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उत्तरखण्ड · अध्याय 4

प्रायश्चित्त, दाह-विधि और मरण-संस्कार

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (garuda.2.4.1)

श्रीकृष्ण उवाच । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापियन्नरैः कलुषं कृतम् । तस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं विधेया निष्कृतिर्नरैः

śrīkṛṣṇa uvāca | jñānato'jñānato vāpiyannaraiḥ kaluṣaṁ kṛtam | tasya pāpasya śuddhyarthaṁ vidheyā niṣkṛtirnaraiḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — मनुष्यों द्वारा ज्ञानपूर्वक अथवा अज्ञानवश जो भी पाप किया गया हो, उस पाप की शुद्धि के लिए मनुष्यों को प्रायश्चित्त करना चाहिए।

श्लोक 2 (garuda.2.4.2)

भस्मादिस्नानदशकमादौ कुर्याद्विचक्षणः । यथाशक्ति षडब्दादिप्रत्याम्नायाच्चरेदपि

bhasmādisnānadaśakamādau kuryādvicakṣaṇaḥ | yathāśakti ṣaḍabdādipratyāmnāyāccaredapi

बुद्धिमान व्यक्ति को पहले भस्म आदि दस स्नान करने चाहिए, और यथाशक्ति छह वर्ष आदि तक निरंतर [व्रत] का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 3 (garuda.2.4.3)

तदर्धं वा तदर्धं वा तदर्धार्धमथापि वा । यथाशक्त्या ततः कुर्याद्दश दानानि वै शृणु

tadardhaṁ vā tadardhaṁ vā tadardhārdhamathāpi vā | yathāśaktyā tataḥ kuryāddaśa dānāni vai śṛṇu

अथवा उसका आधा, अथवा आधे का आधा, अथवा उससे भी आधा करना चाहिए। फिर यथाशक्ति दस दान भी करने चाहिए, सुनो।

श्लोक 4 (garuda.2.4.4)

गोभूतिलहिरण्याज्यवासोधन्यगुडास्तथा । रजतं लवणं चैव दानानि दश वै विदुः

gobhūtilahiraṇyājyavāsodhanyaguḍāstathā | rajataṁ lavaṇaṁ caiva dānāni daśa vai viduḥ

गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, घी, वस्त्र, अन्न, गुड़, चाँदी और नमक — ये दस दान कहे गए हैं।

श्लोक 5 (garuda.2.4.5)

प्रायश्चित्ते त्वागता ये तेभ्यो दद्यान्नरो दश । ततो यमद्वारपथे पूयशोणितसंकुले

prāyaścitte tvāgatā ye tebhyo dadyānnaro daśa | tato yamadvārapathe pūyaśoṇitasaṁkule

जो लोग प्रायश्चित्त हेतु आए हों, उन्हें मनुष्य ये दस [वस्तुएँ] देनी चाहिए; क्योंकि यमद्वार के मार्ग में, जो मवाद और रक्त से भरा है,

श्लोक 6 (garuda.2.4.6)

नदीं वैतरणीं तर्तुं दद्याद्वैतरणीं च गाम् । कृष्णस्तनी सकृष्णाङ्गी सा वै वैतरणी स्मृता

nadīṁ vaitaraṇīṁ tartuṁ dadyādvaitaraṇīṁ ca gām | kṛṣṇastanī sakṛṣṇāṁgī sā vai vaitaraṇī smṛtā

वैतरणी नदी को पार करने के लिए वैतरणी-गाय दान करनी चाहिए — काले स्तनों और काले अंगोंवाली गाय ही वैतरणी कही गई है।

श्लोक 7 (garuda.2.4.7)

तिला लोहं हिरण्यं च कर्पासं लवणं तथा । सप्तधान्यं क्षितिर्गाव एकैकं पावनं स्मृतम्

tilā lohaṁ hiraṇyaṁ ca karpāsaṁ lavaṇaṁ tathā | saptadhānyaṁ kṣitirgāva ekaikaṁ pāvanaṁ smṛtam

तिल, लोहा, सुवर्ण, कपास, नमक, सात प्रकार के धान्य, भूमि और गौ — इनमें से प्रत्येक पावन कहा गया है।

श्लोक 8 (garuda.2.4.8)

एतान्यष्टौ महादानान्युत्तमाय द्विजातये । आतुरेण तु देयानि पदरूपाणि मे शृणु

etānyaṣṭau mahādānānyuttamāya dvijātaye | ātureṇa tu deyāni padarūpāṇi me śṛṇu

ये आठ महादान श्रेष्ठ ब्राह्मण को दिए जाने चाहिए; अब रोगी (मरणासन्न व्यक्ति) द्वारा दिए जाने वाले पद-दान भी सुनो।

श्लोक 9 (garuda.2.4.9)

छत्रो पानहवस्त्राणि मुद्रिका च कमण्डलुः । आसनं भाजनं पदं चाष्टविधं स्मृतम्

chatro pānahavastrāṇi mudrikā ca kamaṇḍaluḥ | āsanaṁ bhājanaṁ padaṁ cāṣṭavidhaṁ smṛtam

छाता, जूते, वस्त्र, अँगूठी और कमण्डलु, आसन, पात्र और पद — ये आठ प्रकार के कहे गए हैं।

श्लोक 10 (garuda.2.4.10)

तिलापात्रं सर्पिः पात्रं शय्या सोपस्करा तथा । एतत्सर्वं प्रदातव्यं यदिष्टं चात्मनोऽपि तत्

tilāpātraṁ sarpiḥ pātraṁ śayyā sopaskarā tathā | etatsarvaṁ pradātavyaṁ yadiṣṭaṁ cātmano'pi tat

तिल का पात्र, घी का पात्र, और बिछावन-सामग्री सहित शय्या — यह सब उसे भी देना चाहिए, जो उसे प्रिय हो।

श्लोक 11 (garuda.2.4.11)

अश्वो रथश्च महीषी व्यञ्जनं वस्त्रमेव च । ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्यं ब्रह्मपूर्वमपि स्वयम्

aśvo rathaśca mahīṣī vyañjanaṁ vastrameva ca | brāhmaṇebhyaḥ pradātavyaṁ brahmapūrvamapi svayam

घोड़ा, रथ, भैंस, बर्तन और वस्त्र भी ब्राह्मणों को दिए जाने चाहिए, [इनमें] ब्रह्मदान (गौ) प्रमुख होकर स्वयं दिया जाए।

श्लोक 12 (garuda.2.4.12)

दाना न्यन्यान्यपि खग तर्पयेत्स्वीयशक्तितः । प्रायाश्चित्तं कृतं येन दश दानान्यपि क्षितौ

dānā nyanyānyapi khaga tarpayetsvīyaśaktitaḥ | prāyāścittaṁ kṛtaṁ yena daśa dānānyapi kṣitau

हे खग! अन्य दान भी अपनी शक्ति के अनुसार करके [मृतक को] तृप्त करना चाहिए। जिसने पृथ्वी पर ये दस दान करके प्रायश्चित्त किया है,

श्लोक 13 (garuda.2.4.13)

दानं गोर्वैतरण्याश्च दानान्यष्टौ तथापि वा । तिलपात्रं सर्पिः पात्रं शय्यादानं तथैव च

dānaṁ gorvaitaraṇyāśca dānānyaṣṭau tathāpi vā | tilapātraṁ sarpiḥ pātraṁ śayyādānaṁ tathaiva ca

गौ और वैतरणी का दान, आठ दान, तिल-पात्र, घी-पात्र, और शय्या-दान भी,

श्लोक 14 (garuda.2.4.14)

पददानं च विधिवन्नासौ निरयगर्भगः । स्वातन्त्र्येणापि लवणदानमिच्छन्ति सूरयः

padadānaṁ ca vidhivannāsau nirayagarbhagaḥ | svātantryeṇāpi lavaṇadānamicchanti sūrayaḥ

तथा विधिपूर्वक पद-दान भी [जिसने किया है] — वह नरक के गर्भ में नहीं जाता। विद्वानजन स्वतंत्र रूप से भी नमक का दान करना चाहते हैं,

श्लोक 15 (garuda.2.4.15)

विष्णुदेहसमुत्पन्नो यतोऽयं लवणो रसः । आतुरस्य यदा प्राणा न यान्ति वसुधातले

viṣṇudehasamutpanno yato'yaṁ lavaṇo rasaḥ | āturasya yadā prāṇā na yānti vasudhātale

क्योंकि यह नमक-रस विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है। जब रोगी के प्राण भूतल पर नहीं जा पाते,

श्लोक 16 (garuda.2.4.16)

लवणं च तदा देयं द्वारस्योद्वाटनं दिवः । यानिकानि च दानानि स्वयं दत्तानि मानवैः

lavaṇaṁ ca tadā deyaṁ dvārasyodvāṭanaṁ divaḥ | yānikāni ca dānāni svayaṁ dattāni mānavaiḥ

तब नमक देना चाहिए, [जो] स्वर्ग के द्वार को खोलने वाला है। और मनुष्यों द्वारा स्वयं दिए गए जो भी दान होते हैं,

श्लोक 17 (garuda.2.4.17)

तानितानि च सर्वाणि उपतिष्ठन्ति चाग्रतः । प्रायश्चित्तं कृतं येन साङ्गं खग स वै पुमान्

tānitāni ca sarvāṇi upatiṣṭhanti cāgrataḥ | prāyaścittaṁ kṛtaṁ yena sāṁgaṁ khaga sa vai pumān

वे सब उसके सामने आकर उपस्थित होते हैं। हे खग! जिसने सांगोपांग प्रायश्चित्त किया है, वह मनुष्य,

श्लोक 18 (garuda.2.4.18)

पापानि भस्मसात्कृत्वा स्वर्गलोके महीयते । अमृतं तु गवां क्षीरं यतः पतगसत्तम्

pāpāni bhasmasātkṛtvā svargaloke mahīyate | amṛtaṁ tu gavāṁ kṣīraṁ yataḥ patagasattam

पापों को भस्म करके स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है। हे पक्षिसत्तम! क्योंकि गौ का दूध अमृत है,

श्लोक 19 (garuda.2.4.19)

तस्माद्ददाति यो धेनुममृतत्वं स गच्छति । दानान्यष्टौ तु दत्त्वा वै गन्धर्वनिलये वसेत्

tasmāddadāti yo dhenumamṛtatvaṁ sa gacchati | dānānyaṣṭau tu dattvā vai gandharvanilaye vaset

इसलिए जो गौ का दान करता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है। जो आठों दान देकर [मरता है], वह गंधर्वलोक में निवास करता है।

श्लोक 20 (garuda.2.4.20)

आलयस्तत्र रौद्रे हि दह्यते येन मानवः । छत्रदानेन सुच्छाया जायते पथि तुष्टिदा

ālayastatra raudre hi dahyate yena mānavaḥ | chatradānena succhāyā jāyate pathi tuṣṭidā

जिस मनुष्य का घर [अग्नि से] जल जाता है, उसका निवास [नरक के] भयंकर [स्थान में] होता है; छाता-दान से मार्ग में सुखद छाया प्राप्त होती है, जो संतोष देती है,

श्लोक 21 (garuda.2.4.21)

असिपत्रवनं धारमतिक्रामति वै सुखम् । अश्वारूढश्च व्रजति ददते यद्युपानहौ

asipatravanaṁ dhāramatikrāmati vai sukham | aśvārūḍhaśca vrajati dadate yadyupānahau

और असिपत्रवन के मार्ग को सुखपूर्वक पार करता है। जो जूते देता है, वह घोड़े पर सवार होकर चलता है।

श्लोक 22 (garuda.2.4.22)

भोजनासनदानेन सुखं मार्गे भुनक्ति वै । प्रदेशे निर्जले दाता सुखी स्याद्वै कमण्डलोः

bhojanāsanadānena sukhaṁ mārge bhunakti vai | pradeśe nirjale dātā sukhī syādvai kamaṇḍaloḥ

भोजन और आसन के दान से मार्ग में सुखपूर्वक भोग प्राप्त करता है; निर्जल प्रदेश में जो कमण्डलु का दाता होता है, वह सुखी होता है।

श्लोक 23 (garuda.2.4.23)

यमदूता महारौद्राः करालाः कृष्णपिङ्गलाः । न पीडयन्ति दाक्षिण्याद्वस्त्राभरणदानतः

yamadūtā mahāraudrāḥ karālāḥ kṛṣṇapiṁgalāḥ | na pīḍayanti dākṣiṇyādvastrābharaṇadānataḥ

अत्यंत भयंकर, विकराल, काले-पीले यमदूत भी वस्त्र और आभूषण के दान से प्रसन्न होकर उसे पीड़ा नहीं देते।

श्लोक 24 (garuda.2.4.24)

तिलपात्रं तु विप्राय दत्तं पत्ररथ ध्रुवम् । नाशयेत्त्रिविधं षापं वाङ्मनः कायसम्भवम्

tilapātraṁ tu viprāya dattaṁ patraratha dhruvam | nāśayettrividhaṁ ṣāpaṁ vāṁmanaḥ kāyasambhavam

ब्राह्मण को दिया गया तिल-पात्र, हे खगेश्वर! निश्चय ही वाणी, मन और शरीर से उत्पन्न त्रिविध पाप का नाश करता है।

श्लोक 25 (garuda.2.4.25)

घृतपात्रप्रदाने रुद्रलोके वसेन्नरः । सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दत्त्वा द्विजातये

ghṛtapātrapradāne rudraloke vasennaraḥ | sarvopaskarasaṁyuktāṁ śayyāṁ dattvā dvijātaye

घी के पात्र के दान से मनुष्य रुद्रलोक में निवास करता है; समस्त उपकरणों सहित शय्या ब्राह्मण को देकर,

श्लोक 26 (garuda.2.4.26)

नानाप्सरोभिराकीर्णं विमानमधिरोहति । षष्टिवर्षसहस्राणि क्रीडित्वा शक्रमन्दिरे

nānāpsarobhirākīrṇaṁ vimānamadhirohati | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi krīḍitvā śakramandire

वह नाना अप्सराओं से भरे विमान पर आरूढ़ होता है। साठ हजार वर्षों तक इन्द्र के भवन में क्रीड़ा करके,

श्लोक 27 (garuda.2.4.27)

इन्द्रलोकात्परिभ्रष्ट इह लोके नृपो भवेत् । सर्वोपस्करणोपेतं युवानं दोषवर्जितम्

indralokātparibhraṣṭa iha loke nṛpo bhavet | sarvopaskaraṇopetaṁ yuvānaṁ doṣavarjitam

इन्द्रलोक से च्युत होकर वह इस लोक में राजा बनता है। जो समस्त साज-सज्जा से युक्त, यौवन-संपन्न, निर्दोष घोड़ा,

श्लोक 28 (garuda.2.4.28)

योऽश्वं ददाति विप्राय स्वर्गलोके च तिष्ठति । यावन्ति रोमाणि हये भवन्ति हि खगेश्वर

yo'śvaṁ dadāti viprāya svargaloke ca tiṣṭhati | yāvanti romāṇi haye bhavanti hi khageśvara

ब्राह्मण को देता है, वह स्वर्गलोक में निवास करता है। हे खगेश्वर! घोड़े के शरीर में जितने रोम होते हैं,

श्लोक 29 (garuda.2.4.29)

तावतो राजितांल्लोकानाप्नुवन्ति हि पुष्कलान् । चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं सर्वोपकरणैर्युतम्

tāvato rājitāṁllokānāpnuvanti hi puṣkalān | caturbhisturagairyuktaṁ sarvopakaraṇairyutam

उतने ही वर्षों तक वह उज्ज्वल, समृद्ध लोकों को प्राप्त करता है। चार घोड़ों से युक्त, सम्पूर्ण साज-सामान से युक्त रथ,

श्लोक 30 (garuda.2.4.30)

रथं द्विजातये दत्त्वा राजसूयफलं लभ्त्

rathaṁ dvijātaye dattvā rājasūyaphalaṁ labht

ब्राह्मण को देकर वह राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (garuda.2.4.31)

दुग्धाधिकां च महिषीं नवमेघवर्णां सन्तुष्टतर्णकवलीं जघनाभिरामाम् । दत्त्वा सुवर्णतिलकां द्विजपुङ्गवाय लोकोदयं स जयतीति किमत्र चित्रम्

dugdhādhikāṁ ca mahiṣīṁ navameghavarṇāṁ santuṣṭatarṇakavalīṁ jaghanābhirāmām | dattvā suvarṇatilakāṁ dvijapuṁgavāya lokodayaṁ sa jayatīti kimatra citram

प्रचुर दूधवाली, नए मेघ के समान वर्णवाली, संतुष्ट बछड़े को दूध पिलाने वाली, सुंदर जघन से मनोहर, स्वर्ण-तिलक से युक्त भैंस को श्रेष्ठ ब्राह्मण को देकर — इस लोक में विजय प्राप्त करता है, इसमें क्या आश्चर्य है?

श्लोक 32 (garuda.2.4.32)

तालवृन्तस्य दानेन वायुना वीज्यते पथि । कान्तियुक्सुभगः श्रीमान् भवत्यम्बरदानतः

tālavṛntasya dānena vāyunā vījyate pathi | kāntiyuksubhagaḥ śrīmān bhavatyambaradānataḥ

पंखे के दान से मार्ग में वायु उसे झलती है; वस्त्र-दान से वह कान्तिमान्, सुभग और श्रीसंपन्न होता है।

श्लोक 33 (garuda.2.4.33)

रसान्नोपस्करयुतं गृहं विप्राय योर्ऽपयेत् । न हीयते तस्य वंशः स्वर्गं प्राप्नोत्यनुत्तमम्

rasānnopaskarayutaṁ gṛhaṁ viprāya yor'payet | na hīyate tasya vaṁśaḥ svargaṁ prāpnotyanuttamam

जो रस, अन्न और उपकरणों सहित घर ब्राह्मण को देता है, उसका वंश क्षीण नहीं होता, और वह उत्तम स्वर्ग प्राप्त करता है।

श्लोक 34 (garuda.2.4.34)

भवत्यत्र खगश्रेष्ठ फलगौखलाघवम् । श्रद्धाश्रद्धाविभेदेन दानगौरवलाघवात्

bhavatyatra khagaśreṣṭha phalagaukhalāghavam | śraddhāśraddhāvibhedena dānagauravalāghavāt

हे खगश्रेष्ठ! यहाँ फल की न्यूनाधिकता श्रद्धा-अश्रद्धा के भेद से, और दान की महत्ता-लघुता से होती है।

श्लोक 35 (garuda.2.4.35)

ततो येनाम्बुदानानि कृतान्यत्र रसास्तथा । तदा खग तथाह्लादमापदि प्रतिपद्यते

tato yenāmbudānāni kṛtānyatra rasāstathā | tadā khaga tathāhlādamāpadi pratipadyate

इसलिए जिसने यहाँ जल-दान और रस-दान किए हैं, हे खग! विपत्ति में उसे उतना ही आह्लाद प्राप्त होता है।

श्लोक 36 (garuda.2.4.36)

अन्नानि येन दत्तानि श्रद्धापूतेन चेतसा । सोऽपि तृप्तिमवाप्नोति विनाप्यन्नेन वै तदा

annāni yena dattāni śraddhāpūtena cetasā | so'pi tṛptimavāpnoti vināpyannena vai tadā

जिसने श्रद्धा से पवित्र चित्त से अन्न दिया है, वह भी उस समय बिना अन्न के भी तृप्ति प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 37 (garuda.2.4.37)

आसन्ने मरणे कुर्यात्संन्यासं चेद्विधानतः । आवर्तेत पुनर्नासौ ब्रह्मभूयाय कल्पते

āsanne maraṇe kuryātsaṁnyāsaṁ cedvidhānataḥ | āvarteta punarnāsau brahmabhūyāya kalpate

यदि मृत्यु निकट आने पर विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण कर ले, तो वह पुनः [संसार में] नहीं लौटता, वह ब्रह्म-भाव को प्राप्त होने योग्य होता है।

श्लोक 38 (garuda.2.4.38)

आसन्नमरणो मत्यश्चेत्तीर्थं प्रतिनयिते । तीर्थप्राप्तौ भवेन्मुक्तिर्म्रियते यदि मार्गगः । पदेपदे क्रतुसमं भवेत्तस्य न संशयः

āsannamaraṇo matyaścettīrthaṁ pratinayite | tīrthaprāptau bhavenmuktirmriyate yadi mārgagaḥ | padepade kratusamaṁ bhavettasya na saṁśayaḥ

यदि मरणासन्न मनुष्य को तीर्थ ले जाया जाए, तो तीर्थ में पहुँचने पर मुक्ति होती है; यदि वह मार्ग में ही चलते-चलते मर जाए, तो हर कदम पर उसे यज्ञ के समान फल मिलता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 39 (garuda.2.4.39)

गृह्णीयाच्चेदनशनं व्रतं विधिवदागते । मृत्यौ न सोऽपि संसारे भूयः पर्यटति द्विज

gṛhṇīyāccedanaśanaṁ vrataṁ vidhivadāgate | mṛtyau na so'pi saṁsāre bhūyaḥ paryaṭati dvija

यदि विधिपूर्वक मृत्यु आने पर अनशन-व्रत ग्रहण कर ले, तो हे द्विज! वह भी फिर संसार में नहीं भटकता।

श्लोक 40 (garuda.2.4.40)

किं दानमिति तुर्यस्य प्रश्नस्योत्तरमीरितम् । दाहमृत्योरन्तरे किमितिप्रश्नोत्तरं शृणु

kiṁ dānamiti turyasya praśnasyottaramīritam | dāhamṛtyorantare kimitipraśnottaraṁ śṛṇu

इस प्रकार चौथे प्रश्न का उत्तर — दान क्या है — कह दिया गया। अब दाह और मृत्यु के बीच के [विधान संबंधी] प्रश्न का उत्तर सुनो।

श्लोक 41 (garuda.2.4.41)

गतप्राणं ततो ज्ञात्वा स्नात्वा पुत्रादिराशु तम् । शवं जलेन शुद्धेन क्षालयेदविचारयन्

gataprāṇaṁ tato jñātvā snātvā putrādirāśu tam | śavaṁ jalena śuddhena kṣālayedavicārayan

प्राण निकल जाने का ज्ञान होने पर, पुत्र आदि स्वयं स्नान करके, बिना विचार किए तुरन्त उस शव को शुद्ध जल से धोएँ।

श्लोक 42 (garuda.2.4.42)

परिधाप्याहते वस्त्रे चन्दनैः प्रोक्षयेत्तनुम् । ततो मृतस्य स्थाने वै एकोद्दिष्टं समाचरेत्

paridhāpyāhate vastre candanaiḥ prokṣayettanum | tato mṛtasya sthāne vai ekoddiṣṭaṁ samācaret

उसे बिना सिली हुई वस्त्र पहनाकर, शरीर पर चंदन का छिड़काव करना चाहिए; फिर मृतक के स्थान पर एकोद्दिष्ट श्राद्ध का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 43 (garuda.2.4.43)

प्रयोगपूर्वं दाहस्य योग्यतादिर्यथा भवेत् । आंसनं प्राक्षण च स्यान्न स्यादेतच्चतुष्टयम्

prayogapūrvaṁ dāhasya yogyatādiryathā bhavet | āṁsanaṁ prākṣaṇa ca syānna syādetaccatuṣṭayam

दाह के लिए योग्यता आदि जिस विधि से हो, उसका पूर्व-प्रयोग [बताता हूँ]। आसन और प्रोक्षण — ये चार [कर्म ऐसे हैं जो] नहीं होते,

श्लोक 44 (garuda.2.4.44)

आवाहनार्चन चैव पान्त्रालम्भावगाहने । भवेद्दानान्नसङ्कल्पः पिण्डदानं सदा भवेत्

āvāhanārcana caiva pāntrālambhāvagāhane | bhaveddānānnasaṁkalpaḥ piṇḍadānaṁ sadā bhavet

आवाहन, अर्चन, पात्र-आलम्भन और अवगाहन [भी नहीं होते]। दान का संकल्प और अन्न [का संकल्प] होता है, पिण्डदान सदा होता है।

श्लोक 45 (garuda.2.4.45)

पदार्थपञ्चकं न स्याद्रेखा प्रत्यवनेजनम् । दद्यादक्षय्यमुदकं न स्यादेतत्त्रयं पुनः

padārthapañcakaṁ na syādrekhā pratyavanejanam | dadyādakṣayyamudakaṁ na syādetattrayaṁ punaḥ

पाँच पदार्थ [इस रीति के] नहीं होते, न रेखा और न प्रत्यवनेजन (पुनः-प्रक्षालन)। अक्षय जल देना चाहिए, किन्तु ये तीन [अन्य कर्म] पुनः नहीं होते —

श्लोक 46 (garuda.2.4.46)

स्वधावाचनमाशीश्च तिलकं च खगोत्तम । घटं दद्यात्समाषान्नं दद्याल्लोहस्य दक्षिणाम्

svadhāvācanamāśīśca tilakaṁ ca khagottama | ghaṭaṁ dadyātsamāṣānnaṁ dadyāllohasya dakṣiṇām

स्वधा-वाचन, आशीर्वचन और तिलक, हे खगोत्तम! घट देना चाहिए, माष-मिश्रित अन्न देना चाहिए, लोहे की दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 47 (garuda.2.4.47)

पिण्डस्य चालनं प्रोक्तं नैव प्रोक्तमिदं त्रिकम् । प्रच्छादनविसर्गौ च स्वस्तिवाचनकं तथा

piṇḍasya cālanaṁ proktaṁ naiva proktamidaṁ trikam | pracchādanavisargau ca svastivācanakaṁ tathā

पिण्ड को हिलाना कहा गया है, यह त्रिक (तीन क्रियाएँ) नहीं कही गई — ढकना, विसर्जन करना, तथा स्वस्तिवाचन,

श्लोक 48 (garuda.2.4.48)

एषु षट्सु विधिः प्रोक्तः श्राद्धेषु मलिनेषु ते । षडेव मरणस्थाने द्वारि चात्वरिके तथा

eṣu ṣaṭsu vidhiḥ proktaḥ śrāddheṣu malineṣu te | ṣaḍeva maraṇasthāne dvāri cātvarike tathā

इन छह में विधि कही गई है, उन मलिन (अशुद्धि-काल के) श्राद्धों में। मरण-स्थान में, द्वार में, चौराहे में — ये छह ही स्थान हैं —

श्लोक 49 (garuda.2.4.49)

विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने खग । मृतिस्थाने शवो नाम भूमिस्तुष्यति देवता

viśrāme kāṣṭhacayane tathā sañcayane khaga | mṛtisthāne śavo nāma bhūmistuṣyati devatā

विश्राम-स्थान में, लकड़ी एकत्र करने के स्थान में, और हे खग! अस्थि-संचयन के स्थान में भी। मरण-स्थान को 'शव' कहा जाता है, और वहाँ की भूमि-देवता प्रसन्न होती है,

श्लोक 50 (garuda.2.4.50)

पान्थो द्वारि भवेत्तेन प्रीता स्याद्वास्तुदेवता । चत्वरे खेचरस्तेन तुष्येद्भृतादिदेवता

pāntho dvāri bhavettena prītā syādvāstudevatā | catvare khecarastena tuṣyedbhṛtādidevatā

द्वार पर पथिक-देवता प्रसन्न होती है, इसी से वास्तु-देवता भी प्रसन्न होती है। चौराहे पर आकाशचारी देवता प्रसन्न होती है, इसी से भूत आदि देवता तृप्त होती हैं।

श्लोक 51 (garuda.2.4.51)

विश्रामे भूतसंज्ञोऽयं तुष्टस्तेन दिशो दश । चितायां साधक इति सञ्चितौ प्रेत उच्यते

viśrāme bhūtasaṁjño'yaṁ tuṣṭastena diśo daśa | citāyāṁ sādhaka iti sañcitau preta ucyate

विश्राम-स्थान में यह 'भूत' नाम से जाना जाता है, जिससे दसों दिशाएँ प्रसन्न होती हैं। चिता पर वह 'साधक' कहलाता है, संचयन-स्थल पर उसे 'प्रेत' कहा जाता है।

श्लोक 52 (garuda.2.4.52)

तिलदर्भघृतेधांसि गृहीत्वा तु सुतादयः । गाथां यमस्य सूक्तं वाप्यधीयाना व्रजन्ति हि

tiladarbhaghṛtedhāṁsi gṛhītvā tu sutādayaḥ | gāthāṁ yamasya sūktaṁ vāpyadhīyānā vrajanti hi

तिल, कुश, घी और लकड़ियाँ लेकर पुत्र आदि यम की गाथा अथवा सूक्त का पाठ करते हुए चलते हैं —

श्लोक 53 (garuda.2.4.53)

अहरहर्नीयमानो गामश्वं पुरुषं वृषम् । वैवस्वतो न तृप्येत सुरया त्विव दुर्मतिः

aharaharnīyamāno gāmaśvaṁ puruṣaṁ vṛṣam | vaivasvato na tṛpyeta surayā tviva durmatiḥ

'प्रतिदिन गौ, अश्व, पुरुष और बैल को ले जाया जा रहा है, फिर भी दुर्बुद्धि वैवस्वत यम, सुरा के समान, कभी तृप्त नहीं होता —'

श्लोक 54 (garuda.2.4.54)

इमां गाथमपेतेति सूक्तं वा पथि संपठेत् । दक्षिणस्यां दिश्यरण्यं व्रजेयुः सर्वबान्धवाः

imāṁ gāthamapeteti sūktaṁ vā pathi saṁpaṭhet | dakṣiṇasyāṁ diśyaraṇyaṁ vrajeyuḥ sarvabāndhavāḥ

यह गाथा अथवा सूक्त मार्ग में पढ़ते हुए, सभी बंधु-बांधव दक्षिण दिशा में स्थित श्मशान की ओर चलें।

श्लोक 55 (garuda.2.4.55)

पथि श्राद्धद्वयं कुर्यात्पूर्वोक्तविधिना खग । ततः शनैर्भूतले वै दक्षिणाशिरसं शवम्

pathi śrāddhadvayaṁ kuryātpūrvoktavidhinā khaga | tataḥ śanairbhūtale vai dakṣiṇāśirasaṁ śavam

हे खग! मार्ग में पूर्वोक्त विधि से दो श्राद्ध करने चाहिए। फिर धीरे-धीरे भूतल पर, शव का सिर दक्षिण दिशा की ओर करके,

श्लोक 56 (garuda.2.4.56)

स्थापयित्वा चिताभूमौ पूर्वोक्तं श्राद्धमाचरेत् । तृणकाष्ठतिलाज्यादि स्वयं निन्युः सुतादयः

sthāpayitvā citābhūmau pūrvoktaṁ śrāddhamācaret | tṛṇakāṣṭhatilājyādi svayaṁ ninyuḥ sutādayaḥ

उसे चिता-भूमि पर स्थापित करके, पूर्वोक्त श्राद्ध का आचरण करना चाहिए। पुत्र आदि स्वयं तृण, काष्ठ, तिल और घी आदि ले जाएँ;

श्लोक 57 (garuda.2.4.57)

शूद्रानीतैः कृतं कर्म सर्वं भवति निष्फलम् । प्राचीनावीतिना भाव्यं दक्षिणाभिमुकेन च

śūdrānītaiḥ kṛtaṁ karma sarvaṁ bhavati niṣphalam | prācīnāvītinā bhāvyaṁ dakṣiṇābhimukena ca

शूद्र द्वारा लाई गई सामग्री से किया गया समस्त कर्म निष्फल होता है। यज्ञोपवीत को दाईं ओर धारण करते हुए और दक्षिणाभिमुख होकर [यह सब करना चाहिए]।

श्लोक 58 (garuda.2.4.58)

वेदी तत्र प्रकर्तव्या यथाशास्त्रमथाण्डज । प्रतेवस्त्रं द्विधा कृत्वार्धेन तं छादयेत्ततः

vedī tatra prakartavyā yathāśāstramathāṇḍaja | pratevastraṁ dvidhā kṛtvārdhena taṁ chādayettataḥ

हे अण्डज! वहाँ शास्त्रविधि के अनुसार वेदी बनानी चाहिए। मृतक के वस्त्र को दो भागों में बाँटकर, आधे से उसे ढकना चाहिए,

श्लोक 59 (garuda.2.4.59)

अर्धं श्मशानवासार्थं भूमावेव विनिः क्षिपेत् । ततः पूर्वोक्तविधिना पिण्डं प्रेतकरे न्यसेत्

ardhaṁ śmaśānavāsārthaṁ bhūmāveva viniḥ kṣipet | tataḥ pūrvoktavidhinā piṇḍaṁ pretakare nyaset

और आधा भाग श्मशान-निवास के लिए भूमि पर ही छोड़ देना चाहिए। फिर पूर्वोक्त विधि से मृतक के हाथ में पिण्ड रखना चाहिए।

श्लोक 60 (garuda.2.4.60)

आज्येनाभ्यञ्जनं कार्यं सर्वाङ्गेषु शवस्य च । दाहमृत्योरन्तराले विधिः पिण्डस्य तं शृणु

ājyenābhyañjanaṁ kāryaṁ sarvāṁgeṣu śavasya ca | dāhamṛtyorantarāle vidhiḥ piṇḍasya taṁ śṛṇu

शव के समस्त अंगों पर घी से अभ्यंजन करना चाहिए। अब दाह और मृत्यु के अंतराल में पिण्ड के विधान को सुनो।

श्लोक 61 (garuda.2.4.61)

पूर्वोक्तैः पञ्चभिः पिण्डैः शवस्याहुतियोग्यता । अन्यथा चोपघाताच्च राक्षसाद्या भवन्ति हि

pūrvoktaiḥ pañcabhiḥ piṇḍaiḥ śavasyāhutiyogyatā | anyathā copaghātācca rākṣasādyā bhavanti hi

पूर्वोक्त पाँच पिण्डों से शव की आहुति के योग्यता प्राप्त होती है; अन्यथा, [उस विधि के] उल्लंघन से राक्षस आदि [योनियाँ प्राप्त] होती हैं।

श्लोक 62 (garuda.2.4.62)

संमृज्य चोपलिप्याथ उल्लिख्योद्धृत्य वेदिकाम् । अभ्युक्ष्योपसमाधाय वह्निं तत्र विधानतः

saṁmṛjya copalipyātha ullikhyoddhṛtya vedikām | abhyukṣyopasamādhāya vahniṁ tatra vidhānataḥ

वेदी को बुहारकर, लीपकर, खुरचकर और मिट्टी हटाकर, जल छिड़ककर और विधिपूर्वक वहाँ अग्नि स्थापित करके,

श्लोक 63 (garuda.2.4.63)

पुष्पाक्षतैश्च संपूज्य देवं क्रव्यादसंज्ञकम् । श्रौतेन तु विधानेन ह्याहिताग्निं दहेद्वुधः

puṣpākṣataiśca saṁpūjya devaṁ kravyādasaṁjñakam | śrautena tu vidhānena hyāhitāgniṁ dahedvudhaḥ

पुष्प और अक्षत से क्रव्याद-संज्ञक देवता (अग्नि) की पूजा करके, विद्वान पुरुष श्रौत विधि से आहिताग्नि (नित्य अग्नि रखने वाले) को जलाए।

श्लोक 64 (garuda.2.4.64)

चण्डालाग्निं चिताग्निं च पतिताग्निं परित्यजेत् । त्वं भूतकृज्जगद्योनिस्त्वं लोकपरिपालकः

caṇḍālāgniṁ citāgniṁ ca patitāgniṁ parityajet | tvaṁ bhūtakṛjjagadyonistvaṁ lokaparipālakaḥ

चाण्डाल की अग्नि, चिता की [पुरानी शेष] अग्नि, और पतित की अग्नि — इनका त्याग कर देना चाहिए। 'तुम प्राणियों के रचयिता हो, जगत के मूल हो, तुम लोकों के पालक हो —'

श्लोक 65 (garuda.2.4.65)

उपसंहर तस्मात्त्वमेनं स्वर्गं नयामृतम् । इति क्रव्यादमभ्यर्च्य शरीराहुतिमाचरेत्

upasaṁhara tasmāttvamenaṁ svargaṁ nayāmṛtam | iti kravyādamabhyarcya śarīrāhutimācaret

'इसलिए तुम इसे समेट लो, इसे अमृतमय स्वर्ग तक ले जाओ' — ऐसा कहकर क्रव्याद देवता का पूजन करके शरीर की आहुति करनी चाहिए।

श्लोक 66 (garuda.2.4.66)

अर्धदग्धे तथा देहे दद्यादाज्याहुतिं ततः । अस्मात्त्वमधिजातोऽसि त्वदयं जायतां पुनः

ardhadagdhe tathā dehe dadyādājyāhutiṁ tataḥ | asmāttvamadhijāto'si tvadayaṁ jāyatāṁ punaḥ

शरीर के आधे जल जाने पर घी की आहुति देनी चाहिए — 'तुम इससे उत्पन्न हुए हो, यह पुनः तुमसे उत्पन्न हो' [ऐसा कहते हुए]।

श्लोक 67 (garuda.2.4.67)

असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेत्युक्त्वा तु नामतः । एवमाज्याहुतिं दत्त्वा तिलमिश्रां समन्त्रकम्

asau svargāya lokāya svāhetyuktvā tu nāmataḥ | evamājyāhutiṁ dattvā tilamiśrāṁ samantrakam

'यह अमुक (नामपूर्वक) स्वर्गलोक के लिए स्वाहा' — ऐसा नाम लेकर कहते हुए, इस प्रकार घी की आहुति देकर, तिल-मिश्रित मंत्रयुक्त [आहुति भी देनी चाहिए]।

श्लोक 68 (garuda.2.4.68)

रोदितव्यं ततो गाढमेवं तस्य सुखं भवेत् । दाहस्यानन्तरं तत्र कृत्वा सञ्चयनिक्रियाम्

roditavyaṁ tato gāḍhamevaṁ tasya sukhaṁ bhavet | dāhasyānantaraṁ tatra kṛtvā sañcayanikriyām

फिर उसके पश्चात् गहरे स्वर में रोना चाहिए, इससे उसे सुख प्राप्त होता है। दाह के तुरंत बाद वहाँ संचयन-क्रिया करके,

श्लोक 69 (garuda.2.4.69)

प्रेतपिण्डं प्रदद्याच्च दाहार्तिशमनं खग । ततः प्रदक्षिणं कृक्त्वा चिताप्रस्थानवीक्षकाः

pretapiṇḍaṁ pradadyācca dāhārtiśamanaṁ khaga | tataḥ pradakṣiṇaṁ kṛktvā citāprasthānavīkṣakāḥ

हे खग! दाह की पीड़ा शांत करने के लिए प्रेत-पिण्ड अर्पित करना चाहिए। फिर चिता की प्रदक्षिणा करके, उससे विमुख होकर,

श्लोक 70 (garuda.2.4.70)

कनिष्ठपूर्वाः स्नानार्थं गच्छेयुः सूक्तजापकाः । ततो जालसमीपे तु गत्वा प्रक्षाल्य चांशुकम्

kaniṣṭhapūrvāḥ snānārthaṁ gaccheyuḥ sūktajāpakāḥ | tato jālasamīpe tu gatvā prakṣālya cāṁśukam

कनिष्ठ को आगे रखकर, सूक्त का जाप करते हुए, स्नान के लिए जाना चाहिए। फिर जलाशय के निकट जाकर वस्त्र धोकर,

श्लोक 71 (garuda.2.4.71)

परिधाय पुनस्तच्च ब्रृयुस्तं पुरुषं प्रति । उदकं तु करिष्यामः सचैलं पुरुषास्ततः

paridhāya punastacca brṛyustaṁ puruṣaṁ prati | udakaṁ tu kariṣyāmaḥ sacailaṁ puruṣāstataḥ

उन्हें फिर पहनकर, [मृतक] पुरुष के प्रति यह कहना चाहिए — 'हम अब जल-तर्पण करेंगे' — इस प्रकार पुरुषों को [कहना चाहिए]।

श्लोक 72 (garuda.2.4.72)

कुरुध्वमित्येव वदेच्छतवर्षावरे मृते । पुत्राद्या वृद्धपूर्वास्ते एकवस्त्राः शिखां विना

kurudhvamityeva vadecchatavarṣāvare mṛte | putrādyā vṛddhapūrvāste ekavastrāḥ śikhāṁ vinā

यदि मृतक सौ वर्ष से कम आयु का हो, तो 'करो' ऐसा ही कहना चाहिए। पुत्र आदि, वृद्धों को आगे रखकर, एक ही वस्त्र पहने, शिखा (चोटी) खोले हुए,

श्लोक 73 (garuda.2.4.73)

प्राचीनावीतिनः सर्वे विशेयुर्मौनिनो जलम् । अपनः शोशुचदघमनेन पितृदिङ्मुखाः

prācīnāvītinaḥ sarve viśeyurmaunino jalam | apanaḥ śośucadaghamanena pitṛdiṁmukhāḥ

यज्ञोपवीत दाईं ओर धारण किए, सब मौन होकर जल में प्रवेश करें। पितरों की दिशा (दक्षिण) की ओर मुख करके, 'हमारे पापों को यह [जल] भस्म करे' [ऐसा भाव रखते हुए],

श्लोक 74 (garuda.2.4.74)

जलावघट्टनं चव न कुर्युः स्नानकारकाः । ततस्तटे समागत्य शिखां बद्ध्वा ऋजून् कुशान्

jalāvaghaṭṭanaṁ cava na kuryuḥ snānakārakāḥ | tatastaṭe samāgatya śikhāṁ baddhvā ṛjūn kuśān

स्नान करने वाले जल को हिलाएँ नहीं। फिर तट पर आकर, शिखा बाँधकर, सीधे कुश लेकर,

श्लोक 75 (garuda.2.4.75)

दक्षिणाग्रहस्तयोस्तु कृत्वाथ सतिलं जलम् । आदायाञ्जलिना याम्यां दुः खी पैतृकतीर्थतः

dakṣiṇāgrahastayostu kṛtvātha satilaṁ jalam | ādāyāñjalinā yāmyāṁ duḥ khī paitṛkatīrthataḥ

दोनों हाथों को दक्षिण दिशा में फैलाकर, तिल-मिश्रित जल लेकर, पितृ-तीर्थ (अंगूठे और तर्जनी के बीच) से दुःखी होकर अंजलि में,

श्लोक 76 (garuda.2.4.76)

एकवारं त्रिवारं वा दशवारमथापि वा । भूमावश्मनि वा सर्वे क्षिपेयुर्वाग्यताः खग

ekavāraṁ trivāraṁ vā daśavāramathāpi vā | bhūmāvaśmani vā sarve kṣipeyurvāgyatāḥ khaga

एक बार, तीन बार अथवा दस बार भी, हे खग! सब मौन रहकर भूमि पर अथवा पत्थर पर [वह जल] छोड़ें —

श्लोक 77 (garuda.2.4.77)

तृप्यन्तु तृप्यतां वापि तर्पयाम्युपतिष्ठताम् । प्रेतैतदमुकगोत्रेत्युक्तेष्वेवं समुच्चरेत्

tṛpyantu tṛpyatāṁ vāpi tarpayāmyupatiṣṭhatām | pretaitadamukagotretyukteṣvevaṁ samuccaret

'तृप्त हों, तृप्त हों, मैं तर्पण करता हूँ, उपस्थित हों' — 'हे अमुक-गोत्रीय प्रेत!' ऐसा कहते हुए, इस प्रकार उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 78 (garuda.2.4.78)

जलाञ्जलौ कृते पश्चाद्विधेयं दन्तधावनम् । त्यजन्ति गोत्रिणः सर्वे दिनानि नव काश्यप

jalāñjalau kṛte paścādvidheyaṁ dantadhāvanam | tyajanti gotriṇaḥ sarve dināni nava kāśyapa

जल की अंजलि देने के बाद दतुअन करना चाहिए। हे काश्यप! सभी सगोत्र नौ दिनों तक [कुछ नियमों का] त्याग करते हैं।

श्लोक 79 (garuda.2.4.79)

तत उत्तीर्योदकाद्वै वस्त्राणि परिधाय च । स्नानवस्त्रं सकृत्पीड्य विशेयुः शुचिभूतले

tata uttīryodakādvai vastrāṇi paridhāya ca | snānavastraṁ sakṛtpīḍya viśeyuḥ śucibhūtale

फिर जल से बाहर निकलकर वस्त्र धारण करके, स्नान के वस्त्र को एक बार निचोड़कर, शुद्ध भूमि पर प्रवेश करें।

श्लोक 80 (garuda.2.4.80)

अश्रुपातं न कुर्वीत दत्त्वा दाहजलाञ्जलिम् । श्लेष्माश्रु बान्धवैर्मुक्तं प्रेतो भुङ्क्ते यतोऽवशः

aśrupātaṁ na kurvīta dattvā dāhajalāñjalim | śleṣmāśru bāndhavairmuktaṁ preto bhuṁkte yato'vaśaḥ

दाह-जल की अंजलि देने के बाद आँसू नहीं बहाने चाहिए, क्योंकि प्रेत अपने बंधुजनों द्वारा छोड़े गए कफ और आँसू को विवश होकर खाता है।

श्लोक 81 (garuda.2.4.81)

अतो न रोदितव्यं हि क्रियाः कार्याः स्वशक्तितः । ततस्तेषूपविष्टेषु पुराणज्ञः सुकृत्स्वकः

ato na roditavyaṁ hi kriyāḥ kāryāḥ svaśaktitaḥ | tatasteṣūpaviṣṭeṣu purāṇajñaḥ sukṛtsvakaḥ

इसलिए रोना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी शक्ति के अनुसार क्रियाएँ करनी चाहिए। फिर जब सब वहाँ बैठे हों, तो पुराणों का ज्ञाता, स्वयं सुसंस्कृत व्यक्ति,

श्लोक 82 (garuda.2.4.82)

शोकापनोदं कुर्वीत संसारानित्यतां ब्रुवन् । मानुष्ये कदलीस्तन्भे असारे सारमार्गणम्

śokāpanodaṁ kurvīta saṁsārānityatāṁ bruvan | mānuṣye kadalīstanbhe asāre sāramārgaṇam

संसार की अनित्यता का वर्णन करते हुए शोक को दूर करना चाहिए — मनुष्य-जीवन केले के तने के समान असार है, [उसमें] सार की खोज,

श्लोक 83 (garuda.2.4.83)

करोति यः स संमूढो जलबुद्वद्रसन्निभे । पञ्चधा संभृतः कायो यदि पञ्चत्वमागतः

karoti yaḥ sa saṁmūḍho jalabudvadrasannibhe | pañcadhā saṁbhṛtaḥ kāyo yadi pañcatvamāgataḥ

जो करता है, वह मूढ़ है — जैसे जल के बुलबुले या नदी की धारा में [सार खोजना व्यर्थ है]। यह शरीर पाँच तत्वों से बना है; यदि वह पंचत्व को प्राप्त हो गया,

श्लोक 84 (garuda.2.4.84)

कर्मभिः स्वशरीरोत्थैस्तत्र का परिदेवना । गन्त्री वसुमती नाशमुदधिर्दैवतानि च

karmabhiḥ svaśarīrotthaistatra kā paridevanā | gantrī vasumatī nāśamudadhirdaivatāni ca

अपने ही शरीर से उत्पन्न कर्मों के कारण, तो इसमें विलाप की क्या आवश्यकता? यह विशाल पृथ्वी भी नाश को प्राप्त होने वाली है, समुद्र और देवता भी,

श्लोक 85 (garuda.2.4.85)

फेनप्रख्यः कथं नाशं मर्त्यलोको न यास्यति । एवं संश्रावयेत्तत्र मृदुशाद्वलसंस्थितान्

phenaprakhyaḥ kathaṁ nāśaṁ martyaloko na yāsyati | evaṁ saṁśrāvayettatra mṛduśādvalasaṁsthitān

फेन के समान क्षणभंगुर, यह मर्त्यलोक नाश को प्राप्त क्यों नहीं होगा? इस प्रकार वहाँ मुलायम घास पर बैठे हुए [शोकसंतप्त बंधुजनों] को सुनाना चाहिए।

श्लोक 86 (garuda.2.4.86)

तेऽयि संश्रुत्य गच्छेयुर्गृहं बालपुरः सराः । विदश्य र्निबपत्राणि नियता द्वारि वेश्मनः

te'yi saṁśrutya gaccheyurgṛhaṁ bālapuraḥ sarāḥ | vidaśya rnibapatrāṇi niyatā dvāri veśmanaḥ

यह सुनकर वे बालक को आगे करके सहचरों सहित घर लौटें। घर के द्वार पर नीम के पत्तों को चबाकर, नियमपूर्वक खड़े होकर,

श्लोक 87 (garuda.2.4.87)

आचम्य वह्निसलिलं गोमयं गौरसर्षपान् । दूर्वाप्रवालं वृषभमन्यदप्यथ मङ्गलम्

ācamya vahnisalilaṁ gomayaṁ gaurasarṣapān | dūrvāpravālaṁ vṛṣabhamanyadapyatha maṁgalam

आचमन करके अग्नि, जल, गोबर, श्वेत सरसों, दूर्वा के अंकुर, बैल तथा अन्य मंगल-वस्तुओं का,

श्लोक 88 (garuda.2.4.88)

प्रविशेयुः समालभ्य कृत्वाश्मनि पदं शनैः । श्रौतेन तु विधानेन आहिताग्निं देहद्वधः

praviśeyuḥ samālabhya kṛtvāśmani padaṁ śanaiḥ | śrautena tu vidhānena āhitāgniṁ dehadvadhaḥ

स्पर्श करके, पत्थर पर धीरे-धीरे पैर रखते हुए, घर में प्रवेश करें। श्रौत विधि के अनुसार आहिताग्नि [ब्राह्मण] का दाह [अलग विधि से] विद्वान करे।

श्लोक 89 (garuda.2.4.89)

ऊनद्विवर्षं निखनेन्न कुर्यादुदकं ततः । योषित्पतिव्रता या स्याद्भर्तारं यानुगच्छति

ūnadvivarṣaṁ nikhanenna kuryādudakaṁ tataḥ | yoṣitpativratā yā syādbhartāraṁ yānugacchati

दो वर्ष से कम आयु के [बालक] को दफनाना चाहिए, उसका जलदान नहीं करना चाहिए। जो पतिव्रता स्त्री अपने पति का अनुगमन करती है (सती होती है),

श्लोक 90 (garuda.2.4.90)

प्रयोग पूर्वं भर्तारं नमस्कृत्यारुहेच्चितिम् । चितिभ्रष्टा तु या मोहात्सा प्राजापत्यमाचरेत्

prayoga pūrvaṁ bhartāraṁ namaskṛtyāruheccitim | citibhraṣṭā tu yā mohātsā prājāpatyamācaret

उसे विधिपूर्वक पति को नमस्कार करके चिता पर आरोहण करना चाहिए। जो मोहवश चिता से भ्रष्ट हो जाए (पीछे हट जाए), उसे प्राजापत्य [प्रायश्चित्त] करना चाहिए।

श्लोक 91 (garuda.2.4.91)

तिस्रः कोट्योर्धकोटी य यानि लोमानि मानुषे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्तारं यानुगच्छति

tisraḥ koṭyordhakoṭī ya yāni lomāni mānuṣe | tāvatkālaṁ vasetsvarge bhartāraṁ yānugacchati

मनुष्य के शरीर में जितने रोम होते हैं, साढ़े तीन करोड़ [के बराबर वर्षों तक] — जो [पत्नी] पति का अनुगमन करती है, वह उतने ही समय तक स्वर्ग में निवास करती है।

श्लोक 92 (garuda.2.4.92)

व्यालग्राही यथा व्यालं बिलादुद्धरते बलात् । तद्वदुद्धृत्य सा नारी तेनैव सह मोदते

vyālagrāhī yathā vyālaṁ bilāduddharate balāt | tadvaduddhṛtya sā nārī tenaiva saha modate

जैसे सर्प पकड़ने वाला बलपूर्वक बिल से सर्प को निकाल लेता है, वैसे ही वह स्त्री [अपने पति को मृत्यु से] निकालकर उसी के साथ आनंद मनाती है।

श्लोक 93 (garuda.2.4.93)

तत्र सा भर्तृपरमा स्तूयमानाप्सरोगणैः । क्रीडते पतिना सार्धं यावदिन्द्राश्चतुर्दश

tatra sā bhartṛparamā stūyamānāpsarogaṇaiḥ | krīḍate patinā sārdhaṁ yāvadindrāścaturdaśa

वहाँ पति-परायणा वह [स्त्री], अप्सराओं के समूह द्वारा स्तुति की जाती हुई, चौदह इन्द्रों के काल तक अपने पति के साथ क्रीड़ा करती है।

श्लोक 94 (garuda.2.4.94)

ब्रह्मघ्नो वा कृघ्नो वा मित्त्रिघ्नो वा भवेत्पतिः । पुनात्यविधवा नारी तमादाय मृता तु या

brahmaghno vā kṛghno vā mittrighno vā bhavetpatiḥ | punātyavidhavā nārī tamādāya mṛtā tu yā

चाहे पति ब्रह्महत्यारा हो, कृतघ्न हो, अथवा मित्रद्रोही हो — जो अविधवा स्त्री मरकर उसे [साथ] ले जाती है, वह उसे भी पवित्र कर देती है।

श्लोक 95 (garuda.2.4.95)

मृते भर्तरि या नारी समारोहेद्धुताशनम् । सारन्धतीसमाचारा स्वर्गलोके महीयते

mṛte bhartari yā nārī samāroheddhutāśanam | sārandhatīsamācārā svargaloke mahīyate

जो स्त्री पति के मरने पर अग्नि पर आरोहण करती है, वह अरुन्धती के समान आचरणवाली होकर स्वर्गलोक में महिमामंडित होती है।

श्लोक 96 (garuda.2.4.96)

यावच्चाग्नौ मृते पत्यौ स्त्री नात्मानं प्रदाहयेत् । तावन्न मुच्यते सा हि स्त्रीशरीरात्कथञ्चन

yāvaccāgnau mṛte patyau strī nātmānaṁ pradāhayet | tāvanna mucyate sā hi strīśarīrātkathañcana

जब तक पति के मरने पर स्त्री स्वयं को अग्नि में नहीं जलाती, तब तक वह किसी भी प्रकार स्त्री-शरीर से मुक्त नहीं होती।

श्लोक 97 (garuda.2.4.97)

मातृकं पैतृकं चैव यत्र चैव प्रदीयते । कुलत्रयं पुनात्येषा भर्तारं यानुगच्छति

mātṛkaṁ paitṛkaṁ caiva yatra caiva pradīyate | kulatrayaṁ punātyeṣā bhartāraṁ yānugacchati

माता के, पिता के, और जिस [ससुराल के कुल में] वह ब्याही जाती है, इन तीनों कुलों को वह पवित्र करती है, जो अपने पति का अनुगमन करती है।

श्लोक 98 (garuda.2.4.98)

आर्तार्ते मुदिते हृष्टा प्रोषिते मलिना कृशा । मृते म्रियेत या पत्यौ सा स्त्री ज्ञेया पतिव्रता

ārtārte mudite hṛṣṭā proṣite malinā kṛśā | mṛte mriyeta yā patyau sā strī jñeyā pativratā

पति के दुःखी होने पर दुःखी, प्रसन्न होने पर प्रसन्न, प्रवास पर जाने पर मलिन और कृश रहने वाली, तथा पति के मरने पर स्वयं मरने वाली — वही स्त्री पतिव्रता जानी जाती है।

श्लोक 99 (garuda.2.4.99)

पृथक्चितां समारुह्य न प्रिया गन्तुमर्हति । क्षत्त्रियाद्याः सवर्णाश्च आरोहेयुरपीह ताः

pṛthakcitāṁ samāruhya na priyā gantumarhati | kṣattriyādyāḥ savarṇāśca āroheyurapīha tāḥ

प्रिय पत्नी को अलग चिता पर चढ़कर जाना उचित नहीं है; क्षत्रिय आदि समान वर्ण की स्त्रियाँ भी यहाँ [उसी चिता पर] आरोहण कर सकती हैं।

श्लोक 100 (garuda.2.4.100)

चाण्डालीमवधिं कृत्वा ब्राह्मणीतः समो विधिः । अगर्भिणीनां सर्वासामबालताक्मे(का)नामपि

cāṇḍālīmavadhiṁ kṛtvā brāhmaṇītaḥ samo vidhiḥ | agarbhiṇīnāṁ sarvāsāmabālatākme(kā)nāmapi

चाण्डाल स्त्री की सीमा को छोड़कर, ब्राह्मणी तक सबके लिए यही विधि समान है — गर्भवती न हो, अवयस्क न हो, अथवा रजस्वला न हो, ऐसी सभी स्त्रियों के लिए,

श्लोक 101 (garuda.2.4.101)

दहनस्य विधिः प्रोक्तः सामान्येन मया खग । विशेषमपि तस्यास्य कञ्चित्किं श्रोतुमिच्छति

dahanasya vidhiḥ proktaḥ sāmānyena mayā khaga | viśeṣamapi tasyāsya kañcitkiṁ śrotumicchati

हे खग! मैंने सामान्य रूप से यह दाह-विधि तुम्हें बता दी है। क्या तुम इसका कोई विशेष अंश भी सुनना चाहते हो?

श्लोक 102 (garuda.2.4.102)

गरुड उवाच । प्रोषिते तु मृते स्वामिन्यस्थ्निनाशमुपेयुषि । कथं दाहः प्रकर्तव्यस्तन्मे वद जगत्पते

garuḍa uvāca | proṣite tu mṛte svāminyasthnināśamupeyuṣi | kathaṁ dāhaḥ prakartavyastanme vada jagatpate

गरुड़ ने कहा — हे स्वामिन्! यदि मालिक (व्यक्ति) प्रवास में मर जाए और उसकी अस्थियाँ भी नष्ट हो जाएँ, तो दाह किस प्रकार किया जाए? हे जगत्पते! यह मुझे बताइए।

श्लोक 103 (garuda.2.4.103)

श्रीकृष्ण उवाच । अस्थीनि चेन्न लभ्यन्ते प्रोषितस्य नरस्य च । तेषाञ्च हि गतिस्थानं विधानं कथयाम्यहम्

śrīkṛṣṇa uvāca | asthīni cenna labhyante proṣitasya narasya ca | teṣāñca hi gatisthānaṁ vidhānaṁ kathayāmyaham

श्रीकृष्ण ने कहा — यदि प्रवास में मरे हुए मनुष्य की हड्डियाँ प्राप्त न हों, तो उनके स्थान पर जो गति-स्थान (विकल्प) है, उसका विधान मैं बताता हूँ।

श्लोक 104 (garuda.2.4.104)

शृणु तार्क्ष्य परं गोप्यं पत्युर्दुर्मरणेषु यत् । लङ्घनैर्ये मृता जीवां दंष्ट्रिभिश्चाभिघातिताः

śṛṇu tārkṣya paraṁ gopyaṁ patyurdurmaraṇeṣu yat | laṁghanairye mṛtā jīvāṁ daṁṣṭribhiścābhighātitāḥ

हे तार्क्ष्य! अत्यंत गोप्य बात सुनो, जो अपशकुन-मृत्यु से संबंधित है — जो पशुओं पर सवार होते हुए मरे, जो दाँतों वाले पशुओं से आहत होकर मरे,

श्लोक 105 (garuda.2.4.105)

कण्ठग्रहे विलग्नानां क्षीणानां तुण्डघातिनाम् । विषाग्निवृषविप्रेभ्यो विषूच्या चात्मघातकाः

kaṇṭhagrahe vilagnānāṁ kṣīṇānāṁ tuṇḍaghātinām | viṣāgnivṛṣaviprebhyo viṣūcyā cātmaghātakāḥ

जो गले में फंदा लगाकर, अथवा दुर्बल होकर, मुख पर आघात से मरे, जो विष, अग्नि, बैल अथवा ब्राह्मण से मरे, हैजे से मरे, अथवा आत्महत्या करने वाले —

श्लोक 106 (garuda.2.4.106)

पतनोद्बन्धनजलैर्मृतानां शृणु संस्थितिम् । सर्पव्याघ्रैः शृङ्गिभिश्च उपसर्गोपलोदकैः

patanodbandhanajalairmṛtānāṁ śṛṇu saṁsthitim | sarpavyāghraiḥ śṛṁgibhiśca upasargopalodakaiḥ

गिरकर, फाँसी लगाकर, अथवा जल में डूबकर मरने वालों की स्थिति सुनो — सर्प, बाघ अथवा सींगवाले पशुओं से, महामारी अथवा जल से,

श्लोक 107 (garuda.2.4.107)

ब्राह्मणैः श्वापदैश्चैव पतनैर्वृक्षवैद्युतैः । नखैर्लोहैर्गिरेः पातैर्भित्तिपातैर्भृगोस्तथा

brāhmaṇaiḥ śvāpadaiścaiva patanairvṛkṣavaidyutaiḥ | nakhairlohairgireḥ pātairbhittipātairbhṛgostathā

ब्राह्मण के शाप से, हिंसक पशुओं से, गिरने से, वृक्ष से, बिजली से, नाखूनों से, लोहे से, पर्वत से गिरकर, दीवार गिरने से, अथवा चट्टान से गिरकर,

श्लोक 108 (garuda.2.4.108)

कट्वायामन्तरिक्षे च चौरचाण्डालतस्तथा । उदक्याशुनकीशूद्ररजकादिविभूषिताः

kaṭvāyāmantarikṣe ca cauracāṇḍālatastathā | udakyāśunakīśūdrarajakādivibhūṣitāḥ

कड़वे [विष] से, आकाश में (उड़ते हुए) से, चोर या चाण्डाल के हाथों — रजस्वला, कुतिया, शूद्र, धोबी आदि से स्पर्शित होकर,

श्लोक 109 (garuda.2.4.109)

ऊर्ध्वोचछिष्टाधरोच्छिष्टोभयोच्छिष्टास्तु ये मृताः । शस्त्रघातैर्मृता ये चास्यश्वस्पृष्टास्तथैव च

ūrdhvocachiṣṭādharocchiṣṭobhayocchiṣṭāstu ye mṛtāḥ | śastraghātairmṛtā ye cāsyaśvaspṛṣṭāstathaiva ca

जो जूठे मुख से, जूठे नीचे भाग से अथवा दोनों ओर से जूठे होकर मरे, जो शस्त्र-आघात से मरे और घोड़े या गधे के स्पर्श से मरे,

श्लोक 110 (garuda.2.4.110)

तत्तु दुर्मरणं ज्ञेयं यच्च जातं विधैं विना । तेन पापेन नरकान् भुक्त्वा प्रेतत्वभागिनः

tattu durmaraṇaṁ jñeyaṁ yacca jātaṁ vidhaiṁ vinā | tena pāpena narakān bhuktvā pretatvabhāginaḥ

यह सब दुर्मृत्यु जानी जानी चाहिए, जो विधि से रहित होकर हुई हो। ऐसे पाप के कारण नरक भोगकर वे प्रेत-भाव को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 111 (garuda.2.4.111)

न तेषां कारयेद्दाहं सूतकं नोदकक्रियाम् । न विधानं मृताद्यञ्च न कुर्या दौर्ध्वदैहिकम्

na teṣāṁ kārayeddāhaṁ sūtakaṁ nodakakriyām | na vidhānaṁ mṛtādyañca na kuryā daurdhvadaihikam

उनका दाह नहीं करना चाहिए, न सूतक मानना चाहिए, न जलक्रिया करनी चाहिए; न कोई अन्य विधि, न ऊर्ध्वदैहिक संस्कार करना चाहिए।

श्लोक 112 (garuda.2.4.112)

न पिण्डदानं कर्तव्यं प्रमादाच्चेत्करोति हि । नोपतिष्ठति तत्सर्वमन्तरिक्षे विनश्यति

na piṇḍadānaṁ kartavyaṁ pramādāccetkaroti hi | nopatiṣṭhati tatsarvamantarikṣe vinaśyati

पिण्डदान भी नहीं करना चाहिए; यदि प्रमादवश कोई कर भी दे, तो वह सब कुछ [उस मृतक तक] नहीं पहुँचता, बल्कि आकाश में ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 113 (garuda.2.4.113)

अतस्तस्य सुतैः पौत्त्रैः सपिण्डैः शुभमिच्छुभिः । नारायणबलिः कार्यो लोकगर्हाभिया खग

atastasya sutaiḥ pauttraiḥ sapiṇḍaiḥ śubhamicchubhiḥ | nārāyaṇabaliḥ kāryo lokagarhābhiyā khaga

इसलिए हे खग! उसके पुत्र, पौत्र और सपिण्ड कल्याण की इच्छा से, लोक-निन्दा के भय से, नारायण-बलि करवाएँ।

श्लोक 114 (garuda.2.4.114)

तथा तेषां भवेच्छौचं नान्यथेत्यब्रवीद्यमः । कृते नारायणबलावौर्ध्वदेहिकयोग्यता

tathā teṣāṁ bhavecchaucaṁ nānyathetyabravīdyamaḥ | kṛte nārāyaṇabalāvaurdhvadehikayogyatā

यम ने ऐसा कहा है कि तभी उनकी शुद्धि होती है, अन्यथा नहीं। नारायण-बलि के किए जाने पर ही ऊर्ध्वदैहिक संस्कार की योग्यता प्राप्त होती है।

श्लोक 115 (garuda.2.4.115)

तस्य सुद्धिकरं कर्म तद्भवेन्न तदन्यथा । नारायणबलिं सम्यक्तीर्थे सर्वं प्रक्पयेत्

tasya suddhikaraṁ karma tadbhavenna tadanyathā | nārāyaṇabaliṁ samyaktīrthe sarvaṁ prakpayet

यही उसकी शुद्धि करने वाला कर्म है, अन्यथा नहीं। नारायण-बलि को किसी तीर्थ पर, भलीभाँति विधिपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 116 (garuda.2.4.116)

कृष्णाग्रे कारयेद्बिप्रैर्येन पूतो भवेन्नरः । पूर्वन्तु तर्पणं कार्यं विप्रैः पौराणवैदिकैः

kṛṣṇāgre kārayedbiprairyena pūto bhavennaraḥ | pūrvantu tarpaṇaṁ kāryaṁ vipraiḥ paurāṇavaidikaiḥ

कृष्ण-मूर्ति के समक्ष ब्राह्मणों द्वारा इसे कराना चाहिए, जिससे वह मनुष्य पवित्र हो जाए। सबसे पहले पौराणिक और वैदिक ब्राह्मणों द्वारा तर्पण कराना चाहिए।

श्लोक 117 (garuda.2.4.117)

सर्वौषध्यक्षतैर्मिश्रैर्विष्णुमुद्दिश्य तर्पयेत् । कार्यं पुरुषसूक्तेन मन्त्रैर्वा वैष्णवैरपि

sarvauṣadhyakṣatairmiśrairviṣṇumuddiśya tarpayet | kāryaṁ puruṣasūktena mantrairvā vaiṣṇavairapi

समस्त औषधियों और अक्षतों से मिश्रित [जल से] विष्णु का उद्देश्य करके तर्पण करना चाहिए, पुरुषसूक्त अथवा वैष्णव मंत्रों से यह करना चाहिए।

श्लोक 118 (garuda.2.4.118)

दक्षिणाभिमुखो भूत्वा प्रेतं विष्णुमिति स्मरन् । अनादिनिधनो देवः शङ्खचक्रगदाधरः

dakṣiṇābhimukho bhūtvā pretaṁ viṣṇumiti smaran | anādinidhano devaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

दक्षिणाभिमुख होकर, प्रेत को विष्णु-स्वरूप स्मरण करते हुए [कहना चाहिए] — 'अनादि-निधन देव, शंख-चक्र-गदाधारी,

श्लोक 119 (garuda.2.4.119)

अक्षयः पुण्डरीकाक्षः प्रेतमोक्षप्रदो भव । तर्पणस्यावसाने स्याद्वीतरागो विमत्सरः

akṣayaḥ puṇḍarīkākṣaḥ pretamokṣaprado bhava | tarpaṇasyāvasāne syādvītarāgo vimatsaraḥ

अक्षय, पुण्डरीकाक्ष — तुम प्रेत को मोक्ष प्रदान करो।' तर्पण की समाप्ति पर [कर्ता] राग-रहित और मत्सर-रहित होकर,

श्लोक 120 (garuda.2.4.120)

जितेन्द्रियमना भूत्वा शुचिष्मान्धर्मतत्परः । भक्त्या तत्र प्रकुर्वीत श्राद्धान्येकादशैव तु

jitendriyamanā bhūtvā śuciṣmāndharmatatparaḥ | bhaktyā tatra prakurvīta śrāddhānyekādaśaiva tu

इन्द्रियों को जीतकर, शुद्ध और धर्मपरायण होकर, भक्तिपूर्वक वहाँ ग्यारह श्राद्ध करने चाहिए।

श्लोक 121 (garuda.2.4.121)

सर्वकर्मविधाने एकैकाग्रे समाहितः । तोयव्रीहियवान्दद्याद्गोधूमांश्च प्रियङ्गवः

sarvakarmavidhāne ekaikāgre samāhitaḥ | toyavrīhiyavāndadyādgodhūmāṁśca priyaṁgavaḥ

समस्त कर्मों की विधि में एकाग्रचित्त होकर, जल, धान, जौ, गेहूँ और प्रियंगु (कँगनी) अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 122 (garuda.2.4.122)

हविष्यान्नं शुभं मुद्रां छत्रोष्णीषे च दापयेत् । दापयेत्सर्वसंस्यानि क्षीरं क्षौद्रसमान्वितम्

haviṣyānnaṁ śubhaṁ mudrāṁ chatroṣṇīṣe ca dāpayet | dāpayetsarvasaṁsyāni kṣīraṁ kṣaudrasamānvitam

हविष्य अन्न, शुभ मूँग, छाता और पगड़ी अर्पित करनी चाहिए। दूध और शहद सहित सारी सामग्री अर्पित करनी चाहिए।

श्लोक 123 (garuda.2.4.123)

वस्त्रोपानहसंयुक्तं दद्यादष्टविधं पदम् । द्पयेत्सर्वपापेभ्यो न कुर्यात्पङ्क्तिवञ्चनम्

vastropānahasaṁyuktaṁ dadyādaṣṭavidhaṁ padam | dpayetsarvapāpebhyo na kuryātpaṁktivañcanam

वस्त्र और जूतों सहित अष्टविध पद-दान करना चाहिए। सभी पापों से मुक्त कराना चाहिए; पंक्ति में किसी को छोड़ना (धोखा देना) नहीं चाहिए।

श्लोक 124 (garuda.2.4.124)

भूमौ स्थितेषु पिण्डेषु गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् । दातव्यं सर्वंविप्रेभ्यो वेदशास्त्रविधानतः

bhūmau sthiteṣu piṇḍeṣu gandhapuṣpākṣatānvitam | dātavyaṁ sarvaṁviprebhyo vedaśāstravidhānataḥ

भूमि पर रखे हुए पिण्डों पर गंध, पुष्प और अक्षत [चढ़ाकर], वेद-शास्त्र की विधि के अनुसार सब ब्राह्मणों को देने चाहिए।

श्लोक 125 (garuda.2.4.125)

शङ्खे खड्गेऽथ वा ताम्रे तर्पणञ्च पृथक्पृथक् । ध्यानधारणसंयुक्तो जानुभ्यामवनीं गतः

śaṁkhe khaḍge'tha vā tāmre tarpaṇañca pṛthakpṛthak | dhyānadhāraṇasaṁyukto jānubhyāmavanīṁ gataḥ

शंख में, तलवार पर, अथवा ताँबे के [पात्र में], प्रत्येक के लिए अलग-अलग तर्पण करना चाहिए। ध्यान और धारणा में युक्त होकर, दोनों घुटनों के बल भूमि पर बैठकर,

श्लोक 126 (garuda.2.4.126)

ऋचा वै दापयेदर्घमर्घोद्दिष्टं पृथक्पृथक् । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च यमः प्रेतश्च पञ्चमः

ṛcā vai dāpayedarghamarghoddiṣṭaṁ pṛthakpṛthak | brahmā viṣṇuśca rudraśca yamaḥ pretaśca pañcamaḥ

ऋचा से अर्घ्य देना चाहिए, प्रत्येक के लिए अलग-अलग निर्दिष्ट अर्घ्य। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और पाँचवाँ प्रेत —

श्लोक 127 (garuda.2.4.127)

पृथक्कुम्भे ततः स्थाप्याः पञ्चरत्नसमन्विताः । वस्त्रयज्ञोपवीतानि पृथङ्मुद्गाः पदानि च

pṛthakkumbhe tataḥ sthāpyāḥ pañcaratnasamanvitāḥ | vastrayajñopavītāni pṛthaṁmudgāḥ padāni ca

इनके लिए अलग-अलग घड़ों में पाँच रत्न सहित [जल] स्थापित करना चाहिए। वस्त्र, यज्ञोपवीत, अलग-अलग मुद्राएँ और पद-दान भी,

श्लोक 128 (garuda.2.4.128)

पञ्च श्राद्धानि कुर्वीत देवतानां यथाविधि । जलधारां ततः कुर्यात्पिण्डेपिण्डे पृथक्पृथक्

pañca śrāddhāni kurvīta devatānāṁ yathāvidhi | jaladhārāṁ tataḥ kuryātpiṇḍepiṇḍe pṛthakpṛthak

देवताओं के लिए विधिपूर्वक पाँच श्राद्ध करने चाहिए। फिर प्रत्येक पिण्ड पर अलग-अलग जलधारा अर्पित करनी चाहिए,

श्लोक 129 (garuda.2.4.129)

शङ्खे वा ताम्रपात्रे वा अलाभे मृन्मये पि वा । तिलोदकं समादाय सर्वोषधिमसन्वितम्

śaṁkhe vā tāmrapātre vā alābhe mṛnmaye pi vā | tilodakaṁ samādāya sarvoṣadhimasanvitam

शंख में, ताँबे के पात्र में, अथवा उनके अभाव में मिट्टी के पात्र में भी। तिल-मिश्रित जल लेकर, समस्त औषधियों से युक्त,

श्लोक 130 (garuda.2.4.130)

ताम्रपात्रं तिलैः पूर्णं सहिरण्यं सदक्षिणम् । दद्याद्ब्राह्मणमुख्याय पददानं तथैच

tāmrapātraṁ tilaiḥ pūrṇaṁ sahiraṇyaṁ sadakṣiṇam | dadyādbrāhmaṇamukhyāya padadānaṁ tathaica

तिल से भरा ताँबे का पात्र, सुवर्ण और दक्षिणा सहित, श्रेष्ठ ब्राह्मण को देना चाहिए, और वैसे ही पद-दान भी करना चाहिए।

श्लोक 131 (garuda.2.4.131)

यमोद्देशेतिलांल्लौहं ततो दद्याच्च दक्षिणाम् । एवं विष्णुबलिं दत्त्वा यथाशक्त्या विधानतः

yamoddeśetilāṁllauhaṁ tato dadyācca dakṣiṇām | evaṁ viṣṇubaliṁ dattvā yathāśaktyā vidhānataḥ

यम के उद्देश्य से तिल और लोहा देकर फिर दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार यथाशक्ति विधिपूर्वक विष्णु-बलि देकर,

श्लोक 132 (garuda.2.4.132)

समुद्धरति तत्क्षिप्रं नात्र कार्या विचारण नागदंशान्मृतो यस्तु विशेषस्तन्तु मे शृणु

samuddharati tatkṣipraṁ nātra kāryā vicāraṇa nāgadaṁśānmṛto yastu viśeṣastantu me śṛṇu

वह [मृतक] तुरंत [अपनी दुर्गति से] उद्धार पा लेता है, इसमें विचार नहीं करना चाहिए। अब जो सर्पदंश से मरा हो, उसका विशेष विधान सुनो।

श्लोक 133 (garuda.2.4.133)

सुवर्णभारनिष्पन्नं नागं कृत्वा तथैव गाम् । विप्राय दत्त्वा विधिवत्पितुरानृण्यमाप्नुयात्

suvarṇabhāraniṣpannaṁ nāgaṁ kṛtvā tathaiva gām | viprāya dattvā vidhivatpiturānṛṇyamāpnuyāt

सुवर्ण के भार के बराबर बना हुआ नाग, और वैसे ही एक गौ, विधिपूर्वक ब्राह्मण को देकर वह पिता के ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 134 (garuda.2.4.134)

एवं सर्पबलिं दत्त्वा सर्पदोषाद्विमुच्यते । पश्चात्पुत्तलकं कार्यं सर्वोषधिसमन्वितम्

evaṁ sarpabaliṁ dattvā sarpadoṣādvimucyate | paścātputtalakaṁ kāryaṁ sarvoṣadhisamanvitam

इस प्रकार सर्प-बलि देकर वह सर्प के दोष से मुक्त हो जाता है। इसके बाद समस्त औषधियों से युक्त एक पुतला (प्रतिमा) बनाना चाहिए।

श्लोक 135 (garuda.2.4.135)

पलाशस्य च वृन्तानां विभागं शृणु काश्यप । कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशैश्च पुरुषाकृतिम्

palāśasya ca vṛntānāṁ vibhāgaṁ śṛṇu kāśyapa | kṛṣṇājinaṁ samāstīrya kuśaiśca puruṣākṛtim

हे काश्यप! पलाश के डंठलों के विभाजन को सुनो। काले मृगचर्म को बिछाकर, कुश से एक मानव आकृति बनानी चाहिए।

श्लोक 136 (garuda.2.4.136)

शतत्रयेण षष्ट्या च वृन्तैः प्रोक्तोऽस्थिसञ्चयः । विन्यस्य तानि वृन्तानि अङ्गेष्वेषु पृथक्पृथक्

śatatrayeṇa ṣaṣṭyā ca vṛntaiḥ prokto'sthisañcayaḥ | vinyasya tāni vṛntāni aṁgeṣveṣu pṛthakpṛthak

तीन सौ साठ डंठलों से अस्थि-संचयन कहा गया है; उन डंठलों को अलग-अलग अंगों में रखते हुए,

श्लोक 137 (garuda.2.4.137)

चत्वारिंशच्छिरोभागे ग्रीवायां दश विन्यसेत् । विंशत्युरः स्थले दद्याद्विंशतिञ्जठरे तथा

catvāriṁśacchirobhāge grīvāyāṁ daśa vinyaset | viṁśatyuraḥ sthale dadyādviṁśatiñjaṭhare tathā

सिर के भाग में चालीस, गर्दन में दस रखने चाहिए; वक्षस्थल में बीस देने चाहिए, और वैसे ही उदर में बीस।

श्लोक 138 (garuda.2.4.138)

बाहुद्वये शतं दद्यात्कटिदेशे च विंशतिम् । ऊरुद्वये शतञ्चापि त्रिंशज्जङ्घाद्वये न्यसेत्

bāhudvaye śataṁ dadyātkaṭideśe ca viṁśatim | ūrudvaye śatañcāpi triṁśajjaṁghādvaye nyaset

दोनों भुजाओं में सौ देने चाहिए, और कमर के प्रदेश में बीस; दोनों जाँघों में भी सौ, और दोनों पिंडलियों में तीस रखने चाहिए।

श्लोक 139 (garuda.2.4.139)

दद्याच्चतुष्टयं शिश्ने षड्दद्याद्वृषाणद्वये । दश पादाङ्गुलीभागे एवमस्थीनि विन्यसेत्

dadyāccatuṣṭayaṁ śiśne ṣaḍdadyādvṛṣāṇadvaye | daśa pādāṁgulībhāge evamasthīni vinyaset

शिश्न में चार देने चाहिए, दोनों वृषणों में छह देने चाहिए; पैर की अँगुलियों के भाग में दस — इस प्रकार अस्थियाँ रखनी चाहिए।

श्लोक 140 (garuda.2.4.140)

नारिकेलं शिरः स्थानें तुम्बं दद्याच्च तालुके । पञ्चरत्नं मुखे दद्याज्जिह्वायां कदलीफलम्

nārikelaṁ śiraḥ sthāneṁ tumbaṁ dadyācca tāluke | pañcaratnaṁ mukhe dadyājjihvāyāṁ kadalīphalam

सिर के स्थान पर नारियल, तालु में तूँबा देना चाहिए; मुख में पाँच रत्न, जिह्वा पर केले का फल देना चाहिए।

श्लोक 141 (garuda.2.4.141)

अन्त्रेषु नालिकं तद्याद्वालुकाङ्घ्राणे एव च । वसायां मृत्तिकां दद्याद्धरितालमनः शिलाः

antreṣu nālikaṁ tadyādvālukāṁghrāṇe eva ca | vasāyāṁ mṛttikāṁ dadyāddharitālamanaḥ śilāḥ

आँतों में नरकुल (नलिका) देनी चाहिए, नासिका में बालू; वसा (चर्बी) के स्थान पर मिट्टी, तथा हरताल और मैनसिल देनी चाहिए।

श्लोक 142 (garuda.2.4.142)

पारदं रेतसः स्थाने पुरीषे पित्तलं तथा । मनः शिला तथा गात्रे तिलपक्वन्तु सन्धिषु

pāradaṁ retasaḥ sthāne purīṣe pittalaṁ tathā | manaḥ śilā tathā gātre tilapakvantu sandhiṣu

पारद वीर्य के स्थान पर, पीतल पित्त के स्थान पर; मैनसिल शरीर पर, तथा तिल का लेप जोड़ों पर देना चाहिए।

श्लोक 143 (garuda.2.4.143)

यवपिष्टं यथा मांसे मधु शोणितमेव च । केशेषु च जटाजूटं त्वचायाञ्च मृगत्वचम्

yavapiṣṭaṁ yathā māṁse madhu śoṇitameva ca | keśeṣu ca jaṭājūṭaṁ tvacāyāñca mṛgatvacam

जौ का आटा मांस के स्थान पर, शहद रक्त के स्थान पर; बालों के स्थान पर जटा का गुच्छा, त्वचा के स्थान पर मृगचर्म।

श्लोक 144 (garuda.2.4.144)

कर्णयोस्तालपत्रञ्च स्तनयोश्चैव गुञ्जिकाः । नासायां शतपत्रञ्च कमलं नाभिमण्डले

karṇayostālapatrañca stanayoścaiva guñjikāḥ | nāsāyāṁ śatapatrañca kamalaṁ nābhimaṇḍale

दोनों कानों में ताड़-पत्र, दोनों स्तनों में गुंजा-फल; नासिका में सौ पंखुड़ियों वाला [फूल], नाभि-मण्डल में कमल।

श्लोक 145 (garuda.2.4.145)

वृन्ताकं वृषणद्वन्द्वे लिङ्गे स्याद्गृञ्जनं शुभम् । घृतं नाभ्यां प्रदेयं स्यात्कौ पीने च त्रपुस्मृतम्

vṛntākaṁ vṛṣaṇadvandve liṁge syādgṛñjanaṁ śubham | ghṛtaṁ nābhyāṁ pradeyaṁ syātkau pīne ca trapusmṛtam

दोनों वृषणों के स्थान पर बैंगन, लिंग के स्थान पर शुभ मूली रखनी चाहिए। नाभि पर घी लगाना चाहिए, और दोनों गोलाकार भागों में राँगा (एक धातु) रखा जाना चाहिए।

श्लोक 146 (garuda.2.4.146)

मौक्तिकं स्तनयोर्मूर्ध्नि कुङ्कुमेव विलेपनम् । कर्पूरागुरुधूपैश्च शुभैर्माल्यैः सुगन्धिभिः

mauktikaṁ stanayormūrdhni kuṁkumeva vilepanam | karpūrāgurudhūpaiśca śubhairmālyaiḥ sugandhibhiḥ

दोनों स्तनों पर मोती, सिर पर कुंकुम का लेप; कपूर, अगर की धूप, और सुगंधित शुभ मालाएँ [अर्पित करनी चाहिए]।

श्लोक 147 (garuda.2.4.147)

परिधानं पट्टसूत्रंहृदये चैव विन्यसेत् । ऋद्धिवृद्धी भुजौ द्वौ च चक्षुर्भ्याञ्च कपर्दकम्

paridhānaṁ paṭṭasūtraṁhṛdaye caiva vinyaset | ṛddhivṛddhī bhujau dvau ca cakṣurbhyāñca kapardakam

वस्त्र और रेशमी डोरी हृदय पर रखनी चाहिए; समृद्धि और वृद्धि के प्रतीक दोनों भुजाओं पर, और दोनों नेत्रों के स्थान पर कौड़ी।

श्लोक 148 (garuda.2.4.148)

दन्तेषु दाडिमीबीजान्यङ्गुलीषु च चम्पकम् । सिन्दूरं नेत्रकोणे च ताम्बूलाद्युपहारकम्

danteṣu dāḍimībījānyaṁgulīṣu ca campakam | sindūraṁ netrakoṇe ca tāmbūlādyupahārakam

दाँतों में अनार के बीज, अँगुलियों में चंपा के फूल; नेत्रों के कोनों में सिंदूर, और पान आदि की भेंट [अर्पित करनी चाहिए]।

श्लोक 149 (garuda.2.4.149)

सर्वौषदियुतं प्रेतं कृत्वा पूजां यथोदिताम् । साग्निके चापि विधिना यज्ञपात्रं न्यस्येत्क्रमात्

sarvauṣadiyutaṁ pretaṁ kṛtvā pūjāṁ yathoditām | sāgnike cāpi vidhinā yajñapātraṁ nyasyetkramāt

इस प्रकार समस्त औषधियों से युक्त प्रेत [की प्रतिमा] बनाकर, विधिवत पूजा करके, अग्निहोत्री विधि से यज्ञपात्र क्रमशः रखना चाहिए।

श्लोक 150 (garuda.2.4.150)

स्त्रियः पुनन्तु म शिर इमं मे वरुणेन च । प्रेतस्य पावनं कृत्वा शालग्रामशिलोदकैः

striyaḥ punantu ma śira imaṁ me varuṇena ca | pretasya pāvanaṁ kṛtvā śālagrāmaśilodakaiḥ

'स्त्रियाँ इस मेरे शिर को पवित्र करें, और वरुण भी' — इस प्रकार शालग्राम-शिला के जल से प्रेत को पवित्र करके,

श्लोक 151 (garuda.2.4.151)

विष्णुमुद्दिश्य दातव्या सुशीला गौः पयस्विनी । तिला लौहं हिरण्यञ्च कर्पासं लवणं तथा

viṣṇumuddiśya dātavyā suśīlā gauḥ payasvinī | tilā lauhaṁ hiraṇyañca karpāsaṁ lavaṇaṁ tathā

विष्णु के उद्देश्य से एक सुशील, दुधारू गौ देनी चाहिए। तिल, लोहा, सुवर्ण, कपास, नमक,

श्लोक 152 (garuda.2.4.152)

सप्तधान्यं क्षितिर्गाव एकैकं पावनं स्मृतम् । तिलपात्रं ततो दद्यात्पददानं तथैव च

saptadhānyaṁ kṣitirgāva ekaikaṁ pāvanaṁ smṛtam | tilapātraṁ tato dadyātpadadānaṁ tathaiva ca

सात प्रकार के धान्य, भूमि और गौ — इनमें से प्रत्येक पावन कहा गया है। फिर तिल का पात्र देना चाहिए, और वैसे ही पद-दान भी करना चाहिए।

श्लोक 153 (garuda.2.4.153)

कर्तव्यं वैष्णवं श्राद्धं प्रेतमुक्त्यर्थमात्मनः । प्रेतमोक्षं ततः कुर्याद्धृदि विष्णुं प्रकल्प्यच

kartavyaṁ vaiṣṇavaṁ śrāddhaṁ pretamuktyarthamātmanaḥ | pretamokṣaṁ tataḥ kuryāddhṛdi viṣṇuṁ prakalpyaca

अपनी मुक्ति के लिए वैष्णव-श्राद्ध करना चाहिए। फिर हृदय में विष्णु की स्थापना करके प्रेत-मोक्ष का कर्म करना चाहिए।

श्लोक 154 (garuda.2.4.154)

एवं पुत्तलकं कृत्वा दाहयेद्विधिपूर्वकम् । तच्छ्रुद्धये तु संस्कर्ता पुत्रादिर्निष्कृतिं चरेत्

evaṁ puttalakaṁ kṛtvā dāhayedvidhipūrvakam | tacchruddhaye tu saṁskartā putrādirniṣkṛtiṁ caret

इस प्रकार पुतला बनाकर विधिपूर्वक उसका दाह करना चाहिए। इस श्राद्ध के लिए संस्कार करने वाला पुत्र आदि प्रायश्चित्त का आचरण करे,

श्लोक 155 (garuda.2.4.155)

त्रीन्कृच्छ्रान्षड्द्वादश च तथा पञ्चदशापि च । प्रायश्चित्तनिमित्तानुसारेण विप्रवत्स्मृतः

trīnkṛcchrānṣaḍdvādaśa ca tathā pañcadaśāpi ca | prāyaścittanimittānusāreṇa vipravatsmṛtaḥ

तीन, छह, बारह अथवा पंद्रह कृच्छ्र-व्रत — प्रायश्चित्त के निमित्त के अनुसार, ब्राह्मणों के लिए यह विधान कहा गया है।

श्लोक 156 (garuda.2.4.156)

अशक्तौ गोहिरण्यादि प्रत्याम्नायं चरेदपि । आत्मनोऽनधिकारित्वे शुद्धिमेवं चरेद्वुन्धः

aśaktau gohiraṇyādi pratyāmnāyaṁ caredapi | ātmano'nadhikāritve śuddhimevaṁ caredvundhaḥ

समर्थ न होने पर गौ, सुवर्ण आदि से विकल्प का आचरण करना चाहिए। अपने अनधिकार होने पर बुद्धिमान इसी प्रकार शुद्धि का आचरण करे।

श्लोक 157 (garuda.2.4.157)

अशुद्धेन तु यद्दत्तमुद्दिश्याशुद्धिमेव च । नोपतिष्ठति तत्सर्वमन्तरिक्षे विनश्यति

aśuddhena tu yaddattamuddiśyāśuddhimeva ca | nopatiṣṭhati tatsarvamantarikṣe vinaśyati

अशुद्ध व्यक्ति द्वारा अशुद्धि की स्थिति में दिया गया दान [मृतक तक] नहीं पहुँचता; वह सब आकाश में ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 158 (garuda.2.4.158)

शुद्धिं सम्पाद्य कर्तव्यं दहनाद्यौर्ध्वदेहिकम् । अकृत्वा निष्कृतिं यस्तु कुरुते दहनादिकम्

śuddhiṁ sampādya kartavyaṁ dahanādyaurdhvadehikam | akṛtvā niṣkṛtiṁ yastu kurute dahanādikam

शुद्धि प्राप्त करके ही दाह आदि ऊर्ध्वदैहिक संस्कार करना चाहिए। जो बिना प्रायश्चित्त किए दाह आदि करता है,

श्लोक 159 (garuda.2.4.159)

मतिपूर्वममत्या च क्रमात्तनिष्कृतिं शृणु । कृत्वाग्निमुदकं स्नानं स्पर्शनं वहनं कथाम्

matipūrvamamatyā ca kramāttaniṣkṛtiṁ śṛṇu | kṛtvāgnimudakaṁ snānaṁ sparśanaṁ vahanaṁ kathām

चाहे जानबूझकर या अनजाने में — अब उस [दोष के] प्रायश्चित्त को क्रमशः सुनो। अग्नि, जल, स्नान,

श्लोक 160 (garuda.2.4.160)

रज्जुच्छेदाश्रुपातञ्च तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति । एषामन्यतमं प्रेतं यो वहेत्तु देहत वा

rajjucchedāśrupātañca taptakṛcchreṇa śudhyati | eṣāmanyatamaṁ pretaṁ yo vahettu dehata vā

स्पर्श, वहन (ढोना), कथा-श्रवण, रस्सी काटना, और आँसू बहाना — इनमें से किसी एक कार्य से जो प्रेत को छूता या ढोता है, अथवा उससे संपर्क करता है,

श्लोक 161 (garuda.2.4.161)

कटोदकक्रियां कृत्वा कृच्छ्र सान्तपनं चरेत् । निमित्ते लघुनि स्वल्पं महन्महति कल्पयेत्

kaṭodakakriyāṁ kṛtvā kṛcchra sāntapanaṁ caret | nimitte laghuni svalpaṁ mahanmahati kalpayet

वह तप्तकृच्छ्र व्रत से शुद्ध होता है। कट-जल-क्रिया करके सान्तपन-व्रत का आचरण करना चाहिए; छोटे निमित्त के लिए छोटा, बड़े के लिए बड़ा [व्रत] निर्धारित करना चाहिए।

श्लोक 162 (garuda.2.4.162)

गरुड उवाच । कृच्छ्रस्य तप्तकृच्छ्रस्य तथा सान्तपनस्य च । लक्षणं ब्रूहि मे स्वामिंस्त्रयाणामपि सुव्रत

garuḍa uvāca | kṛcchrasya taptakṛcchrasya tathā sāntapanasya ca | lakṣaṇaṁ brūhi me svāmiṁstrayāṇāmapi suvrata

गरुड़ ने कहा — हे स्वामिन्! हे सुव्रत! मुझे कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र और सान्तपन — इन तीनों का लक्षण बताइए।

श्लोक 163 (garuda.2.4.163)

श्रीकृष्ण उवाच । त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् । उपवासस्त्र्यहञ्चैव एष कृच्छ्र उदाहृतः

śrīkṛṣṇa uvāca | tryahaṁ prātastryahaṁ sāyaṁ tryahamadyādayācitam | upavāsastryahañcaiva eṣa kṛcchra udāhṛtaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल, तीन दिन बिना माँगे जो मिले वही खाना, और तीन दिन उपवास — यह कृच्छ्र-व्रत कहा गया है।

श्लोक 164 (garuda.2.4.164)

तप्तक्षीरघृताम्बूनामेकैकं प्रत्यहं पिबेत् । एकरात्रोपवासश्च तप्तकृच्छ्र उदाहृतः

taptakṣīraghṛtāmbūnāmekaikaṁ pratyahaṁ pibet | ekarātropavāsaśca taptakṛcchra udāhṛtaḥ

तपे हुए दूध, घी और जल में से प्रत्येक को एक-एक दिन पीना चाहिए, और एक रात्रि का उपवास करना चाहिए — यह तप्तकृच्छ्र कहा गया है।

श्लोक 165 (garuda.2.4.165)

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । जग्ध्वा परेऽह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनञ्चरन्

gomūtraṁ gomayaṁ kṣīraṁ dadhi sarpiḥ kuśodakam | jagdhvā pare'hnyupavasetkṛcchraṁ sāntapanañcaran

गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुश-जल — इन्हें खाकर अगले दिन उपवास करना — यह सान्तपन-व्रत का आचरण है।

श्लोक 166 (garuda.2.4.166)

मया तेऽयं समाख्यातो दुर्मृतस्य विधिः खग । तदा मृतं विजानीयाद्दीपनिर्वाणमागतः

mayā te'yaṁ samākhyāto durmṛtasya vidhiḥ khaga | tadā mṛtaṁ vijānīyāddīpanirvāṇamāgataḥ

हे खग! मैंने तुम्हें दुर्मृत्यु का यह विधान बताया है। अब यह भी जानो कि जब [जीवन का] दीपक बुझ जाए, तभी मृत्यु मानी जाए —

श्लोक 167 (garuda.2.4.167)

अग्निदाहं ततः कुर्यात्सूतकञ्च दिनत्रयम् । दशाहं गर्तपिणाडञ्च कर्तव्यं प्रेतपूर्वकम्

agnidāhaṁ tataḥ kuryātsūtakañca dinatrayam | daśāhaṁ gartapiṇāḍañca kartavyaṁ pretapūrvakam

तभी अग्नि-दाह करना चाहिए, और तीन दिन सूतक मानना चाहिए। दस दिन तक गड्ढा और पिण्ड-दान प्रेत के लिए करना चाहिए।

श्लोक 168 (garuda.2.4.168)

एवं विधिं ततः कुर्यात्ततः प्रेतश्च मुक्तिभाक् । मृतभ्रान्त्या प्रतिकृतेः कृते दाहे स वै यदि

evaṁ vidhiṁ tataḥ kuryāttataḥ pretaśca muktibhāk | mṛtabhrāntyā pratikṛteḥ kṛte dāhe sa vai yadi

फिर यह विधि करने पर प्रेत मुक्ति को प्राप्त होता है। यदि मृत्यु के भ्रम से किसी की प्रतिकृति बनाकर दाह कर दिया गया हो, [और वह व्यक्ति वास्तव में जीवित निकले],

श्लोक 169 (garuda.2.4.169)

आयाति तेन कर्तव्यं मज्जनं घृकुण्डके । जातकर्मादिसंस्काराः कर्तव्याः पुनरेव तु

āyāti tena kartavyaṁ majjanaṁ ghṛkuṇḍake | jātakarmādisaṁskārāḥ kartavyāḥ punareva tu

तो उस [जीवित लौटे] व्यक्ति को घी के कुण्ड में स्नान करना चाहिए, और उसके जातकर्म आदि संस्कार पुनः करने चाहिए।

श्लोक 170 (garuda.2.4.170)

ऊढामेव स्वकां भार्यामुद्वहेद्विधिवत्पुमान् । वर्षे पञ्चदशे पक्षिन् द्वादशे वा गते सति

ūḍhāmeva svakāṁ bhāryāmudvahedvidhivatpumān | varṣe pañcadaśe pakṣin dvādaśe vā gate sati

हे पक्षिन्! ऐसा पुरुष अपनी पूर्व विवाहित पत्नी का ही विधिपूर्वक पुनः पाणिग्रहण करे। पंद्रह वर्ष अथवा बारह वर्ष बीत जाने पर,

श्लोक 171 (garuda.2.4.171)

अज्ञातस्य प्रोषितस्य कृत्वा प्रतिकृतिं दहेत् । रजस्वलासूतिकयोर्विशेषं मरणे शृणु

ajñātasya proṣitasya kṛtvā pratikṛtiṁ dahet | rajasvalāsūtikayorviśeṣaṁ maraṇe śṛṇu

किसी अज्ञात रूप से मृत या प्रवासी की प्रतिकृति बनाकर उसे जला देना चाहिए। अब रजस्वला और प्रसूता स्त्री की मृत्यु में विशेष विधान सुनो।

श्लोक 172 (garuda.2.4.172)

सूतिकायां मृतायान्तु एवं कुर्वन्ति याज्ञिकाः । कुम्भे सलिलमादाय पञ्चगव्यं तथैव च

sūtikāyāṁ mṛtāyāntu evaṁ kurvanti yājñikāḥ | kumbhe salilamādāya pañcagavyaṁ tathaiva ca

प्रसूता स्त्री के मरने पर याज्ञिक जन इस प्रकार करते हैं — घड़े में जल लेकर, उसमें पंचगव्य भी मिलाकर,

श्लोक 173 (garuda.2.4.173)

पुण्याभिरभिमन्त्र्यापो वाचा शुद्धिं लभेत्ततः । शतसूर्पोदकेनादौ स्नापयित्वा यथाविधि

puṇyābhirabhimantryāpo vācā śuddhiṁ labhettataḥ | śatasūrpodakenādau snāpayitvā yathāvidhi

पवित्र मंत्रों से उस जल को अभिमंत्रित करके शुद्धि प्राप्त की जाती है। पहले सौ सूपों के जल से विधिपूर्वक स्नान कराकर,

श्लोक 174 (garuda.2.4.174)

तेनैव स्नापयित्वा तु दाहं कुर्यात्स्वगेश्वर । पञ्चभिः स्नापयित्वा तु गव्यैः प्रेतां रजस्वलाम्

tenaiva snāpayitvā tu dāhaṁ kuryātsvageśvara | pañcabhiḥ snāpayitvā tu gavyaiḥ pretāṁ rajasvalām

उसी से स्नान कराकर, हे खगेश्वर! दाह करना चाहिए। रजस्वला अवस्था में मरी हुई प्रेतिका को पाँच गव्य पदार्थों से स्नान कराकर,

श्लोक 175 (garuda.2.4.175)

वस्त्रान्तराकृतिं कृत्वा दाहयेद्विधिपूर्वकम् । मृतस्य पञ्चके दाहविधिं वच्मि शृणुष्व मे

vastrāntarākṛtiṁ kṛtvā dāhayedvidhipūrvakam | mṛtasya pañcake dāhavidhiṁ vacmi śṛṇuṣva me

वस्त्र के भीतर [शरीर का] रूप बनाकर विधिपूर्वक दाह करना चाहिए। अब पंचक-योग में मरे हुए व्यक्ति का दाह-विधान बताता हूँ, सुनो।

श्लोक 176 (garuda.2.4.176)

आदौ कृत्वा धनिष्ठार्धमेतन्नक्षत्रपञ्चकम् । रेवत्यन्तं सदा दूष्यमशुभं सर्वदा भवेत्

ādau kṛtvā dhaniṣṭhārdhametannakṣatrapañcakam | revatyantaṁ sadā dūṣyamaśubhaṁ sarvadā bhavet

धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध से आरंभ करके, ये पाँच नक्षत्र, रेवती तक — यह सदा दूषित [काल] कहा जाता है, यह सदैव अशुभ रहता है।

श्लोक 177 (garuda.2.4.177)

दाहस्तत्र न कर्तव्यो विषादः सर्वजन्तुषु । न जलं दीयते तेषु अशुभं सर्वदा भवेत्

dāhastatra na kartavyo viṣādaḥ sarvajantuṣu | na jalaṁ dīyate teṣu aśubhaṁ sarvadā bhavet

उस काल में दाह नहीं करना चाहिए; यह सभी प्राणियों के लिए विषाद (संकट) है। उस समय जल नहीं देना चाहिए; यह सदैव अशुभ रहता है।

श्लोक 178 (garuda.2.4.178)

पञ्चकानन्तरं सर्वं कार्यं कर्तव्यमन्यथा । पुत्त्राणां गोत्रिणां तस्य सन्तापोऽप्युपजायते

pañcakānantaraṁ sarvaṁ kāryaṁ kartavyamanyathā | puttrāṇāṁ gotriṇāṁ tasya santāpo'pyupajāyate

पंचक के बाद ही सब कुछ करना चाहिए, अन्यथा उसके पुत्रों और सगोत्रियों को भी संताप उत्पन्न होता है,

श्लोक 179 (garuda.2.4.179)

गृहे हानिर्भवत्येव ऋक्षेष्वेषु मृतस्य च । अथ वा ऋक्षमद्ये च दाहस्तु विधिपूर्वकः

gṛhe hānirbhavatyeva ṛkṣeṣveṣu mṛtasya ca | atha vā ṛkṣamadye ca dāhastu vidhipūrvakaḥ

और घर में हानि होती ही है, यदि मृत्यु इन नक्षत्रों में हुई हो। अथवा, यदि उन्हीं नक्षत्रों के मध्य ही विधिपूर्वक दाह किया जाए,

श्लोक 180 (garuda.2.4.180)

क्रियते मानुषाणान्तु स वा आहुतिपूर्वकः । विप्रैर्विधिरतः कार्यो मन्त्रैस्तु विधिपूर्वकम्

kriyate mānuṣāṇāntu sa vā āhutipūrvakaḥ | viprairvidhirataḥ kāryo mantraistu vidhipūrvakam

जैसे यह मनुष्यों के लिए किया जाता है, तो वह आहुतिपूर्वक ही किया जाना चाहिए। इसलिए ब्राह्मणों द्वारा मंत्रों सहित विधिपूर्वक यह विधान करना चाहिए।

श्लोक 181 (garuda.2.4.181)

शवस्थानसमीपे तु क्षेप्तव्याः पुत्तलास्ततः । दर्भकॢप्तास्तु चत्वार ऋक्षमन्त्राभिमन्त्रिताः

śavasthānasamīpe tu kṣeptavyāḥ puttalāstataḥ | darbhakḷptāstu catvāra ṛkṣamantrābhimantritāḥ

शव के स्थान के निकट पुतले रखने चाहिए — कुश से बने चार पुतले, नक्षत्र-मंत्रों से अभिमंत्रित।

श्लोक 182 (garuda.2.4.182)

ततो दाहः प्रकर्तव्यस्तैश्च पुत्तलकैः सह । सूतकान्ते तदा पुत्त्रैः कार्यं शान्तिकपौष्टिकम्

tato dāhaḥ prakartavyastaiśca puttalakaiḥ saha | sūtakānte tadā puttraiḥ kāryaṁ śāntikapauṣṭikam

फिर उन पुतलों के साथ ही दाह करना चाहिए। सूतक की समाप्ति पर पुत्रों को शांतिक और पौष्टिक कर्म करने चाहिए।

श्लोक 183 (garuda.2.4.183)

पञ्चकेषु मृतो योऽसौ न सतिं लभते नरः । तिलान् गाञ्च सुवर्णञ्च तमुद्दिश्य घृतं ददेत्

pañcakeṣu mṛto yo'sau na satiṁ labhate naraḥ | tilān gāñca suvarṇañca tamuddiśya ghṛtaṁ dadet

पंचक-काल में मरा हुआ व्यक्ति सद्गति को प्राप्त नहीं करता; उसके उद्देश्य से तिल, गौ और सुवर्ण के साथ घी भी देना चाहिए।

श्लोक 184 (garuda.2.4.184)

विप्राणां दापयेद्दानं सर्वविघ्नविनाशनम् । भोजनोपानहौच्छत्त्रं हेममुद्रा च वाससी

viprāṇāṁ dāpayeddānaṁ sarvavighnavināśanam | bhojanopānahaucchattraṁ hemamudrā ca vāsasī

ब्राह्मणों को ऐसा दान दिलवाना चाहिए, जो समस्त विघ्नों का नाश करने वाला हो — भोजन, जूते, छाता, स्वर्ण-मुद्रा और दो वस्त्र भी।

श्लोक 185 (garuda.2.4.185)

दक्षिणा दीयते विप्रे पातकस्य प्रमोचनः । मयातेऽयं समाख्यातो विधिः पञ्चहरः स्थितः । संयमिन्यां यथायानं यथावर्षं मृतक्रिया

dakṣiṇā dīyate vipre pātakasya pramocanaḥ | mayāte'yaṁ samākhyāto vidhiḥ pañcaharaḥ sthitaḥ | saṁyaminyāṁ yathāyānaṁ yathāvarṣaṁ mṛtakriyā

ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है, जो पाप से मुक्ति दिलाने वाली है। मैंने तुम्हें यह पंचक-काल का विधान बता दिया है, जो संयमनी (यमपुरी) में यान के अनुसार वर्षभर की मृत्यु-क्रिया के रूप में स्थित है।

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