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उत्तरखण्ड · अध्याय 53

गुणवैषम्य: महत्तत्त्व में गुणों का अनुपात

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

श्लोक 1 (garuda.2.53.1)

श्रीकृष्ण उवाच । यथा ससर्ज भगवांस्त्रीन् गुणान्प्रकृतेस्तदा । लक्ष्मीस्त्रिरूपा संभूता श्रीर्भूर्दुर्गोति संज्ञिता

śrīkṛṣṇa uvāca yathā sasarja bhagavāṁstrīn guṇānprakṛtestadā lakṣmīstrirūpā saṁbhūtā śrīrbhūrdurgoti saṁjñitā

श्रीकृष्ण ने कहा — जब भगवान ने प्रकृति के तीन गुणों की सृष्टि की, तब लक्ष्मी भी त्रिरूपा होकर श्री, भू और दुर्गा नाम से प्रकट हुईं।

श्लोक 2 (garuda.2.53.2)

सत्त्वाभिमानिनी श्रीस्तु भूर्देवी रजमानिनी । तमोभिमानिनी दुर्गा ह्येवमाहुर्मनीषिणः

sattvābhimāninī śrīstu bhūrdevī rajamāninī tamobhimāninī durgā hyevamāhurmanīṣiṇaḥ

श्री सत्त्व-गुण की अभिमानिनी देवी हैं, भूदेवी रज-गुण की अभिमानिनी हैं, और दुर्गा तमोगुण की अभिमानिनी हैं — विद्वान लोग ऐसा कहते हैं।

श्लोक 3 (garuda.2.53.3)

अन्तरं न विजानीयाद्रूपाणां च परस्परम् । गुणानां चैव संबन्धाद्दुर्गादीनां खगेश्वर

antaraṁ na vijānīyādrūpāṇāṁ ca parasparam guṇānāṁ caiva saṁbandhāddurgādīnāṁ khageśvara

हे पक्षीश्वर, इन रूपों के परस्पर अन्तर को, तथा गुणों के सम्बन्ध से दुर्गा आदि के अन्तर को भी, कभी नहीं समझना चाहिए [अर्थात् वस्तुतः वे एक ही देवी के भेद हैं]।

श्लोक 4 (garuda.2.53.4)

अन्तरं ये विजानन्ति ते यान्त्यन्धन्तमः परम् । पुरुषस्तु त्रिरूपोभूद्विष्णुर्ब्रह्मा भवेतिसः

antaraṁ ye vijānanti te yāntyandhantamaḥ param puruṣastu trirūpobhūdviṣṇurbrahmā bhavetisaḥ

जो लोग [उनमें वास्तविक] अन्तर समझते हैं, वे घोर अन्धकार को प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पुरुष भी त्रिरूप हुए — विष्णु, ब्रह्मा और वह [रुद्र]।

श्लोक 5 (garuda.2.53.5)

सत्त्वेन लोकान्वर्धयितुं विष्णुः साक्षाद्धरिः स्वयम् । सृष्टिं कर्तुं च रजसा ब्रह्मणि प्राविशद्धरिः

sattvena lokānvardhayituṁ viṣṇuḥ sākṣāddhariḥ svayam sṛṣṭiṁ kartuṁ ca rajasā brahmaṇi prāviśaddhariḥ

लोकों की वृद्धि करने के लिए सत्त्व-गुण से साक्षात् हरि स्वयं विष्णु-रूप में रहे; और सृष्टि करने के लिए हरि रज-गुण से ब्रह्मा में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 6 (garuda.2.53.6)

आद्यो ब्रह्मा स विज्ञेयो न तु साक्षाद्धरिः स्वयम् । तमसापि समान्हन्तुं रुद्रे च प्राविशद्धरिः

ādyo brahmā sa vijñeyo na tu sākṣāddhariḥ svayam tamasāpi samānhantuṁ rudre ca prāviśaddhariḥ

उस आदि ब्रह्मा को यह जानना चाहिए कि वे स्वयं साक्षात् हरि नहीं हैं। तमोगुण से भी, संहार करने के लिए, हरि रुद्र में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 7 (garuda.2.53.7)

रुद्रे स्थितो रुद्रसंज्ञो न रुद्रस्तु हरिः स्वयम् । विष्णुरेव हरिः साक्षात्तावुभौन हरी स्मृतौ

rudre sthito rudrasaṁjño na rudrastu hariḥ svayam viṣṇureva hariḥ sākṣāttāvubhauna harī smṛtau

रुद्र में स्थित होने के कारण उन्हें 'रुद्र' नाम मिला, किन्तु स्वयं हरि रुद्र नहीं हैं। साक्षात् हरि केवल विष्णु ही हैं; ब्रह्मा और रुद्र दोनों को 'हरि' नहीं कहा गया है।

श्लोक 8 (garuda.2.53.8)

आविष्टरूपौ विज्ञेयौ ब्रह्मरुद्राभिधायकौ । एवं ज्ञात्वा मोक्षमेति नान्यथा तु कथञ्चन

āviṣṭarūpau vijñeyau brahmarudrābhidhāyakau evaṁ jñātvā mokṣameti nānyathā tu kathañcana

ब्रह्मा और रुद्र नाम धारण करने वाले दोनों को हरि द्वारा 'आविष्ट' (प्रविष्ट) रूप ही जानना चाहिए। इस प्रकार जानकर ही मोक्ष प्राप्त होता है, अन्यथा किसी प्रकार नहीं।

श्लोक 9 (garuda.2.53.9)

विष्णुब्रह्मादिरूपाणामैक्यं जानन्ति ये द्विजाः । ते यान्ति नरकं घोरं पुनरावृत्तिवर्जितम्

viṣṇubrahmādirūpāṇāmaikyaṁ jānanti ye dvijāḥ te yānti narakaṁ ghoraṁ punarāvṛttivarjitam

जो द्विज विष्णु, ब्रह्मा आदि के रूपों में पूर्ण एकत्व मानते हैं, वे घोर नरक में जाते हैं, जहाँ से पुनरागमन नहीं होता।

श्लोक 10 (garuda.2.53.10)

गुणत्रयं प्रविष्टस्तु पुरुषो हरिरव्ययः । कार्योन्मुखं यथा भूयात्क्षोभयामास वै तथा

guṇatrayaṁ praviṣṭastu puruṣo hariravyayaḥ kāryonmukhaṁ yathā bhūyātkṣobhayāmāsa vai tathā

तीनों गुणों में प्रविष्ट होकर अविनाशी पुरुष हरि ने, कार्य [सृष्टि] के सम्मुख होने के लिए, उन्हें भलीभाँति क्षुब्ध किया।

श्लोक 11 (garuda.2.53.11)

जातक्षोभाद्भगवतो महानासीद्गुणत्रयात् । गुणत्रये विद्यमानाद्भागादेव न संशयः

jātakṣobhādbhagavato mahānāsīdguṇatrayāt guṇatraye vidyamānādbhāgādeva na saṁśayaḥ

उस क्षोभ से भगवान से उन तीन गुणों में से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ; इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह उन तीनों गुणों में विद्यमान अंश से ही हुआ।

श्लोक 12 (garuda.2.53.12)

महतो ब्रह्मवायू च जज्ञाते खाभिमानिनौ । तस्य संवत्सरात्पश्चाद्यमलौ संबभूवतुः

mahato brahmavāyū ca jajñāte khābhimāninau tasya saṁvatsarātpaścādyamalau saṁbabhūvatuḥ

महत्तत्त्व से आकाश के अभिमानी देवता ब्रह्मा और वायु उत्पन्न हुए; उसके एक वर्ष पश्चात् उन दोनों के जुड़वाँ [सन्तान] उत्पन्न हुए।

श्लोक 13 (garuda.2.53.13)

रजः प्रधानं यत्तत्वं महत्तत्तवमितीरितम् । सर्गं त्विमं विजानीयाद्गुणवैषम्यनामकम्

rajaḥ pradhānaṁ yattatvaṁ mahattattavamitīritam sargaṁ tvimaṁ vijānīyādguṇavaiṣamyanāmakam

जो तत्त्व रजःप्रधान है, वही महत्तत्त्व कहलाता है। इस सृष्टि को 'गुणवैषम्य' नामक सृष्टि जानना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.2.53.14)

गरुड उवाच । महत्तत्तवस्वरूपस्य ज्ञानार्थं देवकीसुत । त्वयोक्ता गुणवैषम्यनामिका सृष्टिरुत्तमा

garuḍa uvāca mahattattavasvarūpasya jñānārthaṁ devakīsuta tvayoktā guṇavaiṣamyanāmikā sṛṣṭiruttamā

गरुड ने कहा — हे देवकीसुत, महत्तत्त्व के स्वरूप को जानने के लिए आपने 'गुणवैषम्य' नामक इस उत्तम सृष्टि की बात कही।

श्लोक 15 (garuda.2.53.15)

गुणवैषम्यशब्दार्थं मम ब्रूहि महाप्रभो । श्रीकृष्ण उवाच । गुणवैषम्यशब्दार्थज्ञापनाय खगेश्वर

guṇavaiṣamyaśabdārthaṁ mama brūhi mahāprabho śrīkṛṣṇa uvāca guṇavaiṣamyaśabdārthajñāpanāya khageśvara

हे महाप्रभो, मुझे 'गुणवैषम्य' शब्द का अर्थ बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा — हे पक्षीश्वर, 'गुणवैषम्य' शब्द का अर्थ समझाने के लिए,

श्लोक 16 (garuda.2.53.16)

अपिक्षितं च तत्रादौ गुणसाम्यं न संशयः । सम्यग्ज्ञापयितुं तत्र खादौ तावत्स्वगेश्वर

apikṣitaṁ ca tatrādau guṇasāmyaṁ na saṁśayaḥ samyagjñāpayituṁ tatra khādau tāvatsvageśvara

उसके पहले 'गुणसाम्य' (गुणों की समता) को समझना अपेक्षित है, इसमें कोई सन्देह नहीं। हे पक्षीश्वर, उसे पहले भलीभाँति समझाने के लिए,

श्लोक 17 (garuda.2.53.17)

राशिभूतं गुणानां तु दर्शयिष्ये स्थितिं च वै । राशीभूतस्य तसमः सकाशाद्विनतासुत

rāśibhūtaṁ guṇānāṁ tu darśayiṣye sthitiṁ ca vai rāśībhūtasya tasamaḥ sakāśādvinatāsuta

हे विनतासुत, मैं गुणों की राशिभूत (संहत) स्थिति को दिखाऊँगा। राशिभूत तमोगुण की अपेक्षा से,

श्लोक 18 (garuda.2.53.18)

राशीभूतं रजो ज्ञेयन्द्विगुणं तत्तु नान्यथा । राशीभूतस्य रजसः सकाशाद्विनतासुत

rāśībhūtaṁ rajo jñeyandviguṇaṁ tattu nānyathā rāśībhūtasya rajasaḥ sakāśādvinatāsuta

राशिभूत रजोगुण को दुगुना जानना चाहिए, अन्यथा नहीं। राशिभूत रजोगुण की अपेक्षा से, हे विनतासुत,

श्लोक 19 (garuda.2.53.19)

राशीभूतं तथा सत्त्वं द्विगुणं समुदाहृतम् । मूलप्रकृतिजा ह्येते न मूला प्रकृतिः स्मृता

rāśībhūtaṁ tathā sattvaṁ dviguṇaṁ samudāhṛtam mūlaprakṛtijā hyete na mūlā prakṛtiḥ smṛtā

राशिभूत सत्त्वगुण को भी दुगुना कहा गया है। ये [रज-सत्त्व] मूल-प्रकृति से उत्पन्न हैं, मूल-प्रकृति नहीं कहलाते।

श्लोक 20 (garuda.2.53.20)

यतः प्रकृतिरूपाणां परिच्छेदो न विद्यते । अतः प्रकृतिजा ज्ञेया न मूलास्ते खगेश्वर

yataḥ prakṛtirūpāṇāṁ paricchedo na vidyate ataḥ prakṛtijā jñeyā na mūlāste khageśvara

क्योंकि प्रकृति के [मूल] रूपों का कोई परिच्छेद (सीमांकन) सम्भव नहीं है, इसलिए हे पक्षीश्वर, प्रकृति से उत्पन्न इन [गुणों] को मूल-प्रकृति नहीं जानना चाहिए।

श्लोक 21 (garuda.2.53.21)

एवं तव गुणानाञ्च परिमाणं खगेश्वर । उक्तं स्वरूपं तेषां तु तव सम्यक्खगेश्वर

evaṁ tava guṇānāñca parimāṇaṁ khageśvara uktaṁ svarūpaṁ teṣāṁ tu tava samyakkhageśvara

हे पक्षीश्वर, इस प्रकार आपके [पूछे] गुणों का परिमाण और उनका स्वरूप मैंने आपको भलीभाँति बता दिया।

श्लोक 22 (garuda.2.53.22)

तत्र राशित्रये सत्त्वं केवलं समुदाहृतम् । रजस्तमोभ्यां गरुड ह्यविमिश्रं ह्यतस्तु तत्

tatra rāśitraye sattvaṁ kevalaṁ samudāhṛtam rajastamobhyāṁ garuḍa hyavimiśraṁ hyatastu tat

उन तीन राशियों में सत्त्व को 'केवल' (शुद्ध, अमिश्रित) कहा गया है; हे गरुड, वह रज और तम से अमिश्रित है, इसलिए ऐसा कहा गया है।

श्लोक 23 (garuda.2.53.23)

केवलं सत्त्वमित्युक्तं न तु श्रेष्ठत्वतः प्रभो । सृष्टिकाले केवलं स्यात्प्रलये मिश्रितं भवेत्

kevalaṁ sattvamityuktaṁ na tu śreṣṭhatvataḥ prabho sṛṣṭikāle kevalaṁ syātpralaye miśritaṁ bhavet

हे प्रभो, इसे 'केवल सत्त्व' कहा गया है, किन्तु श्रेष्ठता के कारण नहीं। सृष्टिकाल में वह [सचमुच] अमिश्रित होता है, प्रलयकाल में वह मिश्रित हो जाता है।

श्लोक 24 (garuda.2.53.24)

सर्वदाप्यविमिश्रं च सत्त्वराशिं खगेश्वर । सर्वदापि विमिश्रं च सत्त्वराशिं द्विजोत्तम

sarvadāpyavimiśraṁ ca sattvarāśiṁ khageśvara sarvadāpi vimiśraṁ ca sattvarāśiṁ dvijottama

हे पक्षीश्वर, जो लोग यह समझते हैं कि सत्त्व-राशि सर्वदा ही अमिश्रित रहती है, अथवा हे श्रेष्ठ द्विज, जो यह समझते हैं कि वह सर्वदा ही मिश्रित रहती है —

श्लोक 25 (garuda.2.53.25)

ये विजानन्ति ते सर्वे विशन्ति ह्यधरं तमः । रजस्तमोगुणौ वीन्द्र इतराभ्यां विमिश्रितौ

ye vijānanti te sarve viśanti hyadharaṁ tamaḥ rajastamoguṇau vīndra itarābhyāṁ vimiśritau

वे सभी [सत्य को न जानने वाले] घोर अधोगति में प्रवेश करते हैं। हे पक्षिराज, रज और तम — दोनों गुण एक-दूसरे से सदा मिश्रित रहते हैं;

श्लोक 26 (garuda.2.53.26)

सृष्टौ प्रलयकालेपि मिश्रावेव खगेश्वर । राशिभूतेपि रजसि रजोभागाच्छताधिकम्

sṛṣṭau pralayakālepi miśrāveva khageśvara rāśibhūtepi rajasi rajobhāgācchatādhikam

सृष्टि और प्रलय दोनों कालों में भी वे मिश्रित ही रहते हैं, हे पक्षीश्वर। राशिभूत रजोगुण में भी, रजोगुण के भाग से एक सौ [भाग] से अधिक,

श्लोक 27 (garuda.2.53.27)

सत्त्वं च मिश्रितं ज्ञेयं नान्यथा पक्षिसत्तम । रजसः शतभागानां मध्ये तु विनतासुत

sattvaṁ ca miśritaṁ jñeyaṁ nānyathā pakṣisattama rajasaḥ śatabhāgānāṁ madhye tu vinatāsuta

सत्त्व भी उसमें मिश्रित है, ऐसा जानना चाहिए, अन्यथा नहीं, हे श्रेष्ठ पक्षी। हे विनतासुत, रजोगुण के सौ भागों में से,

श्लोक 28 (garuda.2.53.28)

य एको भाग उद्दिष्टस्तावत्परिमितं तमः । राशिभूतेपि रजसि मिश्रितं परिकीर्तितम्

ya eko bhāga uddiṣṭastāvatparimitaṁ tamaḥ rāśibhūtepi rajasi miśritaṁ parikīrtitam

जो एक भाग निर्दिष्ट है, उतने ही परिमाण का तमोगुण भी राशिभूत रजोगुण में मिश्रित हुआ कहा गया है।

श्लोक 29 (garuda.2.53.29)

रजोराशिस्थितिस्त्वेवं तात व्याप्तं तमोगुणैः । राशिभूतेपि तमसि सत्त्वं च विनतासुत

rajorāśisthitistvevaṁ tāta vyāptaṁ tamoguṇaiḥ rāśibhūtepi tamasi sattvaṁ ca vinatāsuta

हे तात, इस प्रकार रजो-राशि की स्थिति तमोगुण से व्याप्त कही गई है। राशिभूत तमोगुण में भी, हे विनतासुत, सत्त्व —

श्लोक 30 (garuda.2.53.30)

तमः सकाशाद्गरुड दशभागाधिकेन च । मिश्रितं भवतीत्येवं ज्ञातव्यं नात्र संशयः

tamaḥ sakāśādgaruḍa daśabhāgādhikena ca miśritaṁ bhavatītyevaṁ jñātavyaṁ nātra saṁśayaḥ

हे गरुड, तमोगुण की अपेक्षा से दस भाग से भी अधिक मिश्रित होता है — ऐसा जानना चाहिए, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 31 (garuda.2.53.31)

तमसो दशभागानां मध्ये तु विनतासुत । य एको भाग उद्दिष्टस्तावत्परिमितं रजः

tamaso daśabhāgānāṁ madhye tu vinatāsuta ya eko bhāga uddiṣṭastāvatparimitaṁ rajaḥ

हे विनतासुत, तमोगुण के दस भागों में से जो एक भाग निर्दिष्ट है, उतने ही परिमाण का रजोगुण भी —

श्लोक 32 (garuda.2.53.32)

राशिभूतेपि तमसि मिश्रितं भवति ध्रुवम् । तमोराशिस्थितिस्त्वेवं ज्ञातव्या पक्षिसत्तम

rāśibhūtepi tamasi miśritaṁ bhavati dhruvam tamorāśisthitistvevaṁ jñātavyā pakṣisattama

राशिभूत तमोगुण में निश्चय ही मिश्रित होता है। हे श्रेष्ठ पक्षी, तमो-राशि की यह स्थिति इस प्रकार जाननी चाहिए।

श्लोक 33 (garuda.2.53.33)

गरुड उवाच । रशिभूतेपि रजसि राशिभूते तमस्यपि । सत्त्वांशा ह्यधिकाः संतीत्येवमुक्तं मयानघ

garuḍa uvāca raśibhūtepi rajasi rāśibhūte tamasyapi sattvāṁśā hyadhikāḥ saṁtītyevamuktaṁ mayānagha

गरुड ने कहा — हे निष्पाप, आपने यह कहा कि राशिभूत रजोगुण में और राशिभूत तमोगुण में भी सत्त्व-अंश अधिक होते हैं।

श्लोक 34 (garuda.2.53.34)

तत्र मे संशयो ह्यस्ति शृणु त्वं सात्त्वतां पते । यद्राश्यां यद्रा शिभागा ह्यधिकाः संति यावता

tatra me saṁśayo hyasti śṛṇu tvaṁ sāttvatāṁ pate yadrāśyāṁ yadrā śibhāgā hyadhikāḥ saṁti yāvatā

इसमें मुझे एक सन्देह है, हे सात्त्वतों के स्वामी, सुनिए — जिस राशि में जिस राशि के भाग अधिक होते हैं,

श्लोक 35 (garuda.2.53.35)

तावता व्यवहारः स्यात्क्षीरनीरमिव प्रभो । श्रुत्वा स गरुडेनोक्तं भगवान्पुरुषोत्तमः

tāvatā vyavahāraḥ syātkṣīranīramiva prabho śrutvā sa garuḍenoktaṁ bhagavānpuruṣottamaḥ

हे प्रभो, उतने भर से उसका व्यवहार दूध और जल की भाँति हो जाएगा [अर्थात् दोनों एक ही मान लिए जाएँगे]। गरुड द्वारा कहा गया यह सुनकर, भगवान पुरुषोत्तम,

श्लोक 36 (garuda.2.53.36)

उवाच पर मप्रीत्या संस्तुवन् गरुडं हरिः । श्रीकृष्ण उवाच । रजोराश्या तमोराश्या सत्त्वराश्यधिका सदा

uvāca para maprītyā saṁstuvan garuḍaṁ hariḥ śrīkṛṣṇa uvāca rajorāśyā tamorāśyā sattvarāśyadhikā sadā

गरुड की भलीभाँति सराहना करते हुए, परम प्रीति से यह वचन कहा। श्रीकृष्ण ने कहा — रजो-राशि और तमो-राशि की अपेक्षा से सत्त्व-राशि सदा अधिक होती है,

श्लोक 37 (garuda.2.53.37)

मिश्रितं चापि पक्षीन्द्र न सत्तवमिति कीर्त्यते । रजोराशिस्तमोराशिरित्येवं विबुधा विदुः

miśritaṁ cāpi pakṣīndra na sattavamiti kīrtyate rajorāśistamorāśirityevaṁ vibudhā viduḥ

फिर भी, हे पक्षीन्द्र, [जो थोड़ा-सा] मिश्रित है, वह सत्त्व नहीं कहलाता; विद्वान लोग उसे रजो-राशि और तमो-राशि ही जानते हैं।

श्लोक 38 (garuda.2.53.38)

विषं तु चरुदुग्धस्थं विषमित्युच्यते यथा । एवं मयोक्ता गरुड गुणानां निजसंस्थितिः

viṣaṁ tu carudugdhasthaṁ viṣamityucyate yathā evaṁ mayoktā garuḍa guṇānāṁ nijasaṁsthitiḥ

जैसे खीर में मिला हुआ विष भी 'विष' ही कहलाता है, उसी प्रकार, हे गरुड, मैंने गुणों की अपनी-अपनी स्थिति बताई है।

श्लोक 39 (garuda.2.53.39)

साम्यावस्थां गुणानां च शृण्विदानीं खगेश्वर । राशीकृताच्च रजसः जन्यं यच्च कगेश्वर

sāmyāvasthāṁ guṇānāṁ ca śṛṇvidānīṁ khageśvara rāśīkṛtācca rajasaḥ janyaṁ yacca kageśvara

हे पक्षीश्वर, अब गुणों की साम्यावस्था (समता की अवस्था) सुनिए। हे पक्षीश्वर, राशिकृत रजोगुण से जो उत्पन्न होता है —

श्लोक 40 (garuda.2.53.40)

महत्तत्त्वे प्रविष्टं च यद्रजः परिकीर्तितम् । प्रलये समनुप्राप्ते महत्तत्त्वे स्थितं रजः

mahattattve praviṣṭaṁ ca yadrajaḥ parikīrtitam pralaye samanuprāpte mahattattve sthitaṁ rajaḥ

जो रजोगुण महत्तत्त्व में प्रविष्ट हुआ कहा गया है, प्रलय के प्राप्त होने पर, महत्तत्त्व में स्थित वह रजोगुण,

श्लोक 41 (garuda.2.53.41)

द्वादशांशेन तु ह्यद्धा विभक्तं भवतिं प्रभो । राशीभूते हि सत्त्वे तु दशभागेन मिश्रितम्

dvādaśāṁśena tu hyaddhā vibhaktaṁ bhavatiṁ prabho rāśībhūte hi sattve tu daśabhāgena miśritam

हे प्रभो, बारह भागों में पूर्णतः विभाजित हो जाता है। राशिभूत सत्त्व में उसके दस भाग मिश्रित होते हैं,

श्लोक 42 (garuda.2.53.42)

सम्यक्भवति पक्षीन्द्र तथैकांशेन चाण्डज । तमोराश्या मिश्रितं च भवत्येव न संशयः

samyakbhavati pakṣīndra tathaikāṁśena cāṇḍaja tamorāśyā miśritaṁ ca bhavatyeva na saṁśayaḥ

हे पक्षीन्द्र, यह भलीभाँति होता है; और हे अण्डज, उसके एक भाग से वह तमो-राशि में भी मिश्रित हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 43 (garuda.2.53.43)

अन्येनैकेन भागेन रजोराश्या खगेश्वर । मिश्रितं भवतीत्येवं ज्ञातव्यं नान्यथा क्वचित्

anyenaikena bhāgena rajorāśyā khageśvara miśritaṁ bhavatītyevaṁ jñātavyaṁ nānyathā kvacit

हे पक्षीश्वर, शेष बचे एक अन्य भाग से वह रजो-राशि में ही मिश्रित होता है — ऐसा जानना चाहिए, अन्यथा कहीं नहीं।

श्लोक 44 (garuda.2.53.44)

गुणत्रयेपि भगवान्महत्तत्त्वस्य चाण्डज । एवं लयस्तु ज्ञातव्यो हृदि तत्त्वार्थवोदिभिः

guṇatrayepi bhagavānmahattattvasya cāṇḍaja evaṁ layastu jñātavyo hṛdi tattvārthavodibhiḥ

हे अण्डज, महत्तत्त्व के तीनों गुणों में भगवान का यह प्रलय इस प्रकार जानना चाहिए — तत्त्वार्थ को जानने वालों के हृदय में।

श्लोक 45 (garuda.2.53.45)

एवं गुणत्रयाणां च मिश्रितत्त्वात्खगेश्वर । गुणसाम्यमिति प्राहुरेवं जानीहि वै खग

evaṁ guṇatrayāṇāṁ ca miśritattvātkhageśvara guṇasāmyamiti prāhurevaṁ jānīhi vai khaga

हे पक्षीश्वर, इस प्रकार तीनों गुणों के इस [विशिष्ट अनुपात में] मिश्रित होने के कारण ही इसे 'गुणसाम्य' कहा जाता है — हे पक्षी, ऐसा ही जानो।

श्लोक 46 (garuda.2.53.46)

अन्यथा ये विजानन्ति ते यान्ति ह्यधरं तमः । गरुड उवाच । राशीकृतगुणानां च त्रयाणां परमेश्वर

anyathā ye vijānanti te yānti hyadharaṁ tamaḥ garuḍa uvāca rāśīkṛtaguṇānāṁ ca trayāṇāṁ parameśvara

जो लोग इसे अन्यथा समझते हैं, वे घोर अन्धकार में जाते हैं। गरुड ने कहा — हे परमेश्वर, राशिभूत तीनों विशाल गुणों की,

श्लोक 47 (garuda.2.53.47)

विशालानां परं ब्रह्मन्प्रलये गुणसाम्यता । कथं ब्रूहि महाभाग एतत्तत्त्वं समासतः

viśālānāṁ paraṁ brahmanpralaye guṇasāmyatā kathaṁ brūhi mahābhāga etattattvaṁ samāsataḥ

प्रलय में जो गुणसाम्यता है, हे ब्रह्मन्, हे महाभाग, इस तत्त्व को संक्षेप में मुझे बताइए।

श्लोक 48 (garuda.2.53.48)

श्रीकृष्ण उवाच । राशीभूतगुणानां तु त्रयणामपि सत्तम । तदा विमिश्रितत्वेन ह्यवस्थानं विदुर्बुधाः

śrīkṛṣṇa uvāca rāśībhūtaguṇānāṁ tu trayaṇāmapi sattama tadā vimiśritatvena hyavasthānaṁ vidurbudhāḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — हे साधुश्रेष्ठ, राशिभूत तीनों गुणों की उस समय जो मिश्रित अवस्था होती है, उसी को विद्वान लोग [गुणसाम्य] जानते हैं।

श्लोक 49 (garuda.2.53.49)

इदानीं गुणवैषम्यं शृणु सम्यङ्मम प्रिय । सृष्टिकाले तु संप्राप्ते यत्पूर्वं प्रलये खग

idānīṁ guṇavaiṣamyaṁ śṛṇu samyaṅmama priya sṛṣṭikāle tu saṁprāpte yatpūrvaṁ pralaye khaga

हे प्रिय, अब गुणवैषम्य को भलीभाँति सुनिए। सृष्टिकाल के प्राप्त होने पर, हे पक्षी, पहले प्रलयकाल में जो —

श्लोक 50 (garuda.2.53.50)

दशभागैश्च सत्त्वे तु मिश्रितं यद्र जस्तथा । तमस्यप्येकभागेन प्रविष्टं यत्तु तद्रजः

daśabhāgaiśca sattve tu miśritaṁ yadra jastathā tamasyapyekabhāgena praviṣṭaṁ yattu tadrajaḥ

दस भागों से सत्त्व में मिश्रित रजोगुण था, और जो एक भाग से तमोगुण में प्रविष्ट हुआ था,

श्लोक 51 (garuda.2.53.51)

रजस्यप्येकभागेन प्रविष्टं यच्च तद्रजः । एवं द्वादशभागैश्च प्रविष्टं सर्वशो रजः

rajasyapyekabhāgena praviṣṭaṁ yacca tadrajaḥ evaṁ dvādaśabhāgaiśca praviṣṭaṁ sarvaśo rajaḥ

और जो एक भाग से रजोगुण में ही प्रविष्ट हुआ था — इस प्रकार बारह भागों से रजोगुण सर्वत्र प्रविष्ट हुआ था।

श्लोक 52 (garuda.2.53.52)

सत्त्वस्तैर्दशभागैश्च तथैकेन रजोंशिना । एवमेकादशैर्भागैस्तमस्थांशेन वै व्दिज

sattvastairdaśabhāgaiśca tathaikena rajoṁśinā evamekādaśairbhāgaistamasthāṁśena vai vdija

हे द्विज, उन दस भागों के सत्त्व के साथ, तथा उस एक रजो-अंश के साथ, इस प्रकार ग्यारह भागों के साथ, तमो-अंश के साथ भी —

श्लोक 53 (garuda.2.53.53)

मिश्रितं भवति ह्यद्धा महत्तत्त्वं तदा स्मृतम् । एतदन्यो विशेषश्च मन्तध्यो विनतासुत

miśritaṁ bhavati hyaddhā mahattattvaṁ tadā smṛtam etadanyo viśeṣaśca mantadhyo vinatāsuta

पूर्णतः मिश्रित होकर, वह तब महत्तत्त्व कहलाता है। हे विनतासुत, इस विषय में एक अन्य विशेष बात भी विचारणीय है:

श्लोक 54 (garuda.2.53.54)

एकांशस्तामसो ज्ञेयो महत्तत्त्वे न संशयः । एवं त्रयोदशैर्भागैर्मिश्रितं तच्च सत्तम

ekāṁśastāmaso jñeyo mahattattve na saṁśayaḥ evaṁ trayodaśairbhāgairmiśritaṁ tacca sattama

महत्तत्त्व में एक अंश तामस है, इसमें कोई सन्देह नहीं — इस प्रकार, हे साधुश्रेष्ठ, वह तेरह भागों से मिश्रित है।

श्लोक 55 (garuda.2.53.55)

एवमेतद्विजानीयान्नान्यथा तु कथञ्चन । गरुड उवाच । चतुर्मुखाच्छ्रुतं पूर्वं भगवन्सात्त्वतां पते

evametadvijānīyānnānyathā tu kathañcana garuḍa uvāca caturmukhācchrutaṁ pūrvaṁ bhagavansāttvatāṁ pate

इसी प्रकार इसे जानना चाहिए, अन्यथा कदापि नहीं। गरुड ने कहा — हे भगवन्, हे सात्त्वतों के स्वामी, पहले मैंने चतुर्मुख ब्रह्मा से सुना था कि,

श्लोक 56 (garuda.2.53.56)

चतुर्भागात्समुत्पन्नं महत्तत्त्वमिति प्रभो । तत्रैकांशस्तमः प्रोक्तः त्रिभागो रज एव च

caturbhāgātsamutpannaṁ mahattattvamiti prabho tatraikāṁśastamaḥ proktaḥ tribhāgo raja eva ca

हे प्रभो, महत्तत्त्व चार भागों से उत्पन्न हुआ है — उसमें एक अंश तम कहा गया, और तीन भाग रज ही।

श्लोक 57 (garuda.2.53.57)

तदाहुर्ब्रह्मणो रूपं गुणवैषम्यनामकम् । चतुर्भागात्मकं प्रोक्तं महत्तत्त्वं श्रुतं मया

tadāhurbrahmaṇo rūpaṁ guṇavaiṣamyanāmakam caturbhāgātmakaṁ proktaṁ mahattattvaṁ śrutaṁ mayā

उन्होंने उसे 'गुणवैषम्य' नामक ब्रह्मा का रूप कहा — मैंने सुना कि महत्तत्त्व चार भागों वाला बताया गया।

श्लोक 58 (garuda.2.53.58)

त्रयोदशांशैः संभूतमिति प्रोक्तं त्वयानघ । तदेतत्संशयं छिन्धि कृपालो भक्तवत्सल

trayodaśāṁśaiḥ saṁbhūtamiti proktaṁ tvayānagha tadetatsaṁśayaṁ chindhi kṛpālo bhaktavatsala

किन्तु आपने कहा कि यह तेरह अंशों से बना है, हे निष्पाप — इसलिए हे कृपालु, हे भक्तवत्सल, मेरा यह सन्देह दूर कीजिए।

श्लोक 59 (garuda.2.53.59)

श्रीकृष्ण उवाच । ब्रह्मोक्तम्य मयोक्तस्य विवादो नास्ति सर्वथा । मूलसत्त्वे मिश्रितं च दशभागेन यद्रजः

śrīkṛṣṇa uvāca brahmoktamya mayoktasya vivādo nāsti sarvathā mūlasattve miśritaṁ ca daśabhāgena yadrajaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — ब्रह्मा के कहे और मेरे कहे में कोई विवाद नहीं है। मूल सत्त्व में जो रजोगुण दस भाग से मिश्रित है,

श्लोक 60 (garuda.2.53.60)

तत्सर्वं च मिलित्वैव त्वेको भागस्तु कीर्तितः । मूले रजसि यच्चोक्तो रजोभागः खगेश्वर

tatsarvaṁ ca militvaiva tveko bhāgastu kīrtitaḥ mūle rajasi yaccokto rajobhāgaḥ khageśvara

उन सब भागों को मिलाकर ही एक भाग कहा गया है। मूल रजोगुण में जो रजो-अंश कहा गया, हे पक्षीश्वर,

श्लोक 61 (garuda.2.53.61)

भागे द्वितीये विज्ञेयस्तद्रजो नात्र संशयः । मूले तमसि यच्चोक्तो रजोभागस्तथैव च

bhāge dvitīye vijñeyastadrajo nātra saṁśayaḥ mūle tamasi yaccokto rajobhāgastathaiva ca

वही उस [गिनती के] दूसरे भाग में जाना जाना चाहिए, इसमें कोई सन्देह नहीं। मूल तमोगुण में जो रजो-अंश कहा गया, उसी प्रकार,

श्लोक 62 (garuda.2.53.62)

तृतीयभागो विज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा । तथा मूले च तमसि ह्येको भागस्तमः स्मृतः

tṛtīyabhāgo vijñeyo nātra kāryā vicāraṇā tathā mūle ca tamasi hyeko bhāgastamaḥ smṛtaḥ

उसे तीसरा भाग जानना चाहिए, इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है। और उसी प्रकार मूल तमोगुण में जो एक भाग तम कहा गया,

श्लोक 63 (garuda.2.53.63)

एवं त्रिभागो रजसः एकांशस्तमसः स्मृतः । तदाहुर्ब्रह्मणो देहं गुणवैषम्यनामकम्

evaṁ tribhāgo rajasaḥ ekāṁśastamasaḥ smṛtaḥ tadāhurbrahmaṇo dehaṁ guṇavaiṣamyanāmakam

इस प्रकार रजोगुण के तीन भाग और तमोगुण का एक अंश स्मरण किया गया — इसी को ब्रह्मा का 'गुणवैषम्य' नामक शरीर कहा गया।

श्लोक 64 (garuda.2.53.64)

गरुड उवाच । महत्तत्त्वस्य चत्वारो भागास्तेषु रजस्त्रयः । तमसस्त्वेक एवेति त्वयोक्तं गरुडध्वज

garuḍa uvāca mahattattvasya catvāro bhāgāsteṣu rajastrayaḥ tamasastveka eveti tvayoktaṁ garuḍadhvaja

गरुड ने कहा — आपने कहा कि महत्तत्त्व के चार भाग हैं, उनमें तीन रजोगुण के हैं, और एक ही तमोगुण का है, हे गरुड-ध्वज।

श्लोक 65 (garuda.2.53.65)

रजोभागात्मको देहोः ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । इति प्रतीयते ब्रह्मन्वचनात्तव माधव

rajobhāgātmako dehoḥ brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ iti pratīyate brahmanvacanāttava mādhava

हे ब्रह्मन्, हे माधव, आपके इस वचन से यह प्रतीत होता है कि परमेष्ठी ब्रह्मा का शरीर रजो-भागमय है।

श्लोक 66 (garuda.2.53.66)

शुद्धसत्त्वात्मको देहो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । एवं हि श्रूयते कृष्ण संशयो मेत्र बाधते

śuddhasattvātmako deho brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ evaṁ hi śrūyate kṛṣṇa saṁśayo metra bādhate

किन्तु हे कृष्ण, यह भी सुना जाता है कि परमेष्ठी ब्रह्मा का शरीर शुद्ध सत्त्वमय है — यह मेरा सन्देह यहाँ बाधा डालता है।

श्लोक 67 (garuda.2.53.67)

तमेवं संशयं छिन्धि यद्धि तच्छ्रोतुमर्हति । श्रीकृष्ण उवाच । त्रिभागभूते रजसि तथा द्वादशधापि च

tamevaṁ saṁśayaṁ chindhi yaddhi tacchrotumarhati śrīkṛṣṇa uvāca tribhāgabhūte rajasi tathā dvādaśadhāpi ca

यह सन्देह मेरा दूर कीजिए, क्योंकि यह सुनने योग्य है। श्रीकृष्ण ने कहा — रजोगुण के त्रिभाग [स्वरूप] में, तथा उसी प्रकार बारह भागों में भी,

श्लोक 68 (garuda.2.53.68)

रजसोपेक्षया सत्त्वं दशांशाधिकमेव च । प्रविष्टमस्तीति खग ज्ञातव्यं तच्छणु द्विज

rajasopekṣayā sattvaṁ daśāṁśādhikameva ca praviṣṭamastīti khaga jñātavyaṁ tacchaṇu dvija

रजोगुण की अपेक्षा सत्त्वगुण दस अंश अधिक ही प्रविष्ट है — हे पक्षी, यह जानना चाहिए, इसे सुनिए, हे द्विज।

श्लोक 69 (garuda.2.53.69)

तमसोपेक्षया सत्त्वं दशांशाधिकमेव वै । प्रविष्टमस्तीति खग वक्तव्यं नात्र संशयः

tamasopekṣayā sattvaṁ daśāṁśādhikameva vai praviṣṭamastīti khaga vaktavyaṁ nātra saṁśayaḥ

तमोगुण की अपेक्षा भी सत्त्वगुण दस अंश अधिक ही प्रविष्ट है — हे पक्षी, यह कहा जाना चाहिए, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 70 (garuda.2.53.70)

तमसोपेक्षया तत्र तम एकादशं स्मृतम् । एकांशस्तु रजो ज्ञेयमेवमाहुर्मनीषिणः । एवं च मिलितान्भागान्वक्ष्ये शृणु महामते

tamasopekṣayā tatra tama ekādaśaṁ smṛtam ekāṁśastu rajo jñeyamevamāhurmanīṣiṇaḥ evaṁ ca militānbhāgānvakṣye śṛṇu mahāmate

तमोगुण की अपेक्षा से वहाँ तम स्वयं ग्यारहवें [भाग के रूप में] स्मरण किया गया है, और एक अंश रजोगुण जानना चाहिए — विद्वान लोग ऐसा कहते हैं। इस प्रकार मिले हुए भागों को अब मैं बताऊँगा, हे महामते, सुनिए।

श्लोक 71 (garuda.2.53.71)

महत्तत्त्वसमुत्पत्ता उपादानं खगेश्वर । त्रयोदशांशा विज्ञेया द्वादशाशं रजः स्मृतम्

mahattattvasamutpattā upādānaṁ khageśvara trayodaśāṁśā vijñeyā dvādaśāśaṁ rajaḥ smṛtam

हे पक्षीश्वर, महत्तत्त्व की उत्पत्ति का जो उपादान-कारण है, उसे तेरह भागों वाला जानना चाहिए — बारह भाग रजोगुण कहा गया है,

श्लोक 72 (garuda.2.53.72)

एकांशस्तमसो ज्ञेयस्तत्र भागाञ्छृणु द्विजा । आदौ तु द्वादशांशेषु भागान्वक्ष्यामि तच्छृणु

ekāṁśastamaso jñeyastatra bhāgāñchṛṇu dvijā ādau tu dvādaśāṁśeṣu bhāgānvakṣyāmi tacchṛṇu

और एक अंश तमोगुण जानना चाहिए। हे द्विज, अब उन [बारह] भागों को सुनिए — पहले उन बारह भागों में जो उप-भाग हैं, उन्हें मैं बताऊँगा, सुनिए।

श्लोक 73 (garuda.2.53.73)

एकांशस्तमसो ज्ञेयस्तद्दशां शाधिकं रजः । तच्छतांशाधिकं सत्त्वमेवमाहुर्मनीषिणः

ekāṁśastamaso jñeyastaddaśāṁ śādhikaṁ rajaḥ tacchatāṁśādhikaṁ sattvamevamāhurmanīṣiṇaḥ

उसमें एक अंश तमोगुण जानना चाहिए, दस अंश से अधिक रजोगुण है, और सौ अंश से अधिक सत्त्वगुण है — विद्वान लोग ऐसा कहते हैं।

श्लोक 74 (garuda.2.53.74)

एकांशतमसि ह्येवं विभागाञ्छृणु सत्तम । एकांशस्तु रजो ज्ञेयस्तमो ह्येका दशाधिकम्

ekāṁśatamasi hyevaṁ vibhāgāñchṛṇu sattama ekāṁśastu rajo jñeyastamo hyekā daśādhikam

इस एक-अंश-तमोगुण [की उपश्रेणी] में भी विभाग सुनिए, हे साधुश्रेष्ठ — एक अंश रजोगुण जानना चाहिए, और तमोगुण ग्यारह अंशों से अधिक है।

श्लोक 75 (garuda.2.53.75)

तमोभागास्तु विज्ञेयास्तद्दशांशाधिकः स्मृतः । सत्त्वभाग इति ज्ञेयो महत्तत्त्वे खगेश्वर

tamobhāgāstu vijñeyāstaddaśāṁśādhikaḥ smṛtaḥ sattvabhāga iti jñeyo mahattattve khageśvara

तमोगुण के भाग इस प्रकार जानने चाहिए; और हे पक्षीश्वर, महत्तत्त्व में जो उससे दस अंश अधिक है, वह सत्त्वगुण का भाग जानना चाहिए।

श्लोक 76 (garuda.2.53.76)

सत्त्वांशो बहुलो यस्माच्छुद्धसत्त्वं चतुर्मुखः । उत्पत्तिर्महतश्चोक्ता एवं च विनतासुत

sattvāṁśo bahulo yasmācchuddhasattvaṁ caturmukhaḥ utpattirmahataścoktā evaṁ ca vinatāsuta

चूँकि सत्त्व-अंश ही सर्वाधिक है, इसलिए चतुर्मुख ब्रह्मा शुद्ध-सत्त्वस्वरूप हैं। हे विनतासुत, इस प्रकार महत्तत्त्व की उत्पत्ति कही गई है।

श्लोक 77 (garuda.2.53.77)

तज्ज्ञानान्मोक्षमाप्नोति नान्यथा तु कथञ्चन

tajjñānānmokṣamāpnoti nānyathā tu kathañcana

इसे जानने से ही मोक्ष प्राप्त होता है, अन्यथा किसी प्रकार भी नहीं।

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