सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 11
पिता-पुत्र संवाद: जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र का वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.11.1)
पुत्र उवाच निषेकं मानवं स्त्रीणां बीजं प्राप्तं रजस्यथ । विमुक्तमात्रो नरकात् स्वर्गाद्वापि प्रपद्यते॥ 11.1 ॥
putra uvāca niṣekaṁ mānavaṁ strīṇāṁ bījaṁ prāptaṁ rajasyatha vimuktamātro narakāt svargādvāpi prapadyate
जैसे ही यह जीव नरक अथवा स्वर्ग से मुक्त होता है, वह गर्भाधान के समय स्त्री के रज में पहुँचे मानव-बीज को प्राप्त करता है।
श्लोक 2 (markandeya.11.2)
तेनाभिभूतं तत् स्थैर्यं याति बीजद्वयं पितः । कललत्वं बुद्बुदत्वं ततः पेषित्वमेव च॥ 11.2 ॥
tenābhibhūtaṁ tat sthairyaṁ yāti bījadvayaṁ pitaḥ kalalatvaṁ budbudatvaṁ tataḥ peṣitvameva ca
उस जीव से अभिभूत होकर पिता का वह द्विविध बीज स्थिरता को प्राप्त होता है; फिर वह कलल (लोंदे), फिर बुद्बुद (बुलबुले), और फिर पेशी (मांसपिंड) के रूप में परिणत होता है।
श्लोक 3 (markandeya.11.3)
पेष्यां यथाणुबीजं स्यादङ्कुरस्तद्वदुच्यते । अङ्गानां च तथोत्पत्तिः पञ्चानामनुभागशः॥ 11.3 ॥
peṣyāṁ yathāṇubījaṁ syādaṅkurastadvaducyate aṅgānāṁ ca tathotpattiḥ pañcānāmanubhāgaśaḥ
जैसे पेशी में रखे सूक्ष्म बीज से अंकुर उत्पन्न होता कहा जाता है, वैसे ही उसके पाँचों अंगों की उत्पत्ति भाग-भाग करके होती है।
श्लोक 4 (markandeya.11.4)
उपाङ्गान्यङ्गुली-नेत्र-नासास्य-श्रवणानि च । प्ररोहं यान्ति चाङ्गेभ्यस्तद्वत् तेभ्यो नखादिकम्॥ 11.4 ॥
upāṅgānyaṅgulī-netra-nāsāsya-śravaṇāni ca prarohaṁ yānti cāṅgebhyastadvat tebhyo nakhādikam
अंगुलियाँ, नेत्र, नासिका, मुख और कान — ये उपांग भी उन्हीं अंगों से अंकुरित होते हैं, और उन्हीं से आगे नख आदि भी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 5 (markandeya.11.5)
त्वचि रोमाणि जायन्ते केशाश्चैव ततः परम् । समं समृद्धिमायाति तेनैवोद्भवकोषकम्॥ 11.5 ॥
tvaci romāṇi jāyante keśāścaiva tataḥ param samaṁ samṛddhimāyāti tenaivodbhavakoṣakam
त्वचा पर रोम उत्पन्न होते हैं, और उसके बाद सिर के केश; और इसी के साथ समान रूप से बढ़ती हुई गर्भ की आवरण-झिल्ली भी विकसित होती है।
श्लोक 6 (markandeya.11.6)
नारिकेलफलं यद्वत् सकोषं वृद्धिमृच्छति । तद्वत् प्रयात्यसौ वृद्धिं सकोषोऽधोमुखः स्थितः॥ 11.6 ॥
nārikelaphalaṁ yadvat sakoṣaṁ vṛddhimṛcchati tadvat prayātyasau vṛddhiṁ sakoṣo’dhomukhaḥ sthitaḥ
जैसे नारियल का फल अपने छिलके सहित बढ़ता है, वैसे ही यह जीव भी अपने आवरण सहित, सिर नीचे किए हुए ही वृद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (markandeya.11.7)
तले तु जानु-पार्श्वाभ्यां करौ न्यस्य स वर्धते । अङ्गुष्ठो चोपरि न्यस्तौ जान्वोरग्रे तथाङ्गुली॥ 11.7 ॥
tale tu jānu-pārśvābhyāṁ karau nyasya sa vardhate aṅguṣṭho copari nyastau jānvoragre tathāṅgulī
वह अपने दोनों हाथों को घुटनों और कमर के पास रखकर बढ़ता है; उसके दोनों अंगूठे ऊपर की ओर तथा अंगुलियाँ घुटनों के आगे स्थित रहती हैं।
श्लोक 8 (markandeya.11.8)
जानुपृष्ठे तथा नेत्रे जानुमध्ये च नासिका । स्फिचौ पार्ष्णिद्वयस्थे च बाहुजङ्घे बहिः स्थिते॥ 11.8 ॥
jānupṛṣṭhe tathā netre jānumadhye ca nāsikā sphicau pārṣṇidvayasthe ca bāhujaṅghe bahiḥ sthite
उसके नेत्र घुटनों के पीछे, नासिका घुटनों के बीच में, नितम्ब दोनों एड़ियों पर टिके हुए, और भुजाएँ तथा पिंडलियाँ बाहर की ओर स्थित रहती हैं।
श्लोक 9 (markandeya.11.9)
एवं वृद्धिं क्रमाद्याति जन्तुः स्त्रीगर्भसंस्थितः । अन्यसत्त्वोदरे जन्तोर्यथा रूपं तथा स्थितिः॥ 11.9 ॥
evaṁ vṛddhiṁ kramādyāti jantuḥ strīgarbhasaṁsthitaḥ anyasattvodare jantoryathā rūpaṁ tathā sthitiḥ
इस प्रकार स्त्री के गर्भ में स्थित प्राणी क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता है; जिस अन्य प्राणी के गर्भ में जो जीव रहता है, उसकी स्थिति भी उसी के अनुरूप होती है।
श्लोक 10 (markandeya.11.10)
काठिन्यमग्निना याति भुक्तपीतेन जीवति । पुण्यापुण्याश्रयमयी स्थितिर्जन्तोस्तथोदरे॥ 11.10 ॥
kāṭhinyamagninā yāti bhuktapītena jīvati puṇyāpuṇyāśrayamayī sthitirjantostathodare
वह जठराग्नि से कठोरता को प्राप्त होता है, और माता के खाए-पिए अन्न-जल से जीवित रहता है; इस प्रकार गर्भ में प्राणी की स्थिति पुण्य और पाप के आश्रय पर ही निर्भर रहती है।
श्लोक 11 (markandeya.11.11)
नाडी चाप्यायनी नाम नाभ्यां तस्य निबध्यते । स्त्रीणां तथान्त्रसुषिरे सा निबद्धोपजायते॥ 11.11 ॥
nāḍī cāpyāyanī nāma nābhyāṁ tasya nibadhyate strīṇāṁ tathāntrasuṣire sā nibaddhopajāyate
'आप्यायनी' नामक एक नाड़ी उसकी नाभि से बँधी रहती है, और वह स्त्री की आँतों के एक छिद्र में जाकर बँधी हुई उत्पन्न होती है।
श्लोक 12 (markandeya.11.12)
क्रामन्ति भुक्तपीतानि स्त्रीणां गर्भोदरे यथा । तैराप्यायितदेहोऽसौ जन्तुर्वृद्धिमुपैति वै॥ 11.12 ॥
krāmanti bhuktapītāni strīṇāṁ garbhodare yathā tairāpyāyitadeho’sau janturvṛddhimupaiti vai
स्त्री जो कुछ खाती-पीती है, वह उसी नाड़ी के द्वारा गर्भ में पहुँचता है; उससे पुष्ट होकर ही वह प्राणी शरीर की वृद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (markandeya.11.13)
स्मृतीस्तस्य प्रयान्त्यस्य बह्व्यः संसारभूमयः । ततो निर्वेदमायाति पीड्यमान इतस्ततः॥ 11.13 ॥
smṛtīstasya prayāntyasya bahvyaḥ saṁsārabhūmayaḥ tato nirvedamāyāti pīḍyamāna itastataḥ
उसे अपने पूर्वजन्मों की अनेक स्मृतियाँ प्राप्त होती हैं; और इधर-उधर से पीड़ित होते हुए वह वैराग्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (markandeya.11.14)
पुनर्नैवं करिष्यामि मुक्तमात्र इहोदरात् । तथा तथा यतिष्यामि गर्भं नाप्स्याम्यहं यथा॥ 11.14 ॥
punarnaivaṁ kariṣyāmi muktamātra ihodarāt tathā tathā yatiṣyāmi garbhaṁ nāpsyāmyahaṁ yathā
वह सोचता है — 'इस उदर से मुक्त होते ही मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगा; मैं हर प्रकार से यत्न करूँगा जिससे मुझे पुनः गर्भ प्राप्त न हो।'
श्लोक 15 (markandeya.11.15)
इति चिन्तयते स्मृत्वा जन्मदुःखशतानि वै । यानि पूर्वानुभूतानि दैवभूतानि यानि वै॥ 11.15 ॥
iti cintayate smṛtvā janmaduḥkhaśatāni vai yāni pūrvānubhūtāni daivabhūtāni yāni vai
पूर्वजन्मों में भोगे हुए और भाग्यवश उत्पन्न हुए सैकड़ों जन्म-दुःखों का स्मरण करते हुए वह इस प्रकार चिन्तन करता है।
श्लोक 16 (markandeya.11.16)
ततः कालक्रमाज्जन्तुः परिवर्तत्यधोमुखः । नवमे दशमे वापि मासि सज्जयते यतः॥ 11.16 ॥
tataḥ kālakramājjantuḥ parivartatyadhomukhaḥ navame daśame vāpi māsi sajjayate yataḥ
फिर समय के क्रम से वह प्राणी उलट जाता है और सिर नीचे कर लेता है, क्योंकि नवें या दसवें महीने में वह जन्म लेने के लिए तैयार हो जाता है।
श्लोक 17 (markandeya.11.17)
निष्क्रम्यमाणो वातेन प्राजापत्येन पीड्यते । निष्क्राम्यते च विलपन् हृदि दुःखनिपीडितः॥ 11.17 ॥
niṣkramyamāṇo vātena prājāpatyena pīḍyate niṣkrāmyate ca vilapan hṛdi duḥkhanipīḍitaḥ
प्रजापति के वायु द्वारा बाहर निकाला जाता हुआ वह पीड़ित होता है, और हृदय में दुःख से पीड़ित होकर रोता हुआ बाहर निकलता है।
श्लोक 18 (markandeya.11.18)
निष्क्रान्तश्चोदरान्मूर्च्छामसह्यां प्रतिपद्यते । प्राप्नोति चेतनां चासौ वायुस्पर्शसमन्वितः॥ 11.18 ॥
niṣkrāntaścodarānmūrcchāmasahyāṁ pratipadyate prāpnoti cetanāṁ cāsau vāyusparśasamanvitaḥ
गर्भ से बाहर निकलते ही वह असह्य मूर्च्छा को प्राप्त होता है; फिर बाहरी वायु के स्पर्श से उसे पुनः चेतना प्राप्त होती है।
श्लोक 19 (markandeya.11.19)
ततस्तं वैष्णवी माया समास्कन्दति मोहिनी । तया विमोहितात्मासौ ज्ञानभ्रंशमवाप्नुते॥ 11.19 ॥
tatastaṁ vaiṣṇavī māyā samāskandati mohinī tayā vimohitātmāsau jñānabhraṁśamavāpnute
तब भगवान विष्णु की मोहमयी माया उसे घेर लेती है; उससे मोहित होकर उसका पूर्व-ज्ञान नष्ट हो जाता है।
श्लोक 20 (markandeya.11.20)
भ्रष्टज्ञानो बालभावं ततो जन्तुः प्रपद्यते । ततः कौमारकावस्थां यौवनं वृद्धतामपि॥ 11.20 ॥
bhraṣṭajñāno bālabhāvaṁ tato jantuḥ prapadyate tataḥ kaumārakāvasthāṁ yauvanaṁ vṛddhatāmapi
ज्ञान से भ्रष्ट हुआ वह प्राणी तब बाल-अवस्था को प्राप्त होता है; फिर क्रमशः कुमार-अवस्था, यौवन और वृद्धावस्था को भी प्राप्त होता है।
श्लोक 21 (markandeya.11.21)
पुनश्च मरणं तद्वज्जन्म चाप्नोति मानवः । ततः संसारचक्रेऽस्मिन् भ्राम्यते घटियन्त्रवत्॥ 11.21 ॥
punaśca maraṇaṁ tadvajjanma cāpnoti mānavaḥ tataḥ saṁsāracakre’smin bhrāmyate ghaṭiyantravat
फिर मनुष्य को वैसे ही मृत्यु और पुनः जन्म प्राप्त होता है; इस प्रकार वह इस संसार-चक्र में घट-यंत्र (रहट) की भाँति घूमता रहता है।
श्लोक 22 (markandeya.11.22)
कदाचित् स्वर्गमाप्नोति कदाचिन्निरयं नरः । नरकं चैव स्वर्गं च कदाचिच्च मृतोऽश्नुते॥ 11.22 ॥
kadācit svargamāpnoti kadācinnirayaṁ naraḥ narakaṁ caiva svargaṁ ca kadācicca mṛto’śnute
कभी मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है, कभी नरक को; और कभी मरने के बाद वह नरक और स्वर्ग दोनों का ही क्रमशः अनुभव करता है।
श्लोक 23 (markandeya.11.23)
कदाचिदत्रैव पुनर्जातः स्वं कर्म सोऽश्नुते । कदाचिद्भुक्तकर्मा च मृतः स्वल्पेन गच्छति॥ 11.23 ॥
kadācidatraiva punarjātaḥ svaṁ karma so’śnute kadācidbhuktakarmā ca mṛtaḥ svalpena gacchati
कभी यहीं पुनः जन्म लेकर वह अपने ही कर्म का फल भोगता है; कभी कर्मफल भोग चुकने पर मरकर वह थोड़े-से शेष कर्म के साथ आगे बढ़ता है।
श्लोक 24 (markandeya.11.24)
कदाचिदल्पैश्च ततो जायतेऽत्र शुभाशुभैः । स्वर्लोके नरके चैव भुक्तप्रायो द्विजोत्तम॥ 11.24 ॥
kadācidalpaiśca tato jāyate’tra śubhāśubhaiḥ svarloke narake caiva bhuktaprāyo dvijottama
हे द्विजोत्तम! कभी स्वर्गलोक अथवा नरक में प्रायः कर्मफल भोग चुकने पर, वह थोड़े-से शुभ-अशुभ कर्मों के साथ यहाँ फिर जन्म लेता है।
श्लोक 25 (markandeya.11.25)
नरकेषु महद्दुःखमेतद् यत् स्वर्गवासिनः । दृश्यन्ते तात मोदन्ते पात्यमानाश्च नारकाः॥ 11.25 ॥
narakeṣu mahadduḥkhametad yat svargavāsinaḥ dṛśyante tāta modante pātyamānāśca nārakāḥ
नरकों में यह भी एक बड़ा दुःख है, तात! कि नरकवासी, यातना में गिराए जाते हुए भी, स्वर्गवासियों को आनन्द मनाते हुए देखते हैं।
श्लोक 26 (markandeya.11.26)
स्वर्गेऽपि दुःखमतुलं यदारोहणकालतः । प्रभृत्यहं पतिष्यामीत्येतन्मनसि वर्तते॥ 11.26 ॥
svarge’pi duḥkhamatulaṁ yadārohaṇakālataḥ prabhṛtyahaṁ patiṣyāmītyetanmanasi vartate
स्वर्ग में भी यह अतुलनीय दुःख है कि वहाँ पहुँचने के क्षण से ही यह विचार मन में बना रहता है — 'मैं एक दिन अवश्य गिरूँगा।'
श्लोक 27 (markandeya.11.27)
नारकांश्चैव संप्रेक्ष्य महद्दुःखमवाप्यते । एतां गतिमहं गन्तेत्यहर्निशमनिर्वृतः॥ 11.27 ॥
nārakāṁścaiva saṁprekṣya mahadduḥkhamavāpyate etāṁ gatimahaṁ gantetyaharniśamanirvṛtaḥ
और नरकवासियों को देखकर भी बड़ा दुःख होता है — 'मुझे भी अंततः इसी गति को प्राप्त होना है' — इस प्रकार वे रात-दिन अशांत रहते हैं।
श्लोक 28 (markandeya.11.28)
गर्भवासे महद्दुःखं जायमानस्य योनितः । जातस्य बलाभावे च वृद्धत्वे दुःखमेव च॥ 11.28 ॥
garbhavāse mahadduḥkhaṁ jāyamānasya yonitaḥ jātasya balābhāve ca vṛddhatve duḥkhameva ca
गर्भवास में महान दुःख है, योनि से जन्म लेने में भी दुःख है; जन्म लेने पर बल न होने का दुःख है, और वृद्धावस्था में भी दुःख है।
श्लोक 29 (markandeya.11.29)
कामेर्ष्या-क्रोधसम्बन्धं यौवने चातिदुः सहम् । दुःखप्राया वृद्धता च मरणे दुःखमुत्तमम्॥ 11.29 ॥
kāmerṣyā-krodhasambandhaṁ yauvane cātiduḥ saham duḥkhaprāyā vṛddhatā ca maraṇe duḥkhamuttamam
यौवन में काम, ईर्ष्या और क्रोध से जुड़ा असह्य दुःख होता है; वृद्धावस्था प्रायः दुःखमय होती है, और मृत्यु में सर्वोच्च दुःख होता है।
श्लोक 30 (markandeya.11.30)
कृष्यणमाणस्य याम्यैश्च नरकेषु च पात्यतः । पुनश्च गर्भो जन्माथ मरणं नरकस्तथा॥ 11.30 ॥
kṛṣyaṇamāṇasya yāmyaiśca narakeṣu ca pātyataḥ punaśca garbho janmātha maraṇaṁ narakastathā
यमदूतों द्वारा घसीटे जाने और नरकों में गिराए जाने का दुःख भी है; फिर पुनः गर्भ, फिर जन्म, फिर मृत्यु, और फिर नरक — यही क्रम चलता रहता है।
श्लोक 31 (markandeya.11.31)
एवं संसारचक्रेऽस्मिन् जन्तवो घटियन्त्रवत् । भ्राम्यन्ते प्राकृतैर्बन्धैर्बद्ध्वा बाध्यन्ति चासकृत्॥ 11.31 ॥
evaṁ saṁsāracakre’smin jantavo ghaṭiyantravat bhrāmyante prākṛtairbandhairbaddhvā bādhyanti cāsakṛt
इस प्रकार इस संसार-चक्र में प्राणी घट-यंत्र की भाँति घूमते रहते हैं; प्रकृति के बंधनों में बँधकर वे बार-बार पीड़ित होते हैं।
श्लोक 32 (markandeya.11.32)
नास्ति तात ! सुखं किञ्चिदत्र दुःखशताकुले । तस्मान्मोक्षाय यतता कथं सेव्या मया त्रयी॥ 11.32 ॥
nāsti tāta ! sukhaṁ kiñcidatra duḥkhaśatākule tasmānmokṣāya yatatā kathaṁ sevyā mayā trayī
हे तात! सैकड़ों दुःखों से भरे इस संसार में कोई सुख नहीं है; इसलिए मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हुए मुझे त्रयी (वैदिक कर्मकांड) का आश्रय क्यों लेना चाहिए?