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उत्तरखण्ड · अध्याय 67

रुद्र के रोदन का कारण तथा आनन्द के तारतम्य का वर्णन

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (garuda.2.67.1)

श्रीकृष्ण उवाच । अथानन्तरजान्वक्ष्ये शृणु पक्षीन्द्रसत्तम । शृणु तान्सावधानेन श्रुत्वा तानवधारय

śrīkṛṣṇa uvāca athānantarajānvakṣye śṛṇu pakṣīndrasattama śṛṇu tānsāvadhānena śrutvā tānavadhāraya

श्रीकृष्ण ने कहा — अब इसके बाद उत्पन्न होने वालों का वर्णन करूँगा, हे पक्षीन्द्र-श्रेष्ठ! ध्यानपूर्वक सुनो, और सुनकर उन्हें भलीभाँति धारण करो।

श्लोक 2 (garuda.2.67.2)

पुरुषाख्यविरिञ्चानुजातः शेषो महाबलः । हरे रमायाश्च यस्य स्वस्मिन्निद्रां प्रकुर्वतः

puruṣākhyaviriñcānujātaḥ śeṣo mahābalaḥ hare ramāyāśca yasya svasminnidrāṁ prakurvataḥ

'पुरुष' नामक विरिंचि के पश्चात् महाबली शेष उत्पन्न हुए; वे हरि और रमा की जिस पर शय्या होती है—

श्लोक 3 (garuda.2.67.3)

शयनार्थमभूदेष तेन कृत्यं हरेर्न तु । सर्वदा हरिदासोहं सर्वदा हरिपूजकः

śayanārthamabhūdeṣa tena kṛtyaṁ harerna tu sarvadā haridāsohaṁ sarvadā haripūjakaḥ

—वे इसी शयन-प्रयोजन के लिए हुए, इससे भिन्न कोई स्वतंत्र कृत्य उनका नहीं है। 'मैं सदा हरि का दास हूँ, सदा हरि का पूजक हूँ,

श्लोक 4 (garuda.2.67.4)

हरे सदा नमामि त्वां बहु जन्मनि जन्मनि । एवं बुद्ध्वा तु गरुडो ह्यभूच्च शयनं हरेः

hare sadā namāmi tvāṁ bahu janmani janmani evaṁ buddhvā tu garuḍo hyabhūcca śayanaṁ hareḥ

हे हरि! मैं जन्म-जन्मान्तर में सदा तुम्हें नमस्कार करता हूँ' — ऐसा निश्चय कर, हे गरुड! वे हरि की शय्या बने।

श्लोक 5 (garuda.2.67.5)

सूत्रनाम्नस्तथा वायोः सदायं विनतासुत । कालनामा च गरुडो वाहनार्थं हरेरभूत्

sūtranāmnastathā vāyoḥ sadāyaṁ vinatāsuta kālanāmā ca garuḍo vāhanārthaṁ harerabhūt

हे विनतासुत! इसी प्रकार 'सूत्र' नामधारी वायु के साथ, तथा 'काल' नामधारी तुम गरुड भी, हरि के वाहन के लिए हुए।

श्लोक 6 (garuda.2.67.6)

ततो महत्तत्त्वतनोर्विरिञ्चात्तु खगेश्वर । अहं कारात्मको रुद्रः समभूत्सोवितुं हरिम्

tato mahattattvatanorviriñcāttu khageśvara ahaṁ kārātmako rudraḥ samabhūtsovituṁ harim

हे खगेश्वर! तत्पश्चात् महत्तत्त्व-शरीर वाले विरिंचि से अहंकार-स्वरूप रुद्र हरि की सेवा के लिए उत्पन्न हुए।

श्लोक 7 (garuda.2.67.7)

त्रय एते महाभाग परस्परसमाः स्मृताः । गायत्रीभारतीभ्यां ते त्रयः शतगुणा वराः

traya ete mahābhāga parasparasamāḥ smṛtāḥ gāyatrībhāratībhyāṁ te trayaḥ śataguṇā varāḥ

हे महाभाग! ये तीनों (शेष, गरुड, रुद्र) परस्पर समान माने गए हैं; ये तीनों गायत्री और भारती से सौ गुना श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 8 (garuda.2.67.8)

शेषः स एव विज्ञेयो भक्तो नारायणस्य च । विष्णोर्वायोरनन्तस्य त्रिभिरंशैर्युतः सदा

śeṣaḥ sa eva vijñeyo bhakto nārāyaṇasya ca viṣṇorvāyoranantasya tribhiraṁśairyutaḥ sadā

वही शेष नारायण के भक्त जानने चाहिए; वे सदा विष्णु, वायु और अनन्त — इन तीनों के अंशों से युक्त रहते हैं।

श्लोक 9 (garuda.2.67.9)

सुमित्रांशो दशरथाज्जातो यो लक्ष्मणः खग । सोपि शेषस्तु विज्ञेयो वाय्वनन्तांशसंयुतः

sumitrāṁśo daśarathājjāto yo lakṣmaṇaḥ khaga sopi śeṣastu vijñeyo vāyvanantāṁśasaṁyutaḥ

हे खग! दशरथ से सुमित्रा के अंशरूप में जो उत्पन्न हुए, वे लक्ष्मण भी शेष ही जानने चाहिए, जो वायु और अनन्त के अंशों से युक्त थे।

श्लोक 10 (garuda.2.67.10)

रामस्य सेवां कर्तुं सा सीता भूम्यां खगाधिप । बलभद्रस्तु रोहिण्यां वसुदेवादभूत्खग

rāmasya sevāṁ kartuṁ sā sītā bhūmyāṁ khagādhipa balabhadrastu rohiṇyāṁ vasudevādabhūtkhaga

हे खगाधिप! राम की सेवा के लिए वे ही सीता पृथ्वी पर प्रकट हुईं। बलभद्र वसुदेव से रोहिणी के गर्भ में उत्पन्न हुए, हे खग!

श्लोक 11 (garuda.2.67.11)

सोयमेप तु विज्ञेयस्त्वंशद्वयसमन्वितः । आविष्टः शुक्लकृष्णे हरिणा रोहिणीसुतः

soyamepa tu vijñeyastvaṁśadvayasamanvitaḥ āviṣṭaḥ śuklakṛṣṇe hariṇā rohiṇīsutaḥ

रोहिणी के वे ही पुत्र दो अंशों से युक्त जानने चाहिए, जिनमें हरि ने श्वेत और श्याम — दोनों रूपों में प्रवेश किया।

श्लोक 12 (garuda.2.67.12)

त्रय एते माहाभागावताराः फणिनः स्मृताः । न वीन्द्रास्यावतारोस्ति भूम्यां चाज्ञा तथा हरेः

traya ete māhābhāgāvatārāḥ phaṇinaḥ smṛtāḥ na vīndrāsyāvatārosti bhūmyāṁ cājñā tathā hareḥ

ये तीनों महाभाग शेषनाग के अवतार माने गए हैं। हे वीन्द्र! हरि की आज्ञा के बिना पृथ्वी पर शेष का कोई अवतार नहीं होता।

श्लोक 13 (garuda.2.67.13)

रुद्रावतारान्वक्ष्येहं ताञ्छृणु त्वं समाहितः । योहङ्कारात्मको रुद्रः स एवाभूत्खगेश्वर

rudrāvatārānvakṣyehaṁ tāñchṛṇu tvaṁ samāhitaḥ yohaṅkārātmako rudraḥ sa evābhūtkhageśvara

अब रुद्र के अवतारों का वर्णन करूँगा, सावधान होकर सुनो। हे खगेश्वर! अहंकार-स्वरूप वही रुद्र—

श्लोक 14 (garuda.2.67.14)

सदाशिव इति त्वाख्यामवाप स विनाशकः । तमोभिमानी स ज्ञेयस्त्वशिवत्वात्सदाशिवः

sadāśiva iti tvākhyāmavāpa sa vināśakaḥ tamobhimānī sa jñeyastvaśivatvātsadāśivaḥ

—संहारकर्ता होने के कारण 'सदाशिव' नाम को प्राप्त हुए। तमोगुण के अधिष्ठाता वे अशिव (अमंगल) होने के कारण ही 'सदाशिव' जानने चाहिए।

श्लोक 15 (garuda.2.67.15)

कपालमालामशिवां सदा धारयते यतः । अतः सदाऽशिवो ज्ञेयो न च भागवतः शिवः

kapālamālāmaśivāṁ sadā dhārayate yataḥ ataḥ sadā'śivo jñeyo na ca bhāgavataḥ śivaḥ

चूँकि वे सदा अमंगल कपाल-माला धारण करते हैं, इसलिए वे सदा-अशिव जानने चाहिए, न कि भागवतों के (वास्तविक) शिव।

श्लोक 16 (garuda.2.67.16)

गजाजिनं चापवित्रं यतो धारयते हरः । लोकानमङ्गलान्सर्वान्हरते च सदा हरः

gajājinaṁ cāpavitraṁ yato dhārayate haraḥ lokānamaṅgalānsarvānharate ca sadā haraḥ

हर अपवित्र गजचर्म धारण करते हैं, और सदा समस्त लोकों से मंगल को दूर करते हैं।

श्लोक 17 (garuda.2.67.17)

हर्याज्ञया सदा लोकान्विषयासक्तचेतसः । विमुखान्कुरुते यस्माद्विष्णोस्तस्मात्सदाशिवः

haryājñayā sadā lokānviṣayāsaktacetasaḥ vimukhānkurute yasmādviṣṇostasmātsadāśivaḥ

हरि की आज्ञा से, वे सदा विषयासक्त-चित्त लोगों को विष्णु से विमुख करते हैं, इसीलिए वे 'सदाशिव' कहलाते हैं।

श्लोक 18 (garuda.2.67.18)

कदाचिदसुरावेशाद्विरुद्धं कुरुते हरः । अतः सदाशिवो ज्ञेयो न च भागवतः शिवः

kadācidasurāveśādviruddhaṁ kurute haraḥ ataḥ sadāśivo jñeyo na ca bhāgavataḥ śivaḥ

कभी-कभी असुर-आवेश के कारण हर विपरीत आचरण भी करते हैं; इसीलिए वे सदाशिव (इस सीमित अर्थ में) जानने चाहिए, भागवतों के वास्तविक शिव नहीं।

श्लोक 19 (garuda.2.67.19)

सोयं श्मशानवसतिं कर्तुमैच्छद्यतो हरः । अतः सदाशिवो ज्ञेयो न च भागवतः शिवः

soyaṁ śmaśānavasatiṁ kartumaicchadyato haraḥ ataḥ sadāśivo jñeyo na ca bhāgavataḥ śivaḥ

चूँकि यही हर श्मशान में निवास करना चाहते थे, इसलिए वे सदाशिव जानने चाहिए, न कि भागवतों के शिव।

श्लोक 20 (garuda.2.67.20)

दशवर्षं तपः कर्तुं विवेश लवणांभसि । अतो रुद्रस्तपः संज्ञामवाप च खगोत्तम

daśavarṣaṁ tapaḥ kartuṁ viveśa lavaṇāṁbhasi ato rudrastapaḥ saṁjñāmavāpa ca khagottama

वे दस वर्ष तक तप करने के लिए खारे समुद्र में प्रविष्ट हुए; इसीलिए रुद्र ने 'तप' नाम प्राप्त किया, हे खगोत्तम!

श्लोक 21 (garuda.2.67.21)

व्यासपुत्रः शुकः प्रोक्तो वायोरावेशसंयुतः । रुद्रावतारो विज्ञेयो ज्ञानार्थमभवद्भुवि

vyāsaputraḥ śukaḥ prokto vāyorāveśasaṁyutaḥ rudrāvatāro vijñeyo jñānārthamabhavadbhuvi

व्यासपुत्र शुक, वायु के आवेश से युक्त, रुद्र का ही अवतार जानने चाहिए, जो ज्ञान के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए।

श्लोक 22 (garuda.2.67.22)

अत्रिपत्न्यनुसूयायां जज्ञे रुद्रो महातपाः । दुर्वासास्तु स विज्ञेयो मानभङ्गाय भूभृताम्

atripatnyanusūyāyāṁ jajñe rudro mahātapāḥ durvāsāstu sa vijñeyo mānabhaṅgāya bhūbhṛtām

महातपस्वी रुद्र अत्रि की पत्नी अनसूया के गर्भ से उत्पन्न हुए; वे ही दुर्वासा जानने चाहिए, जो राजाओं का मानभंग करने के लिए प्रकट हुए।

श्लोक 23 (garuda.2.67.23)

द्रोणाज्जातो द्रौणिसंज्ञो रुद्र एव प्रकीर्तितः । प्रारब्धं भोक्तुकामोसौ परपक्षप्रकाशकः

droṇājjāto drauṇisaṁjño rudra eva prakīrtitaḥ prārabdhaṁ bhoktukāmosau parapakṣaprakāśakaḥ

द्रोण से उत्पन्न 'द्रौणि' नामक (अश्वत्थामा) रुद्र ही कहे गए हैं; अपने प्रारब्ध का भोग करने की इच्छा से वे विपक्ष के भेद खोलने वाले हैं।

श्लोक 24 (garuda.2.67.24)

ईशानकोणे संस्थितो यस्तु रुद्रो ह्यवाप वै वामदेवेति संज्ञाम् । स्ववामभागे संस्थितं चैव वायुस्तं योग्यभक्तं सेवते सर्वदैव

īśānakoṇe saṁsthito yastu rudro hyavāpa vai vāmadeveti saṁjñām svavāmabhāge saṁsthitaṁ caiva vāyustaṁ yogyabhaktaṁ sevate sarvadaiva

ईशानकोण में स्थित जो रुद्र हैं, उन्होंने 'वामदेव' नाम प्राप्त किया; उनके ही बाईं ओर स्थित वायु उन योग्य भक्त की सदा सेवा करते हैं।

श्लोक 25 (garuda.2.67.25)

अतो रुद्रो वामदेवेति संज्ञा मवाप शिष्टत्वमथोत्तमत्वम् । कालात्मकत्वं च बलात्मकत्वमवाप रुद्रो न तु सुंदरत्वतः

ato rudro vāmadeveti saṁjñā mavāpa śiṣṭatvamathottamatvam kālātmakatvaṁ ca balātmakatvamavāpa rudro na tu suṁdaratvataḥ

इसीलिए रुद्र ने 'वामदेव' नाम के साथ शिष्टता और श्रेष्ठता प्राप्त की; रुद्र ने काल-स्वरूपता और बल-स्वरूपता प्राप्त की, न कि सौंदर्य के कारण यह नाम मिला।

श्लोक 26 (garuda.2.67.26)

सदा रुद्रो त्रिपुरस्थांश्च दैत्यान्विष्णुदुहो हन्तु कामो महात्मा । अघोररूपं धृपवान्रुद्र एव ततस्त्वघोरेति स आप संज्ञाम्

sadā rudro tripurasthāṁśca daityānviṣṇuduho hantu kāmo mahātmā aghorarūpaṁ dhṛpavānrudra eva tatastvaghoreti sa āpa saṁjñām

त्रिपुर में स्थित, विष्णु-भक्तों के शत्रु दैत्यों का सदा वध करने की इच्छा वाले महात्मा रुद्र ने अघोर रूप धारण किया, इसीलिए वे 'अघोर' नाम को प्राप्त हुए।

श्लोक 27 (garuda.2.67.27)

सेवां कर्तुं त्विच्छतो दैत्यसंघान्किञ्चित्कालं तपसा क्लिश्यमानान् । वरान्दातुं सद्य एवाभिजातः सद्योजातेत्येव संज्ञामवाप

sevāṁ kartuṁ tvicchato daityasaṁghānkiñcitkālaṁ tapasā kliśyamānān varāndātuṁ sadya evābhijātaḥ sadyojātetyeva saṁjñāmavāpa

सेवा करने की इच्छा रखने वाले तथा कुछ काल तक तप से क्लेश पाने वाले दैत्यों को वर देने के लिए वे तत्काल प्रकट हुए; इसीलिए 'सद्योजात' नाम को प्राप्त हुए।

श्लोक 28 (garuda.2.67.28)

उरोः पुत्रस्तु और्वश्च रुद्र एव प्रकीर्तितः । इत्यकृष्टवाचित्वाद्रुस्तुरोदनवाचकः

uroḥ putrastu aurvaśca rudra eva prakīrtitaḥ ityakṛṣṭavācitvādrusturodanavācakaḥ

'उरु' (जांघ) के पुत्र और्व भी रुद्र ही कहे गए हैं; रोदन-वाचक 'रु' शब्द के सरल न होने के कारण यह नाम पड़ा।

श्लोक 29 (garuda.2.67.29)

उरू रुद्रो ह्यतः प्रोक्तस्तत्पुत्रश्चौर्वसंज्ञकः । रुदमुर्वरितं कर्तुमौर्वोभूद्रुद्र एव सः

urū rudro hyataḥ proktastatputraścaurvasaṁjñakaḥ rudamurvaritaṁ kartumaurvobhūdrudra eva saḥ

इसीलिए रुद्र को 'उरु' कहा गया, और उनके पुत्र 'और्व' संज्ञक हुए; अपने रोदन को प्रचुर करने के लिए वे ही रुद्र और्व बने।

श्लोक 30 (garuda.2.67.30)

गरुड उवाच । रोदनं कुरुते कस्मादुरुसंज्ञो हरे हरः । रुदमुर्वरितं कस्मात्कुरुते और्वाकारकः

garuḍa uvāca rodanaṁ kurute kasmādurusaṁjño hare haraḥ rudamurvaritaṁ kasmātkurute aurvākārakaḥ

गरुड ने कहा — हे हरि! 'उरु' नामधारी हर रोदन क्यों करते हैं? 'और्व' रूप धारण करने वाले वे रोदन को प्रचुर क्यों करते हैं?

श्लोक 31 (garuda.2.67.31)

एतद्विस्तार्य मेब्रूहि पौत्राय तव सुव्रत । इत्युक्तस्तेन स हरिरुवाच करुणानिधिः

etadvistārya mebrūhi pautrāya tava suvrata ityuktastena sa hariruvāca karuṇānidhiḥ

हे सुव्रत! अपने पौत्र (शिष्य) को यह विस्तार से बताइए। ऐसा कहे जाने पर करुणानिधि हरि ने कहा—

श्लोक 32 (garuda.2.67.32)

श्रीकृष्ण उवाच । दृष्ट्वा स्वबिंबं सुगुणैस्तु पूर्णं संकर्षणाख्यं नतपादपद्म् । श्रीब्रह्मशेषैर्जिष्णुकामैस्तथान्यैर्भारत्या वै स्वस्ति पैश्चापि नित्यम्

śrīkṛṣṇa uvāca dṛṣṭvā svabiṁbaṁ suguṇaistu pūrṇaṁ saṁkarṣaṇākhyaṁ natapādapadm śrībrahmaśeṣairjiṣṇukāmaistathānyairbhāratyā vai svasti paiścāpi nityam

श्रीकृष्ण ने कहा — श्री, ब्रह्मा, शेष, विजयाकांक्षी अन्य देवताओं तथा भारती द्वारा जिनके चरण-कमलों को नित्य नमन किया जाता है, ऐसे सुगुणपूर्ण 'संकर्षण' नामक अपने ही प्रतिबिम्ब को देखकर—

श्लोक 33 (garuda.2.67.33)

दृष्ट्वा हरिं पुलकाङ्गस्तु रुद्रः सभाष्पचक्षू रुद्धकण्ठश्च हृष्टः । अनाद्यनन्तब्रह्मकल्पेषु नैव कृतं यया स्मरणं सर्वदैव

dṛṣṭvā hariṁ pulakāṅgastu rudraḥ sabhāṣpacakṣū ruddhakaṇṭhaśca hṛṣṭaḥ anādyanantabrahmakalpeṣu naiva kṛtaṁ yayā smaraṇaṁ sarvadaiva

—हरि को देखकर रुद्र का शरीर रोमांचित हो गया, नेत्र अश्रुपूर्ण हुए, कण्ठ अवरुद्ध हो गया, और वे हर्षित हुए — 'अनादि-अनन्त ब्रह्मकल्पों में मैंने सदा ऐसा स्मरण कभी नहीं किया—

श्लोक 34 (garuda.2.67.34)

पादारविन्दे सुनखैर्विभूषिते दृष्टे मया केन पुण्येन देव । दृष्ट्वादृष्ट्वा पादपद्मं मुरारेः पुनः पुना रुद्धकण्ठो बभूव

pādāravinde sunakhairvibhūṣite dṛṣṭe mayā kena puṇyena deva dṛṣṭvādṛṣṭvā pādapadmaṁ murāreḥ punaḥ punā ruddhakaṇṭho babhūva

—हे देव! किस पुण्य से मैंने सुन्दर नखों से विभूषित तुम्हारे चरण-कमल देखे?' बार-बार मुरारि के चरण-कमल देखकर उनका कण्ठ बार-बार अवरुद्ध हो गया।

श्लोक 35 (garuda.2.67.35)

रुरोद रुद्रो भयकंपिताङ्गः कथं पुनर्दर्शनं मे प्रभोः स्यात् । मुकुन्द नारायण विश्वमूर्ते वागिन्द्रियेण स्तवनं मे कथं स्यात्

ruroda rudro bhayakaṁpitāṅgaḥ kathaṁ punardarśanaṁ me prabhoḥ syāt mukunda nārāyaṇa viśvamūrte vāgindriyeṇa stavanaṁ me kathaṁ syāt

भयकम्पित शरीर से रुद्र रो पड़े — 'मुझे अपने प्रभु का पुनः दर्शन कैसे होगा? हे मुकुन्द! हे नारायण! हे विश्वमूर्ति! मेरी वाणी तुम्हारी स्तुति कैसे कर सकेगी?

श्लोक 36 (garuda.2.67.36)

मद्दर्शनं सर्वदा पापुयुक्तं तथा मद्वाक्सर्वदा पापयुक्ता । मद्दर्शनं सर्वदा स्त्रीषु सक्तमभूच्च ते दर्शनं मे ह्यसक्तम्

maddarśanaṁ sarvadā pāpuyuktaṁ tathā madvāksarvadā pāpayuktā maddarśanaṁ sarvadā strīṣu saktamabhūcca te darśanaṁ me hyasaktam

मेरा दर्शन सदा पापयुक्त रहा है, मेरी वाणी भी सदा पापयुक्त रही है; मेरा दर्शन सदा स्त्रियों में आसक्त रहा है, किन्तु तुम्हारा दर्शन मुझ पर सर्वथा निर्लिप्त रहा है।

श्लोक 37 (garuda.2.67.37)

आसक्तता पुत्रदारादिकानां सम्यक्शक्तिस्तवने नास्ति विष्णोः । विष्णुस्तुतौ नावकाशोस्ति वाचो दृष्टोहं त्वं केन पुण्येन देव

āsaktatā putradārādikānāṁ samyakśaktistavane nāsti viṣṇoḥ viṣṇustutau nāvakāśosti vāco dṛṣṭohaṁ tvaṁ kena puṇyena deva

मेरी आसक्ति पुत्र-पत्नी आदि में है, विष्णु की स्तुति की सम्यक् शक्ति मुझमें नहीं है; मेरी वाणी को विष्णु-स्तुति का अवसर ही नहीं मिलता — हे देव! किस पुण्य से मैंने तुम्हें देखा, और तुमने मुझे देखा?

श्लोक 38 (garuda.2.67.38)

अनन्तकर्णेश सुचन्द्रसंज्ञ श्रोत्रेण नित्यं न कथा श्रुता ते । श्रुता मया बहुधा लोकवार्ता दृष्टो मया त्वं केन पुण्येन देव

anantakarṇeśa sucandrasaṁjña śrotreṇa nityaṁ na kathā śrutā te śrutā mayā bahudhā lokavārtā dṛṣṭo mayā tvaṁ kena puṇyena deva

हे अनन्त-कर्ण, हे सुचन्द्र-संज्ञक! मेरे कानों ने कभी नित्य तुम्हारी कथा नहीं सुनी; मैंने तो बहुधा केवल लौकिक बातें ही सुनी हैं — हे देव! किस पुण्य से मैंने तुम्हें देखा?

श्लोक 39 (garuda.2.67.39)

दृष्ट्वादृष्ट्वा पादपीठं हरेश्च पुनः पुना रुद्धङ्कठो बभूव । रुरोद रुद्रो भयकंपिताङ्गः कथं पुनः श्रवणं स्यात्कथायाः

dṛṣṭvādṛṣṭvā pādapīṭhaṁ hareśca punaḥ punā ruddhaṅkaṭho babhūva ruroda rudro bhayakaṁpitāṅgaḥ kathaṁ punaḥ śravaṇaṁ syātkathāyāḥ

बार-बार हरि की चरण-पीठिका को देखकर उनका कण्ठ बार-बार अवरुद्ध हो गया। भयकम्पित शरीर से रुद्र रो पड़े — 'तुम्हारी कथा का श्रवण मुझे पुनः कैसे प्राप्त होगा?'

श्लोक 40 (garuda.2.67.40)

त्वमीश वैकुण्ठ सुवायुसंज्ञस्त्वदर्पितं गन्धपुष्पादिकं च । सदा न लिप्तं च भुजैर्विलिप्तं तन्मूत्रविष्ठादिमकर्दमाम्बुभिः

tvamīśa vaikuṇṭha suvāyusaṁjñastvadarpitaṁ gandhapuṣpādikaṁ ca sadā na liptaṁ ca bhujairviliptaṁ tanmūtraviṣṭhādimakardamāmbubhiḥ

हे वैकुण्ठनाथ! हे सुवायु-संज्ञक ईश! तुम्हें अर्पित गन्ध-पुष्पादि को मैंने कभी अपनी भुजाओं से नहीं छुआ; इसके विपरीत वे तो मूत्र-विष्ठा आदि मल के कीचड़-जल से ही लिप्त रही हैं।

श्लोक 41 (garuda.2.67.41)

स्त्रीणां कुचोदैश्च कचोदकैश्चकक्षोदकैर्गात्रजलैर्मुकुन्द । अनर्पितैर्वस्त्रगन्धादिकैश्च दृष्टो मया केन पुण्येन देव

strīṇāṁ kucodaiśca kacodakaiścakakṣodakairgātrajalairmukunda anarpitairvastragandhādikaiśca dṛṣṭo mayā kena puṇyena deva

हे मुकुन्द! स्त्रियों के कुच, केश और कक्ष के जल तथा शरीर के पसीने का ही स्पर्श मैंने पाया है, तुम्हें अर्पित वस्त्र-गन्धादि का नहीं — हे देव! किस पुण्य से मैंने तुम्हें देखा?

श्लोक 42 (garuda.2.67.42)

स्पृष्ट्वास्पृष्ट्वा हरिनिर्माल्यगन्धं पुनः पुना रुद्धकण्ठो बभूव । रुरोद रुद्रो भयकंपिताङ्गः कथं पुनः स्पर्शनं स्यात्सदा मे

spṛṣṭvāspṛṣṭvā harinirmālyagandhaṁ punaḥ punā ruddhakaṇṭho babhūva ruroda rudro bhayakaṁpitāṅgaḥ kathaṁ punaḥ sparśanaṁ syātsadā me

बार-बार हरि के निर्माल्य की सुगन्ध का स्पर्श करके उनका कण्ठ बार-बार अवरुद्ध हो गया। भयकम्पित शरीर से रुद्र रो पड़े — 'मुझे सदा ऐसा स्पर्श पुनः कैसे प्राप्त होगा?'

श्लोक 43 (garuda.2.67.43)

नृसिंह नासास्थित नासिकेश मन्नासया क्वापि सुपद्मसौरभम् । नाघ्रातमित्थं पुनराघ्रातमेव ह्यनर्पितं गन्धपुष्पादिकं च

nṛsiṁha nāsāsthita nāsikeśa mannāsayā kvāpi supadmasaurabham nāghrātamitthaṁ punarāghrātameva hyanarpitaṁ gandhapuṣpādikaṁ ca

हे नृसिंह! हे नासिका में स्थित नासिकेश! मेरी नासिका ने ऐसी सुन्दर कमल-सुगन्ध कभी कहीं ग्रहण नहीं की थी, अब पुनः-पुनः ग्रहण की; अन्यथा वह तो अनर्पित गन्ध-पुष्पादि की ही सूँघने वाली रही है।

श्लोक 44 (garuda.2.67.44)

सुनासिकं सुष्ठुदन्तं मुरारे दृष्टं मुखं केन पुण्येन देव । घ्रात्वा घ्रात्वा विष्णुनिर्माल्यगन्धं पुनः पुना रुद्धकण्ठो बभूव

sunāsikaṁ suṣṭhudantaṁ murāre dṛṣṭaṁ mukhaṁ kena puṇyena deva ghrātvā ghrātvā viṣṇunirmālyagandhaṁ punaḥ punā ruddhakaṇṭho babhūva

हे मुरारि! किस पुण्य से मैंने सुन्दर नासिका और सुन्दर दन्तपंक्ति वाला तुम्हारा मुख देखा? बार-बार विष्णु के निर्माल्य की सुगन्ध सूँघकर उनका कण्ठ बार-बार अवरुद्ध हो गया।

श्लोक 45 (garuda.2.67.45)

रुरोद रुद्रो भयकंपिताङ्गो जिघ्रामि निर्माल्यमिदं कथं ते । जिह्वास्थितो जिह्व संज्ञो मुरारे जिह्वेन्द्रियेणापि तथार्पितं च

ruroda rudro bhayakaṁpitāṅgo jighrāmi nirmālyamidaṁ kathaṁ te jihvāsthito jihva saṁjño murāre jihvendriyeṇāpi tathārpitaṁ ca

भयकम्पित शरीर से रुद्र रो पड़े — 'मैं तुम्हारे इस निर्माल्य को अब कैसे सूँघ रहा हूँ?' हे मुरारि! जिह्वा में स्थित, जिह्वा के अधिष्ठाता! जिह्वेन्द्रिय द्वारा भी वैसे ही अर्पित—

श्लोक 46 (garuda.2.67.46)

नैवेद्यशेषं तुलसीविमिश्रितं विशेषतः पादजलेन सिक्तम् । यो स्नाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम्

naivedyaśeṣaṁ tulasīvimiśritaṁ viśeṣataḥ pādajalena siktam yo snāti nityaṁ purato murāreḥ prāpnoti yajñāyutakoṭipuṇyam

—तुलसीमिश्रित नैवेद्य-शेष को, विशेषतः तुम्हारे चरण-जल से सिक्त होकर, जो मुरारि के आगे नित्य स्नान करता है, वह अरबों-खरबों यज्ञों का पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 47 (garuda.2.67.47)

एतादृशं तव नैवेद्यशेषं न भुक्तं वै सर्वदादित्यरूपम् । अनर्पितं तव देवस्य विष्णोर्भुक्तं मया बहुवारं मुकुन्द

etādṛśaṁ tava naivedyaśeṣaṁ na bhuktaṁ vai sarvadādityarūpam anarpitaṁ tava devasya viṣṇorbhuktaṁ mayā bahuvāraṁ mukunda

हे मुकुन्द! तुम्हारे ऐसे नैवेद्य-शेष को मैंने कभी नहीं खाया, मैं तो सदा सूर्य-रूप ही रहा हूँ; तुम्हें, हे देव विष्णु, अनर्पित वस्तु ही मैंने अनेक बार खाई है।

श्लोक 48 (garuda.2.67.48)

पादारविन्दे नार्पितं भक्ष्यभोज्यं दृष्टो मया केन पुण्येन देव । भुक्त्वाभुक्त्वा हरिनैरवेद्यजातं सुखं त्वदीयं रमया लालितं च

pādāravinde nārpitaṁ bhakṣyabhojyaṁ dṛṣṭo mayā kena puṇyena deva bhuktvābhuktvā harinairavedyajātaṁ sukhaṁ tvadīyaṁ ramayā lālitaṁ ca

हे देव! किस पुण्य से मैंने तुम्हारे चरण-कमल में अर्पित भक्ष्य-भोज्य को देखा? बार-बार हरि के नैवेद्य से प्राप्त उस सुख को खाकर, जो रमा द्वारा लालित है—

श्लोक 49 (garuda.2.67.49)

द्युभ्वाश्रयं तव मूर्धानमाहुः किरीटयुक्तं कुटिलैः कुन्तलैश्च । अनेकजन्मार्जितपुण्यसंचयैर्दृष्टं मया सज्जनसंगमाच्च

dyubhvāśrayaṁ tava mūrdhānamāhuḥ kirīṭayuktaṁ kuṭilaiḥ kuntalaiśca anekajanmārjitapuṇyasaṁcayairdṛṣṭaṁ mayā sajjanasaṁgamācca

—स्वर्ग-पृथ्वी के आश्रयभूत, घुँघराले केशों तथा किरीट से युक्त तुम्हारे मस्तक को अनेक जन्मों के संचित पुण्य तथा सज्जन-संगति से ही मैंने देखा है।

श्लोक 50 (garuda.2.67.50)

अनेकजन्मार्जितपापसंचयैरदर्शनं यास्यति देवदेव । एवं सुभक्त्या च रुरोद रुद्रो दृष्ट्वा हरिं सुर्वगुणैः संपूर्णम्

anekajanmārjitapāpasaṁcayairadarśanaṁ yāsyati devadeva evaṁ subhaktyā ca ruroda rudro dṛṣṭvā hariṁ survaguṇaiḥ saṁpūrṇam

अनेक जन्मों के संचित पाप से मुझे यह दर्शन फिर छूट जाएगा, हे देवदेव!' — इस प्रकार भक्तिपूर्वक रुद्र सर्वगुणसंपन्न हरि को देखकर रो पड़े।

श्लोक 51 (garuda.2.67.51)

पादारविन्दं तव विश्वमूर्ते योगीश्वरैर्हृदये संगृहीतम् । दृष्टं मया दयया वासुदेव द्रक्ष्ये कथं पुनरित्थं रुरोद

pādāravindaṁ tava viśvamūrte yogīśvarairhṛdaye saṁgṛhītam dṛṣṭaṁ mayā dayayā vāsudeva drakṣye kathaṁ punaritthaṁ ruroda

हे विश्वमूर्ति! योगीश्वरों द्वारा हृदय में धारण किए गए तुम्हारे चरण-कमल को मैंने तुम्हारी ही कृपा से देखा है, हे वासुदेव! मैं इसे पुनः कैसे देखूँगा?' — ऐसा कहकर वे रो पड़े।

श्लोक 52 (garuda.2.67.52)

दृष्टं मया त्वरिवले भविनाशिशङ्खचक्रादिकैस्त्रिजगतापि च देव पूर्णम् । एतादृशं त्वदुदरं च कथं रमेश द्रक्ष्ये पुनः पुनरहं त्विति संरुरोद

dṛṣṭaṁ mayā tvarivale bhavināśiśaṅkhacakrādikaistrijagatāpi ca deva pūrṇam etādṛśaṁ tvadudaraṁ ca kathaṁ rameśa drakṣye punaḥ punarahaṁ tviti saṁruroda

'शत्रुओं के लिए दुर्जेय, भव-नाशक, शंख-चक्रादि से सुशोभित तथा तीनों लोकों से परिपूर्ण तुम्हारा उदर मैंने देखा है — हे रमेश! मैं इसे पुनः-पुनः कैसे देखूँगा?' — इस प्रकार वे बार-बार रोए।

श्लोक 53 (garuda.2.67.53)

आनन्दपूर्ण नखपूर्ण सुकेशपूर्ण लोमादिपूर्ण गुणपूर्ण सुघोणपूर्ण । वक्षः स्थलं तव विभोस्तु विशालभूतं सद्भूषणं विमलकौस्तुभशोभि लक्ष्म्या

ānandapūrṇa nakhapūrṇa sukeśapūrṇa lomādipūrṇa guṇapūrṇa sughoṇapūrṇa vakṣaḥ sthalaṁ tava vibhostu viśālabhūtaṁ sadbhūṣaṇaṁ vimalakaustubhaśobhi lakṣmyā

'हे आनन्दपूर्ण! हे सुन्दर नख, केश, रोम और गुणों से परिपूर्ण! तुम्हारा विशाल वक्षःस्थल शुभ आभूषणों तथा लक्ष्मी की शोभा से युक्त निर्मल कौस्तुभमणि से सुशोभित है,

श्लोक 54 (garuda.2.67.54)

सुकोमलं श्रीतुलस्यास्तथैव सुपुष्पितं चन्द नैश्चर्चितं च । एतादृशं तव वक्षः स्थलं च दृष्टं मया तव कारुण्यदृष्ट्या

sukomalaṁ śrītulasyāstathaiva supuṣpitaṁ canda naiścarcitaṁ ca etādṛśaṁ tava vakṣaḥ sthalaṁ ca dṛṣṭaṁ mayā tava kāruṇyadṛṣṭyā

—अत्यन्त कोमल, श्रीतुलसी के सुन्दर पुष्पों से सज्जित, चन्दन से चर्चित — ऐसा तुम्हारा वक्षःस्थल मैंने तुम्हारी करुणा-दृष्टि से देखा है।'

श्लोक 55 (garuda.2.67.55)

पुनः पुनर्दर्शनं मे कथं स्यादेवं रुद्रः स च भक्त्या रुरोद । अतस्तूरुर्नाम संप्राप्य रुद्रस्तत्पुत्रोभूद्दौर्वसंज्ञः स एव

punaḥ punardarśanaṁ me kathaṁ syādevaṁ rudraḥ sa ca bhaktyā ruroda atastūrurnāma saṁprāpya rudrastatputrobhūddaurvasaṁjñaḥ sa eva

'मुझे पुनः-पुनः यह दर्शन कैसे प्राप्त होगा?' — इस प्रकार भक्तिपूर्वक रुद्र रोए। इसी कारण 'उरु' नाम प्राप्त कर रुद्र के पुत्र 'और्व' संज्ञक हुए।

श्लोक 56 (garuda.2.67.56)

यस्माद्रुदं चोर्वरितं वै चकार तस्मात्स रुद्रस्त्वौर्वसंज्ञो बभूव । और्वस्तु लोकान्मोक्षयोग्यांश्च दृष्ट्वा ह्यत्यन्तं वै विषयेष्वेव निष्ठान्

yasmādrudaṁ corvaritaṁ vai cakāra tasmātsa rudrastvaurvasaṁjño babhūva aurvastu lokānmokṣayogyāṁśca dṛṣṭvā hyatyantaṁ vai viṣayeṣveva niṣṭhān

चूँकि उन्होंने रोदन को प्रचुर किया, इसीलिए वे रुद्र 'और्व' संज्ञक हुए। और्व ने मोक्ष के योग्य लोकों को, तथा विषयों में अत्यन्त लीन लोकों को देखकर—

श्लोक 57 (garuda.2.67.57)

स्तुवद्दैव चौर्वो विष्णुपादारविदं स्मृत्वास्मृत्वा रुद्धकण्ठो बभूव । ते पापिष्ठाः पापरूपान्भजन्तो दिनेदिने दुर्विषयान्कदिन्द्रियैः

stuvaddaiva caurvo viṣṇupādāravidaṁ smṛtvāsmṛtvā ruddhakaṇṭho babhūva te pāpiṣṭhāḥ pāparūpānbhajanto dinedine durviṣayānkadindriyaiḥ

—विष्णु के चरण-कमल की स्तुति करते हुए बार-बार स्मरण से कण्ठ अवरुद्ध हो गया — 'ये अत्यन्त पापी, दिन-प्रतिदिन अपनी दुष्ट इन्द्रियों से पापमय विषयों में लगे रहते हैं,

श्लोक 58 (garuda.2.67.58)

कदा चैतान्हेयबुद्ध्या विमुञ्चे न जानेहं चेति सम्यग्रुरोद । एते हि मूर्खा विषयानर्थलब्ध्यै कुर्वन्ति यत्नं परमादरेण

kadā caitānheyabuddhyā vimuñce na jānehaṁ ceti samyagruroda ete hi mūrkhā viṣayānarthalabdhyai kurvanti yatnaṁ paramādareṇa

—इन्हें त्याज्य-बुद्धि से मैं कब मुक्त करूँगा, मुझे नहीं पता' — इस प्रकार वे खूब रोए। 'ये मूर्ख लोग विषयों और धन की प्राप्ति के लिए ही अत्यन्त परिश्रम करते हैं—

श्लोक 59 (garuda.2.67.59)

कदिन्द्रियार्थं हि धनादिकं च त्यजन्ति च सर्वे विषयेषु निष्ठाः । त्वन्मायया मोहितान्नष्टबुद्धीन्कदा चैतान्मुञ्चसे विश्वमूर्ते

kadindriyārthaṁ hi dhanādikaṁ ca tyajanti ca sarve viṣayeṣu niṣṭhāḥ tvanmāyayā mohitānnaṣṭabuddhīnkadā caitānmuñcase viśvamūrte

—अपनी दुष्ट इन्द्रियों के लिए धन आदि त्याग देते हैं, और विषयों में ही लीन रहते हैं। हे विश्वमूर्ति! तुम्हारी माया से मोहित, बुद्धिनष्ट इन लोगों को तुम कब मुक्त करोगे?'

श्लोक 60 (garuda.2.67.60)

स्मृत्वास्मृत्वा वासुदेवस्य मायां रुरोद चौर्वो भयकंपिताङ्गः । अतीव कष्टेन च लोकवृत्त्या श्रिता दैन्यं स्वीयकार्यं विहाय

smṛtvāsmṛtvā vāsudevasya māyāṁ ruroda caurvo bhayakaṁpitāṅgaḥ atīva kaṣṭena ca lokavṛttyā śritā dainyaṁ svīyakāryaṁ vihāya

वासुदेव की माया का बार-बार स्मरण करते हुए, भयकम्पित शरीर से और्व रोए — 'अत्यन्त कष्ट से, लौकिक व्यवहार में, अपने वास्तविक कार्य को त्यागकर ये दीनता का आश्रय लेते हैं,

श्लोक 61 (garuda.2.67.61)

अतीव दैन्येन धनादिकं च संपाद्य सर्वेऽपि सुपापशीलाः । कष्टार्जितं द्रव्यधनादिकं च त्यजन्ति सर्वे पशवो व्यर्थमेव

atīva dainyena dhanādikaṁ ca saṁpādya sarve'pi supāpaśīlāḥ kaṣṭārjitaṁ dravyadhanādikaṁ ca tyajanti sarve paśavo vyarthameva

—अत्यन्त दीनता से धन आदि अर्जित कर, सभी अत्यन्त पापशील बनकर, कष्ट से कमाए धन-वैभव को अन्ततः व्यर्थ ही त्याग देते हैं, सभी पशुतुल्य लोग।

श्लोक 62 (garuda.2.67.62)

सत्पात्रभूते विष्णुबुद्ध्या कदापि त्यजन्ति नैते मायया वै मुरारेः । एषामायुर्व्यर्थमाहुर्महान्तः कथं नष्टा इति सम्यग्रुरोद

satpātrabhūte viṣṇubuddhyā kadāpi tyajanti naite māyayā vai murāreḥ eṣāmāyurvyarthamāhurmahāntaḥ kathaṁ naṣṭā iti samyagruroda

विष्णु-बुद्धि से किसी सुपात्र को कभी नहीं देते, मुरारि की माया के वशीभूत होकर; इनकी आयु व्यर्थ ही गई, ऐसा महात्मा कहते हैं — ये कैसे नष्ट हुए' — इस प्रकार वे खूब रोए।

श्लोक 63 (garuda.2.67.63)

एषामायुर्व्यर्थमेवं गतं च एषां दृष्ट्वा यौवनं तु ध्रुवं च । स्कन्धस्थमृत्युर्हसते कृष्ण विष्णो तं वै न जानन्ति विमूढचेतसः

eṣāmāyurvyarthamevaṁ gataṁ ca eṣāṁ dṛṣṭvā yauvanaṁ tu dhruvaṁ ca skandhasthamṛtyurhasate kṛṣṇa viṣṇo taṁ vai na jānanti vimūḍhacetasaḥ

'इस प्रकार इनकी आयु व्यर्थ ही बीत गई; इनकी युवावस्था को ध्रुव मानकर देखते हुए, हे कृष्ण! हे विष्णु! मृत्यु इनके कंधे पर बैठी हँसती है, पर ये मूढ़चित्त उसे जानते ही नहीं।

श्लोक 64 (garuda.2.67.64)

गृहं मदीयं शतवर्षं च जीवेत्पुत्रा मदीया शवतवर्षं तथैव । अहं च जीवे शतवर्षं सुखेन मदीयभार्यापि सुलक्षणाऽस्ते

gṛhaṁ madīyaṁ śatavarṣaṁ ca jīvetputrā madīyā śavatavarṣaṁ tathaiva ahaṁ ca jīve śatavarṣaṁ sukhena madīyabhāryāpi sulakṣaṇā'ste

'मेरा घर सौ वर्ष तक चलेगा, मेरे पुत्र भी सौ वर्ष तक जिएँगे, मैं स्वयं सौ वर्ष सुखपूर्वक जिऊँगा, मेरी सुलक्षणा पत्नी भी साथ रहेगी,

श्लोक 65 (garuda.2.67.65)

गावश्च मे संति सदुग्धपूर्णा मित्राणि मे संति मुदा हि युक्ताः । दास्ये सुतं वारणार्थं तु वध्वै पुत्रीं विवाहार्थमहं ददामि

gāvaśca me saṁti sadugdhapūrṇā mitrāṇi me saṁti mudā hi yuktāḥ dāsye sutaṁ vāraṇārthaṁ tu vadhvai putrīṁ vivāhārthamahaṁ dadāmi

—मेरी गायें अच्छे दूध से परिपूर्ण हैं, मेरे मित्र आनन्दयुक्त हैं; मैं वधू के लिए पुत्र को दूँगा, पुत्री का विवाह भी कर दूँगा,

श्लोक 66 (garuda.2.67.66)

दास्ये चाहं सत्सु पुत्रीं धनं वा दास्ये चाहं धनिकेष्वेव नित्यम् । अदृष्टशून्यान् भगवान्वासुदेवो दृष्ट्वादृष्ट्वा हसते सर्वदैव

dāsye cāhaṁ satsu putrīṁ dhanaṁ vā dāsye cāhaṁ dhanikeṣveva nityam adṛṣṭaśūnyān bhagavānvāsudevo dṛṣṭvādṛṣṭvā hasate sarvadaiva

—सत्पुरुषों को अपनी पुत्री या धन दूँगा, धनवानों को ही सदा दूँगा' — इस प्रकार भविष्य-दृष्टि से शून्य इन लोगों को देख-देखकर भगवान वासुदेव सदा हँसते हैं।

श्लोक 67 (garuda.2.67.67)

नाहं करिष्ये श्रवणं कथाया मद्भाग्यना शश्च भविष्यतीति । नाहं हरिं पूजयिष्ये सदैव पुत्रादिनाशश्च भविष्यतीति

nāhaṁ kariṣye śravaṇaṁ kathāyā madbhāgyanā śaśca bhaviṣyatīti nāhaṁ hariṁ pūjayiṣye sadaiva putrādināśaśca bhaviṣyatīti

'मैं (हरि की) कथा नहीं सुनूँगा, फिर भी मेरा भाग्य बढ़ता रहेगा' — 'मैं हरि की पूजा कभी नहीं करूँगा, फिर भी मेरे पुत्रादि का नाश नहीं होगा' —

श्लोक 68 (garuda.2.67.68)

कालेकाले दिष्टनामा हरिस्तु फलप्रदो वासुदेवोऽखिलस्य । एतादृशान्मूर्खजनांश्च दृष्ट्वा रुरोद चौर्वो वासुदेवैकनिष्ठः

kālekāle diṣṭanāmā haristu phalaprado vāsudevo'khilasya etādṛśānmūrkhajanāṁśca dṛṣṭvā ruroda caurvo vāsudevaikaniṣṭhaḥ

—किन्तु समय-समय पर 'दिष्ट' नामधारी हरि वासुदेव ही सबका फल देने वाले हैं' — ऐसे मूर्ख लोगों को देखकर, वासुदेव में एकनिष्ठ और्व रो पड़े।

श्लोक 69 (garuda.2.67.69)

अतस्त्वौर्वो रुद्ररूपी खगेन्द्र जानीहि नित्यं कृष्णसुशिक्षितार्थः । यदा सती दक्षपुत्री खगेन्द्र दक्षाध्वरे स्वशरीरं विसृज्य

atastvaurvo rudrarūpī khagendra jānīhi nityaṁ kṛṣṇasuśikṣitārthaḥ yadā satī dakṣaputrī khagendra dakṣādhvare svaśarīraṁ visṛjya

हे खगेन्द्र! इसीलिए रुद्र-रूपधारी और्व को कृष्ण-तत्त्व में सुशिक्षित जानो। हे खगेन्द्र! जब दक्ष-पुत्री सती ने दक्ष-यज्ञ में अपना शरीर त्याग दिया—

श्लोक 70 (garuda.2.67.70)

जज्ञे पुनर्मेनकायां हिमाद्रेस्तदा रुद्रस्त्वौर्वसंज्ञा मवाप । ऊर्ध्वरेता भवेत्युक्त्वा ऊर्ध्वरेता बभूव ह

jajñe punarmenakāyāṁ himādrestadā rudrastvaurvasaṁjñā mavāpa ūrdhvaretā bhavetyuktvā ūrdhvaretā babhūva ha

—और पुनः हिमालय की कन्या मेनका के रूप में जन्म लिया, तब रुद्र ने 'और्व' नाम प्राप्त किया; 'मैं ऊर्ध्वरेता रहूँगा' — ऐसा प्रतिज्ञा कर वे ऊर्ध्वरेता बन गए।

श्लोक 71 (garuda.2.67.71)

पाणिग्राहं रुद्रदेवो महात्मा यदा हिमाद्रेः कन्यकायाश्चकार । तस्यां परं लंपटः संबभूव अतो रुद्रः परसंज्ञामवाप

pāṇigrāhaṁ rudradevo mahātmā yadā himādreḥ kanyakāyāścakāra tasyāṁ paraṁ laṁpaṭaḥ saṁbabhūva ato rudraḥ parasaṁjñāmavāpa

जब महात्मा रुद्रदेव ने हिमालय की कन्या का पाणिग्रहण किया, तब वे उसमें अत्यन्त अनुरक्त हो गए; इसीलिए रुद्र ने 'पर' (परम अनुरक्त) नाम प्राप्त किया।

श्लोक 72 (garuda.2.67.72)

सदाशिवाद्या दश रुद्रभ्रातरः सौमित्रेयो हौहिणेयस्त्रयश्च । समा एते मोक्षकाले सृतौ च शतैर्गुणैर्न्यूनभूताश्च ताभ्याम्

sadāśivādyā daśa rudrabhrātaraḥ saumitreyo hauhiṇeyastrayaśca samā ete mokṣakāle sṛtau ca śatairguṇairnyūnabhūtāśca tābhyām

सदाशिव आदि रुद्र के दस भाई, सुमित्रापुत्र (लक्ष्मण), और रोहिणीपुत्र (बलराम) के तीनों रूप — ये सब मोक्ष के समय तथा संसरण में समान हैं, किन्तु उन दोनों (शेष और गरुड) से सौ गुना न्यून हैं।

श्लोक 73 (garuda.2.67.73)

गरुड उवाच । आनन्दनिर्णयं ब्रूहि कृष्ण पूर्णदयानिघे । निर्णेतुं ज्ञानिनां यद्वज्ज्ञापनार्थं तथा मम

garuḍa uvāca ānandanirṇayaṁ brūhi kṛṣṇa pūrṇadayānighe nirṇetuṁ jñānināṁ yadvajjñāpanārthaṁ tathā mama

गरुड ने कहा — हे कृष्ण! हे पूर्ण करुणा के भण्डार! मुझे आनन्द के निर्णय (तारतम्य) का वर्णन कीजिए, जैसे ज्ञानीजनों के निश्चय के लिए, वैसे ही मेरे ज्ञान के लिए भी।

श्लोक 74 (garuda.2.67.74)

ब्रूहि शिष्याय दयया उद्धर्तुं मां च सर्वदा । पूर्णकामस्य ते कृष्ण का स्पृहा विद्यते प्रभो

brūhi śiṣyāya dayayā uddhartuṁ māṁ ca sarvadā pūrṇakāmasya te kṛṣṇa kā spṛhā vidyate prabho

अपने शिष्य को कृपापूर्वक बताइए, ताकि मुझे सदा उद्धार मिले। हे कृष्ण! हे प्रभो! पूर्णकाम आपकी और क्या इच्छा शेष रह सकती है?

श्लोक 75 (garuda.2.67.75)

एवमुक्तो हृषीकेशः पक्षीशेन महात्मना । उवाच कृपया कृष्णः प्रसन्नः कमलेक्षणः

evamukto hṛṣīkeśaḥ pakṣīśena mahātmanā uvāca kṛpayā kṛṣṇaḥ prasannaḥ kamalekṣaṇaḥ

महात्मा पक्षिराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, प्रसन्न कमलनयन हृषीकेश कृष्ण ने कृपापूर्वक कहा—

श्लोक 76 (garuda.2.67.76)

श्रीकृष्ण उवाच । गायत्र्याश्च शतानन्द एकानन्दस्तु वेधसः एतादृशः शतानन्दो ब्रह्मणः परिकीर्तितः

śrīkṛṣṇa uvāca gāyatryāśca śatānanda ekānandastu vedhasaḥ etādṛśaḥ śatānando brahmaṇaḥ parikīrtitaḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — गायत्री का आनन्द शतगुण है, ब्रह्मा का आनन्द एक गुण है; ऐसा शतगुणित आनन्द ब्रह्मा का ही कहा गया है (आगे की तुलना के लिए)।

श्लोक 77 (garuda.2.67.77)

शेषादेश्च शतानन्दः सरस्वत्याः खगोत्तम । एकानन्दस्तु विज्ञेयो भारत्या विनतासुत

śeṣādeśca śatānandaḥ sarasvatyāḥ khagottama ekānandastu vijñeyo bhāratyā vinatāsuta

हे खगोत्तम! शेष की अपेक्षा सरस्वती का आनन्द भी शतगुण है; हे विनतासुत! भारती का आनन्द एक गुण जानना चाहिए।

श्लोक 78 (garuda.2.67.78)

एवं तु निर्णयो ज्ञेय आनन्दस्य सदा खग । एवमुक्तं मया सर्वं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

evaṁ tu nirṇayo jñeya ānandasya sadā khaga evamuktaṁ mayā sarvaṁ kimanyacchrotumicchasi

हे खग! इस प्रकार आनन्द का निर्णय सदा जानना चाहिए। मैंने यह सब कह दिया — अब और क्या सुनना चाहते हो?

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