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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 108

वंशानुक्रम-वर्णन

अध्याय 107अध्याय-सूचीअध्याय 109

श्लोक 1 (markandeya.108.1)

एवंप्रभावो भगवाननादिनिधनो रविः । यस्य त्वं क्रौष्टुके भक्त्या माहात्म्यं परिपृच्छसि ॥ 108.1 ॥

evaṁprabhāvo bhagavānanādinidhano raviḥ yasya tvaṁ krauṣṭuke bhaktyā māhātmyaṁ paripṛcchasi

आदि-अंतरहित भगवान् सूर्य का ऐसा ही प्रभाव है, जिसकी महिमा तुम, हे क्रौष्टुकि, भक्तिपूर्वक विस्तार से पूछ रहे हो।

श्लोक 2 (markandeya.108.2)

परमात्मा स योगिनां युञ्जतां चेतसां लयम् । क्षेत्रज्ञः सांख्ययोगानां यज्ञेशो यज्विनामपि ॥ 108.2 ॥

paramātmā sa yogināṁ yuñjatāṁ cetasāṁ layam kṣetrajñaḥ sāṁkhyayogānāṁ yajñeśo yajvināmapi

वे योगियों के लिए, जो चित्त को एकाग्र करते हैं, परमात्मा हैं; सांख्य-योगियों के लिए क्षेत्रज्ञ हैं, तथा यज्ञकर्ताओं के लिए यज्ञेश भी हैं।

श्लोक 3 (markandeya.108.3)

सूर्याधिकारं वहतो विष्णोरीशस्य वेधसः । मनुस्तस्याभवत्पुत्रश्छिन्नसर्वार्थसंशयः ॥ 108.3 ॥

sūryādhikāraṁ vahato viṣṇorīśasya vedhasaḥ manustasyābhavatputraśchinnasarvārthasaṁśayaḥ

सूर्य, विष्णु, ईश (शिव) और विधाता (ब्रह्मा) के अधिकार को धारण करने वाले उनसे एक पुत्र मनु उत्पन्न हुआ, जिसके समस्त संशय नष्ट हो चुके थे।

श्लोक 4 (markandeya.108.4)

मन्वन्तराधिपो विप्र यस्य सप्तममन्तरम् । इक्ष्वाकुर्नाभगो रिष्टो महाबलपराक्रमः ॥ 108.4 ॥

manvantarādhipo vipra yasya saptamamantaram ikṣvākurnābhago riṣṭo mahābalaparākramaḥ

हे विप्र, वे सप्तम मन्वंतर के अधिपति हैं; इक्ष्वाकु, नाभाग, रिष्ट — महाबली और पराक्रमी —

श्लोक 5 (markandeya.108.5)

नरिष्यन्तोऽथ नाभागः पृषध्रो धृष्ट एव च । एते पुत्रा मनोस्तस्य पृथग्राज्यस्य पालकाः ॥ 108.5 ॥

nariṣyanto’tha nābhāgaḥ pṛṣadhro dhṛṣṭa eva ca ete putrā manostasya pṛthagrājyasya pālakāḥ

नरिष्यन्त, फिर नाभाग, पृषध्र और धृष्ट — ये उस मनु के पुत्र थे, जो अपने-अपने पृथक् राज्य के पालक थे,

श्लोक 6 (markandeya.108.6)

विख्यातकीर्त्तयः सर्वे सर्वे शस्त्रास्त्रपारगाः । विशिष्टतरमन्विच्छन्मनुः पुत्रं तथा पुनः ॥ 108.6 ॥

vikhyātakīrttayaḥ sarve sarve śastrāstrapāragāḥ viśiṣṭataramanvicchanmanuḥ putraṁ tathā punaḥ

सभी विख्यात कीर्ति वाले, सभी शस्त्रास्त्रों में पारंगत। तब मनु ने और भी विशिष्ट पुत्र की कामना से,

श्लोक 7 (markandeya.108.7)

मित्रावरुणयोरिष्टिं चकार कृतिनां वरः । यत्र चापहुते होतुरपचारान्महामुने ॥ 108.7 ॥

mitrāvaruṇayoriṣṭiṁ cakāra kṛtināṁ varaḥ yatra cāpahute hoturapacārānmahāmune

मित्रावरुण की इष्टि (यज्ञ) की, हे महामुने; उसमें जब होता का अपचार हुआ [अर्थात् आह्वान में त्रुटि हुई],

श्लोक 8 (markandeya.108.8)

इला नाम समुत्पन्ना मनोः कन्या सुमध्यमा । तां दृष्ट्वा कन्यकां तत्र समुत्पन्नां ततो मनुः ॥ 108.8 ॥

ilā nāma samutpannā manoḥ kanyā sumadhyamā tāṁ dṛṣṭvā kanyakāṁ tatra samutpannāṁ tato manuḥ

तब इला नामक अत्यंत सुंदर कन्या उत्पन्न हुई; उस उत्पन्न कन्या को देखकर मनु ने—

श्लोक 9 (markandeya.108.9)

तुष्टाव मित्रावरुणौ वाक्यं चेदमुवाच ह । भवत्प्रसादात्तनयो विशिष्टो मे भवेदिति ॥ 108.9 ॥

tuṣṭāva mitrāvaruṇau vākyaṁ cedamuvāca ha bhavatprasādāttanayo viśiṣṭo me bhavediti

मित्रावरुण की स्तुति की और यह वाक्य कहा — 'आपकी कृपा से मुझे विशिष्ट पुत्र प्राप्त हो।'

श्लोक 10 (markandeya.108.10)

कृते मखे समुत्पन्ना तनया मम धीमतः । यदि प्रसन्नौ वरदौ तदियं तनया मम ॥ 108.10 ॥

kṛte makhe samutpannā tanayā mama dhīmataḥ yadi prasannau varadau tadiyaṁ tanayā mama

'यज्ञ में मुझ बुद्धिमान् को यह कन्या उत्पन्न हुई है; यदि आप दोनों वरदाता प्रसन्न हैं, तो यही मेरी कन्या—'

श्लोक 11 (markandeya.108.11)

प्रसादाद्भवतो पुत्रो भवत्वतिगुणान्वितः । तथेति चाभ्यामुक्ते देवाभ्यां सैव कन्यका ॥ 108.11 ॥

prasādādbhavato putro bhavatvatiguṇānvitaḥ tatheti cābhyāmukte devābhyāṁ saiva kanyakā

'—आपकी कृपा से गुणसम्पन्न पुत्र बन जाए।' उन दोनों देवताओं द्वारा 'तथास्तु' कहे जाने पर वही कन्या—

श्लोक 12 (markandeya.108.12)

इला समभवत्सद्यः सुद्युम्न इति विश्रुतः । पुनश्चेश्वरकोपेन मृगयामटता वने ॥ 108.12 ॥

ilā samabhavatsadyaḥ sudyumna iti viśrutaḥ punaśceśvarakopena mṛgayāmaṭatā vane

इला तत्काल सुद्युम्न नामक पुत्र बन गई; परन्तु पुनः किसी ईश्वर के कोपवश वन में शिकार खेलते समय,

श्लोक 13 (markandeya.108.13)

स्त्रीत्वमासादितं तेन मनुपुत्रेण धीमता । पुरूरवसनामानं चक्रवर्तिनमूर्जितम् ॥ 108.13 ॥

strītvamāsāditaṁ tena manuputreṇa dhīmatā purūravasanāmānaṁ cakravartinamūrjitam

मनु के उस बुद्धिमान् पुत्र ने स्त्रीत्व प्राप्त कर लिया; उस अवस्था में उसने चक्रवर्ती, तेजस्वी पुरूरवा नामक पुत्र को जन्म दिया,

श्लोक 14 (markandeya.108.14)

जनयामास तनयं यत्र सोमसुतो बुधः । जाते सुते पुनः कृत्वा सोऽश्वमेधं महाक्रतुम् ॥ 108.14 ॥

janayāmāsa tanayaṁ yatra somasuto budhaḥ jāte sute punaḥ kṛtvā so’śvamedhaṁ mahākratum

जिसका पुत्र चंद्रमा-पुत्र बुध हुआ। फिर, वह पुत्र जन्म लेने पर पुनः महाक्रतु अश्वमेध यज्ञ करके,

श्लोक 15 (markandeya.108.15)

पुरुषत्वमनुप्राप्तः सुद्युम्नः पार्थिवोऽभवत् । सुद्युम्नस्य त्रयः पुत्रा उत्कलो विनयो गयः ॥ 108.15 ॥

puruṣatvamanuprāptaḥ sudyumnaḥ pārthivo’bhavat sudyumnasya trayaḥ putrā utkalo vinayo gayaḥ

उसने पुरुषत्व प्राप्त किया और सुद्युम्न राजा बना। सुद्युम्न के तीन पुत्र हुए — उत्कल, विनय और गय —

श्लोक 16 (markandeya.108.16)

पुरुषत्वे महावीर्या यज्विनः पृथुलौजसः । पुरुषत्वे तु ये जातास्तस्य राज्ञस्त्रयः सुताः ॥ 108.16 ॥

puruṣatve mahāvīryā yajvinaḥ pṛthulaujasaḥ puruṣatve tu ye jātāstasya rājñastrayaḥ sutāḥ

पुरुषत्व में महापराक्रमी, यज्ञकर्ता, तेजस्वी; पुरुषत्व की अवस्था में जन्मे वे तीनों राजपुत्र

श्लोक 17 (markandeya.108.17)

बुभुजुस्ते महीमेतां धर्मे नियतचेतसः । स्त्रीभूतस्य तु यो जातस्तस्य राज्ञः पुरूरवाः ॥ 108.17 ॥

bubhujuste mahīmetāṁ dharme niyatacetasaḥ strībhūtasya tu yo jātastasya rājñaḥ purūravāḥ

धर्मपरायण होकर इस पृथ्वी को भोगते रहे। किन्तु जो पुत्र उसके स्त्री-रूप में जन्मा था, वह पुरूरवा था —

श्लोक 18 (markandeya.108.18)

न स लेभे महाभागं यतो बुधसुतो हि सः । ततो वसिष्ठवचनात्प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम् । तस्मै दत्तं स राजाभूत्तत्रातीव मनोहरे ॥ 108.18 ॥

na sa lebhe mahābhāgaṁ yato budhasuto hi saḥ tato vasiṣṭhavacanātpratiṣṭhānaṁ purottamam tasmai dattaṁ sa rājābhūttatrātīva manohare

वह महाभाग्यशाली पद प्राप्त न कर सका, क्योंकि वह बुध का पुत्र था; तब वसिष्ठ के वचन से उसे उत्तम नगरी प्रतिष्ठान दी गई, और वह वहाँ, उस अत्यंत मनोहर स्थान में, राजा हुआ।

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