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उत्तरखण्ड · अध्याय 54

तत्त्वाभिमानी देवताओं की उत्पत्ति और तारतम्य

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (garuda.2.54.1)

एतादृशे महत्तत्त्वे लक्ष्म्या सह हरिः स्वयम् । प्रविवेश महाभाग क्षोभयामास वै हरिः

etādṛśe mahattattve lakṣmyā saha hariḥ svayam praviveśa mahābhāga kṣobhayāmāsa vai hariḥ

हे महाभाग! ऐसे महत्तत्त्व में लक्ष्मी सहित स्वयं हरि ने प्रवेश किया, और हरि ने ही उसे क्षुब्ध किया।

श्लोक 2 (garuda.2.54.2)

अहन्तत्त्वमभूत्तस्माज्ज्ञानद्रव्यक्रियात्मकम् । अहङ्कारसमुत्पत्तावेकांशस्तमसि स्मृतः

ahantattvamabhūttasmājjñānadravyakriyātmakam ahaṅkārasamutpattāvekāṁśastamasi smṛtaḥ

उससे अहंतत्त्व (अहंकार) उत्पन्न हुआ, जो ज्ञान, द्रव्य और क्रिया के रूप में है; अहंकार की उत्पत्ति के समय उसका एक अंश तमोगुण में माना गया है।

श्लोक 3 (garuda.2.54.3)

तद्दशांशाधिकरजस्तद्दशांशाधिकं प्रभो । सत्त्वमित्युच्यते सद्भिर्ह्येतदात्मा त्वहं स्मृतम्

taddaśāṁśādhikarajastaddaśāṁśādhikaṁ prabho sattvamityucyate sadbhirhyetadātmā tvahaṁ smṛtam

हे प्रभो! उससे दस अंश अधिक रजोगुण है, और उससे भी दस अंश अधिक जो है उसे सत्पुरुष सत्त्वगुण कहते हैं; यही आत्मरूप अहंकार 'अहं' नाम से स्मरण किया गया है।

श्लोक 4 (garuda.2.54.4)

अहन्तत्त्वाभिमानी तु आदौ शेषो बभूवह । सहस्राब्दाच्च पश्चात्तौ जातौ खगहरौ द्विज

ahantattvābhimānī tu ādau śeṣo babhūvaha sahasrābdācca paścāttau jātau khagaharau dvija

अहंतत्त्व के अभिमानी देवता आरम्भ में शेष हुए; और हे द्विज, एक सहस्र वर्ष के पश्चात् गरुड और हरि (वायु) दोनों उत्पन्न हुए।

श्लोक 5 (garuda.2.54.5)

अहन्तत्त्वे खग ह्येषु प्रविष्टो हरिरव्ययः । क्षोभयामास भगवाल्लङ्क्ष्म्या सह हरिः स्वयम्

ahantattve khaga hyeṣu praviṣṭo hariravyayaḥ kṣobhayāmāsa bhagavāllaṅkṣmyā saha hariḥ svayam

हे खग! इन्हीं अहंतत्त्व में अव्यय हरि ने प्रवेश किया और भगवान ने स्वयं लक्ष्मी सहित उसे क्षुब्ध किया।

श्लोक 6 (garuda.2.54.6)

वैकारिकस्तामसश्च तैजसश्चेत्यहं त्रिधा । त्रिधा बभूव रुद्रोपि यतस्तेषां नियामकः

vaikārikastāmasaśca taijasaścetyahaṁ tridhā tridhā babhūva rudropi yatasteṣāṁ niyāmakaḥ

वैकारिक, तामस और तैजस — इस प्रकार अहंकार तीन प्रकार का हुआ; और रुद्र भी तीन प्रकार के हुए, क्योंकि वे ही उनके नियामक हैं।

श्लोक 7 (garuda.2.54.7)

वैकारिकस्थितो रुद्रो वैकारिक इति स्मृतः । तामसे तु स्थितो रुद्रस्तामसो ह्यभिधीयते

vaikārikasthito rudro vaikārika iti smṛtaḥ tāmase tu sthito rudrastāmaso hyabhidhīyate

वैकारिक अहंकार में स्थित रुद्र वैकारिक कहलाए; तामस अहंकार में स्थित रुद्र तामस कहे जाते हैं।

श्लोक 8 (garuda.2.54.8)

तैजसे तु स्थितो रुद्रो लोके वै तैजसः स्मृतः । तैजसे तु ह्यहन्तत्त्वे लक्ष्म्या सह हरिः स्वयम्

taijase tu sthito rudro loke vai taijasaḥ smṛtaḥ taijase tu hyahantattve lakṣmyā saha hariḥ svayam

तैजस अहंकार में स्थित रुद्र लोक में तैजस कहलाए। उसी तैजस अहंतत्त्व में लक्ष्मी सहित स्वयं हरि विराजमान हैं।

श्लोक 9 (garuda.2.54.9)

विशित्वा क्षोभयामास तदासौ दशधा त्वभूत् । श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च

viśitvā kṣobhayāmāsa tadāsau daśadhā tvabhūt śrotraṁ cakṣuḥ sparśanaṁ ca rasanaṁ ghrāṇameva ca

उसमें प्रवेश करके भगवान ने उसे क्षुब्ध किया, और तब वह दस प्रकार का हो गया — श्रोत्र, चक्षु, स्पर्श, रसना और घ्राण,

श्लोक 10 (garuda.2.54.10)

वाक्पाणिपादं पायुश्च उपस्थेति दश स्मृताः । वैकारिके ह्यहन्तत्त्वे प्रविश्य क्षोभयद्धरिः

vākpāṇipādaṁ pāyuśca upastheti daśa smṛtāḥ vaikārike hyahantattve praviśya kṣobhayaddhariḥ

तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ — ये दस इन्द्रियाँ कही गई हैं। वैकारिक अहंतत्त्व में प्रवेश करके हरि ने उसे क्षुब्ध किया।

श्लोक 11 (garuda.2.54.11)

महत्तत्त्वादिमा अदाविन्द्रियाणां च देवताः । एकादशविधा आसन्क्रमेण तु खगेश्वर

mahattattvādimā adāvindriyāṇāṁ ca devatāḥ ekādaśavidhā āsankrameṇa tu khageśvara

हे खगेश्वर! महत्तत्त्व से आरम्भ होकर इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता क्रम से ग्यारह प्रकार के हुए।

श्लोक 12 (garuda.2.54.12)

मनोभिमानि नी ह्यादौ वारुणी त्वभवत्तदा । अनन्तरं च सौपर्णी गौरोजापि तथैव च

manobhimāni nī hyādau vāruṇī tvabhavattadā anantaraṁ ca sauparṇī gaurojāpi tathaiva ca

मन के अभिमानी देवता के आरम्भ में 'नी' हुई, फिर वारुणी हुई; उसके अनन्तर सौपर्णी तथा उसी प्रकार गौरजा भी हुई।

श्लोक 13 (garuda.2.54.13)

शेषादनन्तरास्तासां दशवर्षादनंरम् । उत्पत्तिरिति विज्ञेयं क्रमेण तु खगेश्वर

śeṣādanantarāstāsāṁ daśavarṣādanaṁram utpattiriti vijñeyaṁ krameṇa tu khageśvara

हे खगेश्वर! शेष से अनन्तर उन देवियों की उत्पत्ति दस वर्ष के अन्तर से क्रमशः हुई — ऐसा जानना चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.2.54.14)

मनोभिमानिनावन्याविन्द्रकामौ प्रजज्ञतुः । तार्क्ष्य ह्यनन्तरौ ज्ञेयौ मुक्तौ संसार एव च

manobhimānināvanyāvindrakāmau prajajñatuḥ tārkṣya hyanantarau jñeyau muktau saṁsāra eva ca

मन के अभिमानी उन दोनों देवताओं से इन्द्र और कामदेव उत्पन्न हुए; उनके अनन्तर तार्क्ष्य (गरुड) को मुक्ति और संसार दोनों में समान जानना चाहिए।

श्लोक 15 (garuda.2.54.15)

ततस्त्वगात्मा ह्यभवत्सोहं कारिक ईरितः । ततः पाण्यात्मकाश्चैव जज्ञिरे पक्षिसत्तम

tatastvagātmā hyabhavatsohaṁ kārika īritaḥ tataḥ pāṇyātmakāścaiva jajñire pakṣisattama

तत्पश्चात् त्वगिन्द्रिय की आत्मा उत्पन्न हुई, जो 'सोऽहंकारिक' कही गई; हे पक्षिश्रेष्ठ! फिर हाथ के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए।

श्लोक 16 (garuda.2.54.16)

शची रतिश्चानिरुद्धस्तथा स्वायंभुवो मनुः । बृहस्पतिस्तथा दक्ष एते पाण्यात्मकाः स्मृताः

śacī ratiścāniruddhastathā svāyaṁbhuvo manuḥ bṛhaspatistathā dakṣa ete pāṇyātmakāḥ smṛtāḥ

शची, रति, अनिरुद्ध, तथा स्वायम्भुव मनु, बृहस्पति और दक्ष — ये सब हाथ के अभिमानी देवता कहे गए हैं।

श्लोक 17 (garuda.2.54.17)

दक्षस्यानन्तरं जज्ञे प्रवाहो नाम चाण्डज । स एवोक्तश्चातिंवाहो यापयत्यात्मचोदितः

dakṣasyānantaraṁ jajñe pravāho nāma cāṇḍaja sa evoktaścātiṁvāho yāpayatyātmacoditaḥ

हे अण्डज! दक्ष के अनन्तर प्रवाह नामक देवता उत्पन्न हुए; उन्हीं को अतिवाह भी कहा गया है, जो आत्मा से प्रेरित होकर कार्य करते हैं।

श्लोक 18 (garuda.2.54.18)

हस्तादनन्तरं ज्ञेयो न तु शच्यादिवत्स्मृतः । ततोभवन्महाभाग चक्षुरिद्रियमात्मनः

hastādanantaraṁ jñeyo na tu śacyādivatsmṛtaḥ tatobhavanmahābhāga cakṣuridriyamātmanaḥ

हस्तेन्द्रिय के अनन्तर उसे जानना चाहिए, किन्तु शची आदि के समान नहीं माना गया है। हे महाभाग! उसके पश्चात् चक्षुरिन्द्रिय के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए।

श्लोक 19 (garuda.2.54.19)

स्वायंभुवमनोर्भार्या शतरूपा यमस्तथा । चन्द्रसूर्यौ तु चत्त्वारश्चक्षुरिन्द्रियमानिनः

svāyaṁbhuvamanorbhāryā śatarūpā yamastathā candrasūryau tu cattvāraścakṣurindriyamāninaḥ

स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा, तथा यम, चन्द्रमा और सूर्य — ये चार चक्षुरिन्द्रिय के अभिमानी हैं।

श्लोक 20 (garuda.2.54.20)

चन्द्रः श्रोत्राभिमानीति तथा ज्ञेयः खगेश्वर । जिह्वेन्द्रियात्मा वरुणः सूर्यस्यानन्तरोभवत्

candraḥ śrotrābhimānīti tathā jñeyaḥ khageśvara jihvendriyātmā varuṇaḥ sūryasyānantarobhavat

हे खगेश्वर! चन्द्रमा को श्रोत्रेन्द्रिय के अभिमानी के रूप में भी जानना चाहिए। जिह्वेन्द्रिय की आत्मा वरुण हैं, जो सूर्य के अनन्तर हुए।

श्लोक 21 (garuda.2.54.21)

वागिन्द्रियाभिमानिन्यो ह्यभवन्वरुणादनु । दक्षपत्नी प्रसूतिश्च भृगुरग्निस्तर्थव च

vāgindriyābhimāninyo hyabhavanvaruṇādanu dakṣapatnī prasūtiśca bhṛguragnistarthava ca

वाणी की अभिमानिनी देवियाँ वरुण के अनन्तर हुईं — दक्ष की पत्नी प्रसूति, भृगु और उसी प्रकार अग्नि।

श्लोक 22 (garuda.2.54.22)

तत्र वैते महात्मानो वागिन्द्रियनियामकाः । ये क्रव्यादादयश्चोक्तास्तेनन्तत्त्वनियामकाः

tatra vaite mahātmāno vāgindriyaniyāmakāḥ ye kravyādādayaścoktāstenantattvaniyāmakāḥ

इनमें वे महात्मा वाणी-इन्द्रिय के नियामक हैं; और जिन्हें क्रव्याद आदि कहा गया है, वे अन्तः-तत्त्व के नियामक हैं।

श्लोक 23 (garuda.2.54.23)

साम्यत्वाच्च तथैवोक्तिर्न तु तत्त्वाभिमानितः । उपस्थमानिनो वीन्द्र बभूवुस्तदनन्तरम्

sāmyatvācca tathaivoktirna tu tattvābhimānitaḥ upasthamānino vīndra babhūvustadanantaram

समानता के कारण ही ऐसा कथन है, न कि तत्त्व-अभिमान के कारण। हे पक्षीन्द्र! उनके अनन्तर उपस्थेन्द्रिय के अभिमानी देवता उत्पन्न हुए।

श्लोक 24 (garuda.2.54.24)

विश्वामित्रो वसिष्टोत्रिर्मरीचिः पुलहः क्रतुः । पुलस्त्योङ्गिरसश्चैव तथा वैवस्वतो मनुः

viśvāmitro vasiṣṭotrirmarīciḥ pulahaḥ kratuḥ pulastyoṅgirasaścaiva tathā vaivasvato manuḥ

विश्वामित्र, वसिष्ठ, अत्रि, मरीचि, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अंगिरा तथा वैवस्वत मनु —

श्लोक 25 (garuda.2.54.25)

मन्वादयोनन्तसंख्या उपस्थात्मान ईरिताः । पायोश्च मानिनो वीन्द्र जज्ञिरे तदनन्तरम्

manvādayonantasaṁkhyā upasthātmāna īritāḥ pāyośca mānino vīndra jajñire tadanantaram

मनु आदि अनन्त संख्या में उपस्थेन्द्रिय के अभिमानी कहे गए हैं। हे पक्षीन्द्र! उनके अनन्तर गुदेन्द्रिय के अभिमानी उत्पन्न हुए।

श्लोक 26 (garuda.2.54.26)

सूर्येषु द्वादशस्वेको मित्रस्तारा गुरोः प्रिया । कोणाधिपो निरृतिश्च प्रवहप्रिया

sūryeṣu dvādaśasveko mitrastārā guroḥ priyā koṇādhipo nirṛtiśca pravahapriyā

बारह सूर्यों में से एक मित्र, बृहस्पति की प्रिया तारा, दिशाओं के अधिपति (नैरृत आदि), और प्रवाह की प्रिया —

श्लोक 27 (garuda.2.54.27)

चत्त्वार एते पक्षीन्द्र वायुतत्त्वाभिमानिनः । घ्राणाभिमानिनः सर्वे जज्ञिरे द्विजसत्तम

cattvāra ete pakṣīndra vāyutattvābhimāninaḥ ghrāṇābhimāninaḥ sarve jajñire dvijasattama

हे पक्षीन्द्र! ये चार वायुतत्त्व के अभिमानी हैं। हे द्विजसत्तम! ये सभी घ्राणेन्द्रिय के भी अभिमानी उत्पन्न हुए।

श्लोक 28 (garuda.2.54.28)

विष्ववसेनो वायुपुत्रौ ह्यश्विनौ गणपस्तथा । वित्तपः सप्त वसव उक्तो ह्याग्निस्तथाष्टमः

viṣvavaseno vāyuputrau hyaśvinau gaṇapastathā vittapaḥ sapta vasava ukto hyāgnistathāṣṭamaḥ

विष्वक्सेन, वायु के दोनों पुत्र, अश्विनीकुमार, गणप, वित्तप — सात वसु कहे गए हैं, और आठवें कहे गए अग्नि हैं।

श्लोक 29 (garuda.2.54.29)

सत्यानां शृणु नामानि द्रोणः प्राणो ध्रुवस्तथा । अर्के दोषस्तथा वस्कः सप्तमस्तु विभावसुः

satyānāṁ śṛṇu nāmāni droṇaḥ prāṇo dhruvastathā arke doṣastathā vaskaḥ saptamastu vibhāvasuḥ

अब सत्य लोक के देवताओं के नाम सुनो — द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, दोष, वस्क, और सातवें विभावसु।

श्लोक 30 (garuda.2.54.30)

दशरुद्रास्तथा ज्ञेया मूलरुद्रो भवः स्मृतः । दश रुद्रस्य नामानि शृणुष्व द्विजसत्तम

daśarudrāstathā jñeyā mūlarudro bhavaḥ smṛtaḥ daśa rudrasya nāmāni śṛṇuṣva dvijasattama

इन्हें दस रुद्र जानना चाहिए, और उनके मूल रुद्र भव कहे गए हैं। हे द्विजसत्तम! अब रुद्र के दस नाम सुनो।

श्लोक 31 (garuda.2.54.31)

रैवन्तेयस्तथा भीमो वामदेवो वृषाकपिः । अजैकपादहिर्वुध्न्यो बहुरूपो महानिति

raivanteyastathā bhīmo vāmadevo vṛṣākapiḥ ajaikapādahirvudhnyo bahurūpo mahāniti

रैवन्तेय, भीम, वामदेव, वृषाकपि, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप और महान् —

श्लोक 32 (garuda.2.54.32)

दश रुद्रा इति प्रोक्ताः षडादित्याञ्छृणु द्विज । उरुक्रमस्तथा शक्रो विवस्वान्वरुणस्तथा

daśa rudrā iti proktāḥ ṣaḍādityāñchṛṇu dvija urukramastathā śakro vivasvānvaruṇastathā

इन्हें दस रुद्र कहा गया है। अब छह आदित्यों को सुनो, हे द्विज — उरुक्रम, शक्र, विवस्वान् और उसी प्रकार वरुण।

श्लोक 33 (garuda.2.54.33)

पर्जन्योतिबाहुरेत उक्ताः पूर्वं द्विजोत्तम । पर्जन्यव्यतिरिक्तास्तु पञ्चैवोक्ता न संशयः

parjanyotibāhureta uktāḥ pūrvaṁ dvijottama parjanyavyatiriktāstu pañcaivoktā na saṁśayaḥ

हे द्विजोत्तम! पर्जन्य और अतिबाहु — ये पूर्व में कहे गए हैं। पर्जन्य को छोड़कर शेष पाँच ही निःसंदेह कहे गए हैं।

श्लोक 34 (garuda.2.54.34)

गङ्गासमस्तु पर्जन्य इति चोक्तः खगेश्वर । सविता ह्यर्यमा धाता पूषा त्वष्टा तथा भगः

gaṅgāsamastu parjanya iti coktaḥ khageśvara savitā hyaryamā dhātā pūṣā tvaṣṭā tathā bhagaḥ

हे खगेश्वर! पर्जन्य को गंगा के समान कहा गया है। सविता, अर्यमा, धाता, पूषा, त्वष्टा तथा भग —

श्लोक 35 (garuda.2.54.35)

चत्वारिंशत्तथा सप्त महतः परिकीर्तिताः । द्वावुक्ताविति विज्ञेयो प्रवहोतिवहस्तथा

catvāriṁśattathā sapta mahataḥ parikīrtitāḥ dvāvuktāviti vijñeyo pravahotivahastathā

इस प्रकार सैंतालीस महान् देवता कीर्तित हुए हैं। प्रवाह और अतिवाह — ये दोनों एक ही जानने चाहिए।

श्लोक 36 (garuda.2.54.36)

तथा दशविधा ज्ञेया विश्वेदेवाः खगेश्वर । शृणु नामानि तेषां तु पुरूरवार्द्रवसंज्ञकौ

tathā daśavidhā jñeyā viśvedevāḥ khageśvara śṛṇu nāmāni teṣāṁ tu purūravārdravasaṁjñakau

हे खगेश्वर! इसी प्रकार विश्वेदेव दस प्रकार के जानने चाहिए। उनके नाम सुनो — पुरूरवा और आर्द्रव संज्ञक दोनों,

श्लोक 37 (garuda.2.54.37)

धूरिलोचनसंज्ञौ द्वौ क्रतुदक्षेतिसंज्ञकौ । द्वौ सत्यवसुसंज्ञौ च कामकालकसंज्ञकौ

dhūrilocanasaṁjñau dvau kratudakṣetisaṁjñakau dvau satyavasusaṁjñau ca kāmakālakasaṁjñakau

धूरि और लोचन संज्ञक दोनों, क्रतु और दक्ष संज्ञक दोनों, सत्य और वसु संज्ञक दोनों, तथा काम और कालक संज्ञक दोनों।

श्लोक 38 (garuda.2.54.38)

एवं दशविधा ज्ञेया विश्वेदेवाः प्रकीर्तिताः । तथा ऋभुगणश्चोक्तस्तथा च पितरस्त्रयः

evaṁ daśavidhā jñeyā viśvedevāḥ prakīrtitāḥ tathā ṛbhugaṇaścoktastathā ca pitarastrayaḥ

इस प्रकार विश्वेदेव दस प्रकार के कीर्तित हुए हैं। उसी प्रकार ऋभुगण भी कहे गए हैं, और तीन पितर भी।

श्लोक 39 (garuda.2.54.39)

द्यावा पृथिव्यौ विज्ञेयौ एते च षडशीतयः । देवाः प्रजज्ञिरे सर्वे नासिकद्रियमानिनः

dyāvā pṛthivyau vijñeyau ete ca ṣaḍaśītayaḥ devāḥ prajajñire sarve nāsikadriyamāninaḥ

द्यावा और पृथ्वी को भी जानना चाहिए — इस प्रकार ये छियासी देवता, हे विनतासुत, नासिकेन्द्रिय के अभिमानी उत्पन्न हुए।

श्लोक 40 (garuda.2.54.40)

आकाशस्याभिमानी तु गणपः सुदाहृतः । उभयत्राभि मानीति ज्ञेयं तत्त्वार्थवेदिभिः

ākāśasyābhimānī tu gaṇapaḥ sudāhṛtaḥ ubhayatrābhi mānīti jñeyaṁ tattvārthavedibhiḥ

आकाश के अभिमानी गणप कहे गए हैं; तत्त्वार्थ के ज्ञाताओं द्वारा उन्हें दोनों (श्रोत्र और आकाश) के अभिमानी जानना चाहिए।

श्लोक 41 (garuda.2.54.41)

विष्वक्सेनं विना सर्वे जयाद्या विष्णुपार्षदाः । अभवन्समहीनाश्च विष्वक्सेनादनन्तरम्

viṣvaksenaṁ vinā sarve jayādyā viṣṇupārṣadāḥ abhavansamahīnāśca viṣvaksenādanantaram

विष्वक्सेन को छोड़कर जय आदि सभी विष्णु के पार्षद, विष्वक्सेन के अनन्तर, सबके समान बल वाले हुए।

श्लोक 42 (garuda.2.54.42)

एतेपि नासिकायाश्च अवान्तरनियामकाः । अतस्ते तत्त्वमानिभ्यो ह्यवरास्ते प्रकीर्तिताः

etepi nāsikāyāśca avāntaraniyāmakāḥ ataste tattvamānibhyo hyavarāste prakīrtitāḥ

ये भी नासिका के अवान्तर नियामक हैं; इसलिए ये तत्त्व के अभिमानियों से न्यून कहे गए हैं।

श्लोक 43 (garuda.2.54.43)

स्पर्शतत्त्वाभिमानी तु अपानश्चेत्युदाहृतः । रूपाभिमानी संजज्ञे व्यानो नाम महान्प्रभो

sparśatattvābhimānī tu apānaścetyudāhṛtaḥ rūpābhimānī saṁjajñe vyāno nāma mahānprabho

स्पर्शतत्त्व के अभिमानी अपान कहे गए हैं। रूप के अभिमानी व्यान नामक महान् प्रभु उत्पन्न हुए।

श्लोक 44 (garuda.2.54.44)

रसात्मक उदानश्च समानो गन्धनामकः । अपां नाथाश्च चत्वारो मरुतः परिकीर्तिताः

rasātmaka udānaśca samāno gandhanāmakaḥ apāṁ nāthāśca catvāro marutaḥ parikīrtitāḥ

रस के अभिमानी उदान हैं, और गन्ध के अभिमानी समान नामक हैं। जल के ये चार स्वामी मरुद्गण कहे गए हैं।

श्लोक 45 (garuda.2.54.45)

जयाद्यनन्तरान्वक्ष्ये समुत्पन्नान्खगेश्वर । प्रधानाग्रे प्रथमजः पावकः समुदाहृतः

jayādyanantarānvakṣye samutpannānkhageśvara pradhānāgre prathamajaḥ pāvakaḥ samudāhṛtaḥ

हे खगेश्वर! अब जय आदि से उत्पन्न अनन्तर देवताओं को कहूँगा। प्रधान (तत्त्वों) में सबसे पहले उत्पन्न होने वाले पावक (अग्नि) कहे गए हैं।

श्लोक 46 (garuda.2.54.46)

भृगोर्महर्षेः पुत्रश्च च्यवनः समुदाहृतः । बृहस्पतेश्च पुत्रस्तु उतथ्यः परिकीर्तितः

bhṛgormaharṣeḥ putraśca cyavanaḥ samudāhṛtaḥ bṛhaspateśca putrastu utathyaḥ parikīrtitaḥ

भृगु महर्षि के पुत्र च्यवन कहे गए हैं, और बृहस्पति के पुत्र उतथ्य कीर्तित हुए हैं।

श्लोक 47 (garuda.2.54.47)

रैवतश्चाक्षुषश्चैव तथा स्वारोचिषः स्मृतः । उत्तमो ब्रह्मसावर्णी रुद्रसावर्णिरेव च

raivataścākṣuṣaścaiva tathā svārociṣaḥ smṛtaḥ uttamo brahmasāvarṇī rudrasāvarṇireva ca

रैवत, चाक्षुष, तथा स्वारोचिष स्मृत मनु, उत्तम, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि,

श्लोक 48 (garuda.2.54.48)

देवसावर्णिसावर्णिरिन्द्रसावर्णिरेवच । तथैव दक्षसावर्णिर्धर्मभावर्णिरेव च

devasāvarṇisāvarṇirindrasāvarṇirevaca tathaiva dakṣasāvarṇirdharmabhāvarṇireva ca

देवसावर्णि, इन्द्रसावर्णि, उसी प्रकार दक्षसावर्णि और धर्मसावर्णि —

श्लोक 49 (garuda.2.54.49)

एकादशविधा ह्येवं मनवः परिकीर्तिताः । पितॄणां सप्तकं चैवेत्याद्याः संजज्ञिरे खग

ekādaśavidhā hyevaṁ manavaḥ parikīrtitāḥ pitṝṇāṁ saptakaṁ caivetyādyāḥ saṁjajñire khaga

इस प्रकार ग्यारह प्रकार के मनु कीर्तित हुए हैं। हे खग! सात पितरों का समुदाय भी इसी क्रम में उत्पन्न हुआ जानना चाहिए।

श्लोक 50 (garuda.2.54.50)

तदनन्तरमुत्पन्नास्तेभ्यो नीचाः शृणु द्विज । वरुणस्य पत्नी गङ्गा पर्जन्याख्यो विभावसुः

tadanantaramutpannāstebhyo nīcāḥ śṛṇu dvija varuṇasya patnī gaṅgā parjanyākhyo vibhāvasuḥ

हे द्विज! उनके अनन्तर उत्पन्न उनसे न्यून देवताओं को सुनो — वरुण की पत्नी गंगा, तथा पर्जन्य नामक विभावसु,

श्लोक 51 (garuda.2.54.51)

यमभार्या श्यामला तु ह्यनिरुद्धप्रिया विराट् । ब्रह्माण्डमानिनी सैव ह्युषानाम्ना सुशब्दिता

yamabhāryā śyāmalā tu hyaniruddhapriyā virāṭ brahmāṇḍamāninī saiva hyuṣānāmnā suśabditā

यम की पत्नी श्यामला, अनिरुद्ध की प्रिया विराट्, जो ब्रह्माण्ड की अभिमानिनी हैं और उषा नाम से सुविख्यात हैं,

श्लोक 52 (garuda.2.54.52)

रोहिणी चन्द्रभार्योक्ता सूर्यभार्या तु संज्ञका । एता गङ्गादिषटूसंख्या जज्ञिरे विनतासुत

rohiṇī candrabhāryoktā sūryabhāryā tu saṁjñakā etā gaṅgādiṣaṭūsaṁkhyā jajñire vinatāsuta

रोहिणी चन्द्रमा की पत्नी कही गई हैं, और संज्ञा सूर्य की पत्नी हैं — हे विनतासुत! ये गंगा आदि छह उत्पन्न हुई हैं।

श्लोक 53 (garuda.2.54.53)

गङ्गाद्यनन्तरं जज्ञे स्वाहा वै मन्त्रदेवता । स्वाहानामाग्निभार्योक्ता गङ्गादिभ्योधमा श्रुता

gaṅgādyanantaraṁ jajñe svāhā vai mantradevatā svāhānāmāgnibhāryoktā gaṅgādibhyodhamā śrutā

गंगा आदि के अनन्तर मन्त्रों की देवता स्वाहा उत्पन्न हुईं। स्वाहा नामक अग्नि की पत्नी सुनी गई हैं, जो गंगा आदि से न्यून हैं।

श्लोक 54 (garuda.2.54.54)

स्वाहानन्तरजो ज्ञेयो ज्ञानात्मा बुधनामकः । बुधस्तु चन्द्रपुत्रो यः स्वाहाया अधमः स्मृतः

svāhānantarajo jñeyo jñānātmā budhanāmakaḥ budhastu candraputro yaḥ svāhāyā adhamaḥ smṛtaḥ

स्वाहा के अनन्तर उत्पन्न होने वाले ज्ञानात्मा बुध नामक जानने चाहिए। बुध, जो चन्द्रमा के पुत्र हैं, स्वाहा से न्यून स्मृत हैं।

श्लोक 55 (garuda.2.54.55)

उषा नाम तथा जज्ञे बुधस्यानन्तरं खग । उषानामा भिमानी तु ह्यश्विभार्या प्रकीर्तिता

uṣā nāma tathā jajñe budhasyānantaraṁ khaga uṣānāmā bhimānī tu hyaśvibhāryā prakīrtitā

हे खग! बुध के अनन्तर उषा नामक उत्पन्न हुईं; उषा नामक अभिमानिनी अश्विनीकुमारों की पत्नी कही गई हैं।

श्लोक 56 (garuda.2.54.56)

बुधाधमा सा विज्ञेया नात्र कार्या विचारणा । ततः शनैश्चरो जज्ञे पृथिव्यात्मेति विश्रुतः

budhādhamā sā vijñeyā nātra kāryā vicāraṇā tataḥ śanaiścaro jajñe pṛthivyātmeti viśrutaḥ

उन्हें बुध से न्यून जानना चाहिए, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए। उसके पश्चात् पृथ्वी के आत्मस्वरूप विख्यात शनैश्चर उत्पन्न हुए।

श्लोक 57 (garuda.2.54.57)

उषाधमस्तु विज्ञेयस्ततो जज्ञेथ पुष्करः । कर्माभिमानी विज्ञेयः शनैश्चर इतीरितः

uṣādhamastu vijñeyastato jajñetha puṣkaraḥ karmābhimānī vijñeyaḥ śanaiścara itīritaḥ

उन्हें उषा से न्यून जानना चाहिए। उसके बाद पुष्कर उत्पन्न हुए, जिन्हें कर्म के अभिमानी शनैश्चर कहा गया है।

श्लोक 58 (garuda.2.54.58)

तत्त्वाभिमानिनो देवानेवं सृष्ट्वा हरिः स्वयम् । प्रविवेश स देवेशस्तत्त्वेषु रमया सहा

tattvābhimānino devānevaṁ sṛṣṭvā hariḥ svayam praviveśa sa deveśastattveṣu ramayā sahā

इस प्रकार तत्त्वाभिमानी देवताओं को उत्पन्न करके स्वयं हरि ने, हे देवेश! रमा (लक्ष्मी) के साथ उन तत्त्वों में प्रवेश किया।

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