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उत्तरखण्ड · अध्याय 69

भद्रा और मित्रविन्दा द्वारा भगवत्प्राप्ति हेतु तपश्चर्या का वर्णन

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

श्लोक 1 (garuda.2.69.1)

श्रीकृष्ण उवाच । या पूर्वसर्गे नलसंज्ञस्य वीन्द्र पुत्री भूत्वा विष्णुपत्नी सकामा । प्रदक्षिणं भ्रमणं वै चकार गुणेन भद्रा भद्रसंज्ञा बभूव

śrīkṛṣṇa uvāca yā pūrvasarge nalasaṁjñasya vīndra putrī bhūtvā viṣṇupatnī sakāmā pradakṣiṇaṁ bhramaṇaṁ vai cakāra guṇena bhadrā bhadrasaṁjñā babhūva

श्रीकृष्ण ने कहा — हे वीन्द्र! पूर्व सृष्टि में नल नामक की पुत्री होकर विष्णु की पत्नी बनने की कामना से जिसने प्रदक्षिणा की, वह अपने गुण से 'भद्रा' नाम को प्राप्त हुई।

श्लोक 2 (garuda.2.69.2)

कन्याभावे संस्थितां भद्रसंज्ञां पिता नलस्त्वब्रवीत्तां स पश्यन् । भद्रे किमर्थं गात्रपीडां करोषि फलं हि तन्नन्दिनि मे वदस्व

kanyābhāve saṁsthitāṁ bhadrasaṁjñāṁ pitā nalastvabravīttāṁ sa paśyan bhadre kimarthaṁ gātrapīḍāṁ karoṣi phalaṁ hi tannandini me vadasva

कुमारी अवस्था में स्थित भद्रा को देखकर पिता नल ने उससे कहा — 'हे भद्रे! तुम शरीर को क्यों कष्ट देती हो? हे पुत्री! मुझे इसका फल बताओ।'

श्लोक 3 (garuda.2.69.3)

भद्रोवाच । शृणुत्वं मे तात नमस्क्रियादेः फलं वक्तुं का समर्था भवेच्च

bhadrovāca śṛṇutvaṁ me tāta namaskriyādeḥ phalaṁ vaktuṁ kā samarthā bhavecca

भद्रा ने कहा — 'हे तात! सुनिए, नमस्कार आदि के फल का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है?

श्लोक 4 (garuda.2.69.4)

तथाप्यहं तव वक्ष्यामि तात यथाशक्त्या शृणु सम्यग्घिताय । सदा हरिमर्म नाथो दयालुरहं हरेस्तव दासानुदासी । मां पाहि विष्णोस्तव वन्दे पदे इत्युक्त्वा प्रणामं चाकरोद्दण्डरूपम्

tathāpyahaṁ tava vakṣyāmi tāta yathāśaktyā śṛṇu samyagghitāya sadā harimarma nātho dayālurahaṁ harestava dāsānudāsī māṁ pāhi viṣṇostava vande pade ityuktvā praṇāmaṁ cākaroddaṇḍarūpam

फिर भी, हे तात! मैं यथाशक्ति आपको बताती हूँ, आपके ही हित के लिए भलीभाँति सुनिए — हरि के मर्म को सदा जानने वाले, दयालु स्वामी! मैं आपके दास का भी दास हूँ; मेरी रक्षा करो, हे विष्णु! मैं तुम्हारे चरणों की वन्दना करती हूँ' — ऐसा कहकर उसने दण्डवत् प्रणाम किया।

श्लोक 5 (garuda.2.69.5)

हरेः प्रणामं त्विति कर्तव्यशून्यं व्यर्थं तमाहुर्ज्ञानिनस्तच्छृणु त्वम् । रमेश मध्वेश सरस्वतीशेत्येवं वदन्प्रणमेद्विष्णुदेवम्

hareḥ praṇāmaṁ tviti kartavyaśūnyaṁ vyarthaṁ tamāhurjñāninastacchṛṇu tvam rameśa madhveśa sarasvatīśetyevaṁ vadanpraṇamedviṣṇudevam

ज्ञानीजन कहते हैं कि कर्तव्य-भाव से रहित हरि का प्रणाम व्यर्थ है — यह सुनो: 'हे रमेश, हे मध्वेश, हे सरस्वतीश' — ऐसा कहते हुए विष्णु को प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 6 (garuda.2.69.6)

यथा प्रसन्नो वन्दनाद्देवद्देव स्तथा न तुष्टः पूजनात्कर्मतश्च । यथा नामस्मरणाद्वन्दनाद्वा पापान्नियच्छेतु तथा न चान्यैः

yathā prasanno vandanāddevaddeva stathā na tuṣṭaḥ pūjanātkarmataśca yathā nāmasmaraṇādvandanādvā pāpānniyacchetu tathā na cānyaiḥ

जैसे देवाधिदेव वन्दना से प्रसन्न होते हैं, वैसे केवल पूजा और कर्मकाण्ड से नहीं होते; जैसे नाम-स्मरण या वन्दना से पाप का निवारण होता है, वैसे अन्य साधनों से नहीं होता।

श्लोक 7 (garuda.2.69.7)

देहं तु ये पोषयन्त्येव तात हरेः प्रणामैः शून्यभूतं च पुष्टम् । तदेवमाहुर्व्यर्थमेवेति तात तत्पोषकाणां नरके दुः खमाहुः

dehaṁ tu ye poṣayantyeva tāta hareḥ praṇāmaiḥ śūnyabhūtaṁ ca puṣṭam tadevamāhurvyarthameveti tāta tatpoṣakāṇāṁ narake duḥ khamāhuḥ

हे तात! जो केवल शरीर को पोषित करते हैं, जो हरि के प्रणाम से रहित होकर भी पुष्ट है, उसके लिए कहा गया है कि यह सब व्यर्थ है; ऐसे पोषकों के लिए नरक का दुःख कहा गया है।

श्लोक 8 (garuda.2.69.8)

यमोऽपि तं तत्र उलूखले तु निधाय पिष्टं सुखलैः करोति । यो वा परं न करोत्येव तात प्रदक्षिणं देवदेवस्य विष्णोः

yamo'pi taṁ tatra ulūkhale tu nidhāya piṣṭaṁ sukhalaiḥ karoti yo vā paraṁ na karotyeva tāta pradakṣiṇaṁ devadevasya viṣṇoḥ

यम उसे ऊखल में रखकर मूसलों से पीसते हैं, हे तात, जो देवाधिदेव विष्णु की सर्वोत्तम प्रदक्षिणा कभी नहीं करता।

श्लोक 9 (garuda.2.69.9)

तस्यैव पादौ तलयन्त्रे निधाय यमश्च नित्यं प्रकरोति पिष्टम् । एषां जिह्वा हरिकृष्णेति नाम न वक्ति नित्यं व्यर्थभूतां वदन्ति

tasyaiva pādau talayantre nidhāya yamaśca nityaṁ prakaroti piṣṭam eṣāṁ jihvā harikṛṣṇeti nāma na vakti nityaṁ vyarthabhūtāṁ vadanti

उसी के पैरों को यम तेल के कोल्हू में रखकर नित्य पीसते हैं; जिनकी जिह्वा 'हरि-कृष्ण' नाम कभी नहीं कहती, उसे व्यर्थ जिह्वा कहा जाता है।

श्लोक 10 (garuda.2.69.10)

तेषां जिह्वा यमलोके यमस्तु निष्कास्य पिष्टं प्रकरोति नित्यम् । काशीनिवासेन च किं प्रयोजनं किं वा प्रयागे मरणेन तात

teṣāṁ jihvā yamaloke yamastu niṣkāsya piṣṭaṁ prakaroti nityam kāśīnivāsena ca kiṁ prayojanaṁ kiṁ vā prayāge maraṇena tāta

यमलोक में यम उनकी जिह्वा खींचकर नित्य पीसते रहते हैं। काशी-निवास से क्या प्रयोजन, प्रयाग में मरण से भी क्या, हे तात?

श्लोक 11 (garuda.2.69.11)

किं वारणाग्रे मरणेन सौख्यं किं वा मखादेः समनुष्ठितेन । समस्ततीर्थेष्वटनेन किं किमधीतशास्त्रेण सुतीक्ष्णबुद्ध्या

kiṁ vāraṇāgre maraṇena saukhyaṁ kiṁ vā makhādeḥ samanuṣṭhitena samastatīrtheṣvaṭanena kiṁ kimadhītaśāstreṇa sutīkṣṇabuddhyā

वाराणसी के हाथीद्वार पर मरण से क्या सुख, यज्ञ आदि के अनुष्ठान से क्या; समस्त तीर्थों में भ्रमण से क्या, तीक्ष्ण बुद्धि से शास्त्राध्ययन से भी क्या,

श्लोक 12 (garuda.2.69.12)

येषां जिह्वाग्रे हरिनामैव नास्ति येषां गात्रैर्नमनं नापि विष्णोः । येषां पद्भ्यां नास्ति हरेः प्रदक्षिणं तेषां सर्वं व्यर्थमाहुर्महान्तः

yeṣāṁ jihvāgre harināmaiva nāsti yeṣāṁ gātrairnamanaṁ nāpi viṣṇoḥ yeṣāṁ padbhyāṁ nāsti hareḥ pradakṣiṇaṁ teṣāṁ sarvaṁ vyarthamāhurmahāntaḥ

—जिनकी जिह्वा के अग्रभाग पर हरि का नाम नहीं है, जिनका शरीर विष्णु को नमन नहीं करता, जिनके पैर हरि की प्रदक्षिणा नहीं करते — उनका सब कुछ व्यर्थ है, ऐसा महात्मा कहते हैं।

श्लोक 13 (garuda.2.69.13)

हर्यर्पणाद्रिहितं नाम कस्मात्प्रदक्षिणं नमनं चाहुरर्घ्यम् । अतो विष्णोर्नमनं कार्यमेव हरेर्नामस्मरणं तात कार्यम्

haryarpaṇādrihitaṁ nāma kasmātpradakṣiṇaṁ namanaṁ cāhurarghyam ato viṣṇornamanaṁ kāryameva harernāmasmaraṇaṁ tāta kāryam

हरि को अर्पण किए बिना नाम, प्रदक्षिणा, नमन या अर्घ्य किस प्रयोजन का कहा जाए? इसलिए विष्णु को नमन करना ही चाहिए, हे तात! हरि के नाम का स्मरण करना ही चाहिए।

श्लोक 14 (garuda.2.69.14)

जन्म ह्येतद्दुर्लभं नश्वरं तु यथा जलस्थं तत्तथैव । नो विस्वासं कुरु गात्रे त्वदीये जीवेष्वपि स्वः परश्चेति तात

janma hyetaddurlabhaṁ naśvaraṁ tu yathā jalasthaṁ tattathaiva no visvāsaṁ kuru gātre tvadīye jīveṣvapi svaḥ paraśceti tāta

यह मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, फिर भी नाशवान है, जैसे जल पर स्थित बुलबुला। हे तात! अपने शरीर पर विश्वास मत करो, न ही जीवों में 'यह मेरा है, वह पराया' — ऐसा मानो।

श्लोक 15 (garuda.2.69.15)

सद्यः कृतं नमनं न त्वदीयं सद्यः कृतं स्मरणं न त्वदीयम् । कदा प्राप्स्ये मरणं तन्न जाने न विश्वासं कुरु गात्रे महात्मन्

sadyaḥ kṛtaṁ namanaṁ na tvadīyaṁ sadyaḥ kṛtaṁ smaraṇaṁ na tvadīyam kadā prāpsye maraṇaṁ tanna jāne na viśvāsaṁ kuru gātre mahātman

तत्काल किया गया प्रणाम ही तुम्हारा है, तत्काल किया गया स्मरण ही तुम्हारा है; मृत्यु कब आएगी, यह मैं नहीं जानती — शरीर पर विश्वास मत करो, हे महात्मन्!

श्लोक 16 (garuda.2.69.16)

एतच्छ्रुत्वा नलो वीन्द्र पुत्रीवाक्यं सुनिर्मलम् । नमस्कारं च कृतवान्यथाशक्त्या प्रदक्षिणम्

etacchrutvā nalo vīndra putrīvākyaṁ sunirmalam namaskāraṁ ca kṛtavānyathāśaktyā pradakṣiṇam

हे वीन्द्र! पुत्री के इस अत्यन्त निर्मल वचन को सुनकर, नल ने भी यथाशक्ति नमस्कार और प्रदक्षिणा किया।

श्लोक 17 (garuda.2.69.17)

सापि प्रदक्षिणं चक्रे नमस्कारं सदा हरेः । एवं बहुदिनं कृत्वा ध्यात्वा नारायणं परम्

sāpi pradakṣiṇaṁ cakre namaskāraṁ sadā hareḥ evaṁ bahudinaṁ kṛtvā dhyātvā nārāyaṇaṁ param

वह भी सदा हरि की प्रदक्षिणा और नमस्कार करती रही; इस प्रकार बहुत दिनों तक करके, परम नारायण का ध्यान करते हुए—

श्लोक 18 (garuda.2.69.18)

कलेवरं च तत्याज मरणे हरिचिन्तया । मत्पितुर्वसुदेवस्य भगिन्या उदरे खग

kalevaraṁ ca tatyāja maraṇe haricintayā matpiturvasudevasya bhaginyā udare khaga

—मृत्यु के समय हरि-चिन्तन के साथ शरीर त्याग दिया। हे खग! मेरे पिता वसुदेव की बहिन के गर्भ में—

श्लोक 19 (garuda.2.69.19)

कैकेयीति च नाम्ना सा त्वभवद्भद्रसंज्ञका । यस्माद्भद्रगुणैर्युक्ता भद्रा सा भद्रनामिका

kaikeyīti ca nāmnā sā tvabhavadbhadrasaṁjñakā yasmādbhadraguṇairyuktā bhadrā sā bhadranāmikā

—वह 'कैकेयी' नाम से 'भद्रा' संज्ञक हुई; भद्र गुणों से युक्त होने के कारण वह भद्रा ही 'भद्रा' नाम को प्राप्त हुई।

श्लोक 20 (garuda.2.69.20)

तस्यात्मजैश्च कैकेयैः पञ्चभिः खगसत्तम । प्रत्याहृतामिमां भद्रां प्राप्तवान् खगसत्तम

tasyātmajaiśca kaikeyaiḥ pañcabhiḥ khagasattama pratyāhṛtāmimāṁ bhadrāṁ prāptavān khagasattama

हे खगसत्तम! उसके पाँच कैकेय पुत्रों द्वारा वापस लाई गई इस भद्रा को मैंने प्राप्त किया, हे खगसत्तम!

श्लोक 21 (garuda.2.69.21)

वक्ष्येहं मित्रविन्दायाः पाणिग्रहणकारणम् । सावधानमना भूत्वा शृणु पक्षीन्द्र सत्तम

vakṣyehaṁ mitravindāyāḥ pāṇigrahaṇakāraṇam sāvadhānamanā bhūtvā śṛṇu pakṣīndra sattama

अब मैं मित्रविन्दा के पाणिग्रहण का कारण बताऊँगा; सावधानचित्त होकर सुनो, हे पक्षीन्द्र-श्रेष्ठ!

श्लोक 22 (garuda.2.69.22)

मित्रविन्दोवाच । यान्पूर्वसर्गेप्यवृणोन्निकामतो ह्यग्नीषोमान्नामिका मित्रविन्दा । मित्रं हरिं प्राप्तुकामा सदैक तत्रोपायं चिन्तयामासदेवी

mitravindovāca yānpūrvasargepyavṛṇonnikāmato hyagnīṣomānnāmikā mitravindā mitraṁ hariṁ prāptukāmā sadaika tatropāyaṁ cintayāmāsadevī

मित्रविन्दा ने कहा — पूर्व सृष्टि में जो अग्नि-सोम को प्रीतिपूर्वक वरण करती थी, वह मित्रविन्दा नामधारी देवी हरि को मित्र के रूप में पाने की सदा इच्छुक रहकर उसका उपाय सोचने लगी।

श्लोक 23 (garuda.2.69.23)

हरिप्राप्तौ साधनाः संति तेषु मुख्यं कचिच्चिन्तयामास देवी । तेषां मध्ये श्रवणं श्रेष्ठमाहुः पुराणानां सात्त्विकानां सदापि

hariprāptau sādhanāḥ saṁti teṣu mukhyaṁ kaciccintayāmāsa devī teṣāṁ madhye śravaṇaṁ śreṣṭhamāhuḥ purāṇānāṁ sāttvikānāṁ sadāpi

हरि की प्राप्ति के जो साधन हैं, उनमें कौन-सा मुख्य है, यह उस देवी ने सोचा; उनमें सात्त्विक पुराणों का श्रवण ही सदा श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 24 (garuda.2.69.24)

विष्णोरुत्कर्षो वर्तते यत्र वायोस्तथोत्कर्षः सज्जनानां पुराणे । श्राद्धं सदा विष्णुबुद्ध्या सदैव नान्यच्छ्राव्यं साधनं तत्र चैव

viṣṇorutkarṣo vartate yatra vāyostathotkarṣaḥ sajjanānāṁ purāṇe śrāddhaṁ sadā viṣṇubuddhyā sadaiva nānyacchrāvyaṁ sādhanaṁ tatra caiva

जिस पुराण में विष्णु की श्रेष्ठता, वायु तथा सज्जनों की श्रेष्ठता वर्णित है, वहाँ श्राद्ध सदा विष्णु-बुद्धि से ही करना चाहिए; उसके समान अन्य कोई श्रवण-साधन नहीं है।

श्लोक 25 (garuda.2.69.25)

यस्मिन्दिने श्रवणं नास्ति विष्णोस्तेषां जन्म व्यर्थमाहुः कथायाम् । स्नान जपः पञ्चयज्ञं व्रतं च इष्टापूर्ते कृच्छ्रचान्द्रो च दत्तम्

yasmindine śravaṇaṁ nāsti viṣṇosteṣāṁ janma vyarthamāhuḥ kathāyām snāna japaḥ pañcayajñaṁ vrataṁ ca iṣṭāpūrte kṛcchracāndro ca dattam

जिस दिन विष्णु की कथा का श्रवण नहीं होता, उनका जन्म व्यर्थ कहा गया है; स्नान, जप, पंचयज्ञ, व्रत, इष्टापूर्त, कृच्छ्र-चान्द्रायण और दान—

श्लोक 26 (garuda.2.69.26)

सर्वं व्यर्थं वैष्णवानां च दीक्षा कथां विना सम्यगनुष्ठितां वै । यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणं ससंप्रदायैर्गुरुभिः संयुतैश्च

sarvaṁ vyarthaṁ vaiṣṇavānāṁ ca dīkṣā kathāṁ vinā samyaganuṣṭhitāṁ vai yairna śrutaṁ bhāgavataṁ purāṇaṁ sasaṁpradāyairgurubhiḥ saṁyutaiśca

—कथा के बिना, सम्यक् रूप से अनुष्ठित न होने पर, वैष्णवों की दीक्षा भी सब व्यर्थ है; जिन्होंने सम्प्रदाय-सम्पन्न गुरुओं से भागवत पुराण नहीं सुना—

श्लोक 27 (garuda.2.69.27)

यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणं यैर्न श्रुतं ब्रह्मकाण्डं पुराणम् । तेषां जन्म व्यर्थमाहुर्ममहान्तस्तस्माच्छ्राव्या हरिवार्ता सदैव

yairna śrutaṁ bhāgavataṁ purāṇaṁ yairna śrutaṁ brahmakāṇḍaṁ purāṇam teṣāṁ janma vyarthamāhurmamahāntastasmācchrāvyā harivārtā sadaiva

—और जिन्होंने भागवत पुराण नहीं सुना, जिन्होंने ब्रह्मकाण्ड पुराण नहीं सुना — उनका जन्म व्यर्थ है, ऐसा महात्मा कहते हैं; इसलिए हरि-कथा का श्रवण सदा करना चाहिए।

श्लोक 28 (garuda.2.69.28)

न यत्र गोविन्दकथामहानदी न यत्र नारायणपादसंश्रयः । न यत्र विष्णोः सततं वचोस्ति न संवसेत्तत्क्षणमात्रं कथञ्चित्

na yatra govindakathāmahānadī na yatra nārāyaṇapādasaṁśrayaḥ na yatra viṣṇoḥ satataṁ vacosti na saṁvasettatkṣaṇamātraṁ kathañcit

जहाँ गोविन्द-कथा की महानदी नहीं है, जहाँ नारायण के चरणों का आश्रय नहीं है, जहाँ विष्णु की निरन्तर वाणी नहीं है — वहाँ क्षणमात्र भी नहीं रहना चाहिए।

श्लोक 29 (garuda.2.69.29)

यस्मिन् ग्रामे भागवतं न शास्त्रं न वर्तते भागवता रसज्ञाः । यस्मिन् गृहे नास्ति गीतार्थसारः यस्मिन् ग्रामे नाम सहस्रकं वा

yasmin grāme bhāgavataṁ na śāstraṁ na vartate bhāgavatā rasajñāḥ yasmin gṛhe nāsti gītārthasāraḥ yasmin grāme nāma sahasrakaṁ vā

जिस गाँव में भागवत शास्त्र नहीं है, जहाँ रसज्ञ भागवत नहीं रहते; जिस घर में गीता के अर्थ का सार नहीं है, जिस गाँव में सहस्रनाम नहीं है—

श्लोक 30 (garuda.2.69.30)

तयो रसज्ञा यत्र न सन्ति तत्र न संवसेत्क्षणमात्रं कथञ्चित् । यस्मिन् दिने दिव्यकथा च विष्णोर्न वास्ति जन्तोस्तस्य चायुर्वृथैव

tayo rasajñā yatra na santi tatra na saṁvasetkṣaṇamātraṁ kathañcit yasmin dine divyakathā ca viṣṇorna vāsti jantostasya cāyurvṛthaiva

—जहाँ इनके रसज्ञ नहीं हैं, वहाँ क्षणमात्र भी नहीं रहना चाहिए; जिस दिन विष्णु की दिव्य कथा नहीं होती, उस जीव की आयु उस दिन सर्वथा व्यर्थ है।

श्लोक 31 (garuda.2.69.31)

गर्भे गते नात्र विचार्यमस्ति तन्मन्यते दुर्लभं मर्त्यलोके । कर्णं कल्पैर्भूषितं सुंदरं च न सुंदरं चाहुरार्या रसज्ञाः

garbhe gate nātra vicāryamasti tanmanyate durlabhaṁ martyaloke karṇaṁ kalpairbhūṣitaṁ suṁdaraṁ ca na suṁdaraṁ cāhurāryā rasajñāḥ

गर्भ में आने के बाद कोई विचार शेष नहीं रहता; इसे मर्त्यलोक में दुर्लभ मानना चाहिए। आभूषणों से सुसज्जित कान भी, चाहे कितना सुन्दर क्यों न हो, रसज्ञ आर्यजन उसे सुन्दर नहीं कहते—

श्लोक 32 (garuda.2.69.32)

विष्णोः कथाख्याभरणैश्च युक्तं तदेव कर्णं सुंदरं चाहुरार्याः । तस्मात्सदा भागवतार्थसारं शृण्वन्ति ये सततं वाचयन्ति

viṣṇoḥ kathākhyābharaṇaiśca yuktaṁ tadeva karṇaṁ suṁdaraṁ cāhurāryāḥ tasmātsadā bhāgavatārthasāraṁ śṛṇvanti ye satataṁ vācayanti

—विष्णु की कथा-रूपी आभूषण से युक्त वही कान सुन्दर है, ऐसा आर्यजन कहते हैं। इसलिए जो सदा भागवत के अर्थ-सार को सुनते हैं और सुनाते हैं—

श्लोक 33 (garuda.2.69.33)

तेषां जन्म स्वस्थमाहुर्महान्तो महत्फलं चास्ति तथैव तेषाम् । सोष्णीषकञ्चुकयुताश्च हरेः कथां वै शृण्वन्ति येपि च पठन्ति सदैव मर्त्याः

teṣāṁ janma svasthamāhurmahānto mahatphalaṁ cāsti tathaiva teṣām soṣṇīṣakañcukayutāśca hareḥ kathāṁ vai śṛṇvanti yepi ca paṭhanti sadaiva martyāḥ

—उनका जन्म सार्थक है, ऐसा महात्मा कहते हैं, और उनका फल भी महान है। साधारण वेशभूषा वाले जो मनुष्य भी हरि की कथा को सदा सुनते और पढ़ते हैं—

श्लोक 34 (garuda.2.69.34)

सर्वेपि ते पूजनीया हि लोके न वै शिश्रे चोदरे चैव सक्ताः । ये दाक्षिण्यादर्थलोभाद्वदन्ति सदा पुराणं भगवत्तत्त्वसारम्

sarvepi te pūjanīyā hi loke na vai śiśre codare caiva saktāḥ ye dākṣiṇyādarthalobhādvadanti sadā purāṇaṁ bhagavattattvasāram

—वे सब लोक में पूजनीय हैं, जो सुख या उदरपोषण में आसक्त नहीं हैं। जो लोग केवल शिष्टाचार या धन-लोभ से भगवत्तत्त्व के सार, पुराण को कहते हैं—

श्लोक 35 (garuda.2.69.35)

प्रच्छादयन्ते तत्त्वगोप्यानि ये तु तेषां गतिः सूर्यसूनुः सदैव । ये धर्मकाण्डे कर्मकाण्डे सदैव उत्पादयन्ते सुरुचिं तत्र नित्यम्

pracchādayante tattvagopyāni ye tu teṣāṁ gatiḥ sūryasūnuḥ sadaiva ye dharmakāṇḍe karmakāṇḍe sadaiva utpādayante suruciṁ tatra nityam

—और उसके गूढ़ तत्त्वों को छिपाते हैं, उनकी गति सदा सूर्यपुत्र (यम) की ओर है; जो धर्मकाण्ड और कर्मकाण्ड में सदा केवल रुचि उत्पन्न कराते हैं—

श्लोक 36 (garuda.2.69.36)

मौल्येन ये कथयेयुः पुराणं तेषां गतिः सूर्य सुनः सदैव । मौल्येन ये भागवतं पुराणं शृण्वन्ति वै हरिशास्त्रार्थतत्त्वम्

maulyena ye kathayeyuḥ purāṇaṁ teṣāṁ gatiḥ sūrya sunaḥ sadaiva maulyena ye bhāgavataṁ purāṇaṁ śṛṇvanti vai hariśāstrārthatattvam

—मूल्य लेकर पुराण कथन करने वालों की गति सदा सूर्यपुत्र की ओर है; जो मूल्य लेकर भागवत पुराण, हरि-शास्त्र के तत्त्वार्थ को सुनते हैं—

श्लोक 37 (garuda.2.69.37)

मौल्येन वेदाध्ययनं प्रकुर्वते तेषां गतिः सूर्यसूनुः सदैव । यदृच्छया प्राप्तधनेन ये तु संतुष्टास्ते ह्यत्र योग्याः सदैव

maulyena vedādhyayanaṁ prakurvate teṣāṁ gatiḥ sūryasūnuḥ sadaiva yadṛcchayā prāptadhanena ye tu saṁtuṣṭāste hyatra yogyāḥ sadaiva

—मूल्य लेकर वेदाध्ययन कराने वालों की गति भी सदा सूर्यपुत्र की ओर है; परन्तु जो अनायास प्राप्त धन से संतुष्ट रहते हैं, वे ही इसमें सदा योग्य हैं।

श्लोक 38 (garuda.2.69.38)

धनार्जने ये त्वतितृष्णाभियुक्तास्तेषां न वै भागवतेधिकारः । मत्वा लोके हरिरेवति नित्यमन्तर्यामी नास्ति तदन्य ईशः

dhanārjane ye tvatitṛṣṇābhiyuktāsteṣāṁ na vai bhāgavatedhikāraḥ matvā loke harirevati nityamantaryāmī nāsti tadanya īśaḥ

धनार्जन में अत्यधिक तृष्णा से युक्त लोगों का भागवत में कोई अधिकार नहीं है; यह मानकर कि संसार में हरि ही सदा अन्तर्यामी हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है—

श्लोक 39 (garuda.2.69.39)

एवं सदा ये प्रविचिन्तयन्ति योगक्षेमं बिभृयाद्विष्णुरेषाम् । सद्वैष्णवानामशुभं नास्ति नास्ति प्रदृश्यते संशयज्ञानरूपात्

evaṁ sadā ye pravicintayanti yogakṣemaṁ bibhṛyādviṣṇureṣām sadvaiṣṇavānāmaśubhaṁ nāsti nāsti pradṛśyate saṁśayajñānarūpāt

—जो सदा इस प्रकार विचार करते हैं, उनका योग-क्षेम विष्णु स्वयं वहन करते हैं; सच्चे वैष्णवों के लिए कोई अमंगल नहीं है, न ही किसी संशययुक्त ज्ञान से कुछ दिखाई देता है।

श्लोक 40 (garuda.2.69.40)

कर्मानुसारेण हरिर्ददाति फलं शुभानामशुभस्य चैव । अतस्तदर्थं नैव यत्नं च कुर्याद्धनार्थं वै हरितत्त्वे च कुर्यात्

karmānusāreṇa harirdadāti phalaṁ śubhānāmaśubhasya caiva atastadarthaṁ naiva yatnaṁ ca kuryāddhanārthaṁ vai haritattve ca kuryāt

कर्म के अनुसार हरि ही शुभ और अशुभ का फल देते हैं; इसलिए धन के लिए स्वतंत्र प्रयास नहीं करना चाहिए, अपितु प्रयास हरि-तत्त्व के लिए ही करना चाहिए।

श्लोक 41 (garuda.2.69.41)

अतः स्नात्वा दिव्यमन्त्रं जपित्वा विसर्जयित्वा विष्णुनिर्माल्यगन्धम् । शुचिर्भूत्वा भागवतं पुराणं संश्रावयेत्सर्ववेत्तापि नित्यम्

ataḥ snātvā divyamantraṁ japitvā visarjayitvā viṣṇunirmālyagandham śucirbhūtvā bhāgavataṁ purāṇaṁ saṁśrāvayetsarvavettāpi nityam

अतः स्नान कर, दिव्य मन्त्र का जप कर, विष्णु के निर्माल्य की सुगन्ध अर्पित कर, शुद्ध होकर, सर्वज्ञ भी नित्य भागवत पुराण सुनाए।

श्लोक 42 (garuda.2.69.42)

कर्मानुसारेण धनार्जनं च वेदार्जनं शास्त्रसमार्जनं च । भविष्यति श्रवणं चापि विष्णोरत्यादराच्छ्रवणं दुर्घटं च

karmānusāreṇa dhanārjanaṁ ca vedārjanaṁ śāstrasamārjanaṁ ca bhaviṣyati śravaṇaṁ cāpi viṣṇoratyādarācchravaṇaṁ durghaṭaṁ ca

कर्मानुसार ही धनार्जन, वेदार्जन और शास्त्रार्जन होता है; विष्णु का श्रवण भी वैसे ही होगा, परन्तु अत्यन्त आदर के साथ श्रवण दुर्लभ है।

श्लोक 43 (garuda.2.69.43)

अत्यादराद्भागवतस्य सारमास्वादयेद्दुर्घटं मर्त्यलोके । आस्वाद्य तद्भागवतं पुराणमानन्दबाष्पैर्युक्तता दुर्घटा च

atyādarādbhāgavatasya sāramāsvādayeddurghaṭaṁ martyaloke āsvādya tadbhāgavataṁ purāṇamānandabāṣpairyuktatā durghaṭā ca

अत्यन्त आदर से भागवत के सार का आस्वादन मर्त्यलोक में दुर्लभ है; उस भागवत पुराण का आस्वादन कर आनन्दाश्रुओं से युक्त होना भी दुर्लभ है।

श्लोक 44 (garuda.2.69.44)

श्रुत्वा तत्त्वा नां निर्णयं धारणं च सुदुर्घटं चाहुरार्याः समस्तम् । श्रुत्वा तत्त्वानां धारणानन्तरं च कामक्रुधोर्जारणं दुर्घटं च

śrutvā tattvā nāṁ nirṇayaṁ dhāraṇaṁ ca sudurghaṭaṁ cāhurāryāḥ samastam śrutvā tattvānāṁ dhāraṇānantaraṁ ca kāmakrudhorjāraṇaṁ durghaṭaṁ ca

सुनकर तत्त्वों का निर्णय और धारण करना भी अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसा आर्यजन सर्वथा कहते हैं; तत्त्वों को सुनकर, धारण करने के पश्चात् काम-क्रोध का नाश करना भी दुर्लभ है।

श्लोक 45 (garuda.2.69.45)

श्रुत्वा तत्त्वानां धारणानं तरं त तथा योगे दुर्घटं संगतं च

śrutvā tattvānāṁ dhāraṇānaṁ taraṁ ta tathā yoge durghaṭaṁ saṁgataṁ ca

तत्त्वों को सुनकर धारण करने के पश्चात्, योग में भी संगति बिठाना दुर्लभ है।

श्लोक 46 (garuda.2.69.46)

श्रुत्वा तत्त्वानां धारणानन्तरं च कामक्रुधोर्जारणं दुर्घटं च । एते दोषा ज्ञानपूतानपीह कुर्वन्ति संदेहयुतान्सदैव

śrutvā tattvānāṁ dhāraṇānantaraṁ ca kāmakrudhorjāraṇaṁ durghaṭaṁ ca ete doṣā jñānapūtānapīha kurvanti saṁdehayutānsadaiva

तत्त्वों को सुनकर धारण करने के पश्चात् काम-क्रोध का नाश करना दुर्लभ है; ये दोष ज्ञान से पवित्र हुए लोगों को भी सदा संशययुक्त बना देते हैं।

श्लोक 47 (garuda.2.69.47)

अतो ह्यहं श्रवणं सत्कथायाः सदा करिष्ये नात्र विचार्यमस्ति । तेनाप्यहं हरिनामाभिवाञ्छा निश्चित्य चित्तं श्रवणे वै चकार । आदेहमेवं श्रवणं च कृत्वा त्यक्त्वा देहं भूतले संप्रजाता

ato hyahaṁ śravaṇaṁ satkathāyāḥ sadā kariṣye nātra vicāryamasti tenāpyahaṁ harināmābhivāñchā niścitya cittaṁ śravaṇe vai cakāra ādehamevaṁ śravaṇaṁ ca kṛtvā tyaktvā dehaṁ bhūtale saṁprajātā

'इसलिए मैं सत्कथा का श्रवण सदा करूँगी, इसमें कोई विचार नहीं है' — इस प्रकार निश्चय कर, हरि के नाम की अभिलाषा से उसने अपना चित्त श्रवण में लगाया; इस प्रकार जीवनभर श्रवण करके, शरीर त्यागकर वह पृथ्वी पर पुनः उत्पन्न हुई—

श्लोक 48 (garuda.2.69.48)

निवस्तुं वसुदेवस्य भगिन्या उदरे खग । सुमित्रा संज्ञकायां च जाता वै मित्रविन्दिका

nivastuṁ vasudevasya bhaginyā udare khaga sumitrā saṁjñakāyāṁ ca jātā vai mitravindikā

—हे खग! वसुदेव की बहिन, सुमित्रा नामधारी, के गर्भ में निवास करने के लिए; वहाँ मित्रविन्दिका उत्पन्न हुई।

श्लोक 49 (garuda.2.69.49)

श्रवणेन हरिं मित्रं प्राप्ता सा मित्रविन्दिका । अतः सा मित्रविन्देति संज्ञया संबभूव ह

śravaṇena hariṁ mitraṁ prāptā sā mitravindikā ataḥ sā mitravindeti saṁjñayā saṁbabhūva ha

श्रवण के द्वारा उसने हरि को मित्र रूप में प्राप्त किया, इसलिए वह मित्रविन्दिका 'मित्रविन्दा' नाम को प्राप्त हुई।

श्लोक 50 (garuda.2.69.50)

स्वयंवरे मित्रविन्दा राज्ञां मध्ये तु भामिनी । ममांसे व्यसृजन्मालां तां गृहीत्वा खगेश्वर । विधूय नृपतीन्सर्वान्पुरीं प्राप्ताः खगेश्वर

svayaṁvare mitravindā rājñāṁ madhye tu bhāminī mamāṁse vyasṛjanmālāṁ tāṁ gṛhītvā khageśvara vidhūya nṛpatīnsarvānpurīṁ prāptāḥ khageśvara

स्वयंवर में राजाओं के मध्य उस सुन्दरी मित्रविन्दा ने मेरे कंधे पर माला डाल दी; हे खगेश्वर! उसे ग्रहण कर, सभी राजाओं को हराकर, हम नगरी को प्राप्त हुए, हे खगेश्वर!

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