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उत्तरखण्ड · अध्याय 38

उत्तमलोकगति, मोक्ष तथा मानुष्यहेतु-निरूपण

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (garuda.2.38.1)

तार्क्ष्य उवाच । दानतीर्थार्थितं मोक्षं स्वर्गञ्च वद मे प्रभो । केन मोक्षमवाप्नोति केन स्वर्गे वसेच्चिरम्

tārkṣya uvāca dānatīrthārthitaṁ mokṣaṁ svargañca vada me prabho kena mokṣamavāpnoti kena svarge vasecciram

तार्क्ष्य ने कहा — हे प्रभो! दान और तीर्थ से प्राप्त होने वाले मोक्ष और स्वर्ग के विषय में मुझे बताइए। किससे मोक्ष प्राप्त होता है, और किससे मनुष्य चिरकाल स्वर्ग में निवास करता है?

श्लोक 2 (garuda.2.38.2)

केन गच्छति तेजस्तु स्वर्लोकात्सत्यलोकतः । मानुष्यं केन लभते नरकेशु निमज्जति

kena gacchati tejastu svarlokātsatyalokataḥ mānuṣyaṁ kena labhate narakeśu nimajjati

वह तेज स्वर्लोक से सत्यलोक तक किससे जाता है? मनुष्यत्व किससे प्राप्त होता है, और मनुष्य नरकों में किससे डूबता है?

श्लोक 3 (garuda.2.38.3)

एतन्मे वदनिश्चित्य भक्तानां मोक्षदायक । ब्रूहि कस्मिन्मृते स्वर्गे पुनर्जन्म न विद्यते

etanme vadaniścitya bhaktānāṁ mokṣadāyaka brūhi kasminmṛte svarge punarjanma na vidyate

हे भक्तों को मोक्ष देने वाले! यह मुझे निश्चयपूर्वक बताइए। बताइए कि किस स्थान पर मरने से स्वर्ग में भी पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 4 (garuda.2.38.4)

श्रीविष्णुरुवाच । मानुष्यं भारते वर्षे त्रयोदशसु जातिषु

śrīviṣṇuruvāca mānuṣyaṁ bhārate varṣe trayodaśasu jātiṣu

श्रीविष्णु ने कहा — भारतवर्ष में तेरह जातियों (क्षेत्रों) में मनुष्यत्व,

श्लोक 5 (garuda.2.38.5)

तत्प्राप्य म्रियते क्षेत्रे पुनर्जन्म न विद्यते । अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका

tatprāpya mriyate kṣetre punarjanma na vidyate ayodhyā mathurā māyā kāśī kāñcī avantikā

उसे प्राप्त कर उस क्षेत्र में मरने पर पुनर्जन्म नहीं होता। अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, काञ्ची, अवन्तिका,

श्लोक 6 (garuda.2.38.6)

पुरी द्वारवती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिकाः । सन्न्यस्तमिति यो ब्रुयात्प्राणैः कण्ठगतैरपि

purī dvāravatī jñeyā saptaitā mokṣadāyikāḥ sannyastamiti yo bruyātprāṇaiḥ kaṇṭhagatairapi

पुरी तथा द्वारका — ये सात मोक्षदायिनी जाननी चाहिए। जो कोई भी कण्ठगत प्राणों से भी 'मैंने संन्यास ले लिया' ऐसा कहे,

श्लोक 7 (garuda.2.38.7)

मृतो विष्णुपुरं याति न पुनर्जायते क्षितौ । सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्

mṛto viṣṇupuraṁ yāti na punarjāyate kṣitau sakṛduccaritaṁ yena harirityakṣaradvayam

वह मरकर विष्णुपुर को जाता है, पृथ्वी पर पुनः जन्म नहीं लेता। जिसने एक बार भी 'हरि' इन दो अक्षरों का उच्चारण किया हो,

श्लोक 8 (garuda.2.38.8)

बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति । कृष्णकृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः

baddhaḥ parikarastena mokṣāya gamanaṁ prati kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti yo māṁ smarati nityaśaḥ

उसके लिए मोक्ष की ओर जाने का बन्धन (सम्बल) बँध जाता है। जो सदा मुझे 'कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण' कहकर स्मरण करता है,

श्लोक 9 (garuda.2.38.9)

जल भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् । शालग्रामजिला यत्र यत्र द्वारवती शिला

jala bhittvā yathā padmaṁ narakāduddharāmyaham śālagrāmajilā yatra yatra dvāravatī śilā

उसे मैं वैसे ही नरक से उबार लेता हूँ जैसे जल को चीरकर कमल निकाला जाता है। जहाँ शालग्राम-शिला हो और जहाँ द्वारवती-शिला हो,

श्लोक 10 (garuda.2.38.10)

उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः । शालग्रामशिला यत्र पापदोषक्षयावहा

ubhayoḥ saṅgamo yatra muktistatra na saṁśayaḥ śālagrāmaśilā yatra pāpadoṣakṣayāvahā

दोनों का जहाँ संगम होता है, वहाँ निश्चय ही मुक्ति होती है। जहाँ शालग्राम-शिला हो, जो पाप-दोष का क्षय करने वाली है,

श्लोक 11 (garuda.2.38.11)

तत्सन्निधानमरणान्मुक्तिर्जन्तोः सुनिश्चता । रोपणात्पालनात्सेकाद्ध्यानस्पर्शनकीर्तनात् । तुलसी दहते पापं नृणां जन्मार्जितं खग

tatsannidhānamaraṇānmuktirjantoḥ suniścatā ropaṇātpālanātsekāddhyānasparśanakīrtanāt tulasī dahate pāpaṁ nṛṇāṁ janmārjitaṁ khaga

उसके सान्निध्य में मृत्यु होने पर प्राणी की मुक्ति निश्चित है। रोपण, पालन, सिंचन, ध्यान, स्पर्श तथा कीर्तन से, हे खग, तुलसी मनुष्यों के जन्मार्जित पापों को जला देती है।

श्लोक 12 (garuda.2.38.12)

ज्ञानहृदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे । यः स्नातो मानसे तीर्थे न स लिप्येत पातकैः

jñānahṛde satyajale rāgadveṣamalāpahe yaḥ snāto mānase tīrthe na sa lipyeta pātakaiḥ

राग-द्वेष रूपी मल को हरने वाले सत्य-जल से युक्त ज्ञान-सरोवर में जो स्नान करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 13 (garuda.2.38.13)

न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां कदाचन । भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावं समाचरेत्

na kāṣṭhe vidyate devo na śilāyāṁ kadācana bhāve hi vidyate devastasmādbhāvaṁ samācaret

देवता न काठ में विद्यमान होते हैं, न कभी पत्थर में; देवता भाव में ही विद्यमान होते हैं, इसलिए भाव का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.2.38.14)

प्रातः प्रातः प्रपश्यन्ति नर्मदां मत्स्यघातिनः । न ते शिवपुरीं यान्ति चित्तवृत्तिर्गरीयसी

prātaḥ prātaḥ prapaśyanti narmadāṁ matsyaghātinaḥ na te śivapurīṁ yānti cittavṛttirgarīyasī

मछुआरे प्रतिदिन प्रातः नर्मदा के दर्शन करते हैं, फिर भी वे शिवपुरी को नहीं जाते - चित्त की वृत्ति ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

श्लोक 15 (garuda.2.38.15)

यादृक्चित्तप्रतीतिः स्यात्तादृक्कर्मफलं नृणाम् । परलोकगतिस्तादृक सूचीसूत्रविचारवत्

yādṛkcittapratītiḥ syāttādṛkkarmaphalaṁ nṛṇām paralokagatistādṛka sūcīsūtravicāravat

जैसी मनुष्यों की चित्त-प्रतीति होती है, वैसा ही उनके कर्मों का फल होता है; उनकी परलोक-गति भी सुई के धागे-सी सूक्ष्म विचार के समान होती है।

श्लोक 16 (garuda.2.38.16)

ब्राह्मणार्थे गवार्थे च स्त्रीणां बलवधेषु च । प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात्

brāhmaṇārthe gavārthe ca strīṇāṁ balavadheṣu ca prāṇatyāgaparo yastu sa vai mokṣamavāpnuyāt

ब्राह्मण के लिए, गौ के लिए, अथवा स्त्रियों की रक्षा तथा बल-वध में जो प्राण त्याग को उद्यत होता है, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (garuda.2.38.17)

अनाशके मृतौ यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात् । अनाशके मृतो यस्तु स मुक्तः सर्वबन्धनैः

anāśake mṛtau yastu sa vai mokṣamavāpnuyāt anāśake mṛto yastu sa muktaḥ sarvabandhanaiḥ

जो अनशन में मरता है, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है; जो अनशन में मरता है, वह सभी बन्धनों से मुक्त होता है।

श्लोक 18 (garuda.2.38.18)

दत्त्वा दानानि विप्रेभ्यस्ततो मोक्षमवाप्नुयात् । एते वै मोक्षमार्गाश्च स्वर्गमार्गास्तथैव च

dattvā dānāni viprebhyastato mokṣamavāpnuyāt ete vai mokṣamārgāśca svargamārgāstathaiva ca

ब्राह्मणों को दान देकर तत्पश्चात् वह मोक्ष प्राप्त करता है। ये सभी मोक्ष के मार्ग हैं, और इसी प्रकार स्वर्ग के भी मार्ग हैं।

श्लोक 19 (garuda.2.38.19)

गोग्रहे देशविध्वंसे मरणं रणतीर्थयोः । उत्तमाधममध्यस्य बाध्यमानस्य देहिनः । आत्मानं तत्र सन्त्यज्य स्वर्गवासं लभेच्चिरम्

gograhe deśavidhvaṁse maraṇaṁ raṇatīrthayoḥ uttamādhamamadhyasya bādhyamānasya dehinaḥ ātmānaṁ tatra santyajya svargavāsaṁ labhecciram

गौ-रक्षा में, राष्ट्र-रक्षा में विध्वंस के समय, युद्ध या तीर्थ में मृत्यु होने पर, चाहे प्राणी उत्तम हो, अधम हो या मध्यम, पीड़ित होने पर, वहाँ स्वयं को त्यागकर वह चिरकाल स्वर्गवास प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (garuda.2.38.20)

जीवितं मरणञ्चैव द्वयं शिक्षेत पण्डितः । जीवितं दानभोगाभ्यां मरणं रणतीर्थयोः

jīvitaṁ maraṇañcaiva dvayaṁ śikṣeta paṇḍitaḥ jīvitaṁ dānabhogābhyāṁ maraṇaṁ raṇatīrthayoḥ

विद्वान को जीवन और मृत्यु दोनों की शिक्षा लेनी चाहिए - जीवन दान-भोग से, तथा मृत्यु युद्ध या तीर्थ में।

श्लोक 21 (garuda.2.38.21)

हरिक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे भृगुक्षेत्रे तथैव च । प्रभासे श्रीस्थले चैव अर्बुदे च त्रिपुष्करे

harikṣetre kurukṣetre bhṛgukṣetre tathaiva ca prabhāse śrīsthale caiva arbude ca tripuṣkare

हरिक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, भृगुक्षेत्र, प्रभास, श्रीस्थल, अर्बुद तथा त्रिपुष्कर में,

श्लोक 22 (garuda.2.38.22)

भूतेश्वरे मृतो यस्तु स्वर्गे वसति मानवः । ब्रह्मणो दिवसं यावत्ततः पतति भूतले

bhūteśvare mṛto yastu svarge vasati mānavaḥ brahmaṇo divasaṁ yāvattataḥ patati bhūtale

भूतेश्वर में जो मरता है, वह मनुष्य ब्रह्मा के एक दिन तक स्वर्ग में निवास करता है, तत्पश्चात् भूतल पर गिरता है।

श्लोक 23 (garuda.2.38.23)

वर्षवृत्तिन्तु यो दद्याद्ब्राह्मणे दोषवर्जिते । सर्वं कलं स मुद्धृत्य स्वर्गलोके महीयते

varṣavṛttintu yo dadyādbrāhmaṇe doṣavarjite sarvaṁ kalaṁ sa muddhṛtya svargaloke mahīyate

जो दोषरहित ब्राह्मण को एक वर्ष का जीवन-निर्वाह दान देता है, वह अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार करके स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 24 (garuda.2.38.24)

कन्यां विवाहयेद्यस्तु ब्राह्मणं वेदपारगम् । इन्द्रलोके वसेत्सोऽपि स्वकुलैः परिवेष्टितः

kanyāṁ vivāhayedyastu brāhmaṇaṁ vedapāragam indraloke vasetso'pi svakulaiḥ pariveṣṭitaḥ

जो वेदपारंगत ब्राह्मण से कन्या का विवाह कराता है, वह भी अपने कुल से घिरा हुआ इन्द्रलोक में निवास करता है।

श्लोक 25 (garuda.2.38.25)

महादानानि दत्वा च नरस्तत्फलमामुयात्

mahādānāni datvā ca narastatphalamāmuyāt

महादान देकर मनुष्य उसका फल प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (garuda.2.38.26)

वापी कूपतडागानामारामसुरसद्मनाम् । जीर्णोद्धारं प्रकुर्वाणः पूर्वकर्तुः फलं लभेत् । जीर्णोद्धारेण वा तेषां तत्पुण्यं द्विगुणं भवेत्

vāpī kūpataḍāgānāmārāmasurasadmanām jīrṇoddhāraṁ prakurvāṇaḥ pūrvakartuḥ phalaṁ labhet jīrṇoddhāreṇa vā teṣāṁ tatpuṇyaṁ dviguṇaṁ bhavet

बावली, कुआँ, तालाब, बगीचे तथा देवमंदिरों का जो जीर्णोद्धार करता है, वह पूर्व निर्माता का फल प्राप्त करता है; अथवा जीर्णोद्धार से उन दोनों का वह पुण्य दोगुना हो जाता है।

श्लोक 27 (garuda.2.38.27)

शीतवा तातपहरमपि पर्णकुटीरकम् । कृत्वा विप्राय विदुषे प्रददाति कुटुम्बिने

śītavā tātapaharamapi parṇakuṭīrakam kṛtvā viprāya viduṣe pradadāti kuṭumbine

जो सर्दी-गर्मी से रक्षा करने वाली पर्ण-कुटीर बनवाकर विद्वान, गृहस्थ ब्राह्मण को देता है,

श्लोक 28 (garuda.2.38.28)

तिस्रः कोट्योर्धकोटी च नरः स्वर्गे महीयते

tisraḥ koṭyordhakoṭī ca naraḥ svarge mahīyate

वह मनुष्य साढ़े तीन करोड़ वर्षों तक स्वर्ग में महिमामंडित होता है।

श्लोक 29 (garuda.2.38.29)

या स्त्री सवर्णा संशुबा मृतं पतिमनुव्रजेत् । सा मृता स्वर्गमाप्नोति वर्षाणां रोमसंख्यता

yā strī savarṇā saṁśubā mṛtaṁ patimanuvrajet sā mṛtā svargamāpnoti varṣāṇāṁ romasaṁkhyatā

जो सवर्णा, शुद्धाचारिणी स्त्री अपने मृत पति का अनुगमन करती है, वह मरकर शरीर के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्ग प्राप्त करती है।

श्लोक 30 (garuda.2.38.30)

पुत्रपौत्रादिकं त्यक्त्वा स्वपतिं यानुगच्छति । स्वर्गं लभेतां तौ चोभौ दिव्यस्त्रीभिरलङ्कृतौ

putrapautrādikaṁ tyaktvā svapatiṁ yānugacchati svargaṁ labhetāṁ tau cobhau divyastrībhiralaṅkṛtau

पुत्र-पौत्र आदि त्यागकर जो अपने पति का अनुगमन करती है, वे दोनों दिव्य स्त्री-पुरुषों से अलंकृत होकर स्वर्ग प्राप्त करते हैं।

श्लोक 31 (garuda.2.38.31)

कृत्वा पापान्यनेकानि भर्तृद्रोहमतिः सदा । प्रक्षालयति सर्वाणि या स्वं पतिमनुव्रजेत्

kṛtvā pāpānyanekāni bhartṛdrohamatiḥ sadā prakṣālayati sarvāṇi yā svaṁ patimanuvrajet

अनेक पाप करने वाली, सदा पति-द्रोह की भावना रखने वाली स्त्री भी, यदि अपने पति का अनुगमन करे, तो अपने सभी पापों को धो देती है।

श्लोक 32 (garuda.2.38.32)

महापापसमाचारो भर्ता चेद्दुष्कृती भवेत् । तस्याप्यनुव्रता नारी नारायेत्सर्वकिल्बिषम्

mahāpāpasamācāro bhartā cedduṣkṛtī bhavet tasyāpyanuvratā nārī nārāyetsarvakilbiṣam

यदि पति महापापी और दुष्कर्मी भी हो, तब भी उसकी अनुगामिनी पत्नी उसके सभी पापों को हर लेती है।

श्लोक 33 (garuda.2.38.33)

ग्रासमात्रं नियमतो नित्यदानं करोति यः । चतुश्चामरसंयुक्तविमानेनाधिगच्छति

grāsamātraṁ niyamato nityadānaṁ karoti yaḥ catuścāmarasaṁyuktavimānenādhigacchati

जो नियमपूर्वक ग्रासमात्र भी नित्य दान करता है, वह चार चँवरों से युक्त विमान से (स्वर्ग को) प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (garuda.2.38.34)

यत्कृतं हि मनुष्येण पापमामरणान्तिकम् । तत्सर्वं नाशमायाति वर्षवृत्तिप्रदानतः

yatkṛtaṁ hi manuṣyeṇa pāpamāmaraṇāntikam tatsarvaṁ nāśamāyāti varṣavṛttipradānataḥ

मनुष्य द्वारा मृत्यु तक किया गया जो भी पाप हो, वह सब वर्षभर के जीवन-निर्वाह के दान से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 35 (garuda.2.38.35)

भूतं भव्यं बविष्यञ्च पापं जन्मत्रयार्जितम् । पक्षालयति तत्सर्वं विप्रकन्योपनायनात्

bhūtaṁ bhavyaṁ baviṣyañca pāpaṁ janmatrayārjitam pakṣālayati tatsarvaṁ viprakanyopanāyanāt

भूत, वर्तमान तथा भविष्य के तीन जन्मों में अर्जित पाप - वह सब ब्राह्मण-कन्या के विवाह से धुल जाता है।

श्लोक 36 (garuda.2.38.36)

दशकूपसमा वापि दशवापीसमं सरः । सरो भिर्दशभिस्तुल्या या प्रपा निर्जले वने

daśakūpasamā vāpi daśavāpīsamaṁ saraḥ saro bhirdaśabhistulyā yā prapā nirjale vane

दस कुओं के बराबर एक बावली, दस बावलियों के बराबर एक सरोवर, दस सरोवरों के बराबर निर्जल वन में एक प्याऊ,

श्लोक 37 (garuda.2.38.37)

या वापी निर्जले देशे यद्दानं निर्धने द्विजे । प्राणिनां यो दयां धत्ते स भवेन्नाकनायकः

yā vāpī nirjale deśe yaddānaṁ nirdhane dvije prāṇināṁ yo dayāṁ dhatte sa bhavennākanāyakaḥ

निर्जल प्रदेश में जो बावली हो, निर्धन ब्राह्मण को जो दान दिया जाए - जो प्राणियों पर दया रखता है, वह स्वर्ग का स्वामी बनता है।

श्लोक 38 (garuda.2.38.38)

एवमादिभिरन्यैश्च सुकृतैः स्वर्गभाग्भवेत् । स तत्सर्वं फलं प्राप्य प्रतिष्ठां परमां लभेत्

evamādibhiranyaiśca sukṛtaiḥ svargabhāgbhavet sa tatsarvaṁ phalaṁ prāpya pratiṣṭhāṁ paramāṁ labhet

इन तथा अन्य सुकृत कर्मों से मनुष्य स्वर्ग का भागी बनता है; वह यह सब फल प्राप्त कर परम प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

श्लोक 39 (garuda.2.38.39)

फल्गु कार्यं परित्यज्य सततं धर्मवान् भवेत् । दानं दमो दया चेति सारमेतत्त्रयं भुवि

phalgu kāryaṁ parityajya satataṁ dharmavān bhavet dānaṁ damo dayā ceti sārametattrayaṁ bhuvi

तुच्छ कार्यों को त्यागकर सदा धर्मपरायण होना चाहिए। दान, दम तथा दया - संसार में यही तीन सार हैं।

श्लोक 40 (garuda.2.38.40)

दानं साधोर्दरिद्रस्य शून्यलिङ्गस्य पूजनम् । अनाथप्रेतसंस्कारः कोटियज्ञफलप्रदः

dānaṁ sādhordaridrasya śūnyaliṅgasya pūjanam anāthapretasaṁskāraḥ koṭiyajñaphalapradaḥ

साधु और दरिद्र को दान, शून्य लिंग (जिस मंदिर में देवता न हों) की पूजा, तथा अनाथ प्रेत का संस्कार - ये करोड़ यज्ञों का फल देने वाले हैं।

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