सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 107
भानु-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.107.1)
ततः प्रसन्नो भगवान्भानुराहाखिलाञ्जनान् । व्रियतां यदभिप्रेतं मत्तः प्राप्तुं द्विजादयः ॥ 107.1 ॥
tataḥ prasanno bhagavānbhānurāhākhilāñjanān vriyatāṁ yadabhipretaṁ mattaḥ prāptuṁ dvijādayaḥ
तब प्रसन्न होकर भगवान् भानु ने उन समस्त जनों से कहा — 'हे ब्राह्मणादि, तुम्हें जो अभीष्ट हो, मुझसे वर माँगो।'
श्लोक 2 (markandeya.107.2)
ततस्ते प्रणिपत्योचुर्विप्रक्षत्रादयो जनाः । ससाध्वसमशीतांशुमवलोक्य पुरः स्थितम् ॥ 107.2 ॥
tataste praṇipatyocurviprakṣatrādayo janāḥ sasādhvasamaśītāṁśumavalokya puraḥ sthitam
तब वे ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि लोग सामने खड़े उग्र-रश्मि सूर्य को भय-सम्मिश्रित भाव से देखकर, प्रणाम करके बोले:
श्लोक 3 (markandeya.107.3)
भगवन्यदि नो भक्त्या प्रसन्नस्तिमिरापह ॥ 107.3 ॥
bhagavanyadi no bhaktyā prasannastimirāpaha
'हे भगवन्, हे अंधकार-नाशक, यदि आप हमारी भक्ति से प्रसन्न हैं—'
श्लोक 4 (markandeya.107.4)
दश वर्षसहस्राणि ततो नो जीवतां नृपः । निरामयो जितारातिः सुकोशः स्थिरयौवनः ॥ 107.4 ॥
daśa varṣasahasrāṇi tato no jīvatāṁ nṛpaḥ nirāmayo jitārātiḥ sukośaḥ sthirayauvanaḥ
'—तो हमारा राजा दस हजार वर्षों तक रोगरहित, शत्रुविजयी, समृद्ध कोष वाला और सदा युवा बना रहते हुए जीवित रहे।'
श्लोक 5 (markandeya.107.5)
तथेत्युक्त्वा जनान्भास्वानदृश्योऽभून्महामुने । तेऽपि लब्धवरा हृष्टाः समाजग्मुर्जनेश्वरम् ॥ 107.5 ॥
tathetyuktvā janānbhāsvānadṛśyo’bhūnmahāmune te’pi labdhavarā hṛṣṭāḥ samājagmurjaneśvaram
'तथास्तु' कहकर भगवान् भानु उन लोगों के समक्ष से अंतर्धान हो गए, हे महामुने; वे भी वर पाकर हर्षित होकर अपने राजा के पास लौट आए।
श्लोक 6 (markandeya.107.6)
यथा वृत्तं च ते तस्मै नरेन्द्राय न्यवेदयन् । वरं लब्ध्वा सहस्रांशो सकाशादखिलं द्विज ॥ 107.6 ॥
yathā vṛttaṁ ca te tasmai narendrāya nyavedayan varaṁ labdhvā sahasrāṁśo sakāśādakhilaṁ dvija
जैसा हुआ था, वैसा ही उन्होंने राजा को बताया, हे विप्र — कि उन्हें सूर्यदेव से यह सम्पूर्ण वर प्राप्त हुआ है।
श्लोक 7 (markandeya.107.7)
तच्छ्रुत्वा जहृषे तस्य सा पत्नी मानिनी द्विज । (प्रहर्षं परमं याता हर्षोद्गततनूरुहा) । स च राजा चिरं दध्यौ नाह किञ्चिच्च तं जनम् ॥ 107.7 ॥
tacchrutvā jahṛṣe tasya sā patnī māninī dvija (praharṣaṁ paramaṁ yātā harṣodgatatanūruhā) sa ca rājā ciraṁ dadhyau nāha kiñcicca taṁ janam
यह सुनकर उसकी पत्नी मानिनी हर्षित हुई; (वह परम हर्ष से रोमांचित हो गई;) परन्तु राजा स्वयं बहुत देर तक सोचते रहे और उन लोगों से कुछ नहीं कहा।
श्लोक 8 (markandeya.107.8)
ततः सा मानिनी भूपं हर्षापूरितमानसा । दिष्ट्याऽऽयुषा महीपाल वर्द्धस्वेत्याह तं पतिम् ॥ 107.8 ॥
tataḥ sā māninī bhūpaṁ harṣāpūritamānasā diṣṭyā’’yuṣā mahīpāla varddhasvetyāha taṁ patim
तब हर्ष से भरे मन वाली मानिनी ने राजा से कहा — 'सौभाग्य से, हे नरेश, आप दीर्घायु होकर वृद्धि पाएँ' — ऐसा उसने अपने पति से कहा।
श्लोक 9 (markandeya.107.9)
तथा तया मुदा भर्ता मानिन्याथ सभाजितः । नाहं किञ्चिन्महीपालश्चिन्ताजडमनाद्विज ॥ 107.9 ॥
tathā tayā mudā bhartā māninyātha sabhājitaḥ nāhaṁ kiñcinmahīpālaścintājaḍamanādvija
मानिनी द्वारा इस हर्ष के साथ सम्मानित होने पर भी पति ने कहा — 'हे विप्र, मैं तनिक भी प्रसन्न नहीं हूँ, मेरा मन चिंता से जड़ हो गया है।'
श्लोक 10 (markandeya.107.10)
सा पुनः प्राह भर्त्तारं चिन्तयानमधोमुखम् । कस्मान्न हर्षमभ्येषि परमाभ्युदये नृप ॥ 107.10 ॥
sā punaḥ prāha bharttāraṁ cintayānamadhomukham kasmānna harṣamabhyeṣi paramābhyudaye nṛpa
उसने अधोमुख होकर चिंतामग्न पति से पुनः कहा — 'हे राजन्, इस परम अभ्युदय पर भी आप हर्षित क्यों नहीं होते?'
श्लोक 11 (markandeya.107.11)
दशवर्षसहस्राणि नीरुजः स्थिरयौवनः । भावी त्वमद्यप्रभृति किं तथापि न हृष्यसे ॥ 107.11 ॥
daśavarṣasahasrāṇi nīrujaḥ sthirayauvanaḥ bhāvī tvamadyaprabhṛti kiṁ tathāpi na hṛṣyase
'आज से आप दस हजार वर्षों तक रोगरहित और स्थिर यौवन वाले होंगे — फिर भी आप हर्षित क्यों नहीं होते?'
श्लोक 12 (markandeya.107.12)
किन्तु तत्कारणं ब्रूहि यच्चिन्ताकृष्टमानसः । परमाभ्युदयेऽपि त्वं सम्प्राप्ते पृथिवीपते ॥ 107.12 ॥
kintu tatkāraṇaṁ brūhi yaccintākṛṣṭamānasaḥ paramābhyudaye’pi tvaṁ samprāpte pṛthivīpate
'किन्तु यह बताइए, हे पृथ्वीपते, इस परम अभ्युदय के प्राप्त होने पर भी आप चिंता से आकृष्ट-मन क्यों हैं?'
श्लोक 13 (markandeya.107.13)
कथमभ्युदयो भद्रे किं सभाजयसे च माम् । प्राप्तो दुःखसहस्राणां किं सभाजनमिष्यते ॥ 107.13 ॥
kathamabhyudayo bhadre kiṁ sabhājayase ca mām prāpto duḥkhasahasrāṇāṁ kiṁ sabhājanamiṣyate
'हे भद्रे, यह कैसा अभ्युदय है, और तुम मेरा अभिनंदन क्यों करती हो? सहस्रों दुःखों को प्राप्त करके भला कैसा अभिनंदन?'
श्लोक 14 (markandeya.107.14)
दशवर्षसहस्राणि जीविष्याम्यहमेककः । न त्वं तव विपत्तौ मे किन्न दुःखं भविष्यति ॥ 107.14 ॥
daśavarṣasahasrāṇi jīviṣyāmyahamekakaḥ na tvaṁ tava vipattau me kinna duḥkhaṁ bhaviṣyati
'दस हजार वर्षों तक मैं अकेला जीवित रहूँगा; क्या तुम्हारी विपत्ति (मृत्यु) में मुझे दुःख नहीं होगा?'
श्लोक 15 (markandeya.107.15)
पुत्रान्पौत्रान्प्रपौत्रांश्च तथान्यानिष्टबान्धवान् । पश्यतो मे मृतान्दुःखं किमल्पं हि भविष्यति ॥ 107.15 ॥
putrānpautrānprapautrāṁśca tathānyāniṣṭabāndhavān paśyato me mṛtānduḥkhaṁ kimalpaṁ hi bhaviṣyati
'पुत्रों, पौत्रों, प्रपौत्रों तथा अन्य प्रिय बांधवों को मरते देखने का दुःख क्या अल्प होगा?'
श्लोक 16 (markandeya.107.16)
भृत्येषु चातिभक्तेषु मित्रवर्गे तथा मृते । भद्रे दुःखमपारं मे भविष्यति तु सन्ततम् ॥ 107.16 ॥
bhṛtyeṣu cātibhakteṣu mitravarge tathā mṛte bhadre duḥkhamapāraṁ me bhaviṣyati tu santatam
'अत्यंत भक्त सेवकों और मित्रवर्ग के मरने पर, हे भद्रे, मुझे निरंतर अपार दुःख होगा।'
श्लोक 17 (markandeya.107.17)
यैर्मदर्थं तपस्तप्तं कृशैर्धमनिसन्ततैः । ते मरिष्यन्त्यहं भोगी जीविष्यामीति धिक्करम् ॥ 107.17 ॥
yairmadarthaṁ tapastaptaṁ kṛśairdhamanisantataiḥ te mariṣyantyahaṁ bhogī jīviṣyāmīti dhikkaram
'जिनके लिए तपस्वियों ने कृश होकर, नसें तनी हुई होने तक तप किया, वे मर जाएँगे और भोगी मैं जीवित रहूँगा — धिक्कार है ऐसे जीवन को!'
श्लोक 18 (markandeya.107.18)
सेयमापद्वरारोहे प्राप्ता नाभ्युदयो मम । कथं वा मन्यसे न त्वं यत्सभाजयसेऽद्य माम् ॥ 107.18 ॥
seyamāpadvarārohe prāptā nābhyudayo mama kathaṁ vā manyase na tvaṁ yatsabhājayase’dya mām
'यही, हे वरारोहे, मुझे प्राप्त हुई विपत्ति है, अभ्युदय नहीं — तुम कैसे यह न सोचकर आज मेरा अभिनंदन करती हो?'
श्लोक 19 (markandeya.107.19)
महाराज यथात्थ त्वं तथैतन्नात्र संशयः । मया पौरैश्च दोषोऽयं प्रीत्या नालोकितस्तव ॥ 107.19 ॥
mahārāja yathāttha tvaṁ tathaitannātra saṁśayaḥ mayā pauraiśca doṣo’yaṁ prītyā nālokitastava
'हे महाराज, जैसा आप कहते हैं, वैसा ही निःसंदेह है; स्नेहवश यह दोष न मुझे दिखा, न प्रजाजनों को।'
श्लोक 20 (markandeya.107.20)
एवं गतेऽत्र किं कार्यं नरनाथ विचिन्त्यताम् । नान्यथा भावि यत्प्राह प्रसन्नौ भगवान्रविः ॥ 107.20 ॥
evaṁ gate’tra kiṁ kāryaṁ naranātha vicintyatām nānyathā bhāvi yatprāha prasannau bhagavānraviḥ
'ऐसा होने पर, हे नरनाथ, अब क्या करना उचित है, विचार कीजिए; भगवान् रवि ने जो प्रसन्न होकर कहा है, वह अन्यथा नहीं होगा।'
श्लोक 21 (markandeya.107.21)
उपकारः कृतः पौरैः प्रीत्या भृत्यैश्च यो मम । कथं भोक्ष्याम्यहं भोगान्गत्वा तेषामनिष्कृतिम् ॥ 107.21 ॥
upakāraḥ kṛtaḥ pauraiḥ prītyā bhṛtyaiśca yo mama kathaṁ bhokṣyāmyahaṁ bhogāngatvā teṣāmaniṣkṛtim
'प्रेमपूर्वक प्रजाजनों और सेवकों द्वारा मेरे प्रति किए गए इस उपकार का बदला चुकाए बिना मैं कैसे भोगों का उपभोग करूँ?'
श्लोक 22 (markandeya.107.22)
सोऽहमद्यप्रभृत्यद्रिं गत्वा नियतमानसः । ( पौरलोकहितार्थं च तोषयिष्यामि भास्करम् । यथा पौरा मम कृते बान्धवाश्च समन्ततः । आराधनाय देवेशं तथाहमपि साम्प्रतम्) । तपस्तप्स्ये निराहारो भानोराराधनोद्यतः ॥ 107.22 ॥
so’hamadyaprabhṛtyadriṁ gatvā niyatamānasaḥ ( pauralokahitārthaṁ ca toṣayiṣyāmi bhāskaram yathā paurā mama kṛte bāndhavāśca samantataḥ ārādhanāya deveśaṁ tathāhamapi sāmpratam) tapastapsye nirāhāro bhānorārādhanodyataḥ
'अतः आज से पर्वत पर जाकर संयमित मन से (प्रजा के हित के लिए मैं भी सूर्य को संतुष्ट करूँगा; जैसे प्रजाजनों ने मेरे लिए किया, वैसे ही अब मैं भी) निराहार रहकर सूर्याराधना में तत्पर होकर तप करूँगा,'
श्लोक 23 (markandeya.107.23)
दशवर्षसहस्राणि यथाहं स्थिरयौवनः । तस्य प्रसादाद्देवस्य जीविष्यामि निरामयः ॥ 107.23 ॥
daśavarṣasahasrāṇi yathāhaṁ sthirayauvanaḥ tasya prasādāddevasya jīviṣyāmi nirāmayaḥ
'जिससे उनकी कृपा से मैं भी दस हजार वर्षों तक रोगरहित और स्थिर यौवन वाला होकर जीऊँ, जैसा अभी हूँ।'
श्लोक 24 (markandeya.107.24)
तथा यदि प्रजाः सर्वा भृत्यास्त्वं च सुताश्च मे । पुत्रा पौत्रा प्रपौत्राश्च सुहृदश्च वरानने ॥ 107.24 ॥
tathā yadi prajāḥ sarvā bhṛtyāstvaṁ ca sutāśca me putrā pautrā prapautrāśca suhṛdaśca varānane
'और यदि समस्त प्रजा, सेवक, तुम, और मेरे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तथा मित्रगण —'
श्लोक 25 (markandeya.107.25)
जीवन्त्येतं प्रसादं च करोति भगवान्रविः । ततोऽहं भविता राज्ये भोक्ष्ये भोगांस्तथा मुदा ॥ 107.25 ॥
jīvantyetaṁ prasādaṁ ca karoti bhagavānraviḥ tato’haṁ bhavitā rājye bhokṣye bhogāṁstathā mudā
'— भगवान् रवि द्वारा दी गई यही कृपा प्राप्त कर जीवित रहें, तो मैं सिंहासन पर रहकर हर्षपूर्वक भोगों का उपभोग करूँगा।'
श्लोक 26 (markandeya.107.26)
न चेदेवं करोत्यर्कस्तदाद्रौ तत्र मानिनि । तपस्तप्स्ये निराहारो यावज्जीवितसंक्षयः ॥ 107.26 ॥
na cedevaṁ karotyarkastadādrau tatra mānini tapastapsye nirāhāro yāvajjīvitasaṁkṣayaḥ
'किन्तु यदि सूर्यदेव ऐसा वर न दें, तो हे भद्रे, मैं उसी पर्वत पर जीवन के अंत तक निराहार रहकर तप करूँगा।'
श्लोक 27 (markandeya.107.27)
इत्युक्ता सा तदा तेन तथेत्याह नराधिपम् । जगाम तेन च समं साऽपि तं धरणीधरम् ॥ 107.27 ॥
ityuktā sā tadā tena tathetyāha narādhipam jagāma tena ca samaṁ sā’pi taṁ dharaṇīdharam
इस प्रकार कहे जाने पर उसने 'तथास्तु' कहकर राजा की बात मान ली, और वह भी पृथ्वीपति के साथ चल पड़ी।
श्लोक 28 (markandeya.107.28)
स तदायतनं गत्वा भार्यया सह पार्थिवः । भानोराराधनं चक्रे शुश्रूषानिरतो द्विज ॥ 107.28 ॥
sa tadāyatanaṁ gatvā bhāryayā saha pārthivaḥ bhānorārādhanaṁ cakre śuśrūṣānirato dvija
वह राजा अपनी पत्नी सहित उस पवित्र आयतन में जाकर सेवा में तत्पर होकर सूर्य की आराधना करने लगा, हे विप्र।
श्लोक 29 (markandeya.107.29)
निराहारा कृशा सा च यथासौ पृथिवीपतिः । तेपे तपस्तथैवोग्रं शीतवातातपक्षमा ॥ 107.29 ॥
nirāhārā kṛśā sā ca yathāsau pṛthivīpatiḥ tepe tapastathaivograṁ śītavātātapakṣamā
निराहार और कृश होकर वह रानी भी उस पृथ्वीपति के समान शीत, वायु और आतप सहते हुए उग्र तप करने लगी।
श्लोक 30 (markandeya.107.30)
तस्य पूजयतो भानुं तप्यतश्च तपो महत् । साग्रे सम्वत्सरे याते ततः प्रीतो दिवाकरः ॥ 107.30 ॥
tasya pūjayato bhānuṁ tapyataśca tapo mahat sāgre samvatsare yāte tataḥ prīto divākaraḥ
इस प्रकार सूर्य की पूजा और महान् तप करते हुए, जब पूरा एक वर्ष बीत गया, तब सूर्यदेव प्रसन्न हुए।
श्लोक 31 (markandeya.107.31)
समस्तभृत्यपौरादिपुत्राणां च कृते द्विज । ददौ यथाभिलषितं वरं द्विजवरोत्तम ॥ 107.31 ॥
samastabhṛtyapaurādiputrāṇāṁ ca kṛte dvija dadau yathābhilaṣitaṁ varaṁ dvijavarottama
उन्होंने समस्त सेवकों, प्रजाजनों और पुत्रों के लिए, हे द्विजवरोत्तम, अभीष्ट वर प्रदान किया।
श्लोक 32 (markandeya.107.32)
लब्ध्वा वरं स नृपतिः समभ्येत्यात्मनः पुरम् । चकार मुदितो राज्यं प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ 107.32 ॥
labdhvā varaṁ sa nṛpatiḥ samabhyetyātmanaḥ puram cakāra mudito rājyaṁ prajā dharmeṇa pālayan
वर पाकर वह राजा अपने नगर लौट आया, और हर्षित होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए राज्य करने लगा।
श्लोक 33 (markandeya.107.33)
ईजे यज्ञान्स च बहून्ददौ दानान्यहर्निशम् । मानिन्या सहितो भोगान्बुभुजे च स धर्मवित् ॥ 107.33 ॥
īje yajñānsa ca bahūndadau dānānyaharniśam māninyā sahito bhogānbubhuje ca sa dharmavit
उसने अनेक यज्ञ किए, दिन-रात दान दिए, और धर्मज्ञ होकर मानिनी के साथ भोगों का उपभोग किया।
श्लोक 34 (markandeya.107.34)
दश वर्षसहस्राणि पुत्रपौत्रादिभिः सह । भृत्यैः पौत्रैः प्रमुदितः सोऽभवत्स्थिरयौवनः ॥ 107.34 ॥
daśa varṣasahasrāṇi putrapautrādibhiḥ saha bhṛtyaiḥ pautraiḥ pramuditaḥ so’bhavatsthirayauvanaḥ
दस हजार वर्षों तक वह पुत्र-पौत्रादि और हर्षित सेवकों-पौत्रों सहित सदा स्थिर यौवन वाला बना रहा।
श्लोक 35 (markandeya.107.35)
तस्येति चरितं दृष्ट्वा प्रमतिर्नाम भार्गवः । विस्मयाकृष्टहृदयो गाथामेतामगायत ॥ 107.35 ॥
tasyeti caritaṁ dṛṣṭvā pramatirnāma bhārgavaḥ vismayākṛṣṭahṛdayo gāthāmetāmagāyata
उसका यह चरित देखकर भृगुवंशी प्रमति नामक ऋषि आश्चर्यचकित हो उठे और यह गाथा गाई:
श्लोक 36 (markandeya.107.36)
भानुभक्तेरहो शक्तिर्यद्राजा राज्यवर्द्धनः । आयुषो वर्द्धने जातः स्वजनस्य तथात्मनः ॥ 107.36 ॥
bhānubhakteraho śaktiryadrājā rājyavarddhanaḥ āyuṣo varddhane jātaḥ svajanasya tathātmanaḥ
'अहो, सूर्यभक्ति की कैसी शक्ति है! कि राजा राज्यवर्धन अपनी तथा अपनी प्रजा की आयु-वृद्धि प्राप्त कर सके।'
श्लोक 37 (markandeya.107.37)
इति ते कथितं विप्र यत्पृष्टोऽहं त्वयोदितः । आदिदेवस्य माहात्म्यमादित्यस्य विवस्वतः ॥ 107.37 ॥
iti te kathitaṁ vipra yatpṛṣṭo’haṁ tvayoditaḥ ādidevasya māhātmyamādityasya vivasvataḥ
'इस प्रकार, हे विप्र, तुमने जो पूछा था, वह आदिदेव आदित्य विवस्वान् की महिमा मैंने तुम्हें बता दी।'
श्लोक 38 (markandeya.107.38)
विप्रैतदखिलं श्रुत्वा भानोर्माहात्म्यमुत्तमम् । पठंश्च मुच्यते पापैः सप्तरात्रकृतैर्नरः ॥ 107.38 ॥
vipraitadakhilaṁ śrutvā bhānormāhātmyamuttamam paṭhaṁśca mucyate pāpaiḥ saptarātrakṛtairnaraḥ
हे विप्र, भानु की इस सम्पूर्ण उत्तम महिमा को सुनकर और पढ़कर मनुष्य सात रात्रियों में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 39 (markandeya.107.39)
अरोगी धनवानाढ्यः कुले महति धीमताम् । जायते च महाप्राज्ञो यश्चैतद्धारयेद्बुधः ॥ 107.39 ॥
arogī dhanavānāḍhyaḥ kule mahati dhīmatām jāyate ca mahāprājño yaścaitaddhārayedbudhaḥ
जो बुद्धिमान् इसे स्मरण रखता है, वह निरोग, धनवान्, समृद्ध, महान् कुल में जन्मा और महाप्राज्ञ होता है,
श्लोक 40 (markandeya.107.40)
( यजते च महायज्ञैः समाप्तवरदक्षिणः । श्रुत्वा चरितमेतद्धि समानं लभते फलम् । मन्त्राश्च येऽत्राभिहिता भास्वतो मुनिसत्तम । जपः प्रत्येकमेतेषां त्रिसंध्यं पातकापहः ॥ 107.40 ॥
( yajate ca mahāyajñaiḥ samāptavaradakṣiṇaḥ śrutvā caritametaddhi samānaṁ labhate phalam mantrāśca ye’trābhihitā bhāsvato munisattama japaḥ pratyekameteṣāṁ trisaṁdhyaṁ pātakāpahaḥ
(और महायज्ञों से यजन करने वाला, दक्षिणा सहित यज्ञ पूर्ण करने वाले के समान फल पाता है — इस चरित को सुनकर भी वही फल मिलता है। हे मुनिश्रेष्ठ, यहाँ जो मंत्र सूर्य के संबंध में कहे गए हैं—) उनमें से प्रत्येक का त्रिकाल जप पाप का नाश करने वाला है।
श्लोक 41 (markandeya.107.41)
समस्तमेतन्माहात्म्यं यत्र चायतने रवेः । पठ्यते तत्र भगवान्सान्निध्यं न विमुञ्चति ॥ 107.41 ॥
samastametanmāhātmyaṁ yatra cāyatane raveḥ paṭhyate tatra bhagavānsānnidhyaṁ na vimuñcati
जिस सूर्य-मंदिर में यह सम्पूर्ण महिमा पढ़ी जाती है, वहाँ भगवान् अपना सान्निध्य नहीं छोड़ते।
श्लोक 42 (markandeya.107.42)
तस्मादेतत्त्वया ब्रह्मन्भानोर्माहात्म्यमुत्तमम् । धार्यं मनसि जाप्यं च महत्पुण्यमभीप्सता ॥ 107.42 ॥
tasmādetattvayā brahmanbhānormāhātmyamuttamam dhāryaṁ manasi jāpyaṁ ca mahatpuṇyamabhīpsatā
अतः, हे ब्रह्मन्, महापुण्य की इच्छा रखने वाले को भानु की यह उत्तम महिमा मन में धारण करनी और जपनी चाहिए।
श्लोक 43 (markandeya.107.43)
सुवर्णशृङ्गीमतिशोभनाङ्गीं पयस्विनीं गां प्रददाति यो हि । शृणोति चैतत्त्र्यहमात्मवान्नरः समं तयोः पुण्यफलं द्विजाग्र्य ॥ 107.43 ॥
suvarṇaśṛṅgīmatiśobhanāṅgīṁ payasvinīṁ gāṁ pradadāti yo hi śṛṇoti caitattryahamātmavānnaraḥ samaṁ tayoḥ puṇyaphalaṁ dvijāgrya
जो सुवर्ण-सींगों वाली, अत्यंत सुंदर, दूध देने वाली गाय का दान करता है, और जो आत्मसंयमी होकर तीन दिनों तक इसे सुनता है — हे द्विजाग्र्य, दोनों को समान पुण्यफल प्राप्त होता है।