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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 113

भलन्दन-वत्सप्री-चरित

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

श्लोक 1 (markandeya.113.1)

मार्कण्डेय उवाच इति तस्या वचः श्रुत्वा पुत्रस्य स च पार्थिवः । पुनः प्रोवाच धर्मज्ञस्तां पत्नीं तनयं तथा ॥ 113.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti tasyā vacaḥ śrutvā putrasya sa ca pārthivaḥ punaḥ provāca dharmajñastāṁ patnīṁ tanayaṁ tathā

मार्कण्डेय ने कहा—अपनी पत्नी के ये वचन सुनकर धर्मज्ञ उस राजा ने पुनः अपनी पत्नी तथा पुत्र से कहा।

श्लोक 2 (markandeya.113.2)

यन्मया पितुरादेशात्त्यक्तं राज्यं न तत्पुनः । ग्रहीष्यामि वृथोक्तेन किमात्मा क्लिश्यते त्वया ॥ 113.2 ॥

yanmayā piturādeśāttyaktaṁ rājyaṁ na tatpunaḥ grahīṣyāmi vṛthoktena kimātmā kliśyate tvayā

"जो राज्य मैंने पिता की आज्ञा से त्याग दिया, उसे मैं पुनः ग्रहण नहीं करूँगा; व्यर्थ कहने से क्या लाभ, तुम अपने आपको क्यों कष्ट देती हो?

श्लोक 3 (markandeya.113.3)

अहं ते सम्प्रदास्यामि करं वैश्यव्रते स्थितः । भुङ्क्ष्व राज्यमशेषं त्वमिच्छया वा परित्यज ॥ 113.3 ॥

ahaṁ te sampradāsyāmi karaṁ vaiśyavrate sthitaḥ bhuṅkṣva rājyamaśeṣaṁ tvamicchayā vā parityaja

मैं वैश्य-व्रत में स्थित रहते हुए तुम्हें कर दूँगा; तुम इस समस्त राज्य को भोगो, अथवा चाहो तो इसे त्याग दो।"

श्लोक 4 (markandeya.113.4)

इत्युक्तः स तदा पित्रा राजपुत्रो भलनन्दनः । चकार राज्यं धर्मेण तद्वद्दारपरिग्रहम् ॥ 113.4 ॥

ityuktaḥ sa tadā pitrā rājaputro bhalanandanaḥ cakāra rājyaṁ dharmeṇa tadvaddāraparigraham

तब पिता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस राजपुत्र भलनन्दन ने धर्मपूर्वक राज्य किया, और उसी प्रकार विवाह भी किया।

श्लोक 5 (markandeya.113.5)

अव्याहतं तस्य चक्रं पृथिव्यामभवद्द्विज । न चाधर्मे मनो भूपास्तस्य सर्वेऽभवन्वशे ॥ 113.5 ॥

avyāhataṁ tasya cakraṁ pṛthivyāmabhavaddvija na cādharme mano bhūpāstasya sarve'bhavanvaśe

हे द्विज, पृथ्वी पर उसका शासन-चक्र अबाधित रहा; कोई भी राजा अधर्म में मन नहीं लगाता था, सभी उसके वश में हो गए थे।

श्लोक 6 (markandeya.113.6)

तेनेष्टो विधिवद्यज्ञः सम्यक्शास्ति वसुन्धराम् । स एवैकोऽभवद्भर्त्ता पृथिव्यामरिशासनः ॥ 113.6 ॥

teneṣṭo vidhivadyajñaḥ samyakśāsti vasundharām sa evaiko'bhavadbharttā pṛthivyāmariśāsanaḥ

उसने विधिपूर्वक यज्ञ किए, और पृथ्वी का भलीभाँति शासन किया; वह अकेला ही पृथ्वी का स्वामी और शत्रुओं का शासक बना।

श्लोक 7 (markandeya.113.7)

अजायत सुतस्तस्य वत्सप्रीरिति नामतः । पितातिशयितो येन गुणौघेन महात्मना ॥ 113.7 ॥

ajāyata sutastasya vatsaprīriti nāmataḥ pitātiśayito yena guṇaughena mahātmanā

उसका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, वत्सप्री नाम से, जिसने अपने गुणों की अधिकता से महात्मा पिता को भी पीछे छोड़ दिया।

श्लोक 8 (markandeya.113.8)

तस्यापि भार्या सौनन्दा विदूरथसुताऽभवत् । पतिव्रता महाभागा सा प्राप्ता तेन शौर्यतः । । हत्वा पुरन्दररिपुं कुजंभं दितिजेश्वरम् ॥ 113.8 ॥

tasyāpi bhāryā saunandā vidūrathasutā'bhavat pativratā mahābhāgā sā prāptā tena śauryataḥ | hatvā purandararipuṁ kujaṁbhaṁ ditijeśvaram

उसकी पत्नी सौनन्दा विदूरथ की पुत्री थी—पतिव्रता, महाभाग्यशालिनी; इन्द्र के शत्रु दैत्येश्वर कुजृंभ का वध करके उसने उसे शौर्य से प्राप्त किया।

श्लोक 9 (markandeya.113.9)

क्रौष्टुकिरुवाच भगवंस्तेन सम्प्राप्ता कुजृंभनिधनात्कथम् । एतदाख्यानमाख्याहि प्रसन्नेनान्तरात्मना ॥ 113.9 ॥

krauṣṭukiruvāca bhagavaṁstena samprāptā kujṛṁbhanidhanātkatham etadākhyānamākhyāhi prasannenāntarātmanā

क्रौष्टुकि ने कहा—"हे भगवन्, कुजृंभ के वध से उसे वह कैसे प्राप्त हुई? प्रसन्न मन से यह आख्यान सुनाइए।"

श्लोक 10 (markandeya.113.10)

मार्कण्डेय उवाच विदूरथोनाम नृपः ख्यातकीर्तिरभूद्भुवि । तस्य पुत्रद्वयं जातं सुनीतिः सुमतिस्तथा ॥ 113.10 ॥

mārkaṇḍeya uvāca vidūrathonāma nṛpaḥ khyātakīrtirabhūdbhuvi tasya putradvayaṁ jātaṁ sunītiḥ sumatistathā

मार्कण्डेय ने कहा—पृथ्वी पर विदूरथ नाम से विख्यात कीर्ति वाला एक राजा था; उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए—सुनीति और सुमति।

श्लोक 11 (markandeya.113.11)

एकदा तु वनं यातो मृगयां स विदूरथः । ददर्श गर्तं सुमहद्भूमेर्मुखमिवोद्गतम् ॥ 113.11 ॥

ekadā tu vanaṁ yāto mṛgayāṁ sa vidūrathaḥ dadarśa gartaṁ sumahadbhūmermukhamivodgatam

एक बार मृगया के लिए वन गए उस विदूरथ ने पृथ्वी के उभरे हुए मुख के समान एक अत्यंत विशाल गड्ढा देखा।

श्लोक 12 (markandeya.113.12)

तं दृष्ट्वा चिन्तयामास किमेतदिति भैरवम् । पातालविवरं मन्ये नैतद्मूमेश्चिरन्तनम् ॥ 113.12 ॥

taṁ dṛṣṭvā cintayāmāsa kimetaditi bhairavam pātālavivaraṁ manye naitadmūmeścirantanam

उसे देखकर उसने सोचा—"यह क्या भयंकर वस्तु है? मुझे नहीं लगता यह पृथ्वी का कोई प्राचीन विवर है।"

श्लोक 13 (markandeya.113.13)

चिन्तयन्निति तत्रासौ ददर्श विजने वने । ब्राह्मणं सुव्रतं नाम तपस्विनमुपागतम् ॥ 113.13 ॥

cintayanniti tatrāsau dadarśa vijane vane brāhmaṇaṁ suvrataṁ nāma tapasvinamupāgatam

ऐसा सोचते हुए उसने वहाँ, उस निर्जन वन में, समीप आए हुए सुव्रत नामक एक तपस्वी ब्राह्मण को देखा।

श्लोक 14 (markandeya.113.14)

स तं पप्रच्छ च नृपः किमेतदिति विस्मितः । अतिगम्भीरमवनेर्दर्शितान्तर्गतोदरम् ॥ 113.14 ॥

sa taṁ papraccha ca nṛpaḥ kimetaditi vismitaḥ atigambhīramavanerdarśitāntargatodaram

आश्चर्यचकित उस राजा ने उससे पूछा—"यह क्या है, जो पृथ्वी के भीतरी भाग को दिखाता हुआ अत्यंत गहरा है?"

श्लोक 15 (markandeya.113.15)

ऋषिरुवाच किन्न वेत्सि महीपाल वागर्थस्त्वं हि मे मतः । ज्ञेयं सर्वं नरेन्द्रेण वर्तते यन्महीतले ॥ 113.15 ॥

ṛṣiruvāca kinna vetsi mahīpāla vāgarthastvaṁ hi me mataḥ jñeyaṁ sarvaṁ narendreṇa vartate yanmahītale

ऋषि ने कहा—"हे राजन्, क्या तुम नहीं जानते? मैं तो तुम्हें वाणी के अर्थ को जानने वाला मानता हूँ; पृथ्वी पर जो कुछ भी होता है, वह राजा को अवश्य ज्ञात होना चाहिए।

श्लोक 16 (markandeya.113.16)

दानवः सुमहावीर्यो वसत्युग्रो रसातले । स जृम्भयति यत्पृथ्वीं कुजृम्भः प्रोच्यते ततः ॥ 113.16 ॥

dānavaḥ sumahāvīryo vasatyugro rasātale sa jṛmbhayati yatpṛthvīṁ kujṛmbhaḥ procyate tataḥ

अत्यंत बलशाली एक उग्र दानव रसातल में रहता है; चूँकि वह पृथ्वी को जृम्भित (विदीर्ण) करता है, इसलिए वह कुजृंभ कहलाता है।

श्लोक 17 (markandeya.113.17)

क्रियते तेन यत्किञ्चिद्रत्नभूतं महीतले । त्रिदिवे वा नरपते तं कथं वेत्ति नो भवान् ॥ 113.17 ॥

kriyate tena yatkiñcidratnabhūtaṁ mahītale tridive vā narapate taṁ kathaṁ vetti no bhavān

पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में जो कुछ भी रत्न-रूप है, वह उसी के द्वारा किया जाता है (अर्थात् हड़पा जाता है); हे नरपते, तुम उसे कैसे नहीं जानते?

श्लोक 18 (markandeya.113.18)

सुनन्दं नाम मुशलं त्वष्ट्रा यन्निर्मितं पुरा । तज्जहार स दुष्टात्मा तेन हन्ति रणे रिपून् ॥ 113.18 ॥

sunandaṁ nāma muśalaṁ tvaṣṭrā yannirmitaṁ purā tajjahāra sa duṣṭātmā tena hanti raṇe ripūn

त्वष्टा द्वारा पूर्वकाल में बनाई गई सुनन्द नामक गदा को उस दुरात्मा ने हर लिया; उसी से वह युद्ध में शत्रुओं का वध करता है।

श्लोक 19 (markandeya.113.19)

पातालान्तर्गतस्तेन भिनत्ति वसुधामिमाम् । ततोऽसुराणां सर्वेषां द्वाराणि कुरुतेऽसुरः ॥ 113.19 ॥

pātālāntargatastena bhinatti vasudhāmimām tato'surāṇāṁ sarveṣāṁ dvārāṇi kurute'suraḥ

उसी के द्वारा वह रसातल में जाकर इस पृथ्वी को विदीर्ण कर देता है; तब वह समस्त असुरों के लिए द्वार बना देता है।

श्लोक 20 (markandeya.113.20)

तेन भिन्नात्र वसुधा सुनन्दमुशलेन तु । भोक्ष्यते वसुधामेतां तमजित्वा कथं भवान् ॥ 113.20 ॥

tena bhinnātra vasudhā sunandamuśalena tu bhokṣyate vasudhāmetāṁ tamajitvā kathaṁ bhavān

उसी सुनन्द-गदा से यहाँ पृथ्वी विदीर्ण हुई है; वह इस पृथ्वी को भोगेगा—उसे जीते बिना तुम कैसे (इसे रोकोगे)?

श्लोक 21 (markandeya.113.21)

यज्ञान्विध्वंसयत्युग्रो देवानामुपरोधकः । आप्याययति दैतेयान्स बली मुशलायुधः ॥ 113.21 ॥

yajñānvidhvaṁsayatyugro devānāmuparodhakaḥ āpyāyayati daiteyānsa balī muśalāyudhaḥ

वह उग्र देवताओं के यज्ञों को नष्ट करता है, उनमें विघ्न डालता है; वह बलशाली गदाधारी दैत्यों का पोषण करता है।

श्लोक 22 (markandeya.113.22)

यद्यरिं घातयस्येनं पातालान्तरगोचरम् । ततः समस्तवसुधापतिस्त्वं परमेश्वरः ॥ 113.22 ॥

yadyariṁ ghātayasyenaṁ pātālāntaragocaram tataḥ samastavasudhāpatistvaṁ parameśvaraḥ

यदि तुम रसातल में विचरण करने वाले इस शत्रु का वध कर दो, तो तुम समस्त पृथ्वी के स्वामी, परमेश्वर बन जाओगे।

श्लोक 23 (markandeya.113.23)

मुशलं तस्य बलिनः सौनन्दं प्रोच्यते जनैः । तथा बलाबलं चैव तं वदन्ति विचक्षणाः ॥ 113.23 ॥

muśalaṁ tasya balinaḥ saunandaṁ procyate janaiḥ tathā balābalaṁ caiva taṁ vadanti vicakṣaṇāḥ

उस बलशाली की गदा को लोग सौनन्द कहते हैं; और विद्वान लोग उसी से उसके बल-अबल को भी पहचानते हैं (कहते हैं)।

श्लोक 24 (markandeya.113.24)

तत्तु निर्वीर्यतां याति संस्पृष्टं योषिता नृप । तस्मिन्दिने द्वितीयेऽह्नि वीर्यवत्तदुदीर्यते ॥ 113.24 ॥

tattu nirvīryatāṁ yāti saṁspṛṣṭaṁ yoṣitā nṛpa tasmindine dvitīye'hni vīryavattadudīryate

हे राजन्, स्त्री द्वारा स्पर्श किए जाने पर वह निर्वीर्य हो जाती है; उसके दूसरे दिन वह पुनः वीर्यवान् (सशक्त) हो उठती है।

श्लोक 25 (markandeya.113.25)

न स वेत्ति दुराचारः प्रभावं मुशलस्य तम् । योषित्कराग्रसंस्पर्शे दोषं वीर्यविशातनम् ॥ 113.25 ॥

na sa vetti durācāraḥ prabhāvaṁ muśalasya tam yoṣitkarāgrasaṁsparśe doṣaṁ vīryaviśātanam

वह दुराचारी गदा के इस प्रभाव को नहीं जानता—कि स्त्री की उँगलियों के स्पर्श से उसकी शक्ति क्षीण हो जाने का यह दोष है।

श्लोक 26 (markandeya.113.26)

एवं तस्य बलं भूप दानवस्य दुरात्मनः । मुशलस्य च ते प्रोक्तं यद्युक्तं तत्समाचर ॥ 113.26 ॥

evaṁ tasya balaṁ bhūpa dānavasya durātmanaḥ muśalasya ca te proktaṁ yadyuktaṁ tatsamācara

हे राजन्, इस प्रकार उस दुरात्मा दानव तथा उसकी गदा का बल तुम्हें बताया गया; जो उचित हो, वही करो।

श्लोक 27 (markandeya.113.27)

आसन्नमेतद्भवतः पुरस्य पृथिवीपते । कृतं तेन महारन्ध्रं निश्चिन्तः किं भवान्वृथा ॥ 113.27 ॥

āsannametadbhavataḥ purasya pṛthivīpate kṛtaṁ tena mahārandhraṁ niścintaḥ kiṁ bhavānvṛthā

हे पृथ्वीपते, यह संकट अब तुम्हारे नगर पर ही आसन्न है; उसने यह विशाल विवर बनाया है—तुम व्यर्थ ही निश्चिंत क्यों हो?"

श्लोक 28 (markandeya.113.28)

इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन्पुरं गत्वा महीपतिः । मन्त्रयामास मन्त्रज्ञैः पुरमध्ये तु मन्त्रिभिः ॥ 113.28 ॥

ityuktvā tu gate tasminpuraṁ gatvā mahīpatiḥ mantrayāmāsa mantrajñaiḥ puramadhye tu mantribhiḥ

यह कहकर वह चला गया; तब वह राजा नगर में जाकर मन्त्र-कुशल मन्त्रियों के साथ नगर के मध्य विचार-विमर्श करने लगा।

श्लोक 29 (markandeya.113.29)

यथाश्रुतमशेषं तत्कथयामास मन्त्रिणाम् । मुशलस्य प्रभावं च वीर्यशातनमेव च ॥ 113.29 ॥

yathāśrutamaśeṣaṁ tatkathayāmāsa mantriṇām muśalasya prabhāvaṁ ca vīryaśātanameva ca

जैसा उसने सुना था, वह सब उसने मन्त्रियों से कह सुनाया—गदा का प्रभाव, तथा उसकी शक्ति क्षीण होने का रहस्य भी।

श्लोक 30 (markandeya.113.30)

तं मन्त्रं क्रियमाणं तु मन्त्रिभिस्तेन भूभृता । तत्पार्श्ववर्तिनी कन्या शुश्रावाथ मुदावती ॥ 113.30 ॥

taṁ mantraṁ kriyamāṇaṁ tu mantribhistena bhūbhṛtā tatpārśvavartinī kanyā śuśrāvātha mudāvatī

उस राजा और उसके मन्त्रियों द्वारा किए जाते हुए उस विचार-विमर्श को समीप ही खड़ी मुदावती नामक कन्या ने सुन लिया।

श्लोक 31 (markandeya.113.31)

ततः कतिपयाहे तु तां कन्यां वयसान्विताम् । जहारोपवनाद्दैत्यः कुजृम्भः स सखीवृताम् ॥ 113.31 ॥

tataḥ katipayāhe tu tāṁ kanyāṁ vayasānvitām jahāropavanāddaityaḥ kujṛmbhaḥ sa sakhīvṛtām

तब कुछ दिनों बाद युवावस्था को प्राप्त उस कन्या को, सखियों सहित, दैत्य कुजृंभ उपवन से हर ले गया।

श्लोक 32 (markandeya.113.32)

तच्छ्रुत्वा स महीपालः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । पुत्रावुवाच त्वरितं गच्छतं वनकोविदौ ॥ 113.32 ॥

tacchrutvā sa mahīpālaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ putrāvuvāca tvaritaṁ gacchataṁ vanakovidau

यह सुनकर क्रोध से व्याकुल दृष्टि वाले उस राजा ने अपने पुत्रों से शीघ्रता से कहा—"वन में कुशल तुम दोनों जाओ,

श्लोक 33 (markandeya.113.33)

निर्विन्ध्यायास्तटे गर्तस्तेन गत्वा रसातलम् । स हन्यतां योऽपहर्ता मुदावत्याः सुदुर्मतिः ॥ 113.33 ॥

nirvindhyāyāstaṭe gartastena gatvā rasātalam sa hanyatāṁ yo'pahartā mudāvatyāḥ sudurmatiḥ

निर्विन्ध्या नदी के तट पर उस विवर से रसातल में जाकर, मुदावती के अत्यंत दुर्बुद्धि हरणकर्ता का वध कर दो।"

श्लोक 34 (markandeya.113.34)

मार्कण्डेय उवाच ततस्तौ तत्सुतौ प्राप्य तं गर्त्तं तत्पदानुगौ । युयुधाते कुजृम्भेण स्वसैन्येनातिकोपितौ ॥ 113.34 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tatastau tatsutau prāpya taṁ garttaṁ tatpadānugau yuyudhāte kujṛmbheṇa svasainyenātikopitau

मार्कण्डेय ने कहा—तब वे दोनों पुत्र उस विवर तक पहुँचकर उसके पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, अत्यंत क्रुद्ध होकर, अपनी सेना सहित कुजृंभ से युद्ध करने लगे।

श्लोक 35 (markandeya.113.35)

ततः परिघनिस्त्रिंशशक्तिशूलपरश्वधैः । बाणैश्चाविरतं युद्धं तेषामासीत्सुदारुणम् ॥ 113.35 ॥

tataḥ parighanistriṁśaśaktiśūlaparaśvadhaiḥ bāṇaiścāvirataṁ yuddhaṁ teṣāmāsītsudāruṇam

तब परिघ, तलवार, शक्ति, त्रिशूल, फरसे तथा बाणों से उनका निरंतर अत्यंत भयंकर युद्ध होने लगा।

श्लोक 36 (markandeya.113.36)

ततो मायाबलवता तेन दैत्येन तावुभौ । राजपुत्रौ रणे बद्धौ निहताशेषसैनिकौ ॥ 113.36 ॥

tato māyābalavatā tena daityena tāvubhau rājaputrau raṇe baddhau nihatāśeṣasainikau

तब माया में बलवान उस दैत्य ने उन दोनों राजकुमारों को युद्ध में बाँध लिया, उनके समस्त सैनिक मार डाले गए।

श्लोक 37 (markandeya.113.37)

तच्छ्रुत्वा स महीपालः प्राहेदं सर्वसैनिकान् । बद्धपुत्रः परामार्तिमुपेतो मुनिसत्तम ॥ 113.37 ॥

tacchrutvā sa mahīpālaḥ prāhedaṁ sarvasainikān baddhaputraḥ parāmārtimupeto munisattama

यह सुनकर, हे मुनिश्रेष्ठ, अपने पुत्रों के बंधन से घोर व्यथा को प्राप्त उस राजा ने अपने सभी सैनिकों से यह कहा—

श्लोक 38 (markandeya.113.38)

यस्तं निहत्य दैतेयं मोचयिष्यति मे सुताम् । तस्याहं सम्प्रदास्यामि तामेवायतलोचनाम् ॥ 113.38 ॥

yastaṁ nihatya daiteyaṁ mocayiṣyati me sutām tasyāhaṁ sampradāsyāmi tāmevāyatalocanām

"जो उस दैत्य का वध करके मेरी पुत्री को छुड़ाएगा, उसी को मैं यह विशाल-नेत्रों वाली कन्या दे दूँगा।"

श्लोक 39 (markandeya.113.39)

इत्येवं घोषयांचक्रे स राजा स्वपुरे तदा । निराशः पुत्रतनयाबन्धमोक्षाय वै मुने ॥ 113.39 ॥

ityevaṁ ghoṣayāṁcakre sa rājā svapure tadā nirāśaḥ putratanayābandhamokṣāya vai mune

हे मुने, इस प्रकार उस राजा ने अपने पुत्रों के तथा पुत्री के बंधन-मोचन के लिए निराश होकर अपने नगर में यह उद्घोषणा करवाई।

श्लोक 40 (markandeya.113.40)

ततः शुश्राव वत्सप्रीर्भलन्दनसुतो हि तत् । आघोष्यमाणं बलवान्कृतास्त्रः शौर्यसंयुतः ॥ 113.40 ॥

tataḥ śuśrāva vatsaprīrbhalandanasuto hi tat āghoṣyamāṇaṁ balavānkṛtāstraḥ śauryasaṁyutaḥ

तब भलन्दन के पुत्र वत्सप्री ने, जो बलशाली, अस्त्रकुशल और शौर्य से युक्त थे, उस उद्घोषणा को सुना।

श्लोक 41 (markandeya.113.41)

स चागम्याभिवाद्यैनं प्राह पार्थिवसत्तमम् । विनयावनतो भूत्वा पितुर्मित्रमनुत्तमम् ॥ 113.41 ॥

sa cāgamyābhivādyainaṁ prāha pārthivasattamam vinayāvanato bhūtvā piturmitramanuttamam

वे आकर, उस पिता के अनुपम मित्र, श्रेष्ठ राजा को अभिवादन करते हुए, विनयपूर्वक झुककर बोले—

श्लोक 42 (markandeya.113.42)

आज्ञापयाशु मामेव तनयौ मोचयामि ते । तवैव तेजसा हत्वा तं दैत्यं तनयां च ते ॥ 113.42 ॥

ājñāpayāśu māmeva tanayau mocayāmi te tavaiva tejasā hatvā taṁ daityaṁ tanayāṁ ca te

"मुझे ही तुरंत आज्ञा दीजिए, मैं आपके पुत्रों को छुड़ा दूँगा—आपके ही तेज से उस दैत्य का वध करके, और आपकी पुत्री को भी।"

श्लोक 43 (markandeya.113.43)

मार्कण्डेय उवाच स तं मुदा परिष्वज्य प्रियसख्युरथात्मजम् । गम्यतामिति संसिद्ध्यै वत्सेत्याह स पार्थिवः ॥ 113.43 ॥

mārkaṇḍeya uvāca sa taṁ mudā pariṣvajya priyasakhyurathātmajam gamyatāmiti saṁsiddhyai vatsetyāha sa pārthivaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—अपने प्रिय मित्र के उस पुत्र को हर्षपूर्वक आलिंगन करके उस राजा ने कहा—"पुत्र, इस कार्य की सिद्धि के लिए जाओ!

श्लोक 44 (markandeya.113.44)

स्थाने स्थास्यति मे वत्सो यद्येवं कुरुते विधिम् । वत्सैतत्क्रियतामाशु यद्युत्साहि मनस्तव ॥ 113.44 ॥

sthāne sthāsyati me vatso yadyevaṁ kurute vidhim vatsaitatkriyatāmāśu yadyutsāhi manastava

यदि तुम यह विधि पूरी करते हो तो मेरा पुत्र अपने स्थान पर ही बना रहेगा; पुत्र, यदि तुम्हारा मन उत्साहित है, तो यह कार्य शीघ्र किया जाए।"

श्लोक 45 (markandeya.113.45)

मार्कण्डेय उवाच ततः सखड्गः सधनुर्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । जगाम वीर पातालं तेन गर्तेन सत्वरः ॥ 113.45 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ sakhaḍgaḥ sadhanurbaddhagodhāṅgulitravān jagāma vīra pātālaṁ tena gartena satvaraḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब तलवार और धनुष धारण किए, गोह की खाल से बने अंगुलित्राण बाँधे हुए, वह वीर उसी विवर से शीघ्रता से रसातल में गया।

श्लोक 46 (markandeya.113.46)

ततो ज्यास्वनमत्युग्रं स चक्रे पार्थिवात्मजः । येन पातालमखिलमासीदापूरितान्तरम् ॥ 113.46 ॥

tato jyāsvanamatyugraṁ sa cakre pārthivātmajaḥ yena pātālamakhilamāsīdāpūritāntaram

तब उस राजपुत्र ने अपने धनुष की प्रत्यंचा का अत्यंत भयंकर टंकार किया, जिससे समस्त रसातल का भीतरी भाग गूँज उठा।

श्लोक 47 (markandeya.113.47)

ततो ज्यास्वनमाकर्ण्य कुजृम्भो दानवेश्वरः । आजगामातिकोपेन स्वसैन्यपरिवारितः ॥ 113.47 ॥

tato jyāsvanamākarṇya kujṛmbho dānaveśvaraḥ ājagāmātikopena svasainyaparivāritaḥ

उस टंकार को सुनकर दानवों का स्वामी कुजृंभ अपनी सेना से घिरा हुआ अत्यंत क्रोध में वहाँ आया।

श्लोक 48 (markandeya.113.48)

ततो युद्धमभूत्तस्य तेन पार्थिवसूनुना । ससैन्यस्य ससैन्येन बलिनो बलशालिना ॥ 113.48 ॥

tato yuddhamabhūttasya tena pārthivasūnunā sasainyasya sasainyena balino balaśālinā

तब सेनासहित उस बलशाली, शक्तिशाली दानव का उस राजपुत्र के साथ, जो स्वयं भी सेना सहित था, युद्ध हुआ।

श्लोक 49 (markandeya.113.49)

दिनानि त्रीणि स यदा योधितस्तेन दानवः । ततः कोपपरीतात्मा मुसलायाभ्यधावत ॥ 113.49 ॥

dināni trīṇi sa yadā yodhitastena dānavaḥ tataḥ kopaparītātmā musalāyābhyadhāvata

जब उस दानव से तीन दिनों तक युद्ध किया गया, तब क्रोध से व्याप्त चित्त वाला वह अपनी गदा की ओर दौड़ा।

श्लोक 50 (markandeya.113.50)

गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैः पूज्यमानः स तिष्ठति । अन्तःपुरे महाभाग प्रजापतिविनिर्मितः ॥ 113.50 ॥

gandhairmālyaistathā dhūpaiḥ pūjyamānaḥ sa tiṣṭhati antaḥpure mahābhāga prajāpativinirmitaḥ

हे महाभाग, वह प्रजापति द्वारा निर्मित गदा अंतःपुर में गंध, माल्य तथा धूप से पूजित होकर स्थित रहती थी।

श्लोक 51 (markandeya.113.51)

ततो विज्ञातमुशलप्रभावा सा मुदावती । पस्पर्श मुशलश्रेष्ठमतिनम्रशिरोधरा ॥ 113.51 ॥

tato vijñātamuśalaprabhāvā sā mudāvatī pasparśa muśalaśreṣṭhamatinamraśirodharā

तब गदा के प्रभाव को जानने वाली उस मुदावती ने अत्यंत विनम्र सिर झुकाकर उस श्रेष्ठ गदा का स्पर्श किया।

श्लोक 52 (markandeya.113.52)

पुनर्यावत्स गृह्णाति मुशलं तं महासुरः । तावत्सा वन्दनव्याजात्पस्पर्शानेकशः शुभा ॥ 113.52 ॥

punaryāvatsa gṛhṇāti muśalaṁ taṁ mahāsuraḥ tāvatsā vandanavyājātpasparśānekaśaḥ śubhā

जब तक वह महाअसुर पुनः उस गदा को ग्रहण करने वाला था, तब तक वह शुभा वंदना के बहाने से उसे बार-बार स्पर्श करती रही।

श्लोक 53 (markandeya.113.53)

ततः स गत्वा युयुधे मुसलेनासुरेश्वरः । व्यर्था मुशलपातास्ते संजग्मुस्तेषु शत्रुषु ॥ 113.53 ॥

tataḥ sa gatvā yuyudhe musalenāsureśvaraḥ vyarthā muśalapātāste saṁjagmusteṣu śatruṣu

तब वह असुरेश्वर वहाँ जाकर गदा से युद्ध करने लगा; परंतु शत्रुओं पर पड़ने वाले वे गदा-प्रहार व्यर्थ हो गए।

श्लोक 54 (markandeya.113.54)

परमास्त्रे तु निर्वीर्ये सौनन्दे मुशले मुने । अस्त्रैः शस्त्रैश्च दैतेयः सोऽयुध्यत रणेऽरिणा ॥ 113.54 ॥

paramāstre tu nirvīrye saunande muśale mune astraiḥ śastraiśca daiteyaḥ so'yudhyata raṇe'riṇā

हे मुने, वह परम अस्त्र सौनन्द गदा निर्वीर्य हो जाने पर, वह दैत्य अन्य अस्त्रों और शस्त्रों से ही युद्ध में शत्रु से लड़ने लगा।

श्लोक 55 (markandeya.113.55)

शस्त्रास्त्रैर्नः समस्तस्य राजपुत्रस्य सोऽसुरः । मुशलेन बलं तस्य तच्च तन्व्या निराकृतम् ॥ 113.55 ॥

śastrāstrairnaḥ samastasya rājaputrasya so'suraḥ muśalena balaṁ tasya tacca tanvyā nirākṛtam

उस असुर ने शस्त्रों और अस्त्रों से उस राजपुत्र के समस्त बल का सामना किया; परंतु उसका बल तो गदा के माध्यम से उस कोमलांगी द्वारा ही निष्फल कर दिया गया था।

श्लोक 56 (markandeya.113.56)

ततः पराजित्य स भूपसूनुरस्त्राणि शस्त्राणि च दानवस्य । चकार सद्यो विरथं ततश्च सचर्मखड्गः पुनरप्यधावत् ॥ 113.56 ॥

tataḥ parājitya sa bhūpasūnurastrāṇi śastrāṇi ca dānavasya cakāra sadyo virathaṁ tataśca sacarmakhaḍgaḥ punarapyadhāvat

तब उस राजपुत्र ने उस दानव के अस्त्रों और शस्त्रों को पराजित करके उसे तत्काल रथहीन कर दिया; तब वह ढाल और तलवार लेकर पुनः दौड़ा।

श्लोक 57 (markandeya.113.57)

तमापतन्तं रभसाऽभ्युदीर्णं विस्पष्टकोपं त्रिदशेन्द्रशत्रुम् । शस्त्रेण वह्नेर्भुवि राजपुत्रौ जघान कालानलसप्रभेण ॥ 113.57 ॥

tamāpatantaṁ rabhasā'bhyudīrṇaṁ vispaṣṭakopaṁ tridaśendraśatrum śastreṇa vahnerbhuvi rājaputrau jaghāna kālānalasaprabheṇa

उग्रता से आते हुए, स्पष्ट क्रोध से युक्त, इन्द्र के उस शत्रु को, प्रलय-अग्नि के समान तेजस्वी अग्नि-अस्त्र से राजपुत्र ने भूमि पर मार गिराया।

श्लोक 58 (markandeya.113.58)

स पावकास्त्रेण हृदि क्षतो भृशं तत्याज देहं त्रिदशारिरात्मनः । बभूव सद्यश्च महोरगाणां रसातलान्तेषु महानथोत्सवः ॥ 113.58 ॥

sa pāvakāstreṇa hṛdi kṣato bhṛśaṁ tatyāja dehaṁ tridaśārirātmanaḥ babhūva sadyaśca mahoragāṇāṁ rasātalānteṣu mahānathotsavaḥ

अग्नि-अस्त्र से हृदय में गहरा घायल हुआ वह इन्द्र-शत्रु अपने प्राण त्याग गया; और तत्काल रसातल के भीतर महानागों का महान उत्सव हो गया।

श्लोक 59 (markandeya.113.59)

ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिर्महीपालसुतोपरि । जगुर्गन्धर्वपतयो देववाद्यानि सस्वनुः ॥ 113.59 ॥

tato'patatpuṣpavṛṣṭirmahīpālasutopari jagurgandharvapatayo devavādyāni sasvanuḥ

तब उस राजपुत्र के ऊपर पुष्पों की वर्षा हुई, गन्धर्वपतियों ने गीत गाए और देव-वाद्य बज उठे।

श्लोक 60 (markandeya.113.60)

स चापि राजपुत्रस्तं हत्वा तौ नृपतेः सुतौ । मोचयामास तन्वङ्गी तां च कन्यां मुदावतीम् ॥ 113.60 ॥

sa cāpi rājaputrastaṁ hatvā tau nṛpateḥ sutau mocayāmāsa tanvaṅgī tāṁ ca kanyāṁ mudāvatīm

उस राजपुत्र ने भी उसका वध करके उन दोनों राजकुमारों को तथा उस कोमलांगी मुदावती को भी मुक्त कर दिया।

श्लोक 61 (markandeya.113.61)

तच्चापि मुसलं तस्मिन्कुजृम्भे विनिपातिते । जग्राह नागाधिपतिरनन्तः शेषसंज्ञितः ॥ 113.61 ॥

taccāpi musalaṁ tasminkujṛmbhe vinipātite jagrāha nāgādhipatiranantaḥ śeṣasaṁjñitaḥ

कुजृंभ के मारे जाने पर उस गदा को भी नागों के स्वामी शेष नामक अनन्त ने ग्रहण कर लिया।

श्लोक 62 (markandeya.113.62)

तस्याश्च परितुष्टोऽसौ शेषः सर्वोरगेश्वरः । मुदावत्या मुदाध्यातमनोवृत्तिस्तपोधनः ॥ 113.62 ॥

tasyāśca parituṣṭo'sau śeṣaḥ sarvorageśvaraḥ mudāvatyā mudādhyātamanovṛttistapodhanaḥ

तपोधन वे सर्वोरगेश्वर शेष उस मुदावती से अत्यंत प्रसन्न हुए, उनका चित्त हर्ष से उसी में लगा रहा,

श्लोक 63 (markandeya.113.63)

सुनन्दमुसलस्पर्शं यच्चकार पुनः पुनः । योषित्करतलस्पर्शप्रभावज्ञातिशोभना ॥ 113.63 ॥

sunandamusalasparśaṁ yaccakāra punaḥ punaḥ yoṣitkaratalasparśaprabhāvajñātiśobhanā

और उन्होंने बार-बार सुनन्द-गदा का स्पर्श कराया; उस स्त्री की हथेली के स्पर्श के प्रभाव से वह सुशोभित हुई।

श्लोक 64 (markandeya.113.64)

मुदावत्यास्ततो नाम नागराजस्तदाकरोत् । सुनन्दामिति सानन्दं सौनन्दगुणजं द्विज ॥ 113.64 ॥

mudāvatyāstato nāma nāgarājastadākarot sunandāmiti sānandaṁ saunandaguṇajaṁ dvija

हे द्विज, तब उस नागराज ने प्रसन्नतापूर्वक मुदावती का नाम सौनन्द-गदा के गुण से उत्पन्न "सुनन्दा" रख दिया।

श्लोक 65 (markandeya.113.65)

स चापि राजपुत्रस्तां भ्रातृभ्यां सहितां पितुः । समीपमानिनायाशु प्रणिपत्याह चैव तम् ॥ 113.65 ॥

sa cāpi rājaputrastāṁ bhrātṛbhyāṁ sahitāṁ pituḥ samīpamānināyāśu praṇipatyāha caiva tam

वह राजपुत्र भी उसके दोनों भाइयों सहित उसे शीघ्र ही अपने पिता के पास ले आया, और प्रणाम करते हुए उनसे कहा—

श्लोक 66 (markandeya.113.66)

आनीतौ तनयौ तात तथैवेयं मुदावती । तवाज्ञया मयान्यद्यत्कर्तव्यं तत्समादिश ॥ 113.66 ॥

ānītau tanayau tāta tathaiveyaṁ mudāvatī tavājñayā mayānyadyatkartavyaṁ tatsamādiśa

"हे तात, आपके दोनों पुत्र और यह मुदावती भी लाई गई है; आपकी आज्ञा से मैंने यह किया—अब आगे जो करना हो, वह आदेश दीजिए।"

श्लोक 67 (markandeya.113.67)

मार्कण्डेय उवाच ततः प्रहर्षसम्पूर्णहृदयः स महीपतिः । साधुसाध्वित्यथाहोच्चैर्वत्स वत्सेति शोभनम् ॥ 113.67 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ praharṣasampūrṇahṛdayaḥ sa mahīpatiḥ sādhusādhvityathāhoccairvatsa vatseti śobhanam

मार्कण्डेय ने कहा—तब हर्ष से भरे हृदय वाले उस राजा ने ऊँचे स्वर में "साधु, साधु" तथा "वत्स, वत्स" कहते हुए यह सुंदर वचन कहा—

श्लोक 68 (markandeya.113.68)

सभाजितोऽस्मि त्रिदशैर्वत्साहं कारणैस्त्रिभिः । त्वं जामाता च यत्प्राप्तो यच्चारिर्विनिपातितः ॥ 113.68 ॥

sabhājito'smi tridaśairvatsāhaṁ kāraṇaistribhiḥ tvaṁ jāmātā ca yatprāpto yaccārirvinipātitaḥ

"हे वत्स, मैं तीन कारणों से देवताओं द्वारा सम्मानित हुआ हूँ—कि तुम मेरे जामाता बने, कि शत्रु का वध हुआ,

श्लोक 69 (markandeya.113.69)

आगतान्यक्षतान्यत्र यच्चापत्यानि मे पुनः । तद्गृहाणाद्य शस्तेऽह्नि पाणिमस्या मयोदितम् ॥ 113.69 ॥

āgatānyakṣatānyatra yaccāpatyāni me punaḥ tadgṛhāṇādya śaste'hni pāṇimasyā mayoditam

और कि मेरी संतानें यहाँ अक्षत लौट आईं; इसलिए आज, इस शुभ दिन पर, इसका पाणिग्रहण करो—यह मैंने कहा है।

श्लोक 70 (markandeya.113.70)

त्वं राजपुत्र चार्वङ्ग्याः कन्याया दुहितुर्मम । मुदावत्या मुदा युक्तः सत्यवाक्यं कुरुष्व माम् ॥ 113.70 ॥

tvaṁ rājaputra cārvaṅgyāḥ kanyāyā duhiturmama mudāvatyā mudā yuktaḥ satyavākyaṁ kuruṣva mām

हे राजपुत्र, तुम प्रसन्नतापूर्वक मेरी सुंदर-अंगी पुत्री मुदावती को ग्रहण करके मेरे वचन को सत्य करो।"

श्लोक 71 (markandeya.113.71)

राजपुत्र उवाच तातस्याज्ञा मया कार्या यद्ब्रवीषि करोमि तत् । त्वमेव तात जानीषे नैवात्राधिकृता वयम् ॥ 113.71 ॥

rājaputra uvāca tātasyājñā mayā kāryā yadbravīṣi karomi tat tvameva tāta jānīṣe naivātrādhikṛtā vayam

राजपुत्र ने कहा—"मुझे पिता की आज्ञा का ही पालन करना है, आप जो कहें वही मैं करूँगा; हे तात, आप ही जानते हैं, इसमें हम अधिकारी नहीं हैं।"

श्लोक 72 (markandeya.113.72)

मार्कण्डेय उवाच ततस्तयोः स राजेन्द्रश्चक्रे वैवाहिकं क्रमम् । मुदावत्याश्च दुहितुर्भलन्दनसुतस्य वै ॥ 113.72 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tatastayoḥ sa rājendraścakre vaivāhikaṁ kramam mudāvatyāśca duhiturbhalandanasutasya vai

मार्कण्डेय ने कहा—तब उस राजेन्द्र ने उन दोनों का—अपनी पुत्री मुदावती और भलन्दन के पुत्र का—विवाह-संस्कार संपन्न किया।

श्लोक 73 (markandeya.113.73)

ततः स तया रेमे वत्सप्रीर्नवयौवनः । रमणीयेषु देशेषु प्रासादशिखरेषु च ॥ 113.73 ॥

tataḥ sa tayā reme vatsaprīrnavayauvanaḥ ramaṇīyeṣu deśeṣu prāsādaśikhareṣu ca

तब नवयौवन वत्सप्री उसके साथ रमणीय प्रदेशों में और महलों के शिखरों पर विहार करने लगे।

श्लोक 74 (markandeya.113.74)

कालेन गच्छता वृद्धः पिता तस्य भलन्दनः । वनं जगाम वत्सप्रीः स बभूव महीपतिः ॥ 113.74 ॥

kālena gacchatā vṛddhaḥ pitā tasya bhalandanaḥ vanaṁ jagāma vatsaprīḥ sa babhūva mahīpatiḥ

समय बीतने पर उनके पिता भलन्दन वृद्ध होकर वन में चले गए, और वत्सप्री पृथ्वी के स्वामी बन गए।

श्लोक 75 (markandeya.113.75)

इयाज यज्ञान्सततं प्रजा धर्मेण पालयन् । पुत्रवत्पाल्यमानास्तु प्रजास्तेन महात्मना ॥ 113.75 ॥

iyāja yajñānsatataṁ prajā dharmeṇa pālayan putravatpālyamānāstu prajāstena mahātmanā

वे निरंतर यज्ञ करते हुए प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करने लगे; उस महात्मा द्वारा पुत्रों के समान पाली जाती हुई प्रजा

श्लोक 76 (markandeya.113.76)

ववृधुर्विषये तस्य न चाभूद्वर्णसङ्करः । न दस्युव्यालदुर्वृत्तभयमासीच्च कस्यचित् । । नोपसर्गभयं चैव तस्मिञ्छासति भूपतौ ॥ 113.76 ॥

vavṛdhurviṣaye tasya na cābhūdvarṇasaṅkaraḥ na dasyuvyāladurvṛttabhayamāsīcca kasyacit | nopasargabhayaṁ caiva tasmiñchāsati bhūpatau

उसके राज्य में फलती-फूलती रही, और वर्णसंकर नहीं हुआ; किसी को भी चोरों, हिंसक पशुओं अथवा दुष्टों का भय नहीं था, और उस राजा के शासन में महामारी का भय भी नहीं था।

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