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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 111

नाभाग का चरित

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (markandeya.111.1)

मार्कण्डेय उवाच निवृत्तोऽसौ ततो भूपः संग्रामात्स्वसुतेन वै । उपयेमे च तां वैश्यतनयां सोऽपि तत्सुतः ॥ 111.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca nivṛtto'sau tato bhūpaḥ saṁgrāmātsvasutena vai upayeme ca tāṁ vaiśyatanayāṁ so'pi tatsutaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब वह भूपति अपने ही पुत्र के साथ युद्ध से निवृत्त हो गया; और वह भी—अर्थात् उस राजा (दिष्ट) का पुत्र नाभाग—उस वैश्य-कन्या को ब्याह लाया।

श्लोक 2 (markandeya.111.2)

ततः स वैश्यतां प्राप्तः समुपेत्याह पार्थिवम् । भूपाल यन्मया कार्यं तत्ममादिश्यतां मम ॥ 111.2 ॥

tataḥ sa vaiśyatāṁ prāptaḥ samupetyāha pārthivam bhūpāla yanmayā kāryaṁ tatmamādiśyatāṁ mama

तब वैश्यत्व को प्राप्त हुए उस नाभाग ने राजा के पास जाकर कहा—"हे राजन्, मुझे जो कार्य करना है, वह मुझे आदेश दीजिए।"

श्लोक 3 (markandeya.111.3)

राजोवाच धर्माधिकरणे युक्ता बाभ्रव्याद्यास्तपस्विनः । यदस्य कर्मधर्माय तद्वदन्तु तथाचर ॥ 111.3 ॥

rājovāca dharmādhikaraṇe yuktā bābhravyādyāstapasvinaḥ yadasya karmadharmāya tadvadantu tathācara

राजा ने कहा—"धर्म के अधिकार में नियुक्त बाभ्रव्य आदि तपस्वी हैं; इसके कर्म-धर्म के लिए वे जो कहें, वैसा ही आचरण करो।"

श्लोक 4 (markandeya.111.4)

मार्कण्डेय उवाच ततस्ते मुनयस्तस्य पाशुपाल्यं तथा कृषिम् । वाणिज्यं च परं धर्ममाचचख्युः सभासदः ॥ 111.4 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataste munayastasya pāśupālyaṁ tathā kṛṣim vāṇijyaṁ ca paraṁ dharmamācacakhyuḥ sabhāsadaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब सभा में बैठे उन मुनियों ने उसे पशुपालन, कृषि तथा वाणिज्य को उसका परम धर्म बताया।

श्लोक 5 (markandeya.111.5)

तथैव चक्रे स सुतस्तस्य राज्ञो यथोदितम् । तैर्धर्मवादिभिर्धर्मं च्युतस्य निजधर्मतः ॥ 111.5 ॥

tathaiva cakre sa sutastasya rājño yathoditam tairdharmavādibhirdharmaṁ cyutasya nijadharmataḥ

और उस राजा के पुत्र ने वैसा ही किया जैसा उन धर्मवादियों ने कहा था, क्योंकि वह अपने ही (क्षत्रिय) धर्म से च्युत हो चुका था।

श्लोक 6 (markandeya.111.6)

तस्य पुत्रस्ततो जातो नाम्ना ख्यातो भलन्दनः । स मात्रा प्रहितो गच्छद्गोपालो भव पुत्रक ॥ 111.6 ॥

tasya putrastato jāto nāmnā khyāto bhalandanaḥ sa mātrā prahito gacchadgopālo bhava putraka

उससे तब भलन्दन नाम से विख्यात एक पुत्र उत्पन्न हुआ; माता ने उसे भेजते हुए कहा—"जाओ पुत्र, गोपाल बनो।"

श्लोक 7 (markandeya.111.7)

मात्रा तथा नियुक्तोऽथ प्रणिपत्य स्वमातरम् । राजर्षिमगमन्नीपं हिमवत्पर्वताश्रयम् ॥ 111.7 ॥

mātrā tathā niyukto'tha praṇipatya svamātaram rājarṣimagamannīpaṁ himavatparvatāśrayam

माता द्वारा इस प्रकार नियुक्त होकर उसने अपनी माता को प्रणाम किया, और हिमवत् पर्वत के आश्रय में रहने वाले राजर्षि नीप के पास गया।

श्लोक 8 (markandeya.111.8)

तं समेत्य च जग्राह तस्य पादौ यथाविधि । प्रणिपत्याह चैवैनं राजर्षिं स भलन्दनः ॥ 111.8 ॥

taṁ sametya ca jagrāha tasya pādau yathāvidhi praṇipatyāha caivainaṁ rājarṣiṁ sa bhalandanaḥ

उनके पास पहुँचकर विधिपूर्वक उनके चरण पकड़े, और प्रणाम करके उस भलन्दन ने उस राजर्षि से यह कहा—

श्लोक 9 (markandeya.111.9)

आदिष्टो भगवन्मात्रा गोपालस्त्वं भवेति वै । मया च पालनीया क्ष्मा तस्याः स्वीकरणं कथम् ॥ 111.9 ॥

ādiṣṭo bhagavanmātrā gopālastvaṁ bhaveti vai mayā ca pālanīyā kṣmā tasyāḥ svīkaraṇaṁ katham

"हे भगवन्, माता ने मुझे आदेश दिया है कि तुम गोपाल बनो; और मुझे यह पृथ्वी भी पालनीय है—इसे कैसे स्वीकार करूँ?

श्लोक 10 (markandeya.111.10)

मया हि गौः पालनीया सा यदा स्वीकृता भवेत् । आक्रान्ता बलवद्भिः सा दायादैः पृथिवी मम ॥ 111.10 ॥

mayā hi gauḥ pālanīyā sā yadā svīkṛtā bhavet ākrāntā balavadbhiḥ sā dāyādaiḥ pṛthivī mama

क्योंकि जब तक मुझसे पालनीय वह गाय स्वीकार की जाएगी, तब तक मेरी यह पृथ्वी बलवान दायादों द्वारा आक्रांत हो चुकी है।

श्लोक 11 (markandeya.111.11)

तां यथा प्राप्नुयां पृथ्वीं त्वत्प्रसादादहं विभो । तथादिश करिष्यामि तवाज्ञां प्रणतोऽस्मि ते ॥ 111.11 ॥

tāṁ yathā prāpnuyāṁ pṛthvīṁ tvatprasādādahaṁ vibho tathādiśa kariṣyāmi tavājñāṁ praṇato'smi te

हे विभो, आपकी कृपा से मैं जैसे उस पृथ्वी को प्राप्त कर सकूँ, वैसा आदेश दीजिए; मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, मैं आपको प्रणत हूँ।"

श्लोक 12 (markandeya.111.12)

मार्कण्डेय उवाच ततः स नीपो राजर्षिस्तस्मै निरवशेषतः । भलन्दाय ददौ ब्रह्मन्नस्त्रग्रामं महात्मने ॥ 111.12 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ sa nīpo rājarṣistasmai niravaśeṣataḥ bhalandāya dadau brahmannastragrāmaṁ mahātmane

मार्कण्डेय ने कहा—तब उस राजर्षि नीप ने, हे ब्रह्मन्, उस महात्मा भलन्दन को समस्त अस्त्र-विद्या पूर्णरूप से प्रदान की।

श्लोक 13 (markandeya.111.13)

प्राप्तास्त्रविद्यः स ययौ पितृव्यतनयान्द्विज । वसुरातादिकान्पुत्रानादिष्टः स महात्मना ॥ 111.13 ॥

prāptāstravidyaḥ sa yayau pitṛvyatanayāndvija vasurātādikānputrānādiṣṭaḥ sa mahātmanā

हे द्विज, अस्त्र-विद्या प्राप्त करके, उस महात्मा की आज्ञा से वह अपने चाचा के पुत्रों—वसुरात आदि—के पास गया।

श्लोक 14 (markandeya.111.14)

अयाचत स राज्यार्धं पितृपैतामहोचितम् । ते चोचुर्वैश्यपुत्रस्त्वं कथं भोक्ष्यसि मेदिनीम् ॥ 111.14 ॥

ayācata sa rājyārdhaṁ pitṛpaitāmahocitam te cocurvaiśyaputrastvaṁ kathaṁ bhokṣyasi medinīm

उसने पिता और पितामह के योग्य आधा राज्य माँगा; तब उन्होंने कहा—"तुम वैश्य-पुत्र होकर इस पृथ्वी को कैसे भोगोगे?"

श्लोक 15 (markandeya.111.15)

ततस्तैर्युद्धमभवद्भलन्दस्यात्मवंशजैः । वसुरातादिभिः क्रुद्धैः कृतास्त्रस्यास्त्रवर्षिभिः ॥ 111.15 ॥

tatastairyuddhamabhavadbhalandasyātmavaṁśajaiḥ vasurātādibhiḥ kruddhaiḥ kṛtāstrasyāstravarṣibhiḥ

तब उसका और उसी वंश में उत्पन्न, क्रुद्ध, अस्त्रकुशल, बाणवर्षा करने वाले वसुरात आदि का युद्ध हुआ।

श्लोक 16 (markandeya.111.16)

स जित्वा तानशेषांस्तु शस्त्रविक्षतसैनिकान् । जहार पृथिवी तेषां धर्मयुद्धेन धर्मवित् ॥ 111.16 ॥

sa jitvā tānaśeṣāṁstu śastravikṣatasainikān jahāra pṛthivī teṣāṁ dharmayuddhena dharmavit

उन सबको जीतकर, उनके सैनिकों को शस्त्रों से क्षत-विक्षत कर, धर्मज्ञ उस भलन्दन ने धर्मयुद्ध द्वारा उनकी पृथ्वी हर ली।

श्लोक 17 (markandeya.111.17)

स निर्जितारिः सकलां पृथ्वीं राज्यं तथा पितुः । निवेदयामास ततस्तत्पिता जगृहे न च । । प्रत्युवाच स तं पुत्रं भार्यायाः पुरतस्तदा ॥ 111.17 ॥

sa nirjitāriḥ sakalāṁ pṛthvīṁ rājyaṁ tathā pituḥ nivedayāmāsa tatastatpitā jagṛhe na ca | pratyuvāca sa taṁ putraṁ bhāryāyāḥ puratastadā

शत्रुओं को जीतकर उसने समस्त पृथ्वी और पिता का राज्य भी निवेदित किया; परंतु उसके पिता ने उसे स्वीकार नहीं किया, और तब पत्नी के समक्ष उस पुत्र को उत्तर दिया।

श्लोक 18 (markandeya.111.18)

नाभाग उवाच भलन्द राज्यमेतत्ते क्रियतां पूर्वजैः कृतम् ॥ 111.18 ॥

nābhāga uvāca bhalanda rājyametatte kriyatāṁ pūrvajaiḥ kṛtam

नाभाग ने कहा—"हे भलन्दन, यह राज्य, जो पूर्वजों द्वारा बनाया गया था, तुम्हीं धारण करो।

श्लोक 19 (markandeya.111.19)

अहं न कृतवान्राज्यं नासामर्थ्ययुतः पुरा । वैश्यतां तु पुरस्कृत्य तथैवाज्ञाकरः पितुः ॥ 111.19 ॥

ahaṁ na kṛtavānrājyaṁ nāsāmarthyayutaḥ purā vaiśyatāṁ tu puraskṛtya tathaivājñākaraḥ pituḥ

मैंने राज्य नहीं किया, क्योंकि पहले मैं उसके योग्य सामर्थ्य से युक्त नहीं था; वैश्यत्व को आगे रखकर मैं वैसे ही पिता की आज्ञा का पालन करने वाला बना रहा।

श्लोक 20 (markandeya.111.20)

कृत्वाऽप्रीतिं पितुरहं वैश्यकन्यापरिग्रहात् । न पुण्यलोकभाग्राजा यावदाभूतसम्प्लवम् ॥ 111.20 ॥

kṛtvā'prītiṁ piturahaṁ vaiśyakanyāparigrahāt na puṇyalokabhāgrājā yāvadābhūtasamplavam

वैश्य-कन्या को ग्रहण करके पिता को अप्रसन्न करने के कारण मैं प्रलयकाल तक राजा के रूप में पुण्यलोकों का भागी नहीं हूँ।

श्लोक 21 (markandeya.111.21)

उल्लंघ्याज्ञां पुनस्तस्य पालयामि महीं यदि । नास्ति मोक्षस्ततो नूनं मम कल्पशतैरपि ॥ 111.21 ॥

ullaṁghyājñāṁ punastasya pālayāmi mahīṁ yadi nāsti mokṣastato nūnaṁ mama kalpaśatairapi

यदि मैं पुनः उनकी आज्ञा का उल्लंघन करके पृथ्वी का पालन करूँ, तो निश्चय ही सैकड़ों कल्पों में भी मुझे मोक्ष नहीं मिलेगा।

श्लोक 22 (markandeya.111.22)

न चापि युक्तं त्वद्बाहुनिर्जितं मम मानिनः । राज्यं भोक्तुमनीहस्य दुर्बलस्येव कस्यचित् ॥ 111.22 ॥

na cāpi yuktaṁ tvadbāhunirjitaṁ mama māninaḥ rājyaṁ bhoktumanīhasya durbalasyeva kasyacit

और अभिमानी मेरे लिए यह भी उचित नहीं कि मैं, स्वयं बिना प्रयास किए, किसी दुर्बल पुरुष के समान, तुम्हारी भुजाओं से जीता हुआ राज्य भोगूँ।

श्लोक 23 (markandeya.111.23)

राज्यं कुरु स्वयं पुत्र दायादेभ्यो विमुञ्च वा । ममाज्ञापालनं शस्तं पितुर्न क्षितिपालनम् ॥ 111.23 ॥

rājyaṁ kuru svayaṁ putra dāyādebhyo vimuñca vā mamājñāpālanaṁ śastaṁ piturna kṣitipālanam

हे पुत्र, तुम स्वयं राज्य करो, अथवा इसे बंधुजनों में बाँट दो; मेरे लिए तो पिता की आज्ञा का पालन ही श्रेष्ठ है, पृथ्वी का पालन नहीं।"

श्लोक 24 (markandeya.111.24)

मार्कण्डेय उवाच ततः प्रहस्य तद्भार्या सुप्रभा नाम भामिनी । प्रत्युवाच पतिं भूप गृह्यतां राज्यमूर्जितम् ॥ 111.24 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ prahasya tadbhāryā suprabhā nāma bhāminī pratyuvāca patiṁ bhūpa gṛhyatāṁ rājyamūrjitam

मार्कण्डेय ने कहा—तब उसकी सुप्रभा नामक सुंदरी पत्नी ने हँसते हुए अपने पति से कहा—"हे राजन्, यह विशाल राज्य ग्रहण किया जाए!

श्लोक 25 (markandeya.111.25)

न त्वं वैश्यो न चैवाहं जाता वैश्यकुले नृप । क्षत्रियस्त्वं तथैवाहं क्षत्रियाणां कुलोद्भवा ॥ 111.25 ॥

na tvaṁ vaiśyo na caivāhaṁ jātā vaiśyakule nṛpa kṣatriyastvaṁ tathaivāhaṁ kṣatriyāṇāṁ kulodbhavā

तुम वैश्य नहीं हो, और न ही मैं वैश्य-कुल में उत्पन्न हूँ, हे राजन्; तुम क्षत्रिय हो, और मैं भी क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हूँ।

श्लोक 26 (markandeya.111.26)

पूर्वमासीन्महीपालः सुदेव इति विश्रुतः । तस्याभूच्च सखा राज्ञो धूम्राश्वस्य सुतो नलः ॥ 111.26 ॥

pūrvamāsīnmahīpālaḥ sudeva iti viśrutaḥ tasyābhūcca sakhā rājño dhūmrāśvasya suto nalaḥ

पूर्वकाल में सुदेव नाम से प्रसिद्ध एक राजा था; उसका मित्र था धूम्राश्व राजा का पुत्र नल।

श्लोक 27 (markandeya.111.27)

स तेन सख्या सहितो जगामाम्रवनं वनम् । पत्नीभिः स समं रन्तुं माधवे मासि पार्थिव ॥ 111.27 ॥

sa tena sakhyā sahito jagāmāmravanaṁ vanam patnībhiḥ sa samaṁ rantuṁ mādhave māsi pārthiva

हे राजन्, वह उस मित्र के साथ अपनी पत्नियों सहित विहार करने के लिए वसंत के माधव मास में आम्रवन नामक वन में गया।

श्लोक 28 (markandeya.111.28)

ततः पानान्यनेकानि भक्ष्याणि बुभुजे तदा । भार्याभिः सहितस्ताभिस्तेन सख्या समन्वितः ॥ 111.28 ॥

tataḥ pānānyanekāni bhakṣyāṇi bubhuje tadā bhāryābhiḥ sahitastābhistena sakhyā samanvitaḥ

तब उसने अपनी उन पत्नियों तथा उस मित्र के साथ मिलकर अनेक प्रकार के पेय और भोज्य पदार्थों का सेवन किया।

श्लोक 29 (markandeya.111.29)

ततः पुष्करिणीतीरे ददर्शातिमनोरमाम् । पत्नीं च्यवनपुत्रस्य प्रमतेः पार्थिवात्मजाम् ॥ 111.29 ॥

tataḥ puṣkariṇītīre dadarśātimanoramām patnīṁ cyavanaputrasya pramateḥ pārthivātmajām

तब उसने एक सरोवर के तट पर च्यवन के पुत्र प्रमति की, राजकुमारी, अत्यंत मनोहर पत्नी को देखा।

श्लोक 30 (markandeya.111.30)

सखा तस्य नलो मत्तो जगृहे तां च दुर्मतिः । पश्यतस्तस्य राज्ञश्च त्रातत्रातेति वादिनीम् ॥ 111.30 ॥

sakhā tasya nalo matto jagṛhe tāṁ ca durmatiḥ paśyatastasya rājñaśca trātatrāteti vādinīm

उसके मित्र मदमत्त दुर्बुद्धि नल ने, राजा सुदेव के देखते-देखते ही, "बचाओ, बचाओ" कहती हुई उस स्त्री को पकड़ लिया।

श्लोक 31 (markandeya.111.31)

आक्रन्दितं निशम्यैव स तस्याः प्रमतिः पतिः । आजगाम त्वरायुक्तः किमेतदिति वै वदन् ॥ 111.31 ॥

ākranditaṁ niśamyaiva sa tasyāḥ pramatiḥ patiḥ ājagāma tvarāyuktaḥ kimetaditi vai vadan

उसकी पुकार सुनते ही उसका पति प्रमति "यह क्या है" कहता हुआ शीघ्रता से वहाँ आया।

श्लोक 32 (markandeya.111.32)

ततो ददर्श राजानं सुदेवं तत्र संस्थितम् । गृहीतां च तथा पत्नीं नलेन सुदुरात्मना ॥ 111.32 ॥

tato dadarśa rājānaṁ sudevaṁ tatra saṁsthitam gṛhītāṁ ca tathā patnīṁ nalena sudurātmanā

तब उसने वहाँ खड़े राजा सुदेव को, और अत्यंत दुरात्मा नल द्वारा पकड़ी गई अपनी पत्नी को देखा।

श्लोक 33 (markandeya.111.33)

ततः सुदेवं प्रमतिः प्राहायं शास्यतामिति । त्वं च शास्ता भवद्राज्ये दुष्टश्चायं नलो नृप ॥ 111.33 ॥

tataḥ sudevaṁ pramatiḥ prāhāyaṁ śāsyatāmiti tvaṁ ca śāstā bhavadrājye duṣṭaścāyaṁ nalo nṛpa

तब प्रमति ने सुदेव से कहा—"इसे दंड दिया जाए! तुम अपने राज्य में शासक हो, और यह नल तो दुष्ट है, हे राजन्!"

श्लोक 34 (markandeya.111.34)

मार्कण्डेय उवाच तस्यार्तस्य वचः श्रुत्वा सुदेवो नलगौरवात् । प्राह वैश्योऽस्मि गच्छान्यं क्षत्रियं त्राणकारणात् ॥ 111.34 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tasyārtasya vacaḥ śrutvā sudevo nalagauravāt prāha vaiśyo'smi gacchānyaṁ kṣatriyaṁ trāṇakāraṇāt

मार्कण्डेय ने कहा—उस पीड़ित के वचन सुनकर सुदेव ने नल के प्रति सम्मान के कारण कहा—"मैं तो वैश्य हूँ, रक्षा के लिए किसी अन्य क्षत्रिय के पास जाओ।"

श्लोक 35 (markandeya.111.35)

ततः स प्रमतिः क्रुद्धस्तेजसा निर्दहन्निव । प्रत्युवाचाथ राजानं वैश्योऽस्मीत्यभिभाषिणम् ॥ 111.35 ॥

tataḥ sa pramatiḥ kruddhastejasā nirdahanniva pratyuvācātha rājānaṁ vaiśyo'smītyabhibhāṣiṇam

तब वह प्रमति क्रुद्ध होकर, मानो अपने तेज से जला देने वाला, वैश्य कहने वाले उस राजा को उत्तर देने लगा—

श्लोक 36 (markandeya.111.36)

प्रमतिरुवाच एवमस्तु भवान्वैश्यः क्षत्रियः क्षतरक्षणात् । क्षत्रियैर्धार्यते शस्त्रं नार्त्तशब्दो भवेदिति । । स त्वं न क्षत्रियो भावी वैश्य एव कुलाधमः ॥ 111.36 ॥

pramatiruvāca evamastu bhavānvaiśyaḥ kṣatriyaḥ kṣatarakṣaṇāt kṣatriyairdhāryate śastraṁ nārttaśabdo bhavediti | sa tvaṁ na kṣatriyo bhāvī vaiśya eva kulādhamaḥ

प्रमति ने कहा—"ऐसा ही हो, तुम वैश्य बन जाओ! क्षत्रिय वही है जो घायल की रक्षा करता है; क्षत्रियों द्वारा शस्त्र इसीलिए धारण किया जाता है कि पीड़ा का शब्द न उठे। इसलिए तुम भविष्य में क्षत्रिय नहीं, बल्कि कुल में अधम वैश्य ही रहोगे।"

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