सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 106
भानु-स्तव-वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.106.1)
भगवन्कथितः सम्यग्भानोः सन्ततिसम्भवः । माहात्म्यमादिदेवस्य स्वरूपं चातिविस्तरात् ॥ 106.1 ॥
bhagavankathitaḥ samyagbhānoḥ santatisambhavaḥ māhātmyamādidevasya svarūpaṁ cātivistarāt
हे भगवन्, आपने सूर्य की संतति की उत्पत्ति तथा आदिदेव के स्वरूप की महिमा विस्तार से भली-भाँति बताई है।
श्लोक 2 (markandeya.106.2)
भूयोऽपि भास्वतः सम्यङ्माहात्म्यं मुनिसत्तम । श्रोतुमिच्छाम्यहं तन्मे प्रसन्नो वक्तुमर्हसि ॥ 106.2 ॥
bhūyo’pi bhāsvataḥ samyaṅmāhātmyaṁ munisattama śrotumicchāmyahaṁ tanme prasanno vaktumarhasi
हे मुनिश्रेष्ठ, मैं पुनः भास्कर की महिमा सुनना चाहता हूँ; कृपा करके प्रसन्न होकर मुझसे कहिए।
श्लोक 3 (markandeya.106.3)
श्रूयतामादिदेवस्य माहात्म्यं कथयामि ते । विवस्वतो यच्चकार पूर्वमाराधितो जनैः ॥ 106.3 ॥
śrūyatāmādidevasya māhātmyaṁ kathayāmi te vivasvato yaccakāra pūrvamārādhito janaiḥ
सुनो, मैं तुम्हें आदिदेव की वह महिमा बताता हूँ जो उन्होंने पूर्वकाल में भक्तों द्वारा आराधित होकर की थी।
श्लोक 4 (markandeya.106.4)
दमस्य पुत्रो विख्यातो राजाभूद्राज्यवर्धनः । स सम्यक्पालनं चक्रे पृथिव्या पृथिवीपतिः ॥ 106.4 ॥
damasya putro vikhyāto rājābhūdrājyavardhanaḥ sa samyakpālanaṁ cakre pṛthivyā pṛthivīpatiḥ
दम का पुत्र राज्यवर्धन नामक विख्यात राजा था; वह पृथ्वीपति भली-भाँति पृथ्वी का पालन करता था।
श्लोक 5 (markandeya.106.5)
धर्मतः पाल्यमानं तु तेन राष्ट्रं महात्मना । ववृधेऽनुदिनं विप्र जनेन च धनेन च ॥ 106.5 ॥
dharmataḥ pālyamānaṁ tu tena rāṣṭraṁ mahātmanā vavṛdhe’nudinaṁ vipra janena ca dhanena ca
उस महात्मा द्वारा धर्मपूर्वक पालित राज्य प्रजा और धन दोनों से प्रतिदिन बढ़ता गया, हे विप्र।
श्लोक 6 (markandeya.106.6)
हृष्टपुष्टमतीवासीत्तस्मिन्राजन्यशेषतः । निर्भयः सकलश्चोर्व्यां पौरजानपदो जनः ॥ 106.6 ॥
hṛṣṭapuṣṭamatīvāsīttasminrājanyaśeṣataḥ nirbhayaḥ sakalaścorvyāṁ paurajānapado janaḥ
उस दमपुत्र राजा के राज्य में समस्त नगर और जनपद की प्रजा अत्यंत हृष्ट-पुष्ट तथा निर्भय थी।
श्लोक 7 (markandeya.106.7)
नोपसर्गो न च व्याधिर्न च व्यालोद्भवं भयम् । न चावृष्टिभयं तत्र दमपुत्रे महीपतौ ॥ 106.7 ॥
nopasargo na ca vyādhirna ca vyālodbhavaṁ bhayam na cāvṛṣṭibhayaṁ tatra damaputre mahīpatau
उस दमपुत्र राजा के राज्य में न कोई उपद्रव था, न व्याधि, न सर्प-व्याघ्रादि का भय, न अनावृष्टि का भय।
श्लोक 8 (markandeya.106.8)
स ईजे च महायज्ञैर्ददौ दानानि चार्थिनाम् । सुधर्मस्याविरोधेन बुभुजे विषयानपि ॥ 106.8 ॥
sa īje ca mahāyajñairdadau dānāni cārthinām sudharmasyāvirodhena bubhuje viṣayānapi
उसने महायज्ञों से यजन किया, याचकों को दान दिया, तथा धर्म का उल्लंघन किए बिना विषय-भोगों का उपभोग किया।
श्लोक 9 (markandeya.106.9)
तस्यैवं कुर्वतो राज्यं सम्यक्पालयतः प्रजाः । सप्त वर्षसहस्राणि जग्मुरेकमहर्यथा ॥ 106.9 ॥
tasyaivaṁ kurvato rājyaṁ samyakpālayataḥ prajāḥ sapta varṣasahasrāṇi jagmurekamaharyathā
इस प्रकार राज्य करते और प्रजा का भली-भाँति पालन करते हुए उसके सात हजार वर्ष एक दिन के समान बीत गए।
श्लोक 10 (markandeya.106.10)
विदूरथस्य तनया दाक्षिणात्यस्य भूभृतः । तस्य पत्नी बभूवाथ मानिनी नाम मानिनी ॥ 106.10 ॥
vidūrathasya tanayā dākṣiṇātyasya bhūbhṛtaḥ tasya patnī babhūvātha māninī nāma māninī
दक्षिण देश के राजा विदूरथ की पुत्री मानिनी नामक अभिमानिनी उसकी पत्नी थी।
श्लोक 11 (markandeya.106.11)
कदाचित्तस्य सा सुभ्रुः शिरसोऽभ्यञ्जनादृता । पश्यतो राजलोकस्य मुमोचाश्रूणि मानिनी ॥ 106.11 ॥
kadācittasya sā subhruḥ śiraso’bhyañjanādṛtā paśyato rājalokasya mumocāśrūṇi māninī
एक बार उस भ्रूवाली रानी ने केश संवारते समय, समस्त राजसभा के देखते हुए, आँसू बहाए।
श्लोक 12 (markandeya.106.12)
तदश्रुबिन्दवो गात्रे यदा तस्य महीपतेः । तदा वीक्ष्याश्रुवदनां तामपृच्छत मानिनीम् ॥ 106.12 ॥
tadaśrubindavo gātre yadā tasya mahīpateḥ tadā vīkṣyāśruvadanāṁ tāmapṛcchata māninīm
जब उसके अश्रुबिंदु राजा के शरीर पर गिरे, तब उसका अश्रुपूर्ण मुख देखकर राजा ने मानिनी से पूछा।
श्लोक 13 (markandeya.106.13)
निःशब्दमश्रुमोक्षेण रुदन्तीं तां विलोक्य वै । किमेतदिति पप्रच्छ मानिनीं राज्यवर्धनः ॥ 106.13 ॥
niḥśabdamaśrumokṣeṇa rudantīṁ tāṁ vilokya vai kimetaditi papraccha māninīṁ rājyavardhanaḥ
मौन रहकर आँसू बहाती उस रानी को देखकर राज्यवर्धन ने पूछा — 'यह क्या है?'
श्लोक 14 (markandeya.106.14)
पृष्टा सा तु ततस्तेन भर्त्रा प्राह मनस्विनी । न किञ्चिदिति तां भूयः पप्रच्छ स महीपतिः ॥ 106.14 ॥
pṛṣṭā sā tu tatastena bhartrā prāha manasvinī na kiñciditi tāṁ bhūyaḥ papraccha sa mahīpatiḥ
पति द्वारा पूछे जाने पर उस स्वाभिमानी रानी ने कहा — 'कुछ नहीं'; राजा ने पुनः पूछा।
श्लोक 15 (markandeya.106.15)
बहुशः पृच्छतस्तस्य भूभृतः सा सुमध्यमा । (न किञ्चिदिति होवाच सा भूयो राज्यवर्धनम् । किमेतदिति पप्रच्छ मानिनीं पार्थिवः पुनः । बहुशः प्रेरिता तेन सा भर्त्रा तत्र भामिनी ।) दर्शयामास पलितं केशभारान्तरोद्भवम् ॥ 106.15 ॥
bahuśaḥ pṛcchatastasya bhūbhṛtaḥ sā sumadhyamā (na kiñciditi hovāca sā bhūyo rājyavardhanam kimetaditi papraccha māninīṁ pārthivaḥ punaḥ bahuśaḥ preritā tena sā bhartrā tatra bhāminī) darśayāmāsa palitaṁ keśabhārāntarodbhavam
बार-बार पूछे जाने पर भी वह सुमध्यमा (कुछ नहीं कहती रही; राजा ने फिर पूछा — 'यह क्या है?'; बार-बार आग्रह करने पर उस भामिनी ने अंततः) अपने केशों के बीच उगा एक सफेद बाल दिखाया।
श्लोक 16 (markandeya.106.16)
एतत्पश्येति भूपाल किमन्यन्मन्युकारणम् । ममातिमन्दभाग्याया जहासाथ नृपस्ततः ॥ 106.16 ॥
etatpaśyeti bhūpāla kimanyanmanyukāraṇam mamātimandabhāgyāyā jahāsātha nṛpastataḥ
'यह देखिए, राजन्! इसके अतिरिक्त मेरे दुर्भाग्य का और क्या कारण हो सकता है?' — यह सुनकर राजा हँस पड़े।
श्लोक 17 (markandeya.106.17)
स विहस्याह तां पत्नीं शृण्वतां सर्वभूभृताम् । पौराणां च महीपाला ये तत्रासन्समावृताः ॥ 106.17 ॥
sa vihasyāha tāṁ patnīṁ śṛṇvatāṁ sarvabhūbhṛtām paurāṇāṁ ca mahīpālā ye tatrāsansamāvṛtāḥ
हँसते हुए, वहाँ उपस्थित समस्त राजाओं और प्रजाजनों के सुनते हुए, उन्होंने अपनी पत्नी से कहा:
श्लोक 18 (markandeya.106.18)
शोकेनालं विशालाक्षि रोदितव्यं न ते शुभे । जन्मर्द्धिपरिणामाद्या विकाराः सर्वजन्तुषु ॥ 106.18 ॥
śokenālaṁ viśālākṣi roditavyaṁ na te śubhe janmarddhipariṇāmādyā vikārāḥ sarvajantuṣu
'हे विशालाक्षी, शोक की आवश्यकता नहीं, तुम्हें रोना नहीं चाहिए; जन्म, वृद्धि और क्षय — ये विकार सभी प्राणियों में स्वाभाविक हैं।'
श्लोक 19 (markandeya.106.19)
अधीताः सकला वेदा इष्टा यज्ञाः सहस्रशः । दत्तं द्विजानां पुत्राश्च समुत्पन्ना वरानने ॥ 106.19 ॥
adhītāḥ sakalā vedā iṣṭā yajñāḥ sahasraśaḥ dattaṁ dvijānāṁ putrāśca samutpannā varānane
'हे वरानने, सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन किया, सहस्रों यज्ञ किए, ब्राह्मणों को दान दिया, और हमारे पुत्र भी उत्पन्न हुए।'
श्लोक 20 (markandeya.106.20)
भुक्ता भोगस्त्वया सार्द्धं ये मर्त्यैरतिदुर्लभाः । सभ्यञ्च पालिता पृथ्वी शौर्यं युद्धेष्वनुष्ठितम् ॥ 106.20 ॥
bhuktā bhogastvayā sārddhaṁ ye martyairatidurlabhāḥ sabhyañca pālitā pṛthvī śauryaṁ yuddheṣvanuṣṭhitam
'तुम्हारे साथ वे भोग भोगे जो मनुष्यों को दुर्लभ हैं, पृथ्वी का सम्यक् पालन किया, युद्धों में शौर्य दिखाया।'
श्लोक 21 (markandeya.106.21)
मित्रैः सहेष्टैर्हसितं विहृतं च वनान्तरे । किमन्यत्र कृतं भद्रे पलितेभ्यो बिभेषि यत् ॥ 106.21 ॥
mitraiḥ saheṣṭairhasitaṁ vihṛtaṁ ca vanāntare kimanyatra kṛtaṁ bhadre palitebhyo bibheṣi yat
'प्रिय मित्रों के साथ हास-विलास किया, वनों में विहार किया — हे भद्रे, अब और क्या शेष है, जिस कारण तुम श्वेत केशों से भयभीत होती हो?'
श्लोक 22 (markandeya.106.22)
भवन्तु केशाः पलिता वलयः सन्तु मे शुभे । शैथिल्यमेतु मे कायः कृतकृत्योऽस्मि मानिनि ॥ 106.22 ॥
bhavantu keśāḥ palitā valayaḥ santu me śubhe śaithilyametu me kāyaḥ kṛtakṛtyo’smi mānini
'हे मानिनि, केश श्वेत हो जाएँ, शरीर शिथिल हो जाए — मैं कृतकृत्य हूँ।'
श्लोक 23 (markandeya.106.23)
मूर्ध्नि यद्दर्शितं भद्रे भवत्या पलितं मम । चिकित्सामेव तस्याहं करोमि वनसंश्रयात् ॥ 106.23 ॥
mūrdhni yaddarśitaṁ bhadre bhavatyā palitaṁ mama cikitsāmeva tasyāhaṁ karomi vanasaṁśrayāt
'हे भद्रे, तुमने मेरे सिर पर जो श्वेत केश दिखाया है, उसकी चिकित्सा मैं वन का आश्रय लेकर ही करूँगा।'
श्लोक 24 (markandeya.106.24)
बाल्ये बालक्रियापूर्वं तद्वत्कौमारके च या । यौवने चापि या योग्या वार्द्धके वनसंश्रया ॥ 106.24 ॥
bālye bālakriyāpūrvaṁ tadvatkaumārake ca yā yauvane cāpi yā yogyā vārddhake vanasaṁśrayā
'जैसे बाल्यावस्था में बालक की क्रियाएँ उचित होती हैं, कौमार में कौमार की, यौवन में यौवन की — वैसे ही वृद्धावस्था में वनवास उचित है।'
श्लोक 25 (markandeya.106.25)
एवं मत्पूर्वजैर्भद्रे कृतं त्वत्पूर्वजैश्च यत् । अतो न तेऽश्रुपातस्य किञ्चित्पश्यामि कारणम् ॥ 106.25 ॥
evaṁ matpūrvajairbhadre kṛtaṁ tvatpūrvajaiśca yat ato na te’śrupātasya kiñcitpaśyāmi kāraṇam
'हे भद्रे, जैसा मेरे और तुम्हारे पूर्वजों ने किया, वैसा ही अब मैं भी करूँगा; अतः तुम्हारे अश्रुपात का मुझे कोई कारण नहीं दिखता।'
श्लोक 26 (markandeya.106.26)
अलं ते मन्युना भद्रे नन्वभ्युदयकारि मे । दर्शनं पलितस्यास्य मा रोदीर्निष्प्रयोजनम् ॥ 106.26 ॥
alaṁ te manyunā bhadre nanvabhyudayakāri me darśanaṁ palitasyāsya mā rodīrniṣprayojanam
'हे भद्रे, दुःख मत करो — यह तो मेरे लिए अभ्युदयकारी है; इस श्वेत केश को देखकर व्यर्थ ही मत रोओ।'
श्लोक 27 (markandeya.106.27)
ततः प्रणम्य तं भूपाः पौराश्चैव समीपगाः । साम्ना प्रोचुर्महीपाला महर्षे राज्यवर्धनम् ॥ 106.27 ॥
tataḥ praṇamya taṁ bhūpāḥ paurāścaiva samīpagāḥ sāmnā procurmahīpālā maharṣe rājyavardhanam
तब वहाँ उपस्थित राजाओं और समीपवर्ती प्रजाजनों ने प्रणाम करके राज्यवर्धन से मधुर वचनों में कहा, हे महर्षे:
श्लोक 28 (markandeya.106.28)
न रोदितव्यमनया तव पत्न्या नराधिप । रोदितव्यमिहास्माभिरथवा सर्वजन्तुभिः ॥ 106.28 ॥
na roditavyamanayā tava patnyā narādhipa roditavyamihāsmābhirathavā sarvajantubhiḥ
'हे नराधिप, आपकी इस पत्नी को नहीं, अपितु हमें और समस्त प्राणियों को रोना चाहिए।'
श्लोक 29 (markandeya.106.29)
त्वं ब्रवीषि यथा नाथ वनवासाश्रितं वचः । पतन्ति तेन नः प्राणा लालितानां त्वया नृप ॥ 106.29 ॥
tvaṁ bravīṣi yathā nātha vanavāsāśritaṁ vacaḥ patanti tena naḥ prāṇā lālitānāṁ tvayā nṛpa
'हे नाथ, जैसे आप वनवास की बात कहते हैं, उससे तो आपके द्वारा पाले-पोसे हुए हम सबके प्राण ही निकल जाएँगे।'
श्लोक 30 (markandeya.106.30)
सर्वे यास्यामहे भूप यदि याति भवान्वनम् । ततोऽशेषक्रियाहानिः सर्वपृथ्वीनिवासिनाम् ॥ 106.30 ॥
sarve yāsyāmahe bhūpa yadi yāti bhavānvanam tato’śeṣakriyāhāniḥ sarvapṛthvīnivāsinām
'हे भूप, यदि आप वन जाएँगे तो हम सब भी वहीं चले जाएँगे; तब समस्त पृथ्वीवासियों की सभी क्रियाएँ ठप हो जाएँगी।'
श्लोक 31 (markandeya.106.31)
भविष्यति न सन्देहस्त्वयि नाथ वनाश्रमे । सा च धर्मोपघाताय यदि तत्प्रविमुच्यताम् ॥ 106.31 ॥
bhaviṣyati na sandehastvayi nātha vanāśrame sā ca dharmopaghātāya yadi tatpravimucyatām
'हे नाथ, आपके वनाश्रम में जाने पर निस्संदेह ऐसा ही होगा; और यदि इससे धर्म की हानि हो, तो वह त्याग दिया जाना चाहिए।'
श्लोक 32 (markandeya.106.32)
सप्त वर्षसहस्राणि त्वयेयं पालिता मही । तत्समुत्थं महापुण्यमालोकय नराधिप ॥ 106.32 ॥
sapta varṣasahasrāṇi tvayeyaṁ pālitā mahī tatsamutthaṁ mahāpuṇyamālokaya narādhipa
'सात हजार वर्षों तक आपने इस पृथ्वी का पालन किया है — हे नराधिप, उससे संचित महापुण्य पर विचार कीजिए।'
श्लोक 33 (markandeya.106.33)
वने वसन्महाराज त्वं करिष्यसि यत्तपः । तन्महीपालनस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 106.33 ॥
vane vasanmahārāja tvaṁ kariṣyasi yattapaḥ tanmahīpālanasyāsya kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm
'हे महाराज, वन में रहकर आप जो तप करेंगे, वह इस पृथ्वी-पालन के पुण्य के सोलहवें भाग के भी योग्य नहीं है।'
श्लोक 34 (markandeya.106.34)
सप्त वर्षसहस्राणि मयेयं पालिता मही । इदानीं वनवासस्य मम कालोऽयमागतः ॥ 106.34 ॥
sapta varṣasahasrāṇi mayeyaṁ pālitā mahī idānīṁ vanavāsasya mama kālo’yamāgataḥ
'सात हजार वर्षों तक मैंने इस पृथ्वी का पालन किया है; अब मेरे वनवास का समय आ गया है।'
श्लोक 35 (markandeya.106.35)
ममापत्यानि जातानि दृष्ट्वा मेऽपत्यसन्ततीः । स्वल्पैरेवमहोभिर्मे ह्यन्तको न सहिष्यति ॥ 106.35 ॥
mamāpatyāni jātāni dṛṣṭvā me’patyasantatīḥ svalpairevamahobhirme hyantako na sahiṣyati
'अपनी संतानों को जन्म लेते देखा, अपनी संतति-परंपरा भी देख ली; अब थोड़े ही दिनों में मृत्यु मुझे सहन नहीं करेगी।'
श्लोक 36 (markandeya.106.36)
यदेतत्पलितं मूर्ध्नि तद्विजानीत नागराः । दूतभूतमनार्यस्य मृत्योरत्युग्रकर्मणः ॥ 106.36 ॥
yadetatpalitaṁ mūrdhni tadvijānīta nāgarāḥ dūtabhūtamanāryasya mṛtyoratyugrakarmaṇaḥ
'हे नागरिको, जानो कि मेरे सिर पर उगा यह श्वेत केश उस अनार्य, उग्रकर्मा मृत्यु का दूत है।'
श्लोक 37 (markandeya.106.37)
सोऽहं राज्ये सुतं कृत्वा भोगांस्त्यक्त्वा वनाश्रयः । तपस्तप्स्ये समायान्ति न यावद्यमसैनिकाः ॥ 106.37 ॥
so’haṁ rājye sutaṁ kṛtvā bhogāṁstyaktvā vanāśrayaḥ tapastapsye samāyānti na yāvadyamasainikāḥ
'अतः पुत्र को राज्य पर स्थापित करके, भोगों को त्यागकर, यमसैनिकों के आने से पहले ही मैं वन का आश्रय लेकर तप करूँगा।'
श्लोक 38 (markandeya.106.38)
ततो यियासुः स वनं दैवज्ञानवनीपतिः । पुत्रराज्याऽभिषेकाय दिनलग्नान्यपृच्छत ॥ 106.38 ॥
tato yiyāsuḥ sa vanaṁ daivajñānavanīpatiḥ putrarājyā’bhiṣekāya dinalagnānyapṛcchata
तब वन जाने का इच्छुक वह राजा ज्योतिषियों से पुत्र के राज्याभिषेक हेतु शुभ दिन-मुहूर्त पूछने लगा।
श्लोक 39 (markandeya.106.39)
श्रुत्वा च ते तु नृपतेर्वचो व्याकुलचेतसः । दिनं लग्नं च होराश्च न विदुः शास्त्रदृष्टयः ॥ 106.39 ॥
śrutvā ca te tu nṛpatervaco vyākulacetasaḥ dinaṁ lagnaṁ ca horāśca na viduḥ śāstradṛṣṭayaḥ
राजा की यह बात सुनकर व्याकुल-चित्त उन ज्योतिषियों को शास्त्र-दृष्टि से भी कोई शुभ दिन या मुहूर्त नहीं सूझा।
श्लोक 40 (markandeya.106.40)
ऊचुश्च तं महीपालं दैवज्ञा बाष्पगद्गदम् । ज्ञानानि नः प्रणष्टानि श्रुत्वैतत्ते वचो नृप ॥ 106.40 ॥
ūcuśca taṁ mahīpālaṁ daivajñā bāṣpagadgadam jñānāni naḥ praṇaṣṭāni śrutvaitatte vaco nṛpa
अश्रुगद्गद स्वर में उन ज्योतिषियों ने राजा से कहा — 'हे राजन्, आपकी यह बात सुनकर हमारा ज्ञान ही नष्ट हो गया है।'
श्लोक 41 (markandeya.106.41)
ततोऽन्यनगरेभ्यश्च भृत्यै राष्ट्रेभ्य एव च । ततस्तस्माच्च नगरात्प्राचुर्येणाभ्युपागमन् ॥ 106.41 ॥
tato’nyanagarebhyaśca bhṛtyai rāṣṭrebhya eva ca tatastasmācca nagarātprācuryeṇābhyupāgaman
तब अन्य नगरों से, सेवकों तथा राष्ट्रों से, और उसी नगर से भी लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए,
श्लोक 42 (markandeya.106.42)
समुत्पत्य महीपालं तं यियासुं मुने वनम् । प्रकम्पिशिरसो भूत्वा प्रोचुर्ब्राह्मणसत्तमाः ॥ 106.42 ॥
samutpatya mahīpālaṁ taṁ yiyāsuṁ mune vanam prakampiśiraso bhūtvā procurbrāhmaṇasattamāḥ
और वन जाने के इच्छुक उस राजा के पास जाकर, हे मुने, सिर कँपाते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कहा:
श्लोक 43 (markandeya.106.43)
प्रसीद पाहि नो राजन्पालिताः स्म यथा पुरा । सीदिष्यत्यखिलो लोकस्त्वयि भूप वनाश्रये ॥ 106.43 ॥
prasīda pāhi no rājanpālitāḥ sma yathā purā sīdiṣyatyakhilo lokastvayi bhūpa vanāśraye
'हे राजन्, प्रसन्न होइए, हमारी रक्षा कीजिए जैसे पहले करते थे; आपके वनाश्रम में जाने पर सम्पूर्ण लोक नष्ट हो जाएगा।'
श्लोक 44 (markandeya.106.44)
त्वं कुरुष्व तथा राजन्यथा नो सीदते जगत् । नेच्छामश्च भवच्छून्यं द्रष्टुं सिंहासनं विभो ॥ 106.44 ॥
tvaṁ kuruṣva tathā rājanyathā no sīdate jagat necchāmaśca bhavacchūnyaṁ draṣṭuṁ siṁhāsanaṁ vibho
'हे राजन्, ऐसा कीजिए जिससे हमारा जगत् नष्ट न हो; हे वीर, हम अल्प समय तक ही जीवित रहेंगे — हम आपके बिना यह सिंहासन खाली नहीं देखना चाहते।'
श्लोक 45 (markandeya.106.45)
इत्येवं तैस्तथान्यैश्च द्विजैः पौरपुरःसरैः । भूपैर्भृत्यैरमात्यैश्च राजा प्रोक्तः पुनः पुनः ॥ 106.45 ॥
ityevaṁ taistathānyaiśca dvijaiḥ paurapuraḥsaraiḥ bhūpairbhṛtyairamātyaiśca rājā proktaḥ punaḥ punaḥ
इस प्रकार इन तथा अन्य ब्राह्मणों, प्रजाजनों, राजाओं, सेवकों और अमात्यों ने राजा से बार-बार निवेदन किया।
श्लोक 46 (markandeya.106.46)
वनवासविनिर्बन्धं नोपसंहरते यदा । क्षमिष्यत्यन्तको नेति ददौ स च तदोत्तरम् ॥ 106.46 ॥
vanavāsavinirbandhaṁ nopasaṁharate yadā kṣamiṣyatyantako neti dadau sa ca tadottaram
जब उसने वनवास का हठ नहीं छोड़ा, तब उसने उत्तर दिया — 'मृत्यु क्षमा नहीं करेगी।'
श्लोक 47 (markandeya.106.47)
ततोऽमात्याश्च भूपाश्च पौरवृद्धास्तथा द्विजाः । समेत्य मन्त्रयामासुः किमत्र क्रियतामिति ॥ 106.47 ॥
tato’mātyāśca bhūpāśca pauravṛddhāstathā dvijāḥ sametya mantrayāmāsuḥ kimatra kriyatāmiti
तब अमात्य, राजा, वृद्ध नागरिक और ब्राह्मण एकत्र होकर विचार करने लगे — 'अब यहाँ क्या किया जाए?'
श्लोक 48 (markandeya.106.48)
तेषां मन्त्रयतां विप्र निश्चयोऽयमजायत । अनुरागवतां तत्र महीपालेऽतिधार्मिके ॥ 106.48 ॥
teṣāṁ mantrayatāṁ vipra niścayo’yamajāyata anurāgavatāṁ tatra mahīpāle’tidhārmike
उन विचार करते हुए लोगों में, हे विप्र, उस अत्यंत धार्मिक राजा के प्रति अनुराग रखते हुए यह निश्चय हुआ:
श्लोक 49 (markandeya.106.49)
सम्यग्ध्यानपरा भूत्वा प्रार्थयामः समाहिताः । तपसाराध्य भास्वन्तमायुरस्य महीपतेः ॥ 106.49 ॥
samyagdhyānaparā bhūtvā prārthayāmaḥ samāhitāḥ tapasārādhya bhāsvantamāyurasya mahīpateḥ
'हम सब एकाग्रचित्त और ध्यानमग्न होकर, तप द्वारा सूर्यदेव की आराधना कर इस राजा की आयु-वृद्धि के लिए प्रार्थना करेंगे।'
श्लोक 50 (markandeya.106.50)
तत्रैकनिश्चयाः कार्ये केचिद्गेहे च भास्करम् । सम्यगर्घोपचाराद्यैरुपहारैरपूजयन् ॥ 106.50 ॥
tatraikaniścayāḥ kārye kecidgehe ca bhāskaram samyagarghopacārādyairupahārairapūjayan
इस कार्य में एकनिश्चयी होकर कुछ लोग घर में ही अर्घ्य आदि उपचारों से सूर्य की पूजा करने लगे।
श्लोक 51 (markandeya.106.51)
अपरे मौनिनो भूत्वा ऋग्जापेन तथापरे । यजुषामथ साम्नां च तोषयाञ्चक्रिरे रविम् ॥ 106.51 ॥
apare maunino bhūtvā ṛgjāpena tathāpare yajuṣāmatha sāmnāṁ ca toṣayāñcakrire ravim
अन्य मौन धारण कर ऋग्वेद के जप से, तथा अन्य यजुर्वेद और सामवेद के मंत्रों से रवि को संतुष्ट करने लगे।
श्लोक 52 (markandeya.106.52)
अपरे च निराहारा नदीपुलिनशायिनः । तपांसि चक्रुरिच्छंतो भास्कराराधनं द्विजाः ॥ 106.52 ॥
apare ca nirāhārā nadīpulinaśāyinaḥ tapāṁsi cakruricchaṁto bhāskarārādhanaṁ dvijāḥ
अन्य निराहार रहकर नदी-तट पर शयन करते हुए भास्कर की आराधना की इच्छा से तप करने लगे।
श्लोक 53 (markandeya.106.53)
अग्निहोत्रपराश्चान्ये रविसूक्तान्यहर्निशम् । जेपुस्तत्रापरे तस्थुर्भास्करे न्यस्तदृष्टयः ॥ 106.53 ॥
agnihotraparāścānye ravisūktānyaharniśam jepustatrāpare tasthurbhāskare nyastadṛṣṭayaḥ
अन्य अग्निहोत्रपरायण होकर दिन-रात सूर्य-सूक्तों का जप करने लगे, तथा अन्य निर्निमेष दृष्टि से सूर्य पर ही टिके रहे।
श्लोक 54 (markandeya.106.54)
इत्येवमतिनिर्बन्धं भास्कराराधनं प्रति । बहुप्रकारं चक्रुस्ते तं तं विधिमुपाश्रिताः ॥ 106.54 ॥
ityevamatinirbandhaṁ bhāskarārādhanaṁ prati bahuprakāraṁ cakruste taṁ taṁ vidhimupāśritāḥ
इस प्रकार सूर्य की आराधना के प्रति अत्यंत आग्रहपूर्वक उन्होंने विविध विधियों का आश्रय लेकर अनेक प्रकार के अनुष्ठान किए।
श्लोक 55 (markandeya.106.55)
तथा तु यततां तेषां भास्कराराधनं प्रति । सुदामा नाम गन्धर्व उपगम्येदमब्रवीत् ॥ 106.55 ॥
tathā tu yatatāṁ teṣāṁ bhāskarārādhanaṁ prati sudāmā nāma gandharva upagamyedamabravīt
उनके इस प्रकार सूर्याराधना में प्रयत्नशील रहते हुए सुदामा नामक एक गन्धर्व वहाँ आकर बोला:
श्लोक 56 (markandeya.106.56)
यद्याराधनमिष्टं वो भास्करस्य द्विजातयः । तदेतत्क्रियतां येन भानुः प्रीतिमुपैष्यति ॥ 106.56 ॥
yadyārādhanamiṣṭaṁ vo bhāskarasya dvijātayaḥ tadetatkriyatāṁ yena bhānuḥ prītimupaiṣyati
'हे द्विजो, यदि तुम्हें सूर्य की आराधना अभीष्ट है, तो वह करो जिससे भानु प्रसन्न होंगे।'
श्लोक 57 (markandeya.106.57)
तस्माद्गुरुविशालाख्यं वनं सिद्धनिषेवितम् । कामरूपे महाशैले गम्यतां तत्र वै लघु ॥ 106.57 ॥
tasmādguruviśālākhyaṁ vanaṁ siddhaniṣevitam kāmarūpe mahāśaile gamyatāṁ tatra vai laghu
'अतः तुम शीघ्र ही कामरूप के महापर्वत पर स्थित सिद्धसेवित गुरुविशाल नामक वन में जाओ।'
श्लोक 58 (markandeya.106.58)
तस्मिन्नाराधनं भानोः क्रियतां सुसमाहितैः । सिद्धक्षेत्रं हितं तत्र सर्वकामानवाप्स्यथ ॥ 106.58 ॥
tasminnārādhanaṁ bhānoḥ kriyatāṁ susamāhitaiḥ siddhakṣetraṁ hitaṁ tatra sarvakāmānavāpsyatha
'वहाँ सुसमाहित होकर सूर्य की आराधना करो; वह सिद्धक्षेत्र कल्याणकारी है — वहाँ तुम्हें सभी कामनाएँ प्राप्त होंगी।'
श्लोक 59 (markandeya.106.59)
इति ते तद्वचः श्रुत्वा गत्वा तत्काननं द्विजाः । ददृशुर्भास्वतस्तत्र पुण्यमायतनं शुभम् ॥ 106.59 ॥
iti te tadvacaḥ śrutvā gatvā tatkānanaṁ dvijāḥ dadṛśurbhāsvatastatra puṇyamāyatanaṁ śubham
उसकी यह बात सुनकर वे ब्राह्मण उस वन में गए और वहाँ भास्कर का पवित्र, शुभ आयतन देखा।
श्लोक 60 (markandeya.106.60)
तत्र ते नियताहारा वर्णा विप्रादयो द्विज । धूपपुष्पोपहाराढ्या पूजां चक्रुरतन्द्रिताः ॥ 106.60 ॥
tatra te niyatāhārā varṇā viprādayo dvija dhūpapuṣpopahārāḍhyā pūjāṁ cakruratandritāḥ
वहाँ नियमपूर्वक आहार लेते हुए ब्राह्मण आदि सभी वर्ण धूप-पुष्प के उपहारों से समृद्ध होकर अथक भाव से पूजा करने लगे।
श्लोक 61 (markandeya.106.61)
पुष्पानुलेपनाद्यैश्च धूपगन्धादिकैस्तथा । जपहोमान्नदानाद्यं पूजनं ते समाहिताः । कुर्वन्तस्तुष्टुवुर्ब्रह्मन्विवस्वन्तं द्विजातयः ॥ 106.61 ॥
puṣpānulepanādyaiśca dhūpagandhādikaistathā japahomānnadānādyaṁ pūjanaṁ te samāhitāḥ kurvantastuṣṭuvurbrahmanvivasvantaṁ dvijātayaḥ
पुष्प, अनुलेपन, धूप, गंध आदि से, तथा जप, होम और अन्नदान आदि पूजनों से, वे ब्राह्मण सुसमाहित होकर विवस्वान् की स्तुति करने लगे।
श्लोक 62 (markandeya.106.62)
देवदानवयक्षाणां ग्रहाणां ज्योतिषामपि । तेजसाभ्यधिकं देवं व्रजाम शरणं रविम् ॥ 106.62 ॥
devadānavayakṣāṇāṁ grahāṇāṁ jyotiṣāmapi tejasābhyadhikaṁ devaṁ vrajāma śaraṇaṁ ravim
'देव-दानव-यक्षों, ग्रहों और नक्षत्रों से भी अधिक तेजस्वी उन सूर्यदेव की हम शरण लेते हैं।'
श्लोक 63 (markandeya.106.63)
दिवि स्थितं च देवेशं द्योतयन्तं समन्ततः । वसुधामन्तरिक्षं च व्याप्नुवन्तं मरीचिभिः ॥ 106.63 ॥
divi sthitaṁ ca deveśaṁ dyotayantaṁ samantataḥ vasudhāmantarikṣaṁ ca vyāpnuvantaṁ marīcibhiḥ
'आकाश में स्थित, सर्वत्र प्रकाशित करने वाले, अपनी किरणों से पृथ्वी और अंतरिक्ष को व्याप्त करने वाले देवेश की शरण लेते हैं।'
श्लोक 64 (markandeya.106.64)
आदित्यं भास्करं भानुं सवितारं दिवाकरम् । पूषाणमर्यमाणं च स्वर्भानुं दीप्तदीधितिम् ॥ 106.64 ॥
ādityaṁ bhāskaraṁ bhānuṁ savitāraṁ divākaram pūṣāṇamaryamāṇaṁ ca svarbhānuṁ dīptadīdhitim
'आदित्य, भास्कर, भानु, सवितृ, दिवाकर, पूषा, अर्यमा, स्वर्भानु के नाशक, दीप्त तेज वाले —'
श्लोक 65 (markandeya.106.65)
चतुर्युगान्तकालाग्निदुष्प्रेक्ष्यं प्रलयान्तगम् । योगीश्वरमनन्तं च रक्तं पीतं सितासितम् ॥ 106.65 ॥
caturyugāntakālāgniduṣprekṣyaṁ pralayāntagam yogīśvaramanantaṁ ca raktaṁ pītaṁ sitāsitam
'चार युगों के अंत में प्रलयाग्नि स्वरूप, दुष्प्रेक्ष्य, प्रलयांत में विद्यमान, योगीश्वर, अनंत, लाल, पीत, श्वेत-श्याम वर्ण वाले —'
श्लोक 66 (markandeya.106.66)
ऋषीणामग्निहोत्रेषु यज्ञदेवेष्ववस्थितम् । व्रजाम शरणं देवं तेजोराशिं तमच्युतम् । अक्षरं परमं गुह्यं मोक्षद्वारमनुत्तमम् ॥ 106.66 ॥
ṛṣīṇāmagnihotreṣu yajñadeveṣvavasthitam vrajāma śaraṇaṁ devaṁ tejorāśiṁ tamacyutam akṣaraṁ paramaṁ guhyaṁ mokṣadvāramanuttamam
'ऋषियों के अग्निहोत्रों और यज्ञ-देवताओं में स्थित उस अच्युत, तेजोराशि, अक्षर, परम, गुह्य, मोक्ष के अनुपम द्वार-स्वरूप देव की हम शरण लेते हैं।'
श्लोक 67 (markandeya.106.67)
छन्दोभिरश्वरूपैश्च सकृद्युक्तैर्विहङ्गमम् । उदयास्तमने युक्तं सदा मेरोः प्रदक्षिणे ॥ 106.67 ॥
chandobhiraśvarūpaiśca sakṛdyuktairvihaṅgamam udayāstamane yuktaṁ sadā meroḥ pradakṣiṇe
'वेदछन्दरूपी अश्वों से युक्त होकर विहंगम गति से मेरु की सदा प्रदक्षिणा करते हुए, उदय और अस्त में नियत—'
श्लोक 68 (markandeya.106.68)
अनृतं च ऋतं चैव पुण्यतीर्थं पृथग्विधम् । विश्वस्थितिचिन्त्यं च प्रपन्नाः स्म प्रभाकरम् ॥ 106.68 ॥
anṛtaṁ ca ṛtaṁ caiva puṇyatīrthaṁ pṛthagvidham viśvasthiticintyaṁ ca prapannāḥ sma prabhākaram
'ऋत और अनृत दोनों, तथा विविध पुण्यतीर्थ-स्वरूप, विश्व की स्थिति के चिंतनीय प्रभाकर की हमने शरण ली है।'
श्लोक 69 (markandeya.106.69)
यो ब्रह्मा यो महादेवो यो विष्णुर्यः प्रजापतिः । वायुराकाशमापश्च पृथिवीगिरिसागराः ॥ 106.69 ॥
yo brahmā yo mahādevo yo viṣṇuryaḥ prajāpatiḥ vāyurākāśamāpaśca pṛthivīgirisāgarāḥ
'जो ब्रह्मा हैं, जो महादेव हैं, जो विष्णु हैं, जो प्रजापति हैं, जो वायु, आकाश, जल, पृथ्वी, पर्वत और सागर हैं —'
श्लोक 70 (markandeya.106.70)
ग्रहनक्षत्रचन्द्राद्या वानस्पत्यं द्रुमौषधम् । व्यक्ताव्यक्तेषु भूतेषु धर्माधर्मप्रवर्त्तकः ॥ 106.70 ॥
grahanakṣatracandrādyā vānaspatyaṁ drumauṣadham vyaktāvyakteṣu bhūteṣu dharmādharmapravarttakaḥ
'ग्रह, नक्षत्र, चंद्र आदि, वनस्पति, वृक्ष-औषधि — व्यक्त-अव्यक्त भूतों में धर्म-अधर्म के प्रवर्तक —'
श्लोक 71 (markandeya.106.71)
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव वैष्णवी चैव ते तनुः । त्रिधा यस्य स्वरूपं तु भानोर्भास्वान्प्रसीदतु ॥ 106.71 ॥
brāhmī māheśvarī caiva vaiṣṇavī caiva te tanuḥ tridhā yasya svarūpaṁ tu bhānorbhāsvānprasīdatu
'ब्राह्मी, माहेश्वरी और वैष्णवी — ये तीन आपके ही रूप हैं; ऐसे त्रिविध स्वरूप वाले भानु प्रसन्न हों।'
श्लोक 72 (markandeya.106.72)
यस्य सर्वमयस्येदमङ्गभूतं जगत्प्रभोः । स नः प्रसीदतां भास्वाञ्जगतां यश्च जीवनम् ॥ 106.72 ॥
yasya sarvamayasyedamaṅgabhūtaṁ jagatprabhoḥ sa naḥ prasīdatāṁ bhāsvāñjagatāṁ yaśca jīvanam
'जिसका यह सम्पूर्ण जगत् अंगभूत है, वे सर्वस्वरूप प्रभु भानु हम पर प्रसन्न हों, जो जगत् के जीवनस्वरूप हैं।'
श्लोक 73 (markandeya.106.73)
यस्यैकमक्षरं रूपं प्रभामण्डलदुर्दृशम् । द्वितीयमैन्दवं सौम्यं स नो भास्वान्प्रसीदतु ॥ 106.73 ॥
yasyaikamakṣaraṁ rūpaṁ prabhāmaṇḍaladurdṛśam dvitīyamaindavaṁ saumyaṁ sa no bhāsvānprasīdatu
'जिनका एक रूप प्रभामंडल है, दुर्दर्श; और दूसरा सौम्य, चंद्रमय है — वे भास्वान् हम पर प्रसन्न हों।'
श्लोक 74 (markandeya.106.74)
ताभ्यां च तस्य रूपाभ्यामिदं विश्वं विनिर्मितम् । अग्नीषोममयं भास्वान्स नो देवः प्रसीदतु ॥ 106.74 ॥
tābhyāṁ ca tasya rūpābhyāmidaṁ viśvaṁ vinirmitam agnīṣomamayaṁ bhāsvānsa no devaḥ prasīdatu
'उन्हीं दोनों रूपों से यह विश्व निर्मित हुआ; अग्नि-सोममय वे भास्वान् देव हम पर प्रसन्न हों।'
श्लोक 75 (markandeya.106.75)
इत्थं स्तुत्या तदा भक्त्या सम्यक्पूजाविधानतः । तुतोष भगवान्भास्वांस्त्रिभिर्मासैर्द्विजोत्तम ॥ 106.75 ॥
itthaṁ stutyā tadā bhaktyā samyakpūjāvidhānataḥ tutoṣa bhagavānbhāsvāṁstribhirmāsairdvijottama
इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्तुति और सम्यक् पूजा-विधान से, हे द्विजोत्तम, भगवान् भास्कर तीन महीनों में ही संतुष्ट हो गए।
श्लोक 76 (markandeya.106.76)
ततः स मण्डलादुद्यन्निजबिम्बसमप्रभः । अवतीर्य ददौ तेभ्यो दुर्दृशो दर्शनं रविः ॥ 106.76 ॥
tataḥ sa maṇḍalādudyannijabimbasamaprabhaḥ avatīrya dadau tebhyo durdṛśo darśanaṁ raviḥ
तब वे अपने मंडल से उदित होकर, अपने बिम्ब के समान तेजस्वी रूप में उतरकर, उन्हें अपना दुर्दर्श दर्शन प्रदान किया।
श्लोक 77 (markandeya.106.77)
ततस्ते स्पष्टरूपं तं सवितारमजं जनाः । पुलकोत्कम्पिनो विप्रा भक्तिनम्राः प्रणेमिरे ॥ 106.77 ॥
tataste spaṣṭarūpaṁ taṁ savitāramajaṁ janāḥ pulakotkampino viprā bhaktinamrāḥ praṇemire
तब वे लोग उस स्पष्ट, अजन्मा सवितारूप को देखकर, रोमांचित होकर, भक्ति से नम्र होकर उन्हें प्रणाम करने लगे।
श्लोक 78 (markandeya.106.78)
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्ररश्मे सर्वस्य हेतुस्त्वमशेषकेतुः । पाता त्वमीड्योऽखिलयज्ञधामध्येयस्तथा योगविदां प्रसीद ॥ 106.78 ॥
namo namaste’stu sahasraraśme sarvasya hetustvamaśeṣaketuḥ pātā tvamīḍyo’khilayajñadhāmadhyeyastathā yogavidāṁ prasīda
'हे सहस्ररश्मि, आपको नमस्कार, नमस्कार है; आप सबके कारण हैं, आपका तेज अनंत है; आप रक्षक हैं, स्तुत्य हैं, समस्त यज्ञों के आश्रय हैं, योगियों के ध्येय हैं — प्रसन्न होइए।'