṅgulyaścaturthake

दो मास बीतने पर त्वचा और मेद बनते हैं; तीन मास में मज्जा-अस्थि, चौथे मास में केश और अंगुलियाँ।

श्लोक 27 (garuda.2.32.27)

कर्णौ च नासिके वक्षो जायेरन्मासि पञ्चमे । कण्ठरन्ध्रोदरं षष्ठे गुह्यादिर्मासि सप्तमे

karṇau ca nāsike vakṣo jāyeranmāsi pañcame kaṇṭharandhrodaraṁ ṣaṣṭhe guhyādirmāsi saptame

पाँचवें मास में कान, नासिका और वक्ष उत्पन्न होते हैं; छठे में कण्ठ-रन्ध्र और उदर, सातवें मास में गुह्यांग आदि।

श्लोक 28 (garuda.2.32.28)

अङ्गप्रत्यङ्गसम्पूर्णो गर्भो मासैरथाष्टभिः । अष्टमे चलते जीवो धात्रीगर्भे पुनः पुनः । नवमेमासि सम्प्राप्ते गर्भस्थौजौ दृढं भवेत्

aṅgapratyaṅgasampūrṇo garbho māsairathāṣṭabhiḥ aṣṭame calate jīvo dhātrīgarbhe punaḥ punaḥ navamemāsi samprāpte garbhasthaujau dṛḍhaṁ bhavet

आठवें मास में गर्भ अंग-प्रत्यंगों से पूर्ण हो जाता है; आठवें मास में जीव बार-बार माता के गर्भ में हलचल करता है; नवें मास में गर्भ का बल दृढ़ हो जाता है।

श्लोक 29 (garuda.2.32.29)

चिकित्सा जायते तस्य गर्भवासपरिक्षये । नारी वाथ नरो वाथ नपुंस्त्वं वाभिजायते

cikitsā jāyate tasya garbhavāsaparikṣaye nārī vātha naro vātha napuṁstvaṁ vābhijāyate

गर्भवास के समाप्त होने पर उसमें चिकित्सा (विवेक) उत्पन्न होती है; तब वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 30 (garuda.2.32.30)

शक्तित्रयं विशालाक्षं षाट्कौशिकसमायुतम् । पञ्चेन्द्रियसमोपेतं दशनाडीविभूषितम्

śaktitrayaṁ viśālākṣaṁ ṣāṭkauśikasamāyutam pañcendriyasamopetaṁ daśanāḍīvibhūṣitam

तीन शक्तियों से युक्त, विशाल नेत्रों वाला, छह कोशों से युक्त, पाँचों इन्द्रियों से सम्पन्न, दस नाड़ियों से सुशोभित,

श्लोक 31 (garuda.2.32.31)

दशप्राणगुणोपेतं यो जानाति स योगवित् । मज्जास्थिशुक्रमांसानि रोम रक्तं बलं तथा

daśaprāṇaguṇopetaṁ yo jānāti sa yogavit majjāsthiśukramāṁsāni roma raktaṁ balaṁ tathā

तथा दस प्राण-गुणों से युक्त — जो इसे जानता है, वही योगवेत्ता है। मज्जा, अस्थि, शुक्र, मांस, रोम, रक्त तथा बल —

श्लोक 32 (garuda.2.32.32)

षाट्कौशिकमिदं पिण्डं स्याज्जन्तोः पाञ्चभौतिकम् । नवमे दशमे मासि जायते पाञ्चभौतिकः

ṣāṭkauśikamidaṁ piṇḍaṁ syājjantoḥ pāñcabhautikam navame daśame māsi jāyate pāñcabhautikaḥ

यह छह कोशों वाला पिण्ड प्राणी का पंचभौतिक शरीर है। नवें या दसवें मास में यह पूर्ण पंचभौतिक हो जाता है।

श्लोक 33 (garuda.2.32.33)

सूतिवातैः समाकृष्टः पीडया विह्वलीकृतः । पुष्टो नाड्याः सुषुम्णाया योषिद्गर्भस्थितस्त्वरन्

sūtivātaiḥ samākṛṣṭaḥ pīḍayā vihvalīkṛtaḥ puṣṭo nāḍyāḥ suṣumṇāyā yoṣidgarbhasthitastvaran

प्रसव-वायु से खींचा गया, पीड़ा से व्याकुल, सुषुम्ना नाड़ी से पुष्ट, गर्भस्थित प्राणी शीघ्रता करता है।

श्लोक 34 (garuda.2.32.34)

क्षितिर्वारि हविर्भोक्ता पवनाकाशमेव च । एभिर्भूतैः पीडितस्तु निबद्धः स्नायुबन्धनैः

kṣitirvāri havirbhoktā pavanākāśameva ca ebhirbhūtaiḥ pīḍitastu nibaddhaḥ snāyubandhanaiḥ

पृथ्वी, जल, अग्नि (हवि-भोक्ता), वायु तथा आकाश — इन तत्वों से पीड़ित तथा स्नायु-बन्धनों से बँधा हुआ,

श्लोक 35 (garuda.2.32.35)

मूलभूता इमे प्रोक्ताः सप्त नाड्यन्तरे स्थिताः । त्वचास्थिनाड्यो रोमाणि मांसञ्चैवात्र पञ्चमम्

mūlabhūtā ime proktāḥ sapta nāḍyantare sthitāḥ tvacāsthināḍyo romāṇi māṁsañcaivātra pañcamam

ये मूल तत्व सात नाड़ियों में स्थित कहे गए हैं — त्वचा, अस्थि, नाड़ियाँ, रोम तथा पाँचवाँ मांस।

श्लोक 36 (garuda.2.32.36)

एते पञ्च गुणाः प्रोक्ता मया भूमेः खगेश्वर । यथा पञ्च गुणाश्चापस्तथा तच्छृणु काश्यप

ete pañca guṇāḥ proktā mayā bhūmeḥ khageśvara yathā pañca guṇāścāpastathā tacchṛṇu kāśyapa

हे खगेश्वर! ये पृथ्वी के पाँच गुण मैंने बताए; अब जल के पाँच गुण सुनो, हे काश्यप।

श्लोक 37 (garuda.2.32.37)

लाला मूत्रं तथा शुक्रं मज्जार रक्तञ्च पञ्चमम् । आपः पञ्चगुणाः प्रोक्ता ज्ञातव्यास्ते प्रयत्नतः

lālā mūtraṁ tathā śukraṁ majjāra raktañca pañcamam āpaḥ pañcaguṇāḥ proktā jñātavyāste prayatnataḥ

लार, मूत्र, शुक्र, मज्जा तथा पाँचवाँ रक्त — ये जल के पाँच गुण कहे गए हैं, इन्हें यत्नपूर्वक जानना चाहिए।

श्लोक 38 (garuda.2.32.38)

क्षुधा तृषा तथा निद्रा आलस्यं कान्तिरेव च । तेजः पञ्चगुणं प्रोक्तं तार्क्ष्य सर्वत्रयोगिभिः

kṣudhā tṛṣā tathā nidrā ālasyaṁ kāntireva ca tejaḥ pañcaguṇaṁ proktaṁ tārkṣya sarvatrayogibhiḥ

भूख, प्यास, नींद, आलस्य तथा कान्ति — हे तार्क्ष्य! ये अग्नि के पाँच गुण सभी योगियों द्वारा कहे गए हैं।

श्लोक 39 (garuda.2.32.39)

रागद्वेषौ तथा लज्जा भयं मोहस्तथैव च । इत्येतत्कथितं तार्क्ष्य वायुजं गुणपञ्चकम्

rāgadveṣau tathā lajjā bhayaṁ mohastathaiva ca ityetatkathitaṁ tārkṣya vāyujaṁ guṇapañcakam

राग-द्वेष, लज्जा, भय तथा मोह — हे तार्क्ष्य! ये वायु से उत्पन्न पाँच गुण कहे गए हैं।

श्लोक 40 (garuda.2.32.40)

आकुञ्चनं धावनञ्च लङ्घनञ्च प्रसारणम् । निरोधः पञ्चमः प्रोक्तो वायोः पञ्च गुणाः स्मृताः

ākuñcanaṁ dhāvanañca laṅghanañca prasāraṇam nirodhaḥ pañcamaḥ prokto vāyoḥ pañca guṇāḥ smṛtāḥ

सिकुड़ना, दौड़ना, कूदना, फैलना तथा पाँचवाँ अवरोध — ये वायु के पाँच गुण स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 41 (garuda.2.32.41)

घोषश्चिन्ता च गाम्भीर्यं श्रवणं सत्यसंक्रमः । आकाशस्य गुणाः पञ्च ज्ञातव्यास्तार्क्ष्य यत्नतः

ghoṣaścintā ca gāmbhīryaṁ śravaṇaṁ satyasaṁkramaḥ ākāśasya guṇāḥ pañca jñātavyāstārkṣya yatnataḥ

घोष (ध्वनि), चिन्तन, गम्भीरता, श्रवण तथा सत्य का संचरण — हे तार्क्ष्य! ये आकाश के पाँच गुण यत्नपूर्वक जानने चाहिए।

श्लोक 42 (garuda.2.32.42)

श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासा बुद्धीन्द्रियाणि च । पाणी पादौ गुदं प्राक्च गुह्यं कर्मेन्द्रियाणि च

śrotraṁ tvakcakṣuṣī jihvā nāsā buddhīndriyāṇi ca pāṇī pādau gudaṁ prākca guhyaṁ karmendriyāṇi ca

कान, त्वचा, आँखें, जिह्वा, नासिका — ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं; हाथ, पैर, गुदा तथा गुह्यांग — ये कर्मेन्द्रियाँ हैं।

श्लोक 43 (garuda.2.32.43)

इडाच पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका । गान्धारी गजजिह्वा च पूषा चैव यशा तथा

iḍāca piṅgalā caiva suṣumṇā ca tṛtīyakā gāndhārī gajajihvā ca pūṣā caiva yaśā tathā

इडा, पिंगला, तीसरी सुषुम्ना, गान्धारी, गजजिह्वा, पूषा तथा यशस्विनी,

श्लोक 44 (garuda.2.32.44)

अलम्बुषा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता । पिण्ड मध्ये स्थिता ह्येताः प्रधाना दश नाडयः

alambuṣā kuhūścaiva śaṅkhinī daśamī smṛtā piṇḍa madhye sthitā hyetāḥ pradhānā daśa nāḍayaḥ

अलम्बुषा, कुहू, तथा दसवीं शंखिनी स्मरण की गई है — ये पिण्ड के मध्य स्थित प्रधान दस नाड़ियाँ हैं।

श्लोक 45 (garuda.2.32.45)

प्राणापानौ समानश्च उदानो व्यान एव च । नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः

prāṇāpānau samānaśca udāno vyāna eva ca nāgaḥ kūrmaśca kṛkaro devadatto dhanañjayaḥ

प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान; नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त तथा धनञ्जय —

श्लोक 46 (garuda.2.32.46)

इत्येते वायवः प्रोक्ता दश देहेषु सुस्थिताः । केवलं भुक्तमन्नञ्च पुष्टिदं सर्वदेहिनाम्

ityete vāyavaḥ proktā daśa deheṣu susthitāḥ kevalaṁ bhuktamannañca puṣṭidaṁ sarvadehinām

ये दस वायु शरीर में सुस्थित कहे गए हैं। केवल खाया हुआ अन्न ही सब देहधारियों को पुष्टि देता है,

श्लोक 47 (garuda.2.32.47)

नयते प्राणदो वायुः शरीरे सर्वसन्धिषु । आहारो भुक्तमात्रस्तु वायुना क्रियते द्विधा

nayate prāṇado vāyuḥ śarīre sarvasandhiṣu āhāro bhuktamātrastu vāyunā kriyate dvidhā

प्राणदायी वायु उसे शरीर के सभी संधि-स्थानों तक ले जाता है। खाया हुआ आहार वायु द्वारा दो भागों में किया जाता है;

श्लोक 48 (garuda.2.32.48)

स प्रविश्य गुहे सम्यक्पृथगन्नं पृथग्जलम् । ऊर्ध्वमग्नेर्जलं कृत्वा तदन्नञ्च जलोपरि

sa praviśya guhe samyakpṛthagannaṁ pṛthagjalam ūrdhvamagnerjalaṁ kṛtvā tadannañca jalopari

वह भलीभाँति उदर-गुहा में प्रवेश कर अन्न और जल को अलग करता है — अग्नि के ऊपर जल को और उसके ऊपर अन्न को रखता है,

श्लोक 49 (garuda.2.32.49)

अग्नेश्चाधः स्वयं प्राणस्तमग्निञ्च धमेच्छनैः । वायुना धम्यमानोऽग्निः पृथक्किट्टं पृथग्रसम्

agneścādhaḥ svayaṁ prāṇastamagniñca dhamecchanaiḥ vāyunā dhamyamāno'gniḥ pṛthakkiṭṭaṁ pṛthagrasam

तथा प्राण स्वयं अग्नि के नीचे रहकर उसे धीरे-धीरे प्रज्वलित करता है। वायु से प्रज्वलित होकर वह अग्नि मल और रस को अलग करती है।

श्लोक 50 (garuda.2.32.50)

मलैर्द्वादशभिः किट्टं भिन्नं देहात्पृथग्भवेत् । कर्णाक्षिनासिका जिह्वा दन्तनाभिवपुर्गुदम्

malairdvādaśabhiḥ kiṭṭaṁ bhinnaṁ dehātpṛthagbhavet karṇākṣināsikā jihvā dantanābhivapurgudam

बारह मलों के द्वारा मल शरीर से पृथक होता है — कान, आँख, नासिका, जिह्वा, दाँत, नाभि, शरीर, गुदा,

श्लोक 51 (garuda.2.32.51)

नखा मलाश्रया ह्येते विण्मूत्रञ्चेत्यनन्तकम् । शुक्रशोणितसंयोगादेतत्षाट्कौशिकं स्मृतम्

nakhā malāśrayā hyete viṇmūtrañcetyanantakam śukraśoṇitasaṁyogādetatṣāṭkauśikaṁ smṛtam

तथा नख इन मलों के आश्रय हैं — मल-मूत्र सहित अनेक। शुक्र-शोणित के संयोग से यह छह-कोशीय शरीर बनता है, ऐसा कहा गया है।

श्लोक 52 (garuda.2.32.52)

रोम्णां कोट्यस्तथा तिस्रोऽप्यर्धकोटि समन्विताः । द्वात्रिंशद्दशनाः प्रोक्ताः सामान्याद्विनतासुत

romṇāṁ koṭyastathā tisro'pyardhakoṭi samanvitāḥ dvātriṁśaddaśanāḥ proktāḥ sāmānyādvinatāsuta

शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम होते हैं; हे विनतासुत! सामान्यतः बत्तीस दाँत कहे गए हैं।

श्लोक 53 (garuda.2.32.53)

सप्त लक्षाणि केशाः स्युर्नखाः प्रोक्तास्तु विंशतिः । मांसं पलसहस्रैकं सामान्याद्देहसंस्थितम्

sapta lakṣāṇi keśāḥ syurnakhāḥ proktāstu viṁśatiḥ māṁsaṁ palasahasraikaṁ sāmānyāddehasaṁsthitam

सिर के केश सात लाख होते हैं, नख बीस कहे गए हैं; शरीर में सामान्यतः एक हजार पल मांस होता है।

श्लोक 54 (garuda.2.32.54)

रक्तं पलशतं तार्क्ष्यं बुद्धमेव पुरातनैः । पलानि दश मेदश्च त्वचा चैव तु तत्समा

raktaṁ palaśataṁ tārkṣyaṁ buddhameva purātanaiḥ palāni daśa medaśca tvacā caiva tu tatsamā

हे तार्क्ष्य! पूर्वजों ने रक्त सौ पल जाना है; मेद दस पल, तथा त्वचा भी उतनी ही।

श्लोक 55 (garuda.2.32.55)

पलद्वादशकं मज्जा महारक्तं पलत्रयम् । शुक्रं द्विकुडवं ज्ञेयं शोणितं कुडवं स्मृतम्

paladvādaśakaṁ majjā mahāraktaṁ palatrayam śukraṁ dvikuḍavaṁ jñeyaṁ śoṇitaṁ kuḍavaṁ smṛtam

मज्जा बारह पल, महारक्त तीन पल; शुक्र दो कुडव जानना चाहिए, शोणित एक कुडव कहा गया है।

श्लोक 56 (garuda.2.32.56)

श्लेष्माणश्च षडूर्ध्वञ्च विण्मूत्रं तत्प्रमाणतः । अस्थ्नां हि ह्यधिकं प्रोक्तं षष्ट्युत्तरशतत्रयात्

śleṣmāṇaśca ṣaḍūrdhvañca viṇmūtraṁ tatpramāṇataḥ asthnāṁ hi hyadhikaṁ proktaṁ ṣaṣṭyuttaraśatatrayāt

कफ छह पल से अधिक, तथा मल-मूत्र भी उसी प्रमाण में; अस्थियाँ तीन सौ साठ से भी अधिक कही गई हैं।

श्लोक 57 (garuda.2.32.57)

एवं पिण्डः समाख्यातो वैभवं सम्प्रचक्ष्महे । सुखं दुः खं भयं क्षेमं कर्मणैव हि प्राप्यते

evaṁ piṇḍaḥ samākhyāto vaibhavaṁ sampracakṣmahe sukhaṁ duḥ khaṁ bhayaṁ kṣemaṁ karmaṇaiva hi prāpyate

इस प्रकार पिण्ड (शरीर) का वर्णन किया गया; अब इसके वैभव के विषय में बताते हैं — सुख, दुःख, भय, क्षेम — ये सब कर्म से ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 58 (garuda.2.32.58)

अधोमुखं चोर्ध्वपादं गर्भाद्वायुः प्रकर्षति । तले तु करयोर्न्यस्य वर्धते जानुपार्श्वयोः

adhomukhaṁ cordhvapādaṁ garbhādvāyuḥ prakarṣati tale tu karayornyasya vardhate jānupārśvayoḥ

सिर नीचे, पैर ऊपर करके वायु गर्भ से बाहर खींचता है; तली में हाथ रखकर वह घुटनों और बगल में बढ़ता है,

श्लोक 59 (garuda.2.32.59)

अङ्गुष्ठौ चोपरि न्यस्तौ जान्वोरथ कराङ्गुली । जानुपृष्ठे तथा नेत्रे जानुमध्ये च नासिका

aṅguṣṭhau copari nyastau jānvoratha karāṅgulī jānupṛṣṭhe tathā netre jānumadhye ca nāsikā

अँगूठे घुटनों के ऊपर रखे रहते हैं, हाथ की अंगुलियाँ घुटनों पर; घुटनों के पीछे आँखें, तथा घुटनों के बीच नासिका होती है।

श्लोक 60 (garuda.2.32.60)

एवं वृद्धिं क्रमाद्याति जन्तुः स्त्रीगर्भसंस्थितः । काठिन्यमस्थीन्यायान्ति भुक्तपीतेन जीवति

evaṁ vṛddhiṁ kramādyāti jantuḥ strīgarbhasaṁsthitaḥ kāṭhinyamasthīnyāyānti bhuktapītena jīvati

इस प्रकार क्रमशः वह प्राणी स्त्री के गर्भ में बढ़ता है; खाए-पिए हुए से ही जीता है, अस्थियाँ कठोर होती जाती हैं।

श्लोक 61 (garuda.2.32.61)

नाडी वाप्यायनी नाम नाभ्यां तत्र निबध्यते । स्त्रीणां तथान्त्रसुषिरे स निबद्धः प्रजायते

nāḍī vāpyāyanī nāma nābhyāṁ tatra nibadhyate strīṇāṁ tathāntrasuṣire sa nibaddhaḥ prajāyate

'आप्यायनी' नामक नाड़ी वहाँ नाभि में बँधी रहती है; स्त्रियों में वह आँतों की गुहा में बँधकर उत्पन्न होती है।

श्लोक 62 (garuda.2.32.62)

क्रामन्ति भुक्तपीतानि स्त्रीणां गर्भोदरे तथा । तैराप्यायितदेहोऽसौ जन्तुर्वृद्धिमुपैति च

krāmanti bhuktapītāni strīṇāṁ garbhodare tathā tairāpyāyitadeho'sau janturvṛddhimupaiti ca

स्त्री के गर्भाशय में खाए-पिए पदार्थ उसी प्रकार संचरित होते हैं; उनसे उस प्राणी का शरीर पुष्ट होकर बढ़ता है।

श्लोक 63 (garuda.2.32.63)

स्मृत्यस्तत्र प्रयान्त्यस्य बह्व्यः संसारभूतयः । ततो निर्वेदमायाति पीड्यमान इतस्ततः

smṛtyastatra prayāntyasya bahvyaḥ saṁsārabhūtayaḥ tato nirvedamāyāti pīḍyamāna itastataḥ

वहाँ उसे अपने पूर्व-जन्मों की अनेक स्मृतियाँ याद आती हैं; इधर-उधर पीड़ित होते हुए वह वैराग्य को प्राप्त होता है।

श्लोक 64 (garuda.2.32.64)

पुनर्नैवं करिष्यामि भुक्तमात्र इहोदरात् । तथातथा यतिष्यामि गर्भं नाप्नोम्यहं यथा

punarnaivaṁ kariṣyāmi bhuktamātra ihodarāt tathātathā yatiṣyāmi garbhaṁ nāpnomyahaṁ yathā

'मैं यहाँ उदर से बाहर निकलने पर पुनः ऐसा नहीं करूँगा; मैं ऐसा-ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मुझे पुनः गर्भ प्राप्त न हो।'

श्लोक 65 (garuda.2.32.65)

इति सञ्चिन्तयञ्जीवो स्मृत्वा जन्मशतानि वै । यानि पूर्वानुभूतानि देवभूतात्मजानि वै

iti sañcintayañjīvo smṛtvā janmaśatāni vai yāni pūrvānubhūtāni devabhūtātmajāni vai

इस प्रकार सोचता हुआ जीव अपने सैकड़ों पूर्व-जन्मों को स्मरण करता है, जो देव, पशु तथा मानव योनियों में अनुभव किए गए थे।

श्लोक 66 (garuda.2.32.66)

ततः कालक्रमाज्जन्तुः परिवर्त्यत्वधोमुखः । नवमे दशमे वापि मासि संजायते ततः

tataḥ kālakramājjantuḥ parivartyatvadhomukhaḥ navame daśame vāpi māsi saṁjāyate tataḥ

तत्पश्चात् कालक्रम से वह प्राणी उलटकर अधोमुख हो जाता है, और नवें या दसवें मास में उत्पन्न होता है।

श्लोक 67 (garuda.2.32.67)

निष्क्रम्यमाणो वातेन प्राजापत्येन पीड्यते । निष्क्रमते च विलपंस्तदा दुःखनिपीडितः

niṣkramyamāṇo vātena prājāpatyena pīḍyate niṣkramate ca vilapaṁstadā duḥkhanipīḍitaḥ

बाहर निकलते समय प्रजापति-वायु से पीड़ित होकर, दुःख से व्याकुल होकर वह विलाप करते हुए बाहर निकलता है।

श्लोक 68 (garuda.2.32.68)

निष्क्रामंश्चोदरान्मूर्छामसह्यां प्रतिपद्यते । प्राप्नोति चेतनां चासौ वायुस्पर्शसुखान्वितः

niṣkrāmaṁścodarānmūrchāmasahyāṁ pratipadyate prāpnoti cetanāṁ cāsau vāyusparśasukhānvitaḥ

उदर से निकलते समय उसे असह्य मूर्च्छा होती है; और वायु के स्पर्श-सुख से युक्त होकर वह चेतना प्राप्त करता है।

श्लोक 69 (garuda.2.32.69)

ततस्तं वैष्णवी माया समास्कन्दति मोहिनी । तया विमोहितात्मासौ ज्ञानभ्रंशमवाप्नुते

tatastaṁ vaiṣṇavī māyā samāskandati mohinī tayā vimohitātmāsau jñānabhraṁśamavāpnute

तत्पश्चात् वैष्णवी मोहिनी माया उस पर आक्रमण करती है,

श्लोक 70 (garuda.2.32.70)

भ्रष्टज्ञानं बालभावे ततो जन्तुः प्रपद्यते । ततः कौमारकावस्थां यौवनं वृद्धतामपि

bhraṣṭajñānaṁ bālabhāve tato jantuḥ prapadyate tataḥ kaumārakāvasthāṁ yauvanaṁ vṛddhatāmapi

जिससे उसका मन मोहित होकर ज्ञान खो देता है। ज्ञान-भ्रष्ट होकर वह प्राणी बाल्यावस्था को प्राप्त होता है, फिर कौमार, यौवन तथा वृद्धावस्था को।

श्लोक 71 (garuda.2.32.71)

पुनश्च तद्वन्मरणं जन्म प्राप्नोति मानवः । ततः संसारचक्रेऽस्मिन् भ्राम्यते घटयन्त्रवत्

punaśca tadvanmaraṇaṁ janma prāpnoti mānavaḥ tataḥ saṁsāracakre'smin bhrāmyate ghaṭayantravat

और फिर उसी प्रकार मनुष्य पुनः जन्म-मरण को प्राप्त होता है; इस प्रकार वह घटी-यन्त्र (रहट) के समान इस संसार-चक्र में घूमता रहता है।

श्लोक 72 (garuda.2.32.72)

कदाचित्स्वर्गमाप्नोति कदाचिन्निरयं नरः । स्वर्गं च निरयं चैव स्वकर्मफलमश्नुते

kadācitsvargamāpnoti kadācinnirayaṁ naraḥ svargaṁ ca nirayaṁ caiva svakarmaphalamaśnute

मनुष्य कभी स्वर्ग प्राप्त करता है, कभी नरक; वह स्वर्ग और नरक दोनों को अपने कर्मफल के अनुसार भोगता है।

श्लोक 73 (garuda.2.32.73)

कदाचिद्भुक्तकर्मा च भुवं स्वल्पेन गच्छति । स्वर्लोके नरके चैव भुक्तप्राये द्विजोत्तमाः

kadācidbhuktakarmā ca bhuvaṁ svalpena gacchati svarloke narake caiva bhuktaprāye dvijottamāḥ

कभी अपना कर्मफल भोगकर वह शीघ्र ही पृथ्वी पर लौट आता है; हे द्विजोत्तमों! स्वर्ग और नरक दोनों में जब भोग समाप्तप्राय होता है,

श्लोक 74 (garuda.2.32.74)

नरकेषु महद्दुःखमेतद्यत्स्वर्गवासिनः । दृश्यते नात्र मोदन्ते पात्यमानास्तु नारकैः

narakeṣu mahadduḥkhametadyatsvargavāsinaḥ dṛśyate nātra modante pātyamānāstu nārakaiḥ

नरकों में यह महान दुःख होता है कि वहाँ स्वर्गवासी सुखी दिखाई नहीं देते; नारकीय यातनाओं से गिराए जा रहे प्राणी वहाँ आनन्दित नहीं होते।

श्लोक 75 (garuda.2.32.75)

स्वर्गेऽपि दुः खमतुलं यदारोहणकालतः । प्रभृत्यहं पतिष्यामीत्येतन्मनसि वर्तते

svarge'pi duḥ khamatulaṁ yadārohaṇakālataḥ prabhṛtyahaṁ patiṣyāmītyetanmanasi vartate

स्वर्ग में भी अतुलनीय दुःख है, क्योंकि वहाँ पहुँचने के क्षण से ही 'मैं गिर जाऊँगा' — यह भावना मन में बनी रहती है।

श्लोक 76 (garuda.2.32.76)

नारकांश्चैव सम्प्रेक्ष्य महद्दुःखमवाप्यते । एवं गतिमहं गन्तेत्यहर्निशमनिर्वृतः

nārakāṁścaiva samprekṣya mahadduḥkhamavāpyate evaṁ gatimahaṁ gantetyaharniśamanirvṛtaḥ

नारकीय प्राणियों को देखकर महान दुःख उत्पन्न होता है — 'मैं भी ऐसी ही गति को प्राप्त होऊँगा' — इस प्रकार दिन-रात वह अशान्त रहता है।

श्लोक 77 (garuda.2.32.77)

गर्भवासे महद्दुःखं जायमानस्य योनिजम् । जातस्य बालभावेऽपि वृद्धत्वे दुःखमेव च

garbhavāse mahadduḥkhaṁ jāyamānasya yonijam jātasya bālabhāve'pi vṛddhatve duḥkhameva ca

गर्भवास में जन्म लेते समय योनि से उत्पन्न महान दुःख होता है; जन्म लेने पर बाल्यावस्था में भी, तथा वृद्धावस्था में भी दुःख ही रहता है।

श्लोक 78 (garuda.2.32.78)

कामेर्ष्याक्रोधसम्बन्धाद्यौवनेऽपि च दुः सहम् । दुःस्वप्नं या वृद्धता च मरणे दुःखमुत्कटम्

kāmerṣyākrodhasambandhādyauvane'pi ca duḥ saham duḥsvapnaṁ yā vṛddhatā ca maraṇe duḥkhamutkaṭam

यौवन में भी काम, ईर्ष्या और क्रोध के सम्बन्ध से असह्य दुःख होता है; बुरे स्वप्न, वृद्धावस्था तथा मृत्यु के समय अत्यंत तीव्र दुःख होता है।

श्लोक 79 (garuda.2.32.79)

कृष्यमाणश्च याम्यैः स नरकेऽपि च यात्यधः । पुनश्च गर्भाज्जन्म स्यान्मरणं दुष्करं तथा

kṛṣyamāṇaśca yāmyaiḥ sa narake'pi ca yātyadhaḥ punaśca garbhājjanma syānmaraṇaṁ duṣkaraṁ tathā

याम्य दूतों द्वारा खींचा जाकर वह नरक में भी नीचे जाता है; फिर से गर्भ से जन्म होता है, और फिर वही दुष्कर मृत्यु।

श्लोक 80 (garuda.2.32.80)

एवं संसारचक्रेऽस्मिज्जन्तवो घटयन्त्रवत् । भ्राम्यन्ते प्राक्तनैर्बधैर्बद्धा विध्यन्ति चासकृत्

evaṁ saṁsāracakre'smijjantavo ghaṭayantravat bhrāmyante prāktanairbadhairbaddhā vidhyanti cāsakṛt

इस प्रकार इस संसार-चक्र में प्राणी घटी-यन्त्र के समान अपने पूर्वजन्मार्जित बन्धनों से बँधे हुए बार-बार घूमते और पीड़ित होते रहते हैं।

श्लोक 81 (garuda.2.32.81)

नास्ति पक्षिन्सुखं किञ्चित्क्षेत्रे दुः खशताकुले । विनतासुत मोक्षाय यतितव्यं ततो नरैः

nāsti pakṣinsukhaṁ kiñcitkṣetre duḥ khaśatākule vinatāsuta mokṣāya yatitavyaṁ tato naraiḥ

हे पक्षी! सैकड़ों दुःखों से भरे इस क्षेत्र में तनिक भी सुख नहीं है; इसलिए हे विनतासुत, मनुष्यों को मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक 82 (garuda.2.32.82)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा गर्भस्य संस्थितिः । कथयामि क्रमप्रश्रं पृष्टं वा वर्तते स्पृहा

etatte sarvamākhyātaṁ yathā garbhasya saṁsthitiḥ kathayāmi kramapraśraṁ pṛṣṭaṁ vā vartate spṛhā

यह सब मैंने तुम्हें गर्भ की स्थिति के विषय में बताया। अब मैं क्रमशः तुम्हारे पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताता हूँ, अथवा यदि तुम्हारी और जिज्ञासा हो तो बताओ।

श्लोक 83 (garuda.2.32.83)

गरुड उवाच । मध्ये कृतमहाप्रश्नद्वयस्याप्तं मयोत्तरम् । प्रश्नस्यापि तृतीयस्य उत्तरं च विधीयताम्

garuḍa uvāca madhye kṛtamahāpraśnadvayasyāptaṁ mayottaram praśnasyāpi tṛtīyasya uttaraṁ ca vidhīyatām

गरुड ने कहा — मध्य में पूछे गए दो महाप्रश्नों का उत्तर मुझे प्राप्त हो गया; अब तीसरे प्रश्न का उत्तर भी दीजिए।

श्लोक 84 (garuda.2.32.84)

श्रीकृष्ण उवाच । म्रियमाणस्य किं कृत्यमिति त्वं पृष्टवानसि । शृणु तत्रोत्तरं तूक्तं कथयामि समासतः

śrīkṛṣṇa uvāca mriyamāṇasya kiṁ kṛtyamiti tvaṁ pṛṣṭavānasi śṛṇu tatrottaraṁ tūktaṁ kathayāmi samāsataḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — तुमने पूछा था कि मरणासन्न व्यक्ति के लिए क्या करना चाहिए; उसका उत्तर सुनो, मैं संक्षेप में बताता हूँ।

श्लोक 85 (garuda.2.32.85)

आसन्नमरणं ज्ञात्वा पुरुषं स्नापयेत्ततः । गोमूत्रगोमयसुमृत्तीर्थोदककुशोदकैः

āsannamaraṇaṁ jñātvā puruṣaṁ snāpayettataḥ gomūtragomayasumṛttīrthodakakuśodakaiḥ

मृत्यु निकट जानकर पुरुष को गोमूत्र, गोबर, पवित्र मिट्टी, तीर्थ-जल तथा कुश-जल से स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 86 (garuda.2.32.86)

वाससी परिधार्याथ धौते तु शुचिनी शुभे । दर्भाण्यादौ समास्तीर्य दक्षिणाग्रान्विकीर्य च

vāsasī paridhāryātha dhaute tu śucinī śubhe darbhāṇyādau samāstīrya dakṣiṇāgrānvikīrya ca

फिर धुले हुए दो शुद्ध शुभ वस्त्र पहनाकर, पहले कुश बिछाकर, उनके अग्रभाग दक्षिण दिशा में करके बिखेरना चाहिए,

श्लोक 87 (garuda.2.32.87)

तिलान् गोमयलिप्तायां भूमौ तत्र निवेशयेत्

tilān gomayaliptāyāṁ bhūmau tatra niveśayet

तथा गोबर से लीपी हुई भूमि पर तिल बिछाकर वहाँ उसे लिटाना चाहिए।

श्लोक 88 (garuda.2.32.88)

प्रागुदक्शिरसं वापि मुखे स्वर्णं विनिः क्षेपेत् । शालग्रामशिला तत्र तुलसी च खगेश्वर

prāgudakśirasaṁ vāpi mukhe svarṇaṁ viniḥ kṣepet śālagrāmaśilā tatra tulasī ca khageśvara

पूर्व अथवा उत्तर की ओर सिर करके मुख में स्वर्ण रखना चाहिए। हे खगेश्वर! वहाँ शालग्राम-शिला तथा तुलसी

श्लोक 89 (garuda.2.32.89)

विधेया सन्निधौ सर्पिर्दीपं प्रज्वालयेत्पुनः । नमो भगवते वासुदेवायेति जपस्तथा

vidheyā sannidhau sarpirdīpaṁ prajvālayetpunaḥ namo bhagavate vāsudevāyeti japastathā

पास में रखनी चाहिए, तथा घी का दीपक जलाना चाहिए; और 'नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।

श्लोक 90 (garuda.2.32.90)

आदौ तु प्रणवं कृत्वा पूजादाने ततः स्मृते । समभ्यर्च्य हृषीकेशं पुष्पधूपादिभिस्ततः

ādau tu praṇavaṁ kṛtvā pūjādāne tataḥ smṛte samabhyarcya hṛṣīkeśaṁ puṣpadhūpādibhistataḥ

पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण करके, स्मरणपूर्वक पूजा-दान करना चाहिए; तत्पश्चात् हृषीकेश की पुष्प-धूप आदि से भलीभाँति पूजा करके,

श्लोक 91 (garuda.2.32.91)

प्रणिपातैः स्तवैः पुण्यैर्ध्या नयोगेन पूजयेत् । दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो दीनानाथेभ्य एव च

praṇipātaiḥ stavaiḥ puṇyairdhyā nayogena pūjayet dattvā dānaṁ ca viprebhyo dīnānāthebhya eva ca

प्रणाम, पवित्र स्तुतियों तथा ध्यान-योग से पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों तथा दीन-अनाथों को दान देकर,

श्लोक 92 (garuda.2.32.92)

पुत्त्रे मित्रे कलत्रे च क्षेत्रधान्यधनादिषु । निवर्तयेन्ममत्वं च विष्णोः पादौ हृदि स्मरन्

puttre mitre kalatre ca kṣetradhānyadhanādiṣu nivartayenmamatvaṁ ca viṣṇoḥ pādau hṛdi smaran

पुत्र, मित्र, पत्नी, खेत, धान्य, धन आदि में ममत्व त्याग देना चाहिए, हृदय में विष्णु के चरणों का स्मरण करते हुए।

श्लोक 93 (garuda.2.32.93)

उच्चैः पुरुषसूक्तं च यदि श्रेष्ठापदस्तदा । पुत्त्राद्याः प्रपठेयुस्ते म्रियमाणे निजे जने

uccaiḥ puruṣasūktaṁ ca yadi śreṣṭhāpadastadā puttrādyāḥ prapaṭheyuste mriyamāṇe nije jane

यदि वह श्रेष्ठ अवस्था वाला हो तो पुरुषसूक्त का उच्च स्वर में पाठ किया जाए; अपने मरणासन्न व्यक्ति के लिए पुत्र आदि को यह पढ़ना चाहिए।

श्लोक 94 (garuda.2.32.94)

एतत्ते सर्वमाख्यातं कृत्यं मृत्यावुपस्थिते । फलमप्यस्य कृत्स्नस्य समासात्ते वदाम्यहम्

etatte sarvamākhyātaṁ kṛtyaṁ mṛtyāvupasthite phalamapyasya kṛtsnasya samāsātte vadāmyaham

यह सब मैंने तुम्हें बताया — मृत्यु उपस्थित होने पर करने योग्य कर्तव्य। अब मैं इस सम्पूर्ण का फल संक्षेप में बताता हूँ।

श्लोक 95 (garuda.2.32.95)

स्नानेन शुचिताप्राप्तिरपावित्र्यहृतिस्ततः । ततो विष्णोः स्मृतिस्तस्य ज्ञानात्सर्वफलप्रदा

snānena śucitāprāptirapāvitryahṛtistataḥ tato viṣṇoḥ smṛtistasya jñānātsarvaphalapradā

स्नान से शुद्धता प्राप्त होती है, और अपवित्रता दूर होती है; तत्पश्चात् विष्णु का स्मरण, जो ज्ञान द्वारा सभी फल देने वाला है।

श्लोक 96 (garuda.2.32.96)

दर्भतूली नयेत्स्वर्गमातुरं तु न संशयः । तिलैर्दर्भैश्च निः क्षिप्तैः स्नानं क्रतुमयं भवेत्

darbhatūlī nayetsvargamāturaṁ tu na saṁśayaḥ tilairdarbhaiśca niḥ kṣiptaiḥ snānaṁ kratumayaṁ bhavet

कुश का गुच्छा रोगी को निश्चय ही स्वर्ग ले जाता है; तिल और कुश बिछाने से किया गया स्नान यज्ञ के समान फलदायी होता है।

श्लोक 97 (garuda.2.32.97)

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च श्रीर्हुताशस्तथैव च । मण्डले चोपतिष्ठन्ति तस्मात्कुर्वीत मण्डलम्

brahmā viṣṇuśca rudraśca śrīrhutāśastathaiva ca maṇḍale copatiṣṭhanti tasmātkurvīta maṇḍalam

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, श्री तथा अग्नि स्वयं उस मण्डल में विराजमान रहते हैं; इसलिए मण्डल अवश्य बनाना चाहिए।

श्लोक 98 (garuda.2.32.98)

प्रागुदग्वा कृतेनेह शिरसा लोकमुत्तमम् । व्रजते यदि पापस्याल्पत्वं पुंसो भवेत्खग

prāgudagvā kṛteneha śirasā lokamuttamam vrajate yadi pāpasyālpatvaṁ puṁso bhavetkhaga

यहाँ पूर्व या उत्तर की ओर सिर करने से मनुष्य उत्तम लोक को जाता है; हे खग! इससे उसका पाप अल्प हो जाता है।

श्लोक 99 (garuda.2.32.99)

पञ्चरत्ने मुखे मुक्ते जिवे ज्ञानं प्ररोहति । तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग

pañcaratne mukhe mukte jive jñānaṁ prarohati tulasī brāhmaṇā gāvo viṣṇurekādaśī khaga

मुख में पंचरत्न रखने और छोड़ने से जिह्वा पर ज्ञान का उदय होता है। हे खग! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशी —

श्लोक 100 (garuda.2.32.100)

पञ्च प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम् । विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः

pañca pravahaṇānyeva bhavābdhau majjatāṁ nṛṇām viṣṇurekādaśī gītā tulasī vipradhenavaḥ

संसार-सागर में डूबते मनुष्यों के लिए ये पाँच ही तरणी हैं। विष्णु, एकादशी, गीता, तुलसी, ब्राह्मण तथा गौ —

श्लोक 101 (garuda.2.32.101)

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी भक्तिदायिनी । नमो भगवते वासुदेवायेति जपन्नरः

asāre durgasaṁsāre ṣaṭpadī bhaktidāyinī namo bhagavate vāsudevāyeti japannaraḥ

इस असार, दुर्गम संसार में यह षट्पदी भक्ति प्रदान करने वाली है। जो मनुष्य 'नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करता है,

श्लोक 102 (garuda.2.32.102)

ओङ्कारपूर्वं सायुज्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः । पूजयापि च मल्लोकप्राप्तिराराद्दिवं व्रजेत्

oṅkārapūrvaṁ sāyujyaṁ prāpnuyānnātra saṁśayaḥ pūjayāpi ca mallokaprāptirārāddivaṁ vrajet

ओंकार-पूर्वक, वह निश्चय ही सायुज्य को प्राप्त होता है। पूजा से भी मेरे लोक की प्राप्ति होती है, वह शीघ्र स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 103 (garuda.2.32.103)

बन्धाभावे ममत्वेतु ज्ञानं पुरुषसूक्ततः । यस्ययस्याधिकत्वं तु साधनेष्वेषु काश्यप

bandhābhāve mamatvetu jñānaṁ puruṣasūktataḥ yasyayasyādhikatvaṁ tu sādhaneṣveṣu kāśyapa

ममत्व-बन्धन के अभाव में पुरुषसूक्त से ज्ञान उत्पन्न होता है। हे काश्यप! इन साधनों में से जिस-जिस की जितनी अधिकता हो,

श्लोक 104 (garuda.2.32.104)

तत्तत्फलस्याप्याधिक्यं भवतीत्यवधारय । दातव्यानि यथाशक्त्या प्रीतोऽसौ सर्वदा भवेत्

tattatphalasyāpyādhikyaṁ bhavatītyavadhāraya dātavyāni yathāśaktyā prīto'sau sarvadā bhavet

उसका फल भी उतना ही अधिक होता है — यह निश्चित जानो। यथाशक्ति ये दान देने चाहिए, जिससे वह सदा प्रसन्न रहे।

श्लोक 105 (garuda.2.32.105)

एतत्ते सर्वमाख्यातं स्नानादिषु फलं मया । ब्रह्माण्डे ये गुणाः सन्ति शरीरे ते व्यवस्थिताः

etatte sarvamākhyātaṁ snānādiṣu phalaṁ mayā brahmāṇḍe ye guṇāḥ santi śarīre te vyavasthitāḥ

यह सब मैंने तुम्हें स्नान आदि के फल के विषय में बताया। ब्रह्माण्ड में जो गुण हैं, वे शरीर में भी विद्यमान हैं।

श्लोक 106 (garuda.2.32.106)

पातालभूधरा लोकास्तथान्ये द्वीपसागराः । आदित्यादिग्रहाः सर्वे पिण्डमध्ये व्यवस्थिताः

pātālabhūdharā lokāstathānye dvīpasāgarāḥ ādityādigrahāḥ sarve piṇḍamadhye vyavasthitāḥ

पाताल, पर्वत, अन्य लोक, द्वीप तथा सागर; आदित्य आदि सभी ग्रह — ये सब शरीर के मध्य ही स्थित हैं।

श्लोक 107 (garuda.2.32.107)

पादाधस्तु तलं ज्ञेयं पादोर्ध्वं वितलं तथा । जानुभ्यां सुतलं विद्धि सक्थिदेशे महातलम्

pādādhastu talaṁ jñeyaṁ pādordhvaṁ vitalaṁ tathā jānubhyāṁ sutalaṁ viddhi sakthideśe mahātalam

पैरों के नीचे तल जानना चाहिए, पैरों के ऊपर वितल; घुटनों में सुतल, जाँघों के प्रदेश में महातल।

श्लोक 108 (garuda.2.32.108)

तथा तलातलञ्चोरौ गुह्यदेशे रसातलम् । पातालं कटिसंस्थन्तु पादादौ लक्षयेद्बुधः

tathā talātalañcorau guhyadeśe rasātalam pātālaṁ kaṭisaṁsthantu pādādau lakṣayedbudhaḥ

तथा जाँघों में तलातल, गुह्य-प्रदेश में रसातल; कमर में पाताल — विद्वान को पैरों से आरम्भ करके इसे जानना चाहिए।

श्लोक 109 (garuda.2.32.109)

भूर्लोकं नाभिमध्ये तु भुवर्लोकं तदूर्ध्वतः । स्वर्गलोकं हृदये विद्यात्कण्ठदेशे महस्तथा

bhūrlokaṁ nābhimadhye tu bhuvarlokaṁ tadūrdhvataḥ svargalokaṁ hṛdaye vidyātkaṇṭhadeśe mahastathā

नाभि के मध्य में भूर्लोक, उसके ऊपर भुवर्लोक; हृदय में स्वर्गलोक, कण्ठ-प्रदेश में महर्लोक जानना चाहिए।

श्लोक 110 (garuda.2.32.110)

जनलोकं वक्त्रदेशे तपोलोकं ललाटके । सत्यलोकं महारन्ध्रे भुवनानि चतुर्दश

janalokaṁ vaktradeśe tapolokaṁ lalāṭake satyalokaṁ mahārandhre bhuvanāni caturdaśa

मुख-प्रदेश में जनलोक, ललाट में तपोलोक, ब्रह्मरन्ध्र में सत्यलोक — इस प्रकार चौदह भुवन (शरीर में स्थित हैं)।

श्लोक 111 (garuda.2.32.111)

त्रिकोणे संस्थितो मेरुरधः कोणे च मन्दरः । दक्षिणे चैव कैलासो वामभागे हिमाचलः

trikoṇe saṁsthito meruradhaḥ koṇe ca mandaraḥ dakṣiṇe caiva kailāso vāmabhāge himācalaḥ

त्रिकोण में मेरु स्थित है, नीचे के कोण में मन्दराचल; दक्षिण में कैलास, बाईं ओर हिमाचल;

श्लोक 112 (garuda.2.32.112)

निषधश्चोर्ध्वभागे च दक्षिणे गन्धमादनः । मलयो (रमणो) वामरेखायां सप्तैते कुलपर्वताः

niṣadhaścordhvabhāge ca dakṣiṇe gandhamādanaḥ malayo (ramaṇo) vāmarekhāyāṁ saptaite kulaparvatāḥ

ऊपरी भाग में निषध, दक्षिण में गन्धमादन; बाईं रेखा में मलय (रमण) — ये सात कुल-पर्वत हैं।

श्लोक 113 (garuda.2.32.113)

अस्थिस्थाने स्थितो जम्बूः शाको मज्जासु संस्थितः । कुशद्वीपः स्थितो मांसे क्रौञ्चद्वीपः शिरास्थितः

asthisthāne sthito jambūḥ śāko majjāsu saṁsthitaḥ kuśadvīpaḥ sthito māṁse krauñcadvīpaḥ śirāsthitaḥ

अस्थि-स्थान में जम्बूद्वीप स्थित है, मज्जा में शाकद्वीप; मांस में कुशद्वीप, नाड़ियों में क्रौंचद्वीप स्थित है।

श्लोक 114 (garuda.2.32.114)

त्वचायां शाल्मलिर्द्वीपो प्लक्षः रोम्णां च सञ्चये । नखस्थः पुष्करद्वीपः सागरास्तदनन्तरम्

tvacāyāṁ śālmalirdvīpo plakṣaḥ romṇāṁ ca sañcaye nakhasthaḥ puṣkaradvīpaḥ sāgarāstadanantaram

त्वचा में शाल्मलिद्वीप, रोम-समूह में प्लक्षद्वीप; नख में पुष्करद्वीप स्थित है — तत्पश्चात् सागर आते हैं।

श्लोक 115 (garuda.2.32.115)

क्षारोदश्च तथा मूत्रे क्षारे क्षीरोदसागरः । सुरोदधिश्च श्लेष्मस्थः मज्जायां घृतसागरः

kṣārodaśca tathā mūtre kṣāre kṣīrodasāgaraḥ surodadhiśca śleṣmasthaḥ majjāyāṁ ghṛtasāgaraḥ

मूत्र में क्षारोद (लवण) सागर, तथा क्षार में क्षीरसागर; कफ में सुरोद (मदिरा) सागर, मज्जा में घृतसागर;

श्लोक 116 (garuda.2.32.116)

रसोदधिं रसे विद्याच्छोणिते दधिसागरम् । स्वादुलं लम्बिकास्थाने गर्भोदं शुक्रसंस्थितम्

rasodadhiṁ rase vidyācchoṇite dadhisāgaram svādulaṁ lambikāsthāne garbhodaṁ śukrasaṁsthitam

रस में रसोदधि जानना चाहिए, रक्त में दधिसागर; कण्ठ-प्रदेश में स्वादुजल सागर, तथा शुक्र में गर्भोद सागर स्थित है।

श्लोक 117 (garuda.2.32.117)

नादचक्रे स्थितः सूर्यो बिन्दुचक्रे च चन्द्रमाः । लोचनस्थः कुजो ज्ञेयो हृदये च बुधः स्मृतः

nādacakre sthitaḥ sūryo binducakre ca candramāḥ locanasthaḥ kujo jñeyo hṛdaye ca budhaḥ smṛtaḥ

नादचक्र में सूर्य स्थित है, बिन्दुचक्र में चन्द्रमा; नेत्रों में मंगल जानना चाहिए, हृदय में बुध स्मरण किया गया है।

श्लोक 118 (garuda.2.32.118)

विष्णुस्थाने गुरुं विद्याच्छ्रुक्रे शुक्रो व्यवस्थितः । नाभिस्थाने स्थितो मन्दो मुखे राहुः स्थितः सदा

viṣṇusthāne guruṁ vidyācchrukre śukro vyavasthitaḥ nābhisthāne sthito mando mukhe rāhuḥ sthitaḥ sadā

विष्णु-स्थान (मस्तक) में बृहस्पति जानना चाहिए, शुक्र (वीर्य) में शुक्र ग्रह स्थित है; नाभि-स्थान में शनि स्थित है, मुख में राहु सदा स्थित रहता है।

श्लोक 119 (garuda.2.32.119)

पायु (द) स्थाने स्थितः केतुः शरीरे ग्रहमण्डलम् । विभक्तञ्च समाख्यातमापादतलमस्तकम्

pāyu (da) sthāne sthitaḥ ketuḥ śarīre grahamaṇḍalam vibhaktañca samākhyātamāpādatalamastakam

गुदा-स्थान में केतु स्थित है — इस प्रकार शरीर में ग्रह-मण्डल है। पैर के तलवे से लेकर मस्तक तक इस प्रकार विभाजन कहा गया है।

श्लोक 120 (garuda.2.32.120)

उत्पन्ना ये हि संसारे म्रियन्ते ते न संशयः । बुभुक्षा च तृषा रौद्रा दाहोद्भूता च मूर्छना

utpannā ye hi saṁsāre mriyante te na saṁśayaḥ bubhukṣā ca tṛṣā raudrā dāhodbhūtā ca mūrchanā

संसार में जो उत्पन्न हुए हैं, वे निश्चय ही मरते हैं; भयंकर भूख-प्यास तथा दाह से उत्पन्न मूर्च्छा —

श्लोक 121 (garuda.2.32.121)

यत्र पीडास्त्विमा रौद्रास्ता वै वृश्चिकदंशजाः । विनाशः पूर्णकाले च जायते सर्वदेहिनाम्

yatra pīḍāstvimā raudrāstā vai vṛścikadaṁśajāḥ vināśaḥ pūrṇakāle ca jāyate sarvadehinām

जहाँ ये भयंकर पीड़ाएँ होती हैं, वे वृश्चिक-दंश के समान हैं; समय पूर्ण होने पर सभी देहधारियों का विनाश होता है।

श्लोक 122 (garuda.2.32.122)

अग्रे अग्रे हि धावन्ति यमलोकगतस्यवै । तप्तवालुकमध्येन प्रज्वलद्वह्निमध्यतः

agre agre hi dhāvanti yamalokagatasyavai taptavālukamadhyena prajvaladvahnimadhyataḥ

यमलोक जाने वाले के आगे-आगे तपी हुई बालू तथा प्रज्वलित अग्नि के मध्य से होकर वे दौड़ते हैं,

श्लोक 123 (garuda.2.32.123)

केशग्राहैः समाक्रान्ता नीयन्ते यमकिङ्करैः । पापिष्ठास्त्वधमास्तार्क्ष्य दयाधर्मविविर्जिताः

keśagrāhaiḥ samākrāntā nīyante yamakiṅkaraiḥ pāpiṣṭhāstvadhamāstārkṣya dayādharmavivirjitāḥ

बालों से पकड़े जाकर यमकिंकरों द्वारा ले जाए जाते हैं। हे तार्क्ष्य! जो अत्यंत पापी, अधम तथा दया-धर्म से रहित हैं,

श्लोक 124 (garuda.2.32.124)

यमलोके वसन्त्येते कुट्यां जन्म न विद्यते । एवं सञ्जायते तार्क्ष्य मर्त्ये जन्तुः स्वकर्मभिः

yamaloke vasantyete kuṭyāṁ janma na vidyate evaṁ sañjāyate tārkṣya martye jantuḥ svakarmabhiḥ

वे यमलोक में ही निवास करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। हे तार्क्ष्य! इस प्रकार मर्त्यलोक में प्राणी अपने कर्मों से उत्पन्न होता है।

श्लोक 125 (garuda.2.32.125)

उत्पन्ना ये हि संसारे म्रियन्ते ते न संशयः । आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च

utpannā ye hi saṁsāre mriyante te na saṁśayaḥ āyuḥ karma ca vittañca vidyā nidhanameva ca

संसार में जो उत्पन्न हुए हैं, वे निश्चय ही मरते हैं। आयु, कर्म, धन, विद्या तथा मृत्यु —

श्लोक 126 (garuda.2.32.126)

पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः । कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते

pañcaitāni hi sṛjyante garbhasthasyaiva dehinaḥ karmaṇā jāyate jantuḥ karmaṇaiva pralīyate

ये पाँच ही गर्भस्थ प्राणी के लिए ही निर्धारित हो जाते हैं। प्राणी कर्म से ही जन्म लेता है, कर्म से ही नष्ट होता है।

श्लोक 127 (garuda.2.32.127)

सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते । अधोमुखं चोर्ध्वपादं गर्भाद्वायुः प्रकर्षति

sukhaṁ duḥkhaṁ bhayaṁ kṣemaṁ karmaṇaivābhipadyate adhomukhaṁ cordhvapādaṁ garbhādvāyuḥ prakarṣati

सुख, दुःख, भय, क्षेम — ये सब कर्म से ही प्राप्त होते हैं। सिर नीचे, पैर ऊपर करके वायु उसे गर्भ से बाहर खींचता है।

श्लोक 128 (garuda.2.32.128)

जन्मतो वैष्णवी माया संमोहयति सत्वरम् । स्वकर्मकृतसम्बन्धो जन्तुर्जन्म प्रपद्यते

janmato vaiṣṇavī māyā saṁmohayati satvaram svakarmakṛtasambandho janturjanma prapadyate

जन्म लेते ही वैष्णवी माया शीघ्र उसे मोहित कर देती है; अपने ही कर्म से बने सम्बन्ध के कारण प्राणी पुनः जन्म प्राप्त करता है।

श्लोक 129 (garuda.2.32.129)

सुकृतादुत्तमो भोगभोग्यवान् सुकुले भवेत् । यथायथा दुष्कृतं तत्कुले हीने प्रजायते

sukṛtāduttamo bhogabhogyavān sukule bhavet yathāyathā duṣkṛtaṁ tatkule hīne prajāyate

सुकृत से उत्तम, भोग्य वस्तुओं से युक्त प्राणी सुकुल में जन्म लेता है; जैसे-जैसे दुष्कृत हो, वैसे ही वह नीच कुल में उत्पन्न होता है,

श्लोक 130 (garuda.2.32.130)

दरिद्रो व्याधितो मूर्खः पापकृद्दुःखभाजनम् । अतः परं किमर्थं ते कथयामि खगेश्वर

daridro vyādhito mūrkhaḥ pāpakṛdduḥkhabhājanam ataḥ paraṁ kimarthaṁ te kathayāmi khageśvara

दरिद्र, रोगी, मूर्ख, पापी तथा दुःख का पात्र बनता है। हे खगेश्वर! इसके आगे मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?

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