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उत्तरखण्ड · अध्याय 58

अजानज देवताओं का स्वरूप एवं स्तोत्र-फल

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59

श्लोक 1 (garuda.2.58.1)

श्रीगरुड उवाच । अजानजस्वरूपं च ब्रूहि कृष्ण महामते । तदन्यांश्च क्रमेणेव वक्तुं कृष्ण त्वमर्हसि

śrīgaruḍa uvāca ajānajasvarūpaṁ ca brūhi kṛṣṇa mahāmate tadanyāṁśca krameṇeva vaktuṁ kṛṣṇa tvamarhasi

श्री गरुड ने कहा — हे महामते कृष्ण! अजानज (आजान-कुल के जीवों) के स्वरूप को कहिए, और उनके अतिरिक्त अन्य वर्गों को भी क्रमशः कहने की कृपा कीजिए, हे कृष्ण।

श्लोक 2 (garuda.2.58.2)

श्रीकृष्ण उवाच । अजानाख्या देवतास्तु तत्तद्देवकुले भवाः । अजानदेवतास्ता हि तेभ्योग्र्याः कर्मदेवताः

śrīkṛṣṇa uvāca ajānākhyā devatāstu tattaddevakule bhavāḥ ajānadevatāstā hi tebhyogryāḥ karmadevatāḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — अजान नाम के देवता उन-उन देव-कुलों में उत्पन्न होते हैं; वे अजान-देवता कर्म से उत्पन्न देवताओं से श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 3 (garuda.2.58.3)

विराधश्चारुदेष्णश्च तथा चित्ररथस्तथा । धृतराष्ट्रः किशोरश्च हूहूर्हाहास्तथैव च

virādhaścārudeṣṇaśca tathā citrarathastathā dhṛtarāṣṭraḥ kiśoraśca hūhūrhāhāstathaiva ca

विराध, चारुदेष्ण, तथा चित्ररथ, धृतराष्ट्र, किशोर, हूहू और हाहा — ये सब भी,

श्लोक 4 (garuda.2.58.4)

विद्याधरश्चोग्रसेनो विश्वावसुपरावसू । चित्रसेनश्च गोपालो बलः पञ्चदश स्मृताः

vidyādharaścograseno viśvāvasuparāvasū citrasenaśca gopālo balaḥ pañcadaśa smṛtāḥ

विद्याधर, उग्रसेन, विश्वावसु और परावसु, चित्रसेन, गोपाल और बल — ये पन्द्रह स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 5 (garuda.2.58.5)

एवमाद्याश्च गन्धर्वाः शतसंख्याः खगेश्वर । अजानजसमा ज्ञेया मुक्तौ संसार एव च

evamādyāśca gandharvāḥ śatasaṁkhyāḥ khageśvara ajānajasamā jñeyā muktau saṁsāra eva ca

इस प्रकार आदि लेकर सैकड़ों की संख्या में गन्धर्व हैं, हे खगेश्वर; उन्हें अजानज के समान जानना चाहिए, मुक्ति में और संसार में भी।

श्लोक 6 (garuda.2.58.6)

अज्ञानजास्तु मे देवाः कर्मजेभ्यः शतावराः । घृताची मेनका रंभा उर्वशी च तिलोत्तमा

ajñānajāstu me devāḥ karmajebhyaḥ śatāvarāḥ ghṛtācī menakā raṁbhā urvaśī ca tilottamā

मेरे अज्ञानज देवता कर्मजों से सौ गुना न्यून हैं — घृताची, मेनका, रम्भा, उर्वशी और तिलोत्तमा,

श्लोक 7 (garuda.2.58.7)

सुकेतुः शबरी चैव मञ्जुघोषा च पिङ्गला । इत्यादिकं यक्षरत्नं सह संपरिकीर्तितम्

suketuḥ śabarī caiva mañjughoṣā ca piṅgalā ityādikaṁ yakṣaratnaṁ saha saṁparikīrtitam

सुकेतु, शबरी, तथा मंजुघोषा और पिंगला — इत्यादि यक्ष-रत्न भी साथ में कीर्तित हुए हैं।

श्लोक 8 (garuda.2.58.8)

अजानजसमा ह्येते कर्मजेभ्यः शतावराः । विश्वामित्रो वसिष्ठश्च नारदश्च्यवनस्तथा

ajānajasamā hyete karmajebhyaḥ śatāvarāḥ viśvāmitro vasiṣṭhaśca nāradaścyavanastathā

ये सब भी अजानज के समान ही हैं, कर्मजों से सौ गुना न्यून। विश्वामित्र, वसिष्ठ, नारद, च्यवन,

श्लोक 9 (garuda.2.58.9)

उतथ्यश्च मुनिश्चैतान्द्राजपित्वा खगेश्वर । ऋषयश्च महात्मानो ह्यजानजसमाः स्मृताः

utathyaśca muniścaitāndrājapitvā khageśvara ṛṣayaśca mahātmāno hyajānajasamāḥ smṛtāḥ

और मुनि उतथ्य — इन्हें द्विज-कुल में उत्पन्न मानकर, हे खगेश्वर, ये महात्मा ऋषिगण अजानज के समान स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 10 (garuda.2.58.10)

शतर्चिः कश्यपो ज्ञेयो मध्यमश्च पराशरः । पावमान्यः प्रगाथश्च क्षुद्रसूक्तश्च देवलः

śatarciḥ kaśyapo jñeyo madhyamaśca parāśaraḥ pāvamānyaḥ pragāthaśca kṣudrasūktaśca devalaḥ

शतर्चि, कश्यप, मध्यम और पराशर को जानना चाहिए, तथा पावमान्य, प्रगाथ, क्षुद्रसूक्त और देवल —

श्लोक 11 (garuda.2.58.11)

गृत्समदो ह्यासुरिश्च भरद्वाजोथ मुद्गलः । उद्दालको ह्यृष्यशृङ्गः शङ्खः सत्यव्रतस्तथा

gṛtsamado hyāsuriśca bharadvājotha mudgalaḥ uddālako hyṛṣyaśṛṅgaḥ śaṅkhaḥ satyavratastathā

गृत्समद, आसुरि, भरद्वाज, मुद्गल, उद्दालक, ऋष्यशृंग, शंख और सत्यव्रत,

श्लोक 12 (garuda.2.58.12)

सुयज्ञश्चैव बाभ्रव्यो माण्डूकश्चैव बाष्कलः । धर्माचार्यस्तथागस्त्यो दाल्भ्यो दार्ढ्यच्युतस्तथा

suyajñaścaiva bābhravyo māṇḍūkaścaiva bāṣkalaḥ dharmācāryastathāgastyo dālbhyo dārḍhyacyutastathā

सुयज्ञ, बाभ्रव्य, माण्डूक, बाष्कल, धर्माचार्य, अगस्त्य, दाल्भ्य और दार्ढ्यच्युत,

श्लोक 13 (garuda.2.58.13)

कवषो हरितः कण्वो विरूपो मुसलस्तथा । विष्णुवृद्धश्च आत्रेयः श्रीवत्सो वत्सलेत्यपि

kavaṣo haritaḥ kaṇvo virūpo musalastathā viṣṇuvṛddhaśca ātreyaḥ śrīvatso vatsaletyapi

कवष, हरित, कण्व, विरूप, मुसल, विष्णुवृद्ध, आत्रेय, श्रीवत्स और वत्सल —

श्लोक 14 (garuda.2.58.14)

भार्गवश्चाप्नवानश्च माण्डूकेयस्तथैव । मण्डूकश्चैव जाबचलिः वीतिहव्यस्तथैव च

bhārgavaścāpnavānaśca māṇḍūkeyastathaiva maṇḍūkaścaiva jābacaliḥ vītihavyastathaiva ca

भार्गव, आप्नवान, माण्डूकेय, तथा मण्डूक, जाबालि, और वीतिहव्य,

श्लोक 15 (garuda.2.58.15)

गृत्समदः शौनकश्च इत्याद्या ऋषयः स्मृताः । एतेषां श्रवणादेव हरिः प्रीणाति सर्वदा

gṛtsamadaḥ śaunakaśca ityādyā ṛṣayaḥ smṛtāḥ eteṣāṁ śravaṇādeva hariḥ prīṇāti sarvadā

गृत्समद और शौनक — इत्यादि ऋषि स्मरण किए गए हैं। इनके नाम के श्रवण मात्र से ही हरि सदा प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 16 (garuda.2.58.16)

ब्रुवे द्व्यष्टसहस्रं च शृणु तार्क्ष्य मम स्त्रियः । अग्निपुत्रास्तु यद्द्व्यष्टसहस्रञ्च मम स्त्रियः । अजानजसमा ह्येता (ते) नात्र कार्या विचारणा

bruve dvyaṣṭasahasraṁ ca śṛṇu tārkṣya mama striyaḥ agniputrāstu yaddvyaṣṭasahasrañca mama striyaḥ ajānajasamā hyetā (te) nātra kāryā vicāraṇā

हे तार्क्ष्य! सुनो, मैं सोलह हज़ार की संख्या कहता हूँ — मेरी स्त्रियों की; और अग्नि के पुत्रों से सम्बद्ध सोलह हज़ार भी मेरी स्त्रियाँ हैं — ये सब अजानज के समान ही हैं, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 17 (garuda.2.58.17)

त्वष्टुः पुत्री कशेरूश्च तासां मध्ये गुणाधिका । तदनन्तरजान्वक्ष्ये शृणु सम्यक्खगेश्वर

tvaṣṭuḥ putrī kaśerūśca tāsāṁ madhye guṇādhikā tadanantarajānvakṣye śṛṇu samyakkhageśvara

त्वष्टा की पुत्री कशेरू उनमें गुणों में श्रेष्ठ हैं। अब उनके अनन्तर उत्पन्नों को कहूँगा — भलीभाँति सुनो, हे खगेश्वर।

श्लोक 18 (garuda.2.58.18)

आजानेभ्यस्तु पितरः सप्तभ्योन्ये शतावराः । तथाधिका हि पितर इति वेदविदां मतम्

ājānebhyastu pitaraḥ saptabhyonye śatāvarāḥ tathādhikā hi pitara iti vedavidāṁ matam

आजान-वर्ग के सात जनों से पितर सौ गुना न्यून हैं; फिर भी वेदवेत्ताओं का यह मत है कि पितर (सामान्य मनुष्यों से) श्रेष्ठ ही होते हैं।

श्लोक 19 (garuda.2.58.19)

तदनन्तराजान्वक्ष्ये शृणु त्वं द्विजसत्तम । अष्टाभ्यो देवगन्धर्वा अष्टोत्तरशतं विना

tadanantarājānvakṣye śṛṇu tvaṁ dvijasattama aṣṭābhyo devagandharvā aṣṭottaraśataṁ vinā

अब उनके अनन्तर उत्पन्नों को कहूँगा, सुनो, हे द्विजसत्तम। देव-गन्धर्व, उन आठ के अतिरिक्त, एक सौ आठ की संख्या में हैं,

श्लोक 20 (garuda.2.58.20)

तेभ्यः शतगुणानन्दा देवप्रेष्यास्तु मुख्यतः । स्वमुखेनेव देवैश्च आज्ञाप्याः सर्वदा गणाः

tebhyaḥ śataguṇānandā devapreṣyāstu mukhyataḥ svamukheneva devaiśca ājñāpyāḥ sarvadā gaṇāḥ

उनसे सौ गुना न्यून, मुख्यतः देवताओं के सेवक, आनन्दित गण हैं; वे देवताओं के अपने ही मुख से सदा आज्ञप्त होने वाले गण हैं।

श्लोक 21 (garuda.2.58.21)

आख्याता देवगन्धर्वास्तेभ्यस्ते च शतावराः । तेभ्यस्तु क्षितिपा ज्ञेया अवराश्च शतैर्गुणैः

ākhyātā devagandharvāstebhyaste ca śatāvarāḥ tebhyastu kṣitipā jñeyā avarāśca śatairguṇaiḥ

ये देव-गन्धर्व कहे गए हैं; उनसे राजागण सौ गुणों से न्यून जानने चाहिए।

श्लोक 22 (garuda.2.58.22)

तेभ्यः शतगुणाज्ञेया मानुषेषूत्तमा गणाः । एवं प्रासंगिकानुक्त्वा प्रकृतं ह्यनुसराम्यहम् । एवं ब्रह्मादयो देवा लक्ष्म्याद्या अपि सर्वशः

tebhyaḥ śataguṇājñeyā mānuṣeṣūttamā gaṇāḥ evaṁ prāsaṁgikānuktvā prakṛtaṁ hyanusarāmyaham evaṁ brahmādayo devā lakṣmyādyā api sarvaśaḥ

उनसे मनुष्यों में उत्तम गण सौ गुना न्यून जानने चाहिए। इस प्रकार प्रासंगिक विषयों को कहकर अब मैं मूल विषय का अनुसरण करता हूँ। इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवता, लक्ष्मी आदि सभी देवियाँ,

श्लोक 23 (garuda.2.58.23)

स्तुत्वा तूष्णीं स्थिताः सर्वे प्राञ्जलीकृत्य भो द्विज

stutvā tūṣṇīṁ sthitāḥ sarve prāñjalīkṛtya bho dvija

स्तुति करके, हे द्विज, हाथ जोड़े हुए सब मौन खड़े रहे।

श्लोक 24 (garuda.2.58.24)

इति स्तुतश्च देवेशो भगवान् हरिरव्ययः । तेषामायतनं दातुं मनसा समचिन्तयत्

iti stutaśca deveśo bhagavān hariravyayaḥ teṣāmāyatanaṁ dātuṁ manasā samacintayat

इस प्रकार स्तुत होकर देवाधिदेव भगवान अव्यय हरि ने उन्हें अपने-अपने स्थान प्रदान करने के लिए मन में विचार किया।

श्लोक 25 (garuda.2.58.25)

इदं पवित्रमारोग्यं पुण्यं पापप्रणाशनम् । हरिप्रसादजनकं स्वरूपसुखसाधनम्

idaṁ pavitramārogyaṁ puṇyaṁ pāpapraṇāśanam hariprasādajanakaṁ svarūpasukhasādhanam

यह स्तवन पवित्र है, आरोग्यदायक है, पुण्यमय है, पापों का नाश करने वाला है, हरि की प्रसन्नता उत्पन्न करने वाला है, और अपने स्वरूप के सुख की प्राप्ति का साधन है।

श्लोक 26 (garuda.2.58.26)

इदं तु स्तवनं विप्रा न पठन्तीह मानवाः । न शृण्वन्ति च ये नित्यं ते सर्वे चैव मायिनः

idaṁ tu stavanaṁ viprā na paṭhantīha mānavāḥ na śṛṇvanti ca ye nityaṁ te sarve caiva māyinaḥ

इस स्तवन को जो मनुष्य इस लोक में नहीं पढ़ते, और जो इसे नित्य नहीं सुनते, वे सभी मायावी (भ्रम में पड़े हुए) ही हैं।

श्लोक 27 (garuda.2.58.27)

नस्मरन्तोन्तरं नित्यं ये भुञ्जन्ति नराधमाः । तैर्भुक्ता सततं विष्ठा सदा क्रिमिशतैर्युता

nasmarantontaraṁ nityaṁ ye bhuñjanti narādhamāḥ tairbhuktā satataṁ viṣṭhā sadā krimiśatairyutā

जो नराधम इसका स्मरण किए बिना नित्य भोजन करते हैं, उनके द्वारा खाया गया अन्न सदा विष्ठा के समान होकर सैकड़ों कृमियों से युक्त हो जाता है।

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