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उत्तरखण्ड · अध्याय 62

ब्रह्मा द्वारा देवताओं की उत्पत्ति एवं परम्परा

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (garuda.2.62.1)

श्रीकृष्ण उवाच । इति स्तुतः स भगवान् स्वपूत्रेण दयानिधिः । मेधगंभीरया वाचा प्रोवाच मधुसूदनः

śrīkṛṣṇa uvāca | iti stutaḥ sa bhagavān svapūtreṇa dayānidhiḥ | medhagaṃbhīrayā vācā provāca madhusūdanaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — इस प्रकार अपने पुत्र (ब्रह्मा) द्वारा स्तुति किए जाने पर, दयासागर भगवान मधुसूदन मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोले।

श्लोक 2 (garuda.2.62.2)

सृज ब्रह्मन्निमान्देवान्मत्प्रसादात्क्रमेण च । यथा वै प्राक्क्षणेतद्वत्सृज सर्वं महाप्रभो

sṛja brahmannimāndevānmatprasādātkrameṇa ca | yathā vai prākkṣaṇetadvatsṛja sarvaṃ mahāprabho

हे ब्रह्मन्! मेरी कृपा से क्रमशः इन देवताओं की रचना करो; हे महाप्रभो! जैसे पहले किया था, वैसे ही अब सब कुछ पुनः रचो।

श्लोक 3 (garuda.2.62.3)

नास्ति प्रयोजनं तेन तव मत्प्रीतये सृज । एवमुक्तस्तु हारिणा ब्रह्मा स्तुत्वा हरिं परम्

nāsti prayojanaṃ tena tava matprītaye sṛja | evamuktastu hāriṇā brahmā stutvā hariṃ param

इसमें और कोई प्रयोजन नहीं है, केवल मेरी प्रसन्नता के लिए ही तुम सृष्टि करो। हरि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, ब्रह्मा ने परम हरि की पुनः स्तुति की।

श्लोक 4 (garuda.2.62.4)

सृष्टिं कर्तुं मनो दध्रे प्रीणयन्नेव माधवम् । महत्तत्वात्मको ब्रह्मा वायुं जीवभिमानिनम्

sṛṣṭiṃ kartuṃ mano dadhre prīṇayanneva mādhavam | mahattatvātmako brahmā vāyuṃ jīvabhimāninam

और केवल माधव को प्रसन्न करने के उद्देश्य से ही उन्होंने मन में सृष्टि करने का संकल्प किया। महत्तत्त्वस्वरूप ब्रह्मा ने जीव के अभिमानी देवता वायु को (सबसे पहले रचा)।

श्लोक 5 (garuda.2.62.5)

आदौ ससर्ज गरुड पुरुषात्मा स एव च । ततो दक्षिणहस्तात्तु ब्रह्माणीं भारन्ती तथा

ādau sasarja garuḍa puruṣātmā sa eva ca | tato dakṣiṇahastāttu brahmāṇīṃ bhārantī tathā

हे गरुड! सबसे पहले उन्होंने पुरुषस्वरूप उसी वायु को रचा। फिर अपने दाहिने हाथ से ब्रह्माणी तथा भारती को भी रचा।

श्लोक 6 (garuda.2.62.6)

असृजत्ते महाभागे अव्यक्तस्य नियामिके । वामहस्तात्सत्यपुत्रो महत्तत्वात्मकोऽनलः

asṛjatte mahābhāge avyaktasya niyāmike | vāmahastātsatyaputro mahattatvātmako'nalaḥ

हे महाभागे! उन्होंने उन दोनों को अव्यक्त की नियामिका शक्तियों के रूप में रचा। बायें हाथ से महत्तत्त्वस्वरूप सत्यपुत्र अनल (अग्नि) को उत्पन्न किया।

श्लोक 7 (garuda.2.62.7)

ब्रह्मणो दक्षिणाद्धस्तादहङ्कारात्मको हरः । आदौ शेषस्ततो जज्ञे गरुडतदनन्तरम्

brahmaṇo dakṣiṇāddhastādahaṅkārātmako haraḥ | ādau śeṣastato jajñe garuḍatadanantaram

ब्रह्मा के दाहिने हाथ से अहंकारस्वरूप हर (रुद्र) उत्पन्न हुए। सबसे पहले शेष का जन्म हुआ, फिर उसके बाद गरुड का।

श्लोक 8 (garuda.2.62.8)

तदनन्तरजो रुद्रः स एवं सृष्टवान्प्रभुः । स्वोत्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मा दशवर्षान्महाप्रभुः

tadanantarajo rudraḥ sa evaṃ sṛṣṭavānprabhuḥ | svotpattyanantaraṃ brahmā daśavarṣānmahāprabhuḥ

उसके बाद रुद्र का जन्म हुआ — इस प्रकार प्रभु ने सृष्टि की। अपने जन्म के दस वर्ष पश्चात् महाप्रभु ब्रह्मा ने...

श्लोक 9 (garuda.2.62.9)

वायुमुत्त्पाद्रयामास वत्सरानन्तरे प्रभुः । गायत्रीं जनयामास वायोरुत्पत्त्यनन्तरम्

vāyumuttpādrayāmāsa vatsarānantare prabhuḥ | gāyatrīṃ janayāmāsa vāyorutpattyanantaram

...एक वर्ष बाद वायु को उत्पन्न किया। वायु की उत्पत्ति के पश्चात् उन्होंने गायत्री को जन्म दिया।

श्लोक 10 (garuda.2.62.10)

संवत्सरानन्तरे तु भारतीमसृजत्प्रभुः । भारत्यनन्तरं शें दिव्यसाहस्रवत्सरात्

saṃvatsarānantare tu bhāratīmasṛjatprabhuḥ | bhāratyanantaraṃ śeṃ divyasāhasravatsarāt

एक वर्ष पश्चात् प्रभु ने भारती को रचा। भारती के पश्चात्, एक हजार दिव्य वर्षों के बाद, शेष उत्पन्न हुए।

श्लोक 11 (garuda.2.62.11)

अनन्तरं संबभूव गरुडस्तु ततः परम् । दिव्यसाहस्रवर्षात्तु तथा रुद्रञ्च सृष्टवान्

anantaraṃ saṃbabhūva garuḍastu tataḥ param | divyasāhasravarṣāttu tathā rudrañca sṛṣṭavān

उसके बाद गरुड का प्राकट्य हुआ। तत्पश्चात् एक हजार दिव्य वर्षों के बाद उन्होंने रुद्र को भी रचा।

श्लोक 12 (garuda.2.62.12)

शेषस्यानन्तरं देवीं वारुणीं च महाप्रभुः । दशवर्षानन्तरं तु ह्यसृजत्कमलासनः

śeṣasyānantaraṃ devīṃ vāruṇīṃ ca mahāprabhuḥ | daśavarṣānantaraṃ tu hyasṛjatkamalāsanaḥ

शेष के पश्चात् महाप्रभु ने देवी वारुणी को रचा। दस वर्ष पश्चात् कमलासन (ब्रह्मा) ने उन्हें उत्पन्न किया।

श्लोक 13 (garuda.2.62.13)

गरुडानन्तरं देवीं सौपर्णीमसृजत्प्रभुः । दशवर्षानन्तरं च पार्वतीं च तथैव सः

garuḍānantaraṃ devīṃ sauparṇīmasṛjatprabhuḥ | daśavarṣānantaraṃ ca pārvatīṃ ca tathaiva saḥ

गरुड के पश्चात् प्रभु ने देवी सौपर्णी को रचा। और दस वर्ष पश्चात् उसी प्रकार पार्वती को भी रचा।

श्लोक 14 (garuda.2.62.14)

पार्वत्यनन्तरं चन्द्रं मनस्तत्त्वनियामकम् । दशवर्षानन्तरं तु वासवं ह्यसृजत्ततः

pārvatyanantaraṃ candraṃ manastattvaniyāmakam | daśavarṣānantaraṃ tu vāsavaṃ hyasṛjattataḥ

पार्वती के पश्चात् मन-तत्त्व के नियामक चन्द्रमा को रचा। दस वर्ष पश्चात् उन्होंने वासव (इन्द्र) को उत्पन्न किया।

श्लोक 15 (garuda.2.62.15)

अभिमानी दक्षिणस्य बाहोश्च परमेष्ठिनः । दशवर्षानन्तरं तु शची तामसृजत्प्रभुः

abhimānī dakṣiṇasya bāhośca parameṣṭhinaḥ | daśavarṣānantaraṃ tu śacī tāmasṛjatprabhuḥ

इन्द्र परमेष्ठी ब्रह्मा की दाहिनी भुजा के अभिमानी देवता हैं। दस वर्ष पश्चात् प्रभु ने शची को रचा।

श्लोक 16 (garuda.2.62.16)

इन्द्रस्यानन्तरं कामं त्रिंशद्वर्षादनन्तरम् । असृजद्वामबाहोश्चमनस्तत्वाभिमानिनम्

indrasyānantaraṃ kāmaṃ triṃśadvarṣādanantaram | asṛjadvāmabāhoścamanastatvābhimāninam

इन्द्र के पश्चात्, तीस वर्ष बीतने पर, उन्होंने अपनी बायीं भुजा से मन-तत्त्व के अभिमानी देवता काम को रचा।

श्लोक 17 (garuda.2.62.17)

तदनन्तरजां देवीं दशवर्षादनन्तरम् । रतिं स जनयामास कामभार्यां महाप्रभुः

tadanantarajāṃ devīṃ daśavarṣādanantaram | ratiṃ sa janayāmāsa kāmabhāryāṃ mahāprabhuḥ

उसके पश्चात्, दस वर्ष बाद, महाप्रभु ने काम की पत्नी देवी रति को जन्म दिया।

श्लोक 18 (garuda.2.62.18)

कामस्याप्यभिमानी तु स एव परिकीर्तितः । ब्रह्माहङ्कारिकं प्राणं कार्योत्पत्तेरनन्तरम्

kāmasyāpyabhimānī tu sa eva parikīrtitaḥ | brahmāhaṅkārikaṃ prāṇaṃ kāryotpatteranantaram

वही रति काम की भी अभिमानिनी देवी कही गई हैं। उस कार्य की उत्पत्ति के पश्चात् ब्रह्मा ने अहंकार से उत्पन्न प्राण को रचा।

श्लोक 19 (garuda.2.62.19)

दशवर्षानन्तरं तु निर्ममे नासिक ततः । तस्य भार्यां नासिकस्यः पञ्चवर्षादनन्तरम्

daśavarṣānantaraṃ tu nirmame nāsika tataḥ | tasya bhāryāṃ nāsikasyaḥ pañcavarṣādanantaram

दस वर्ष पश्चात् उन्होंने नासिका (घ्राणेन्द्रिय) को रचा। और पाँच वर्ष पश्चात् उसकी अधिष्ठात्री देवी को रचा।

श्लोक 20 (garuda.2.62.20)

निर्ममे नासिकां वामां ब्रह्मा लोकपितामहः । अहङ्कारादनु ब्रह्मा सज्ञानं च बृहस्पतिम्

nirmame nāsikāṃ vāmāṃ brahmā lokapitāmahaḥ | ahaṅkārādanu brahmā sajñānaṃ ca bṛhaspatim

लोकपितामह ब्रह्मा ने बायीं नासिका को रचा। अहंकार के पश्चात् ब्रह्मा ने ज्ञानसहित बृहस्पति को रचा।

श्लोक 21 (garuda.2.62.21)

निर्ममे च वर्षयुग्मपञ्चवर्षादनन्तरम् । पञ्चवर्षानन्तरं तु तारां भार्यां विनिर्ममे

nirmame ca varṣayugmapañcavarṣādanantaram | pañcavarṣānantaraṃ tu tārāṃ bhāryāṃ vinirmame

दो वर्ष और फिर पाँच वर्ष बीतने पर उन्होंने बृहस्पति को रचा। पाँच वर्ष पश्चात् उन्होंने तारा को उनकी पत्नी के रूप में रचा।

श्लोक 22 (garuda.2.62.22)

गुरोरनन्तरं ब्रह्मा पञ्चविंशादनन्तरम् । स्वायंभुवं मनुं चैव निर्ममे मनसा विभुः

guroranantaraṃ brahmā pañcaviṃśādanantaram | svāyaṃbhuvaṃ manuṃ caiva nirmame manasā vibhuḥ

गुरु (बृहस्पति) के पश्चात्, पच्चीस वर्ष बीतने पर, सर्वव्यापी ब्रह्मा ने मन से ही स्वायम्भुव मनु को रचा।

श्लोक 23 (garuda.2.62.23)

पञ्चवर्षानन्तरं तु शतरूपां विनिर्ममे । शतरूपानन्तरं तु विंशद्वर्षदिनान्तरम्

pañcavarṣānantaraṃ tu śatarūpāṃ vinirmame | śatarūpānantaraṃ tu viṃśadvarṣadināntaram

पाँच वर्ष पश्चात् उन्होंने शतरूपा को रचा। शतरूपा के पश्चात्, बीस वर्ष और कुछ दिन बीतने पर...

श्लोक 24 (garuda.2.62.24)

दक्षः शिष्यात्मको जज्ञे दक्षिणाङ्गुष्ठतः प्रभोः । पञ्चवर्षानन्तरं तु वामाङ्गुष्ठाच्चतुर्मुखः

dakṣaḥ śiṣyātmako jajñe dakṣiṇāṅguṣṭhataḥ prabhoḥ | pañcavarṣānantaraṃ tu vāmāṅguṣṭhāccaturmukhaḥ

...प्रभु के दाहिने अंगूठे से शिष्यस्वरूप दक्ष का जन्म हुआ। पाँच वर्ष पश्चात् बायें अंगूठे से चतुर्मुख (ब्रह्मा का एक रूप) उत्पन्न हुए।

श्लोक 25 (garuda.2.62.25)

प्रसूतिमसृजद्ब्रह्मा सृष्ट्यर्थं परमादरात् । दक्षस्यानन्तरं ब्रह्मा पञ्चविंशादनन्तरम्

prasūtimasṛjadbrahmā sṛṣṭyarthaṃ paramādarāt | dakṣasyānantaraṃ brahmā pañcaviṃśādanantaram

ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रयोजन से परम आदरपूर्वक प्रसूति को रचा। दक्ष के पश्चात्, पच्चीस वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने...

श्लोक 26 (garuda.2.62.26)

निर्ममे ह्यनिरुद्धं च मध्यमाङ्गुलिपर्वतः । पञ्चवर्षानन्तरं तु ससर्ज भगवानजः

nirmame hyaniruddhaṃ ca madhyamāṅguliparvataḥ | pañcavarṣānantaraṃ tu sasarja bhagavānajaḥ

...मध्यमा अंगुली के पर्व से अनिरुद्ध को रचा। पाँच वर्ष पश्चात् अजन्मा भगवान (ब्रह्मा) ने...

श्लोक 27 (garuda.2.62.27)

विराजसंज्ञकां भार्यां मध्यमाङ्गुलिपर्वतः । अनिरुद्धानन्तर तु शतवर्षादनन्तरम्

virājasaṃjñakāṃ bhāryāṃ madhyamāṅguliparvataḥ | aniruddhānantara tu śatavarṣādanantaram

...उसी मध्यमा अंगुली के पर्व से विराजा नामक पत्नी को रचा। अनिरुद्ध के पश्चात्, सौ वर्ष बीतने पर...

श्लोक 28 (garuda.2.62.28)

निर्ममे प्रवहं वायुं कनिष्ठाङ्गुलिपर्वतः । दशवर्षानन्तरं तु प्रवाहीं निर्ममे प्रभुः

nirmame pravahaṃ vāyuṃ kaniṣṭhāṅguliparvataḥ | daśavarṣānantaraṃ tu pravāhīṃ nirmame prabhuḥ

...कनिष्ठा अंगुली के पर्व से प्रवह वायु को रचा। दस वर्ष पश्चात् प्रभु ने प्रवाही (उसकी पत्नी) को रचा।

श्लोक 29 (garuda.2.62.29)

कनिष्ठाङ्गुलिपर्वाच्च वामदेवं न संशयः । प्रवहानन्तरं तब्रह्मा शतवर्षादनन्तरम्

kaniṣṭhāṅguliparvācca vāmadevaṃ na saṃśayaḥ | pravahānantaraṃ tabrahmā śatavarṣādanantaram

निःसन्देह उसी कनिष्ठा अंगुली के पर्व से वामदेव उत्पन्न हुए। प्रवह के पश्चात्, सौ वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने...

श्लोक 30 (garuda.2.62.30)

यमं विनिर्ममे पृष्ठादष्टवर्षादनन्तरम् । तद्भार्यां शामलां देवीं तस्मादेव महाप्रभुः

yamaṃ vinirmame pṛṣṭhādaṣṭavarṣādanantaram | tadbhāryāṃ śāmalāṃ devīṃ tasmādeva mahāprabhuḥ

...आठ वर्ष पश्चात् अपनी पीठ से यम को रचा। और उसी से महाप्रभु ने यम की पत्नी देवी श्यामला को रचा।

श्लोक 31 (garuda.2.62.31)

यमस्यानन्तरं चन्द्रं त्रिंशद्वर्षादनन्तरम् । असृजद्दक्षिणाच्छोत्राच्छोत्रतत्त्वनियामकम्

yamasyānantaraṃ candraṃ triṃśadvarṣādanantaram | asṛjaddakṣiṇācchotrācchotratattvaniyāmakam

यम के पश्चात्, तीस वर्ष बीतने पर, उन्होंने दाहिने कान से श्रोत्रतत्त्व के नियामक चन्द्र को रचा।

श्लोक 32 (garuda.2.62.32)

नववर्षानन्तरं तु रोहिणीसमृजत्प्रभुः । वामश्रोत्राच्च गरुडं वामश्रोत्राभिमानिनम्

navavarṣānantaraṃ tu rohiṇīsamṛjatprabhuḥ | vāmaśrotrācca garuḍaṃ vāmaśrotrābhimāninam

नौ वर्ष पश्चात् प्रभु ने रोहिणी को रचा। और बायें कान से गरुड को — जो बायें कान के अभिमानी देवता हैं।

श्लोक 33 (garuda.2.62.33)

चन्द्रस्यानन्तरं सूर्यं विंशद्वर्षादनन्तरम् । सम्यग्विनिर्ममे ब्रह्मा दक्षिणाक्ष्णश्च देवताम्

candrasyānantaraṃ sūryaṃ viṃśadvarṣādanantaram | samyagvinirmame brahmā dakṣiṇākṣṇaśca devatām

चन्द्र के पश्चात्, बीस वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने भली-भाँति दाहिनी आँख से सूर्य नामक देवता को रचा।

श्लोक 34 (garuda.2.62.34)

वामाक्ष्णो निर्ममे संज्ञां षड्वर्षानन्तरं प्रभुः । सूर्यस्यानन्तरं ब्रह्मा शतवर्षादनन्तरम्

vāmākṣṇo nirmame saṃjñāṃ ṣaḍvarṣānantaraṃ prabhuḥ | sūryasyānantaraṃ brahmā śatavarṣādanantaram

प्रभु ने छह वर्ष पश्चात् बायीं आँख से संज्ञा को रचा। सूर्य के पश्चात्, सौ वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने...

श्लोक 35 (garuda.2.62.35)

रसनेन्द्रियाच्च वरुणं निर्ममे तस्य मानिनम् । विंशद्वर्षानन्तरं तु तस्मादेवेद्रियात्प्रभुः

rasanendriyācca varuṇaṃ nirmame tasya māninam | viṃśadvarṣānantaraṃ tu tasmādevedriyātprabhuḥ

...रसनेन्द्रिय से उसके अभिमानी देवता वरुण को रचा। बीस वर्ष पश्चात् उसी इन्द्रिय से प्रभु ने...

श्लोक 36 (garuda.2.62.36)

गङ्गां विनिर्ममे ब्रह्मा रसनेन्द्रियदेवताम् । वरुणस्यानन्तरं तु दशवर्षादनन्तरम्

gaṅgāṃ vinirmame brahmā rasanendriyadevatām | varuṇasyānantaraṃ tu daśavarṣādanantaram

...रसनेन्द्रिय की अधिष्ठात्री देवी गंगा को रचा। वरुण के पश्चात्, दस वर्ष बीतने पर...

श्लोक 37 (garuda.2.62.37)

उत्संगान्निर्ममे ब्रह्मा नारदं भगवत्प्रियम् । नारदस्यानन्तरं तु षष्टिवर्षादनन्तरम्

utsaṃgānnirmame brahmā nāradaṃ bhagavatpriyam | nāradasyānantaraṃ tu ṣaṣṭivarṣādanantaram

...ब्रह्मा ने अपनी गोद से भगवान के प्रिय नारद को रचा। नारद के पश्चात्, साठ वर्ष बीतने पर...

श्लोक 38 (garuda.2.62.38)

अग्निं विनिर्ममे ब्रह्मात्वगिन्द्रियतः प्रभुः । अतो वागभिमानी सं पञ्चवर्षादनन्तरम्

agniṃ vinirmame brahmātvagindriyataḥ prabhuḥ | ato vāgabhimānī saṃ pañcavarṣādanantaram

...प्रभु ने त्वगिन्द्रिय (स्पर्शेन्द्रिय) से अग्नि को रचा। फिर पाँच वर्ष पश्चात् वाणी के अभिमानी देवता को रचा।

श्लोक 39 (garuda.2.62.39)

स्वाहां विनिर्ममे ब्रह्मा तामाहुर्मन्त्रदेवताम् । अग्नेरनन्तरं वीन्द्र भृगुं ब्रह्मर्षिसत्तमम्

svāhāṃ vinirmame brahmā tāmāhurmantradevatām | agneranantaraṃ vīndra bhṛguṃ brahmarṣisattamam

ब्रह्मा ने स्वाहा को रचा, जिसे मन्त्र की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। हे विहंगेन्द्र! अग्नि के पश्चात् ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ भृगु को रचा।

श्लोक 40 (garuda.2.62.40)

दशवर्षानन्तरं तु भ्रुवोर्मध्याद्विनिर्ममे । संवत्सरानन्तरं तु भृगुभार्यां विनिर्ममे

daśavarṣānantaraṃ tu bhruvormadhyādvinirmame | saṃvatsarānantaraṃ tu bhṛgubhāryāṃ vinirmame

दस वर्ष पश्चात् उन्होंने दोनों भौंहों के मध्य से भृगु को रचा। और एक वर्ष पश्चात् भृगु की पत्नी को रचा।

श्लोक 41 (garuda.2.62.41)

भृगोरनन्तरं ब्रह्मा शतवर्षादनन्तरम् । कश्यपञ्जनयामास मनसा च स्वयं प्रभुः

bhṛgoranantaraṃ brahmā śatavarṣādanantaram | kaśyapañjanayāmāsa manasā ca svayaṃ prabhuḥ

भृगु के पश्चात्, सौ वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने स्वयं अपने मन से कश्यप को उत्पन्न किया।

श्लोक 42 (garuda.2.62.42)

संवत्सरानन्तरं तु अदितिं निर्ममे प्रभुः । कश्यपानन्तरं चात्रिं दशवर्षादनन्तरम्

saṃvatsarānantaraṃ tu aditiṃ nirmame prabhuḥ | kaśyapānantaraṃ cātriṃ daśavarṣādanantaram

एक वर्ष पश्चात् प्रभु ने अदिति को रचा। कश्यप के पश्चात्, दस वर्ष बीतने पर, अत्रि को रचा।

श्लोक 43 (garuda.2.62.43)

अत्रेरनन्तरं ब्रह्मा दशवर्षादनन्तरम् । अजीजनद्भरद्वाजं वसिष्ठ तदनतरम्

atreranantaraṃ brahmā daśavarṣādanantaram | ajījanadbharadvājaṃ vasiṣṭha tadanataram

अत्रि के पश्चात्, दस वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने भरद्वाज को उत्पन्न किया, और उसके बाद वसिष्ठ को।

श्लोक 44 (garuda.2.62.44)

दशवर्षानन्तरं तु तेषां भार्याः क्रमेण तु । संवत्सरानन्तरेण असृजत्कमलासनः

daśavarṣānantaraṃ tu teṣāṃ bhāryāḥ krameṇa tu | saṃvatsarānantareṇa asṛjatkamalāsanaḥ

दस वर्ष पश्चात् उनकी पत्नियों को भी क्रमशः रचा। एक वर्ष पश्चात् कमलासन (ब्रह्मा) ने उन्हें उत्पन्न किया।

श्लोक 45 (garuda.2.62.45)

वसिष्ठस्यानन्तरं तु गौतमं ह्यसृजत्प्रभुः । दशवर्षानन्तरेण जमदग्निं ततोऽसृजत्

vasiṣṭhasyānantaraṃ tu gautamaṃ hyasṛjatprabhuḥ | daśavarṣānantareṇa jamadagniṃ tato'sṛjat

वसिष्ठ के पश्चात् प्रभु ने गौतम को रचा। दस वर्ष पश्चात् उन्होंने जमदग्नि को रचा।

श्लोक 46 (garuda.2.62.46)

दशवर्षानन्तरेण मनुर्वैवस्वतोऽभवत् । मनोरनन्तरं जज्ञे शतवर्षादनन्तरम्

daśavarṣānantareṇa manurvaivasvato'bhavat | manoranantaraṃ jajñe śatavarṣādanantaram

दस वर्ष पश्चात् मनु वैवस्वत उत्पन्न हुए। मनु के पश्चात्, सौ वर्ष बीतने पर, जन्म हुआ...

श्लोक 47 (garuda.2.62.47)

विष्वक्सेनो महाभागो वायुपुत्रो महाबलः । तस्माच्चतुर्दशे वर्षे गणपो ह्यभवद्विभोः

viṣvakseno mahābhāgo vāyuputro mahābalaḥ | tasmāccaturdaśe varṣe gaṇapo hyabhavadvibhoḥ

...महाबली विष्वक्सेन, जो वायु के महाप्रतापी पुत्र हैं। उनसे चौदहवें वर्ष में प्रभु के गणप (गणेश) उत्पन्न हुए।

श्लोक 48 (garuda.2.62.48)

तदनन्तरजो वीन्द्र अष्टवर्षादनन्तरम् । धनपो ह्यभवत्तत्र तद्भार्या वत्सरे परे

tadanantarajo vīndra aṣṭavarṣādanantaram | dhanapo hyabhavattatra tadbhāryā vatsare pare

हे विहंगेन्द्र! उसके पश्चात्, आठ वर्ष बीतने पर, वहाँ धनप (कुबेर) उत्पन्न हुए। और अगले वर्ष उनकी पत्नी उत्पन्न हुई।

श्लोक 49 (garuda.2.62.49)

विष्वक्सेनानन्तरं तु दशवर्षादनन्तरम् । जयादीन्भ गवद्भक्तान्सृष्टवान् कमलासनः

viṣvaksenānantaraṃ tu daśavarṣādanantaram | jayādīnbha gavadbhaktānsṛṣṭavān kamalāsanaḥ

विष्वक्सेन के पश्चात्, दस वर्ष बीतने पर, कमलासन ने भगवान के भक्त जय आदि को रचा।

श्लोक 50 (garuda.2.62.50)

जयाद्यानन्तरं ब्रह्मा वल्लाद्याः कर्मदेवताः । शतवर्षानन्तरं तु सृष्टवाञ्छिववाहनम्

jayādyānantaraṃ brahmā vallādyāḥ karmadevatāḥ | śatavarṣānantaraṃ tu sṛṣṭavāñchivavāhanam

जय आदि के पश्चात् ब्रह्मा ने वल्ल आदि कर्म-देवताओं को रचा। सौ वर्ष पश्चात् उन्होंने शिव के वाहन (नन्दी) को रचा।

श्लोक 51 (garuda.2.62.51)

कर्मदेवानन्तरं तु त्रिंशद्वर्षादनन्तरम् । पर्जन्यमसृजद्ब्रह्मा मन्त्रयन्त्राभिमानिनम्

karmadevānantaraṃ tu triṃśadvarṣādanantaram | parjanyamasṛjadbrahmā mantrayantrābhimāninam

कर्म-देवताओं के पश्चात्, तीस वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने मन्त्र-यन्त्रों के अभिमानी देवता पर्जन्य को रचा।

श्लोक 52 (garuda.2.62.52)

पर्जन्यानन्तरं ब्रह्मा दशवर्षादनन्तरम् । पुष्करं जनयामास कर्मतत्त्वाभिमानिनम्

parjanyānantaraṃ brahmā daśavarṣādanantaram | puṣkaraṃ janayāmāsa karmatattvābhimāninam

पर्जन्य के पश्चात्, दस वर्ष बीतने पर, ब्रह्मा ने कर्म-तत्त्व के अभिमानी देवता पुष्कर को उत्पन्न किया।

श्लोक 53 (garuda.2.62.53)

एवं विनिर्ममे ब्रह्मा मत्प्रसादात्खगेश्वर । एवं ज्ञात्वा मोक्षमेति नान्यथा तु कथञ्चन

evaṃ vinirmame brahmā matprasādātkhageśvara | evaṃ jñātvā mokṣameti nānyathā tu kathañcana

हे पक्षिराज! इस प्रकार ब्रह्मा ने मेरी कृपा से इन सबको रचा। इसे जानकर ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है, अन्यथा कदापि नहीं।

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