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उत्तरखण्ड · अध्याय 75

वेंकटगिरि की महिमा, वहाँ के तीर्थ, देवता तथा शालग्राम-शिलाओं का वर्णन

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

श्लोक 1 (garuda.2.75.1)

कन्योवाच । श्रीनिवासः किमर्थं वै आगतोत्र वदस्व मे । शेषाचलोपि कुत्रा भूत्कदायातश्च पापहा । स्वामिपुष्करिणी चात्र किमर्थं ह्यगता वद

kanyovāca śrīnivāsaḥ kimarthaṁ vai āgatotra vadasva me śeṣācalopi kutrā bhūtkadāyātaśca pāpahā svāmipuṣkariṇī cātra kimarthaṁ hyagatā vada

कन्या ने कहा — श्रीनिवास यहाँ किसलिए आए, मुझे बताइए; शेषाचल पहले कहाँ था, हे पापहारी! वह कब यहाँ आया? स्वामिपुष्करिणी भी यहाँ किसलिए आई, बताइए।

श्लोक 2 (garuda.2.75.2)

जैगीषव्य उवाच शृणु भद्रे महाभागे व्यङ्कटेशस्य चागमम् । आवयोर्देवि पापानि विषमं यान्ति भामिनि

jaigīṣavya uvāca śṛṇu bhadre mahābhāge vyaṅkaṭeśasya cāgamam āvayordevi pāpāni viṣamaṁ yānti bhāmini

जैगीषव्य ने कहा — हे भद्रे! हे महाभागे! व्यंकटेश के आगमन की कथा सुनो; हे देवि, हे भामिनि! इससे हम दोनों के पाप नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 3 (garuda.2.75.3)

आसीत्पुरा हिरण्याक्षः काश्यपो दितिनन्दनः । सनकादेश्च वाग्दण्डाद्द्वितीयद्वारपालकः

āsītpurā hiraṇyākṣaḥ kāśyapo ditinandanaḥ sanakādeśca vāgdaṇḍāddvitīyadvārapālakaḥ

पूर्वकाल में काश्यप और दिति का पुत्र हिरण्याक्ष था, जो सनक आदि के शाप-वचन से विष्णुलोक का द्वितीय द्वारपाल (जय-विजय में से एक) होकर—

श्लोक 4 (garuda.2.75.4)

बभूव दैत्ययोनौ च देवानां कण्टको बली । संजीवो विजयः प्रोक्तो हरिभक्तो महाप्रभुः

babhūva daityayonau ca devānāṁ kaṇṭako balī saṁjīvo vijayaḥ prokto haribhakto mahāprabhuḥ

—दैत्य-योनि में उत्पन्न हुआ, देवताओं के लिए बलशाली कण्टक बनकर; (वास्तव में) वह 'संजीव' या 'विजय' कहा जाता है, महाप्रभु हरि-भक्त।

श्लोक 5 (garuda.2.75.5)

हरिण्याक्षः स्वयं दैत्यो हरिभक्तविदूषकः । एतादृशो हिरण्याक्षस्तपस्तप्तुं समुद्यतः

hariṇyākṣaḥ svayaṁ daityo haribhaktavidūṣakaḥ etādṛśo hiraṇyākṣastapastaptuṁ samudyataḥ

हिरण्याक्ष स्वयं दैत्य होकर हरि-भक्तों का उपहास करने वाला बना; ऐसा हिरण्याक्ष तप करने के लिए तत्पर हुआ।

श्लोक 6 (garuda.2.75.6)

तदा माता दितिर्देवी हिरण्याक्षमुवाच सा । दितिरुवाच । वत्सलस्त्वं महाभागमा तपस्वाष्टहायनः

tadā mātā ditirdevī hiraṇyākṣamuvāca sā ditiruvāca vatsalastvaṁ mahābhāgamā tapasvāṣṭahāyanaḥ

तब माता देवी दिति ने हिरण्याक्ष से कहा। दिति ने कहा — 'हे प्रिय पुत्र! हे महाभाग! अभी आठ ही वर्ष के हो, तप मत करो।'

श्लोक 7 (garuda.2.75.7)

त्वं मा ददस्व दुः खं मे पालयिष्यति कोविदः । क्षणमात्रं न जीवामि त्वां विना जीवनं न हि

tvaṁ mā dadasva duḥ khaṁ me pālayiṣyati kovidaḥ kṣaṇamātraṁ na jīvāmi tvāṁ vinā jīvanaṁ na hi

'मुझे यह दुःख मत दो, कोई विद्वान ही तुम्हारा पालन करेगा। तुम्हारे बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकती।'

श्लोक 8 (garuda.2.75.8)

मा तप त्वं महाभाग मम जीवनहेतवे । एवमुक्तस्तु मात्रा स विजयोवशतोब्रवीत्

mā tapa tvaṁ mahābhāga mama jīvanahetave evamuktastu mātrā sa vijayovaśatobravīt

'हे महाभाग! मेरे जीवन के लिए तप मत करो।' ऐसा माता द्वारा कहे जाने पर, वह विजय अविचलित होकर बोला—

श्लोक 9 (garuda.2.75.9)

हिरण्याक्षो मातरं प्राह जालं हित्वा विष्णोर्भजनेऽलं कुरुष्व । मयिस्नेहं पुत्रहेतोर्विरूढं सुखदुः खे चेह लोके परत्र

hiraṇyākṣo mātaraṁ prāha jālaṁ hitvā viṣṇorbhajane'laṁ kuruṣva mayisnehaṁ putrahetorvirūḍhaṁ sukhaduḥ khe ceha loke paratra

हिरण्याक्ष ने माता से कहा — 'इस मोह-जाल को छोड़कर विष्णु की भक्ति में लग जाओ। मुझ पुत्र के प्रति गहरा स्नेह इस लोक और परलोक में तुम्हें सुख-दुःख ही देगा।

श्लोक 10 (garuda.2.75.10)

यावत्स्नेहं मयि मातः करोषि तावत्क्लेशं शाश्वतं यास्यसि त्वम् । मातश्च ते मयि पुत्रत्वबुद्धिस्त्वय्यप्येषा मातृबुद्धिर्ममापि

yāvatsnehaṁ mayi mātaḥ karoṣi tāvatkleśaṁ śāśvataṁ yāsyasi tvam mātaśca te mayi putratvabuddhistvayyapyeṣā mātṛbuddhirmamāpi

जब तक तुम मुझसे स्नेह करती रहोगी, हे माता, तब तक तुम शाश्वत क्लेश को प्राप्त होगी। हे माता! तुम्हारा यह 'पुत्र' का भाव, और मेरा यह 'माता' का भाव, दोनों ही (लौकिक व्यवहार मात्र) हैं।

श्लोक 11 (garuda.2.75.11)

ताते पूज्ये पितृबुद्धिर्ममास्ति तस्मिंस्तुते भर्तृबुद्धिर्हि मिथ्या । निर्माति यस्माद्धरिरेव सर्वं सम्यक्पाता नियतोऽसौ मुरारिः

tāte pūjye pitṛbuddhirmamāsti tasmiṁstute bhartṛbuddhirhi mithyā nirmāti yasmāddharireva sarvaṁ samyakpātā niyato'sau murāriḥ

पूज्य पिता में भी मेरा 'पिता' का भाव है, परन्तु तुम्हारा उनके प्रति 'पति' का भाव भी मिथ्या है — क्योंकि सब कुछ हरि ही रचते हैं, वे नियत मुरारि ही सच्चे रक्षक हैं।

श्लोक 12 (garuda.2.75.12)

अतो हि माता हरिरेव सर्वदा त्वन्यासां वै मातृता चोपचारात् । निर्मातृत्वं यदि मुख्यं त्वयि स्याद्द्रोणादीनां जननी का वदस्व

ato hi mātā harireva sarvadā tvanyāsāṁ vai mātṛtā copacārāt nirmātṛtvaṁ yadi mukhyaṁ tvayi syāddroṇādīnāṁ jananī kā vadasva

इसलिए सच्ची माता सदा हरि ही हैं, अन्य सबकी मातृता तो केवल औपचारिक है। यदि तुम में ही मुख्य सृजनशक्ति होती, तो बताओ द्रोण आदि की माता कौन है?

श्लोक 13 (garuda.2.75.13)

मातृत्वं वै यदि मुख्यं त्वयि स्याद्धात्रादीनां जननी का वदस्व । यतः सदा याति जगत्तत्तो हरिः सदा पिता विष्णुरजः पुराणः

mātṛtvaṁ vai yadi mukhyaṁ tvayi syāddhātrādīnāṁ jananī kā vadasva yataḥ sadā yāti jagattatto hariḥ sadā pitā viṣṇurajaḥ purāṇaḥ

यदि तुम में ही मुख्य मातृत्व होता, तो बताओ धाता (ब्रह्मा) आदि की माता कौन है? चूँकि जगत सदा उन्हीं से चलता है, इसलिए अजन्मा, सनातन विष्णु हरि ही सच्चे पिता हैं।

श्लोक 14 (garuda.2.75.14)

सदा पिता मुख्यपिता यदि स्याद्गर्भस्थबाले पालकः को वदस्व । मातापित्रोः पालकत्वं यदि स्यात्कूर्मादीनां पालकौ कौ वदस्व

sadā pitā mukhyapitā yadi syādgarbhasthabāle pālakaḥ ko vadasva mātāpitroḥ pālakatvaṁ yadi syātkūrmādīnāṁ pālakau kau vadasva

यदि सांसारिक पिता ही मुख्य पिता होता, तो बताओ गर्भस्थ बालक का पालक कौन है? यदि माता-पिता ही पालक होते, तो बताओ कच्छप आदि का पालक कौन है?

श्लोक 15 (garuda.2.75.15)

मातापित्रोः पालकत्वं यदि स्यात्कृपादीनां रक्षकौ कौ वदस्व । पुन्नामकान्नारकाद्देह भजान्तस्मात्त्रातापुत्रविष्णुः पुराणः

mātāpitroḥ pālakatvaṁ yadi syātkṛpādīnāṁ rakṣakau kau vadasva punnāmakānnārakāddeha bhajāntasmāttrātāputraviṣṇuḥ purāṇaḥ

यदि माता-पिता ही रक्षक होते, तो बताओ कृप आदि का रक्षक कौन है? चूँकि वे ही 'पुत्' नामक नरक से देहधारियों को बचाते हैं, इसलिए सनातन विष्णु ही सच्चे 'पुत्र' (त्राता) हैं।

श्लोक 16 (garuda.2.75.16)

न तारकोहं नरकाच्च सुभ्रूर्न वै भर्ता नापि पित्रादयश्च । न वै माता नानुजादिश्च सर्वः सर्वत्राता विष्णुरतो न चान्यः

na tārakohaṁ narakācca subhrūrna vai bhartā nāpi pitrādayaśca na vai mātā nānujādiśca sarvaḥ sarvatrātā viṣṇurato na cānyaḥ

हे सुभ्रू! न मैं नरक से बचाने वाला हूँ, न कोई पति है, न पिता आदि; न कोई माता है, न छोटा भाई आदि — विष्णु ही सबके रक्षक हैं, इसके अतिरिक्त कोई नहीं।

श्लोक 17 (garuda.2.75.17)

मायां मदीयां ज्ञानशस्त्रेण च्छित्वा भक्त्या हरेः स्मरणं त्वं कुरुष्व । यद्भक्तिरूपूर्वं स्मरणं नाम विष्णोस्तत्सर्वथा पापहरं च मातः

māyāṁ madīyāṁ jñānaśastreṇa cchitvā bhaktyā hareḥ smaraṇaṁ tvaṁ kuruṣva yadbhaktirūpūrvaṁ smaraṇaṁ nāma viṣṇostatsarvathā pāpaharaṁ ca mātaḥ

मेरे प्रति अपने मोह को ज्ञान-शस्त्र से काटकर, भक्तिपूर्वक हरि का स्मरण करो; भक्तिरूप वह अनुपम स्मरण, जो विष्णु के नाम का ही है, सर्वथा पाप-नाशक है, हे माता!

श्लोक 18 (garuda.2.75.18)

यो वा भक्त्या स्मरणं नाम विष्णोः करोत्यसौ पापहरो भविष्यति । अयं देहो दुर्ल्लभः कर्मभूमौ तत्रापि मध्ये भजनं विष्णुमूर्तेः

yo vā bhaktyā smaraṇaṁ nāma viṣṇoḥ karotyasau pāpaharo bhaviṣyati ayaṁ deho durllabhaḥ karmabhūmau tatrāpi madhye bhajanaṁ viṣṇumūrteḥ

जो भी भक्तिपूर्वक विष्णु के नाम का स्मरण करता है, वह पाप-नाशक बनता है; यह देह ही कर्मभूमि में दुर्लभ है, और उसमें भी विष्णु-मूर्ति की भक्ति और भी दुर्लभ है।

श्लोक 19 (garuda.2.75.19)

आयुर्गतं व्यर्थमेव त्वदीयं शीघ्रं भजेः श्रीनिवासस्य पादम् । उपदिश्यैवं मातरं पुत्रवर्यो दैत्यावेशात्सोभवद्वै तपस्वी

āyurgataṁ vyarthameva tvadīyaṁ śīghraṁ bhajeḥ śrīnivāsasya pādam upadiśyaivaṁ mātaraṁ putravaryo daityāveśātsobhavadvai tapasvī

तुम्हारी आयु व्यर्थ ही बीत रही है, शीघ्र ही श्रीनिवास के चरणों की भक्ति करो।' इस प्रकार माता को उपदेश देकर, वह श्रेष्ठ पुत्र दैत्य-आवेश के कारण तपस्वी बना।

श्लोक 20 (garuda.2.75.20)

चतुर्मुखं प्रीणयित्वैव भक्त्या ह्यवध्यत्वं प्राप तस्मान्महात्मा । ततो भूमिं करवद्वेष्टयित्वा निन्ये तदा दैत्यवर्यो महात्मा

caturmukhaṁ prīṇayitvaiva bhaktyā hyavadhyatvaṁ prāpa tasmānmahātmā tato bhūmiṁ karavadveṣṭayitvā ninye tadā daityavaryo mahātmā

चतुर्मुख ब्रह्मा को भक्तिपूर्वक प्रसन्न कर वह महात्मा उनसे अवध्यत्व प्राप्त हुआ; तब उस श्रेष्ठ दैत्य महात्मा ने पृथ्वी को हाथ की तरह लपेटकर उसे ले जाना आरम्भ किया।

श्लोक 21 (garuda.2.75.21)

श्रीमुष्टदेशे प्रादुरासीद्धरिस्तु वाराहविष्णुस्त्वजनः पुराणः । भित्त्वाचाब्धिं विविशे तं महात्मा रसातले संस्थितं भूतलं च

śrīmuṣṭadeśe prādurāsīddharistu vārāhaviṣṇustvajanaḥ purāṇaḥ bhittvācābdhiṁ viviśe taṁ mahātmā rasātale saṁsthitaṁ bhūtalaṁ ca

श्रीमुष्ट नामक स्थान में अजन्मा, सनातन हरि वराह-विष्णु के रूप में प्रकट हुए; समुद्र को भेदकर वह महात्मा रसातल में स्थित पृथ्वी-तल में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 22 (garuda.2.75.22)

स्वदंष्ट्राग्रे स्थापयित्वाऽजगाम तदागमादागतो दैत्यवर्यः । तं कर्णमूले ताडयित्वा जघान प्रसादयामास च पूर्ववद्भुवम्

svadaṁṣṭrāgre sthāpayitvā'jagāma tadāgamādāgato daityavaryaḥ taṁ karṇamūle tāḍayitvā jaghāna prasādayāmāsa ca pūrvavadbhuvam

अपनी दाढ़ के अग्रभाग पर उसे स्थापित कर वे आने लगे; उनके आगमन से ही वह श्रेष्ठ दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसे कान की जड़ में मारकर उन्होंने उसका वध किया, और पृथ्वी को पूर्ववत् स्थापित किया।

श्लोक 23 (garuda.2.75.23)

सुदिग्गजान्स्थापयित्वा च विष्णुः श्रीमुष्टे वै संस्थितः श्रीवराहः । तदा हरिश्चिन्तयामास विष्णुर्भक्त्या मदीयं मानुषं देहमद्य

sudiggajānsthāpayitvā ca viṣṇuḥ śrīmuṣṭe vai saṁsthitaḥ śrīvarāhaḥ tadā hariścintayāmāsa viṣṇurbhaktyā madīyaṁ mānuṣaṁ dehamadya

दिशाओं के हाथियों को स्थापित कर विष्णु श्रीवराह के रूप में श्रीमुष्ट में ही स्थित हुए; तब हरि विष्णु ने सोचा — 'आज मेरे इस मानव-देह की—

श्लोक 24 (garuda.2.75.24)

आराधयिष्यन्ति च मां क्व एते तेषां दयां कुत्र वाहं करिष्ये । एवं हरिश्चिन्तयित्वा सुकन्ये वैकुण्ठलोकादचलं शेष संज्ञम् । वीन्द्रस्कन्धे स्थापयित्वा स्वयं च समागतोभूद्भूतलं भूतलेशः

ārādhayiṣyanti ca māṁ kva ete teṣāṁ dayāṁ kutra vāhaṁ kariṣye evaṁ hariścintayitvā sukanye vaikuṇṭhalokādacalaṁ śeṣa saṁjñam vīndraskandhe sthāpayitvā svayaṁ ca samāgatobhūdbhūtalaṁ bhūtaleśaḥ

—आराधना ये लोग कहाँ करेंगे? इनके प्रति मैं अपनी दया कहाँ दिखाऊँगा?' हे सुकन्ये! इस प्रकार सोचकर हरि ने वैकुण्ठलोक से 'शेष' नामक पर्वत को गरुड के कंधे पर स्थापित कर, स्वयं भी भूतल पर आ गए, वे भूतल के स्वामी।

श्लोक 25 (garuda.2.75.25)

सुवर्णमुखरीतीरमारभ्य गरुडध्वजः । श्रीकृष्णवेणीपर्यन्तं स्थापयामास तं गिरिम्

suvarṇamukharītīramārabhya garuḍadhvajaḥ śrīkṛṣṇaveṇīparyantaṁ sthāpayāmāsa taṁ girim

सुवर्णमुखरी के तट से आरम्भ कर, गरुड-ध्वज हरि ने उस पर्वत को श्रीकृष्ण-वेणी तक स्थापित किया।

श्लोक 26 (garuda.2.75.26)

गिरेः पुच्छे तु श्रीशैलं मध्यमेऽहोबलं [ १ ] स्मृतम् । मुखं च श्रीनिवासस्य क्षेत्रं च समुदाहृतम्

gireḥ pucche tu śrīśailaṁ madhyame'hobalaṁ [ 1 ] smṛtam mukhaṁ ca śrīnivāsasya kṣetraṁ ca samudāhṛtam

पर्वत की पूँछ में श्रीशैल, मध्य में अहोबल स्मरण किया जाता है; और श्रीनिवास का मुख ही (मुख्य) क्षेत्र कहा गया है।

श्लोक 27 (garuda.2.75.27)

अल्पेन तपसाभीष्टं सिध्यत्यस्मिन्नहोबले । गङ्गादिसर्वतीर्थानि पुण्यानि ह्यत्र संति वै

alpena tapasābhīṣṭaṁ sidhyatyasminnahobale gaṅgādisarvatīrthāni puṇyāni hyatra saṁti vai

इस अहोबल में अल्प तप से ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता है; यहाँ गंगा आदि सभी पवित्र तीर्थ विद्यमान हैं।

श्लोक 28 (garuda.2.75.28)

य एनं सेवते नित्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । ज्ञानार्थी ज्ञानमाप्नोति द्रव्यार्थी द्रव्यमाप्नुयात्

ya enaṁ sevate nityaṁ śraddhābhaktisamanvitaḥ jñānārthī jñānamāpnoti dravyārthī dravyamāpnuyāt

जो श्रद्धा-भक्ति सहित इसकी नित्य सेवा करता है, वह ज्ञानार्थी ज्ञान पाता है, धनार्थी धन पाता है—

श्लोक 29 (garuda.2.75.29)

पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति नृपो राज्यं च विन्दति । यंयं कामयते मर्त्यस्तन्तमाप्नोति सर्वथा

putrārthī putramāpnoti nṛpo rājyaṁ ca vindati yaṁyaṁ kāmayate martyastantamāpnoti sarvathā

—पुत्रार्थी पुत्र पाता है, राजा राज्य पाता है; मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, वह सर्वथा उसे प्राप्त होती है।

श्लोक 30 (garuda.2.75.30)

चिन्तितं साध्यते यस्मात्तस्माच्चिन्तामणिं विदुः । पुष्करिण्याश्च बाहुल्याद्गिरावस्मिन्सरः सु च । पुष्कराद्रिरिति प्राहुरेवं तत्त्वार्थवेदिनः

cintitaṁ sādhyate yasmāttasmāccintāmaṇiṁ viduḥ puṣkariṇyāśca bāhulyādgirāvasminsaraḥ su ca puṣkarādririti prāhurevaṁ tattvārthavedinaḥ

चूँकि चिन्तित वस्तु यहाँ सिद्ध हो जाती है, इसीलिए इसे चिन्तामणि कहते हैं; इस पर्वत पर पुष्करिणियों और सुन्दर सरोवरों की बहुलता के कारण तत्त्वार्थ के ज्ञाता इसे 'पुष्कराद्रि' भी कहते हैं।

श्लोक 31 (garuda.2.75.31)

शातकुंभस्वरूपत्वात्कनकाद्रिं च तं विदुः । वैकुण्ठादागतेनैव वैकुण्ठाद्रिरिति स्मृतः

śātakuṁbhasvarūpatvātkanakādriṁ ca taṁ viduḥ vaikuṇṭhādāgatenaiva vaikuṇṭhādririti smṛtaḥ

स्वर्ण जैसा स्वरूप होने के कारण इसे कनकाद्रि भी जानते हैं; वैकुण्ठ से आया होने के कारण इसे वैकुण्ठाद्रि कहा गया है।

श्लोक 32 (garuda.2.75.32)

अमृतैश्वर्यसंयुक्तो व्यङ्कटाद्रिरिति स्मृतः । व्यङ्कटेशस्य शैलस्य माहात्म्यं यावदस्ति हि

amṛtaiśvaryasaṁyukto vyaṅkaṭādririti smṛtaḥ vyaṅkaṭeśasya śailasya māhātmyaṁ yāvadasti hi

अमर ऐश्वर्य से युक्त होने के कारण इसे व्यंकटाद्रि कहा गया है। व्यंकटेश के इस पर्वत की जितनी महिमा है—

श्लोक 33 (garuda.2.75.33)

तावद्वक्तुं समग्रेण न समर्थश्चतुर्मुखः । व्यङ्कटाद्रौ परां भक्तिं ये कुर्वन्ति दिनेदिने । पङ्गर्जङ्घाल एव स्यादचक्षुः पद्मलोचनः

tāvadvaktuṁ samagreṇa na samarthaścaturmukhaḥ vyaṅkaṭādrau parāṁ bhaktiṁ ye kurvanti dinedine paṅgarjaṅghāla eva syādacakṣuḥ padmalocanaḥ

—उसे सम्पूर्ण रूप से कहने में चतुर्मुख ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। व्यंकटाद्रि पर जो दिन-प्रतिदिन परम भक्ति करते हैं, उनमें लंगड़ा भी तेज-चरण, अंधा भी कमल-नेत्र बन जाता है—

श्लोक 34 (garuda.2.75.34)

मूको वाग्मी भवेदेव बधिरः श्रावको भवेत् । वन्ध्या स्याद्बहुपुत्रा च निर्धनः सधनो भवेत्

mūko vāgmī bhavedeva badhiraḥ śrāvako bhavet vandhyā syādbahuputrā ca nirdhanaḥ sadhano bhavet

—गूँगा वाग्मी बन जाता है, बहरा सुनने में सक्षम हो जाता है; बाँझ स्त्री बहुपुत्रवती हो जाती है, निर्धन धनवान बन जाता है।

श्लोक 35 (garuda.2.75.35)

एतत्सर्वं गिरौ भक्तिमात्रेणैव भवेद्ध्रुवम् । तत्त्वतो व्यङ्कटाद्रेस्तु स्वरूपं वेत्ति को भुवि

etatsarvaṁ girau bhaktimātreṇaiva bhaveddhruvam tattvato vyaṅkaṭādrestu svarūpaṁ vetti ko bhuvi

यह सब इस पर्वत पर केवल भक्ति मात्र से निश्चित होता है; परन्तु इस व्यंकटाद्रि के तात्त्विक स्वरूप को पृथ्वी पर कौन जानता है?

श्लोक 36 (garuda.2.75.36)

यस्मादस्य गिरेः पुण्यं माहात्म्यं वेत्ति यः पुमान् । मायावी परमानन्दं त्यक्त्वा वैकुण्ठमुत्तमम् । स्वामिपुष्करिणीतीरे रमया सहमोदते

yasmādasya gireḥ puṇyaṁ māhātmyaṁ vetti yaḥ pumān māyāvī paramānandaṁ tyaktvā vaikuṇṭhamuttamam svāmipuṣkariṇītīre ramayā sahamodate

जो पुरुष इस पर्वत की पवित्र महिमा को जानता है, वह ज्ञानी परम आनन्दमय, उत्तम वैकुण्ठ को भी त्यागकर स्वामिपुष्करिणी के तट पर रमा के साथ आनन्दित होता है।

श्लोक 37 (garuda.2.75.37)

कल्याणाद्भुतगात्राय कामितार्थप्दायिने । श्रीमद्व्यङ्कटनाथाय श्रीनिवासाय ते नमः

kalyāṇādbhutagātrāya kāmitārthapdāyine śrīmadvyaṅkaṭanāthāya śrīnivāsāya te namaḥ

कल्याणकारी अद्भुत अंगों वाले, अभीष्ट फल देने वाले, श्रीमद्व्यंकटनाथ श्रीनिवास को नमस्कार।

श्लोक 38 (garuda.2.75.38)

श्रीस्वामिपुष्करिण्याश्च माहात्म्यं शृणु कन्यके । स्वामिपुष्करिणीमध्ये श्रीनिवासोस्ति सर्वदा

śrīsvāmipuṣkariṇyāśca māhātmyaṁ śṛṇu kanyake svāmipuṣkariṇīmadhye śrīnivāsosti sarvadā

अब स्वामिपुष्करिणी की महिमा सुनो, हे कन्यके! स्वामिपुष्करिणी के मध्य में श्रीनिवास सदा विराजमान रहते हैं।

श्लोक 39 (garuda.2.75.39)

स्नानं कुर्वन्ति ये तत्र तेषां मुक्तिः करे स्थिता । तिस्रः कोट्योर्धकोटिश्च तीर्थानि भुवनत्रये । तानि सर्वाणि तत्रैव संति तीर्थे हरेः सदा

snānaṁ kurvanti ye tatra teṣāṁ muktiḥ kare sthitā tisraḥ koṭyordhakoṭiśca tīrthāni bhuvanatraye tāni sarvāṇi tatraiva saṁti tīrthe hareḥ sadā

जो वहाँ स्नान करते हैं, उनके हाथ में मुक्ति ही स्थित है; तीनों लोकों में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सब सदा हरि के इसी तीर्थ में विद्यमान हैं।

श्लोक 40 (garuda.2.75.40)

तत्तीर्थं श्रीनिवासाख्यं सर्वदेवनमस्कृतम् । तदेव श्रीनिवासस्य मन्दिरं परिकीर्तितम्

tattīrthaṁ śrīnivāsākhyaṁ sarvadevanamaskṛtam tadeva śrīnivāsasya mandiraṁ parikīrtitam

श्रीनिवास नामक वह तीर्थ सभी देवताओं द्वारा नमस्कृत है; वही श्रीनिवास का साक्षात् मन्दिर कहा गया है।

श्लोक 41 (garuda.2.75.41)

तद्दर्शनादेव कन्ये यान्ति पापानि भस्मसात् । एकैकस्नानमात्रेण सत्संगो भवति ध्रुवम्

taddarśanādeva kanye yānti pāpāni bhasmasāt ekaikasnānamātreṇa satsaṁgo bhavati dhruvam

हे कन्ये! उसके दर्शन मात्र से पाप भस्म हो जाते हैं; एक बार भी स्नान करने से सत्संग निश्चय ही प्राप्त होता है।

श्लोक 42 (garuda.2.75.42)

सत्संगाज्ज्ञानमासाद्य ज्ञानान्मोक्षं च विन्दति । अधिकारिणां भवेदेवं विपरीतमयोगिनाम्

satsaṁgājjñānamāsādya jñānānmokṣaṁ ca vindati adhikāriṇāṁ bhavedevaṁ viparītamayoginām

सत्संग से ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान से मोक्ष मिलता है — यह अधिकारियों के लिए है, अयोग्यों के लिए इसके विपरीत होता है।

श्लोक 43 (garuda.2.75.43)

तीर्थानां स्नानमात्रेण मोक्षं यान्तीति ये विदुः । ते सर्वे असुरा ज्ञेयास्ते यान्ति ह्यधमां गतिम्

tīrthānāṁ snānamātreṇa mokṣaṁ yāntīti ye viduḥ te sarve asurā jñeyāste yānti hyadhamāṁ gatim

जो केवल तीर्थ-स्नान मात्र से मोक्ष मिलना मानते हैं, वे सब असुर जानने चाहिए, वे अधम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 44 (garuda.2.75.44)

श्रीनिवासस्य तीर्थेस्मिन्वायुकोणे च कन्यके । आस्ते वायुः सदा विष्णोः पूजां कर्तुमनुत्तमाम्

śrīnivāsasya tīrthesminvāyukoṇe ca kanyake āste vāyuḥ sadā viṣṇoḥ pūjāṁ kartumanuttamām

श्रीनिवास के इस तीर्थ में वायव्य कोण में, हे कन्यके! वायु सदा विष्णु की उत्तम पूजा करने के लिए विराजमान रहते हैं।

श्लोक 45 (garuda.2.75.45)

वायुतीर्थं च तत्प्रोक्तं हस्तद्वादशकान्तरम् । हस्तषट्कप्रमाणं च पश्चिमे समुदाहृतम् । उत्तरे हस्तषट्कं तु वायुतीर्थमुदाहृतम्

vāyutīrthaṁ ca tatproktaṁ hastadvādaśakāntaram hastaṣaṭkapramāṇaṁ ca paścime samudāhṛtam uttare hastaṣaṭkaṁ tu vāyutīrthamudāhṛtam

वह वायु-तीर्थ बारह हाथ विस्तृत कहा गया है; पश्चिम में छह हाथ का प्रमाण कहा गया है, उत्तर में भी छह हाथ का वायु-तीर्थ कहा गया है।

श्लोक 46 (garuda.2.75.46)

ये वेष्णवा वैष्णवदासवर्याः स्नानं सुर्युस्तत्र पूर्वं सुकन्ये । मध्वान्तस्थाः श्रीनिवासस्तु नित्यमत्र स्नानात्प्रीयतां मे दयालुः

ye veṣṇavā vaiṣṇavadāsavaryāḥ snānaṁ suryustatra pūrvaṁ sukanye madhvāntasthāḥ śrīnivāsastu nityamatra snānātprīyatāṁ me dayāluḥ

जो वैष्णव, वैष्णव-दासों में श्रेष्ठ हैं, उन्हें हे सुकन्ये! पहले वहाँ स्नान करना चाहिए — 'मध्व के भीतर सदा विराजमान श्रीनिवास दयालु इस स्नान से मुझ पर प्रसन्न हों।'

श्लोक 47 (garuda.2.75.47)

ये मध्वतीर्थे स्नातुमिच्छन्ति देवि रुद्रादयो वायुभक्ता महान्तः । सदा स्नानं तत्र कुर्वन्ति देवि प्रातः काले चोदयात्पूर्वमेव

ye madhvatīrthe snātumicchanti devi rudrādayo vāyubhaktā mahāntaḥ sadā snānaṁ tatra kurvanti devi prātaḥ kāle codayātpūrvameva

हे देवि! जो मध्व-तीर्थ में स्नान करना चाहते हैं, वे रुद्र आदि महान वायु-भक्त सदा वहाँ प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही स्नान करते हैं।

श्लोक 48 (garuda.2.75.48)

ये वायुतीर्थे विसृजन्ति देहजं मलं मूत्रं वमनं श्लेष्मकं च । येऽपानशुद्धिं लिङ्गशुद्धिं च कन्ये कुर्वन्ति ते ह्यसुरा राक्षसाश्च

ye vāyutīrthe visṛjanti dehajaṁ malaṁ mūtraṁ vamanaṁ śleṣmakaṁ ca ye'pānaśuddhiṁ liṅgaśuddhiṁ ca kanye kurvanti te hyasurā rākṣasāśca

जो वायु-तीर्थ में शरीर का मल, मूत्र, वमन या कफ त्यागते हैं, या अपान-शुद्धि, लिंग-शुद्धि करते हैं, हे कन्ये! वे असुर और राक्षस ही हैं।

श्लोक 49 (garuda.2.75.49)

शृण्वन्ति ये भागवतं पुराणं किं वर्णये तस्य पुण्यं तु देवि । ये कृष्णमन्त्रं तु जपन्ति देवि ह्यष्टा क्षरं मन्त्रवरं सुगोप्यम्

śṛṇvanti ye bhāgavataṁ purāṇaṁ kiṁ varṇaye tasya puṇyaṁ tu devi ye kṛṣṇamantraṁ tu japanti devi hyaṣṭā kṣaraṁ mantravaraṁ sugopyam

जो भागवत पुराण सुनते हैं, हे देवि! उनके पुण्य का मैं क्या वर्णन करूँ? जो कृष्ण-मन्त्र, अत्यन्त गोपनीय आठ-अक्षरी श्रेष्ठ मन्त्र का जप करते हैं—

श्लोक 50 (garuda.2.75.50)

तेषां हरिः प्रीयते केशवोलं मध्वान्तस्थो नात्र विचार्यमस्ति । एवं दानं तत्र कुर्वन्ति ये वै द्विजाग्र्याणां वैष्णवानां विदां च

teṣāṁ hariḥ prīyate keśavolaṁ madhvāntastho nātra vicāryamasti evaṁ dānaṁ tatra kurvanti ye vai dvijāgryāṇāṁ vaiṣṇavānāṁ vidāṁ ca

—उनसे मध्व में विराजमान हरि केशव अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, इसमें कोई विचार नहीं। इसी प्रकार जो द्विजश्रेष्ठ, वैष्णव और विद्वानों को दान देते हैं—

श्लोक 51 (garuda.2.75.51)

तेषां पुण्यं नैव जानन्ति देवा जानात्येवं श्रीनिवासो हरिस्तु । शालग्रामं वायुतीर्थे ददन्ते तेषां पुण्यं वेत्ति स व्यङ्कटेशः

teṣāṁ puṇyaṁ naiva jānanti devā jānātyevaṁ śrīnivāso haristu śālagrāmaṁ vāyutīrthe dadante teṣāṁ puṇyaṁ vetti sa vyaṅkaṭeśaḥ

—उनके पुण्य को देवता भी नहीं जानते, केवल हरि श्रीनिवास ही जानते हैं। जो वायु-तीर्थ में शालग्राम दान देते हैं, उनका पुण्य वही व्यंकटेश जानते हैं।

श्लोक 52 (garuda.2.75.52)

सुदुर्लभो वायुतीर्थेऽभिषेको निष्कामबुद्ध्या वैष्णवानां च देवि । तत्रापि तीर्थे लभ्यते भाग्ययोगाद्भागवतस्य श्रवणं विष्णुदासैः

sudurlabho vāyutīrthe'bhiṣeko niṣkāmabuddhyā vaiṣṇavānāṁ ca devi tatrāpi tīrthe labhyate bhāgyayogādbhāgavatasya śravaṇaṁ viṣṇudāsaiḥ

हे देवि! वैष्णवों का निष्काम भाव से वायु-तीर्थ में अभिषेक अत्यन्त दुर्लभ है; वहाँ भी सौभाग्य-योग से ही विष्णु-दासों को भागवत का श्रवण प्राप्त होता है।

श्लोक 53 (garuda.2.75.53)

तथैव तीर्थे दुर्लभं तत्र देवि शालग्रामस्य द्विजवर्ये च दानम् । जंबूफलाकारसुनीलवर्णं मुखद्वयं चक्रचतुष्टयान्वितम्

tathaiva tīrthe durlabhaṁ tatra devi śālagrāmasya dvijavarye ca dānam jaṁbūphalākārasunīlavarṇaṁ mukhadvayaṁ cakracatuṣṭayānvitam

वैसे ही, हे देवि! वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण को शालग्राम का दान दुर्लभ है — जामुन-फल के आकार का, गहरे नीले रंग का, दो मुखों वाला, चार चक्रों से युक्त—

श्लोक 54 (garuda.2.75.54)

सुकेसरैः संयुतं स्वर्णचिह्नध्वजां कुशैर्वज्रचिह्नैर्यवैश्च । जानार्दनीं मूर्तिमाहुर्महान्तो दानं तस्या दुर्लभं तत्र तीर्थे

sukesaraiḥ saṁyutaṁ svarṇacihnadhvajāṁ kuśairvajracihnairyavaiśca jānārdanīṁ mūrtimāhurmahānto dānaṁ tasyā durlabhaṁ tatra tīrthe

—सुन्दर केसरों से युक्त, स्वर्ण-चिह्नित ध्वजा, कुश, वज्र-चिह्न और यव-चिह्न से युक्त — महात्मा इसे जनार्दन-मूर्ति कहते हैं; उस तीर्थ में उसका दान दुर्लभ है।

श्लोक 55 (garuda.2.75.55)

अत्युत्तमं मूर्तिदानं तु भद्रे सुदुर्ल्लभं परमं नात्र लोभः । सुदुर्लभं बहुदोग्ध्याश्च गृष्टेर्दानं तथा वस्त्ररत्नादिकानाम्

atyuttamaṁ mūrtidānaṁ tu bhadre sudurllabhaṁ paramaṁ nātra lobhaḥ sudurlabhaṁ bahudogdhyāśca gṛṣṭerdānaṁ tathā vastraratnādikānām

हे भद्रे! ऐसी मूर्ति का दान अत्यन्त उत्तम और अत्यन्त दुर्लभ है, यहाँ लोभ का कोई स्थान नहीं। बहु-दुग्धदायिनी गाय, वस्त्र-रत्न आदि का दान भी दुर्लभ है।

श्लोक 56 (garuda.2.75.56)

अत्युत्तमं द्रव्यदानं च देवि स्वापेक्षितं दानमाहुर्महान्तः । स्वस्यानपेक्षं फलदानं च वस्त्रादानं तस्य व्यर्थमाहुर्महान्तः

atyuttamaṁ dravyadānaṁ ca devi svāpekṣitaṁ dānamāhurmahāntaḥ svasyānapekṣaṁ phaladānaṁ ca vastrādānaṁ tasya vyarthamāhurmahāntaḥ

हे देवि! सर्वोत्तम धन-दान वही है, जो अपनी आवश्यकता को ध्यान में रखकर दिया जाए, ऐसा महात्मा कहते हैं; अपनी अपेक्षा के बिना दिया गया फल या वस्त्र का दान व्यर्थ कहा गया है।

श्लोक 57 (garuda.2.75.57)

अत्युत्तमं गृष्टिदानं च पुण्यं नैवाप्यते दुग्धदोहाश्च गावः । अत्युत्तमे वस्त्रदाने सुबुद्धिः सुदुर्घटा परमा वै जनानाम्

atyuttamaṁ gṛṣṭidānaṁ ca puṇyaṁ naivāpyate dugdhadohāśca gāvaḥ atyuttame vastradāne subuddhiḥ sudurghaṭā paramā vai janānām

सर्वोत्तम और पुण्यदायक दुग्धवती गाय का दान है, ऐसी गायें दुर्लभ हैं; सर्वोत्तम वस्त्र-दान की सुबुद्धि लोगों में अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 58 (garuda.2.75.58)

अत्युत्तमं भागवतस्य पुस्तकं सुदुर्घटं वायुतीर्थं च कन्ये । अत्युत्तमं द्रव्यदानं च देवि सुदुर्घटं वायुतीर्थं नृणां हि । सुदुर्लभो वैष्णवैस्तत्त्वविद्भिर्हरेर्विचारो वायुतीर्थे च कन्ये

atyuttamaṁ bhāgavatasya pustakaṁ sudurghaṭaṁ vāyutīrthaṁ ca kanye atyuttamaṁ dravyadānaṁ ca devi sudurghaṭaṁ vāyutīrthaṁ nṛṇāṁ hi sudurlabho vaiṣṇavaistattvavidbhirharervicāro vāyutīrthe ca kanye

हे कन्ये! भागवत-ग्रन्थ का दान सर्वोत्तम है, वायु-तीर्थ में यह अत्यन्त दुर्लभ है; हे देवि! वहाँ धन-दान भी मनुष्यों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है; और हे कन्ये! वायु-तीर्थ में तत्त्ववेत्ता वैष्णवों द्वारा हरि की सच्ची चर्चा अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 59 (garuda.2.75.59)

श्रीनिवासस्य तीर्थस्य उत्तरस्यां दिशि स्थितम् । चन्द्रतीर्थ मिति प्रोक्तं तत्रास्ते चन्द्रमाः सदा

śrīnivāsasya tīrthasya uttarasyāṁ diśi sthitam candratīrtha miti proktaṁ tatrāste candramāḥ sadā

श्रीनिवास के तीर्थ के उत्तर दिशा में स्थित तीर्थ 'चन्द्र-तीर्थ' कहा गया है; वहाँ चन्द्रमा सदा विराजमान रहते हैं।

श्लोक 60 (garuda.2.75.60)

श्रीनिवासस्य पूजां च तत्र स्थित्वा करोत्ययम् । तत्र स्नानं प्रकुर्वन्ति पुण्यदेशे च कन्यके

śrīnivāsasya pūjāṁ ca tatra sthitvā karotyayam tatra snānaṁ prakurvanti puṇyadeśe ca kanyake

वे वहाँ स्थित रहकर श्रीनिवास की पूजा करते हैं; उस पुण्य-स्थान में लोग वहाँ स्नान करते हैं, हे कन्यके!

श्लोक 61 (garuda.2.75.61)

गुरुतल्पादिपापेभ्यो मुच्यन्ते नात्र संशयः । तत्र स्नात्वा पूर्वभागे शालग्रामं ददाति यः

gurutalpādipāpebhyo mucyante nātra saṁśayaḥ tatra snātvā pūrvabhāge śālagrāmaṁ dadāti yaḥ

गुरु-तल्प आदि पापों से वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। वहाँ स्नान कर, पूर्व दिशा में जो शालग्राम दान देता है—

श्लोक 62 (garuda.2.75.62)

ज्ञानद्वारा मोक्षमेति नात्र कार्या विचारणा । दधिवामनमूर्तेश्च दानं तत्र सुदुर्लभम्

jñānadvārā mokṣameti nātra kāryā vicāraṇā dadhivāmanamūrteśca dānaṁ tatra sudurlabham

—वह ज्ञान के मार्ग से मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार नहीं। वहाँ दधि-वामन-मूर्ति का दान भी अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 63 (garuda.2.75.63)

बदरीफलमात्रं तु वतुलं नीलवर्णकम् । प्रसन्नवदनं सूक्ष्मं सुस्निग्धं कन्यके शुभे

badarīphalamātraṁ tu vatulaṁ nīlavarṇakam prasannavadanaṁ sūkṣmaṁ susnigdhaṁ kanyake śubhe

(उसका स्वरूप:) बेर के फल जितना, गोल, नीले रंग का, प्रसन्न मुख वाला, सूक्ष्म, अत्यन्त स्निग्ध, हे शुभ कन्यके!

श्लोक 64 (garuda.2.75.64)

चक्रद्वयसमायुक्तं गौपूरैः पञ्चभिर्युतम् । चापबाणसमायुक्तमनतं कुण्डलाकृतिम्

cakradvayasamāyuktaṁ gaupūraiḥ pañcabhiryutam cāpabāṇasamāyuktamanataṁ kuṇḍalākṛtim

—दो चक्रों से युक्त, पाँच गौ-खुर-चिह्नों से युक्त, धनुष-बाण से युक्त, अनत, कुण्डलाकार—

श्लोक 65 (garuda.2.75.65)

वनमाल सुखयुतं मूर्ध्नसाहस्रसंयुतम् । रौप्यबिन्दुसमायुक्तं सव्ये भद्रार्धमात्रकम्

vanamāla sukhayutaṁ mūrdhnasāhasrasaṁyutam raupyabindusamāyuktaṁ savye bhadrārdhamātrakam

—सुखद वनमाला से युक्त, मस्तक पर सहस्रचिह्न से युक्त, चाँदी के बिन्दु से युक्त, बाईं ओर आधे भद्र-प्रमाण का—

श्लोक 66 (garuda.2.75.66)

चन्द्रेण सहितं देवि दधिवामनमुच्यते । एतादृशं कलौ नॄणां दुर्लभं बहुभाग्यदम् । लक्ष्मीनारायणसमां तां मूर्तिं विद्धि भामिनि

candreṇa sahitaṁ devi dadhivāmanamucyate etādṛśaṁ kalau nṝṇāṁ durlabhaṁ bahubhāgyadam lakṣmīnārāyaṇasamāṁ tāṁ mūrtiṁ viddhi bhāmini

—चन्द्र-चिह्न सहित, हे देवि! 'दधि-वामन' कहा जाता है। कलियुग में मनुष्यों के लिए ऐसी मूर्ति अत्यन्त दुर्लभ और महाभाग्यदायक है; इस मूर्ति को लक्ष्मी-नारायण के समान जानो, हे भामिनि!

श्लोक 67 (garuda.2.75.67)

सुदुर्लभं तस्य मूर्तेश्च दानं तच्चन्द्रतीर्थे श्रवणं दुर्घटं च । सम्यक्स्वरूपं दधिवामनस्य सुदुर्घटं श्रवणं वैष्णवाच्च

sudurlabhaṁ tasya mūrteśca dānaṁ taccandratīrthe śravaṇaṁ durghaṭaṁ ca samyaksvarūpaṁ dadhivāmanasya sudurghaṭaṁ śravaṇaṁ vaiṣṇavācca

उस मूर्ति का दान अत्यन्त दुर्लभ है, चन्द्र-तीर्थ में उसका श्रवण भी दुर्लभ है; दधि-वामन के सच्चे स्वरूप का श्रवण किसी वैष्णव से पाना अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 68 (garuda.2.75.68)

तत्र स्नात्वा वामनस्य स्वरूपश्रवणाद्विदुर्दानफलं समं च । दशहस्तप्रमाणं तु चन्द्रतीर्थमुदाहृतम्

tatra snātvā vāmanasya svarūpaśravaṇādvidurdānaphalaṁ samaṁ ca daśahastapramāṇaṁ tu candratīrthamudāhṛtam

वहाँ स्नान कर, वामन के स्वरूप का श्रवण करने से, दान के समान ही फल प्राप्त होता है, ऐसा जानना चाहिए। चन्द्र-तीर्थ दस हाथ विस्तृत कहा गया है।

श्लोक 69 (garuda.2.75.69)

मध्याह्ने दुर्लभं स्नानं नृणां तत्र सुमङ्गले । तत्र स्थित्वा धन्यनरः सदा भजति वै हरिम्

madhyāhne durlabhaṁ snānaṁ nṛṇāṁ tatra sumaṅgale tatra sthitvā dhanyanaraḥ sadā bhajati vai harim

उस अत्यन्त शुभ स्थान में मध्याह्न में स्नान करना मनुष्यों के लिए दुर्लभ है; वहाँ रहकर भाग्यशाली मनुष्य सदा हरि की भक्ति करता है।

श्लोक 70 (garuda.2.75.70)

वराहमूर्तिदानं तु शालग्रामस्य दुर्लभम् । जंबूफलप्रमाणं तु एतद्वै कुक्कुटाण्डवत्

varāhamūrtidānaṁ tu śālagrāmasya durlabham jaṁbūphalapramāṇaṁ tu etadvai kukkuṭāṇḍavat

वराह-मूर्ति के रूप में शालग्राम का दान दुर्लभ है; यह जामुन-फल के आकार का, मुर्गी के अंडे जैसा है।

श्लोक 71 (garuda.2.75.71)

वदनं वलयाकारं प्रमाणं चणकादिवत् । देवस्य वामभागे च मध्यदेशं विहाय च

vadanaṁ valayākāraṁ pramāṇaṁ caṇakādivat devasya vāmabhāge ca madhyadeśaṁ vihāya ca

इसका मुख कंगन के आकार का, चने के दाने जैसा प्रमाण वाला है; देवता के बाएँ भाग में, मध्य भाग को छोड़कर—

श्लोक 72 (garuda.2.75.72)

चक्रद्वयसमायुक्तंमूर्धदेशे च भामिनि । सुवर्णबिन्दुना युक्तं भूवराहाख्यमुच्यते

cakradvayasamāyuktaṁmūrdhadeśe ca bhāmini suvarṇabindunā yuktaṁ bhūvarāhākhyamucyate

—मस्तक-भाग में दो चक्रों से युक्त, हे भामिनि! स्वर्ण-बिन्दु से युक्त — इसे 'भूवराह' कहा जाता है।

श्लोक 73 (garuda.2.75.73)

पूजां कृत्वा भूवराहस्य मर्तेर्दानं दत्त्वा श्रवणं चापि कृत्वा । तत्र स्थितं भूवराहं च दृष्ट्वा स वै नरः कृतकृत्यो हि लोके

pūjāṁ kṛtvā bhūvarāhasya marterdānaṁ dattvā śravaṇaṁ cāpi kṛtvā tatra sthitaṁ bhūvarāhaṁ ca dṛṣṭvā sa vai naraḥ kṛtakṛtyo hi loke

भूवराह की मूर्ति की पूजा कर, दान देकर, उसका श्रवण भी कर, वहाँ स्थित भूवराह का दर्शन करके वह मनुष्य लोक में कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 74 (garuda.2.75.74)

तत्र स्नात्वा भूवराहस्य मर्तेः शृणोति यो लक्षणं सम्यगेव । स तेन पुण्यं समुपैति देवि स मुक्तिभाङ्नात्र विचार्यमस्ति

tatra snātvā bhūvarāhasya marteḥ śṛṇoti yo lakṣaṇaṁ samyageva sa tena puṇyaṁ samupaiti devi sa muktibhāṅnātra vicāryamasti

वहाँ स्नान कर, भूवराह के लक्षण को जो भलीभाँति सुनता है, वह उससे पुण्य प्राप्त करता है, हे देवि! और मुक्ति का भागी होता है, इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 75 (garuda.2.75.75)

ईशानकोणे श्रीनिवासस्य देवि रौद्रं तीर्थं परमं पावनं च । तत्र स्थित्वा रुद्रदेवो महात्मा पूजां करोति श्रीनिवासस्य नित्यम्

īśānakoṇe śrīnivāsasya devi raudraṁ tīrthaṁ paramaṁ pāvanaṁ ca tatra sthitvā rudradevo mahātmā pūjāṁ karoti śrīnivāsasya nityam

श्रीनिवास के ईशान कोण में, हे देवि! रौद्र-तीर्थ है, परम पवित्र; वहाँ स्थित होकर महात्मा रुद्रदेव सदा श्रीनिवास की पूजा करते हैं।

श्लोक 76 (garuda.2.75.76)

हस्ताष्टकं तत्प्रमाणं वदन्ति तत्र स्नानं वैष्णवैः कार्यमेव । तत्र स्नात्वा प्रयतो वै मुरारेः कथां दिव्यां शृणुयादादरेण । स्नानं पानं तत्र दानं च कुर्याल्लक्ष्मीनृसिंहप्रीयते देवि नित्यम्

hastāṣṭakaṁ tatpramāṇaṁ vadanti tatra snānaṁ vaiṣṇavaiḥ kāryameva tatra snātvā prayato vai murāreḥ kathāṁ divyāṁ śṛṇuyādādareṇa snānaṁ pānaṁ tatra dānaṁ ca kuryāllakṣmīnṛsiṁhaprīyate devi nityam

इसका प्रमाण आठ हाथ कहा जाता है, वहाँ वैष्णवों को स्नान करना ही चाहिए; वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर, मुरारि की दिव्य कथा आदरपूर्वक सुननी चाहिए; वहाँ स्नान, जल-पान और दान करने से, हे देवि! लक्ष्मी-नृसिंह सदा प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 77 (garuda.2.75.77)

बदरीफलमात्रं च वर्तुलं बिन्दुसंयुतम्

badarīphalamātraṁ ca vartulaṁ bindusaṁyutam

(यहाँ की शिला) बेर के फल जितनी, गोल, बिन्दु से युक्त—

श्लोक 78 (garuda.2.75.78)

देवस्य वामभागे तु चक्रद्वयसमन्वितम् । सुवर्णरेखासंयुक्तं किञ्चिद्रक्तसमन्वितम्

devasya vāmabhāge tu cakradvayasamanvitam suvarṇarekhāsaṁyuktaṁ kiñcidraktasamanvitam

—देवता के बाएँ भाग में दो चक्रों से युक्त, स्वर्ण-रेखा से युक्त, कुछ रक्तवर्ण से युक्त—

श्लोक 79 (garuda.2.75.79)

वैश्यवर्णं सवदनं पद्मरेखादिचिह्नितम् । लक्ष्मीनृसिंहं तं विद्धि भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्

vaiśyavarṇaṁ savadanaṁ padmarekhādicihnitam lakṣmīnṛsiṁhaṁ taṁ viddhi bhuktimuktipradāyakam

—वैश्य-वर्ण, मुख सहित, कमल-रेखा आदि चिह्नों से चिह्नित — इसे भोग-मोक्ष देने वाला लक्ष्मी-नृसिंह जानो।

श्लोक 80 (garuda.2.75.80)

एता दृशं गण्डिकायाः शिलाया मूर्तेर्दानं दुर्घटं विद्धि वीन्द्र । तत्र स्नात्वा श्रीनृसिंहस्वरूपं लक्ष्मीपतेः शृणुयाद्भक्तियुक्तः

etā dṛśaṁ gaṇḍikāyāḥ śilāyā mūrterdānaṁ durghaṭaṁ viddhi vīndra tatra snātvā śrīnṛsiṁhasvarūpaṁ lakṣmīpateḥ śṛṇuyādbhaktiyuktaḥ

हे वीन्द्र! गण्डकी-शिला की ऐसी मूर्ति का दान अत्यन्त दुर्लभ जानो; वहाँ स्नान कर, भक्तिपूर्वक लक्ष्मीपति श्रीनृसिंह के स्वरूप को सुनना चाहिए।

श्लोक 81 (garuda.2.75.81)

मूर्तेर्दानात्फलमाप्नोति देवि सत्यंसत्यं नात्र विचार्यमस्ति

mūrterdānātphalamāpnoti devi satyaṁsatyaṁ nātra vicāryamasti

ऐसी मूर्ति के दान से फल प्राप्त होता है, हे देवि! यह सत्य है, सत्य है, इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 82 (garuda.2.75.82)

ईशानशक्रयोर्मध्ये ब्रह्मतीर्थमुदाहृतम् । दुर्लभं मानुषाणां तु स्नानं सर्वार्थसाधकम्

īśānaśakrayormadhye brahmatīrthamudāhṛtam durlabhaṁ mānuṣāṇāṁ tu snānaṁ sarvārthasādhakam

ईशान और इन्द्र (पूर्व) दिशा के मध्य ब्रह्म-तीर्थ कहा गया है; वहाँ स्नान मनुष्यों के लिए दुर्लभ है, यह सर्वार्थ-साधक है।

श्लोक 83 (garuda.2.75.83)

शालग्रामस्य दानं तु दुर्लभं तत्र वै नृणाम् । लक्ष्मीनारायणस्यैव मूर्तेर्दानं सुदुर्लभम्

śālagrāmasya dānaṁ tu durlabhaṁ tatra vai nṛṇām lakṣmīnārāyaṇasyaiva mūrterdānaṁ sudurlabham

वहाँ शालग्राम का दान मनुष्यों के लिए दुर्लभ है; लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति का दान तो अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 84 (garuda.2.75.84)

स्थलमौदुंबरसमं तत्प्रमाणमुदाहृतम् । छत्त्राकारं वर्तुलं च प्रसन्नवदनं शुभम्

sthalamauduṁbarasamaṁ tatpramāṇamudāhṛtam chattrākāraṁ vartulaṁ ca prasannavadanaṁ śubham

इसका स्थल औदुम्बर-फल के समान बताया गया है — छत्र के आकार का, गोल, प्रसन्न मुख वाला, शुभ—

श्लोक 85 (garuda.2.75.85)

चणकप्रदेशमात्रं च वदनं समुदाहृतम् । सव्ये दक्षिणपार्श्वे च समयोः पुष्कलान्वितम्

caṇakapradeśamātraṁ ca vadanaṁ samudāhṛtam savye dakṣiṇapārśve ca samayoḥ puṣkalānvitam

—चने के दाने जितना मुख कहा गया है; बाएँ-दाएँ दोनों पार्श्वों में, दोनों में ही पुष्कल—

श्लोक 86 (garuda.2.75.86)

गोयूथवत्सवर्णं च चतुश्चक्रसमन्वितम् । गोखुरैश्च समायुक्तं सुवर्णकिणसंयुतम्

goyūthavatsavarṇaṁ ca catuścakrasamanvitam gokhuraiśca samāyuktaṁ suvarṇakiṇasaṁyutam

—गाय के बछड़े के रंग का, चार चक्रों से युक्त, गौ-खुर-चिह्नों से युक्त, स्वर्ण-चिह्न से युक्त—

श्लोक 87 (garuda.2.75.87)

वनमालाभिसंयुक्तं वज्रपुङ्खैश्च संयुतम् । एतादृशीं दरेर्मूर्ति लक्ष्मीनारायणं विदुः

vanamālābhisaṁyuktaṁ vajrapuṅkhaiśca saṁyutam etādṛśīṁ darermūrti lakṣmīnārāyaṇaṁ viduḥ

—वनमाला से युक्त, वज्र-पंखयुक्त चिह्नों से युक्त — हरि की ऐसी मूर्ति को लक्ष्मी-नारायण जानते हैं।

श्लोक 88 (garuda.2.75.88)

कलौ नृणां तस्य लाभो दुर्लभः संस्मृतो भुवि । दानं च सुतरां देवि दर्लभं किं वदामि ते

kalau nṛṇāṁ tasya lābho durlabhaḥ saṁsmṛto bhuvi dānaṁ ca sutarāṁ devi darlabhaṁ kiṁ vadāmi te

कलियुग में मनुष्यों के लिए इसकी प्राप्ति दुर्लभ मानी गई है; और दान तो और भी दुर्लभ है, हे देवि! मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?

श्लोक 89 (garuda.2.75.89)

ब्रह्मतीर्थे च संस्नाय श्रोतव्या वै हरेः कथा । गण्डिकायाः शिलायाश्च लक्ष्मीनारायणस्य तु

brahmatīrthe ca saṁsnāya śrotavyā vai hareḥ kathā gaṇḍikāyāḥ śilāyāśca lakṣmīnārāyaṇasya tu

ब्रह्म-तीर्थ में स्नान कर, हरि की कथा तथा गण्डकी-शिला रूप लक्ष्मी-नारायण के विषय में सुनना चाहिए।

श्लोक 90 (garuda.2.75.90)

लक्षणं यो विजानाति तदा तत्सदृशं फलम् । प्राप्नोत्येव न संदेहो नात्र कार्या विचारणा

lakṣaṇaṁ yo vijānāti tadā tatsadṛśaṁ phalam prāpnotyeva na saṁdeho nātra kāryā vicāraṇā

जो उसके लक्षण को जानता है, वह उसके समान ही फल प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं, कोई विचार नहीं।

श्लोक 91 (garuda.2.75.91)

श्रीनिवासस्य तीर्थस्य पूर्वे स्यादिन्द्रतीर्थकम् । श्रीनिवासस्य पूजां तु कर्तुमास्ते शचीपतिः

śrīnivāsasya tīrthasya pūrve syādindratīrthakam śrīnivāsasya pūjāṁ tu kartumāste śacīpatiḥ

श्रीनिवास के तीर्थ के पूर्व में इन्द्र-तीर्थ है; वहाँ शचीपति (इन्द्र) श्रीनिवास की पूजा करने के लिए विराजमान हैं।

श्लोक 92 (garuda.2.75.92)

शालग्रामशिलादानं कर्तव्यं श्रोत्रियायवै । शालग्रामशिलादानं हत्याकोटिविनाशनम्

śālagrāmaśilādānaṁ kartavyaṁ śrotriyāyavai śālagrāmaśilādānaṁ hatyākoṭivināśanam

श्रोत्रिय ब्राह्मण को शालग्राम-शिला का दान करना चाहिए; शालग्राम-शिला का दान करोड़ों हत्याओं का नाश करने वाला है।

श्लोक 93 (garuda.2.75.93)

तस्मिंस्तीर्थे तु यो देवि सीतारामशिलाभिधाम् । ददाति भूतले भद्रे भूपतेः सदृशो भवेत्

tasmiṁstīrthe tu yo devi sītārāmaśilābhidhām dadāti bhūtale bhadre bhūpateḥ sadṛśo bhavet

हे देवि! उस तीर्थ में जो सीताराम-शिला नामक शिला का दान पृथ्वी पर करता है, हे भद्रे! वह राजा के समान हो जाता है।

श्लोक 94 (garuda.2.75.94)

सीतारामशिला देवि द्विविधा संप्रकीर्तिता । पञ्चचक्रयुता काचित्षट्रचक्रेण च संयुता

sītārāmaśilā devi dvividhā saṁprakīrtitā pañcacakrayutā kācitṣaṭracakreṇa ca saṁyutā

हे देवि! सीताराम-शिला दो प्रकार की कही गई है — एक पाँच चक्रों से युक्त, दूसरी छह चक्रों से युक्त।

श्लोक 95 (garuda.2.75.95)

तत्रापि षट्रचक्रयुता ह्युत्तमा संप्रकीर्तिता । पञ्चचक्रयुतायाश्च फलं द्विगुणमीरितम्

tatrāpi ṣaṭracakrayutā hyuttamā saṁprakīrtitā pañcacakrayutāyāśca phalaṁ dviguṇamīritam

उनमें भी छह-चक्रयुक्त उत्तम कही गई है; पाँच-चक्रयुक्त का फल दुगुना कहा गया है।

श्लोक 96 (garuda.2.75.96)

कुक्कुटाण्डप्रमाणं च सुसिग्धं नीलवर्णकम् । वदनत्रयसंयुक्तं सट्चक्रैः केसरैर्युतम्

kukkuṭāṇḍapramāṇaṁ ca susigdhaṁ nīlavarṇakam vadanatrayasaṁyuktaṁ saṭcakraiḥ kesarairyutam

मुर्गी के अंडे के प्रमाण, अत्यन्त स्निग्ध, नीले रंग की, तीन मुखों से युक्त, छह चक्रों और केसरों से युक्त—

श्लोक 97 (garuda.2.75.97)

स्वर्णरेखासमायुक्तं ध्वजवज्राङ्कुशैर्युतम् । एतादृशं तु वै भद्रे सीतारामाभिधं स्मृतम्

svarṇarekhāsamāyuktaṁ dhvajavajrāṅkuśairyutam etādṛśaṁ tu vai bhadre sītārāmābhidhaṁ smṛtam

—स्वर्ण-रेखा से युक्त, ध्वजा-वज्र-अंकुश चिह्नों से युक्त — हे भद्रे! ऐसी ही सीताराम नामक शिला स्मरण की जाती है।

श्लोक 98 (garuda.2.75.98)

वदनेवन्दने देवि सीतारामस्य कोशकम् । दुर्लभं तु कलौ नॄणां स्वसाम्राज्यप्रदं शुभम्

vadanevandane devi sītārāmasya kośakam durlabhaṁ tu kalau nṝṇāṁ svasāmrājyapradaṁ śubham

हे देवि! सीताराम के मुख-कोश की वन्दना कलियुग में मनुष्यों के लिए दुर्लभ है, यह अपने ही साम्राज्य को देने वाली शुभ वन्दना है।

श्लोक 99 (garuda.2.75.99)

इन्द्रतीर्थे महादेवि सीताराम भिधाशिला । या तद्दानं दुर्लभं तन्नाल्पस्य तपसः फलम्

indratīrthe mahādevi sītārāma bhidhāśilā yā taddānaṁ durlabhaṁ tannālpasya tapasaḥ phalam

हे महादेवि! इन्द्र-तीर्थ में सीताराम नामक शिला का दान दुर्लभ है — यह अल्प तप का फल नहीं है।

श्लोक 100 (garuda.2.75.100)

दानस्य शक्त्यभावे तु श्रोतव्यं लक्षणं हरेः । शालग्राम शिलादानाद्यत्फलं तत्फलं लभेत्

dānasya śaktyabhāve tu śrotavyaṁ lakṣaṇaṁ hareḥ śālagrāma śilādānādyatphalaṁ tatphalaṁ labhet

दान की सामर्थ्य न हो तो हरि के लक्षण को ही सुनना चाहिए; शालग्राम-शिला के दान से जो फल मिलता है, वही फल इससे प्राप्त होता है।

श्लोक 101 (garuda.2.75.101)

आग्नेयकोणे श्रीनिवासस्य देवि तीर्थं त्वास्ते वह्निसंज्ञं सुशस्तम् । स वह्निदेवः श्रीनिवासस्य पूजां कर्तुं ह्यास्ते सर्वदा तीर्थमध्ये

āgneyakoṇe śrīnivāsasya devi tīrthaṁ tvāste vahnisaṁjñaṁ suśastam sa vahnidevaḥ śrīnivāsasya pūjāṁ kartuṁ hyāste sarvadā tīrthamadhye

श्रीनिवास के आग्नेय कोण में, हे देवि! वह्नि नामक उत्तम तीर्थ है; वह्निदेव स्वयं वहाँ, तीर्थ के मध्य में, सदा श्रीनिवास की पूजा करने के लिए विराजमान हैं।

श्लोक 102 (garuda.2.75.102)

यो वा तीर्थे वह्निसंज्ञे च देवि भक्त्या स्नानं कुरुतेऽजं स्मरन्हि । ज्ञानद्वारा मोक्षमाप्नोति देवि तत्र स्नानं दुर्ल्लभं वै नृणां च

yo vā tīrthe vahnisaṁjñe ca devi bhaktyā snānaṁ kurute'jaṁ smaranhi jñānadvārā mokṣamāpnoti devi tatra snānaṁ durllabhaṁ vai nṛṇāṁ ca

जो अजन्मा (हरि) का स्मरण करते हुए वह्नि-तीर्थ में भक्तिपूर्वक स्नान करता है, हे देवि! वह ज्ञान के मार्ग से मोक्ष प्राप्त करता है; परन्तु वहाँ स्नान मनुष्यों के लिए दुर्लभ है, हे देवि!

श्लोक 103 (garuda.2.75.103)

ज्ञात्वा स्नानं दुष्करं तीर्थराजे भक्तिस्तस्मिन्दुर्ल्लभा चैव देवि । शालग्रामे तच्छिलायाश्च दानं सुदुर्लभं वासुदेवाभिधायाः

jñātvā snānaṁ duṣkaraṁ tīrtharāje bhaktistasmindurllabhā caiva devi śālagrāme tacchilāyāśca dānaṁ sudurlabhaṁ vāsudevābhidhāyāḥ

इस तीर्थराज में स्नान कठिन जानकर, वहाँ भक्ति भी दुर्लभ है, हे देवि! वासुदेव नामक शालग्राम-शिला का दान भी अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 104 (garuda.2.75.104)

ह्रस्वं तथा वर्तुलं नीलवर्णं सूक्ष्मं मुखं मुखचक्रं सुशुद्धम् । सुवेणुयुक्तं वासुदेवाभिधेयं दानं कलौ दुर्लभं तस्य भद्रे

hrasvaṁ tathā vartulaṁ nīlavarṇaṁ sūkṣmaṁ mukhaṁ mukhacakraṁ suśuddham suveṇuyuktaṁ vāsudevābhidheyaṁ dānaṁ kalau durlabhaṁ tasya bhadre

छोटी, गोल, नीले रंग की, सूक्ष्म मुख वाली, शुद्ध चक्र-चिह्नयुक्त मुख वाली, सुन्दर बाँसुरी-चिह्न से युक्त — वासुदेव नामक शिला का दान, हे भद्रे! कलियुग में दुर्लभ है।

श्लोक 105 (garuda.2.75.105)

दाने तस्याः शक्त्य भावे च देवि स्नात्वा तीर्थे वासुदेवाभिधस्य । सम्यक्श्राव्यं लक्षणं वै शिलायास्तयोस्तुल्यं फलमाहुर्महान्तः

dāne tasyāḥ śaktya bhāve ca devi snātvā tīrthe vāsudevābhidhasya samyakśrāvyaṁ lakṣaṇaṁ vai śilāyāstayostulyaṁ phalamāhurmahāntaḥ

हे देवि! उसके दान की सामर्थ्य न हो, तो वासुदेव नामक तीर्थ में स्नान कर, शिला के लक्षण को भलीभाँति सुनना चाहिए; महात्मा दोनों का फल समान कहते हैं।

श्लोक 106 (garuda.2.75.106)

दक्षिणे श्रीनिवासस्य यमतीर्थं च संस्मृतम् । तत्रास्ते यमराजस्तु पूजां कर्तुं हरेः सदा

dakṣiṇe śrīnivāsasya yamatīrthaṁ ca saṁsmṛtam tatrāste yamarājastu pūjāṁ kartuṁ hareḥ sadā

श्रीनिवास के दक्षिण में यम-तीर्थ स्मरण किया जाता है; वहाँ यमराज सदा हरि की पूजा करने के लिए विराजमान हैं।

श्लोक 107 (garuda.2.75.107)

तत्र स्नानं च दानं चाप्यक्षयं परमं स्मृतम् । शालग्रामशिलादानं कार्यं तत्र महामुने

tatra snānaṁ ca dānaṁ cāpyakṣayaṁ paramaṁ smṛtam śālagrāmaśilādānaṁ kāryaṁ tatra mahāmune

वहाँ स्नान और दान परम अक्षय फल देने वाले स्मरण किए गए हैं; वहाँ शालग्राम-शिला का दान करना चाहिए, हे महामुने!

श्लोक 108 (garuda.2.75.108)

पट्टाभिरामसंज्ञायाः शिलाया दानमिष्यते । तच्चूतफलवत्स्थूलं वदनत्रयसंयुतम्

paṭṭābhirāmasaṁjñāyāḥ śilāyā dānamiṣyate taccūtaphalavatsthūlaṁ vadanatrayasaṁyutam

पट्टाभिराम नामक शिला का दान अभीष्ट है — आम के फल जैसी स्थूल, तीन मुखों से युक्त—

श्लोक 109 (garuda.2.75.109)

शिरश्चक्रेण रहितं सप्तचक्रैः समन्वितम् । नीलवर्णं स्वर्णरेखं गोशुराद्यैः समन्वितम्

śiraścakreṇa rahitaṁ saptacakraiḥ samanvitam nīlavarṇaṁ svarṇarekhaṁ gośurādyaiḥ samanvitam

—सिर पर चक्र-चिह्न से रहित, सात चक्रों से युक्त, नीले रंग की, स्वर्ण-रेखा से युक्त, गौ-खुर आदि चिह्नों से युक्त।

श्लोक 110 (garuda.2.75.110)

पट्टवर्धनरामं तु दुर्लभं बहुभाग्यदम् । पट्टवर्धनरामं तु यो ददाति च तत्र वै । पट्टाभिषिक्तो भवति नात्र कार्या विचारणा

paṭṭavardhanarāmaṁ tu durlabhaṁ bahubhāgyadam paṭṭavardhanarāmaṁ tu yo dadāti ca tatra vai paṭṭābhiṣikto bhavati nātra kāryā vicāraṇā

पट्टवर्धन-राम दुर्लभ और महाभाग्यदायक है; जो वहाँ पट्टवर्धन-राम का दान करता है, वह मानो पट्टाभिषिक्त (राज्याभिषिक्त) हो जाता है, इसमें कोई विचार नहीं।

श्लोक 111 (garuda.2.75.111)

श्रीनिवासस्य नैरृत्ये नैरृतं तीर्थमुत्तमम् । आस्ते हि निरृतिस्तत्र पूजां कुर्तुं च सर्वदा

śrīnivāsasya nairṛtye nairṛtaṁ tīrthamuttamam āste hi nirṛtistatra pūjāṁ kurtuṁ ca sarvadā

श्रीनिवास के नैऋत्य में उत्तम नैऋत-तीर्थ है; वहाँ निरृति स्वयं सदा पूजा करने के लिए विराजमान हैं।

श्लोक 112 (garuda.2.75.112)

तत्र स्नानं प्रकर्तव्यं पुनर्जन्म न विद्यते । शालग्रामशिलायाश्चः पुरुषोत्तमसंज्ञिकाम्

tatra snānaṁ prakartavyaṁ punarjanma na vidyate śālagrāmaśilāyāścaḥ puruṣottamasaṁjñikām

वहाँ स्नान करना चाहिए — तब पुनर्जन्म नहीं होता। पुरुषोत्तम नामक शालग्राम-शिला की मूर्ति—

श्लोक 113 (garuda.2.75.113)

मूर्तिं ददाति यो मर्त्यः स याति परमां गतिम् । औदुंबरफलाकारं प्रसन्नवदनं शुभम्

mūrtiṁ dadāti yo martyaḥ sa yāti paramāṁ gatim auduṁbaraphalākāraṁ prasannavadanaṁ śubham

—जो मनुष्य दान देता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। (इसका स्वरूप:) औदुम्बर-फल के आकार का, प्रसन्न मुख वाला, शुभ—

श्लोक 114 (garuda.2.75.114)

चक्रद्व्यसमायुक्तं शिरश्चक्रसमन्वितम् । सुवर्णबिन्दुसंयुक्तं वज्राङ्कुशसमान्वतम्

cakradvyasamāyuktaṁ śiraścakrasamanvitam suvarṇabindusaṁyuktaṁ vajrāṅkuśasamānvatam

—दो चक्रों से युक्त, सिर पर भी चक्र-चिह्न से युक्त, स्वर्ण-बिन्दु से युक्त, वज्र-अंकुश चिह्न से युक्त।

श्लोक 115 (garuda.2.75.115)

तन्मूर्तिदानं दुर्लभं तत्र देवः प्रीणाति यस्माच्छ्रीनिवासो महात्मा । यदा दानं दुर्घटं स्याच्च देवि तदा श्रोतव्यं लक्षणं तस्य मूर्तेः

tanmūrtidānaṁ durlabhaṁ tatra devaḥ prīṇāti yasmācchrīnivāso mahātmā yadā dānaṁ durghaṭaṁ syācca devi tadā śrotavyaṁ lakṣaṇaṁ tasya mūrteḥ

उस मूर्ति का दान दुर्लभ है, क्योंकि उससे महात्मा श्रीनिवास स्वयं प्रसन्न होते हैं; जब दान कठिन हो, हे देवि! तब उस मूर्ति का लक्षण सुनना चाहिए।

श्लोक 116 (garuda.2.75.116)

पाशिनैरृतयोर्मध्ये शेषतीर्थं परं स्मृतम् । तत्र स्नात्वा शेषमूर्तिं प्रददाति द्विजातये

pāśinairṛtayormadhye śeṣatīrthaṁ paraṁ smṛtam tatra snātvā śeṣamūrtiṁ pradadāti dvijātaye

वरुण और निरृति के बीच परम शेष-तीर्थ स्मरण किया जाता है; वहाँ स्नान कर शेष-मूर्ति ब्राह्मण को देनी चाहिए।

श्लोक 117 (garuda.2.75.117)

स याति परमं लोकं पुनरावृत्तिवर्जितम् । औदुंबरफलाकारं कुण्डलाकृतिमेव च

sa yāti paramaṁ lokaṁ punarāvṛttivarjitam auduṁbaraphalākāraṁ kuṇḍalākṛtimeva ca

वह परम लोक को प्राप्त होता है, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती; (इसका स्वरूप) औदुम्बर-फल के आकार का, कुण्डलाकार भी—

श्लोक 118 (garuda.2.75.118)

शेषवद्वदनं तस्य तस्मिंश्चक्रद्वयं स्मृतम् । फलं तमेकचक्रेण संयुतं वल्मिकान्वितम्

śeṣavadvadanaṁ tasya tasmiṁścakradvayaṁ smṛtam phalaṁ tamekacakreṇa saṁyutaṁ valmikānvitam

—इसका मुख शेष के समान है, जिस पर दो चक्र स्मरण किए जाते हैं; एक अन्य प्रकार एक चक्र से युक्त, बाँबी-चिह्न से युक्त।

श्लोक 119 (garuda.2.75.119)

किञ्चिद्वर्णसमायुक्तं शेषमूर्ति मतिस्फुटम् । सुप्ता प्रबुद्धा द्विविधा शेषमूर्तिरुदाहृता

kiñcidvarṇasamāyuktaṁ śeṣamūrti matisphuṭam suptā prabuddhā dvividhā śeṣamūrtirudāhṛtā

कुछ वर्ण-चिह्न से युक्त शेष-मूर्ति स्पष्ट बुद्धि से जाननी चाहिए; शेष-मूर्ति दो प्रकार की कही गई है — सुप्त और प्रबुद्ध।

श्लोक 120 (garuda.2.75.120)

फणोन्नता प्रबुद्धा स्यात्सप्तलक्षफणान्विता । तत्रापि दुर्लभा सुप्ता महाभाग्यकरीस्मृता

phaṇonnatā prabuddhā syātsaptalakṣaphaṇānvitā tatrāpi durlabhā suptā mahābhāgyakarīsmṛtā

प्रबुद्ध रूप में फण उठा हुआ, सात लाख फणों से युक्त होता है; उनमें भी सुप्त रूप दुर्लभ है, महाभाग्यदायक स्मरण किया जाता है।

श्लोक 121 (garuda.2.75.121)

इह लोके परत्रापि मोक्षदा नात्र संशयः । नवचक्रादुपक्रम्य विंशत्यन्तं च यत्र सः

iha loke paratrāpi mokṣadā nātra saṁśayaḥ navacakrādupakramya viṁśatyantaṁ ca yatra saḥ

यह इस लोक और परलोक में मोक्ष देने वाला है, इसमें संदेह नहीं। जहाँ नौ चक्रों से लेकर बीस चक्रों तक—

श्लोक 122 (garuda.2.75.122)

अनन्त इति विज्ञेयो ह्यनन्तफलदायकः । विश्वंभरः स विज्ञेयो विंशत्यूर्ध्वं वरानने

ananta iti vijñeyo hyanantaphaladāyakaḥ viśvaṁbharaḥ sa vijñeyo viṁśatyūrdhvaṁ varānane

—उसे अनन्त जानना चाहिए, जो अनन्त फल देने वाला है; और बीस से अधिक चक्रों वाले को, हे वरानने! विश्वंभर जानना चाहिए।

श्लोक 123 (garuda.2.75.123)

तत्रापि केसरैश्चैक्रर्लक्षणैश्च समन्वितम् । कलौ तु दुर्लभं नणां तद्दानं चातिदुर्लभम्

tatrāpi kesaraiścaikrarlakṣaṇaiśca samanvitam kalau tu durlabhaṁ naṇāṁ taddānaṁ cātidurlabham

उसमें भी केसरों और अन्य लक्षणों से युक्त — कलियुग में मनुष्यों के लिए यह दुर्लभ है, और इसका दान तो अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 124 (garuda.2.75.124)

स्नानं कृत्वा शेषतीर्थे विशुद्धेनैव चेतसा । एतेषां लक्षणं श्रुत्वा प्रयाति परमां गतिम्

snānaṁ kṛtvā śeṣatīrthe viśuddhenaiva cetasā eteṣāṁ lakṣaṇaṁ śrutvā prayāti paramāṁ gatim

शेष-तीर्थ में विशुद्ध चित्त से स्नान कर, इन लक्षणों को सुनकर, मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 125 (garuda.2.75.125)

ततः परं महाभागे वारुणं तीर्थमुत्तमम् । तत्रास्ते वरुणो देवः पूजां कर्तुं हरेः सदा

tataḥ paraṁ mahābhāge vāruṇaṁ tīrthamuttamam tatrāste varuṇo devaḥ pūjāṁ kartuṁ hareḥ sadā

हे महाभागे! उसके बाद उत्तम वारुण-तीर्थ है; वहाँ वरुण देव सदा हरि की पूजा करने के लिए विराजमान हैं।

श्लोक 126 (garuda.2.75.126)

तत्र स्नानं प्रकर्तव्यं दातव्यं दानमुत्तमम् । शिशुमारं च मत्स्यं च त्रिविक्रममथापि वा । दातव्यं भूतिकामेन तीर्थेस्मिन्विरवर्णिनि

tatra snānaṁ prakartavyaṁ dātavyaṁ dānamuttamam śiśumāraṁ ca matsyaṁ ca trivikramamathāpi vā dātavyaṁ bhūtikāmena tīrthesminviravarṇini

वहाँ स्नान करना चाहिए, उत्तम दान देना चाहिए; हे शुभवर्णिनि! इस तीर्थ में ऐश्वर्य की कामना करने वाले को शिशुमार, मत्स्य अथवा त्रिविक्रम रूप का दान करना चाहिए।

श्लोक 127 (garuda.2.75.127)

जंबूफलसमाकारा पुच्छे सूक्ष्मा सबिन्दुका । चक्रत्रया च वदने पुच्छोपरि सचक्रका

jaṁbūphalasamākārā pucche sūkṣmā sabindukā cakratrayā ca vadane pucchopari sacakrakā

(इसका स्वरूप:) जामुन-फल के आकार का, पूँछ पर सूक्ष्म बिन्दुओं से युक्त, मुख पर तीन चक्रों से युक्त, पूँछ के ऊपर भी चक्र-चिह्न से युक्त—

श्लोक 128 (garuda.2.75.128)

श्रीवत्सबिन्दुमालाढ्या मत्स्यमूर्तिरुदाहृता । पुच्छादधश्चक्रयुतं शिशुमारमुदाहृतम्

śrīvatsabindumālāḍhyā matsyamūrtirudāhṛtā pucchādadhaścakrayutaṁ śiśumāramudāhṛtam

—श्रीवत्स-बिन्दुओं की माला से समृद्ध — यह मत्स्य-मूर्ति कही जाती है; पूँछ के नीचे चक्र-चिह्न से युक्त को शिशुमार कहा जाता है।

श्लोक 129 (garuda.2.75.129)

वक्रचक्रयुतश्चेत्स्यात्त्रिविक्रम उदाहृतः । एतेषां लक्षणं श्रुत्वा वारुणे तीर्थ उत्तमे

vakracakrayutaścetsyāttrivikrama udāhṛtaḥ eteṣāṁ lakṣaṇaṁ śrutvā vāruṇe tīrtha uttame

यदि टेढ़े चक्र-चिह्न से युक्त हो, तो त्रिविक्रम कहा जाता है। इन लक्षणों को उत्तम वारुण-तीर्थ में सुनकर—

श्लोक 130 (garuda.2.75.130)

एतद्दानफलं प्राप्य मोदते विष्णुमन्दिरे । पूर्वौक्ता मूर्तयो यस्मिन् गृहे तिष्ठन्ति भामिनि । भागीरथी तीर्थवरा संनिधत्ते न संशयः

etaddānaphalaṁ prāpya modate viṣṇumandire pūrvauktā mūrtayo yasmin gṛhe tiṣṭhanti bhāmini bhāgīrathī tīrthavarā saṁnidhatte na saṁśayaḥ

—इस दान का फल प्राप्त कर मनुष्य विष्णु-मन्दिर में आनन्दित होता है। हे भामिनि! जिस घर में ये पूर्वोक्त मूर्तियाँ विराजमान रहती हैं, वहाँ श्रेष्ठ तीर्थ भागीरथी स्वयं विद्यमान रहती है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 131 (garuda.2.75.131)

स्वामि पुष्करिणीस्नानं दुर्घटं तु कलौ नृणाम् । तत्र स्थितानां तीर्थानां स्नानं चाप्यतिदुर्घटम्

svāmi puṣkariṇīsnānaṁ durghaṭaṁ tu kalau nṛṇām tatra sthitānāṁ tīrthānāṁ snānaṁ cāpyatidurghaṭam

कलियुग में मनुष्यों के लिए स्वामिपुष्करिणी में स्नान दुर्लभ है; वहाँ स्थित तीर्थों में स्नान तो और भी अधिक दुर्लभ है।

श्लोक 132 (garuda.2.75.132)

शालग्रामशिलादानं दुर्घटं च तथा स्मृताम् । स्वामिपुष्करिणीतीरे कन्यादानं सुदुर्घटम्

śālagrāmaśilādānaṁ durghaṭaṁ ca tathā smṛtām svāmipuṣkariṇītīre kanyādānaṁ sudurghaṭam

शालग्राम-शिला का दान भी वहाँ दुर्लभ स्मरण किया गया है; स्वामिपुष्करिणी के तट पर कन्यादान अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 133 (garuda.2.75.133)

दुर्घटं कपिलादानं भक्ष्यदानं सुदुर्घटम् । स्वामिपुष्करिणीतीर्थे तीर्थेष्वन्येषु भामिनि

durghaṭaṁ kapilādānaṁ bhakṣyadānaṁ sudurghaṭam svāmipuṣkariṇītīrthe tīrtheṣvanyeṣu bhāmini

कपिला गौ का दान दुर्लभ है, भोजन-दान अत्यन्त दुर्लभ है — स्वामिपुष्करिणी तीर्थ में, तथा अन्य तीर्थों में भी, हे भामिनि!

श्लोक 134 (garuda.2.75.134)

स्नानं कुरु यथान्या यं शय्यादानं तथा कुरु । जैगीषव्येन मुनिना त्वेवमुक्ता च कन्यका

snānaṁ kuru yathānyā yaṁ śayyādānaṁ tathā kuru jaigīṣavyena muninā tvevamuktā ca kanyakā

विधिपूर्वक स्नान करो, तथा शय्या-दान भी करो।' मुनि जैगीषव्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस कन्या ने—

श्लोक 135 (garuda.2.75.135)

स्वामिपुष्करिणीस्नानं सा चकार धृतव्रता । तीर्थेष्वेतेषु सुस्नाता दानं चक्रे सुभामिनी

svāmipuṣkariṇīsnānaṁ sā cakāra dhṛtavratā tīrtheṣveteṣu susnātā dānaṁ cakre subhāminī

—दृढ़ व्रत रखते हुए स्वामिपुष्करिणी में स्नान किया; इन तीर्थों में भलीभाँति स्नान कर उस सुन्दरी ने दान दिए।

श्लोक 136 (garuda.2.75.136)

उवास तत्र सा दवी त्रिः सप्तकन्दिनानि च । स्वामिपुष्करणीतीरमहिमानं शृणोति यः । स याति परमां भक्तिं श्रीनिवासे जगन्मये

uvāsa tatra sā davī triḥ saptakandināni ca svāmipuṣkaraṇītīramahimānaṁ śṛṇoti yaḥ sa yāti paramāṁ bhaktiṁ śrīnivāse jaganmaye

वह देवी वहाँ इक्कीस दिनों तक रहीं। जो भी स्वामिपुष्करिणी-तट की महिमा सुनता है, वह जगत्व्यापी श्रीनिवास में परम भक्ति प्राप्त करता है।

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