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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 102

मार्तण्ड-उत्पत्ति

अध्याय 101अध्याय-सूचीअध्याय 103

श्लोक 1 (markandeya.102.1)

मार्कण्डेय उवाच ततः स्वतेजसस्तस्मादाविर्भूतो विभावसुः । अदृश्यत तदादित्यस्तप्तताम्रोपमप्रभः ॥ 102.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ svatejasastasmādāvirbhūto vibhāvasuḥ adṛśyata tadādityastaptatāmropamaprabhaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब अपने ही तेज से वह विभावसु प्रकट हुए; वे आदित्य तपे हुए ताँबे के समान कान्तिमान् दिखायी दिये।

श्लोक 2 (markandeya.102.2)

अथ तां प्रणतां देवीं तस्य संदर्शनान्मुने । प्राह भास्वन्वृणुष्वेष्टवरं मत्तो यमिच्छसि ॥ 102.2 ॥

atha tāṁ praṇatāṁ devīṁ tasya saṁdarśanānmune prāha bhāsvanvṛṇuṣveṣṭavaraṁ matto yamicchasi

हे मुने! तब उनके दर्शन से नत हुई उस देवी से भास्वान् ने कहा—'इच्छित वर माँगो, जो तुम मुझसे चाहती हो।'

श्लोक 3 (markandeya.102.3)

प्रणता शिरसा सा च जानुपीडितमेदिनी । प्रत्युवाच विवस्वन्तं वरदं समुपस्थितम् ॥ 102.3 ॥

praṇatā śirasā sā ca jānupīḍitamedinī pratyuvāca vivasvantaṁ varadaṁ samupasthitam

शिर से प्रणत तथा जानुओं से पृथ्वी को दबाती हुई उसने वर देने के लिए उपस्थित विवस्वान् को उत्तर दिया।

श्लोक 4 (markandeya.102.4)

देव प्रसीद पुत्राणां हृतं त्रिभुवनं मम । यज्ञभागाश्च दैत्यैश्च दानवैश्च बलाधिकैः ॥ 102.4 ॥

deva prasīda putrāṇāṁ hṛtaṁ tribhuvanaṁ mama yajñabhāgāśca daityaiśca dānavaiśca balādhikaiḥ

'हे देव! प्रसन्न होइए — मेरे पुत्रों का त्रिभुवन बलशाली दैत्यों और दानवों ने छीन लिया है, और उनका यज्ञभाग भी।'

श्लोक 5 (markandeya.102.5)

तन्निमित्तं प्रसादं त्वं कुरुष्व मम गोपते । अंशेन तेषां भ्रातृत्वं गत्वा नाशय तद्रिपून् ॥ 102.5 ॥

tannimittaṁ prasādaṁ tvaṁ kuruṣva mama gopate aṁśena teṣāṁ bhrātṛtvaṁ gatvā nāśaya tadripūn

'हे गोपते! उसी कारण मुझ पर प्रसन्न होइए; अपने अंश से उनके भ्राता बनकर उन शत्रुओं का नाश कीजिए।'

श्लोक 6 (markandeya.102.6)

यथा मे तनया भूयो यज्ञभागभुजः प्रभो । भवेयुरधिपाश्चैव त्रैलोक्यस्य दिवाकर ॥ 102.6 ॥

yathā me tanayā bhūyo yajñabhāgabhujaḥ prabho bhaveyuradhipāścaiva trailokyasya divākara

'हे प्रभो, दिवाकर! जिससे मेरे पुत्र पुनः यज्ञभाग के भोक्ता तथा त्रैलोक्य के अधिपति बन सकें।'

श्लोक 7 (markandeya.102.7)

तथानुकम्पां पुत्राणां सुप्रसन्नो रवे मम । कुरु प्रपन्नार्तिहर स्थितिकर्त्ता त्वमुच्यसे ॥ 102.7 ॥

tathānukampāṁ putrāṇāṁ suprasanno rave mama kuru prapannārtihara sthitikarttā tvamucyase

'हे रवे! इस प्रकार सुप्रसन्न होकर मेरे पुत्रों पर कृपा कीजिए — आप शरणागत की पीड़ा हरने वाले तथा स्थितिकर्ता कहे जाते हैं।'

श्लोक 8 (markandeya.102.8)

मार्कण्डेय उवाच ततस्तामाह भगवान्भास्करो वारितस्करः । प्रणतामदितिं विप्र प्रसादसुमुखो विभुः ॥ 102.8 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tatastāmāha bhagavānbhāskaro vāritaskaraḥ praṇatāmaditiṁ vipra prasādasumukho vibhuḥ

मार्कण्डेय ने कहा—हे विप्र! तब चोरों को दूर रखने वाले, प्रसाद से प्रसन्नमुख भगवान् भास्कर ने प्रणत अदिति से कहा।

श्लोक 9 (markandeya.102.9)

सहस्रांशेन ते गर्भे सम्भूयाहमशेषतः । त्वत्पुत्रशत्रूनदिते नाशयाम्याशु निर्वृतः ॥ 102.9 ॥

sahasrāṁśena te garbhe sambhūyāhamaśeṣataḥ tvatputraśatrūnadite nāśayāmyāśu nirvṛtaḥ

'हे अदिति! सहस्रांश से पूर्णतया तुम्हारे गर्भ में समाहित होकर मैं शीघ्र ही आनन्दपूर्वक तुम्हारे पुत्रों के शत्रुओं का नाश करूँगा।'

श्लोक 10 (markandeya.102.10)

इत्युक्त्वा भगवान्भास्वानन्तर्द्धानमुपागमत् । निवृत्ता सापि तपसः संतृप्ताखिलवाञ्छिता ॥ 102.10 ॥

ityuktvā bhagavānbhāsvānantarddhānamupāgamat nivṛttā sāpi tapasaḥ saṁtṛptākhilavāñchitā

ऐसा कहकर भगवान् भास्वान् अन्तर्धान हो गये; और वह भी सन्तुष्ट होकर, समस्त कामना पूर्ण हुई मानकर, तप से निवृत्त हो गयी।

श्लोक 11 (markandeya.102.11)

ततो रश्मिसहस्रात्तु सौषुम्नाख्यो रवेः करः । विप्रावतारं संचक्रे देवमातुरथोदरे ॥ 102.11 ॥

tato raśmisahasrāttu sauṣumnākhyo raveḥ karaḥ viprāvatāraṁ saṁcakre devamāturathodare

तब सूर्य की सहस्र किरणों में से सुषुम्ना नामक किरण ने देवमाता के उदर में विप्र-अवतार को सम्पन्न किया।

श्लोक 12 (markandeya.102.12)

कृच्छ्रचान्द्रायणादीनि सा च चक्रे समाहिता । शुचिः संधारयामास दिव्यं गर्भमिति द्विज ॥ 102.12 ॥

kṛcchracāndrāyaṇādīni sā ca cakre samāhitā śuciḥ saṁdhārayāmāsa divyaṁ garbhamiti dvija

और वह समाहितचित्त होकर कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रत करने लगी; तथा हे द्विज! पवित्र रहकर उस दिव्य गर्भ को धारण करती रही।

श्लोक 13 (markandeya.102.13)

ततस्तां कश्यपः प्राह किञ्चित्कोपप्लुताक्षरम् । किं मारयसि गर्भाण्डमिति नित्योपवासिनी ॥ 102.13 ॥

tatastāṁ kaśyapaḥ prāha kiñcitkopaplutākṣaram kiṁ mārayasi garbhāṇḍamiti nityopavāsinī

तब कश्यप ने कुछ क्रोधयुक्त वाणी में उससे कहा—'हे नित्य उपवास करने वाली! तुम इस गर्भाण्ड को क्यों मार रही हो?'

श्लोक 14 (markandeya.102.14)

सा च तं प्राह गर्भाण्डमेतत्पश्येति कोपना । न मारितं विपक्षाणां मृत्यवे तद्भविष्यति ॥ 102.14 ॥

sā ca taṁ prāha garbhāṇḍametatpaśyeti kopanā na māritaṁ vipakṣāṇāṁ mṛtyave tadbhaviṣyati

और वह क्रोधित होकर उनसे बोली—'देखिए, यह गर्भाण्ड मारा नहीं जा रहा; यह हमारे शत्रुओं की मृत्यु का कारण बनेगा।'

श्लोक 15 (markandeya.102.15)

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा तं तदा गर्भमुत्ससर्ज्ज सुरारणिः । जाज्वल्यमानं तेजोभिः पत्युर्वचनकोपिता ॥ 102.15 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ityuktvā taṁ tadā garbhamutsasarjja surāraṇiḥ jājvalyamānaṁ tejobhiḥ patyurvacanakopitā

मार्कण्डेय ने कहा—ऐसा कहकर, पति के वचन से क्रोधित हुई वह देवारणि अदिति ने तेज से जाज्वल्यमान उस गर्भ को त्याग दिया।

श्लोक 16 (markandeya.102.16)

तं दृष्ट्वा कश्यपो गर्भमुद्यद्भास्करवर्च्चसम् । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा ऋग्भिराद्याभिरादरात् ॥ 102.16 ॥

taṁ dṛṣṭvā kaśyapo garbhamudyadbhāskaravarccasam tuṣṭāva praṇato bhūtvā ṛgbhirādyābhirādarāt

सूर्य के समान तेज से युक्त उस गर्भ को देखकर कश्यप ने प्रणत होकर आदरपूर्वक आद्य ऋचाओं से उसकी स्तुति की।

श्लोक 17 (markandeya.102.17)

संस्तूयमानः स तदा गर्भाण्डात्प्रकटोऽभवत् । पद्मपत्रसवर्णाभस्तेजसा व्याप्तदिङ्मुखः ॥ 102.17 ॥

saṁstūyamānaḥ sa tadā garbhāṇḍātprakaṭo ’bhavat padmapatrasavarṇābhastejasā vyāptadiṅmukhaḥ

इस प्रकार स्तुत होकर वह गर्भाण्ड से प्रकट हो गया — कमलपत्र के समान वर्ण वाला, अपने तेज से दिशाओं को व्याप्त करता हुआ।

श्लोक 18 (markandeya.102.18)

अथान्तरिक्षादाभाष्य कश्यपं मुनिसत्तमम् । सतोयमेघगम्भीरवागुवाचाशरीरिणी ॥ 102.18 ॥

athāntarikṣādābhāṣya kaśyapaṁ munisattamam satoyameghagambhīravāguvācāśarīriṇī

तब आकाश से मुनिसत्तम कश्यप को सम्बोधित करती हुई, जलद के समान गम्भीर स्वर वाली एक अशरीरी वाणी ने कहा—

श्लोक 19 (markandeya.102.19)

मारितं ते यतः प्रोक्तमेतदण्डं त्वया मुने । तस्मान्मुने सुतस्तेऽयं मार्त्तण्डाख्यो भविष्यति ॥ 102.19 ॥

māritaṁ te yataḥ proktametadaṇḍaṁ tvayā mune tasmānmune sutaste ’yaṁ mārttaṇḍākhyo bhaviṣyati

'हे मुने! चूँकि तुमने कहा कि यह अण्डा मारा जा रहा है, इसी कारण, हे मुने! तुम्हारा यह पुत्र मार्तण्ड नाम से जाना जाएगा।'

श्लोक 20 (markandeya.102.20)

सूर्याधिकारं च विभुर्जगत्येष करिष्यति । हनिष्यत्यसुरांश्चायं यज्ञभागहरानरीन् ॥ 102.20 ॥

sūryādhikāraṁ ca vibhurjagatyeṣa kariṣyati haniṣyatyasurāṁścāyaṁ yajñabhāgaharānarīn

'यह प्रभावशाली संसार में सूर्य के अधिकार को धारण करेगा; तथा यज्ञभाग हरने वाले असुर शत्रुओं का वध करेगा।'

श्लोक 21 (markandeya.102.21)

देवा निशम्येति वचो गगनात्समुपागमन् । प्रहर्षमतुलं याता दानवाश्च हतौजसः ॥ 102.21 ॥

devā niśamyeti vaco gaganātsamupāgaman praharṣamatulaṁ yātā dānavāśca hataujasaḥ

यह वचन सुनकर देवता आकाश से एकत्र हो गये, अनुपम हर्ष को प्राप्त हुए; और दानव अपना ओज खोकर [निस्तेज हो गये]।

श्लोक 22 (markandeya.102.22)

ततो युद्धाय दैतेयानाजुहाव शतक्रतुः । सह देवैर्मुदा युक्तो दानवाश्च समभ्ययुः ॥ 102.22 ॥

tato yuddhāya daiteyānājuhāva śatakratuḥ saha devairmudā yukto dānavāśca samabhyayuḥ

तब शतक्रतु (इन्द्र) ने दैत्यों को युद्ध के लिए ललकारा; देवताओं सहित हर्षपूर्वक युक्त होकर वे बढ़े, और दानव भी सामने आ गये।

श्लोक 23 (markandeya.102.23)

तेषां युद्धमभूद्घोरं देवानामसुरैः सह । शस्त्रास्त्रदीप्तिसंदीप्तं समस्तभुवनान्तरम् ॥ 102.23 ॥

teṣāṁ yuddhamabhūdghoraṁ devānāmasuraiḥ saha śastrāstradīptisaṁdīptaṁ samastabhuvanāntaram

देवताओं और असुरों के बीच शस्त्रास्त्रों की चमक से प्रदीप्त, समस्त लोकों को व्याप्त करने वाला घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 24 (markandeya.102.24)

तस्मिन्युद्धे भगवता मार्त्तण्डेन निरीक्षिताः । तेजसा दह्यमानास्ते भस्मीभूता महासुराः ॥ 102.24 ॥

tasminyuddhe bhagavatā mārttaṇḍena nirīkṣitāḥ tejasā dahyamānāste bhasmībhūtā mahāsurāḥ

उस युद्ध में भगवान् मार्तण्ड द्वारा देखे जाने मात्र से वे महान् असुर उनके तेज से जलकर भस्म हो गये।

श्लोक 25 (markandeya.102.25)

ततः प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे दिवौकसः । तुष्टुवुस्तेजसा योनिं मार्त्तण्डमदितिं तथा ॥ 102.25 ॥

tataḥ praharṣamatulaṁ prāptāḥ sarve divaukasaḥ tuṣṭuvustejasā yoniṁ mārttaṇḍamaditiṁ tathā

तब समस्त देवता अनुपम हर्ष को प्राप्त होकर उस तेज के कारण मार्तण्ड तथा अदिति दोनों की स्तुति करने लगे।

श्लोक 26 (markandeya.102.26)

स्वाधिकारांस्तथा प्राप्ता यज्ञभागांश्च पूर्ववत् । भगवानपि मार्तण्डः स्वाधिकारमथाकरोत् ॥ 102.26 ॥

svādhikārāṁstathā prāptā yajñabhāgāṁśca pūrvavat bhagavānapi mārtaṇḍaḥ svādhikāramathākarot

इस प्रकार पूर्ववत् अपने-अपने अधिकार और यज्ञभाग को प्राप्त कर लेने पर, भगवान् मार्तण्ड ने भी अपना अधिकार ग्रहण किया।

श्लोक 27 (markandeya.102.27)

कदम्बपुष्पवद्भास्वानधश्चोर्ध्वं च रश्मिभिः । वृत्ताग्निपिण्डसदृशो दध्रे नातिस्फुरद्वपुः ॥ 102.27 ॥

kadambapuṣpavadbhāsvānadhaścordhvaṁ ca raśmibhiḥ vṛttāgnipiṇḍasadṛśo dadhre nātisphuradvapuḥ

कदम्ब के पुष्प के समान, अपनी किरणों से नीचे और ऊपर व्याप्त, भास्वान् ने गोल अग्निपिण्ड के समान, अति तीव्र न चमकने वाला शरीर धारण किया।

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