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उत्तरखण्ड · अध्याय 76

कन्या द्वारा विविध तीर्थयात्राएँ तथा जाम्बवती-जन्म का वर्णन

अध्याय 75अध्याय-सूचीअध्याय 77

श्लोक 1 (garuda.2.76.1)

श्रीकृष्ण उवाच । सा गता स्नातुकामाथ नन्दां पापनिवारिणीम् । पप्रच्छ तं गुरुं विप्रं विनयावनता सुधीः

śrīkṛṣṇa uvāca sā gatā snātukāmātha nandāṁ pāpanivāriṇīm papraccha taṁ guruṁ vipraṁ vinayāvanatā sudhīḥ

श्रीकृष्ण ने कहा — स्नान की इच्छा से वह पापनिवारिणी नन्दा नदी के पास गई; उस बुद्धिमती ने विनम्रतापूर्वक झुककर गुरु ब्राह्मण से पूछा—

श्लोक 2 (garuda.2.76.2)

किन्नामेयं नदी विप्र किं कार्यं चात्र मे वद । जैगीषव्यस्त्वेवमुक्तो वाक्यमेतदुवाच ह

kinnāmeyaṁ nadī vipra kiṁ kāryaṁ cātra me vada jaigīṣavyastvevamukto vākyametaduvāca ha

'हे विप्र! इस नदी का नाम क्या है? यहाँ मुझे क्या करना चाहिए, बताइए।' ऐसा कहे जाने पर जैगीषव्य ने यह वचन कहा।

श्लोक 3 (garuda.2.76.3)

जैगीषव्य उवाच । शृणु भद्रे प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं पापनाशनम् । इयं नदी महाभागे सदा पापविनाशिनी

jaigīṣavya uvāca śṛṇu bhadre pravakṣyāmi māhātmyaṁ pāpanāśanam iyaṁ nadī mahābhāge sadā pāpavināśinī

जैगीषव्य ने कहा — हे भद्रे! सुनो, मैं पाप-नाशक महिमा बताता हूँ; हे महाभागे! यह नदी सदा पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 4 (garuda.2.76.4)

ब्रह्महत्यादिपापौघो यत्र स्नानेन नश्यति । प्रत्यक्षं दृश्यते ह्यत्र स्नानं कर्तुं समुद्यतैः

brahmahatyādipāpaugho yatra snānena naśyati pratyakṣaṁ dṛśyate hyatra snānaṁ kartuṁ samudyataiḥ

यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या आदि पापों का समूह नष्ट हो जाता है; स्नान करने के लिए तत्पर लोगों को यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

श्लोक 5 (garuda.2.76.5)

जलं चाशुभ्ररूपेण पापैश्च परिदृश्यते । यावच्छुभ्रोदकं देवि तावत्सनानं च कारयेत्

jalaṁ cāśubhrarūpeṇa pāpaiśca paridṛśyate yāvacchubhrodakaṁ devi tāvatsanānaṁ ca kārayet

जल पापों के कारण ही अशुभ्र (मैला) दिखाई देता है; हे देवि! जब तक जल शुभ्र न हो, तब तक स्नान करते रहना चाहिए।

श्लोक 6 (garuda.2.76.6)

यावच्छुभ्रोदकं नैव तावत्पापं न नश्यति । शुद्धोदके समायाते पापं नष्टमिति ध्रुवम्

yāvacchubhrodakaṁ naiva tāvatpāpaṁ na naśyati śuddhodake samāyāte pāpaṁ naṣṭamiti dhruvam

जब तक जल शुभ्र नहीं होता, तब तक पाप नष्ट नहीं होता; शुद्ध जल आने पर पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 7 (garuda.2.76.7)

कलावित्थं विशालाक्षि महिमा दृश्यते भुवि । अत्र स्नानं प्रकर्तव्यं दातव्यं दान मुत्तमम् । ततश्च ज्ञानमासाद्य विविष्णुलोकं स गच्छति

kalāvitthaṁ viśālākṣi mahimā dṛśyate bhuvi atra snānaṁ prakartavyaṁ dātavyaṁ dāna muttamam tataśca jñānamāsādya viviṣṇulokaṁ sa gacchati

हे विशालाक्षि! कलियुग में भी पृथ्वी पर यह महिमा इस प्रकार प्रत्यक्ष दिखाई देती है। यहाँ स्नान करना चाहिए, उत्तम दान देना चाहिए; तत्पश्चात् ज्ञान प्राप्त कर वह विष्णुलोक जाता है।

श्लोक 8 (garuda.2.76.8)

गुरुस्त्रीगमनाच्चन्द्र अहल्यायां गतो हरिः । सुरापानाच्च शुक्रस्तु सुवर्णहरणाद्बलिः

gurustrīgamanāccandra ahalyāyāṁ gato hariḥ surāpānācca śukrastu suvarṇaharaṇādbaliḥ

गुरु-पत्नी के प्रति आकर्षण से चन्द्रमा, अहल्या के प्रकरण से इन्द्र, मदिरा-पान से शुक्र, तथा स्वर्ण-चोरी से बलि—

श्लोक 9 (garuda.2.76.9)

ब्रह्महत्यायाश्च रुद्रो नागो दत्तापहारकः । सूतस्य हननाद्रामो निर्मुक्तो ह्यत्र भामिनि

brahmahatyāyāśca rudro nāgo dattāpahārakaḥ sūtasya hananādrāmo nirmukto hyatra bhāmini

—ब्रह्महत्या से रुद्र, दिए हुए धन का अपहरण करने वाला नाग, तथा सूत-पुत्र के वध से राम — ये सब यहीं मुक्त हुए, हे भामिनि!

श्लोक 10 (garuda.2.76.10)

नानेन सदृशं तीर्थं न भूतं न भविष्यति । स्नानं कुरु महाभागे तेन सिद्धिं ह्यवाप्स्यसि

nānena sadṛśaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati snānaṁ kuru mahābhāge tena siddhiṁ hyavāpsyasi

इसके समान तीर्थ न कभी हुआ है, न होगा। हे महाभागे! स्नान करो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 11 (garuda.2.76.11)

जैगीषव्येण मुनिना पित्रा सह च कन्यका । स्नानं चकार विधिवदुदतिष्ठच्च भामिनि

jaigīṣavyeṇa muninā pitrā saha ca kanyakā snānaṁ cakāra vidhivadudatiṣṭhacca bhāmini

मुनि जैगीषव्य तथा पिता के साथ उस कन्या ने विधिपूर्वक स्नान किया और उठ खड़ी हुई, हे भामिनि!

श्लोक 12 (garuda.2.76.12)

यावच्च पौरुषं सूक्तं तावत्कालं हि तिष्ठति । पश्चाज्जप्त्वा महामन्त्रं वेङ्कटेशाभिधं परम्

yāvacca pauruṣaṁ sūktaṁ tāvatkālaṁ hi tiṣṭhati paścājjaptvā mahāmantraṁ veṅkaṭeśābhidhaṁ param

जब तक पुरुष-सूक्त का पाठ हो, तब तक जल में रहना चाहिए; फिर वेंकटेश नामक परम महामन्त्र का जप कर—

श्लोक 13 (garuda.2.76.13)

द्विजातीन्प्रीणयित्वा सा वस्त्रद्रव्यादिभूषणैः । तस्माच्च प्रययौ देवी कमारीतीर्थमुत्तमम्

dvijātīnprīṇayitvā sā vastradravyādibhūṣaṇaiḥ tasmācca prayayau devī kamārītīrthamuttamam

—ब्राह्मणों को वस्त्र, द्रव्य आदि आभूषणों से प्रसन्न कर, वह देवी वहाँ से उत्तम कुमारी-तीर्थ की ओर चली गई।

श्लोक 14 (garuda.2.76.14)

कुमारीमहिमानं च श्रुत्वा स्नानं चकार सा । पुनरावृत्य सा देवी ह्यन्तरा विरजानदीम्

kumārīmahimānaṁ ca śrutvā snānaṁ cakāra sā punarāvṛtya sā devī hyantarā virajānadīm

कुमारी-तीर्थ की महिमा सुनकर उसने स्नान किया; लौटते समय उस देवी ने मार्ग में विरजा नदी को देखा—

श्लोक 15 (garuda.2.76.15)

दृष्ट्वा पप्रच्छ सा देवी जैगीषव्यं गुरुं प्रभुम् । किं संज्ञिकेयं विप्रेन्द्र किं कार्यं ह्यत्र मे वद

dṛṣṭvā papraccha sā devī jaigīṣavyaṁ guruṁ prabhum kiṁ saṁjñikeyaṁ viprendra kiṁ kāryaṁ hyatra me vada

—देखकर उस देवी ने अपने गुरु प्रभु जैगीषव्य से पूछा — 'हे विप्रेन्द्र! इसका क्या नाम है? यहाँ मुझे क्या करना चाहिए, बताइए।'

श्लोक 16 (garuda.2.76.16)

जैगीषव्यः पृष्ट एव मुवाच करुणानिधिः । इयं भागीरथी कन्ये आयाति ह्यन्तरेण तु

jaigīṣavyaḥ pṛṣṭa eva muvāca karuṇānidhiḥ iyaṁ bhāgīrathī kanye āyāti hyantareṇa tu

इस प्रकार पूछे जाने पर करुणानिधि जैगीषव्य ने कहा — 'हे कन्ये! यह भागीरथी ही अन्तर्मार्ग से यहाँ आती है।

श्लोक 17 (garuda.2.76.17)

अतः सा प्रोच्यते ह्यन्तर्गङ्गेति परमर्षिभिः । कन्ये त्वस्यास्तु सलिलं श्रीनिनिवासप्रियं सदा

ataḥ sā procyate hyantargaṅgeti paramarṣibhiḥ kanye tvasyāstu salilaṁ śrīninivāsapriyaṁ sadā

—इसीलिए परम ऋषि इसे 'अन्तर्गंगा' कहते हैं। हे कन्ये! इसका जल सदा श्रीनिवास को प्रिय है।

श्लोक 18 (garuda.2.76.18)

अत्र स्नानं यः करोति स याति परमां गतिम् । स्नानं चकार सा कन्या जले परमपावने

atra snānaṁ yaḥ karoti sa yāti paramāṁ gatim snānaṁ cakāra sā kanyā jale paramapāvane

यहाँ जो स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।' उस कन्या ने उस परम पवित्र जल में स्नान किया।

श्लोक 19 (garuda.2.76.19)

दानादिकं तथा ज्ञात्वा जजाप परमं मनुम् । श्रीनिवाससमीपं तु पुनरागत्य भामिनी

dānādikaṁ tathā jñātvā jajāpa paramaṁ manum śrīnivāsasamīpaṁ tu punarāgatya bhāminī

दान आदि विधि जानकर उसने परम मन्त्र का जप किया; और वह सुन्दरी पुनः श्रीनिवास के समीप लौट आई।

श्लोक 20 (garuda.2.76.20)

अङ्गप्रदक्षिणं चक्रे भक्त्या वेङ्कटनायकम् । ब्राह्मणादीन्प्रीणयित्वा वस्त्रगन्धादिभूषणैः

aṅgapradakṣiṇaṁ cakre bhaktyā veṅkaṭanāyakam brāhmaṇādīnprīṇayitvā vastragandhādibhūṣaṇaiḥ

उसने भक्तिपूर्वक वेंकटनायक की अंग-प्रदक्षिणा की; ब्राह्मणों आदि को वस्त्र, गन्ध आदि आभूषणों से प्रसन्न किया।

श्लोक 21 (garuda.2.76.21)

पुनः परदिने प्रातः स्वामिपुष्करिणीजले । स्नानं कृत्वा महाभागा ययौ तुंबुरुसंज्ञिकाम्

punaḥ paradine prātaḥ svāmipuṣkariṇījale snānaṁ kṛtvā mahābhāgā yayau tuṁburusaṁjñikām

अगले दिन प्रातः स्वामिपुष्करिणी के जल में स्नान कर, वह महाभागा तुम्बुरु नामक तीर्थ को गई।

श्लोक 22 (garuda.2.76.22)

पप्रच्छ तं गुरुं देवी नाथं किन्नामिका त्वयम् । जैगीषव्य उवाच । इयं तुंबरुकाभिज्ञा नारी वै वरवर्णिनी

papraccha taṁ guruṁ devī nāthaṁ kinnāmikā tvayam jaigīṣavya uvāca iyaṁ tuṁbarukābhijñā nārī vai varavarṇinī

देवी ने अपने गुरु-नाथ से पूछा — 'इसका क्या नाम है?' जैगीषव्य ने कहा — 'यह तुम्बुरु नाम से जानी जाने वाली, श्रेष्ठ वर्ण वाली स्त्री है।

श्लोक 23 (garuda.2.76.23)

पुरा तुं बुरुणा साकं नारदस्तपसि स्थितः । अत्र प्रादुरभूद्विष्णुर्नारदस्य हिताय च

purā tuṁ buruṇā sākaṁ nāradastapasi sthitaḥ atra prādurabhūdviṣṇurnāradasya hitāya ca

पूर्वकाल में तुम्बुरु के साथ नारद तप में स्थित थे; नारद के हित के लिए यहाँ विष्णु प्रकट हुए।

श्लोक 24 (garuda.2.76.24)

स्नानं यः कुरुते ह्यत्र स याति परमां गतिम् । अत्र स्नानं मनुष्याणां सर्वेषां दुर्लभं कलौ

snānaṁ yaḥ kurute hyatra sa yāti paramāṁ gatim atra snānaṁ manuṣyāṇāṁ sarveṣāṁ durlabhaṁ kalau

जो यहाँ स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है; कलियुग में सभी मनुष्यों के लिए यहाँ स्नान दुर्लभ है।

श्लोक 25 (garuda.2.76.25)

अत्र स्नानं मनुष्याणां नाल्पस्य तपसः फलम् । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च दत्त्वा दानान्यकेशः

atra snānaṁ manuṣyāṇāṁ nālpasya tapasaḥ phalam tatra snātvā ca pītvā ca dattvā dānānyakeśaḥ

मनुष्यों के लिए यहाँ स्नान अल्प तप का फल नहीं है।' वहाँ स्नान कर, जल-पान कर, दान देकर, केश-रहित (व्रतधारी) वह—

श्लोक 26 (garuda.2.76.26)

पुनरागत्य सा देवी श्रीनिवासं ननाम ह । तस्मिमन्दिने ब्राह्मणांश्च तर्पयामास भमिनि

punarāgatya sā devī śrīnivāsaṁ nanāma ha tasmimandine brāhmaṇāṁśca tarpayāmāsa bhamini

—पुनः लौटकर उस देवी ने श्रीनिवास को प्रणाम किया; उस दिन, हे भामिनि! उसने ब्राह्मणों को तृप्त किया।

श्लोक 27 (garuda.2.76.27)

स्वामिपुष्करिणीं प्राप्य दीपान्प्राज्वालयत्सती । सोपानेषु महाभागा दीपावलिभिरञ्जसा । प्रीणयामास देवेशं श्रीनिवासं जगद्गुरुम्

svāmipuṣkariṇīṁ prāpya dīpānprājvālayatsatī sopāneṣu mahābhāgā dīpāvalibhirañjasā prīṇayāmāsa deveśaṁ śrīnivāsaṁ jagadgurum

स्वामिपुष्करिणी पहुँचकर उस साध्वी ने दीप जलाए; उस महाभागा ने सीढ़ियों पर दीपमालाओं से देवेश जगद्गुरु श्रीनिवास को प्रसन्न किया।

श्लोक 28 (garuda.2.76.28)

पुनः परदिने प्राप्ते शक्रतीर्थमनुत्तमम् । कपिलाख्योर्ध्वदेशे तु तत्तीर्थं पावनं स्मृतम्

punaḥ paradine prāpte śakratīrthamanuttamam kapilākhyordhvadeśe tu tattīrthaṁ pāvanaṁ smṛtam

अगले दिन उत्तम शक्र-तीर्थ में पहुँचकर — कपिल नामक तीर्थ के ऊपरी भाग में वह पवित्र तीर्थ स्मरण किया जाता है।

श्लोक 29 (garuda.2.76.29)

तत्र स्नात्वा महाभागा तदूर्ध्वं स्नापयेत्स्वयम् । विष्वसेनसरस्तत्र सर्वपापविनाशनम्

tatra snātvā mahābhāgā tadūrdhvaṁ snāpayetsvayam viṣvasenasarastatra sarvapāpavināśanam

वहाँ स्नान कर, वह महाभागा उससे और ऊपर स्वयं स्नान करती गई; वहाँ विष्वक्सेन-सरोवर है, जो सब पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 30 (garuda.2.76.30)

तत ऊर्ध्वं महाभागा ययौ तत्र ददर्श सा । पञ्चायुधानां तीर्थानि तेषु स्नानं चकार सा

tata ūrdhvaṁ mahābhāgā yayau tatra dadarśa sā pañcāyudhānāṁ tīrthāni teṣu snānaṁ cakāra sā

उससे और ऊपर वह महाभागा गई और वहाँ पाँच आयुधों (विष्णु के शस्त्रों) के तीर्थों को देखा; उनमें उसने स्नान किया।

श्लोक 31 (garuda.2.76.31)

तदूर्ध्वं चाग्निकुण्डं स्याद्दुरारोहं ततोग्रतः । तस्योपरि ब्रह्मतीर्थं ब्रह्महत्याविमोचनम्

tadūrdhvaṁ cāgnikuṇḍaṁ syāddurārohaṁ tatogrataḥ tasyopari brahmatīrthaṁ brahmahatyāvimocanam

उससे ऊपर अग्निकुण्ड है, जो उसके आगे दुर्गम है; उसके ऊपर ब्रह्म-तीर्थ है, जो ब्रह्महत्या से मुक्ति देता है।

श्लोक 32 (garuda.2.76.32)

सप्तर्षीणां तदूर्ध्वं तु पुण्यतीर्थं च सत्फलम् । दशाधिकफलं तेषा तीर्थानामुत्तरोत्तरम्

saptarṣīṇāṁ tadūrdhvaṁ tu puṇyatīrthaṁ ca satphalam daśādhikaphalaṁ teṣā tīrthānāmuttarottaram

उससे ऊपर सप्तर्षियों का पुण्य-फलदायक तीर्थ है; उन तीर्थों का उत्तरोत्तर फल दस गुना अधिक है।

श्लोक 33 (garuda.2.76.33)

एतेषां चैव माहात्म्यं को वा वक्तुमिहार्हति । ऋषितीर्थेषु सा कन्या चचार तप उत्तमम्

eteṣāṁ caiva māhātmyaṁ ko vā vaktumihārhati ṛṣitīrtheṣu sā kanyā cacāra tapa uttamam

इन सबकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है? ऋषियों के इन तीर्थों में उस कन्या ने उत्तम तप किया।

श्लोक 34 (garuda.2.76.34)

ममावतारपर्यन्तं चरित्वा तप उत्तमम् । योगधारण या देहं त्यक्त्वा जांबवतो गृहे

mamāvatāraparyantaṁ caritvā tapa uttamam yogadhāraṇa yā dehaṁ tyaktvā jāṁbavato gṛhe

मेरे अवतार-काल तक उत्तम तप करती रही, फिर योगधारणा से शरीर त्यागकर जाम्बवान् के घर में—

श्लोक 35 (garuda.2.76.35)

जाता जांबवती नाम ववृधे तस्य वेश्मनि । तस्याः पिता जांबवान्स समादात्कन्यकां तदा । रुक्म्या अनं तरा सैषा मम भार्या खगेश्वर

jātā jāṁbavatī nāma vavṛdhe tasya veśmani tasyāḥ pitā jāṁbavānsa samādātkanyakāṁ tadā rukmyā anaṁ tarā saiṣā mama bhāryā khageśvara

—'जाम्बवती' नाम से जन्म लिया और उनके घर में बड़ी हुई; उसके पिता जाम्बवान् ने तब उस कन्या को दे दिया — रुक्मिणी के तत्काल बाद वही मेरी पत्नी बनी, हे खगेश्वर!

श्लोक 36 (garuda.2.76.36)

इदं हि परमाख्यानं वेङ्कटाद्रेर्महागिरेः । को वा वर्णयितुं शक्तो मदन्यः पुरुषो भुवि

idaṁ hi paramākhyānaṁ veṅkaṭādrermahāgireḥ ko vā varṇayituṁ śakto madanyaḥ puruṣo bhuvi

यह विशाल पर्वत वेंकटाद्रि की परम कथा है; मेरे अतिरिक्त पृथ्वी पर इसका पूर्ण वर्णन कौन कर सकता है?

श्लोक 37 (garuda.2.76.37)

वेङ्कटेशस्य नैवेद्यं सदा लक्ष्मीः करोति वै । ब्रह्मा पूजयते नित्यमेवं शास्त्रस्य निर्णयः

veṅkaṭeśasya naivedyaṁ sadā lakṣmīḥ karoti vai brahmā pūjayate nityamevaṁ śāstrasya nirṇayaḥ

वेंकटेश का नैवेद्य सदा लक्ष्मी ही बनाती हैं, ब्रह्मा नित्य उनकी पूजा करते हैं — यही शास्त्र का निर्णय है।

श्लोक 38 (garuda.2.76.38)

नैवेद्यभक्षिणां पुंसामुपहासं न कारयेत् । स्वस्य प्राशस्त्यभावे तु नैवेद्यादि गुडादिकम् । ग्राह्यमेव न संदेहो अन्यथा नारकी भवेत्

naivedyabhakṣiṇāṁ puṁsāmupahāsaṁ na kārayet svasya prāśastyabhāve tu naivedyādi guḍādikam grāhyameva na saṁdeho anyathā nārakī bhavet

नैवेद्य खाने वाले पुरुषों का उपहास कभी नहीं करना चाहिए; अपनी श्रेष्ठता न होने पर भी नैवेद्य, गुड़ आदि अवश्य ग्रहण करना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं; अन्यथा नरक-गामी होता है।

श्लोक 39 (garuda.2.76.39)

श्रीनिवासात्परो देवो न भूतो न भविष्यति । स्वयं च पाचयित्वात्वं घृतपक्वादिकं तथा । श्रीनिवासस्य नैवेद्यं दत्त्वा भोजनमाचरेत्

śrīnivāsātparo devo na bhūto na bhaviṣyati svayaṁ ca pācayitvātvaṁ ghṛtapakvādikaṁ tathā śrīnivāsasya naivedyaṁ dattvā bhojanamācaret

श्रीनिवास से बढ़कर कोई देवता न कभी हुआ है, न होगा। स्वयं घी में पकाए गए पदार्थ आदि बनाकर, श्रीनिवास को नैवेद्य अर्पित कर, फिर भोजन करना चाहिए।

श्लोक 40 (garuda.2.76.40)

इदं तु परमं गोप्यं तवोक्तं च खगेश्वर । न कस्यापि च वक्तव्यं गोप्यत्वात्खगसत्तम । इतः परं प्रवक्ष्यामि तारतम्यं शृणु प्रभो

idaṁ tu paramaṁ gopyaṁ tavoktaṁ ca khageśvara na kasyāpi ca vaktavyaṁ gopyatvātkhagasattama itaḥ paraṁ pravakṣyāmi tāratamyaṁ śṛṇu prabho

हे खगेश्वर! यह अत्यन्त गोपनीय बात तुम्हें बताई गई है; इसे गोपनीय होने के कारण किसी और को नहीं बताना चाहिए, हे खगसत्तम! अब इसके आगे तारतम्य का वर्णन करूँगा, सुनो हे प्रभो!

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