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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 115

खनित्र-चरित-समाप्ति

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (markandeya.115.1)

मार्कण्डेय उवाच ततः समस्तलोकस्य विस्मयः सोऽभवन्महान् । यदेककालं नेशुस्ते पृथक्पुरनिवासिनः ॥ 115.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ samastalokasya vismayaḥ so'bhavanmahān yadekakālaṁ neśuste pṛthakpuranivāsinaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—तब समस्त लोक को यह महान आश्चर्य हुआ कि अलग-अलग नगरों में रहने वाले वे सब एक ही समय में नष्ट हो गए।

श्लोक 2 (markandeya.115.2)

ततः शुश्राव निधनं यातान्भ्रातृपुरोहितान् । मन्त्रिणं च तथा भ्रातुर्दग्धं तं विश्ववेदिनम् ॥ 115.2 ॥

tataḥ śuśrāva nidhanaṁ yātānbhrātṛpurohitān mantriṇaṁ ca tathā bhrāturdagdhaṁ taṁ viśvavedinam

तब उसने सुना कि उसके भाइयों के पुरोहित मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं, और उसी प्रकार भाई (शौरि) का मन्त्री विश्ववेदी भी भस्म हो गया है।

श्लोक 3 (markandeya.115.3)

किमेतदिति सोऽतीव विस्मितो मुनिसत्तम । खनित्रोऽभून्महाराजो नाजानात्तच्च कारणम् ॥ 115.3 ॥

kimetaditi so'tīva vismito munisattama khanitro'bhūnmahārājo nājānāttacca kāraṇam

हे मुनिश्रेष्ठ, "यह क्या है" सोचकर अत्यंत विस्मित वह महाराज खनित्र उसका कारण नहीं जान सका।

श्लोक 4 (markandeya.115.4)

ततो वसिष्ठं पप्रच्छ स राजा गृहमागतम् । यत्कारणं विनेशुस्ते भ्रातृमन्त्रिपुरोहिताः ॥ 115.4 ॥

tato vasiṣṭhaṁ papraccha sa rājā gṛhamāgatam yatkāraṇaṁ vineśuste bhrātṛmantripurohitāḥ

तब उस राजा ने अपने घर आए हुए वसिष्ठ से पूछा कि किस कारण उसके भाइयों के मन्त्री और पुरोहित नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 5 (markandeya.115.5)

तेन पृष्टस्तदा प्राह यथा वृत्तं महामुनिः । यच्छौरिमन्त्रिणा प्रोक्तं यच्च शौरिरुवाच तम् ॥ 115.5 ॥

tena pṛṣṭastadā prāha yathā vṛttaṁ mahāmuniḥ yacchaurimantriṇā proktaṁ yacca śauriruvāca tam

उनके द्वारा पूछे जाने पर उस महामुनि ने जैसा हुआ था वैसा ही बताया—शौरि के मन्त्री ने जो कहा था, और शौरि ने उससे जो कहा था,

श्लोक 6 (markandeya.115.6)

यथा चानुष्ठितं तेन भ्रातॄणां भेदकारि वै । मन्त्रिणा तेन दुष्टेन यच्चक्रुश्च पुरोहिताः ॥ 115.6 ॥

yathā cānuṣṭhitaṁ tena bhrātṝṇāṁ bhedakāri vai mantriṇā tena duṣṭena yaccakruśca purohitāḥ

और उस दुष्ट मन्त्री द्वारा जैसे भाइयों में फूट डालने वाला वह कार्य किया गया, और पुरोहितों ने जो किया,

श्लोक 7 (markandeya.115.7)

यन्निमित्तं विनेशुस्ते अपापस्यापकारिणः । पुरोहितास्तस्य राज्ञः शत्रावपि दयावतः ॥ 115.7 ॥

yannimittaṁ vineśuste apāpasyāpakāriṇaḥ purohitāstasya rājñaḥ śatrāvapi dayāvataḥ

जिस कारण से वे नष्ट हुए—उस राजा के वे पुरोहित, जो स्वयं निष्पाप थे, और शत्रु के प्रति भी दयालु थे।

श्लोक 8 (markandeya.115.8)

स तच्छ्रुत्वा ततो राजा हा हतोऽस्मीति वै वदन् । निनिन्दात्मानमत्यर्थं वसिष्ठस्याग्रतो द्विज ॥ 115.8 ॥

sa tacchrutvā tato rājā hā hato'smīti vai vadan ninindātmānamatyarthaṁ vasiṣṭhasyāgrato dvija

यह सुनकर वह राजा "हाय, मैं नष्ट हो गया" कहते हुए, हे द्विज, वसिष्ठ के समक्ष अत्यंत स्वयं की निंदा करने लगा।

श्लोक 9 (markandeya.115.9)

राजोवाच धिङ्मामपुण्यसंस्थानमल्पभाग्यमशोभनम् । दैवदोषकृतं पापं सर्वलोकविगर्हितम् ॥ 115.9 ॥

rājovāca dhiṅmāmapuṇyasaṁsthānamalpabhāgyamaśobhanam daivadoṣakṛtaṁ pāpaṁ sarvalokavigarhitam

राजा ने कहा—"धिक्कार है मुझे—पुण्यरहित, अल्पभाग्य, अशोभन, दैव-दोष से उत्पन्न पाप वाले, समस्त लोक द्वारा निंदित मुझको!

श्लोक 10 (markandeya.115.10)

मन्निमित्तं विनष्टं तत्तद्ब्राह्मणचतुष्टयम् । मत्तः कोऽन्यः पापतरो भविष्यति पुमान्भुवि ॥ 115.10 ॥

mannimittaṁ vinaṣṭaṁ tattadbrāhmaṇacatuṣṭayam mattaḥ ko'nyaḥ pāpataro bhaviṣyati pumānbhuvi

मेरे ही कारण वह चारों ब्राह्मणों का समूह नष्ट हो गया; मुझसे अधिक पापी और कौन पुरुष इस पृथ्वी पर होगा?

श्लोक 11 (markandeya.115.11)

नाभविष्यं यदि पुमानहमत्र महीतले । ततस्ते न विनश्येयुर्मम भ्रातृपुरोहिताः ॥ 115.11 ॥

nābhaviṣyaṁ yadi pumānahamatra mahītale tataste na vinaśyeyurmama bhrātṛpurohitāḥ

यदि मैं इस पृथ्वी पर पुरुष के रूप में उत्पन्न ही न हुआ होता, तो मेरे भाइयों के पुरोहित नष्ट न होते।

श्लोक 12 (markandeya.115.12)

धिग्राज्यं धिक्च मे जन्म भूभुजां महतां कुले । कारणत्वं गतो योऽहं विनाशस्य द्विजन्मनाम् ॥ 115.12 ॥

dhigrājyaṁ dhikca me janma bhūbhujāṁ mahatāṁ kule kāraṇatvaṁ gato yo'haṁ vināśasya dvijanmanām

धिक्कार है इस राज्य को, धिक्कार है महान राजाओं के कुल में मेरे जन्म को—मैं, जो द्विजों के विनाश का कारण बन गया!

श्लोक 13 (markandeya.115.13)

कुर्वन्तः स्वामिनां तेऽथ भ्रातॄणां मम याजकाः । नाशं ययुर्न दुष्टास्ते दुष्टोऽहं नाशकारणे ॥ 115.13 ॥

kurvantaḥ svāmināṁ te'tha bhrātṝṇāṁ mama yājakāḥ nāśaṁ yayurna duṣṭāste duṣṭo'haṁ nāśakāraṇe

मेरे भाइयों के, अपने स्वामियों के, याजक-कर्म करते हुए वे नष्ट हो गए—वे दुष्ट नहीं थे, दुष्ट तो मैं हूँ, जो उनके विनाश का कारण बना।

श्लोक 14 (markandeya.115.14)

किं करोमि क्व गच्छामि नान्यो मत्तो हि पापकृत् । पृथिव्यामस्ति हेतुत्वं द्विजनाशस्य योगतः ॥ 115.14 ॥

kiṁ karomi kva gacchāmi nānyo matto hi pāpakṛt pṛthivyāmasti hetutvaṁ dvijanāśasya yogataḥ

मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मुझसे बढ़कर पापी और कोई नहीं है—इस पृथ्वी पर मैं ही इस संबंध के कारण द्विजों के विनाश का हेतु बना हूँ।"

श्लोक 15 (markandeya.115.15)

इत्थमुद्विग्नहृदयः खनित्रः पृथिवीपतिः । वनं यियासुः पुत्रस्य कृतवानभिषेचनम् ॥ 115.15 ॥

itthamudvignahṛdayaḥ khanitraḥ pṛthivīpatiḥ vanaṁ yiyāsuḥ putrasya kṛtavānabhiṣecanam

इस प्रकार उद्विग्न हृदय वाले पृथ्वीपति खनित्र ने वन जाने की इच्छा से अपने पुत्र का अभिषेक कर दिया।

श्लोक 16 (markandeya.115.16)

अभिषिच्य सुतं राज्ये क्षुपसंज्ञं महीपतिः । भार्याभिस्तिसृभिः सार्धं तपसे स वनं ययौ ॥ 115.16 ॥

abhiṣicya sutaṁ rājye kṣupasaṁjñaṁ mahīpatiḥ bhāryābhistisṛbhiḥ sārdhaṁ tapase sa vanaṁ yayau

क्षुप नामक पुत्र को राज्य में अभिषिक्त करके वह राजा अपनी तीनों पत्नियों सहित तप के लिए वन को चला गया।

श्लोक 17 (markandeya.115.17)

तत्रागत्वा तपस्तेपे वानप्रस्थविधानवित् । शतानि त्रीणि वर्षाणां सार्द्धानि नृपसत्तमः ॥ 115.17 ॥

tatrāgatvā tapastepe vānaprasthavidhānavit śatāni trīṇi varṣāṇāṁ sārddhāni nṛpasattamaḥ

वहाँ जाकर वानप्रस्थ की विधि जानने वाले उस श्रेष्ठ राजा ने साढ़े तीन सौ वर्षों तक तप किया।

श्लोक 18 (markandeya.115.18)

तपसा क्षीणदेहस्तु राजवर्यो द्विजोत्तम । निगृह्य सर्वस्रोतांसि तत्याजासून्वनेचरः ॥ 115.18 ॥

tapasā kṣīṇadehastu rājavaryo dvijottama nigṛhya sarvasrotāṁsi tatyājāsūnvanecaraḥ

हे द्विजोत्तम, तप से क्षीण-देह हुए उस श्रेष्ठ राजा ने अपनी समस्त इन्द्रियों को रोककर, वनवासी होकर, अपने प्राण त्याग दिए।

श्लोक 19 (markandeya.115.19)

ततः पुण्यान्ययौ लोकान्सर्वकामदुहोऽक्षयान् । अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरवाप्या ये नराधिपैः ॥ 115.19 ॥

tataḥ puṇyānyayau lokānsarvakāmaduho'kṣayān aśvamedhādibhiryajñairavāpyā ye narādhipaiḥ

तब वह उन पवित्र, अक्षय, सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाले लोकों को प्राप्त हुआ, जो राजाओं द्वारा अश्वमेध आदि यज्ञों से ही प्राप्त किए जाते हैं।

श्लोक 20 (markandeya.115.20)

भार्याश्च तस्य तास्तिस्रः समन्तेनैव तत्यजुः । प्राणानवापुः सालोक्यं तेनैव सुमहात्मना ॥ 115.20 ॥

bhāryāśca tasya tāstisraḥ samantenaiva tatyajuḥ prāṇānavāpuḥ sālokyaṁ tenaiva sumahātmanā

और उसकी वे तीनों पत्नियाँ भी साथ ही अपने प्राण त्याग गईं; उन्हें उसी महात्मा के साथ उनके ही लोक की प्राप्ति हुई।

श्लोक 21 (markandeya.115.21)

एतत्खनित्रचरितं श्रुतं कल्मषनाशनम् । पठतां च महाभाग क्षुपस्यातो निशामय ॥ 115.21 ॥

etatkhanitracaritaṁ śrutaṁ kalmaṣanāśanam paṭhatāṁ ca mahābhāga kṣupasyāto niśāmaya

हे महाभाग, पाप का नाश करने वाला यह खनित्र का चरित सुना गया; अब इससे आगे क्षुप की कथा सुनो।

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