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उत्तरखण्ड · अध्याय 35

मातृकुल-सपिण्डन तथा शव-विधि-निरूपण

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (garuda.2.35.1)

तर्क्ष्य उवाच । अपरं मम सन्देहं कथयस्व जनार्दन । पुरुषस्य च कस्यापि मता पञ्चत्वमागता

tarkṣya uvāca aparaṁ mama sandehaṁ kathayasva janārdana puruṣasya ca kasyāpi matā pañcatvamāgatā

तार्क्ष्य ने कहा — हे जनार्दन! मेरा एक और संदेह बताइए। किसी भी पुरुष की मृत्यु मानी जाने पर,

श्लोक 2 (garuda.2.35.2)

पितामही जीवति च तथा च प्रपितामही । वृद्धप्रपितामही तद्वन्मातृसक्तः पिता तथा

pitāmahī jīvati ca tathā ca prapitāmahī vṛddhaprapitāmahī tadvanmātṛsaktaḥ pitā tathā

पितामही जीवित हों, तथा प्रपितामही, वृद्ध-प्रपितामही भी, और उसी प्रकार माता से संबंधित पिता के पितर भी,

श्लोक 3 (garuda.2.35.3)

प्रमातामहश्च तथा वृद्धप्रमातामहस्तथा । केन सा मेल्यते माता एतत्कथय मे प्रभो

pramātāmahaśca tathā vṛddhapramātāmahastathā kena sā melyate mātā etatkathaya me prabho

तथा प्रमातामह, वृद्ध-प्रमातामह भी — हे प्रभो! उस माता (के कुल) को किसके साथ मिलाया जाए, यह मुझे बताइए।

श्लोक 4 (garuda.2.35.4)

श्रीकृष्ण उवाच । पुनरुक्तं प्रवक्ष्यामि सपिण्डीकरणं खग । उमा लक्ष्मीश्च सावित्रीत्यताभिर्मेलयेद्ध्रुवम्

śrīkṛṣṇa uvāca punaruktaṁ pravakṣyāmi sapiṇḍīkaraṇaṁ khaga umā lakṣmīśca sāvitrītyatābhirmelayeddhruvam

श्रीकृष्ण ने कहा — हे खग! मैं पुनः सपिण्डीकरण का वर्णन करूँगा। उमा, लक्ष्मी तथा सावित्री — इनके साथ ही निश्चय ही मिलाना चाहिए।

श्लोक 5 (garuda.2.35.5)

त्रयः पिण्डभुजो ज्ञेयास्त्यजाकाश्च त्रयः स्मृताः । त्रयः पिण्डानुलेपाश्च दशमः पङ्क्तिसंन्निधः

trayaḥ piṇḍabhujo jñeyāstyajākāśca trayaḥ smṛtāḥ trayaḥ piṇḍānulepāśca daśamaḥ paṅktisaṁnnidhaḥ

तीन पिण्ड-भोक्ता जानने चाहिए, तथा तीन त्यागक (त्यागी) कहे गए हैं; तीन पिण्ड-अनुलेपक हैं, तथा दसवाँ पंक्ति के निकट रहने वाला।

श्लोक 6 (garuda.2.35.6)

इत्येते पुरुषाः ख्याताः पितृमातृकुलेषु च । तारयेद्यजमानस्तु दश पूर्वान् दशावरान्

ityete puruṣāḥ khyātāḥ pitṛmātṛkuleṣu ca tārayedyajamānastu daśa pūrvān daśāvarān

पितृ-मातृ दोनों कुलों में ये पुरुष प्रसिद्ध हैं; यजमान दस पूर्व तथा दस उत्तर पितरों को तार देता है।

श्लोक 7 (garuda.2.35.7)

सपिण्डः स भवेदादौ सपिण्डीकरणे कृते । अन्त्यस्तु त्याजको ज्ञेयो यो वृद्धप्रपितामहः

sapiṇḍaḥ sa bhavedādau sapiṇḍīkaraṇe kṛte antyastu tyājako jñeyo yo vṛddhaprapitāmahaḥ

सपिण्डीकरण होने पर वह प्रारम्भ में ही सपिण्ड बन जाता है; अंतिम त्यागक वृद्ध-प्रपितामह जानने चाहिए।

श्लोक 8 (garuda.2.35.8)

अन्तिमस्त्याजको ज्ञेयो लेपकः प्रथमो भवेत् । लेपकस्त्वन्तिमो यस्तु स भवेत्पङ्क्तिसन्निधः

antimastyājako jñeyo lepakaḥ prathamo bhavet lepakastvantimo yastu sa bhavetpaṅktisannidhaḥ

अंतिम त्यागक ही जानना चाहिए, प्रथम अनुलेपक बनता है; जो अनुलेपकों में अंतिम हो, वह पंक्ति के निकट होता है।

श्लोक 9 (garuda.2.35.9)

यजमानो भवेदेको दश पृर्त्वे दशावरे । इत्येते पितरो ज्ञेया एकविंशति संख्यकाः

yajamāno bhavedeko daśa pṛrtve daśāvare ityete pitaro jñeyā ekaviṁśati saṁkhyakāḥ

यजमान एक होता है, दस पूर्व तथा दस पर (उत्तर); इस प्रकार ये पितर इक्कीस की संख्या में जाने जाते हैं।

श्लोक 10 (garuda.2.35.10)

विधिना कुरुते यस्तु संसारे श्राद्धमुत्तमम् । जायतेऽत्र न सन्देहः शृणु तस्यापि यत्फलम्

vidhinā kurute yastu saṁsāre śrāddhamuttamam jāyate'tra na sandehaḥ śṛṇu tasyāpi yatphalam

संसार में जो विधिपूर्वक उत्तम श्राद्ध करता है, उसे इसमें कोई संदेह नहीं (फल मिलता है); उसका भी फल सुनो।

श्लोक 11 (garuda.2.35.11)

पिता ददाति पुत्त्रान् वै विच्छिन्नसन्ततिः खग । होमदाता भवेत्सोपि यस्तस्य प्रपितामहः

pitā dadāti puttrān vai vicchinnasantatiḥ khaga homadātā bhavetsopi yastasya prapitāmahaḥ

पिता पुत्रों को जन्म देता है; हे खग! यदि संतति विच्छिन्न हो जाए, तो वह होम-दाता भी वही बन जाता है जो उसका प्रपितामह होता है।

श्लोक 12 (garuda.2.35.12)

कृते श्राद्धे गुणा ह्येते पितॄणां तपेणे स्मृताः । दद्याद्विपुलमन्नाद्यं वृद्धस्तु प्रपितामहः

kṛte śrāddhe guṇā hyete pitṝṇāṁ tapeṇe smṛtāḥ dadyādvipulamannādyaṁ vṛddhastu prapitāmahaḥ

श्राद्ध करने पर पितरों के तर्पण में ये गुण स्मरण किए गए हैं; वृद्ध-प्रपितामह को प्रचुर अन्न देना चाहिए।

श्लोक 13 (garuda.2.35.13)

यस्य पुंसश्च मर्त्ये वै विच्छिन्ना सन्ततिः खग । स वसेन्नरके घोरे पङ्के मग्नः करी यथा

yasya puṁsaśca martye vai vicchinnā santatiḥ khaga sa vasennarake ghore paṅke magnaḥ karī yathā

हे खग! जिस पुरुष की संतति मर्त्यलोक में विच्छिन्न हो जाती है, वह घोर नरक में कीचड़ में डूबे हुए हाथी के समान निवास करता है।

श्लोक 14 (garuda.2.35.14)

योन्यन्तरेषु जायते यत्र वृक्षसरीसृपाः । न सन्ततिं विना सोऽत्र मुच्यते नरकाद्ध्रुवम्

yonyantareṣu jāyate yatra vṛkṣasarīsṛpāḥ na santatiṁ vinā so'tra mucyate narakāddhruvam

वह वृक्ष-सरीसृप आदि अन्य योनियों में जन्म लेता है; संतान के बिना वह इस नरक से निश्चय ही मुक्त नहीं होता।

श्लोक 15 (garuda.2.35.15)

आचार्यस्तस्य शिष्यो वा यो दूरेऽपि हि गात्रेजः । नारायणबलिं कुर्यात्तस्याद्देशेन भक्तितः

ācāryastasya śiṣyo vā yo dūre'pi hi gātrejaḥ nārāyaṇabaliṁ kuryāttasyāddeśena bhaktitaḥ

उसका आचार्य या शिष्य, अथवा उसके शरीर से दूर उत्पन्न कोई भी संबंधी — जो भी उसके निमित्त भक्तिपूर्वक नारायण-बलि करे,

श्लोक 16 (garuda.2.35.16)

विशुद्धः सर्वपापेभ्यो मुक्तः स नरकाद्ध्रुवम् । निवसेन्नाकलोके च नात्र कार्या विचारणा

viśuddhaḥ sarvapāpebhyo muktaḥ sa narakāddhruvam nivasennākaloke ca nātra kāryā vicāraṇā

वह सभी पापों से विशुद्ध होकर निश्चय ही नरक से मुक्त हो जाता है; वह स्वर्गलोक में निवास करता है — इसमें कोई विचारणा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 17 (garuda.2.35.17)

आदौ कृत्वा धनिष्ठाञ्च एतन्नक्षत्रपञ्चकम् । रेवत्यन्तं सदा दूष्यमशुभं सर्वदा भवेत्

ādau kṛtvā dhaniṣṭhāñca etannakṣatrapañcakam revatyantaṁ sadā dūṣyamaśubhaṁ sarvadā bhavet

धनिष्ठा से आरम्भ करके रेवती तक के इन पाँच नक्षत्रों को सदा दूषित और अशुभ मानना चाहिए।

श्लोक 18 (garuda.2.35.18)

दाह (बलि) स्तत्र न कर्तव्यो विप्रदिसर्वजातिषु । दीयते न जलं तत्र अशुभं जायते ध्रुवम् । लोकयात्रा न कर्तव्या दुः खार्तः स्वजनो यदि

dāha (bali) statra na kartavyo vipradisarvajātiṣu dīyate na jalaṁ tatra aśubhaṁ jāyate dhruvam lokayātrā na kartavyā duḥ khārtaḥ svajano yadi

उस समय ब्राह्मण आदि सभी जातियों में दाह (या बलि) नहीं करना चाहिए; वहाँ जल भी नहीं दिया जाता, यह निश्चय ही अशुभ माना गया है; यदि स्वजन दुःखी हो तो लोक-व्यवहार भी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 19 (garuda.2.35.19)

पञ्चकानन्तरं तस्य कर्तव्यं सर्वमन्यथा । पुत्राणां गोत्रिणां तस्य सन्तापोऽप्युपजायते

pañcakānantaraṁ tasya kartavyaṁ sarvamanyathā putrāṇāṁ gotriṇāṁ tasya santāpo'pyupajāyate

पंचक बीत जाने के पश्चात् ही शेष सब कार्य करने चाहिए, अन्यथा उसके पुत्रों तथा गोत्रीजनों को भी संताप होता है।

श्लोक 20 (garuda.2.35.20)

गृहे हानिर्भवेत्तस्य ऋक्षेष्वेषु मृतश्च यः । अथवा ऋक्षमध्येऽपि दाहस्तस्य विधीयते

gṛhe hānirbhavettasya ṛkṣeṣveṣu mṛtaśca yaḥ athavā ṛkṣamadhye'pi dāhastasya vidhīyate

उसके घर में हानि होती है; इन नक्षत्रों में जो मरे, अथवा उनके मध्य में भी, उसका दाह विशेष विधि से किया जाता है।

श्लोक 21 (garuda.2.35.21)

क्रियते मानुषाणान्तु सद्य आहुतिकारणात् । सद्याहुतिकरं पुण्यं तीर्थे तद्दाह उत्तमः

kriyate mānuṣāṇāntu sadya āhutikāraṇāt sadyāhutikaraṁ puṇyaṁ tīrthe taddāha uttamaḥ

मनुष्यों के लिए प्रायश्चित्त हेतु तत्काल आहुति की जाती है; यह तत्काल-आहुति का पुण्य तीर्थ में करना सर्वोत्तम माना गया है।

श्लोक 22 (garuda.2.35.22)

विप्रैर्नियमतः कार्यः समन्त्रो विधिपूर्वकः । शवस्य च समीपे तु क्षिप्यन्ते पुत्तलास्ततः

viprairniyamataḥ kāryaḥ samantro vidhipūrvakaḥ śavasya ca samīpe tu kṣipyante puttalāstataḥ

यह ब्राह्मणों द्वारा नियमपूर्वक, मंत्रसहित तथा विधिपूर्वक करना चाहिए; शव के समीप ही तब पुतले रखे जाते हैं,

श्लोक 23 (garuda.2.35.23)

दर्भमयाश्च चत्वारो विप्रा मन्त्राभिमन्त्रिताः । ततो दाहः प्रकर्तव्यः तैश्च पुत्तलकैः सह

darbhamayāśca catvāro viprā mantrābhimantritāḥ tato dāhaḥ prakartavyaḥ taiśca puttalakaiḥ saha

मंत्रों से अभिमंत्रित, कुश-निर्मित चार पुतले ब्राह्मणों द्वारा; तत्पश्चात् उन पुतलों के साथ ही दाह करना चाहिए।

श्लोक 24 (garuda.2.35.24)

सूतकान्ते ततः पुत्रः कुर्याच्छान्तिकमुत्तमम्

sūtakānte tataḥ putraḥ kuryācchāntikamuttamam

सूतक समाप्त होने पर पुत्र को उत्तम शांति-कर्म करना चाहिए।

श्लोक 25 (garuda.2.35.25)

पञ्चकेषु मृतो योऽसौ न गतिं लभते नरः । तिलान् गाश्च सुवर्णं च तमुद्दिश्य घृतं ददेत्

pañcakeṣu mṛto yo'sau na gatiṁ labhate naraḥ tilān gāśca suvarṇaṁ ca tamuddiśya ghṛtaṁ dadet

इन पंचकों में मरने वाला मनुष्य सुगति प्राप्त नहीं करता; उसके निमित्त तिल, गौ, स्वर्ण तथा घृत देने चाहिए।

श्लोक 26 (garuda.2.35.26)

विप्राणां दीयते दानं सर्वोपद्रवनाशनम् । सूतकान्ते च सत्पुत्रैः स प्रेतो लभते गतिम्

viprāṇāṁ dīyate dānaṁ sarvopadravanāśanam sūtakānte ca satputraiḥ sa preto labhate gatim

ब्राह्मणों को दिया गया यह दान सभी उपद्रवों का नाशक है; सूतक समाप्त होने पर सुपुत्रों द्वारा किए गए इस कर्म से वह प्रेत सुगति प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (garuda.2.35.27)

भाजनोपानहौ च्छत्रं हेममुद्राच वाससी । दक्षिणा दीयते विप्र सर्वपातकमोचनी

bhājanopānahau cchatraṁ hemamudrāca vāsasī dakṣiṇā dīyate vipra sarvapātakamocanī

हे विप्र! पात्र, जूते, छत्र, स्वर्ण-मुद्रा तथा दो वस्त्र — यह दक्षिणा सभी पापों से मुक्ति देने वाली है।

श्लोक 28 (garuda.2.35.28)

बालवृद्धातुराणाञ्च मृतानां पञ्चकेषु हि । विधानं यो न कुर्वीत विघ्नस्तस्य प्रजायते

bālavṛddhāturāṇāñca mṛtānāṁ pañcakeṣu hi vidhānaṁ yo na kurvīta vighnastasya prajāyate

बालक, वृद्ध तथा रोगियों की इन पंचकों में मृत्यु होने पर जो यह विधान नहीं करता, उसे विघ्न उत्पन्न होता है।

श्लोक 29 (garuda.2.35.29)

अष्टादशैव वस्तूनि प्रेतश्राद्धे विवर्जयेत् । आशिषो द्विगुणान् दर्भान् प्रणवान्नैकपिण्डताम्

aṣṭādaśaiva vastūni pretaśrāddhe vivarjayet āśiṣo dviguṇān darbhān praṇavānnaikapiṇḍatām

प्रेत-श्राद्ध में अठारह वस्तुओं को त्यागना चाहिए — दोहरा आशीर्वाद, दुगुना कुश, प्रणव (ॐ), तथा अनेक को एक पिण्ड मानना,

श्लोक 30 (garuda.2.35.30)

अग्नौकरणमुच्छिष्टं श्राद्धं वै वैश्वदैविकम् । विकिरं च स्वधाकारं पितृशब्दं न चोच्चरेत्

agnaukaraṇamucchiṣṭaṁ śrāddhaṁ vai vaiśvadaivikam vikiraṁ ca svadhākāraṁ pitṛśabdaṁ na coccaret

अग्नि-होम, उच्छिष्ट भोजन, वैश्वदेव श्राद्ध, विकिर (बलि-विक्षेप), स्वधा-उच्चारण, तथा 'पितृ' शब्द का उच्चारण न करना,

श्लोक 31 (garuda.2.35.31)

अनुशब्दं न कुर्वीत नावाहनमथोल्मुकम् । आसीमान्तं न कुर्वीत प्रदक्षिणविसर्जनम्

anuśabdaṁ na kurvīta nāvāhanamatholmukam āsīmāntaṁ na kurvīta pradakṣiṇavisarjanam

'अनु' शब्द का प्रयोग न करना, आवाहन न करना, उल्मुक (जलती लकड़ी) न करना; सीमा तक न जाना, तथा प्रदक्षिणापूर्वक विसर्जन न करना।

श्लोक 32 (garuda.2.35.32)

न कुर्यात्तिलहोमञ्च द्विजः पूर्णाहुतिं तथा । न कुर्याद्वैश्वदेवं चेत्कर्ता गच्छत्यधोगतिम्

na kuryāttilahomañca dvijaḥ pūrṇāhutiṁ tathā na kuryādvaiśvadevaṁ cetkartā gacchatyadhogatim

ब्राह्मण को तिल-होम तथा पूर्णाहुति भी नहीं करनी चाहिए; यदि वैश्वदेव न करे तो कर्ता अधोगति को प्राप्त होता है।

श्लोक 33 (garuda.2.35.33)

मलिनश्राद्धसंज्ञानं पूर्वषोडशकं तथा । स्थाने द्वारे चार्धमार्गे चितायां शवहस्तके

malinaśrāddhasaṁjñānaṁ pūrvaṣoḍaśakaṁ tathā sthāne dvāre cārdhamārge citāyāṁ śavahastake

'मलिन-श्राद्ध' नामक पूर्व के सोलह इस प्रकार हैं — मृत्यु-स्थान पर, द्वार पर, अर्ध-मार्ग में, चिता पर, शव के हाथ में,

श्लोक 34 (garuda.2.35.34)

श्मशानवासिभूतेभ्यः पञ्चमं प्रतिवेश्यकम् । षष्ठं सञ्चयने प्रोक्तं दश पिण्डा दशाहिकाः । श्राद्धषोडषकञ्चैतत्प्रथमं परिकीर्तितम्

śmaśānavāsibhūtebhyaḥ pañcamaṁ prativeśyakam ṣaṣṭhaṁ sañcayane proktaṁ daśa piṇḍā daśāhikāḥ śrāddhaṣoḍaṣakañcaitatprathamaṁ parikīrtitam

श्मशान-वासी भूतों के लिए पाँचवाँ, तथा पड़ोसियों के लिए, अस्थि-संचयन में छठा कहा गया है; दस पिण्ड दशाह के — यह प्रथम सोलह श्राद्ध कहे गए हैं।

श्लोक 35 (garuda.2.35.35)

अन्यच्च षोडशं मध्ये द्वितीयं तार्क्ष्य मे शृणु । कर्तव्यानीह विधिना श्राद्धान्येकादशैव तु

anyacca ṣoḍaśaṁ madhye dvitīyaṁ tārkṣya me śṛṇu kartavyānīha vidhinā śrāddhānyekādaśaiva tu

हे तार्क्ष्य! अब मुझसे मध्य के अन्य सोलह, दूसरे समूह के विषय में सुनो — यहाँ विधिपूर्वक ग्यारह श्राद्ध करने चाहिए,

श्लोक 36 (garuda.2.35.36)

ब्रह्मविष्णुशिवाद्यञ्च तथान्यच्छ्राद्धपञ्चकम् । एवं षोडशकं प्राहुरेतत्तत्त्वविदो जनाः

brahmaviṣṇuśivādyañca tathānyacchrāddhapañcakam evaṁ ṣoḍaśakaṁ prāhuretattattvavido janāḥ

तथा ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि को, और अन्य पाँच श्राद्ध — इस प्रकार तत्त्वज्ञ लोग इसे सोलह कहते हैं।

श्लोक 37 (garuda.2.35.37)

द्वादश प्रतिमास्यानि श्राद्धमेकादशे तथा । त्रिपक्षसम्भवञ्चैव द्वे रिक्ते खग षोडश

dvādaśa pratimāsyāni śrāddhamekādaśe tathā tripakṣasambhavañcaiva dve rikte khaga ṣoḍaśa

बारह मासिक श्राद्ध, एकादशी का श्राद्ध, त्रिपक्ष से उत्पन्न श्राद्ध, तथा दो रिक्त तिथियाँ — हे खग! इस प्रकार सोलह (तीसरे समूह के)।

श्लोक 38 (garuda.2.35.38)

आद्यं शवविशुद्ध्यर्थं कृत्वान्यच्च त्रिषोडशम् । पितृपाङ्क्तिविशुद्ध्यर्थं शताद्धैंन तु योजयेत्

ādyaṁ śavaviśuddhyarthaṁ kṛtvānyacca triṣoḍaśam pitṛpāṅktiviśuddhyarthaṁ śatāddhaiṁna tu yojayet

प्रथम शव-शुद्धि के लिए है; अन्य तीन-सोलह करके, पितृ-पंक्ति की शुद्धि के लिए पचास (अर्ध-शत) के साथ जोड़ना चाहिए।

श्लोक 39 (garuda.2.35.39)

शतार्धेन विहीनो यो मिलितः पङ्क्तिभाङ्न हि । चत्वारिंशत्तथैवाष्टश्राद्धं प्रेतत्वनाशनम्

śatārdhena vihīno yo militaḥ paṅktibhāṅna hi catvāriṁśattathaivāṣṭaśrāddhaṁ pretatvanāśanam

जो पचास (अर्ध-शत) से रहित हो, वह मिलकर भी पंक्ति में सम्मिलित नहीं होता; अड़तालीस श्राद्ध प्रेतत्व का नाशक है।

श्लोक 40 (garuda.2.35.40)

सकृदूनशतार्धेन सम्भवेत्पङ्क्तिसन्निधः । मेलनीयः शतार्धेन सन्धिः श्राद्धेन तत्त्वतः

sakṛdūnaśatārdhena sambhavetpaṅktisannidhaḥ melanīyaḥ śatārdhena sandhiḥ śrāddhena tattvataḥ

एक बार पचास से न्यून होकर भी वह पंक्ति के निकट हो जाता है; श्राद्ध द्वारा पचास से ही सही अर्थ में सन्धि होती है।

श्लोक 41 (garuda.2.35.41)

(अथ शवाविधिः) । शवस्य शिबिकायां करचरणबन्धनं तत्र कर्तव्यम् । एवं चेन्न विधानं विधीयते तत्पिशाचपरिभवनम्

(atha śavāvidhiḥ) śavasya śibikāyāṁ karacaraṇabandhanaṁ tatra kartavyam evaṁ cenna vidhānaṁ vidhīyate tatpiśācaparibhavanam

(अब शव-विधि) — शव को शिबिका (डोली) में हाथ-पैर बाँधकर रखना चाहिए; यदि ऐसा विधान न किया जाए, तो वह पिशाच-बाधा को आमंत्रित करता है।

श्लोक 42 (garuda.2.35.42)

संजायते रजन्याञ्च शवनिर्गमने राष्ट्रं भयशून्यम् । शवं न मुञ्चेत मुच्यते चेत्दुः स्पर्शाद्दुर्गतिर्भवेत्

saṁjāyate rajanyāñca śavanirgamane rāṣṭraṁ bhayaśūnyam śavaṁ na muñceta mucyate cetduḥ sparśāddurgatirbhavet

शव के निकलते समय रात्रि में राज्य निर्भय हो जाता है; शव को छोड़ना नहीं चाहिए; यदि छूट जाए तो उसके अशुभ स्पर्श से दुर्गति होती है।

श्लोक 43 (garuda.2.35.43)

ग्राममध्ये स्थिते प्रेते श्रुते भुङ्क्ते यदृच्छया । तदन्नं मांसवज्ज्ञेयं तत्तोयं रुधिरोपमम्

grāmamadhye sthite prete śrute bhuṅkte yadṛcchayā tadannaṁ māṁsavajjñeyaṁ tattoyaṁ rudhiropamam

प्रेत के गाँव में स्थित रहते हुए यदि कोई सुनकर इच्छानुसार भोजन करे, तो वह अन्न मांस के समान और वह जल रक्त के समान जानना चाहिए।

श्लोक 44 (garuda.2.35.44)

ताम्बूलं दन्तकाष्ठञ्च भोजनं ऋतुसेवनम् । ग्राममध्ये स्थिते प्रेते वर्जयेत्पिण्डपातनम्

tāmbūlaṁ dantakāṣṭhañca bhojanaṁ ṛtusevanam grāmamadhye sthite prete varjayetpiṇḍapātanam

प्रेत के गाँव में स्थित रहते हुए ताम्बूल, दन्तकाष्ठ, भोजन तथा ऋतु-सेवन (दांपत्य-संबंध) तथा पिण्डपात को वर्जित करना चाहिए।

श्लोक 45 (garuda.2.35.45)

स्नानं दानं जपो होमस्तर्पणं सुरपूजनम् । ग्राममध्ये स्थिते प्रेते शुद्ध्यर्थं ज्ञातिधर्मतः

snānaṁ dānaṁ japo homastarpaṇaṁ surapūjanam grāmamadhye sthite prete śuddhyarthaṁ jñātidharmataḥ

प्रेत के गाँव में स्थित रहते हुए स्नान, दान, जप, होम, तर्पण तथा देव-पूजन ज्ञातिधर्म की शुद्धि के लिए करने चाहिए।

श्लोक 46 (garuda.2.35.46)

ज्ञातिसम्बन्धिनामेवं व्यवहारः खगेश्वर । विलुप्य ज्ञातिधर्मञ्च प्रेतपापेन लिप्यते

jñātisambandhināmevaṁ vyavahāraḥ khageśvara vilupya jñātidharmañca pretapāpena lipyate

हे खगेश्वर! ज्ञाति-सम्बन्धियों का यही आचरण होना चाहिए; ज्ञाति-धर्म का उल्लंघन करने वाला प्रेत के पाप से लिप्त हो जाता है।

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