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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 103

भानु-तनु-लेखन

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (markandeya.103.1)

मार्कण्डेय उवाच अथ तस्मै ददौ कन्यां संज्ञां नाम विवस्वते । प्रसाद्य प्रणतो भूत्वा विश्वकर्मा प्रजापतिः ॥ 103.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca atha tasmai dadau kanyāṁ saṁjñāṁ nāma vivasvate prasādya praṇato bhūtvā viśvakarmā prajāpatiḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब विश्वकर्मा प्रजापति ने प्रसन्न होकर, प्रणत होकर, विवस्वान् को अपनी कन्या संज्ञा नाम की दे दी।

श्लोक 2 (markandeya.103.2)

वैवस्वतस्तु सम्भूतो मनुस्तस्यां विवस्वतः । पूर्वमेव तथाख्यातं तत्स्वरूपं विशेषतः ॥ 103.2 ॥

vaivasvatastu sambhūto manustasyāṁ vivasvataḥ pūrvameva tathākhyātaṁ tatsvarūpaṁ viśeṣataḥ

उनसे विवस्वान् का पुत्र वैवस्वत मनु उत्पन्न हुआ; उसका विशेष स्वरूप पहले ही बताया जा चुका है।

श्लोक 3 (markandeya.103.3)

क्रौष्टुकिरुवाच मार्कण्डेय उवाच त्रीण्यपत्यान्यसौ तस्यां जनयामास गोपतिः । द्वौ पुत्रौ सुमहाभागो कन्यां च यमुनां मुने ॥ 103.3 ॥

krauṣṭukiruvāca mārkaṇḍeya uvāca trīṇyapatyānyasau tasyāṁ janayāmāsa gopatiḥ dvau putrau sumahābhāgo kanyāṁ ca yamunāṁ mune

क्रौष्टुकि ने कहा (आगे सुनाने का अनुरोध किया)। मार्कण्डेय ने कहा—हे मुने! उस गोपति ने उससे तीन सन्तानें उत्पन्न कीं — दो महाभाग्यशाली पुत्र और यमुना नामक एक कन्या।

श्लोक 4 (markandeya.103.4)

मनुर्वैवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः । ततो यमो यमी चैव यमलौ सम्बभूवतुः ॥ 103.4 ॥

manurvaivasvato jyeṣṭhaḥ śrāddhadevaḥ prajāpatiḥ tato yamo yamī caiva yamalau sambabhūvatuḥ

उनमें ज्येष्ठ वैवस्वत मनु श्राद्धदेव प्रजापति हुए; फिर यम और यमी — यह युगल सन्तान उत्पन्न हुई।

श्लोक 5 (markandeya.103.5)

यत्तेजोऽभ्यधिकं तस्य मार्तण्डस्य विवस्वतः । तेनातितापयामास त्रींल्लोकान्सचराचरान् ॥ 103.5 ॥

yattejo ’bhyadhikaṁ tasya mārtaṇḍasya vivasvataḥ tenātitāpayāmāsa trīṁllokānsacarācarān

मार्तण्ड विवस्वान् का वह अत्यधिक तेज चराचर तीनों लोकों को अत्यन्त सन्तप्त करने लगा।

श्लोक 6 (markandeya.103.6)

गोलाकारं तु तद्दृष्ट्वा संज्ञारूपं विवस्वतः । असहन्ती महत्तेजः स्वां छायां प्रेक्ष्य साऽब्रवीत् ॥ 103.6 ॥

golākāraṁ tu taddṛṣṭvā saṁjñārūpaṁ vivasvataḥ asahantī mahattejaḥ svāṁ chāyāṁ prekṣya sā ’bravīt

विवस्वान् के उस गोलाकार रूप को देखकर तथा उनके महान् तेज को सहन न कर पाकर, संज्ञा ने अपनी छाया को देखकर कहा—

श्लोक 7 (markandeya.103.7)

संज्ञोवाच अहं यास्यामि भद्रं ते स्वमेव भवनं पितुः । निर्विकारं त्वयाप्यत्र स्थेयं मच्छासनाच्छुभे ॥ 103.7 ॥

saṁjñovāca ahaṁ yāsyāmi bhadraṁ te svameva bhavanaṁ pituḥ nirvikāraṁ tvayāpyatra stheyaṁ macchāsanācchubhe

संज्ञा ने कहा—'तुम्हारा कल्याण हो, मैं अपने पिता के घर जा रही हूँ; हे शुभे! तुम मेरी आज्ञा से यहाँ मेरा रूप धारण कर, अपरिवर्तित होकर, रहना।'

श्लोक 8 (markandeya.103.8)

इमौ च बालकौ मह्यं कन्या च वरवर्णिनी । सम्भाव्यौ नैव चाख्येयमिदं भगवते त्वया ॥ 103.8 ॥

imau ca bālakau mahyaṁ kanyā ca varavarṇinī sambhāvyau naiva cākhyeyamidaṁ bhagavate tvayā

'इन दोनों बालकों तथा सुन्दर वर्ण वाली इस कन्या का पालन तुम करना; तथा यह बात मेरे स्वामी से कभी नहीं कहनी है।'

श्लोक 9 (markandeya.103.9)

छायोवाच आकेशग्रहणाद्देवि आशपन्नैव कर्हिचित् । आख्यास्यामि मतं तुभ्यं गम्यतां यत्र वाञ्छितम् ॥ 103.9 ॥

chāyovāca ākeśagrahaṇāddevi āśapannaiva karhicit ākhyāsyāmi mataṁ tubhyaṁ gamyatāṁ yatra vāñchitam

छाया ने कहा—'हे देवि! अपने केश की शपथ लेकर कहती हूँ, मैं यह बात उनसे कभी नहीं कहूँगी; तुम जहाँ चाहो, वहाँ जाओ।'

श्लोक 10 (markandeya.103.10)

इत्युक्ता छायया संज्ञा जगाम पितृमन्दिरम् । तत्रावसत्पितुर्गेहे कञ्चित्कालं शुभेक्षणा ॥ 103.10 ॥

ityuktā chāyayā saṁjñā jagāma pitṛmandiram tatrāvasatpiturgehe kañcitkālaṁ śubhekṣaṇā

छाया द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर संज्ञा पिता के घर चली गयी; वहाँ वह शुभनेत्रा कुछ काल तक पिता के घर में रहती रही।

श्लोक 11 (markandeya.103.11)

भर्तुः समीपं याहीति पित्रोक्ता सा पुनः पुनः । अगच्छद्वडवा भूत्वा कुरून्विप्रोत्तरांस्ततः ॥ 103.11 ॥

bhartuḥ samīpaṁ yāhīti pitroktā sā punaḥ punaḥ agacchadvaḍavā bhūtvā kurūnviprottarāṁstataḥ

पिता द्वारा बार-बार कहे जाने पर 'अपने पति के पास जाओ', वह वडवा (घोड़ी) बनकर उत्तर कुरु देश चली गयी।

श्लोक 12 (markandeya.103.12)

तत्र तेपे तपः साध्वी निराहारा महामुने । पितुः समीपं यातायाः संज्ञाया वाक्यतत्परा ॥ 103.12 ॥

tatra tepe tapaḥ sādhvī nirāhārā mahāmune pituḥ samīpaṁ yātāyāḥ saṁjñāyā vākyatatparā

हे महामुने! वहाँ वह साध्वी निराहार रहकर तप करने लगी, संज्ञा के पिता के पास जाने की बात पर दृढ़ रहते हुए।

श्लोक 13 (markandeya.103.13)

तद्रूपधारिणी छाया भास्करं समुपस्थिता । तस्यां च भगवान्सूर्यः संज्ञेयमिति चिन्तयन् ॥ 103.13 ॥

tadrūpadhāriṇī chāyā bhāskaraṁ samupasthitā tasyāṁ ca bhagavānsūryaḥ saṁjñeyamiti cintayan

उसी रूप को धारण किये हुए छाया भास्कर के पास उपस्थित हुई; और भगवान् सूर्य ने उसे संज्ञा ही समझकर,

श्लोक 14 (markandeya.103.14)

तथैव जनयामास द्वौ सुतौ कन्यकां तथा । पूर्वजस्य मनोस्तुल्यः सावर्णिस्तेन सोऽभवत् ॥ 103.14 ॥

tathaiva janayāmāsa dvau sutau kanyakāṁ tathā pūrvajasya manostulyaḥ sāvarṇistena so ’bhavat

उसी प्रकार उससे दो पुत्र और एक कन्या उत्पन्न की; उनमें जो पूर्वजात मनु के समान था, वह उसी कारण सावर्णि कहलाया।

श्लोक 15 (markandeya.103.15)

यस्तयोः प्रथमं जातः पुत्रयोर्द्विजसत्तम । द्वितीयो योऽभवच्चान्यः स ग्रहोऽभूच्छनैश्चरः ॥ 103.15 ॥

yastayoḥ prathamaṁ jātaḥ putrayordvijasattama dvitīyo yo ’bhavaccānyaḥ sa graho ’bhūcchanaiścaraḥ

हे द्विजसत्तम! उन दोनों पुत्रों में जो पहले उत्पन्न हुआ, और जो दूसरा हुआ, वह शनैश्चर नामक ग्रह हुआ।

श्लोक 16 (markandeya.103.16)

कन्याभूत्तपती या तां वव्रे संवरणो नृपः । संज्ञा तु पार्थिवी तेषामात्मजानां यथाऽकरोत् ॥ 103.16 ॥

kanyābhūttapatī yā tāṁ vavre saṁvaraṇo nṛpaḥ saṁjñā tu pārthivī teṣāmātmajānāṁ yathā ’karot

जो कन्या हुई वह तपती हुई, जिसे राजा संवरण ने वरण किया; परन्तु उस संज्ञा (छाया) ने अपनी सन्तानों के प्रति पूर्वजात सन्तानों से अधिक स्नेह दिखाया।

श्लोक 17 (markandeya.103.17)

स्नेहान्न पूर्वजातानां तथा कृतवती सती । मनुस्तत्क्षान्तवांस्तस्या यमश्चास्या न चक्षमे ॥ 103.17 ॥

snehānna pūrvajātānāṁ tathā kṛtavatī satī manustatkṣāntavāṁstasyā yamaścāsyā na cakṣame

स्नेहवश उसने पूर्वजात सन्तानों के प्रति कम आदर किया; मनु ने इसे सह लिया, किन्तु यम उसे क्षमा न कर सके।

श्लोक 18 (markandeya.103.18)

बहुशो याच्यमानस्तु पितुः पत्न्या सुदुःखितः । स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वै बलात् ॥ 103.18 ॥

bahuśo yācyamānastu pituḥ patnyā suduḥkhitaḥ sa vai kopācca bālyācca bhāvino ’rthasya vai balāt

पिता की पत्नी से बार-बार डाँटे जाने पर अत्यन्त दुःखी होकर, क्रोधवश, बाल्यावस्था के कारण तथा होनहार के बल से,

श्लोक 19 (markandeya.103.19)

पदा सन्तर्जयामास छायासंज्ञां यमो मुने । ततः शशाप च यमं संज्ञा सामर्षिणी भृशम् ॥ 103.19 ॥

padā santarjayāmāsa chāyāsaṁjñāṁ yamo mune tataḥ śaśāpa ca yamaṁ saṁjñā sāmarṣiṇī bhṛśam

हे मुने! यम ने छाया-संज्ञा को पैर से डराया; तब अत्यन्त क्रुद्ध हुई संज्ञा ने यम को शाप दे दिया।

श्लोक 20 (markandeya.103.20)

छायोवाच पदा तर्जयसे यस्मात्पितृभार्यां गरीयसीम् । तस्मात्तवैव चरणः पतिष्यति न संशय ॥ 103.20 ॥

chāyovāca padā tarjayase yasmātpitṛbhāryāṁ garīyasīm tasmāttavaiva caraṇaḥ patiṣyati na saṁśaya

छाया ने कहा—'चूँकि तुम पिता की गरिष्ठ पत्नी को पैर से डराते हो, इसलिए तुम्हारा वही पैर गिर जाएगा, इसमें संशय नहीं।'

श्लोक 21 (markandeya.103.21)

यमस्तु तेन शापेन भृशं पीडितमानसः । मनुना सह धर्मात्मा सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥ 103.21 ॥

yamastu tena śāpena bhṛśaṁ pīḍitamānasaḥ manunā saha dharmātmā sarvaṁ pitre nyavedayat

उस शाप से अत्यन्त पीड़ितमन धर्मात्मा यम ने मनु के साथ सारी बात अपने पिता को बतायी।

श्लोक 22 (markandeya.103.22)

यम उवाच स्नेहेन तुल्यमस्मासु माता देव न वर्तते । विसृज्य ज्यायसोऽप्यस्मान्कनीयांसौ बुभूर्षति ॥ 103.22 ॥

yama uvāca snehena tulyamasmāsu mātā deva na vartate visṛjya jyāyaso ’pyasmānkanīyāṁsau bubhūrṣati

यम ने कहा—'हे देव! माता हम पर समान स्नेह नहीं रखतीं; हम बड़ों को छोड़कर वे छोटी सन्तानों को ही अधिक चाहती हैं।'

श्लोक 23 (markandeya.103.23)

तस्यां मयोद्यतः पादो न तु देहे निपातितः । बाल्याद्वा यदि वा मोहात्तद्भवान्क्षन्तुमर्हति ॥ 103.23 ॥

tasyāṁ mayodyataḥ pādo na tu dehe nipātitaḥ bālyādvā yadi vā mohāttadbhavānkṣantumarhati

'मेरा पैर उनकी ओर उठा तो अवश्य, पर शरीर पर पड़ा नहीं; बाल्यावस्था या मोहवश हुआ यह अपराध — आप क्षमा करने योग्य हैं।'

श्लोक 24 (markandeya.103.24)

शप्तोऽहं तात कोपेन जनन्या तनयो यतः । ततो न मन्ये जननीमिमां वै तपतां वर ॥ 103.24 ॥

śapto ’haṁ tāta kopena jananyā tanayo yataḥ tato na manye jananīmimāṁ vai tapatāṁ vara

'हे तात! मैं अपनी माता के पुत्र होने के कारण ही उनके क्रोध से शापित हुआ हूँ; अतः हे तपस्वियों में श्रेष्ठ, अब मैं उन्हें अपनी माता नहीं मानता।'

श्लोक 25 (markandeya.103.25)

विगुणेष्वपि पुत्रेषु न माता विगुणा पितः । पादस्ते पततां पुत्र कथमेतत्प्रवक्ष्यति ॥ 103.25 ॥

viguṇeṣvapi putreṣu na mātā viguṇā pitaḥ pādaste patatāṁ putra kathametatpravakṣyati

'दोषयुक्त पुत्रों के प्रति भी माता, पिता की दृष्टि में दोषी नहीं होती; हे पुत्र! तुम्हारा पैर गिर जाए, यह बात कैसे कही जा सकती है?'

श्लोक 26 (markandeya.103.26)

तव प्रसादाच्चरणो न पतेद्भगवन्यथा । मातृशापादयं मेऽद्य तथा चिन्तय गोपते ॥ 103.26 ॥

tava prasādāccaraṇo na patedbhagavanyathā mātṛśāpādayaṁ me ’dya tathā cintaya gopate

'हे भगवन्! आपकी कृपा से माता के शाप से मेरा पैर न गिरे — हे गोपते! आज इस पर विचार कीजिए।'

श्लोक 27 (markandeya.103.27)

रविरुवाच असंशयमिदं पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम् । येन त्वामाविशत्क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ॥ 103.27 ॥

raviruvāca asaṁśayamidaṁ putra bhaviṣyatyatra kāraṇam yena tvāmāviśatkrodho dharmajñaṁ satyavādinam

रवि ने कहा—'हे पुत्र! इसमें अवश्य ही कोई कारण होगा, जिससे धर्मज्ञ और सत्यवादी तुम्हें भी क्रोध ने घेर लिया।'

श्लोक 28 (markandeya.103.28)

सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते । न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिच्छापनिवर्तनम् ॥ 103.28 ॥

sarveṣāmeva śāpānāṁ pratighāto hi vidyate na tu mātrābhiśaptānāṁ kvacicchāpanivartanam

'सभी प्रकार के शापों का प्रतिकार होता है, किन्तु माता द्वारा दिये गये शाप का कहीं कोई निवारण नहीं होता।'

श्लोक 29 (markandeya.103.29)

न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव । किञ्चित्तव विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम् ॥ 103.29 ॥

na śakyametanmithyā tu kartuṁ māturvacastava kiñcittava vidhāsyāmi putrasnehādanugraham

'तुम्हारी माता के वचन को मिथ्या करना सम्भव नहीं है; फिर भी पुत्र-स्नेहवश मैं कुछ अनुग्रह अवश्य करूँगा।'

श्लोक 30 (markandeya.103.30)

कृमयो मांसमादाय प्रयास्यन्ति महीतलम् । कृतं तस्या वचः सत्यं त्वं च त्रातो भविष्यसि ॥ 103.30 ॥

kṛmayo māṁsamādāya prayāsyanti mahītalam kṛtaṁ tasyā vacaḥ satyaṁ tvaṁ ca trāto bhaviṣyasi

'कीड़े मांस लेकर पृथ्वी पर गिरेंगे — इस प्रकार उनका वचन भी सत्य होगा और तुम्हारी रक्षा भी हो जाएगी।'

श्लोक 31 (markandeya.103.31)

मार्कण्डेय उवाच आदित्यस्त्वब्रवीच्छायां किमर्थं तनयेषु वै । तुल्येष्वप्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया ॥ 103.31 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ādityastvabravīcchāyāṁ kimarthaṁ tanayeṣu vai tulyeṣvapyadhikaḥ sneha ekatra kriyate tvayā

मार्कण्डेय ने कहा—किन्तु आदित्य ने छाया से कहा—'तुम अपने समान सन्तानों में से एक की ओर अधिक स्नेह क्यों दिखलाती हो?'

श्लोक 32 (markandeya.103.32)

नूनं नैषां त्वं जननी संज्ञा कापि त्वमागता । विगुणेष्वप्यपत्येषु कथं माता शपेत्सुतम् ॥ 103.32 ॥

nūnaṁ naiṣāṁ tvaṁ jananī saṁjñā kāpi tvamāgatā viguṇeṣvapyapatyeṣu kathaṁ mātā śapetsutam

'निश्चय ही तुम इनकी माता नहीं हो, तुम कोई और संज्ञा हो जो यहाँ आयी हो; भला दोषयुक्त पुत्र को भी माता कैसे शाप दे सकती है?'

श्लोक 33 (markandeya.103.33)

मार्कण्डेय उवाच सा तत्परिहरन्ती च नाचचक्षे विवस्वतः । स चात्मानं समाधाय युक्तस्तत्त्वमपश्यत ॥ 103.33 ॥

mārkaṇḍeya uvāca sā tatpariharantī ca nācacakṣe vivasvataḥ sa cātmānaṁ samādhāya yuktastattvamapaśyata

मार्कण्डेय ने कहा—वह इस बात को टालती रही और विवस्वान् से कुछ न बतायी; और उन्होंने आत्मसमाहित होकर ध्यान से यथार्थ तत्त्व को जान लिया।

श्लोक 34 (markandeya.103.34)

तं शप्तुमुद्यतं दृष्ट्वा छायासंज्ञा दिवस्पतिम् । भयेन कंपिता ब्रह्मन्यथावृत्तं न्यवेदयत् ॥ 103.34 ॥

taṁ śaptumudyataṁ dṛṣṭvā chāyāsaṁjñā divaspatim bhayena kaṁpitā brahmanyathāvṛttaṁ nyavedayat

हे ब्रह्मन्! उन्हें शाप देने को उद्यत देखकर, भय से काँपती हुई छाया-संज्ञा ने यथार्थ वृत्तान्त उनसे कह दिया।

श्लोक 35 (markandeya.103.35)

विवस्वांस्तु ततः क्रुद्धः श्रुत्वा श्वशुरमभ्यगात् । स चापि तं तथान्यामर्चयित्वा दिवाकरम् । निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास सुव्रतः ॥ 103.35 ॥

vivasvāṁstu tataḥ kruddhaḥ śrutvā śvaśuramabhyagāt sa cāpi taṁ tathānyāmarcayitvā divākaram nirdagdhukāmaṁ roṣeṇa sāntvayāmāsa suvrataḥ

यह सुनकर क्रुद्ध हुए विवस्वान् अपने श्वसुर के पास गये; और उन सुव्रत विश्वकर्मा ने भी दिवाकर को अन्य प्रकार से पूजित करके, क्रोध से जलाने को उद्यत उन्हें शान्त किया।

श्लोक 36 (markandeya.103.36)

विश्वकर्मोवाच तवातितेजसा व्याप्तमिदं रूपं सुदुःसहम् । असहन्ती ततः संज्ञा वने चरति वै तपः ॥ 103.36 ॥

viśvakarmovāca tavātitejasā vyāptamidaṁ rūpaṁ suduḥsaham asahantī tataḥ saṁjñā vane carati vai tapaḥ

विश्वकर्मा ने कहा—'आपका यह अत्यधिक तेज से व्याप्त, अत्यन्त दुःसह रूप है — इसे सहन न कर पाने के कारण ही संज्ञा वन में तप करती फिर रही है।'

श्लोक 37 (markandeya.103.37)

द्रक्ष्यते तां भवानद्य स्वभार्यां शुभचारिणीम् । रूपार्थं भवतोऽरण्ये चरन्तीं समुहत्तपः ॥ 103.37 ॥

drakṣyate tāṁ bhavānadya svabhāryāṁ śubhacāriṇīm rūpārthaṁ bhavato ’raṇye carantīṁ samuhattapaḥ

'आज आप अपनी सुशीला, शुभचारिणी पत्नी को देखेंगे, जो आपके रूप के कारण वन में महान् तप करती हुई विचरण कर रही है।'

श्लोक 38 (markandeya.103.38)

स्मृतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव रोचते । रूपं निवर्तयाम्येतत्तव कान्तं दिवस्पते ॥ 103.38 ॥

smṛtaṁ me brahmaṇo vākyaṁ yadi te deva rocate rūpaṁ nivartayāmyetattava kāntaṁ divaspate

'मुझे ब्रह्मा का वचन स्मरण है; हे देव! यदि आपको अच्छा लगे तो, हे दिवस्पते! मैं आपके इस मनोहर रूप को न्यून कर दूँ।'

श्लोक 39 (markandeya.103.39)

मार्कण्डेय उवाच यतो हि भास्वतो रूपं प्रागासीत्परिमण्डलम् । ततस्तथेति तं प्राह त्वष्टारं भगवान्रविः ॥ 103.39 ॥

mārkaṇḍeya uvāca yato hi bhāsvato rūpaṁ prāgāsītparimaṇḍalam tatastatheti taṁ prāha tvaṣṭāraṁ bhagavānraviḥ

मार्कण्डेय ने कहा—चूँकि भास्वान् का रूप पहले पूर्ण गोलाकार था, अतः भगवान् रवि ने त्वष्टा से कहा—'ऐसा ही हो।'

श्लोक 40 (markandeya.103.40)

विश्वकर्मा त्वनुज्ञातः शाकद्वीपे विवस्वतः । भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शातनायोपचक्रमे ॥ 103.40 ॥

viśvakarmā tvanujñātaḥ śākadvīpe vivasvataḥ bhramimāropya tattejaḥ śātanāyopacakrame

विवस्वान् से अनुमति पाकर विश्वकर्मा ने शाकद्वीप में उस तेज को खराद पर चढ़ाकर छीलना आरम्भ किया।

श्लोक 41 (markandeya.103.41)

भ्रमताऽशेषजगतां नाभिभूतेन भास्वता । समुद्राद्रिवनोपेता सा रुरोह मही नभः ॥ 103.41 ॥

bhramatā ’śeṣajagatāṁ nābhibhūtena bhāsvatā samudrādrivanopetā sā ruroha mahī nabhaḥ

उस अशेष तेज के, अविचलित भास्वान् के, घूमने से समुद्र, पर्वत और वनों सहित पृथ्वी तथा आकाश काँप उठे।

श्लोक 42 (markandeya.103.42)

गगनं चाखिलं ब्रह्मन्सचन्द्रग्रहतारकम् । अधोगतं महाभाग बभूवाक्षिक्षमाकुलम् ॥ 103.42 ॥

gaganaṁ cākhilaṁ brahmansacandragrahatārakam adhogataṁ mahābhāga babhūvākṣikṣamākulam

हे ब्रह्मन्! और सम्पूर्ण आकाश चन्द्र, ग्रह तथा तारों सहित नीचे की ओर झुक गया, हे महाभाग! तथा असह्य व्याकुलता से भर गया।

श्लोक 43 (markandeya.103.43)

विक्षिप्तसलिलाः सर्वे बभूवुश्च तथाब्धितः । व्यभिद्यन्त महाशैलाः शीर्णसानुनिबन्धनाः ॥ 103.43 ॥

vikṣiptasalilāḥ sarve babhūvuśca tathābdhitaḥ vyabhidyanta mahāśailāḥ śīrṇasānunibandhanāḥ

समस्त जल क्षुब्ध होकर समुद्रों से भी बाहर बहने लगे; बड़े-बड़े पर्वत फट गये, उनकी चोटियाँ चूर-चूर होकर गिर गयीं।

श्लोक 44 (markandeya.103.44)

ध्रुवाधाराण्यशेषाणि धिष्ण्यानि मुनिसत्तम । त्रुट्यद्रश्मिनिबन्धानि ह्यधो जग्मुः सहस्रशः ॥ 103.44 ॥

dhruvādhārāṇyaśeṣāṇi dhiṣṇyāni munisattama truṭyadraśminibandhāni hyadho jagmuḥ sahasraśaḥ

हे मुनिसत्तम! ध्रुव के आधार पर स्थित समस्त नक्षत्रमण्डल, अपने किरण-बन्धन टूट जाने से, सहस्रों की संख्या में नीचे गिर पड़े।

श्लोक 45 (markandeya.103.45)

वेगभ्रमणसंजात वायुक्षिप्ताः समन्ततः । व्यशीर्यन्त महामेघा घोररावविराविणः ॥ 103.45 ॥

vegabhramaṇasaṁjāta vāyukṣiptāḥ samantataḥ vyaśīryanta mahāmeghā ghorarāvavirāviṇaḥ

उस वेगपूर्ण भ्रमण से उत्पन्न वायु द्वारा चारों ओर से उड़ाये गये बड़े-बड़े मेघ भयंकर गर्जना करते हुए छिन्न-भिन्न हो गये।

श्लोक 46 (markandeya.103.46)

भास्वद्भ्रमणविभ्रान्तं भूम्याकाशरसातलम् । जगादाकुलमत्यर्थं तदासीन्मुनिसत्तम ॥ 103.46 ॥

bhāsvadbhramaṇavibhrāntaṁ bhūmyākāśarasātalam jagādākulamatyarthaṁ tadāsīnmunisattama

हे मुनिसत्तम! भास्वान् के घूर्णन से विभ्रान्त हुए भूमि, आकाश और रसातल उस समय अत्यन्त व्याकुल तथा कोलाहलपूर्ण हो गये।

श्लोक 47 (markandeya.103.47)

त्रैलोक्ये सकले विप्र भ्रममाणे सुरर्षयः । देवाश्च ब्रह्मणा सार्द्धं भास्वन्तमभितुष्टुवुः ॥ 103.47 ॥

trailokye sakale vipra bhramamāṇe surarṣayaḥ devāśca brahmaṇā sārddhaṁ bhāsvantamabhituṣṭuvuḥ

हे विप्र! सम्पूर्ण त्रैलोक्य के इस प्रकार भ्रमित होने पर, देवर्षियों तथा ब्रह्मा सहित देवताओं ने भास्वान् की स्तुति की।

श्लोक 48 (markandeya.103.48)

आदिदेवोऽसि देवानां ज्ञातमेतत्स्वरूपतः । स्वर्गस्थित्यन्तकालेषु त्रिधा भेदेन तिष्ठसि ॥ 103.48 ॥

ādidevo ’si devānāṁ jñātametatsvarūpataḥ svargasthityantakāleṣu tridhā bhedena tiṣṭhasi

'आप देवताओं के आदिदेव हैं — यह आपके स्वरूप से ही ज्ञात है; स्वर्ग की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के काल में आप त्रिविध भेद से स्थित रहते हैं।'

श्लोक 49 (markandeya.103.49)

स्वस्ति तेऽस्तु जगन्नाथ धर्मवर्षाहिमाकर । जुषस्व शान्तिं लोकानां देवदेव दिवाकर ॥ 103.49 ॥

svasti te ’stu jagannātha dharmavarṣāhimākara juṣasva śāntiṁ lokānāṁ devadeva divākara

'हे जगन्नाथ, धर्मानुसार वर्षा और हिम करने वाले! आपका कल्याण हो; हे देवदेव दिवाकर! लोकों को शान्ति प्रदान कीजिए।'

श्लोक 50 (markandeya.103.50)

इन्द्रश्चागत्य तं देवं लिख्यमानं यथाऽस्तुवत् । जयदेव जगद्वयापिञ्जयाशेषजगत्पते ॥ 103.50 ॥

indraścāgatya taṁ devaṁ likhyamānaṁ yathā ’stuvat jayadeva jagadvayāpiñjayāśeṣajagatpate

और इन्द्र ने भी छीले जाते हुए उन देव के पास आकर इस प्रकार स्तुति की—'हे जगद्व्यापी देव! आपकी जय हो; हे अशेष जगत्पते! आपकी जय हो।'

श्लोक 51 (markandeya.103.51)

ऋषयश्च ततः सप्त वसिष्ठात्रिपुरोगमाः । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः स्वस्ति स्वस्तीति वादिनः ॥ 103.51 ॥

ṛṣayaśca tataḥ sapta vasiṣṭhātripurogamāḥ tuṣṭuvurvividhaiḥ stotraiḥ svasti svastīti vādinaḥ

तब वसिष्ठ और अत्रि आदि सप्तर्षियों ने नाना स्तोत्रों से 'स्वस्ति, स्वस्ति' कहते हुए उनकी स्तुति की।

श्लोक 52 (markandeya.103.52)

वेदोक्ताभिरथाग्र्याभिर्वालखिल्याश्च तुष्टुवुः । भास्वन्तमृग्भिराद्याभिर्लिख्यमानं मुदायुताः ॥ 103.52 ॥

vedoktābhirathāgryābhirvālakhilyāśca tuṣṭuvuḥ bhāsvantamṛgbhirādyābhirlikhyamānaṁ mudāyutāḥ

और वालखिल्य मुनियों ने आनन्दित होकर वेदोक्त श्रेष्ठ ऋचाओं से, छीले जाते हुए भास्वान् की स्तुति की।

श्लोक 53 (markandeya.103.53)

त्वं नाथ मोक्षिणां मोक्षो ध्येयस्त्वं ध्यानिनां परः । त्वं गतिः सर्वभूतानां कर्मकाण्डेऽपि वर्तताम् ॥ 103.53 ॥

tvaṁ nātha mokṣiṇāṁ mokṣo dhyeyastvaṁ dhyānināṁ paraḥ tvaṁ gatiḥ sarvabhūtānāṁ karmakāṇḍe ’pi vartatām

'हे नाथ! आप मुमुक्षुओं के लिए मोक्षस्वरूप हैं, ध्यानियों के लिए परम ध्येय हैं; कर्मकाण्ड में रहते हुए भी आप ही समस्त प्राणियों की गति हैं।'

श्लोक 54 (markandeya.103.54)

शं प्रजाभ्योऽस्तु देवेश शन्नोऽस्तु जगतांपते । शन्नोऽस्तु द्विपदे नित्यं शन्नश्चास्तु चतुष्पदे ॥ 103.54 ॥

śaṁ prajābhyo ’stu deveśa śanno ’stu jagatāṁpate śanno ’stu dvipade nityaṁ śannaścāstu catuṣpade

'हे देवेश! प्रजा का कल्याण हो; हे जगत्पते! हमारा कल्याण हो; द्विपदों का सदा कल्याण हो और चतुष्पदों का भी कल्याण हो।'

श्लोक 55 (markandeya.103.55)

ततो विद्याधरगणा यक्षराक्षसपन्नगाः । कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिः प्रणता रविम् ॥ 103.55 ॥

tato vidyādharagaṇā yakṣarākṣasapannagāḥ kṛtāñjalipuṭāḥ sarve śirobhiḥ praṇatā ravim

तब विद्याधर, यक्ष, राक्षस तथा नागों के समूह, सभी अंजलिबद्ध होकर, सिर झुकाकर रवि को प्रणाम करने लगे,

श्लोक 56 (markandeya.103.56)

ऊचुरेवंविधा वाचो मनः श्रोत्रसुखावहः । सह्यं भवतु ते तेजो भूतानां भूतभावन ॥ 103.56 ॥

ūcurevaṁvidhā vāco manaḥ śrotrasukhāvahaḥ sahyaṁ bhavatu te tejo bhūtānāṁ bhūtabhāvana

और मन तथा कान को सुख देने वाली ऐसी वाणी बोलने लगे—'हे भूतभावन! आपका तेज सह्य हो!'

श्लोक 57 (markandeya.103.57)

ततो हाहा हुहूश्चैव नारदस्तुम्बुरुस्तथा । उपगायितुमारब्धा गान्धर्वं कुशला रविम् ॥ 103.57 ॥

tato hāhā huhūścaiva nāradastumburustathā upagāyitumārabdhā gāndharvaṁ kuśalā ravim

तब हाहा, हूहू तथा नारद और तुम्बुरु — ये कुशल गायक रवि के लिए गान्धर्व-गान गाने लगे,

श्लोक 58 (markandeya.103.58)

षड्जमध्यमगान्धारग्रामत्रयविशारदाः । मूर्च्छनाभिश्च तानैश्च सम्प्रयोगैः सुखप्रदम् ॥ 103.58 ॥

ṣaḍjamadhyamagāndhāragrāmatrayaviśāradāḥ mūrcchanābhiśca tānaiśca samprayogaiḥ sukhapradam

षड्ज, मध्यम और गान्धार — तीनों ग्रामों में निपुण, मूर्च्छनाओं और तानों के सुखद संयोग से गान करते हुए।

श्लोक 59 (markandeya.103.59)

विश्वाची च घृताची च उर्वश्यथ तिलोत्तमा । मेनका सहजन्या च रम्भा चाप्सरसां वरा ॥ 103.59 ॥

viśvācī ca ghṛtācī ca urvaśyatha tilottamā menakā sahajanyā ca rambhā cāpsarasāṁ varā

विश्वाची, घृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सहजन्या तथा अप्सराओं में श्रेष्ठ रम्भा —

श्लोक 60 (markandeya.103.60)

ननृतुर्जगतामीशे लिख्यमाने विभावसौ । ज्ञानभावविलासाढ्यात्कुर्वन्तोऽभिनयान्बहून् ॥ 103.60 ॥

nanṛturjagatāmīśe likhyamāne vibhāvasau jñānabhāvavilāsāḍhyātkurvanto ’bhinayānbahūn

ये सभी, छीले जाते हुए विभावसु, जगदीश्वर के समक्ष, ज्ञान, भाव और विलास से भरे अनेक अभिनय करती हुई नृत्य करने लगीं।

श्लोक 61 (markandeya.103.61)

प्रावाद्यन्त ततस्तत्र वेणुवीणादिझर्झराः । पणवाः पुष्कराश्चैव मृदङ्गा पटहानकाः ॥ 103.61 ॥

prāvādyanta tatastatra veṇuvīṇādijharjharāḥ paṇavāḥ puṣkarāścaiva mṛdaṅgā paṭahānakāḥ

तब वहाँ बाँसुरी, वीणा तथा झर्झर वाद्य, पणव और पुष्कर, मृदंग तथा पटह बजने लगे,

श्लोक 62 (markandeya.103.62)

देवदुन्दुभयः शङ्खाः शतशोऽथ सहस्रशः । गायद्भिश्चैव गान्धर्वं नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥ 103.62 ॥

devadundubhayaḥ śaṅkhāḥ śataśo ’tha sahasraśaḥ gāyadbhiścaiva gāndharvaṁ nṛtyadbhiścāpsarogaṇaiḥ

देवदुन्दुभियाँ तथा शंख सैकड़ों-हजारों की संख्या में बज उठे, साथ ही गान्धर्वों के गान और अप्सराओं के नृत्य भी होते रहे।

श्लोक 63 (markandeya.103.63)

तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम् । ततः कृताञ्जलिपुटा भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ 103.63 ॥

tūryavāditraghoṣaiśca sarvaṁ kolāhalīkṛtam tataḥ kṛtāñjalipuṭā bhaktinamrātmamūrtayaḥ

तूर्य और वाद्यों की ध्वनि से सब कुछ कोलाहलमय हो गया; तब अंजलिबद्ध, भक्तिनम्र होकर,

श्लोक 64 (markandeya.103.64)

लिख्यमानं सहस्रांशुं प्रणेमुः सर्वदेवताः । ततः कोलाहले तस्मिन्सर्वदेवसमागमे । तेजसः शातनं चक्रे विश्वकर्मा शनैः शनैः ॥ 103.64 ॥

likhyamānaṁ sahasrāṁśuṁ praṇemuḥ sarvadevatāḥ tataḥ kolāhale tasminsarvadevasamāgame tejasaḥ śātanaṁ cakre viśvakarmā śanaiḥ śanaiḥ

समस्त देवताओं ने छीले जाते हुए सहस्रांशु को प्रणाम किया; तब उस समस्त देव-समागम के कोलाहल में विश्वकर्मा ने धीरे-धीरे उनके तेज का शातन (छीलना) पूर्ण किया।

श्लोक 65 (markandeya.103.65)

इति हिमजलघर्मकालहेतोर्हरकमलासनविष्णुसंस्तुतस्य । तनुपरिलिखनं निशम्य भानोर्व्रजति दिवाकरलोकमायुषोऽन्ते ॥ 103.65 ॥

iti himajalagharmakālahetorharakamalāsanaviṣṇusaṁstutasya tanuparilikhanaṁ niśamya bhānorvrajati divākaralokamāyuṣo ’nte

इस प्रकार हिम, जल तथा घाम के हेतुभूत, हर, कमलासन (ब्रह्मा) और विष्णु द्वारा स्तुत भानु के शरीर के इस छीले जाने की कथा सुनकर, मनुष्य जीवन के अन्त में दिवाकर के लोक को प्राप्त होता है।

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