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उत्तरखण्ड · अध्याय 61

ब्रह्मा की स्तुति एवं जीवों का तारतम्य

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

श्लोक 1 (garuda.2.61.1)

श्रीकृष्ण उवाच । नाडीं समाविश्य महानुभावः श्रीविष्णुभक्तो त्वथ पुष्करस्थः । विचारयामास गुरुं स्वमूलं नारायणं निर्गुणमद्वितीयम्

śrīkṛṣṇa uvāca | nāḍīṃ samāviśya mahānubhāvaḥ śrīviṣṇubhakto tvatha puṣkarasthaḥ | vicārayāmāsa guruṃ svamūlaṃ nārāyaṇaṃ nirguṇamadvitīyam

श्रीकृष्ण ने कहा — तदनन्तर पुष्कर (कमल) पर स्थित वह महानुभाव श्रीविष्णु-भक्त ब्रह्मा नाड़ी में प्रविष्ट होकर अपने गुरु, अपने मूल कारण, निर्गुण और अद्वितीय नारायण का चिन्तन करने लगे।

श्लोक 2 (garuda.2.61.2)

एतावता हरिभक्तस्य तस्याप्यच्छिन्नभक्तस्य चतुर्मुखस्य । विचारकाले च विचिन्तनीयो ह्यज्ञानलेशस्तु खगेश्वरेश्वर

etāvatā haribhaktasya tasyāpyacchinnabhaktasya caturmukhasya | vicārakāle ca vicintanīyo hyajñānaleśastu khageśvareśvara

हे पक्षिराज के भी स्वामी! इस प्रकार हरि-भक्त, अखण्ड-भक्ति वाले चतुर्मुख ब्रह्मा के भी उस चिन्तन के समय ज्ञान का कुछ अंश (अज्ञान-लेश) अवश्य विचारणीय है।

श्लोक 3 (garuda.2.61.3)

यथास्ति विष्णोर्मनः सङ्कल्प एव तथैव सोपि प्रकरोति नित्यम् । आलोचने तस्य सदास्ति भूमन्स्वयोग्यतामनतिक्रम्य चैव

yathāsti viṣṇormanaḥ saṅkalpa eva tathaiva sopi prakaroti nityam | ālocane tasya sadāsti bhūmansvayogyatāmanatikramya caiva

जैसा विष्णु का मनःसंकल्प है, वैसा ही ब्रह्मा भी सदा करते हैं; हे भूमन्! उनके चिन्तन में सदा अपनी योग्यता का अतिक्रमण किये बिना ही ज्ञान रहता है।

श्लोक 4 (garuda.2.61.4)

हरेः स्वरूपे च तथा प्रपञ्चः स्वस्मिन्स्वरूपे च खगास्ति ज्ञानम् । यथापि नित्यं परिचारवारि च अज्ञातवद्दृश्यते विष्णुना च

hareḥ svarūpe ca tathā prapañcaḥ svasminsvarūpe ca khagāsti jñānam | yathāpi nityaṃ paricāravāri ca ajñātavaddṛśyate viṣṇunā ca

हरि के स्वरूप में अनन्त विस्तार है, हे खगेश्वर! और अपने ही स्वरूप का ज्ञान ब्रह्मा को है, फिर भी जिस प्रकार सेवक के लिए सदा उपलब्ध जल भी अपनी पूर्णता में अज्ञात-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार विष्णु का स्वरूप भी अज्ञात-सा दिखाई देता है।

श्लोक 5 (garuda.2.61.5)

हरेः प्रीत्यर्थं कुरुतेऽसौ कदाच्चित्तत्रापि कश्चिद्विशेषोऽस्ति वीन्द्र । शृणुष्व सम्यङ्निगृहीतचित्तो यथा प्रोवाच स विजानाति देवः

hareḥ prītyarthaṃ kurute'sau kadāccittatrāpi kaścidviśeṣo'sti vīndra | śṛṇuṣva samyaṅnigṛhītacitto yathā provāca sa vijānāti devaḥ

हे पक्षीन्द्र! हरि की प्रसन्नता के लिए ब्रह्मा कभी-कभी ऐसा करते हैं और उसमें भी कोई विशेषता होती है। चित्त को भलीभाँति स्थिर करके सुनो, जैसा मैं कहता हूँ, वैसे ही वे देव (ब्रह्मा) जानते हैं।

श्लोक 6 (garuda.2.61.6)

सदा त्वदोषं प्रविशेषैश्च मुक्तवेदास्तथा वा पविजानन्ति नित्यम् । तस्य स्वरूपं न तथा हरिं च स्वयोग्यतामनतिक्रम्य वेधाः

sadā tvadoṣaṃ praviśeṣaiśca muktavedāstathā vā pavijānanti nityam | tasya svarūpaṃ na tathā hariṃ ca svayogyatāmanatikramya vedhāḥ

मुक्त पुरुष तथा वेद सदा विशेष रूप से यह जानते हैं कि हरि सर्वदा दोषरहित हैं; किन्तु ब्रह्मा भी अपनी योग्यता का अतिक्रमण किये बिना उनके स्वरूप को उस रूप में पूर्णतः नहीं जानते।

श्लोक 7 (garuda.2.61.7)

हरेः स्वरूपं न विजानाति सर्वं स्वयोग्यरूपं सर्वदा वेत्ति विष्णोः । तत्राज्ञानं नास्ति किञ्चिद्द्विजेन्द्र यावत्स्वरूपं च तथैव लक्ष्म्याः

hareḥ svarūpaṃ na vijānāti sarvaṃ svayogyarūpaṃ sarvadā vetti viṣṇoḥ | tatrājñānaṃ nāsti kiñciddvijendra yāvatsvarūpaṃ ca tathaiva lakṣmyāḥ

वे (ब्रह्मा) हरि के सम्पूर्ण स्वरूप को नहीं जानते, अपितु सदा अपनी योग्यता के अनुरूप ही विष्णु को जानते हैं। हे द्विजेन्द्र! उसमें कोई अज्ञान (दोष) नहीं है, और इसी प्रकार लक्ष्मी के स्वरूप के विषय में भी समझना चाहिए।

श्लोक 8 (garuda.2.61.8)

वेधा न जानाति कुतस्तदन्ये तयोः स्वरूपं न विजानाति सर्वम् । तथापि वेदानेकदेशेन वेद जानाति लक्ष्मीर्हरिरूपं च यावत्

vedhā na jānāti kutastadanye tayoḥ svarūpaṃ na vijānāti sarvam | tathāpi vedānekadeśena veda jānāti lakṣmīrharirūpaṃ ca yāvat

जब स्वयं ब्रह्मा ही नहीं जानते, तो अन्य कौन जान सकता है? वे दोनों (हरि और लक्ष्मी) के सम्पूर्ण स्वरूप को नहीं जानते। फिर भी वेद के एक अंश के द्वारा लक्ष्मी जितना जान सकती हैं, उतना हरि के स्वरूप को जानती हैं।

श्लोक 9 (garuda.2.61.9)

तावन्न जानाति विधिः खगेन्द्र ज्ञाने विधातुश्च स्वयोग्यभूते । अतो विरिञ्चस्य न चिन्तनीयो ह्यज्ञानलेशः क्वापि देशे च काले

tāvanna jānāti vidhiḥ khagendra jñāne vidhātuśca svayogyabhūte | ato viriñcasya na cintanīyo hyajñānaleśaḥ kvāpi deśe ca kāle

हे खगेन्द्र! ब्रह्मा उतना भी नहीं जानते जितना लक्ष्मी जानती हैं, क्योंकि ज्ञान सबकी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही होता है। अतः ब्रह्मा में किसी भी देश-काल में लेशमात्र भी अज्ञान दोष नहीं मानना चाहिए।

श्लोक 10 (garuda.2.61.10)

नाडीं समाविश्य तदा विरिञ्चो न वेद नारायणमेकवच्च । तदाऽशृणोत्तं कमलासनं प्रभुस्तपस्तप द्व्यक्षरं सादरेण

nāḍīṃ samāviśya tadā viriñco na veda nārāyaṇamekavacca | tadā'śṛṇottaṃ kamalāsanaṃ prabhustapastapa dvyakṣaraṃ sādareṇa

नाड़ी में प्रविष्ट होने पर विरिञ्चि (ब्रह्मा) नारायण को उस एक अद्वितीय रूप में नहीं जान सके। तब प्रभु ने उस कमलासन ब्रह्मा से आदरपूर्वक द्व्यक्षर वचन में कहा — "तप करो, तप करो।"

श्लोक 11 (garuda.2.61.11)

अभिप्रायं तस्य सम्यग्विदित्त्वा तपः कुरु त्वं हरितुष्ट्यर्थमेव । तपोऽकरोद्धरिपादैक निष्ठो हरेः प्रीत्यर्थं दिव्यसहस्रवर्षम्

abhiprāyaṃ tasya samyagvidittvā tapaḥ kuru tvaṃ harituṣṭyarthameva | tapo'karoddharipādaika niṣṭho hareḥ prītyarthaṃ divyasahasravarṣam

उसके अभिप्राय को भलीभाँति समझकर — कि "हरि की प्रसन्नता के लिए ही तप करो" — हरि के चरणों में एकनिष्ठ ब्रह्मा ने हरि की प्रीति के लिए दिव्य सहस्र वर्षों तक तप किया।

श्लोक 12 (garuda.2.61.12)

ततो हरिः प्रादुरासीत्खगेन्द्र वरं दातुं भक्तवरस्य दिव्यम् । सदा विष्णुं देवदेवो ददर्श चतुर्भुजं तं जलजायताक्षम्

tato hariḥ prādurāsītkhagendra varaṃ dātuṃ bhaktavarasya divyam | sadā viṣṇuṃ devadevo dadarśa caturbhujaṃ taṃ jalajāyatākṣam

हे खगेन्द्र! तब हरि उस श्रेष्ठ भक्त को दिव्य वर देने के लिए प्रकट हुए। देवाधिदेव ब्रह्मा ने चतुर्भुज, कमलनयन विष्णु को साक्षात् देखा।

श्लोक 13 (garuda.2.61.13)

श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं संपश्यन्तं सुप्रसन्नार्द्रदृष्ट्या । दृष्ट्वा हरिं ब्रह्म नारायणं च पुरः स्थितं भक्तवश्यं दयालुम्

śrīvatsalakṣmaṃ galaśobhikaustubhaṃ saṃpaśyantaṃ suprasannārdradṛṣṭyā | dṛṣṭvā hariṃ brahma nārāyaṇaṃ ca puraḥ sthitaṃ bhaktavaśyaṃ dayālum

श्रीवत्स के चिह्न से युक्त, गले में सुशोभित कौस्तुभमणि धारण किये, अत्यन्त प्रसन्न और स्नेहसिक्त दृष्टि से देखते हुए — भक्तवश्य, दयालु नारायण हरि को अपने सम्मुख खड़ा देखकर ब्रह्मा ने...

श्लोक 14 (garuda.2.61.14)

समर्चयामास महाविभूत्या भक्त्या हरेः पादतीर्थं दधार । अस्तौन्महाभागवतप्रधानो हरिं गुरुं भक्तिविवर्धितात्मा

samarcayāmāsa mahāvibhūtyā bhaktyā hareḥ pādatīrthaṃ dadhāra | astaunmahābhāgavatapradhāno hariṃ guruṃ bhaktivivardhitātmā

...महाविभूति के साथ पूजा की और भक्तिपूर्वक हरि के चरणतीर्थ को धारण किया। महाभागवतों में प्रधान, भक्ति से उमड़े हुए हृदय वाले ब्रह्मा ने अपने गुरु हरि की स्तुति की।

श्लोक 15 (garuda.2.61.15)

ब्रह्मोवाच । रमेश लोकेश जगन्निवास तव स्वरूपं न विजानाति देवी । तव प्रसादात्सुविजानाति देवी गुणान्वेदोक्तान्सर्वदा वीन्द्र सर्वान्

brahmovāca | rameśa lokeśa jagannivāsa tava svarūpaṃ na vijānāti devī | tava prasādātsuvijānāti devī guṇānvedoktānsarvadā vīndra sarvān

ब्रह्मा ने कहा — हे रमेश! हे लोकेश! हे जगन्निवास! देवी लक्ष्मी भी आपके स्वरूप को पूर्णतः नहीं जानतीं; परन्तु हे खगेन्द्र, आपकी कृपा से देवी वेदोक्त समस्त गुणों को सदा भलीभाँति जानती हैं।

श्लोक 16 (garuda.2.61.16)

तथापि सा न विजानाति देवी साकल्येनाशेषितः सद्गुणांश्च । यद्यप्यनुक्तं पञ्चभिर्नास्ति वेदैस्तथापि देवेऽत्र विशेष आस्ते

tathāpi sā na vijānāti devī sākalyenāśeṣitaḥ sadguṇāṃśca | yadyapyanuktaṃ pañcabhirnāsti vedaistathāpi deve'tra viśeṣa āste

फिर भी देवी लक्ष्मी सभी सद्गुणों को समग्र रूप से, पूर्णतया नहीं जानतीं। यद्यपि पाँचों वेदों में कुछ भी अनुक्त (अकथित) नहीं है, तथापि हे देव! इसमें भी एक विशेषता है।

श्लोक 17 (garuda.2.61.17)

तत्त्वेच्छवः प्रविजानन्ति नित्यं वेदे सूक्तान्क्वाप्यनुक्तांश्च सर्वान् । आदौ जानन्त्यत्र वेदा मुरारे ऋगादयः सुष्ठु चत्वार एव

tattvecchavaḥ pravijānanti nityaṃ vede sūktānkvāpyanuktāṃśca sarvān | ādau jānantyatra vedā murāre ṛgādayaḥ suṣṭhu catvāra eva

हे मुरारे! तत्त्व की इच्छा रखने वाले साधक वेद में कहे गये और कहीं भी अकथित सभी गुणों को सदा भलीभाँति जान लेते हैं। सर्वप्रथम ऋग्वेद आदि चारों वेद ही इसे भलीभाँति जानते हैं।

श्लोक 18 (garuda.2.61.18)

वेदा ह्येते वेदयन्तीति देव तथा पुराणं भारतं पञ्चरात्रम् । क्रमादितो विचिन्त्य सा विष्णुगुणान्स्वयोग्यान्सदा विजानाति रमापि देवी

vedā hyete vedayantīti deva tathā purāṇaṃ bhārataṃ pañcarātram | kramādito vicintya sā viṣṇuguṇānsvayogyānsadā vijānāti ramāpi devī

हे देव! ये वेद ही इस प्रकार बतलाते हैं, तथा पुराण, महाभारत और पञ्चरात्र भी। इन्हें क्रमशः विचार कर देवी रमा (लक्ष्मी) भी अपनी योग्यता के अनुसार विष्णु के गुणों को सदा जानती हैं।

श्लोक 19 (garuda.2.61.19)

विशेषतो ह्युक्तगुणा नृगादिषु स्वयोग्यभूतान्संविजानाति देवी । सामान्यतः प्रविजानाति देवी हरेर्गुणान्न विशेषाच्च नित्यम्

viśeṣato hyuktaguṇā nṛgādiṣu svayogyabhūtānsaṃvijānāti devī | sāmānyataḥ pravijānāti devī harerguṇānna viśeṣācca nityam

नृग आदि की कथाओं में विशेष रूप से कहे गये, अपनी योग्यता के अनुरूप गुणों को देवी भलीभाँति जानती हैं। सामान्यतः देवी हरि के गुणों को जानती हैं, किन्तु सदा उनकी पूर्ण विशेषता से नहीं।

श्लोक 20 (garuda.2.61.20)

अहं विजानामि रमाप्रसादात्तव प्रसादाच्च गुणान्सदैव । स्वयोग्यभूताञ्छ्रुतिषूक्तान् गुणांश्च कांश्चिद्विजानाति हरेर्न कश्चित्

ahaṃ vijānāmi ramāprasādāttava prasādācca guṇānsadaiva | svayogyabhūtāñchrutiṣūktān guṇāṃśca kāṃścidvijānāti harerna kaścit

मैं रमा की कृपा से और आपकी कृपा से ही सदा उन गुणों को जानता हूँ, जो श्रुतियों में कहे गये हैं और मेरी योग्यता के अनुरूप हैं। हरि के कुछ गुण तो ऐसे हैं जिन्हें कोई भी नहीं जानता।

श्लोक 21 (garuda.2.61.21)

तव प्रसादाच्च मम प्रसादात्कालान्तरे तांश्च जानाति शेषः । दुष्कर्मलेशान्न तिरोहितान् गुणान्यानेव पूर्वं विदितान् स्वयोग्यान्

tava prasādācca mama prasādātkālāntare tāṃśca jānāti śeṣaḥ | duṣkarmaleśānna tirohitān guṇānyāneva pūrvaṃ viditān svayogyān

आपकी कृपा से और मेरी कृपा से शेषनाग भी कालान्तर में उन गुणों को जान लेते हैं। यह अज्ञान किसी दुष्कर्म-लेश के कारण छिपा हुआ नहीं होता, अपितु जो योग्यता के अनुरूप गुण पहले से ज्ञात थे, वे ही क्रमशः और स्पष्ट होते जाते हैं।

श्लोक 22 (garuda.2.61.22)

तानेव ज्ञात्वा पुनरेव शेषस्तिरो हितांल्लब्धगुणस्ततः स्मृतः । सदा स्वयोग्यांश्च हरेर्गुणांश्च उमापतिश्चापि तव प्रसादात्

tāneva jñātvā punareva śeṣastiro hitāṃllabdhaguṇastataḥ smṛtaḥ | sadā svayogyāṃśca harerguṇāṃśca umāpatiścāpi tava prasādāt

उन्हीं गुणों को पुनः जानकर, पूर्व में छिपे हुए गुणों को प्राप्त कर लेने पर, शेषनाग तत्पश्चात् अधिक ज्ञानसम्पन्न कहलाते हैं। और हे प्रभो! आपकी कृपा से उमापति शिव भी सदा अपनी योग्यता के अनुरूप हरि के गुणों को जानते हैं।

श्लोक 23 (garuda.2.61.23)

यदा विजानाति हरे मुरारे अप्राप्तलब्धेति तदोच्यते हरः । ममापि लोकं च यदा मुरारे तदा विजानाति तव स्वरूपम्

yadā vijānāti hare murāre aprāptalabdheti tadocyate haraḥ | mamāpi lokaṃ ca yadā murāre tadā vijānāti tava svarūpam

हे हरि मुरारे! जब वे पहले अप्राप्त गुणों को प्राप्त कर लेते हैं, तभी वे 'हर' कहलाते हैं। और हे मुरारे! जब वे मेरे लोक को भी जान लेते हैं, तभी वे आपके स्वरूप को उस सीमा तक जान पाते हैं।

श्लोक 24 (garuda.2.61.24)

गोविन्द नित्याव्यय चित्सुपूर्ण तव प्रसादान्नास्ति शतेषु तन्मम। येये हि देवाश्च शरीरधारिणस्ते ज्ञानहीना विषयेषु निष्ठाः

govinda nityāvyaya citsupūrṇa tava prasādānnāsti śateṣu tanmama| yeye hi devāśca śarīradhāriṇaste jñānahīnā viṣayeṣu niṣṭhāḥ

हे गोविन्द! हे नित्य, अव्यय, चित्स्वरूप से परिपूर्ण प्रभो! आपकी कृपा से मुझमें वह अज्ञान सौवें अंश में भी नहीं है। जो भी देवता शरीरधारी हैं, वे ज्ञानहीन होकर विषयों में ही लगे रहते हैं।

श्लोक 25 (garuda.2.61.25)

येये देवा विषयेषु निष्ठास्तेते देवा बहिरर्थभावाः । येये देवा बहिरर्थभावा मोक्षादन्ये प्रलपन्तः सदैव

yeye devā viṣayeṣu niṣṭhāstete devā bahirarthabhāvāḥ | yeye devā bahirarthabhāvā mokṣādanye pralapantaḥ sadaiva

जो देवता विषयों में आसक्त हैं, वे बाह्य पदार्थों में ही अपना अस्तित्व मानने वाले हैं। जो देवता बाह्य पदार्थ-भाव वाले हैं, वे मोक्ष से भिन्न होकर सदा व्यर्थ प्रलाप करते रहते हैं।

श्लोक 26 (garuda.2.61.26)

तव स्वरूपे च जगत्स्वरूपे तवासमानं नास्ति विष्णो सदैव । यतस्तव प्राकृतो नास्ति देहो यतो ज्ञानं नास्ति नास्त्येव नित्यम्

tava svarūpe ca jagatsvarūpe tavāsamānaṃ nāsti viṣṇo sadaiva | yatastava prākṛto nāsti deho yato jñānaṃ nāsti nāstyeva nityam

हे विष्णो! आपके स्वरूप में और जगत् के स्वरूप में आपके समान कुछ भी नहीं है, आप ही सर्वत्र व्याप्त हैं। क्योंकि आपका शरीर प्राकृत (भौतिक) नहीं है, इसीलिए आपमें अज्ञान का सर्वथा अभाव है।

श्लोक 27 (garuda.2.61.27)

पूर्णानन्दज्ञानदेहोऽपि नित्यं सदा शरीरी भाष्यते भक्तिमद्भिः । यतस्तव प्राकृतो नास्ति देहो ह्यतोपि नित्यमशरीरीति च स्मृतः

pūrṇānandajñānadeho'pi nityaṃ sadā śarīrī bhāṣyate bhaktimadbhiḥ | yatastava prākṛto nāsti deho hyatopi nityamaśarīrīti ca smṛtaḥ

यद्यपि आपका शरीर सदा पूर्ण आनन्द और ज्ञान से युक्त है, फिर भी भक्तजन आपको सदा 'शरीरी' कहकर पुकारते हैं। किन्तु चूँकि आपका शरीर प्राकृत नहीं है, इसीलिए आप सदा 'अशरीरी' भी कहे जाते हैं।

श्लोक 28 (garuda.2.61.28)

नतोऽहं सर्वदास्मिञ्शरीरेऽहंममेत्यभिमानेन शून्यः । अत्तोऽप्यहं त्वशरीरी सदैव तथैव नित्यं बहिरर्थैश्च शून्यः

nato'haṃ sarvadāsmiñśarīre'haṃmametyabhimānena śūnyaḥ | atto'pyahaṃ tvaśarīrī sadaiva tathaiva nityaṃ bahirarthaiśca śūnyaḥ

मैं सदा नमस्कार करता हूँ; इस शरीर में मैं 'मैं' और 'मेरा' के अभिमान से सर्वथा रहित हूँ। यद्यपि मैं भोग करता हूँ, फिर भी मैं सदा अशरीरी ही हूँ, और उसी प्रकार सदा बाह्य पदार्थों की आसक्ति से भी रहित हूँ।

श्लोक 29 (garuda.2.61.29)

स्वभोगभार्यासत्यलोकादिभोगः स्वयोग्यभोगो वस्त्रमाल्यादिभोगः । एते हि सर्वे बहिरर्थसंज्ञकाः नैसर्गकामाः सर्वदा मे हि विष्णो

svabhogabhāryāsatyalokādibhogaḥ svayogyabhogo vastramālyādibhogaḥ | ete hi sarve bahirarthasaṃjñakāḥ naisargakāmāḥ sarvadā me hi viṣṇo

अपनी पत्नी का भोग, सत्यलोक आदि का भोग, अपनी योग्यता के अनुरूप भोग, वस्त्र-माला आदि का भोग — ये सब 'बाह्य पदार्थ' कहलाते हैं। किन्तु हे विष्णो! ये मेरे लिए सदा स्वाभाविक, सहज कर्तव्यरूप भोग हैं, वासनाजनित नहीं।

श्लोक 30 (garuda.2.61.30)

तथाप्यहं कामहीनो हि नित्यं रुद्रादयः कामवन्तो यतोतः । शरीरिणस्ते बहिरर्थभावा अज्ञानवन्तोऽपि च संस्मृताः खग

tathāpyahaṃ kāmahīno hi nityaṃ rudrādayaḥ kāmavanto yatotaḥ | śarīriṇaste bahirarthabhāvā ajñānavanto'pi ca saṃsmṛtāḥ khaga

फिर भी मैं सदा कामरहित ही हूँ, जबकि रुद्र आदि कामयुक्त हैं। इसीलिए हे खग! शरीरधारी और बाह्य पदार्थों में आसक्त वे देवता कुछ अज्ञानयुक्त भी माने गये हैं।

श्लोक 31 (garuda.2.61.31)

स्वदारभोगे केवलां प्रीतिमेवं हरेरेवं सर्वदाहं करोति । स्तम्बास्त्रादीन्धारियिष्ये सदैव विष्णोः प्रीत्यर्थं नैव गात्रार्थमेव

svadārabhoge kevalāṃ prītimevaṃ harerevaṃ sarvadāhaṃ karoti | stambāstrādīndhāriyiṣye sadaiva viṣṇoḥ prītyarthaṃ naiva gātrārthameva

पत्नी के भोग में भी मेरी प्रीति केवल हरि के प्रति ही होती है, मैं सदा ऐसा ही करता हूँ। मैं कुशा, अस्त्र आदि को सदा इसलिए धारण करूँगा कि यह विष्णु की प्रसन्नता के लिए हो, कदापि शरीर के भोग के लिए नहीं।

श्लोक 32 (garuda.2.61.32)

नित्यानन्दादन्यकामो न मेस्ति अतः सदा बहिरर्थैश्च शून्यः । ममापि भार्या बहिरर्थशून्या अमूढभावा मूढवतीव दृश्यते

nityānandādanyakāmo na mesti ataḥ sadā bahirarthaiśca śūnyaḥ | mamāpi bhāryā bahirarthaśūnyā amūḍhabhāvā mūḍhavatīva dṛśyate

नित्य आनन्द के अतिरिक्त मेरी कोई अन्य कामना नहीं है, इसीलिए मैं सदा बाह्य पदार्थों की आसक्ति से रहित हूँ। मेरी पत्नी सरस्वती भी बाह्य पदार्थों से शून्य हैं; वे मूढ़भाव से रहित होते हुए भी मूढ़ के समान प्रतीत होती हैं।

श्लोक 33 (garuda.2.61.33)

अमूढभूता ज्ञानिनां सर्वदैव तथाज्ञानां ज्ञानहीनेति भाति । यावज्ज्ञानं चास्ति मे वास्तुदेव तावज्ज्ञानं वासुदेवस्य चास्ति

amūḍhabhūtā jñānināṃ sarvadaiva tathājñānāṃ jñānahīneti bhāti | yāvajjñānaṃ cāsti me vāstudeva tāvajjñānaṃ vāsudevasya cāsti

यह भाव ज्ञानियों को सदा अमूढ़ ही जान पड़ता है, किन्तु अज्ञानियों को ज्ञानहीन-सा प्रतीत होता है। हे वासुदेव! जितना ज्ञान मुझमें है, उतना ही ज्ञान आपके वासुदेव-स्वरूप के विषय में है, न कि आपके अपार, अगम्य स्वरूप के विषय में।

श्लोक 34 (garuda.2.61.34)

यावज्ज्ञानं वासुदेवस्य चास्ति तावज्ज्ञानं ज्ञानवतामृजूनाम् । क्रमेणैवाज्ञानिनां वानृजूनामस्पष्टरूपो ज्ञानगतो विशेषः

yāvajjñānaṃ vāsudevasya cāsti tāvajjñānaṃ jñānavatāmṛjūnām | krameṇaivājñānināṃ vānṛjūnāmaspaṣṭarūpo jñānagato viśeṣaḥ

जितना ज्ञान आपके वासुदेव-स्वरूप के विषय में है, उतना ही ज्ञान ज्ञानवान् और सरल (ऋजु) जनों को होता है। किन्तु अज्ञानियों तथा कुटिल जनों में यह ज्ञान क्रमशः अस्पष्ट होता जाता है, और उसमें तरतमता रहती है।

श्लोक 35 (garuda.2.61.35)

सौरिप्रकाशे च यथैव दर्शनं तथा मम ज्ञानगतो विशेषः । दीपप्रकाशे च यथैव दर्शनं तथा ज्ञानं वासुदेवस्य चास्ति

sauriprakāśe ca yathaiva darśanaṃ tathā mama jñānagato viśeṣaḥ | dīpaprakāśe ca yathaiva darśanaṃ tathā jñānaṃ vāsudevasya cāsti

जैसे सूर्य के प्रकाश में दर्शन होता है, वैसा ही मेरे ज्ञान का विशेष स्तर है। और जैसे दीपक के प्रकाश में दर्शन होता है, वैसा ही अन्य जनों का वासुदेव-विषयक ज्ञान है।

श्लोक 36 (garuda.2.61.36)

अस्पष्टपरूपा न्यूनता ह्यस्ति वायौ तथा ज्ञानं नैव संचिन्तनीयम् । एतादृशी ज्ञानशक्तिर्मुरारेर्वाय्वादीनां मोक्षपर्यन्तमस्ति

aspaṣṭaparūpā nyūnatā hyasti vāyau tathā jñānaṃ naiva saṃcintanīyam | etādṛśī jñānaśaktirmurārervāyvādīnāṃ mokṣaparyantamasti

वायु में भी कुछ न्यूनता है, जो अस्पष्ट रूप में है, परन्तु उसे ज्ञान में कोई दोष नहीं मानना चाहिए। मुरारि के विषय में वायु आदि की ऐसी ही ज्ञानशक्ति मोक्षपर्यन्त बनी रहती है।

श्लोक 37 (garuda.2.61.37)

ज्ञानं त्वृजूनां मोक्षकालेपि पञ्चवाय्वादीनां प्रलयेनाद्रादीर्न । वायोर्मम प्रलये सृष्टिकाले तथा गायत्र्या नास्तिनास्त्येव मोहः

jñānaṃ tvṛjūnāṃ mokṣakālepi pañcavāyvādīnāṃ pralayenādrādīrna | vāyormama pralaye sṛṣṭikāle tathā gāyatryā nāstināstyeva mohaḥ

सरल जनों का ज्ञान मोक्षकाल में भी, और प्रलय के समय भी पञ्चवायु आदि का ज्ञान घटता नहीं। वायु का और मेरा, प्रलय और सृष्टि के समय भी, तथा गायत्री का भी, कभी किञ्चित् मोह नहीं होता।

श्लोक 38 (garuda.2.61.38)

गायत्रीवद्भारत्या देवदेव ज्ञातव्यमेवं हरितत्त्ववेदिभिः । ममाज्ञानं दृश्यते यत्र कुत्र दैत्यादीनां मोहनार्थ सदैव

gāyatrīvadbhāratyā devadeva jñātavyamevaṃ haritattvavedibhiḥ | mamājñānaṃ dṛśyate yatra kutra daityādīnāṃ mohanārtha sadaiva

हे देवदेव! जैसे गायत्री के विषय में, वैसे ही भारती (सरस्वती) के विषय में भी हरितत्त्व के ज्ञाता जनों को यह जानना चाहिए। जहाँ कहीं भी मुझमें अज्ञान दिखाई देता है, वह सदा दैत्यादि को मोहित करने के लिए ही है।

श्लोक 39 (garuda.2.61.39)

तेन प्रीतिर्देवदेवस्य विष्णोर्भविष्यतीत्येव विनिश्चितात्मा । प्रश्रादिकं त्वज्ञवत्सर्वदैवं करिष्येहं मोहनायाधमानाम्

tena prītirdevadevasya viṣṇorbhaviṣyatītyeva viniścitātmā | praśrādikaṃ tvajñavatsarvadaivaṃ kariṣyehaṃ mohanāyādhamānām

उससे देवाधिदेव विष्णु की प्रसन्नता ही होगी — ऐसा दृढ़ निश्चय करके, मैं सदा अज्ञानी के समान विनयादि व्यवहार करूँगा, अधम दैत्यों को मोहित करने के लिए।

श्लोक 40 (garuda.2.61.40)

सूर्योदये नास्ति यथा तमश्च तथाज्ञानं नास्तिनास्त्येव देव । करोम्यहं श्रवणं सर्वदैव हरिप्रीत्यर्थं निश्चतार्थं सतां हि

sūryodaye nāsti yathā tamaśca tathājñānaṃ nāstināstyeva deva | karomyahaṃ śravaṇaṃ sarvadaiva hariprītyarthaṃ niścatārthaṃ satāṃ hi

जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार नहीं रहता, वैसे ही हे देव! मुझमें वास्तविक अज्ञान कभी नहीं है। मैं सदा हरि की प्रसन्नता के लिए तथा सज्जनों के हित हेतु निश्चित उद्देश्य से श्रवण-कीर्तनादि करता हूँ।

श्लोक 41 (garuda.2.61.41)

शतजन्मगतानां त्वनृजूनां पूर्वमेव तु । अपरोक्षाभाव एव ह्यज्ञानं समुदीरितम्

śatajanmagatānāṃ tvanṛjūnāṃ pūrvameva tu | aparokṣābhāva eva hyajñānaṃ samudīritam

सौ जन्मों तक रहने वाले कुटिल (अनृजु) जनों के लिए तो प्रारम्भ में ही अपरोक्ष-ज्ञान का अभाव ही 'अज्ञान' कहा गया है।

श्लोक 42 (garuda.2.61.42)

अपरोक्षानन्तरं तु नास्त्यज्ञानं न संशयः । शतजन्मसु देवेश अपरोक्षेण सर्वदा

aparokṣānantaraṃ tu nāstyajñānaṃ na saṃśayaḥ | śatajanmasu deveśa aparokṣeṇa sarvadā

किन्तु अपरोक्ष-ज्ञान होने के पश्चात् अज्ञान नहीं रहता, इसमें कोई सन्देह नहीं। हे देवेश! सौ जन्मों में सदा अपरोक्ष-ज्ञान के द्वारा ही मुझे ज्ञान प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (garuda.2.61.43)

पूर्णज्ञानं ममास्त्येव नात्र कार्या विचारणा । शतजन्मसु पूर्वं तु परोक्षेण मम प्रभो

pūrṇajñānaṃ mamāstyeva nātra kāryā vicāraṇā | śatajanmasu pūrvaṃ tu parokṣeṇa mama prabho

मुझमें पूर्ण ज्ञान है ही, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। किन्तु हे प्रभो! उन सौ जन्मों में पहले तो मुझे यह ज्ञान परोक्ष रूप से ही प्राप्त था।

श्लोक 44 (garuda.2.61.44)

पूर्णं ज्ञानं सदाप्यस्तीत्येवमाहुर्महर्षयः । संज्ञाजन्मगतायाश्च सरस्वत्या महाप्रभो

pūrṇaṃ jñānaṃ sadāpyastītyevamāhurmaharṣayaḥ | saṃjñājanmagatāyāśca sarasvatyā mahāprabho

'ब्रह्मा में सदा पूर्ण ज्ञान है' — ऐसा महर्षिजन कहते हैं। हे महाप्रभो! विभिन्न नामों से जन्म लेने वाली सरस्वती के विषय में भी यही बात है।

श्लोक 45 (garuda.2.61.45)

नाज्ञानं चिन्तनीयं हि ब्रह्माय्वोश्च देव हि । अत्र कश्चिद्विशेषोस्ति ज्ञातव्यस्तत्वमिच्छुभिः

nājñānaṃ cintanīyaṃ hi brahmāyvośca deva hi | atra kaścidviśeṣosti jñātavyastatvamicchubhiḥ

हे देव! ब्रह्मा और वायु में अज्ञान कदापि नहीं मानना चाहिए। तथापि इसमें कोई विशेषता है, जिसे तत्त्व के जिज्ञासुओं को अवश्य जानना चाहिए।

श्लोक 46 (garuda.2.61.46)

अवतारेषु भारत्याः कदाचिज्ज्ञानपूर्वकम् । सर्वदा ज्ञानरूपा सा सर्वदुःखविवर्जिता

avatāreṣu bhāratyāḥ kadācijjñānapūrvakam | sarvadā jñānarūpā sā sarvaduḥkhavivarjitā

भारती के अवतारों में कभी-कभी ज्ञानपूर्वक जानबूझकर अज्ञान का आभास कराया जाता है, किन्तु वे सदा ज्ञानस्वरूपा हैं और सम्पूर्ण दुःखों से रहित हैं।

श्लोक 47 (garuda.2.61.47)

दैत्यानां मोहनार्थाय अंशे दुःखीव दृश्यते । तस्या दुःखादिकं किञ्चिन्नास्तिनास्त्येव सर्वथा

daityānāṃ mohanārthāya aṃśe duḥkhīva dṛśyate | tasyā duḥkhādikaṃ kiñcinnāstināstyeva sarvathā

दैत्यों को मोहित करने के लिए अपने अंश-रूप में वे दुःखी-सी प्रतीत होती हैं। किन्तु उनमें दुःख आदि कुछ भी नहीं है, सर्वथा नहीं है।

श्लोक 48 (garuda.2.61.48)

अपरोक्षतिरोभाव ईषत्काले प्रदृश्यते । तावन्मात्रेण वाज्ञानं तस्यां नैवाहितं च यत्

aparokṣatirobhāva īṣatkāle pradṛśyate | tāvanmātreṇa vājñānaṃ tasyāṃ naivāhitaṃ ca yat

उनमें क्षणभर के लिए अपरोक्ष-ज्ञान का आभासी तिरोभाव दिखाई देता है, परन्तु इतने मात्र से उनमें कोई वास्तविक अज्ञान स्थापित नहीं होता।

श्लोक 49 (garuda.2.61.49)

मूलरूपे तु नास्त्येव भारत्या ज्ञानविस्मृतिः । भारत्यास्तु यथा नास्ति सरस्वत्यास्तु किं पुनः

mūlarūpe tu nāstyeva bhāratyā jñānavismṛtiḥ | bhāratyāstu yathā nāsti sarasvatyāstu kiṃ punaḥ

भारती के मूल स्वरूप में तो ज्ञान की विस्मृति कदापि नहीं है। और जब भारती में ही यह नहीं है, तो सरस्वती में तो और भी कैसे हो सकती है?

श्लोक 50 (garuda.2.61.50)

अंशावतरणं नास्ति सरस्वत्याः कदाचन । अंशावतरणं नास्ति ममापि मधुसूदन

aṃśāvataraṇaṃ nāsti sarasvatyāḥ kadācana | aṃśāvataraṇaṃ nāsti mamāpi madhusūdana

सरस्वती का कभी भी अंशावतरण (आंशिक अवतार) नहीं होता। हे मधुसूदन! मेरा भी अंशावतरण कभी नहीं होता।

श्लोक 51 (garuda.2.61.51)

तथैव ज्ञानमस्त्येव हरेर्नारायणस्य च । वायोरंशावतारोस्ति यथा मूले तथैव च

tathaiva jñānamastyeva harernārāyaṇasya ca | vāyoraṃśāvatārosti yathā mūle tathaiva ca

उसी प्रकार हरि नारायण के विषय में पूर्ण ज्ञान विद्यमान रहता है। किन्तु वायु के अंशावतार होते हैं — जैसे मूल रूप में, वैसे ही अवतार रूप में भी उनका ज्ञान बना रहता है।

श्लोक 52 (garuda.2.61.52)

बलज्ञानादिकं सर्वं चिन्तनीयं न संशयः । तथापि वायौ दृश्यन्ते बलज्ञानादिव्यक्तयः

balajñānādikaṃ sarvaṃ cintanīyaṃ na saṃśayaḥ | tathāpi vāyau dṛśyante balajñānādivyaktayaḥ

बल-ज्ञान आदि सब कुछ वायु में पूर्ण रूप से विचारणीय है, इसमें सन्देह नहीं। फिर भी वायु में बल-ज्ञान आदि की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं।

श्लोक 53 (garuda.2.61.53)

अवतारेषु वायोस्तु सम्यक्शक्त्यात्मनास्ति हि । अपरोक्षतिरोभावौ नांशावतरणेष्वपि

avatāreṣu vāyostu samyakśaktyātmanāsti hi | aparokṣatirobhāvau nāṃśāvataraṇeṣvapi

वायु के अवतारों में उनकी शक्ति स्वरूपतः सम्यक् (पूर्ण) ही विद्यमान रहती है। उनके अंशावतारों में भी अपरोक्ष-ज्ञान का तिरोभाव नहीं होता।

श्लोक 54 (garuda.2.61.54)

बलज्ञानादिकं यावन्मूलरूपे प्रदृश्यते । त्रेतायुगस्वरूपे च न दर्शयति तादृशम्

balajñānādikaṃ yāvanmūlarūpe pradṛśyate | tretāyugasvarūpe ca na darśayati tādṛśam

वायु के मूल रूप में जितना बल-ज्ञान आदि प्रदर्शित होता है, त्रेतायुग के स्वरूप में वे उतना नहीं दिखाते।

श्लोक 55 (garuda.2.61.55)

त्रेतायुगस्वरूपे च यादृक्चादर्शयत्प्रभो । द्वापरस्थे स्वरूपे तत्तद्दर्शयति तादृशम् । त्रेतायुगस्वरूपे च यादृक्चादर्शयत्प्रभो

tretāyugasvarūpe ca yādṛkcādarśayatprabho | dvāparasthe svarūpe tattaddarśayati tādṛśam | tretāyugasvarūpe ca yādṛkcādarśayatprabho

हे प्रभो! त्रेतायुग के स्वरूप में उन्होंने जैसा प्रदर्शित किया था, द्वापरयुग के स्वरूप में भी वे उतना ही प्रदर्शित करते हैं।

श्लोक 56 (garuda.2.61.56)

द्वापरस्थे वायुरूपे यादृग्वा दर्शयत्प्रभुः । वायुः कलियुगे रूपे तद्दर्शयति तादृशम्

dvāparasthe vāyurūpe yādṛgvā darśayatprabhuḥ | vāyuḥ kaliyuge rūpe taddarśayati tādṛśam

द्वापरयुग के वायु-स्वरूप में प्रभु ने जैसा प्रदर्शित किया, कलियुग के स्वरूप में भी वायु उतना ही प्रदर्शित करते हैं।

श्लोक 57 (garuda.2.61.57)

तथा दर्शयते वायुर्दैत्यानां मोहनाय च । अवतारेषु वायोश्च अन्तरं ये विदुः प्रभो

tathā darśayate vāyurdaityānāṃ mohanāya ca | avatāreṣu vāyośca antaraṃ ye viduḥ prabho

इस प्रकार वायु दैत्यों को मोहित करने के लिए ही ऐसा क्रमिक प्रदर्शन करते हैं। हे प्रभो! जो लोग वायु के अवतारों में इस अन्तर के वास्तविक रहस्य को जानते हैं...

श्लोक 58 (garuda.2.61.58)

तेऽधं तमः प्रविशन्ते ते दैत्या न च ते सुराः । वायावप्यन्तरं नास्ति हरितत्त्वविनिर्णये

te'dhaṃ tamaḥ praviśante te daityā na ca te surāḥ | vāyāvapyantaraṃ nāsti haritattvavinirṇaye

...और उसे वास्तविक न्यूनता मान बैठते हैं, वे अधोगामी होकर घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं; वे दैत्य ही हैं, देव नहीं। हरितत्त्व के सम्यक् निर्णय में वायु में भी कोई वास्तविक अन्तर नहीं है।

श्लोक 59 (garuda.2.61.59)

निन्दां कुर्वन्ति ये विष्णोर्जिह्वाछेदं करोम्यहम् । तदर्थमेव वायोश्च अवतारः सदा भुवि

nindāṃ kurvanti ye viṣṇorjihvāchedaṃ karomyaham | tadarthameva vāyośca avatāraḥ sadā bhuvi

जो लोग विष्णु की निन्दा करते हैं, मैं उनकी जिह्वा काट दूँगा। इसी प्रयोजन के लिए वायु का पृथ्वी पर सदा अवतार होता है।

श्लोक 60 (garuda.2.61.60)

गुणपूर्णस्य विष्णोस्तु निर्गुणत्वविचिन्तनम् । जातानन्दादिपूर्णाङ्ख्यं सोहमित्यादिचिन्तनम्

guṇapūrṇasya viṣṇostu nirguṇatvavicintanam | jātānandādipūrṇāṅkhyaṃ sohamityādicintanam

गुणों से परिपूर्ण विष्णु को निर्गुण (गुणरहित) मानने का चिन्तन करना, तथा नवीन आनन्दादि से पूर्ण हुए मुक्त जीव को 'मैं ही वह हूँ' (सोऽहम्) इत्यादि मानकर विचार करना —

श्लोक 61 (garuda.2.61.61)

चिदानन्दात्मके देहे उत्पत्त्यादिविचिन्तनम् । अच्छेद्याभेद्यगात्रेषु च्छेदभेदादिचिन्तनम्

cidānandātmake dehe utpattyādivicintanam | acchedyābhedyagātreṣu cchedabhedādicintanam

चिदानन्दस्वरूप शरीर में उत्पत्ति आदि की कल्पना करना, तथा अच्छेद्य और अभेद्य अंगों में छेदन-भेदन आदि का चिन्तन करना —

श्लोक 62 (garuda.2.61.62)

देव्या नित्यावियोगिन्या वियोगादिविचिन्तनम् । क्लेशशोकादिशून्यस्य हरेः क्लेशादिचिन्तनम्

devyā nityāviyoginyā viyogādivicintanam | kleśaśokādiśūnyasya hareḥ kleśādicintanam

नित्य अवियोगिनी देवी लक्ष्मी में वियोग आदि की कल्पना करना, तथा क्लेश-शोकादि से रहित हरि में क्लेश आदि का चिन्तन करना —

श्लोक 63 (garuda.2.61.63)

व्यासरामादिरूपेष्वनृषिविप्रत्वचिन्तनम् । कृष्णरामादिरूपेषु अन्तरस्य विचिन्तनम्

vyāsarāmādirūpeṣvanṛṣivipratvacintanam | kṛṣṇarāmādirūpeṣu antarasya vicintanam

व्यास, राम आदि रूपों को अऋषि अथवा अब्राह्मण मानने का चिन्तन करना, तथा कृष्ण-राम आदि रूपों में परस्पर भेद अथवा न्यूनाधिकता का चिन्तन करना —

श्लोक 64 (garuda.2.61.64)

रामकृष्णादिरूपेषु अन्तरस्य विचिन्तनम् । रामकृष्णादिरूपेषु पराजयविचिन्तनम्

rāmakṛṣṇādirūpeṣu antarasya vicintanam | rāmakṛṣṇādirūpeṣu parājayavicintanam

राम-कृष्ण आदि रूपों में परस्पर भेद का चिन्तन करना, तथा राम-कृष्ण आदि रूपों की पराजय की कल्पना करना —

श्लोक 65 (garuda.2.61.65)

सन्तानार्थं तु कृष्णे न शिवपूजादिचिन्तनम् । रामेण दुः खयुक्तेन लिङ्गस्य स्थापनं कृतम्

santānārthaṃ tu kṛṣṇe na śivapūjādicintanam | rāmeṇa duḥ khayuktena liṅgasya sthāpanaṃ kṛtam

कृष्ण ने सन्तान-प्राप्ति के लिए शिवपूजा आदि की — ऐसा चिन्तन करना, तथा राम ने दुःखयुक्त होकर लिंग की स्थापना की — ऐसा मानना —

श्लोक 66 (garuda.2.61.66)

पञ्चधातुमये कृष्णे हरिरूपविचिन्तनम् । स्वयं व्यक्तस्थले चापि चिदानन्दत्वकल्पनम्

pañcadhātumaye kṛṣṇe harirūpavicintanam | svayaṃ vyaktasthale cāpi cidānandatvakalpanam

पंचधातु से निर्मित कृष्ण-प्रतिमा को मात्र धातु मानकर उसमें हरि के स्वरूप का चिन्तन न करना, तथा जो स्वयं-व्यक्त स्थल नहीं है, वहाँ भी चिदानन्दत्व की कल्पना करना —

श्लोक 67 (garuda.2.61.67)

पितृमातृद्विजातीनां हरिरूपत्वचिन्तनम् । अस्वतन्त्रेण रुद्रेण हरेरैक्यदिचिन्तनम्

pitṛmātṛdvijātīnāṃ harirūpatvacintanam | asvatantreṇa rudreṇa hareraikyadicintanam

पिता-माता तथा ब्राह्मणों को साक्षात् हरिरूप मान लेना, तथा अस्वतन्त्र (परतन्त्र) रुद्र के साथ हरि की एकता आदि का चिन्तन करना —

श्लोक 68 (garuda.2.61.68)

विष्णोः सूर्येण साकं च अभेदा दिविचिन्तनम् । सर्वोत्तमः सूर्य एव विष्ण्वाद्यास्तस्य किङ्कराः

viṣṇoḥ sūryeṇa sākaṃ ca abhedā divicintanam | sarvottamaḥ sūrya eva viṣṇvādyāstasya kiṅkarāḥ

विष्णु और सूर्य में अभेद आदि का चिन्तन करना, तथा सूर्य को ही सर्वोत्तम मानकर विष्णु आदि को उसका सेवक मानना —

श्लोक 69 (garuda.2.61.69)

इत्यादिचिन्तनं दोषो हरिनिन्देति चोच्यते । अस्वयं व्यक्तिलिङ्गेषु अश्वत्थतुलसीषु च

ityādicintanaṃ doṣo harinindeti cocyate | asvayaṃ vyaktiliṅgeṣu aśvatthatulasīṣu ca

इस प्रकार का चिन्तन दोषरूप है और 'हरि-निन्दा' कहलाता है। इसी प्रकार अस्वयंव्यक्त लिंगों में, तथा अश्वत्थ और तुलसी में...

श्लोक 70 (garuda.2.61.70)

शालग्रामं विहायैव नमनं ये प्रकुर्वते । ते सर्वे हरिनिन्दायामविकारिण एव हि

śālagrāmaṃ vihāyaiva namanaṃ ye prakurvate | te sarve harinindāyāmavikāriṇa eva hi

...जो लोग शालग्राम की उपेक्षा करके ही उन्हें नमस्कार करते हैं, वे सभी निश्चय ही हरि-निन्दा में स्थिर लिप्त माने जाते हैं।

श्लोक 71 (garuda.2.61.71)

मोक्षाधिकारिणो ये तु अज्ञानात्परमेश्वरम् । पार्थक्यनयनं येषु कुर्वन्ति यर्हि वा प्रभो

mokṣādhikāriṇo ye tu ajñānātparameśvaram | pārthakyanayanaṃ yeṣu kurvanti yarhi vā prabho

किन्तु जो मोक्ष के अधिकारी हैं, वे यदि कदाचित् अज्ञानवश परमेश्वर के विषय में पार्थक्य (भेद) की भावना ला बैठते हैं...

श्लोक 72 (garuda.2.61.72)

तर्हि तेषां हि कालेषु दुः खं याति न संशयः । अतः प्रार्थक्यनयनं ये कुर्वन्त्येषु सर्वदा

tarhi teṣāṃ hi kāleṣu duḥ khaṃ yāti na saṃśayaḥ | ataḥ prārthakyanayanaṃ ye kurvantyeṣu sarvadā

...तो निश्चय ही उन्हें समय-समय पर दुःख भोगना पड़ता है, इसमें सन्देह नहीं। अतः जो लोग सदा इन विषयों में पार्थक्य की भावना लाते रहते हैं...

श्लोक 73 (garuda.2.61.73)

ते सर्वे त्वबुधा ज्ञेया नात्र कार्या विचारणा । अस्वयंव्यक्तलिङ्गेषु नमनं ये प्रकुर्वते

te sarve tvabudhā jñeyā nātra kāryā vicāraṇā | asvayaṃvyaktaliṅgeṣu namanaṃ ye prakurvate

...वे सभी अबुद्ध (अज्ञानी) ही जानने चाहिए, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। जो लोग अस्वयंव्यक्त लिंगों को नमस्कार करते हैं...

श्लोक 74 (garuda.2.61.74)

ते सर्वे ह्यसुरा ज्ञेया नान्यथा तु कथञ्चन । विहाय शून्यमश्वत्थं नमनं ये प्रकुर्वते

te sarve hyasurā jñeyā nānyathā tu kathañcana | vihāya śūnyamaśvatthaṃ namanaṃ ye prakurvate

...वे सभी निश्चय ही असुर जानने चाहिए, अन्यथा किसी प्रकार नहीं। जो लोग निष्फल (बंजर) अश्वत्थ को छोड़कर अन्यत्र नमस्कार करते हैं...

श्लोक 75 (garuda.2.61.75)

द्विमासहीनां तुलसीमप्रसूतां च गां नवाम् । ते सर्वे ह्यसुरा ज्ञेया नात्र कार्या विचारणा

dvimāsahīnāṃ tulasīmaprasūtāṃ ca gāṃ navām | te sarve hyasurā jñeyā nātra kāryā vicāraṇā

...अथवा दो मास से कम आयु की तुलसी को अथवा अभी तक न ब्याई हुई नयी गाय को पूज्य मानकर पूजते हैं, वे सभी निश्चय ही असुर जानने चाहिए, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 76 (garuda.2.61.76)

गुल्माद्याश्च मनुष्यान्तास्ते ज्ञेया ब्रह्मबाहवः । अस्मच्छतायुः पर्यन्तमेक एव कलिः स्मृतः

gulmādyāśca manuṣyāntāste jñeyā brahmabāhavaḥ | asmacchatāyuḥ paryantameka eva kaliḥ smṛtaḥ

गुल्म (झाड़ी) आदि से लेकर मनुष्यों तक सभी प्राणी ब्रह्मा की भुजाओं (सृष्टि-विस्तार) के रूप में जानने चाहिए। मेरी सौ वर्ष की आयु के अन्त तक एक ही कलि स्मरण किया जाता है।

श्लोक 77 (garuda.2.61.77)

कलौ संति कल्पमानं कलेरन्ते संति च । तस्मिन्दिने ब्रह्मरूपे गच्छन्ति च तमोन्तिकम्

kalau saṃti kalpamānaṃ kalerante saṃti ca | tasmindine brahmarūpe gacchanti ca tamontikam

कलियुग में जो प्राणी उत्पन्न होते हैं वे कल्प भर बने रहते हैं, और कलि के अन्त में भी विद्यमान रहते हैं। उस प्रलय के दिन ब्रह्मा के रूप के साथ ही वे तमस् के समीप चले जाते हैं।

श्लोक 78 (garuda.2.61.78)

तत्र स्थित्वा लोकमार्गं प्रतीक्षन्ते न संशयः । साधकैर्विष्णुकार्याणां वायुदासैः प्रपीडिताः

tatra sthitvā lokamārgaṃ pratīkṣante na saṃśayaḥ | sādhakairviṣṇukāryāṇāṃ vāyudāsaiḥ prapīḍitāḥ

वहाँ स्थित होकर वे लोकमार्ग की प्रतीक्षा करते रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं, और विष्णु के कार्यों को सिद्ध करने वाले वायु के दासों द्वारा वे सदा पीड़ित होते रहते हैं।

श्लोक 79 (garuda.2.61.79)

शतवर्षानन्तरं च सर्वेषां कलिना सह । वायोर्गदाप्रहारेण लिङ्गभङ्गो भविष्यति

śatavarṣānantaraṃ ca sarveṣāṃ kalinā saha | vāyorgadāprahāreṇa liṅgabhaṅgo bhaviṣyati

और सौ वर्षों के पश्चात् कलि सहित उन सबका, वायु की गदा के प्रहार से, लिंगशरीर का भेदन (विनाश) होगा।

श्लोक 80 (garuda.2.61.80)

तमोन्धं प्रविशन्त्येते तारतम्येन सर्वशः । तमस्यन्धेपि संसारे नात्र कार्या विचारणा

tamondhaṃ praviśantyete tāratamyena sarvaśaḥ | tamasyandhepi saṃsāre nātra kāryā vicāraṇā

वे सब तारतम्य के अनुसार ही अन्धतमस् में प्रवेश करते हैं। उस अन्धकारमय संसार में भी तारतम्य बना रहता है, इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 81 (garuda.2.61.81)

सर्वेषामुत्तमोन्ते यः कलिरेव न संशयः । दूषको विष्णुभक्तानां तत्समो नास्ति सर्वदा

sarveṣāmuttamonte yaḥ kalireva na saṃśayaḥ | dūṣako viṣṇubhaktānāṃ tatsamo nāsti sarvadā

उन सबमें अन्ततः जो सर्वाधिक अधम है, वह निश्चय ही कलि है। विष्णुभक्तों का दूषक उसके समान कोई भी सदा नहीं है।

श्लोक 82 (garuda.2.61.82)

संसारे वान्धतमसि सर्वत्र हरिदूषकः । मिथ्यादाने ज्ञानबुद्धिर्दुः खे च सुखबुद्धिमान्

saṃsāre vāndhatamasi sarvatra haridūṣakaḥ | mithyādāne jñānabuddhirduḥ khe ca sukhabuddhimān

वह संसार में और अन्धतमस् में सर्वत्र हरि का दूषक है। वह मिथ्या ज्ञान-दान में ज्ञान की बुद्धि रखता है और दुःख में भी सुख की बुद्धि रखता है।

श्लोक 83 (garuda.2.61.83)

तस्मात्कलिसमो लोके शिवभक्तो न कुत्रचित् । दुर्योधनः स एवोक्तो दुः खानन्त्यस्वरूपवान्

tasmātkalisamo loke śivabhakto na kutracit | duryodhanaḥ sa evokto duḥ khānantyasvarūpavān

अतः संसार में कलि के समान कहीं भी कोई ऐसा अधम भक्त तक नहीं है। वही अनन्त दुःखस्वरूप दुर्योधन के नाम से भी कहा गया है।

श्लोक 84 (garuda.2.61.84)

तस्माच्छतगुणांशेन कलिभार्या तु सर्वदा । अलक्ष्मीरिति विख्याता सा लोके मन्थरा स्मृता

tasmācchataguṇāṃśena kalibhāryā tu sarvadā | alakṣmīriti vikhyātā sā loke mantharā smṛtā

उससे सौ गुणा न्यून, कलि की पत्नी सदा 'अलक्ष्मी' के नाम से विख्यात है; वह लोक में मन्थरा के नाम से स्मरण की जाती है।

श्लोक 85 (garuda.2.61.85)

तस्माद्दशगुणांशोनो विप्रचित्तिस्तु सर्वदा । जरासंधः स एवोक्तः कालनेमिस्ततः परम्

tasmāddaśaguṇāṃśono vipracittistu sarvadā | jarāsaṃdhaḥ sa evoktaḥ kālanemistataḥ param

उससे दस गुणा न्यून विप्रचित्ति सदा माना जाता है; वही जरासन्ध कहा गया है, और उससे आगे कालनेमि है।

श्लोक 86 (garuda.2.61.86)

तस्माच्छतगुणांशोनः स तु कंसेति विश्रुतः । तस्मात्पञ्चगुणैर्हीनौ मधुकैटभसंज्ञकौ

tasmācchataguṇāṃśonaḥ sa tu kaṃseti viśrutaḥ | tasmātpañcaguṇairhīnau madhukaiṭabhasaṃjñakau

उससे (कालनेमि से) सौ गुणा न्यून वह कंस नाम से विख्यात है। उससे पाँच गुणा न्यून मधु और कैटभ नामक दोनों असुर हैं।

श्लोक 87 (garuda.2.61.87)

तावेव हंसहिडंबकौ ज्ञेयौ तौ च जनार्दन । विप्रचित्तिसमो ज्ञेयो भौमो वै भूतले स्मृतः

tāveva haṃsahiḍaṃbakau jñeyau tau ca janārdana | vipracittisamo jñeyo bhaumo vai bhūtale smṛtaḥ

हे जनार्दन! वे ही मधु-कैटभ हंस और हिडिम्ब (डिम्बक) के नाम से भी जाने जाते हैं। भूतल पर भौम (नरकासुर) को विप्रचित्ति के समान जानना चाहिए।

श्लोक 88 (garuda.2.61.88)

तस्मादष्ट गुणैरुच्यो हरिण्यकशिषुः स्मृतः । तस्माच्च त्रिगुणैर्हीनो हिरण्याक्षो महासुरः

tasmādaṣṭa guṇairucyo hariṇyakaśiṣuḥ smṛtaḥ | tasmācca triguṇairhīno hiraṇyākṣo mahāsuraḥ

उससे आठ गुणा अधिक हिरण्यकशिपु स्मरण किया जाता है। और उससे तीन गुणा न्यून महासुर हिरण्याक्ष है।

श्लोक 89 (garuda.2.61.89)

मणिमांस्तत्समो ज्ञेयः किञ्चिदूनो बकः स्मृतः । तस्माद्विंशद्गुणैर्हीनस्तारकाख्यो महासुरः

maṇimāṃstatsamo jñeyaḥ kiñcidūno bakaḥ smṛtaḥ | tasmādviṃśadguṇairhīnastārakākhyo mahāsuraḥ

मणिमान् को उसी के समान जानना चाहिए, और बकासुर को उससे कुछ न्यून माना गया है। उससे बीस गुणा न्यून तारक नामक महासुर है।

श्लोक 90 (garuda.2.61.90)

तस्मात्षड्गुणतो हीनः शंबरो लोककण्टकः । शंबरस्य समो ज्ञेयः शाल्वो दैत्येषु चाधमः

tasmātṣaḍguṇato hīnaḥ śaṃbaro lokakaṇṭakaḥ | śaṃbarasya samo jñeyaḥ śālvo daityeṣu cādhamaḥ

उससे छह गुणा न्यून लोक का कण्टकरूप शम्बर है। शम्बर के समान ही दैत्यों में अधम शाल्व को जानना चाहिए।

श्लोक 91 (garuda.2.61.91)

शंबरात्तु द्विगुणतो हिडिंबो न्यून उच्यते । बाणस्ततोऽधमो ज्ञेयः स तु कीचकनामतः

śaṃbarāttu dviguṇato hiḍiṃbo nyūna ucyate | bāṇastato'dhamo jñeyaḥ sa tu kīcakanāmataḥ

शम्बर से दो गुणा न्यून हिडिम्ब कहा गया है। उससे भी अधम बाण को जानना चाहिए, जो ही आगे कीचक नाम से जाना गया।

श्लोक 92 (garuda.2.61.92)

द्वापारख्यो महाहासो बाणासुरसमः स्मृतः । तस्माद्दशगुणैर्हीनो नमुचिर्दैत्यसत्तमः

dvāpārakhyo mahāhāso bāṇāsurasamaḥ smṛtaḥ | tasmāddaśaguṇairhīno namucirdaityasattamaḥ

द्वापरयुग में महाहास नाम से प्रसिद्ध असुर बाणासुर के समान माना गया है। उससे दस गुणा न्यून दैत्यों में श्रेष्ठ नमुचि है।

श्लोक 93 (garuda.2.61.93)

नमुचेस्तु समौ ज्ञेयौ पाक इल्वल इत्युभौ । तस्माच्चतुर्गुणैर्हीनो वातापिर्दानवाधमः

namucestu samau jñeyau pāka ilvala ityubhau | tasmāccaturguṇairhīno vātāpirdānavādhamaḥ

नमुचि के समान पाक और इल्वल दोनों को जानना चाहिए। उससे चार गुणा न्यून दानवों में अधम वातापि है।

श्लोक 94 (garuda.2.61.94)

तस्मात्सार्धगुणैर्हीनो धेनुको नाम दैत्यराट् । धेनुकादर्धगुणतः केशी दैत्यस्तु चावरः

tasmātsārdhaguṇairhīno dhenuko nāma daityarāṭ | dhenukādardhaguṇataḥ keśī daityastu cāvaraḥ

उससे डेढ़ गुणा न्यून धेनुक नामक दैत्यराज है। धेनुक से आधा गुणा न्यून केशी नामक अधम दैत्य है।

श्लोक 95 (garuda.2.61.95)

केशीदैत्यसमो ज्ञेयस्तृणावर्तो महासुरः । तस्माद्दशगुणैर्हीनो हंसो नामरमापते

keśīdaityasamo jñeyastṛṇāvarto mahāsuraḥ | tasmāddaśaguṇairhīno haṃso nāmaramāpate

केशी दैत्य के समान महासुर तृणावर्त को जानना चाहिए। हे रमापते! उससे दस गुणा न्यून हंस नामक असुर है।

श्लोक 96 (garuda.2.61.96)

त्रिरिकस्तु समो ज्ञेयस्तत्समः पौरुकस्मृतः । वेतः स एव विज्ञेयः पूर्वजन्मनि सत्तम

tririkastu samo jñeyastatsamaḥ paurukasmṛtaḥ | vetaḥ sa eva vijñeyaḥ pūrvajanmani sattama

उसके समान त्रिवक्र को जानना चाहिए, और उसके समान ही पौरुक स्मरण किया गया है। हे सत्तम! वही पूर्वजन्म में 'वेत' नाम से जाना जाता था।

श्लोक 97 (garuda.2.61.97)

तस्मादेकगुणैर्हीनौ कुंभाण्डककुपर्णकौ । दुः शासनस्तु विज्ञेयो जरासंधसमः प्रभो

tasmādekaguṇairhīnau kuṃbhāṇḍakakuparṇakau | duḥ śāsanastu vijñeyo jarāsaṃdhasamaḥ prabho

उससे एक गुणा न्यून कुम्भाण्ड और कुपर्णक दोनों हैं। हे प्रभो! दुःशासन को जरासन्ध के समान जानना चाहिए।

श्लोक 98 (garuda.2.61.98)

कंसेन तुल्यो विज्ञेयो विकर्णो दैत्यसत्तमः । कुंभकर्णाच्छतगुणैर्हीनौ क्रध्येति विश्रुतः

kaṃsena tulyo vijñeyo vikarṇo daityasattamaḥ | kuṃbhakarṇācchataguṇairhīnau kradhyeti viśrutaḥ

कंस के तुल्य दैत्यों में श्रेष्ठ विकर्ण को जानना चाहिए। कुम्भकर्ण से सौ गुणा न्यून क्रोधी नाम से विख्यात असुर है।

श्लोक 99 (garuda.2.61.99)

तस्माच्छतगुणैर्हीनः शतधन्वा महासुरः । समानस्तस्य विज्ञेयः कर्मारिर्दैत्यसत्तमः

tasmācchataguṇairhīnaḥ śatadhanvā mahāsuraḥ | samānastasya vijñeyaḥ karmārirdaityasattamaḥ

उससे सौ गुणा न्यून महासुर शतधन्वा है। उसके समान दैत्यों में श्रेष्ठ कर्मारि को जानना चाहिए।

श्लोक 100 (garuda.2.61.100)

कालकेयस्तु विज्ञेयः सदा वेनसमो मतः । अधमानां तु दैत्यानामुत्तमैः साम्यमुच्यते

kālakeyastu vijñeyaḥ sadā venasamo mataḥ | adhamānāṃ tu daityānāmuttamaiḥ sāmyamucyate

कालकेय को सदा वेन के समान माना गया है। इस प्रकार अधम दैत्यों की भी श्रेष्ठ देवगण के साथ कहीं-कहीं समानता कही गयी है।

श्लोक 101 (garuda.2.61.101)

तत्रावेशाच्च विज्ञेयं देवानां नात्र संशयः । तस्माच्छतगुर्णैहीनश्चित्तमानसुरो महान्

tatrāveśācca vijñeyaṃ devānāṃ nātra saṃśayaḥ | tasmācchatagurṇaihīnaścittamānasuro mahān

वहाँ देवताओं के आवेश के कारण ही यह समानता समझनी चाहिए, इसमें सन्देह नहीं। उससे सौ गुणा न्यून चित्तमान नामक महान् असुर है।

श्लोक 102 (garuda.2.61.102)

तच्छरीराभिमानी तु तस्माच्छतगुणैर्वरः । तस्माच्छतगुणैहींनो हस्तमानसुरो महान्

taccharīrābhimānī tu tasmācchataguṇairvaraḥ | tasmācchataguṇaihīṃno hastamānasuro mahān

उससे सौ गुणा अधिक (श्रेष्ठ) वह है जो उस शरीर का अभिमानी है। उससे सौ गुणा न्यून हस्तमान नामक महान् असुर है।

श्लोक 103 (garuda.2.61.103)

तस्माच्छतगुणैर्हीनः पादमानसुरो महान् । नेत्रेन्द्रियाभिमानी तु तस्माच्छतगुणो वरः

tasmācchataguṇairhīnaḥ pādamānasuro mahān | netrendriyābhimānī tu tasmācchataguṇo varaḥ

उससे सौ गुणा न्यून पादमान नामक महान् असुर है। नेत्रेन्द्रिय का अभिमानी उससे सौ गुणा श्रेष्ठ है।

श्लोक 104 (garuda.2.61.104)

चक्षुरिन्द्रियमानी तु तस्माच्छतगुणो वरः । तस्माच्छगुणैर्हीनः स्पर्शमानसुरो महान्

cakṣurindriyamānī tu tasmācchataguṇo varaḥ | tasmācchaguṇairhīnaḥ sparśamānasuro mahān

चक्षुरिन्द्रिय का अभिमानी उससे सौ गुणा श्रेष्ठ है। उससे सौ गुणा न्यून स्पर्शमान नामक महान् असुर है।

श्लोक 105 (garuda.2.61.105)

तस्माच्छतगुर्णैहीनश्चण्डमानसुरो महान् । तस्माच्छतगुर्णैर्हीनः शिश्रमानसुरो महान्

tasmācchatagurṇaihīnaścaṇḍamānasuro mahān | tasmācchatagurṇairhīnaḥ śiśramānasuro mahān

उससे सौ गुणा न्यून चण्डमान नामक महान् असुर है। उससे सौ गुणा न्यून शिश्रमान नामक महान् असुर है।

श्लोक 106 (garuda.2.61.106)

तस्माच्छतगुणैर्हीनः कर्ममानसुरः स्मृतः । कल्पाद्यैः प्रेरिताः सर्वे रुद्राद्या अधिकारिणः

tasmācchataguṇairhīnaḥ karmamānasuraḥ smṛtaḥ | kalpādyaiḥ preritāḥ sarve rudrādyā adhikāriṇaḥ

उससे सौ गुणा न्यून कर्ममान नामक असुर स्मरण किया गया है। कल्प आदि के द्वारा प्रेरित रुद्र आदि सभी अधिकारी देवता...

श्लोक 107 (garuda.2.61.107)

कदाचित्सुविरुद्धं च कुर्वन्ति तव सत्तम । कदाप्यहं च वायुश्च विरुद्धं नाचरेव भोः

kadācitsuviruddhaṃ ca kurvanti tava sattama | kadāpyahaṃ ca vāyuśca viruddhaṃ nācareva bhoḥ

...हे सत्तम! कभी-कभी आपके प्रतिकूल आचरण भी कर बैठते हैं। किन्तु हे प्रभो! मैं और वायु कभी भी आपके विरुद्ध आचरण नहीं करते।

श्लोक 108 (garuda.2.61.108)

मूलेष्वंशावतारेषु रुद्रादीना महाप्रभो । बुद्धिर्विनश्यते यस्मात्तस्माच्छिन्ना हि तेऽखिलाः

mūleṣvaṃśāvatāreṣu rudrādīnā mahāprabho | buddhirvinaśyate yasmāttasmācchinnā hi te'khilāḥ

हे महाप्रभो! रुद्र आदि के मूल रूपों में तथा अंशावतारों में भी कभी-कभी बुद्धि नष्ट (विचलित) हो जाती है, इसीलिए वे सभी 'छिन्न' (खण्डित भक्ति वाले) ही कहलाते हैं।

श्लोक 109 (garuda.2.61.109)

महीपते च मद्बुद्धिस्तस्मादच्छिन्नसंज्ञिकः । एतादृशोप्यहं देव न च शक्तिस्तु नस्तवे

mahīpate ca madbuddhistasmādacchinnasaṃjñikaḥ | etādṛśopyahaṃ deva na ca śaktistu nastave

किन्तु हे महीपते! मेरी बुद्धि कभी विचलित नहीं होती, इसीलिए मैं 'अच्छिन्न' कहलाता हूँ। हे देव! ऐसा होते हुए भी मुझमें आपके समान शक्ति नहीं है।

श्लोक 110 (garuda.2.61.110)

मह्यमच्छिन्नभक्ताय दयां कुरु महाप्रभो । इति स्तुत्वा हरिं ब्रह्मा स्थितः प्राञ्ज लिरग्रतः

mahyamacchinnabhaktāya dayāṃ kuru mahāprabho | iti stutvā hariṃ brahmā sthitaḥ prāñja liragrataḥ

हे महाप्रभो! मुझ अच्छिन्न-भक्त पर कृपा कीजिए। इस प्रकार हरि की स्तुति करके ब्रह्मा उनके सम्मुख हाथ जोड़े हुए खड़े रहे।

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