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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 116

विविंश-चरित

अध्याय 115अध्याय-सूचीअध्याय 117

श्लोक 1 (markandeya.116.1)

मार्कण्डेय उवाच क्षुपः खनित्रपुत्रस्तु प्राप्य राज्यं यथा पिता । तथैव पालयामास प्रजाधर्मेण रञ्जयन् ॥ 116.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca kṣupaḥ khanitraputrastu prāpya rājyaṁ yathā pitā tathaiva pālayāmāsa prajādharmeṇa rañjayan

मार्कण्डेय ने कहा—खनित्र के पुत्र क्षुप ने राज्य प्राप्त कर, अपने पिता के समान ही प्रजा को धर्मपूर्वक प्रसन्न करते हुए उसका पालन किया।

श्लोक 2 (markandeya.116.2)

स दानशीलो यष्टा च यज्ञानामवनीपतिः । समः शत्रौ च मित्रे च व्यवहारादिवर्त्मनि ॥ 116.2 ॥

sa dānaśīlo yaṣṭā ca yajñānāmavanīpatiḥ samaḥ śatrau ca mitre ca vyavahārādivartmani

वह पृथ्वीपति दानशील था, यज्ञों का कर्ता था, और आचार-व्यवहार के मार्ग में शत्रु और मित्र दोनों के प्रति समान था।

श्लोक 3 (markandeya.116.3)

एकदा स महीपालो निजस्थानगतो मुने । सूतैरुक्तो यथा पूर्वं क्षुपो राजा तथाऽभवत् ॥ 116.3 ॥

ekadā sa mahīpālo nijasthānagato mune sūtairukto yathā pūrvaṁ kṣupo rājā tathā'bhavat

हे मुने, एक बार अपने ही स्थान पर बैठे उस राजा को सूतों ने बताया कि पूर्वकाल में राजा क्षुप कैसे थे।

श्लोक 4 (markandeya.116.4)

ब्रह्मणस्तनयः पूर्वं क्षुपोऽभूत्पृथिवीपतिः । यादृक्चरितमस्यासीत्तादृक्तस्यैव चेष्टितम् ॥ 116.4 ॥

brahmaṇastanayaḥ pūrvaṁ kṣupo'bhūtpṛthivīpatiḥ yādṛkcaritamasyāsīttādṛktasyaiva ceṣṭitam

"पहले ब्रह्मा का पुत्र क्षुप पृथ्वी का स्वामी था; उसका जैसा आचरण था, वैसा ही आचरण इसका (इस राजा का) भी है।"

श्लोक 5 (markandeya.116.5)

राजोवाच श्रोतुमिच्छामि चरितं क्षुपस्य सुमहात्मनः । यदि तादृङ्मया शक्यं चेष्टितुं तत्करोम्यहम् ॥ 116.5 ॥

rājovāca śrotumicchāmi caritaṁ kṣupasya sumahātmanaḥ yadi tādṛṅmayā śakyaṁ ceṣṭituṁ tatkaromyaham

राजा ने कहा—"मैं महात्मा क्षुप का चरित सुनना चाहता हूँ; यदि वैसा करना मेरे लिए संभव हो, तो मैं वही करूँगा।"

श्लोक 6 (markandeya.116.6)

सूता ऊचुः स चकाराकरान्भूप राजा गोब्राह्मणान्पुरा । षष्ठांशेन कृता चोर्व्यामिष्टिस्तेन महात्मना ॥ 116.6 ॥

sūtā ūcuḥ sa cakārākarānbhūpa rājā gobrāhmaṇānpurā ṣaṣṭhāṁśena kṛtā corvyāmiṣṭistena mahātmanā

सूतों ने कहा—"हे राजन्, उस राजा ने पूर्वकाल में गायों और ब्राह्मणों के लिए खानों को समृद्ध किया; और उस महात्मा ने पृथ्वी पर षष्ठांश कर लगाया।

श्लोक 7 (markandeya.116.7)

राजोवाच तेषां महात्मनां राज्ञां कोऽनुयास्यति मद्विधः । तथाप्युत्कृष्टचेतानां चेष्टासूद्यमवान्भवेत् ॥ 116.7 ॥

rājovāca teṣāṁ mahātmanāṁ rājñāṁ ko'nuyāsyati madvidhaḥ tathāpyutkṛṣṭacetānāṁ ceṣṭāsūdyamavānbhavet

राजा ने कहा—"उन महात्मा राजाओं का अनुसरण मेरे-जैसा कौन कर सकता है? फिर भी श्रेष्ठ चित्त वालों के कार्यों में उद्यमशील होना ही चाहिए।

श्लोक 8 (markandeya.116.8)

तच्छ्रूयतां प्रतिज्ञा या साम्प्रतं क्रियते मया । क्षुपस्यानुकरिष्यामि महाराजस्य चेष्टितम् ॥ 116.8 ॥

tacchrūyatāṁ pratijñā yā sāmprataṁ kriyate mayā kṣupasyānukariṣyāmi mahārājasya ceṣṭitam

तो सुनो, वह प्रतिज्ञा जो अब मैं करता हूँ—मैं महाराज क्षुप के आचरण का अनुकरण करूँगा।

श्लोक 9 (markandeya.116.9)

त्रींस्त्रीन्यज्ञान्करिष्यामि सस्यापाते गतागते । पृथिव्यां चतुरन्तायां प्रतिज्ञेयं कृता मया ॥ 116.9 ॥

trīṁstrīnyajñānkariṣyāmi sasyāpāte gatāgate pṛthivyāṁ caturantāyāṁ pratijñeyaṁ kṛtā mayā

बुआई और कटाई के प्रत्येक अवसर पर मैं तीन-तीन यज्ञ करूँगा; यह प्रतिज्ञा मैंने चतुष्कोण पृथ्वी के लिए की है।

श्लोक 10 (markandeya.116.10)

यच्च गोब्राह्मणाः पूर्वमददन्भूभृते करम् । तमेव प्रतिदास्यामि ब्राह्मणानां तथा गवाम् ॥ 116.10 ॥

yacca gobrāhmaṇāḥ pūrvamadadanbhūbhṛte karam tameva pratidāsyāmi brāhmaṇānāṁ tathā gavām

और पहले गौ-स्वामी तथा ब्राह्मण राजा को जो कर देते थे, वही मैं ब्राह्मणों को तथा गायों को वापस दूँगा।"

श्लोक 11 (markandeya.116.11)

मार्कण्डेय उवाच इति प्रतिज्ञाय वचः क्षुपस्तत्कृतवांस्तथा । सस्यापाते स यज्ञांस्त्रीनयजद्यजतांवरः ॥ 116.11 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti pratijñāya vacaḥ kṣupastatkṛtavāṁstathā sasyāpāte sa yajñāṁstrīnayajadyajatāṁvaraḥ

मार्कण्डेय ने कहा—यह प्रतिज्ञा करके क्षुप ने वैसा ही किया; यज्ञ करने वालों में श्रेष्ठ उसने प्रत्येक फसल-काल में तीन यज्ञ किए।

श्लोक 12 (markandeya.116.12)

गोब्राह्मणाः पुरा राज्ञामददद्यं च वै करम् । तावत्संख्यमदाद्वित्तमन्यद्गोब्राह्मणाय सः ॥ 116.12 ॥

gobrāhmaṇāḥ purā rājñāmadadadyaṁ ca vai karam tāvatsaṁkhyamadādvittamanyadgobrāhmaṇāya saḥ

पहले गायों और ब्राह्मणों ने राजाओं को जो कर दिया था, उसने उतना ही धन उन्हें लौटा दिया, और गायों तथा ब्राह्मणों को अन्य धन भी दिया।

श्लोक 13 (markandeya.116.13)

तस्य पुत्रोऽभवद्वीरः प्रमथायामनिन्दितः । यस्य प्रतापशौर्याभ्यां कृता वश्या महीभृतः ॥ 116.13 ॥

tasya putro'bhavadvīraḥ pramathāyāmaninditaḥ yasya pratāpaśauryābhyāṁ kṛtā vaśyā mahībhṛtaḥ

उसकी पत्नी प्रमथा से उसे एक वीर, निर्दोष पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके प्रताप और शौर्य से पृथ्वी के राजा वश में हो गए।

श्लोक 14 (markandeya.116.14)

तस्यापि नन्दिनी नाम वैदर्भी दयिताऽभवत् । विविंशं तनयं तस्यां जनयामास स प्रभुः ॥ 116.14 ॥

tasyāpi nandinī nāma vaidarbhī dayitā'bhavat viviṁśaṁ tanayaṁ tasyāṁ janayāmāsa sa prabhuḥ

उसकी भी प्रिय पत्नी नन्दिनी नाम की विदर्भ-राजकुमारी थी; उससे उस स्वामी ने विविंश नामक पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 15 (markandeya.116.15)

विविंशे शासति महीं महीपाले महौजसि । महीतलमभूद्व्याप्तं निरन्तरतया नरैः ॥ 116.15 ॥

viviṁśe śāsati mahīṁ mahīpāle mahaujasi mahītalamabhūdvyāptaṁ nirantaratayā naraiḥ

जब वह महातेजस्वी पृथ्वीपति विविंश पृथ्वी का शासन करता था, तब पृथ्वीतल निरंतर मनुष्यों से भरा रहता था।

श्लोक 16 (markandeya.116.16)

ववर्ष काले पर्जन्यो मही सस्यवती तथा । सुफलानि च सस्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ 116.16 ॥

vavarṣa kāle parjanyo mahī sasyavatī tathā suphalāni ca sasyāni rasavanti phalāni ca

समय पर मेघ बरसते थे, पृथ्वी फसलों से युक्त थी, फसलें उत्तम फल देने वाली थीं, और फल रसयुक्त थे।

श्लोक 17 (markandeya.116.17)

रसाः पुष्टिकराश्चासन्पुष्टिर्नोन्मादकारिणी । न वित्तनिचया नॄणां प्रभूतां मदहेतवः ॥ 116.17 ॥

rasāḥ puṣṭikarāścāsanpuṣṭirnonmādakāriṇī na vittanicayā nṝṇāṁ prabhūtāṁ madahetavaḥ

रस पुष्टिकारक थे, परंतु वह पुष्टि उन्मादकारी नहीं थी; और लोगों के प्रचुर धन-संचय भी अहंकार के कारण नहीं बनते थे।

श्लोक 18 (markandeya.116.18)

तत्प्रतापेन रिपवो भयमापुर्महामुने । स्वास्थ्यं जनः सुहृद्वर्गो मुदमाप सुपूजितः ॥ 116.18 ॥

tatpratāpena ripavo bhayamāpurmahāmune svāsthyaṁ janaḥ suhṛdvargo mudamāpa supūjitaḥ

हे महामुने, उसके प्रताप से शत्रुओं को भय प्राप्त हुआ; प्रजा को स्वस्थता मिली, और सम्मानित मित्रवर्ग को आनंद प्राप्त हुआ।

श्लोक 19 (markandeya.116.19)

इष्ट्वा स यज्ञान्सुबहून्सम्यक्सम्पाल्य मेदिनीम् । सङ्ग्रामे निधनं प्राप्य शक्रलोकमितो गतः ॥ 116.19 ॥

iṣṭvā sa yajñānsubahūnsamyaksampālya medinīm saṅgrāme nidhanaṁ prāpya śakralokamito gataḥ

अनेक यज्ञ करके और पृथ्वी का भलीभाँति पालन करके, वह संग्राम में मृत्यु को प्राप्त कर यहाँ से इन्द्रलोक को चला गया।

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